Lulla Family

गजेन्द्र मोक्ष

कथा 01 · भागवतम् की कथाएँ

गजेन्द्र मोक्ष

When the Elephant’s Strength Ran Out
स्कन्ध 8, अध्याय 2-4

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

सिर्फ़ “हे जगद्गुरो।” बस इतना। और श्रीहरि आ गए।

गजेन्द्र-मोक्ष की पूरी कथा यहीं मुड़ जाती है।

भागवतम् 8.3, गजेन्द्र मोक्ष

परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और पूछा, ”भगवन्, आपने कहा था कि अंत समय में जो एक बार सच्चे मन से पुकार ले, उसका बेड़ा पार है। पर मेरे पास अब छह ही दिन हैं, और भीतर अब भी कभी-कभी काँप उठता हूँ। हमें यह बताइए, जिसके पास न जप की विधि हो, न शास्त्र का ज्ञान, न शब्द भी ठीक से, क्या उसकी पुकार भी सुनी जाती है?”

शुकदेव कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, ”राजन्, एक ऐसा ही पुकारने वाला था। न मनुष्य, न ऋषि। एक हाथी। सुनिए।”


क्षीरसागर के बीच एक पहाड़ की बात है। नाम था त्रिकूट। तीन शिखर वाला पहाड़, पूरे दस हज़ार योजन ऊँचा, और उतना ही चौड़ा-लम्बा भी। उसके तीनों शिखर एक चाँदी का, एक लोहे का, एक सोने का, और चारों ओर दूध-सा सागर लहराता। उसकी तलहटी में भगवान् वरुण का एक उद्यान था, ऋतुमान् नाम का, जहाँ हर ऋतु में फूल और फल लदे रहते। उसी उद्यान में एक बड़ा भारी सरोवर था, जिसका पानी इतना निर्मल और शीतल रहता कि सुनहले कमल साल भर खिले मिलते।

उस पहाड़ पर एक हाथियों का झुंड रहता था। उनका नायक एक विशाल गजेन्द्र था। बहुत बड़ा, बहुत बलवान। उसके दाँत ऐसे कि एक झटके में पेड़ उखाड़ दे। उसके चलने से जंगल काँपते, और उसकी गन्ध मात्र से सिंह, बाघ, गैंडे तक डरकर भाग जाते। उसके चारों ओर मादा-हाथियाँ, बच्चे, और सब उसकी एक सूँड के इशारे पर चलते।

गर्मियों का एक दिन। सूरज सर पर। हाथियों को प्यास लगी। दूर से उस सरोवर के कमलों की महक हवा में आई, और गजेन्द्र अपने झुंड को उसी ओर ले चला। पानी देखकर सब उछल पड़े। मस्ती से नहाए, सूँड में पानी भर-भरकर एक-दूसरे पर डाला। थोड़ी देर पानी में ही खड़े रहे, सिर्फ़ इसलिए कि अच्छा लग रहा था।

A rich painterly classical-Indian color illustration: the mighty elephant-king Gajendra, a huge bull elephant with long tusks, stands chest-deep in a crystal-clear lake on Mount Trikuta, joyfully bathing his herd of she-elephants and calves, spraying water over them with his trunk and pouring water into their mouths; the lake brims with golden lotuses, lush flowering Rituman garden and a triple-peaked silver-iron-gold mountain behind, milk-white ocean on the horizon, bright summer sun, festive and serene mood.

गजेन्द्र भी पानी में उतरा। पहले जी भरकर पिया, फिर भीतर तक नहाया और अपनी थकान मिटाई। गृहस्थ की भाँति मोह में डूबकर सूँड से फुहारें छोड़-छोड़कर अपनी हथिनियों और बच्चों को नहलाने लगा, उनके मुँह में सूँड डालकर पानी पिलाने लगा। भगवान् की माया से मोहित वह उन्मत्त हो रहा था, और उस बेचारे को पता ही न था कि उसके सिर पर कितनी बड़ी विपत्ति मँडरा रही है।

तभी पानी के भीतर कुछ हिला।

A dramatic painterly classical-Indian color illustration: a powerful old crocodile (graha) lunges from beneath the clear lotus-lake water and clamps its jaws around the hind leg of the great elephant Gajendra; the elephant rears in shock, trunk lifted, eyes wide; golden lotuses scatter on rippling water, the Rituman garden and triple-peaked Trikuta mountain in the background, tense and ominous mood with sun overhead.

पानी के नीचे से किसी ने उसके पैर को पकड़ लिया। एक बलवान् ग्राह, एक मगरमच्छ। पुराना, और मज़बूत। प्रारब्ध की प्रेरणा से क्रोध में भरकर उसने गजेन्द्र का पैर अपने जबड़ों में कस लिया।

गजेन्द्र ने पहला झटका दिया। पाँव हिलाने की कोशिश की। हाथी अपनी ताक़त पर भरोसा करता है। उसके लिए ज़ोर लगाना पहला सहारा है। दूसरा भी। और तीसरा भी।

ज़ोर लगाया। मगरमच्छ ने और कस के पकड़ा।

बाक़ी हाथी पास खड़े देख रहे थे। मादा-हाथियाँ चिल्लाईं, उसकी सूँड को सूँड से खींचा, उसके बच्चे आगे आए। पर मगरमच्छ पानी के अंदर था, और पानी उसका मैदान था। हाथी ज़मीन का जानवर है। जिस ताक़त के बल पर वो हमेशा जीतता आया था, आज वही ताक़त पानी में उसके किसी काम न आई।

घंटे बीते। फिर एक दिन। फिर एक हफ़्ता।

गजेन्द्र हार नहीं मानता। वो खींचता, मगरमच्छ खींचता। एक तरफ़ ज़मीन की ताक़त, एक तरफ़ पानी की। ज़मीन पीछे हटना नहीं जानती, पानी छोड़ना नहीं जानता।

महीने बीते।

बाक़ी हाथी एक-एक करके चले गए। पहले मादाएँ, जिन्हें बच्चों की देख-भाल करनी थी। फिर बच्चे, जिन्हें भूख लगी थी। आख़िर में बाक़ी पुरुष-हाथी भी। उन्होंने भी उसे बलवान् ग्राह की पकड़ से छुड़ाना चाहा, पर इसमें असमर्थ रहे। आख़िर उन्हें कहीं और से पानी चाहिए था, उनकी अपनी ज़िंदगियाँ थीं।

गजेन्द्र अकेला रह गया। बस वो और मगरमच्छ।

साल बीते। भागवत कहता है, एक हज़ार साल। शायद यह वो हज़ार साल हैं जो हर एक के जीवन में कहीं छिपे हैं, जब हम किसी आदत से, किसी डर से, किसी पुरानी कहानी से पकड़े जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते। हर रोज़ कोशिश करते हैं, हर रोज़ हार जाते हैं, फिर कोशिश करते हैं।

बहुत दिनों तक बार-बार पानी में खींचे जाने से गजेन्द्र का शरीर शिथिल पड़ गया। न शरीर में बल रहा, न मन में उत्साह। शक्ति भी क्षीण हो गई। पर मगरमच्छ तो जलचर ठहरा, उसकी शक्ति पानी में और बढ़ गई, और वह और भी ज़ोर लगाकर खींचने लगा। फिर भी गजेन्द्र अपनी बची-खुची ताक़त लगाता रहा। यही उसका तरीक़ा था। यही उसकी पहचान थी, हाथियों का राजा।

पर एक पल आया।

वह पल जब अपने हाथ की हर चीज़ आज़माई जा चुकी हो। हर ज़ोर, हर तरकीब, हर दाँव। और किसी से कुछ न बना हो।

उस पल में, गजेन्द्र को एक बात याद आई।

A reverent painterly classical-Indian color illustration of a past-life memory: King Indradyumna, the Pandya-dynasty Dravidian monarch turned ascetic, sits in deep silent meditation with matted hair (jata) and an ascetic's bark garment on the forested Malaya mountain; sage Agastya arrives with his band of disciples in the background, unnoticed by the absorbed king; soft forest greens, devotional golden light, contemplative mood.

वो हमेशा से हाथी नहीं था। बहुत पहले, किसी जन्म में, वो एक राजा था। नाम था इन्द्रद्युम्न। वो एक भक्त था। द्रविड़ देश का, पाण्ड्यवंशी राजा। उसने अपना सब कुछ छोड़कर तपस्वी का वेश ले लिया था, जटाएँ बढ़ा लीं, मलय पर्वत पर मौनव्रत धारण कर भगवान् की आराधना करता था।

एक दिन अगस्त्य ऋषि अपनी शिष्यमण्डली के साथ वहाँ आ पहुँचे। राजा मौन में, ध्यान में इतना डूबा था कि न उठा, न उनका आदर किया। अगस्त्य ने क्रोध में आकर शाप दिया, ”इस राजा ने गुरुजनों से शिक्षा नहीं ली, अभिमानवश सबकी सेवा-सत्कार छोड़कर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला यह हाथी के समान जडबुद्धि है, इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।” इतना कहकर ऋषि अपने शिष्यों के साथ लौट गए। तब से वो हाथी था।

पर एक बात राजा से बच रही थी, हाथी में भी। एक स्मृति। एक भक्त की स्मृति। भगवान् की आराधना का ऐसा प्रभाव था कि हाथी होने पर भी उसे भगवान् की याद बाक़ी रह गई थी।

आज, इस आख़िरी पल में, उसके सूखे होंठों से वो पुरानी बात निकली।

इस बार किसी एक नाम के साथ नहीं। न ”हे राम,” न ”हे विष्णु।” इस बार जिसे वो कभी ”वो, जो सब का मूल कारण है” कहता था, उसी को पुकारा। बिना नाम के, बिना रूप के। बस भीतर के किसी गहरे तल से उठी एक आवाज़, जो किसी एक देवता को नहीं, सबके आदि-कारण को टटोल रही थी।

उसकी सूँड के पास पानी पर एक कमल काँप रहा था। बची-खुची साँस से उसने उसे थामा, और थरथराती सूँड से पानी के ऊपर उठा दिया। चढ़ावे की तरह।

और पुकारा।

यह वो पल था जब गजेन्द्र का अपना सब कुछ ख़त्म हो गया था। उसकी ताक़त, उसका झुंड, उसका रुतबा, उसकी पहचान। सब। और इसी ख़त्म होने में, एक दरवाज़ा खुल गया।

विष्णु के एकमात्र आश्रय परब्रह्म ने उस पुकार को सुना। उन्होंने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है।

अचानक वो उठ बैठे।

A majestic painterly classical-Indian color illustration: four-armed blue-complexioned Lord Vishnu, in yellow silk, holding the Sudarshana chakra, rides swiftly through the sky on the great Vedic eagle Garuda, rushing toward the lake to rescue his devotee; celestial gods follow behind singing his praises, clouds and golden radiance around them, urgent compassionate mood.

बिना देर किए, हाथ में चक्र लिए, वो वेदमय गरुड़ पर सवार हुए और बड़ी शीघ्रता से सरोवर की ओर चल पड़े। उनके साथ स्तुति करते हुए देवता भी आए।

भगवान् दौड़े जा रहे थे। न कोई तैयारी, न कोई समारोह। पर वो रुके नहीं।

क्यों? क्योंकि एक भक्त ने पहली बार सच्चे मन से पुकारा था। और ‘सच्चे मन से’ के माने यहाँ यही थे, कि अब न कोई और सहारा बचा था, न कोई दूसरी तरकीब, न अपनी ताक़त पर ज़रा-सा भी भरोसा।

सरोवर पहुँचे।

गजेन्द्र अपने आख़िरी साँस में था। मगरमच्छ अभी भी उसकी टाँग पकड़े हुए।

A climactic painterly classical-Indian color illustration: four-armed Lord Vishnu, having leapt from Garuda, drags both the exhausted elephant Gajendra and the clinging crocodile out of the lake onto the shore, then with his glowing Sudarshana chakra severs the crocodile's jaws; the weary elephant lifts his trunk holding a single lotus offering, watching gods looking on from above, lake and triple-peaked Trikuta behind, radiant mood of deliverance.

विष्णु गरुड़ से कूद पड़े और गजेन्द्र को मगरमच्छ समेत, दोनों को सरोवर से बाहर खींच निकाला। फिर सबके देखते-देखते सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुँह चीर डाला।

और फिर एक बात हुई।

मगरमच्छ, जिसे काटा गया था, उसी क्षण एक दिव्य रूप में प्रकट हो गया। वो भी मुक्त हो गया। वो भी पुराने जन्म में एक श्रेष्ठ गन्धर्व था, हूहू। देवल मुनि ने उसे शाप दिया था कि जाइए, पानी में मगरमच्छ बन जाइए। आज, विष्णु के चक्र से, उसका शाप भी मिट गया।

तो एक ही प्रहार से दो मुक्तियाँ। पकड़ने वाला और पकड़ा जाने वाला, दोनों।

गजेन्द्र ने विष्णु को देखा। पहली बार। हज़ार साल की उस लड़ाई के बाद, उसकी थकी आँखें उठीं और सामने भगवान खड़े थे। बूढ़ी, धँसी हुई आँखों से पानी बहने लगा, और वो उन्हें बस देखता रहा।

विष्णु ने उसके सिर पर हाथ रखा। हाथी का रूप गिर गया। उसकी जगह एक चार-हाथों वाला, पीताम्बरधारी पार्षद आ खड़ा हुआ। वैकुण्ठ का सेवक। उसके पुराने जन्म का राजा-स्वरूप वापस, मगर अब और भी ऊँचा।

विष्णु उसे साथ ले गए।

बादलों के पीछे यह सब हो रहा था। नीचे पहाड़, सरोवर, और वह खाली पानी, जहाँ कभी एक मगरमच्छ और एक हाथी हज़ार साल जूझे थे, अब निथरा पड़ा था। पास का जंगल पहले जैसा ही हरा था, पर उस सरोवर के ऊपर एक ख़ामोशी उतर आई थी जो पहले कभी न थी।


शुकदेव चुप हुए। परीक्षित् कुछ देर कुछ न बोले।

फिर धीरे से कहा, ”भगवन्, तो विधि नहीं, शब्द नहीं, यहाँ तक कि नाम भी नहीं। बस वह घड़ी, जब अपना सारा बल चुक जाए।”

”हाँ, राजन्,” शुकदेव बोले। ”गजराज ने हज़ार साल अपने बल से लड़ाई लड़ी। श्रीहरि तब नहीं आए। वो उस पल आए जब उसने बल पर भरोसा करना छोड़ दिया। पुकार उसी पल सच्ची हुई, जब पुकारने वाले के पास अपनी कोई चीज़ न बची।”

परीक्षित् कुछ देर मौन रहे। छह दिन रह गए थे।

मन्थन

गजेन्द्र की कथा भागवतम् की परम प्रिय कथाओं में से एक है, और शायद सब में अपनी-सी भी। कई संत-कवियों ने इसे अपने ही जीवन की कथा माना है, क्योंकि सबकी पुकार में यह एक ही धागा बँधा मिलता है।

क्यों? क्योंकि हम सब किसी न किसी मगरमच्छ की पकड़ में हैं। किसी डर की, किसी आदत की, किसी रिश्ते की, किसी पुरानी कहानी की। और हम सब अपने ही बल से उसे तोड़ने में लगे रहते हैं। सालों-साल।

कथा अत्यन्त गहरे वहाँ नहीं मुड़ती जहाँ विष्णु आते हैं। वो वहाँ मुड़ती है जहाँ गजेन्द्र अपने बल पर भरोसा करना छोड़ देता है। जहाँ वो मान लेता है कि उसकी अपनी सारी कोशिशें चुक गईं। यही बेबसी का बिंदु ही वह दरवाज़ा है।

भागवतम् यह नहीं कहता कि कोशिश छोड़ दीजिए। हाथी ने हज़ार साल कोशिश की। पर एक घड़ी आती है जब कोशिश का अर्थ ही बदल जाता है। जब अपना ज़ोर ख़त्म होता है, तभी पुकार शुरू होती है। और सच्ची पुकार के सामने वैकुण्ठ अपने सारे विधि-विधान छोड़कर दौड़ पड़ता है।

साहित्यिक-संदर्भ

गजेन्द्र-मोक्ष की कथा श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 2 से 4 तक आती है। यह पूरे ग्रन्थ की परम मार्मिक शरण-कथाओं में है, क्योंकि शरणागत स्वयं एक मूक पशु है। गज की पुकार किसी एक देवता को नहीं, सबके आदि-कारण परम पुरुष को सम्बोधित है (8.3.2), और इसी कारण यह स्तोत्र वैष्णव, शैव और शाक्त, सभी परम्पराओं में पाठ-योग्य माना गया।