परीक्षित और कलि

कथा 23 · भागवतम् की कथाएँ

परीक्षित और कलि

The New King Meets the Kali Age
स्कन्ध 1, अध्याय 16-17

परीक्षित गद्दी पर बैठा था।

अर्जुन का पोता। अभिमन्यु का बेटा। महाभारत के बाद का राजा।

वो अच्छा राजा था। न्यायी। दानी। प्रजा-प्रेमी।

एक दिन वो अपनी सेना के साथ निकला। एक तरह का royal survey। अपने राज्य की सीमाएँ देखने।

रास्ते में एक अजीब दृश्य आया।

एक काला आदमी, साधारण मगर डरावना, एक धोबी की तरह के कपड़ों में। हाथ में एक मोटी डंडा। और सामने एक बैल।

वो बैल बहुत बूढ़ा था। उसकी सिर्फ़ एक टाँग ज़मीन पर थी। बाक़ी तीन गायब थीं, टूटी हुई थीं। उसके शरीर पर ज़ख़्म।

और काला आदमी उसे और मार रहा था। डंडे से। बेरहमी से।

पास एक गाय भी थी। पतली, कमज़ोर, रो रही थी।

परीक्षित ने रथ रोका।

”क्या हो रहा है?”

वो काला आदमी रुक गया। पीछे मुड़ा। अपनी आँखें ऊपर उठाईं। उसकी आँखों में एक चमक थी, मगर वो चमक dirty थी।

”कौन हो तुम?”

परीक्षित ने अपना परिचय दिया। ”मैं इस राज्य का राजा हूँ। और यह बात मेरे राज्य में नहीं हो सकती। तू कौन है? और इस बूढ़े बैल को क्यों मार रहा है?”

वो आदमी आगे आया। अब वो थोड़ा डर रहा था।

”मेरा नाम कलि है।”

परीक्षित को एक झटका लगा।

वो जानता था। कलियुग का अधिष्ठाता। उसका समय अब शुरू हो रहा था।

उसने तलवार निकाली।

”कलि! अगर तू सच में कलि है, तो मेरे राज्य में तेरी जगह नहीं। मैं तुझे अभी मार दूँगा।”

कलि घुटनों पर गिरा।

”हे राजा, क्षमा कर। मैं तेरी प्रजा को नहीं छेड़ रहा। मैं बस अपनी समय पर हूँ। ब्रह्मांड का नियम। तू मुझे मार नहीं सकता, क्योंकि मेरा समय अभी आना है, इसमें मेरी ग़लती नहीं।”

परीक्षित ने उसकी बात सुनी।

उसने तलवार वापस रखी।

”ठीक है। मैं तुझे नहीं मारूँगा। पर तू मेरे राज्य से निकल। और जहाँ रहना है, बता।”

कलि ने हाथ जोड़े।

”मुझे कुछ जगहें दे दीजिए, राजा। जहाँ मैं रह सकूँ।”

परीक्षित सोचने लगा। फिर उसने पाँच जगहें कलि को दीं।

”एक, द्यूत-घर। जहाँ जुआ खेला जाता है।”

”दो, शराब का घर।”

”तीन, स्त्रियाँ जहाँ देह बेची जाती है।”

”चार, हिंसा-स्थल। जहाँ जानवर मारे जाते हैं।”

”पाँच, सोना। जहाँ सोना है, वहाँ तू रह सकता है।”

कलि खुश। उसने कहा, ”ठीक है।”

पर उसने एक trick की। जो स्वर्ण-मुकुट परीक्षित के सिर पर था, उसमें भी कलि ने अपनी छोटी सी जगह बना ली। क्योंकि वो सोना था।

इति प्राप्ताभयं पादाभिमुखं पञ्चसु स्थलेषु ।
हिरण्ये द्यूते सुरायाञ्च योषिति च हिंस्रकर्मणि ॥

इस तरह कलि ने अभय पाकर, परीक्षित से अपनी पाँच जगहें माँगीं, सोना, द्यूत, शराब, स्त्री (वेश्या-वृत्ति), और हिंसक कर्म।

परीक्षित कलि से निपटकर, बैल और गाय की तरफ़ मुड़ा।

”आप कौन हैं?”

बैल ने अपना सिर ऊँचा किया। एक insanely human आँखें।

”हे राजा, मैं धर्म हूँ।”

परीक्षित चौंका।

”आप? धर्म?”

”हाँ। मेरी चार टाँगें थीं। सत्य, तप, शुद्धि, और दया। सत्ययुग में सब चारों थीं। हर युग में एक-एक करके गईं। अब कलियुग में सिर्फ़ एक बची है, सत्य। और वो भी कमज़ोर।”

”और यह गाय?”

”यह पृथ्वी है। मेरी मित्र। हम दोनों एक साथ बूढ़े हो रहे हैं।”

परीक्षित ने हाथ जोड़े। उसकी आँखें भर आईं।

”हे धर्म, मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। मेरा राज्य आपको ऐसा कमज़ोर बनाए, यह मेरे लिए शर्म की बात है। मैं वादा करता हूँ, जब तक मैं जीवित हूँ, सत्य की रक्षा करूँगा।”

धर्म-बैल ने सर हिलाया। ”राजा, तेरी कोशिश appreciate। मगर समय चलता है। तू अकेले इसे नहीं रोक सकता। तेरे जाने के बाद कलि और बढ़ेगा। पर तेरे जीवन में, तू जो कर सकता है, करना।”

परीक्षित आगे बढ़ गया।

मगर एक काम उसने नहीं देखा था। कलि उसके मुकुट में बैठा था। और थोड़े समय बाद, वो उसके मन तक पहुँचा।

एक दिन परीक्षित शिकार पर गया। थक गया। प्यासा। एक ऋषि के आश्रम में पहुँचा।

ऋषि ध्यान में थे। आँख नहीं खोली।

परीक्षित को क्रोध आया। (जो उसका स्वभाव नहीं था, मगर कलि अंदर बैठा था।)

उसने एक मरा हुआ साँप उठाया। ऋषि के गले में डाल दिया।

ऋषि के बेटे को पता चला। उसने शाप दिया, ”सात दिन में तक्षक तुझे डँसेगा।”

परीक्षित को बाद में अपनी ग़लती का एहसास हुआ। पर अब late था।

वो राज्य से निकल आया। गंगा किनारे बैठा। शुकदेव वहाँ आए। और सात दिन भागवतम् सुनाई।

आठवें दिन तक्षक आया। पर तब तक राजा जा चुका था।

और कलियुग पूरी ताक़त से शुरू हुआ। हम सब इसी में हैं।

मन्थन

परीक्षित-कलि की कथा बहुत सुंदर allegory है।

हम सब अपने जीवन में कलि से निपटते हैं। यानी, समय के एक specific quality से जो हमें छेड़ता है।

कलि का काम पाँच जगहों पर है, जुआ, शराब, sex, हिंसा, और सोना। आज भी यह सब चीज़ें वही trouble पैदा करती हैं।

मगर असली बात यह है कि कलि सीधे कहीं और नहीं घुसा। उसने एक छोटी सी जगह माँगी, सोने में।

और इसी से परीक्षित जैसा अच्छा राजा भी बाद में एक छोटी सी गलती कर बैठा। क्यों? क्योंकि सोना उसके मुकुट में था।

यह कथा हमें कुछ बताती है। हम सोचते हैं हम कलि से अलग हैं। मगर अगर हमारे जीवन में सोना (पैसा, success, status) घुसा है, तो कलि वहाँ है। हम चाहते-नहीं चाहते, उसका असर पड़ता है।

धर्म एक बूढ़ा बैल बन गया है, यह image बहुत powerful है। हम सब उस बैल को रोज़ देखते हैं। हमारे ख़ुद के अंदर। बस ज़्यादातर समय हम कलि की डंडा देख रहे हैं, बैल को नहीं।