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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

गजेन्द्र मोक्ष

कथा 01 · भागवतम् की कथाएँ

गजेन्द्र मोक्ष

जब गजेन्द्र का बल चुक गया
स्कन्ध 8, अध्याय 2-4

“नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है।”

गजेन्द्र-मोक्ष की पूरी कथा यहीं मुड़ जाती है।

भागवतम् 8.3, गजेन्द्र मोक्ष

क्षीरसागर के बीच एक पहाड़ की बात है। नाम था त्रिकूट। तीन शिखर वाला पहाड़, पूरे दस हज़ार योजन ऊँचा, और उतना ही चौड़ा-लम्बा भी। उसके तीनों शिखर एक चाँदी का, एक लोहे का, एक सोने का, और चारों ओर दूध-सा सागर लहराता। उसकी तलहटी में भगवान् वरुण का एक उद्यान था, ऋतुमान् नाम का, जहाँ हर ऋतु में फूल और फल लदे रहते। उसी उद्यान में एक बड़ा भारी सरोवर था, जिसका पानी इतना निर्मल और शीतल रहता कि सुनहले कमल साल भर खिले मिलते।

उस पहाड़ पर एक हाथियों का झुंड रहता था। उनका नायक एक विशाल गजेन्द्र था। बहुत बड़ा, बहुत बलवान। उसके दाँत ऐसे कि एक झटके में पेड़ उखाड़ दे। उसके चलने से जंगल काँपते, और उसकी गन्ध मात्र से सिंह, बाघ, गैंडे तक डरकर भाग जाते। उसके चारों ओर मादा-हाथियाँ, बच्चे, और सब उसकी एक सूँड के इशारे पर चलते।

गर्मियों का एक दिन। सूरज सर पर। हाथियों को प्यास लगी। दूर से उस सरोवर के कमलों की महक हवा में आई, और गजेन्द्र अपने झुंड को उसी ओर ले चला। पानी देखकर सब उछल पड़े। मस्ती से नहाए, सूँड में पानी भर-भरकर एक-दूसरे पर डाला। थोड़ी देर पानी में ही खड़े रहे, सिर्फ़ इसलिए कि अच्छा लग रहा था।

गजेन्द्र अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ सरोवर में जल-क्रीड़ा में मगन, अनजान कि जल के भीतर कुछ हिल उठा है।
गजेन्द्र अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ सरोवर में जल-क्रीड़ा में मगन, अनजान कि जल के भीतर कुछ हिल उठा है।

गजेन्द्र भी पानी में उतरा। पहले जी भरकर पिया, फिर भीतर तक नहाया और अपनी थकान मिटाई। गृहस्थ की भाँति मोह में डूबकर सूँड से फुहारें छोड़-छोड़कर अपनी हथिनियों और बच्चों को नहलाने लगा, उनके मुँह में सूँड डालकर पानी पिलाने लगा। भगवान् की माया से मोहित वह उन्मत्त हो रहा था, और उस बेचारे को पता ही न था कि उसके सिर पर कितनी बड़ी विपत्ति मँडरा रही है।

तभी पानी के भीतर कुछ हिला।

जल में अठखेलियाँ करते गजेन्द्र के पाँव को मगरमच्छ ने अचानक अपने जबड़ों में जकड़ लिया।
जल में अठखेलियाँ करते गजेन्द्र के पाँव को मगरमच्छ ने अचानक अपने जबड़ों में जकड़ लिया।

पानी के नीचे से किसी ने उसके पैर को पकड़ लिया। एक बलवान् ग्राह, एक मगरमच्छ। पुराना, और मज़बूत। प्रारब्ध की प्रेरणा से क्रोध में भरकर उसने गजेन्द्र का पैर अपने जबड़ों में कस लिया।

गजेन्द्र ने पहला झटका दिया। पाँव हिलाने की कोशिश की। हाथी अपनी ताक़त पर भरोसा करता है। उसके लिए ज़ोर लगाना पहला सहारा है। दूसरा भी। और तीसरा भी।

ज़ोर लगाया। मगरमच्छ ने और कस के पकड़ा।

बाक़ी हाथी पास खड़े देख रहे थे। मादा-हाथियाँ चिल्लाईं, उसकी सूँड को सूँड से खींचा, उसके बच्चे आगे आए। पर मगरमच्छ पानी के अंदर था, और पानी उसका मैदान था। हाथी ज़मीन का जानवर है। जिस ताक़त के बल पर वो हमेशा जीतता आया था, आज वही ताक़त पानी में उसके किसी काम न आई।

दूसरे हाथियों ने पीछे से खींचकर उसे छुड़ाने की कोशिश की, पर ग्राह का बल भारी पड़ा। कभी गजेन्द्र उसे पानी से बाहर खींच लाता, कभी ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींच ले जाता। दोनों अपनी पूरी शक्ति लगा रहे थे।

भागवत इस संघर्ष की अवधि एक हज़ार वर्ष बताता है। दोनों जीवित रहे और देवता भी यह देखकर चकित हुए। इतने लम्बे समय तक बार-बार पानी में खींचे जाने से गजेन्द्र का शरीर, मन और इन्द्रियों का बल क्षीण हो गया। ग्राह जलचर था, इसलिए पानी में उसका उत्साह और शक्ति बढ़ती गई।

पर एक पल आया।

वह पल जब अपने हाथ की हर चीज़ आज़माई जा चुकी हो। हर ज़ोर, हर तरकीब, हर दाँव। और किसी से कुछ न बना हो।

उस पल में, गजेन्द्र को एक बात याद आई।

गजेन्द्र मोक्ष की कथा में गजराज और भगवान् की करुणा-भरी लीला का यह अंश।
गजेन्द्र मोक्ष की कथा में गजराज और भगवान् की करुणा-भरी लीला का यह अंश।

वो हमेशा से हाथी नहीं था। बहुत पहले, किसी जन्म में, वो एक राजा था। नाम था इन्द्रद्युम्न। वो एक भक्त था। द्रविड़ देश का, पाण्ड्यवंशी राजा। उसने अपना सब कुछ छोड़कर तपस्वी का वेश ले लिया था, जटाएँ बढ़ा लीं, मलय पर्वत पर मौनव्रत धारण कर भगवान् की आराधना करता था।

एक दिन अगस्त्य ऋषि अपनी शिष्यमण्डली के साथ वहाँ आ पहुँचे। राजा मौन में, ध्यान में इतना डूबा था कि बैठा रहा और ऋषि का आदर-सत्कार करने से चूक गया। अगस्त्य ने क्रोध में आकर शाप दिया, “इस राजा ने गुरुजनों से शिक्षा नहीं ली, अभिमानवश सबकी सेवा-सत्कार छोड़कर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला यह हाथी के समान जडबुद्धि है, इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।” इतना कहकर ऋषि अपने शिष्यों के साथ लौट गए। तब से वो हाथी था।

पर एक बात राजा से बच रही थी, हाथी में भी। एक स्मृति। एक भक्त की स्मृति। भगवान् की आराधना का ऐसा प्रभाव था कि हाथी होने पर भी उसे भगवान् की याद बाक़ी रह गई थी।

संकट में उसने मन को हृदय में एकाग्र किया और पूर्वजन्म में सीखा हुआ स्तोत्र स्मरण करके भगवान् की स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना सबके आदि-कारण, साक्षी और परम आश्रय को सम्बोधित थी।

उसकी सूँड के पास पानी पर एक कमल काँप रहा था। बची हुई शक्ति से उसने उसे थामा और अर्पण के लिए पानी के ऊपर उठा दिया।

और पुकारा।

बड़े कष्ट से उसने कहा, “नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है।”

गजेन्द्र की पुकार सुनकर भगवान् चक्र लिए गरुड़ पर चढ़कर सरोवर की ओर दौड़ पड़े।
गजेन्द्र की पुकार सुनकर भगवान् चक्र लिए गरुड़ पर चढ़कर सरोवर की ओर दौड़ पड़े।

भगवान् ने गजेन्द्र की पीड़ा देखी और उसकी स्तुति सुनी। हाथ में चक्र लिए, वेदमय गरुड़ पर सवार होकर वे बड़ी शीघ्रता से सरोवर की ओर आए। उनके साथ स्तुति करते हुए देवता भी पहुँचे।

सरोवर पहुँचे।

गजेन्द्र अपने आख़िरी साँस में था। मगरमच्छ अभी भी उसकी टाँग पकड़े हुए।

गरुड़ पर सवार भगवान् चक्र लिए सरोवर की ओर दौड़े आए, गजेन्द्र मगरमच्छ की पकड़ में अंतिम साँसें गिन रहा था।
गरुड़ पर सवार भगवान् चक्र लिए सरोवर की ओर दौड़े आए, गजेन्द्र मगरमच्छ की पकड़ में अंतिम साँसें गिन रहा था।

विष्णु गरुड़ से कूद पड़े और गजेन्द्र को मगरमच्छ समेत, दोनों को सरोवर से बाहर खींच निकाला। फिर सबके देखते-देखते सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुँह चीर डाला।

मगरमच्छ के शरीर से उसी क्षण एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। वह पूर्वजन्म में हूहू नाम का श्रेष्ठ गन्धर्व था और देवल मुनि के शाप से ग्राह बना था। भगवान् की कृपा से मुक्त होकर उसने प्रणाम किया, परिक्रमा की, स्तुति गाई और अपने लोक को चला गया।

भगवान् के स्पर्श से गजेन्द्र अज्ञान के बन्धन से मुक्त हुआ। उसे पीताम्बरधारी, चतुर्भुज पार्षद का स्वरूप मिला और वह भगवान् के साथ गरुड़ पर बैठा।

जाने से पहले भगवान् ने इस प्रसंग का फल बताया। रात के पिछले पहर में गजेन्द्र की स्तुति से उनका स्तवन करने वाले को मृत्यु के समय निर्मल स्मृति प्राप्त होगी। फिर उन्होंने पाञ्चजन्य शंख बजाया, देवताओं को आनन्दित किया और गजेन्द्र को साथ लेकर अपने धाम चले गए।


साहित्यिक-संदर्भ

गजेन्द्र-मोक्ष की कथा श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 2 से 4 तक आती है। गजेन्द्र की स्तुति परम पुरुष, सबके आदि-कारण और साक्षी को सम्बोधित है। ग्रन्थ स्वयं स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा आदि देवता इसलिए नहीं आए, क्योंकि स्तुति किसी सीमित देव-पद की नहीं थी; सर्वदेवस्वरूप श्रीहरि प्रकट हुए (8.3.30)। अन्त में भगवान् प्रतिज्ञा करते हैं कि रात के पिछले पहर में इस स्तोत्र से उनका स्मरण करने वाले को मृत्यु के समय निर्मल मति मिलेगी (8.4.25)।

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