कपिल का सांख्य

कथा 20 · भागवतम् की कथाएँ

कपिल का सांख्य

Son Teaching Mother the Way to Freedom
स्कन्ध 3, अध्याय 25-33

कर्दम जा चुके थे। अपनी तपस्या में।

देवहूति अब अपने बेटे कपिल के साथ अकेली थी।

बेटा बड़ा हो रहा था। शान्त। ज्यादा बोलता नहीं था। पर जब बोलता, तो उसकी बातों में एक गहराई होती।

देवहूति देखती रही। एक माँ अपने बच्चे को कैसे देखती है। पर एक दिन उसने notice किया कि वो बच्चा उसे एक अलग नज़र से देख रहा था। एक माँ-बेटा रिश्ते से ऊपर।

एक दिन देवहूति ने अपने बेटे के पाँव छुए।

”क्या कर रही हो, माँ?”

”कपिल, तू मेरा बेटा है, यह सच है। मगर इन सालों में मुझे पता चला है कि तू कुछ और भी है। तू एक ज्ञानी है। मेरे लिए तू अब गुरु है।”

कपिल चुप रहे।

”मुझे सिखाओ। मुक्ति का रास्ता क्या है?”

कपिल ने अपनी माँ को देखा। उनकी आँखों में सच्ची जिज्ञासा थी। कोई बौद्धिक exercise नहीं। एक माँ जो जीवन के अंत में सिर्फ़ एक रास्ता ढूँढ रही थी।

वो बैठे। माँ सामने बैठी।

और तब बेटे ने माँ को पढ़ाना शुरू किया। यह उपदेश भागवतम् के सबसे प्यारे और गहरे हिस्सों में से एक है। ”सांख्य-दर्शन।” पर कपिल के तरीक़े से बताया गया।

”माँ, सबसे पहले समझो। यह सब जो दिखता है, यह दो चीज़ों से बना है। पुरुष और प्रकृति।”

”पुरुष यानी आत्मा। शान्त। चेतन। द्रष्टा।”

”प्रकृति यानी matter। चलने वाली, बदलने वाली, करने वाली।”

”जब पुरुष प्रकृति को देखता है, तब सब कुछ शुरू होता है। प्रकृति तीन गुणों में बँटी है, सत्त्व, रजस, तमस।”

”इन तीनों से बुद्धि बनती है, मन बनता है, अहंकार बनता है, इन्द्रियाँ बनती हैं, इन्द्रियों के विषय बनते हैं। पाँच महाभूत बनते हैं।”

देवहूति सुन रही थी। हर बात साधारण लग रही थी, मगर पकड़ने में मुश्किल भी।

”तो माँ, यह जो शरीर है, यह सिर्फ़ प्रकृति है। तेरी आँखें, तेरा मन, तेरी भावनाएँ, सब प्रकृति।”

”और जो इन सब को देख रहा है, वो पुरुष है। और वो तू है।”

”हम सब अपनी पहचान शरीर में करते हैं। यह मैं हूँ, यह मेरा बच्चा है, यह मेरा घर। पर असली ”मैं” इन सबसे अलग है, इन सब का साक्षी।”

देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् ।
स्वारब्धमश्नुते शुभाशुभमप्रवीतः ॥

जब साधक यह जान लेता है कि शरीर भी प्रकृति के नियमों में बँधा है, अपने कर्मों के फल भोगने के लिए, और वो ख़ुद शरीर से अलग है, तब वो जीवन्मुक्त हो जाता है।

”तो मुक्ति का रास्ता क्या है, बेटा?” देवहूति ने पूछा।

कपिल ने मुस्कुराया।

”दो रास्ते हैं। एक ज्ञान का, एक भक्ति का।”

”ज्ञान का रास्ता यह है कि तू देख। हर अनुभव में, अपने आप से पूछ, ”यह जो हो रहा है, यह मैं हूँ या नहीं?” धीरे-धीरे तेरा शरीर, तेरा मन, सब तुझे अलग दिखने लगेगा। और एक बात बचेगी, बस तू, साक्षी।”

”भक्ति का रास्ता और भी आसान है।”

देवहूति ने आँखें उठाईं। ”आसान? कैसे?”

”भक्ति में तू अपने ”मैं” को छोड़ती है। उसे भगवान को सौंपती है। बस। हर काम, हर साँस, हर भावना, उसे अर्पित।”

”ज्ञान में तू ख़ुद को ढूँढती है। भक्ति में तू ख़ुद को भूल जाती है। दोनों एक ही जगह जाते हैं।”

”पर भक्ति का एक बड़ा फ़ायदा है। इसमें माँग नहीं चाहिए। एक माँ अपने बच्चे को प्रेम करती है। उससे कुछ नहीं चाहती। बस प्रेम करती है। यही भक्ति है।”

देवहूति की आँखों में आँसू।

”क्या यह उतना ही simple है, बेटा?”

”हाँ माँ। बस यह।”

उसके बाद कपिल ने माँ को कई और बातें बताईं। योग के निर्देश। ध्यान कैसे करें। मन को कैसे रोकें। पाँच कोश। सात चक्र।

देवहूति ने सब को ध्यान से सुना। और याद रखा।

जब कपिल का उपदेश ख़त्म हुआ, देवहूति ने एक काम किया जो असाधारण था।

उसने तुरंत उस उपदेश को practice करना शुरू किया।

वो वहीं बैठ गई। सरस्वती के किनारे। आँखें मूँदीं। ध्यान में।

कपिल ने माँ को देखा। फिर बिना कुछ कहे, उठकर हिमालय की तरफ़ चले गए।

देवहूति बैठी रही। दिन। महीने। साल।

उनकी देह पतली होती गई। पर उनका मन साफ़ होता गया।

एक दिन वो जो ज्ञान कपिल ने दिया था, वो उनके अपने अनुभव में बदल गया।

वो अब माँ नहीं थी। न रानी। न देवहूति। बस एक आत्मा। शान्त। चेतन। आज़ाद।

पुराण कहते हैं, उस जगह पर एक झील बन गई। उसे ”सिद्धपद” कहते हैं। आज भी वहाँ साधक जाते हैं।

मन्थन

कपिल का उपदेश भागवतम् का सबसे पुराना सांख्य-वर्णन है। यह वैदिक काल से चला आ रहा एक दर्शन है, मगर कपिल ने इसे माँ-बेटे के संवाद के रूप में दिया।

इसमें एक खासियत है। ज्ञान को बहुत abstract बनाया जा सकता है। बहुत Sanskrit, बहुत terminology। कपिल यह सब बच गए, क्योंकि वो अपनी माँ से बात कर रहे थे।

एक माँ। बच्ची नहीं, मगर ज़्यादा educated भी नहीं। उन्हें practical knowledge चाहिए था। तो कपिल ने रोज़ की भाषा में, रोज़ के examples से, सब कुछ कहा।

और अंत में, कपिल ने भक्ति को ज्ञान से आसान बताया। उन्होंने नहीं कहा भक्ति inferior है। उन्होंने कहा, ”दोनों एक जगह जाते हैं, मगर भक्ति में माँग नहीं चाहिए।”

एक माँ की भावना के लिए, यह perfectly fitting उपदेश था।

और देवहूति ने एक और कमाल किया। उन्होंने सुना नहीं और भूल गई। उन्होंने वहीं तुरंत practice शुरू की।

ज्ञान सुनने के लिए नहीं, करने के लिए होता है। यह कथा का असली message है।