वृत्रासुर, भक्त राक्षस
वृत्रासुर एक राक्षस था। बहुत powerful। ब्रह्मा से वर पाया।
उसने इन्द्र पर हमला किया। तीनों लोक हिल गए।
इन्द्र अपनी सब शक्ति से लड़ा। हार गया।
वो विष्णु के पास गया।
विष्णु ने कहा, ”इन्द्र, इसे साधारण शस्त्र से नहीं मार सकते। एक ऋषि का अस्थि चाहिए। उससे वज्र बनेगा। तभी काम होगा।”
”कौन से ऋषि?”
”ददीचि। उसके पास जाओ। उससे अस्थि माँगो।”
इन्द्र गया। ददीचि एक तपस्वी ऋषि थे। उन्होंने सुना।
”हाँ, मेरा शरीर ले जाओ। मुझे चाहिए नहीं।”
ददीचि ने अपनी देह त्यागी, ध्यान में बैठकर। उनकी हड्डियाँ निकाली गईं।
उनसे एक वज्र बना। इन्द्र ने वो उठाया।
अब फिर युद्ध।
इन्द्र और वृत्रासुर। बहुत बड़ी लड़ाई।
तीर बरसे। गदाएँ चलीं। शस्त्र-अस्त्र।
वृत्रासुर बहुत strong था। पर कुछ अजीब था।
वो लड़ रहा था, मगर अंदर से वो लड़ नहीं रहा था।
वो भगवान का नाम लेता रहा। बीच-बीच में।
”नारायण,” ”वासुदेव,” ”हरि।”
लड़ते-लड़ते वो भगवान को याद कर रहा था।
भक्तिमेव वृणे प्रेष्ठां त्वत्पादे भगवन् सदा ॥
मुझे न स्वर्ग चाहिए, न कोई वर, न मुक्ति। मैं बस आपके चरणों में अनन्त भक्ति चाहता हूँ, हे भगवन्।
एक मौक़ा आया जब इन्द्र ने उसका मुकुट उड़ा दिया। उसका शस्त्र गिरा।
वृत्रासुर निहत्था। पर वो भागा नहीं।
उसने इन्द्र की तरफ़ देखा। मुस्कुराया।
”इन्द्र,” उसने कहा। ”मारो मुझे।”
इन्द्र चौंका।
”तू डर नहीं रहा?”
”नहीं। मैं तो खुश हूँ। मेरा शरीर एक राक्षस का है। मगर मैं असल में एक भक्त हूँ। मरना मेरे लिए मुक्ति है।”
”तू भक्त है?”
”हाँ। पिछले जन्म में मैं चित्रकेतु था। एक राजा। मैंने एक ग़लती की। शिव और पार्वती को disrespect किया। पार्वती ने शाप दिया, ”तू राक्षस बनेगा।”
”तो मैं राक्षस बना। पर मेरा हृदय वही रहा। मैं हर पल भगवान को सोचता हूँ।”
”अब तू मुझे मार। मेरा शाप ख़त्म। मैं भगवान के पास जाऊँगा।”
इन्द्र ने वज्र उठाया।
वृत्रासुर ने आँखें मूँदीं।
और एक last प्रार्थना की। जो भागवतम् में बहुत famous है।
”हे प्रभु,” उसने कहा, ”एक बात पूछूँ। आप क्यों आते हो भक्तों के पास?”
”क्योंकि वो आपको चाहते हैं।”
”पर मैं?? मैं एक राक्षस हूँ। मेरा अधिकार नहीं।”
”एक काम कीजिए। मैं आपसे मुक्ति नहीं माँगता। मैं स्वर्ग भी नहीं चाहता। मुझे एक चीज़ चाहिए। अगले जन्म में, चाहे जो रूप हो, मेरा मन आपके चरणों में रहे। बस इतना।”
”बाक़ी सब आप जो चाहते हो, हो।”
इन्द्र ने वज्र चलाया।
वृत्रासुर मरा।
उसकी जान निकलकर सीधे वैकुण्ठ गई। अपने पुराने रूप में, चित्रकेतु।
और भगवान ने उसकी प्रार्थना मान ली। उसका मन आज भी उनके चरणों में है।
वृत्रासुर की कथा भागवतम् का एक radical theology है।
एक राक्षस। दुश्मन। एक तरह का villain।
मगर अंदर से एक भक्त।
इस कथा का central message यह है। बाहरी रूप से कोई कुछ भी हो, उसके अंदर क्या है, यह important है।
और वृत्रासुर ने जो माँगा, वो बहुत specific है। ”मुझे मुक्ति नहीं चाहिए। स्वर्ग नहीं चाहिए। बस आपकी भक्ति चाहिए।”
ज़्यादातर लोग भगवान से कुछ माँगते हैं। पैसा, सुख, स्वास्थ्य, मुक्ति। पर एक specific group है जो सिर्फ़ ”आप” माँगता है। बिना किसी return के।
यह बहुत selfless बात है। और भागवतम् कह रहा है, यही असली भक्ति है।
अहैतुकी भक्ति। बिना किसी कारण की भक्ति।
”आप मुझे कुछ नहीं देंगे, फिर भी मैं चाहता हूँ।” यह वो सर्वोच्च भाव है।
और जब कोई इस भाव से माँगता है, तो भगवान बिना माँगे ही सब दे देते हैं।