गोपी गीत
कृष्ण ग़ायब हो गए।
गोपियाँ रास के बीच में अकेली रह गईं। चाँदनी में। यमुना तट पर।
पहले हैरानी। फिर डर। फिर एक तीव्र चाह।
”वो कहाँ गया?”
वो एक-एक करके उठीं। दौड़ीं। पेड़ों के बीच। बाग़ों में। नदी के किनारे।
हर जगह वही प्रश्न।
एक गोपी एक कदम्ब के पेड़ के पास खड़ी हुई।
”हे पेड़, क्या तूने हमारे प्यारे को देखा? वो जिसका रंग तेरी छाँव जैसा है। बाँसुरी बजाते। मोर-पंख माथे पर।”
पेड़ चुप।
एक गोपी एक हिरन के पास पहुँची।
”हे हिरन, तुझे तो उसने कई बार दौड़ाया है। तू उसकी आँखें पहचानती है, सुना है। बता, वो कहाँ गया?”
हिरन ने सिर्फ़ देखा। आँखों में बात तो दिखी, मगर कोई जवाब नहीं।
एक गोपी एक लता से कह रही थी।
”हे माधवी, उसके पैर के नीचे तू कई बार दबी है। तू उसकी ख़ुशबू जानती है। उसकी कौन सी direction है आज?”
हर एक से पूछा। हर एक चुप।
अंत में सब गोपियाँ एक जगह इकट्ठी हुईं। एक छोटे से मैदान में। बैठ गईं।
और तब उन्होंने जो गीत गाया, वो भागवतम् का सबसे ऊँचा सुर है।
गोपी-गीत।
उन्होंने पहले कृष्ण को पुकारा।
”हे कृष्ण,” उनकी आवाज़ धीरे शुरू हुई।
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका-
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥
(श्रीमद्भागवत 10.31.1)
तेरे जन्म से व्रज की महिमा बढ़ी। लक्ष्मी ख़ुद यहाँ आकर बैठ गई हैं। हे प्रिय, चारों दिशाओं में देख, तेरी अपनी लोग, अपने प्राण तुझ में रखकर, तुझे ढूँढ रही हैं।
गीत आगे बढ़ा। अब तीखा।
”तेरी मुस्कान हमारी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धन है। तेरी आँख का एक नज़र हमारे लिए vedic ज्ञान है। तेरी बात हमारे लिए मन्त्र। तेरी छाया हमारी रक्षा।”
”और अब? कहाँ हो?”
”क्या यह तेरा खेल है? हमें छोड़कर देखना कि हम कितना तुझे ढूँढते हैं?”
”अगर है तो, मान लिया, हम तेरे बिना नहीं रह सकतीं।”
”हमारे घर हैं, परिवार हैं, पति हैं। मगर वो सब अब बेकार। सब सिर्फ़ background है। हमारा centre तू है।”
”हमने अपनी सब लाज छोड़ दी, अपनी सब इज़्ज़त। हमने तेरे लिए सब छोड़ा। और तू हमें छोड़ रहा है?”
”क्या यह न्याय है? बता।”
”हमारे पैर तेरी तरफ़ चले, यह सही है। मगर हमारे पैर हमारे नहीं। तेरी बाँसुरी ने उन्हें खींचा। तो हम क्यों ज़िम्मेदार?”
एक गोपी ने और कुछ कहा।
”देख, कृष्ण। जो योगी हैं, जो ऋषि हैं, जो ज्ञानी हैं, वो भी तेरे पीछे भागते हैं। उन्हें तू नहीं मिला। मगर हमें मिला। हम जो सिर्फ़ ग्वालिनें हैं, बिना ज्ञान के, बिना तप के। हमें तू मिला।”
”क्यों? क्योंकि हमने तुझे प्रेम किया। बस।”
”तो अब उसी प्रेम के नाम पर, लौट आ। हम इंतज़ार नहीं कर सकतीं।”
गीत बढ़ता गया। दर्द बढ़ता गया।
गोपियाँ एक-एक करके ज़मीन पर लेट गईं। बेहोश-जैसी।
और तब, उनके बीच में, अचानक कृष्ण प्रकट हुआ।
वो हाथ हिला रहा था। ”मैं आ गया।”
गोपियों ने आँखें खोलीं।
एक पल को विश्वास नहीं हुआ।
फिर सब उठीं। सब उसकी तरफ़ दौड़ीं।
कुछ ने उसका हाथ पकड़ा। कुछ ने उसके वस्त्र। कुछ बस चुप-चाप उसके पास खड़ी हो गईं।
कृष्ण ने कहा, ”क्षमा करो। मैं तुम्हें test करना चाहता था। यह जानना चाहता था कि तुम्हारा प्रेम कितना deep है। तुमने जो दिखाया, वो मेरी अपनी कल्पना से बढ़कर है। मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा।”
और तब रास फिर से शुरू हुआ।
इस बार बिना किसी अहंकार के। बिना ”मैं ख़ास हूँ” के।
बस एक pure नृत्य।
पुराण कहते हैं, यह नृत्य पूरी ब्रह्म-रात्रि चला। और जब चाँद ढलने लगा, तब कृष्ण ने हर एक को उनके घर भेजा। चुप-चाप। जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।
गोपी-गीत भागवतम् का सबसे intense moment है। संगीत-शास्त्र की दृष्टि से, यह दस stanzas का एक छोटा गीत है। पर इसकी हर पंक्ति में एक हज़ार साल का दर्द है।
गोपियाँ कोई scholars नहीं थीं। उनके पास कोई ज्ञान नहीं था। उनका सिर्फ़ एक tool था, प्रेम।
और भागवतम् यहाँ एक radical statement कर रहा है। प्रेम योग से, तप से, ज्ञान से भी ऊँचा है। क्योंकि ज्ञानी भगवान को ढूँढते हैं, और कई बार नहीं पाते। गोपियाँ रो रही थीं, और भगवान ख़ुद उनके बीच आ खड़े हुए।
गीत का central message है, ”हमारे पास और कुछ नहीं है। तुम जाओगे, हम नहीं रहेंगी।” यह वो total surrender है जो भगवान को रोक नहीं देता।
एक और बात। गोपियाँ शिकायत करती हैं, मगर शिकायत में भी प्रेम है। ”तू ने हमें छोड़ा” का मतलब है ”हम तेरी हैं।” दर्द भी एक तरह का दावा है।
जब हम भगवान से शिकायत करते हैं कि ”आप हमारी नहीं सुनते,” तो शायद हम भी गोपी-गीत गा रहे हैं, अपने तरीक़े से। और शायद वो भी, गोपियों की तरह, बस अदृश्य हैं, हमारी पुकार का इंतज़ार करते हुए।