परीक्षित और कलि
अर्जुन के पोते, अभिमन्यु के पुत्र, उस महायुद्ध के बाद की पृथ्वी पर परीक्षित ने राज सँभाला था। वे न्यायी थे, दानी थे, प्रजा को अपनी सन्तान की तरह देखते थे।
एक दिन वे अपनी सेना के साथ दिग्विजय को निकले, अपने राज्य की सीमाएँ देखने।
रास्ते में एक दृश्य ने उनके पाँव रोक दिए।
एक काला पुरुष, देखने में साधारण पर जिसकी ओर देखते ही मन काँपे, नीच भेस में खड़ा था। हाथ में एक मोटा डंडा। और सामने एक बैल।

वह बैल बहुत बूढ़ा था। उसकी केवल एक टाँग ज़मीन पर टिकी थी; बाक़ी तीन टूटी हुई थीं। देह पर जगह-जगह घाव। काँपता हुआ, पर खड़ा।
और वह काला पुरुष उसे डंडे से मारे जा रहा था, बेरहमी से, मानो बैल का साँस लेना भी अपराध हो।
पास एक गाय खड़ी थी। दुबली, हड्डियाँ झलकतीं, आँखों से आँसू बहते। उसकी आँखें किसी से कुछ माँग रही थीं, और कोई न था।
परीक्षित ने रथ रोका। उनकी आवाज़ में राजा का अधिकार था।
“यह क्या हो रहा है?”
वह काला पुरुष ठिठका। पीछे मुड़ा। आँखें ऊपर उठाईं। उन आँखों में एक चमक थी, पर वह चमक मैली थी, जैसे साफ़ पानी में किसी ने स्याही घोल दी हो।
“कौन हैं आप?” उसने पूछा।
“मैं इस धरती का राजा हूँ,” परीक्षित बोले, “और यह अनाचार मेरे राज्य में नहीं चल सकता। आप कौन हैं? और इस बूढ़े बैल को किस अधिकार से पीट रहे हैं?”
वह आगे बढ़ा। अब उसके भीतर कुछ सिहर रहा था।
“मेरा नाम कलि है।”
परीक्षित के भीतर कुछ ठहर गया।
वे जानते थे। यही वह युग था जिसकी आहट सब ओर सुनाई दे रही थी। इसका वक़्त अब आ रहा था।

उन्होंने अपना धनुष चढ़ा लिया और मेघ-सी गम्भीर वाणी से ललकारा।
“कलि! अगर आप सचमुच कलि हैं, तो मेरे राज्य में आपके लिए जगह नहीं। मैं आपको यहीं समाप्त कर दूँगा।”
कलि घुटनों के बल गिर पड़ा।
“हे राजन्, क्षमा कीजिए। मैं आपकी प्रजा को नहीं छेड़ रहा। मैं तो केवल अपने वक़्त के साथ आया हूँ। यह सृष्टि का विधान है। मुझे मारना आपके वश में नहीं, क्योंकि मेरा आना अभी शेष है; इसमें मेरा कोई दोष नहीं।”
परीक्षित ने उसकी बात सुनी, अन्त तक।
उन्होंने धनुष की डोरी धीरे से ढीली कर दी।
“ठीक है। मैं आपको नहीं मारूँगा। पर मेरे राज्य की सीमा से बाहर जाइए। और बताइए, रहना कहाँ चाहते हैं।”
कलि ने हाथ जोड़े।
“मुझे कुछ ठिकाने दे दीजिए, राजन्। जहाँ मैं रह सकूँ।”

परीक्षित कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कलि को पाँच ठिकाने दिए।
“पहला, द्यूत-घर, जहाँ जुआ खेला जाता है। वहाँ झूठ बसता है।”
“दूसरा, मदिरालय, जहाँ शराब बहती है। वहाँ मद बसता है।”
“तीसरा, वह स्थान जहाँ स्त्री की देह बेची जाती है। वहाँ काम का भ्रम बसता है।”
“चौथा, वध-स्थल, जहाँ निरीह प्राणी मारे जाते हैं। वहाँ हिंसा बसती है।”
कलि ने और भी ठिकाना माँगा। परीक्षित ने उसे पाँचवाँ स्थान भी दे दिया।
“और पाँचवाँ, स्वर्ण। जहाँ सोना अधर्म से बटोरा जाता है। वहाँ रजोगुण बसता है, जिससे वैर और लोभ जन्म लेते हैं।”
कलि के होंठों पर एक महीन मुस्कान आई। उसने सिर झुकाकर कहा, “जैसी आज्ञा, राजन्।” और उन्हीं पाँच ठिकानों में, अधर्म के मूल की तरह, वह बस गया।
कलि से निबटकर परीक्षित बैल और गाय की ओर मुड़े। उनकी आवाज़ अब नरम थी।
“आप कौन हैं?”
बैल ने अपना सिर धीरे से ऊँचा किया। उसकी आँखों में पशु की नहीं, किसी थके हुए ऋषि की दृष्टि थी।
“हे राजन्, मैं धर्म हूँ।”
परीक्षित ठिठक गए।
“आप? धर्म?”

“जी हाँ। मेरी चार टाँगें थीं, राजन्, तप, शुद्धि, दया और सत्य। सत्ययुग में चारों भूमि पर टिकी थीं। फिर अधर्म के अंशों ने एक-एक कर तीन तोड़ दीं, गर्व ने एक, आसक्ति ने एक, और मद ने एक। अब केवल सत्य की टाँग बची है, और वह भी इस बूढ़ी टाँग की तरह काँप रही है।”
“और यह गाय?”
“यह पृथ्वी है। मेरी पुरानी सहेली। हम दोनों साथ-साथ बूढ़े हो रहे हैं, और साथ-साथ रोते हैं।”
परीक्षित ने धर्म और पृथ्वी को सान्त्वना दी। अपने शासन से उन्होंने तप, शौच और दया को फिर प्रतिष्ठित किया और पृथ्वी का संवर्धन किया।
परीक्षित आगे बढ़ गए, सन्तोष के साथ। उन्होंने धर्म की रक्षा की थी, और इसी से उनके राज में कलि का कोई ज़ोर न चल सका।
कुछ वक़्त बाद एक दिन परीक्षित शिकार पर निकले। थके, प्यासे, एक ऋषि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ शमीक मुनि ध्यान में लीन थे, मौन का व्रत लिए। उन्होंने आँख तक न खोली।
भूख, प्यास और थकान से परीक्षित का विवेक धुँधला गया। उन्होंने मुनि की चुप्पी को अपना अपमान समझ लिया, और क्रोध उमड़ पड़ा।

पास पड़ा एक मरा हुआ साँप उन्होंने धनुष की नोक से उठाया और चुपचाप मुनि के कन्धे पर डाल दिया, और लौट गए।
शमीक के पुत्र शृंगी को यह बात मालूम हुई। बालक का रक्त खौल उठा। उसने हाथ में जल लेकर शाप दे डाला, “जिसने मेरे पिता का अपमान किया, उसे आज से सातवें दिन तक्षक नाग डँसेगा।”
शमीक मुनि ने आँख खोली तो पुत्र पर दुखी हुए, पर शाप वापस न हो सका।
परीक्षित को अपने किए का बोध हुआ। उन्होंने शाप को वैराग्य का अवसर माना, राजपाट पुत्र को सौंपा, अन्न-जल त्यागा और गंगा के तट पर आ बैठे। वहीं शुकदेव आए, और सात दिन तक भागवत की धारा बही।
साहित्यिक-संदर्भ
परीक्षित और कलि का यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 16 से 19 तक आता है। धर्म को चार पैरों वाले वृषभ और पृथ्वी को गौ के रूप में दिखाना, तथा सत्ययुग से कलियुग तक तप, शुद्धि (शौच) और दया के क्रमशः लोप का चित्र, गीताप्रेस संस्करण के अनुसार यहीं है।
कलि को द्यूत, मद्य, स्त्री-संग और हिंसा, इन चार स्थानों में बसने की अनुमति मिलती है, और प्रार्थना पर पाँचवाँ, स्वर्ण, जहाँ रजोगुण बसता है (1.17.38-39)। मरे साँप के अपमान और शृंगी के शाप का प्रसंग आगे अठारहवें अध्याय में आता है, जो परीक्षित के सात-दिन की कथा-धारा की भूमिका बनता है, और यही पूरे ग्रन्थ का ढाँचा है।
परीक्षित का राज्य कलि को सीमा से बाहर रख सका, पर एक पल का क्रोध भीतर का द्वार खोल गया। धर्म और अधर्म किसी दूर के युद्ध में नहीं, एक ही मन में साथ-साथ बसते हैं। कलि का डंडा सब देखते हैं; काँपती टाँग पर खड़ा वह बूढ़ा बैल कम ही किसी को दिखता है।