गजेन्द्र मोक्ष

कथा 01 · भागवतम् की कथाएँ

गजेन्द्र मोक्ष

When the Elephant’s Strength Ran Out
स्कन्ध 8, अध्याय 2-4

मध्य भारत के एक पहाड़ की बात है। नाम था त्रिकूट। तीन शिखर वाला पहाड़, जिसकी एक तरफ़ झरने थे, एक तरफ़ जंगल, और एक तरफ़ एक बड़ा सरोवर। उस सरोवर का पानी इतना ठंडा रहता कि कमल साल भर खिले मिलते।

उस पहाड़ पर एक हाथियों का झुंड रहता था। उनका नायक एक विशाल गजेन्द्र था। बहुत बड़ा, बहुत powerful। उसके दाँत ऐसे कि एक झटके में पेड़ उखाड़ दे। उसके चलने से जंगल काँपते। उसके चारों ओर मादा-हाथियाँ, बच्चे, और सब उसकी एक सूँड के इशारे पर चलते।

गर्मियों का एक दिन। सूरज सर पर। हाथियों को प्यास लगी। गजेन्द्र अपने झुंड को सरोवर तक ले गया। पानी देखकर सब उछल पड़े। मस्ती से नहाए, सूँड में पानी भर-भरकर एक-दूसरे पर डाला। थोड़ी देर पानी में ही खड़े रहे, सिर्फ़ इसलिए कि अच्छा लग रहा था।

गजेन्द्र भी पानी में उतरा। बीच में चला गया, जहाँ पानी गहरा था। एक पल को रुका। सोचा, कितना अच्छा है यह ठंडा पानी।

तभी कुछ हुआ।

पानी के नीचे से किसी ने उसके पैर को पकड़ लिया। एक मगरमच्छ। पुराना, और powerful। अपने जबड़ों से उसने गजेन्द्र की पिछली टाँग कस के पकड़ ली।

गजेन्द्र ने पहला झटका दिया। पाँव हिलाने की कोशिश की। हाथी अपनी ताक़त पर भरोसा करता है। उसके लिए ज़ोर लगाना पहला reaction है। दूसरा भी। और तीसरा भी।

ज़ोर लगाया। मगरमच्छ ने और कस के पकड़ा।

बाक़ी हाथी पास खड़े देख रहे थे। मादा-हाथियाँ चिल्लाईं, उसकी सूँड को सूँड से खींचा, उसके बच्चे आगे आए। पर मगरमच्छ पानी के अंदर था, और पानी उसका मैदान था। हाथी ज़मीन का जानवर है। उसे एक तरह से धोखा हो गया था। जिस तरफ़ वो हमेशा जीतता था, उस तरफ़ वो आज कमज़ोर था।

घंटे बीते। फिर एक दिन। फिर एक हफ़्ता।

गजेन्द्र हार नहीं मानता। वो खींचता, मगरमच्छ खींचता। एक तरफ़ ज़मीन की ताक़त, एक तरफ़ पानी की। ज़मीन पीछे हटना नहीं जानती, पानी छोड़ना नहीं जानता।

महीने बीते।

बाक़ी हाथी एक-एक करके चले गए। पहले मादाएँ, जिन्हें बच्चों की देख-भाल करनी थी। फिर बच्चे, जिन्हें भूख लगी थी। आख़िर में बाक़ी पुरुष-हाथी भी। उन्हें कहीं और से पानी चाहिए था, उनकी अपनी ज़िंदगियाँ थीं। एक नया leader भी ढूँढना था, क्योंकि यह वाला अब काम नहीं आ रहा था।

गजेन्द्र अकेला रह गया। बस वो और मगरमच्छ।

साल बीते। पुराण कहते हैं, हज़ार साल। शायद यह वो हज़ार साल हैं जो हर एक के जीवन में कहीं छिपे हैं, जब हम किसी आदत से, किसी डर से, किसी पुरानी कहानी से पकड़े जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते। हर रोज़ कोशिश करते हैं, हर रोज़ हार जाते हैं, फिर कोशिश करते हैं।

गजेन्द्र का शरीर सूखने लगा। उसके दाँत मटियाले हो गए। उसकी आँखों की चमक गई। पर वो अपनी ताक़त लगाता रहा। यही उसका तरीक़ा था। यही उसकी पहचान थी, हाथियों का राजा।

पर एक पल आया।

हम सब को आता है। जब आदमी अपनी पकड़ की हर चीज़ try कर चुका हो। हर ज़ोर, हर रणनीति, हर option। और कुछ भी काम नहीं किया हो।

उस पल में, गजेन्द्र को एक बात याद आई।

वो हमेशा से हाथी नहीं था। बहुत-बहुत पहले, किसी जन्म में, वो एक राजा था। नाम था इन्द्रद्युम्न। वो एक भक्त था। पाण्ड्य देश का राजा। उसने अपना सब कुछ छोड़कर सन्यास लिया था। मलय पर्वत पर ध्यान करता था।

एक दिन अगस्त्य ऋषि वहाँ आए थे। राजा ध्यान में इतना डूबा था कि उठा नहीं। अगस्त्य ने ग़ुस्से में शाप दिया, ”जा, हाथी बन।” एक राजा का अपमान, एक ऋषि का क्रोध। तब से वो हाथी था।

पर ज़रूर एक बात राजा से बच गई थी, हाथी में भी। एक memory। एक भक्त की memory।

आज, इस आख़िरी पल में, उसके सूखे होंठों से वो पुरानी बात निकली।

इस बार किसी specific नाम के साथ नहीं। न ”हे राम,” न ”हे विष्णु।” इस बार जिसे वो ”वो जो सब का स्रोत है” कहते थे, उसी को पुकारा। बिना नाम के। बिना रूप के। बस एक भीतर से उठी आवाज़।

उसकी सूँड के पास एक कमल था। उसने उसे ऊपर उठाया। पानी से थोड़ा सा बाहर निकाला, जैसे एक offering।

और पुकारा।

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायाद्बीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
(श्रीमद्भागवत 8.3.2)

नमस्कार है उन भगवान को, जो इस सब का चित्-स्वरूप हैं, जो परम पुरुष हैं, सब का बीज हैं, परम ईश्वर हैं। हम उन्हीं का ध्यान करते हैं।

यह वो पल था जब गजेन्द्र का अपना सब कुछ ख़त्म हो गया था। उसकी ताक़त, उसका झुंड, उसका रुतबा, उसकी पहचान। सब। और इसी ख़त्म होने में, एक दरवाज़ा खुल गया।

ब्रह्मांड के दूसरे कोने में, वैकुण्ठ में, विष्णु आराम कर रहे थे। शेषनाग पर लेटे हुए। लक्ष्मी पाँव दबा रही थीं। ब्रह्मा, शिव, बाक़ी देव सब अपने-अपने काम में।

अचानक विष्णु उठ बैठे।

बिना कुछ कहे, बिना शस्त्र उठाए, बिना मुकुट पहने, वो दौड़े। गरुड़ कहीं था, उसे पुकारने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी, वो अपने आप आ गया।

विष्णु गरुड़ पर बैठे और सरोवर की तरफ़ उड़े।

यह scene भागवतम् में बहुत precious है। भगवान दौड़े जा रहे हैं, बिना किसी planning के, बिना ceremony के। उनके पीछे लक्ष्मी, ब्रह्मा, बाक़ी देव, सब हड़बड़ी में पीछे आते हैं। पर वो रुकते नहीं।

क्यों? क्योंकि एक भक्त ने पहली बार सच्चे में पुकारा है। ”सच्चा” का यहाँ एक specific meaning है, बिना किसी और support के, बिना किसी backup plan के, बिना ख़ुद की ताक़त पर भरोसे के।

सरोवर पहुँचे।

गजेन्द्र अपने आख़िरी साँस में था। मगरमच्छ अभी भी उसकी टाँग पकड़े हुए। पानी लाल हो रहा था।

विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र भेजा। एक झटके में मगरमच्छ दो टुकड़ों में।

और कुछ बहुत interesting हुआ।

मगरमच्छ, जिसे काटा गया था, उसकी आत्मा एक दिव्य रूप में निकली। वो भी मुक्त हो गया। वो भी पुराने जन्म में एक गन्धर्व-राजा था, हू-हू। देवल मुनि ने उसे शाप दिया था कि जा, पानी में मगरमच्छ बन। आज, विष्णु के चक्र से, उसका शाप भी मिटा।

तो एक ही action से दो मुक्तियाँ। पकड़ने वाला और पकड़ा जाने वाला, दोनों।

गजेन्द्र ने विष्णु को देखा। पहली बार। हज़ार साल की उस लड़ाई के बाद, उसकी आँखें खुलीं और सामने भगवान खड़े थे। उसकी आँखें भर आईं।

विष्णु ने उसके सिर पर हाथ रखा। हाथी का रूप गिर गया। उसकी जगह एक चार-हाथों वाला पार्षद आ खड़ा हुआ। वैकुण्ठ का सेवक। उसके पुराने जन्म का राजा-स्वरूप वापस, मगर अब और भी ऊँचा।

विष्णु उसे साथ ले गए।

बादलों के पीछे यह सब हो रहा था। नीचे का पहाड़, सरोवर, खाली पानी जहाँ कभी एक मगरमच्छ और एक हाथी की हज़ार-साल की लड़ाई थी, अब बस शान्त था। पास का जंगल अब भी हरा था। कुछ भी नहीं बदला था, और सब कुछ बदल गया था।

मन्थन

गजेन्द्र की कथा भागवतम् की सबसे लोकप्रिय कथाओं में से एक है, और शायद सबसे personal भी। कई संत-कवियों ने इसे अपने जीवन की कथा कहा है। तुलसी, सूरदास, मीराबाई, सब के बीच यह कथा एक common thread है।

क्यों? क्योंकि हम सब किसी न किसी मगरमच्छ की पकड़ में हैं। किसी डर की, किसी आदत की, किसी रिश्ते की, किसी पुरानी कहानी की। और हम सब अपनी ताक़त से उसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। सालों-साल।

कथा का असली turn वहाँ नहीं है जहाँ विष्णु आते हैं। असली turn वहाँ है जहाँ गजेन्द्र अपनी ख़ुद की ताक़त पर भरोसा करना छोड़ता है। जहाँ वो स्वीकार करता है कि उसकी अपनी कोशिशें ख़त्म हो गईं। यह बिंदु, यह helplessness, ही दरवाज़ा है।

भागवतम् यह नहीं कहता कि कोशिश छोड़ दो। हाथी ने हज़ार साल कोशिश की। मगर एक पल आता है जब effort का अर्थ ही transform हो जाता है। जब अपनी कोशिश ख़त्म होती है, तब पुकार शुरू होती है। और सच्ची पुकार के सामने वैकुण्ठ अपनी सब rituals छोड़कर दौड़ता है।