परीक्षित और कलि
परीक्षित ने मुनिवर की ओर देखा और कुछ देर ख़ामोश रहे।
”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”आप मुझे सबकी कथा सुना रहे हैं, पर एक कथा अब तक नहीं छेड़ी। मेरी अपनी। जिस ऋषि के कन्धे पर मैंने मरा हुआ साँप डाला था, वह मेरा स्वभाव न था। मैं न्याय का पालक था, फिर वह हाथ कैसे उठा? मुझे जानना है, मेरे भीतर वह किसने किया।”
शुकदेव ने उन्हें देखा, बिना किसी जल्दी के। ”राजन्, उस हाथ का मूल उस दिन में है जब आप पहली बार कलि से मिले थे। वह कथा सुनिए, फिर देखिए कि भीतर का काँटा कहाँ से चुभा।”
और मुनिवर ने कहना आरम्भ किया।
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अर्जुन के पोते, अभिमन्यु के पुत्र, उस महायुद्ध के बाद की पृथ्वी पर परीक्षित ने राज सँभाला था। वे न्यायी थे, दानी थे, प्रजा को अपनी सन्तान की तरह देखते थे।
एक दिन वे अपनी सेना के साथ दिग्विजय को निकले, अपने राज्य की सीमाएँ देखने।
रास्ते में एक दृश्य ने उनके पाँव रोक दिए।
एक काला पुरुष, देखने में साधारण पर जिसकी ओर देखते ही मन काँपे, नीच भेस में खड़ा था। हाथ में एक मोटा डंडा। और सामने एक बैल।

वह बैल बहुत बूढ़ा था। उसकी केवल एक टाँग ज़मीन पर टिकी थी; बाक़ी तीन टूटी हुई थीं। देह पर जगह-जगह घाव। काँपता हुआ, पर खड़ा।
और वह काला पुरुष उसे डंडे से मारे जा रहा था, बेरहमी से, मानो बैल का साँस लेना भी अपराध हो।
पास एक गाय खड़ी थी। दुबली, हड्डियाँ झलकतीं, आँखों से आँसू बहते। उसकी आँखें किसी से कुछ माँग रही थीं, और कोई न था।
परीक्षित ने रथ रोका। उनकी आवाज़ में राजा का अधिकार था।
”यह क्या हो रहा है?”
वह काला पुरुष ठिठका। पीछे मुड़ा। आँखें ऊपर उठाईं। उन आँखों में एक चमक थी, पर वह चमक मैली थी, जैसे साफ़ पानी में किसी ने स्याही घोल दी हो।
”कौन हैं आप?” उसने पूछा।
”मैं इस धरती का राजा हूँ,” परीक्षित बोले, ”और यह अनाचार मेरे राज्य में नहीं चल सकता। आप कौन हैं? और इस बूढ़े बैल को किस अधिकार से पीट रहे हैं?”
वह आगे बढ़ा। अब उसके भीतर कुछ सिहर रहा था।
”मेरा नाम कलि है।”
परीक्षित के भीतर कुछ ठहर गया।
वे जानते थे। यही वह युग था जिसकी आहट सब ओर सुनाई दे रही थी। इसका वक़्त अब आ रहा था।

उन्होंने अपना धनुष चढ़ा लिया और मेघ-सी गम्भीर वाणी से ललकारा।
”कलि! अगर आप सचमुच कलि हैं, तो मेरे राज्य में आपके लिए जगह नहीं। मैं आपको यहीं समाप्त कर दूँगा।”
कलि घुटनों के बल गिर पड़ा।
”हे राजन्, क्षमा कीजिए। मैं आपकी प्रजा को नहीं छेड़ रहा। मैं तो केवल अपने वक़्त के साथ आया हूँ। यह सृष्टि का विधान है। मुझे मारना आपके वश में नहीं, क्योंकि मेरा आना अभी शेष है; इसमें मेरा कोई दोष नहीं।”
परीक्षित ने उसकी बात सुनी, अन्त तक।
उन्होंने धनुष की डोरी धीरे से ढीली कर दी।
”ठीक है। मैं आपको नहीं मारूँगा। पर मेरे राज्य की सीमा से बाहर जाइए। और बताइए, रहना कहाँ चाहते हैं।”
कलि ने हाथ जोड़े।
”मुझे कुछ ठिकाने दे दीजिए, राजन्। जहाँ मैं रह सकूँ।”

परीक्षित कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कलि को पाँच ठिकाने दिए।
”पहला, द्यूत-घर, जहाँ जुआ खेला जाता है। वहाँ झूठ बसता है।”
”दूसरा, मदिरालय, जहाँ शराब बहती है। वहाँ मद बसता है।”
”तीसरा, वह स्थान जहाँ स्त्री की देह बेची जाती है। वहाँ काम का भ्रम बसता है।”
”चौथा, वध-स्थल, जहाँ निरीह प्राणी मारे जाते हैं। वहाँ हिंसा बसती है।”
कलि ने और भी ठिकाना माँगा। परीक्षित ने उसे पाँचवाँ स्थान भी दे दिया।
”और पाँचवाँ, स्वर्ण। जहाँ सोना अधर्म से बटोरा जाता है। वहाँ रजोगुण बसता है, जिससे वैर और लोभ जन्म लेते हैं।”
कलि के होंठों पर एक महीन मुस्कान आई। उसने सिर झुकाकर कहा, ”जैसी आज्ञा, राजन्।” और उन्हीं पाँच ठिकानों में, अधर्म के मूल की तरह, वह बस गया।
कलि से निबटकर परीक्षित बैल और गाय की ओर मुड़े। उनकी आवाज़ अब नरम थी।
”आप कौन हैं?”
बैल ने अपना सिर धीरे से ऊँचा किया। उसकी आँखों में पशु की नहीं, किसी थके हुए ऋषि की दृष्टि थी।
”हे राजन्, मैं धर्म हूँ।”
परीक्षित ठिठक गए।
”आप? धर्म?”

”जी हाँ। मेरी चार टाँगें थीं, राजन्, तप, शुद्धि, दया और सत्य। सत्ययुग में चारों भूमि पर टिकी थीं। फिर अधर्म के अंशों ने एक-एक कर तीन तोड़ दीं, गर्व ने एक, आसक्ति ने एक, और मद ने एक। अब केवल सत्य की टाँग बची है, और वह भी इस बूढ़ी टाँग की तरह काँप रही है।”
”और यह गाय?”
”यह पृथ्वी है। मेरी पुरानी सहेली। हम दोनों साथ-साथ बूढ़े हो रहे हैं, और साथ-साथ रोते हैं।”
परीक्षित ने हाथ जोड़ दिए। आँखों के कोर भीग आए।
”हे धर्म, मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। मेरे राज में आप इतने निर्बल हो जाएँ, इससे बड़ी मेरी कोई लज्जा नहीं। मैं वचन देता हूँ, जब तक साँस है, सत्य की रक्षा करूँगा।”
और परीक्षित ने वैसा ही किया। अपने राज में उन्होंने तप, शुद्धि और दया को फिर से बल दिया, मानो धर्म की वे तीनों टूटी टाँगें उन्होंने अपने हाथों जोड़ दी हों। पृथ्वी फिर से हरी होने लगी।
धर्म-बैल ने सिर हिलाया। ”राजन्, आपका वचन मुझे छू गया। पर वक़्त अपनी राह चलता है। आप अकेले इसे रोक नहीं सकते। आपके बाद कलि और फैलेगा। फिर भी, जितनी आपकी आयु है, उसमें जो बन पड़े, करते रहिए। एक दीये की रोशनी भी अँधेरे को इतना तो जानती है कि उससे डरे नहीं।”
परीक्षित आगे बढ़ गए, सन्तोष के साथ। उन्होंने धर्म की रक्षा की थी, और इसी से उनके राज में कलि का कोई ज़ोर न चल सका।
पर कलि चुप बैठने वाला न था। उसे पाँच ठिकाने मिले थे, और वह ताक में रहा कि कब मन का कोई द्वार खुले।
कुछ वक़्त बाद एक दिन परीक्षित शिकार पर निकले। थके, प्यासे, एक ऋषि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ शमीक मुनि ध्यान में लीन थे, मौन का व्रत लिए। उन्होंने आँख तक न खोली।
परीक्षित के भीतर क्रोध उमड़ा, एक ऐसा क्रोध जो कभी उनका स्वभाव न था। उस एक पल में कलि को द्वार मिल गया, और वह उनकी रगों में बोल उठा।

पास पड़ा एक मरा हुआ साँप उन्होंने धनुष की नोक से उठाया और चुपचाप मुनि के कन्धे पर डाल दिया, और लौट गए।
शमीक के पुत्र शृंगी को यह बात मालूम हुई। बालक का रक्त खौल उठा। उसने हाथ में जल लेकर शाप दे डाला, ”जिसने मेरे पिता का अपमान किया, उसे आज से सातवें दिन तक्षक नाग डँसेगा।”
शमीक मुनि ने आँख खोली तो पुत्र पर दुखी हुए, पर शाप वापस न हो सका।
परीक्षित को जब अपने किए का बोध हुआ, तब बहुत देर हो चुकी थी। पर उन्होंने उस शाप को दण्ड नहीं, वरदान माना। राजपाट पुत्र को सौंपा, अन्न-जल त्यागा, और गंगा के तट पर आ बैठे, मृत्यु को ठीक से मिलने। वहीं शुकदेव आए, और सात दिन तक भागवत की धारा बही।
कथा यहीं तक की थी। मुनिवर ठहर गए। गंगा का जल पास ही बह रहा था।
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परीक्षित कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, ”तो भगवन्, वह हाथ मेरा था, और मेरा नहीं भी। मैं कलि को राज्य की सीमा के बाहर खदेड़ता रहा, और वह एक पल के क्रोध के द्वार से मेरे ही भीतर उतर आया।”
”यही तो उसका ढंग है, राजन्,” शुकदेव ने कहा। ”वह सामने से युद्ध नहीं माँगता। वह उस एक पल की ताक में रहता है, जब मन डगमगाए, जब क्रोध या लोभ का कोई छोटा-सा द्वार खुले। फिर वहीं से धीरे-धीरे भीतर उतरता है। आप उसे बाहर ढूँढते रहे, और वह मन के एक झरोखे की राह देख रहा था।”
परीक्षित ने सिर झुका लिया।
”पर एक बात समझ लीजिए,” मुनिवर की आवाज़ में अब करुणा थी। ”उसी कलि ने आपको यहाँ, इस तट तक पहुँचाया। उसी क्रोध से वह शाप मिला, और उसी शाप ने आपके हाथ से राजपाट छुड़ाकर आपको भगवत्-कथा के सामने बिठा दिया। जो दूसरों के लिए विष है, वही भगवान् का शरण पाने वाले के लिए अमृत बन जाता है।”
परीक्षित की आँखें कुछ देर के लिए बन्द हो गईं। सात दिनों में पहली बार उन्हें तक्षक का ख़याल तक न आया।
”धर्म-बैल की वे टाँगें,” उन्होंने धीमे से कहा, ”मैंने अपने राज में जितनी जोड़ सकता था, जोड़ीं। पर मैं जानता हूँ, मेरे बाद कलि फिर फैलेगा। फिर भी अब वह डर नहीं रहा। जिसके पास भगवान् का नाम है, उसके लिए एक काँपती टाँग भी पूरी पृथ्वी थाम लेने को बहुत है।”
शुकदेव मुस्कुराए, और कुछ न कहा। गंगा बहती रही, एक दिन और कम।
कलि-पुरुष को एक काले व्यक्ति का रूप देकर भागवत एक सूक्ष्म बात कह देता है। वह कोई बाहर का शत्रु नहीं, समय का एक रंग है, जो हर मन में किसी न किसी द्वार से उतरता है।
उसके पाँच ठिकाने हैं, जुआ, मदिरा, देह का बाज़ार, हिंसा और अधर्म का सोना। आज भी जहाँ झूठ, मद, भोग, क्रूरता और लोभ इकट्ठा होते हैं, कलि वहीं अपना डेरा डाले मिलता है।
पर असली मर्म इसमें है कि कलि ने सीधे टकराव नहीं माँगा। उसने बस ठिकाने माँगे और ताक में बैठ गया, उस एक पल की राह देखता हुआ जब मन डगमगाए और कोई छोटा-सा द्वार खुले।
और परीक्षित जैसे न्यायी राजा का हाथ भी एक क्षण के क्रोध से डगमगा गया, उसी एक झरोखे से कलि भीतर उतर आया, जिसे राजा बाहर सीमा पर खोजते रहे थे।
धर्म का बूढ़े बैल के रूप में खड़ा होना, तीन टाँगें खोकर एक पर काँपता हुआ, इस युग की सर्वाधिक सच्ची तस्वीर है। परीक्षित ने अपने राज में वे तीनों टाँगें फिर जोड़ दीं, पर वह जानते थे कि उनके बाद कलि फिर फैलेगा। वह बैल कहीं दूर नहीं, हर मन के भीतर खड़ा है। बस अधिकतर समय आँख कलि के डंडे पर रहती है, उस काँपती हुई टाँग पर नहीं।
परीक्षित का अन्तिम सन्तोष यही था कि जिसके मुख में भगवान् का नाम है, उसके लिए वह एक काँपती टाँग भी बहुत है।
साहित्यिक-संदर्भ
परीक्षित और कलि का यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 16 और 17 में आता है। धर्म को चार पैरों वाले वृषभ और पृथ्वी को गौ के रूप में दिखाना, तथा सत्ययुग से कलियुग तक तप, शुद्धि (शौच) और दया के क्रमशः लोप का चित्र, गीताप्रेस संस्करण के अनुसार यहीं है।
कलि को द्यूत, मद्य, स्त्री-संग और हिंसा, इन चार स्थानों में बसने की अनुमति मिलती है, और प्रार्थना पर पाँचवाँ, स्वर्ण, जहाँ रजोगुण बसता है (1.17.38-39)। मरे साँप के अपमान और शृंगी के शाप का प्रसंग आगे अठारहवें अध्याय में आता है, जो परीक्षित के सात-दिन की कथा-धारा की भूमिका बनता है, और यही पूरे ग्रन्थ का ढाँचा है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
परीक्षित का राज्य कलि को सीमा से बाहर रख सका, पर एक पल का क्रोध भीतर का द्वार खोल गया। धर्म और अधर्म किसी दूर के युद्ध में नहीं, एक ही मन में साथ-साथ बसते हैं। कलि का डंडा सब देखते हैं; काँपती टाँग पर खड़ा वह बूढ़ा बैल कम ही किसी को दिखता है।