वृत्रासुर, भक्त राक्षस

बात इन्द्र की एक भूल से शुरू हुई थी। विश्वरूप नामक एक तीन-सिरवाला ब्राह्मण था, जो यज्ञ में खुलकर तो देवताओं को आहुति का भाग देता, पर छिपकर अपनी असुर-कुल की माता के नाते असुरों को भी भाग पहुँचाता रहता। यह कपट जान इन्द्र क्रोध में भर गए और उन्होंने विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले। इस वध से जो ब्रह्महत्या का पाप उन पर चढ़ा, उसे उन्होंने चार हिस्सों में बाँटकर पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों को सौंप दिया।
विश्वरूप के पिता त्वष्टा ने पुत्र-शोक में एक हवन रचा, इन्द्र का शत्रु उत्पन्न करने के लिए। उसी अन्वाहार्य-पचन अग्नि से एक भयानक दैत्य प्रकट हुआ, वही वृत्रासुर। जब इस वृत्र ने देवताओं पर चढ़ाई की, तो स्वर्ग की धरती हिल उठी। इन्द्र अपने पूरे बल से लड़े, अपने सब शस्त्र चलाए, और हार गए। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र उस राक्षस ने निगल लिए।
हारे हुए इन्द्र देवताओं के साथ श्रीहरि की शरण में गए।
भगवान ने कहा, “देवराज, इसे किसी साधारण शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। एक तपस्वी की अस्थियाँ चाहिए, ऐसी जिनमें वर्षों की तपस्या जमी हो। उन्हीं से एक श्रेष्ठ वज्र गढ़ा जाएगा। तभी यह कार्य सिद्ध होगा।”
“किस तपस्वी की, प्रभु?”
“दधीचि की। उनके पास जाइए। उनसे यह दान माँगिए।”
इन्द्र दधीचि के आश्रम पहुँचे। वहाँ हवन का धुआँ और तुलसी की गंध फैली थी। ऋषि ने सारी बात सुनी, और हँस पड़े।
“यह हाड़-माँस का ढाँचा तो एक दिन यों ही मिट्टी हो जाना है। यदि इससे किसी का भला हो, तो ले जाइए। मुझे इसका मोह नहीं।”

दधीचि योग में बैठे, और जैसे कोई कपड़े उतार देता है, वैसे ही उन्होंने अपना देह त्याग दिया। उनकी हड्डियाँ निकाली गईं, और विश्वकर्मा ने उन्हीं से वह वज्र गढ़ा। इन्द्र ने उसे उठाया, और उसका भार अपने हाथ में अनुभव किया।
फिर वही रणभूमि।
आकाश तीरों से भर गया। गदाएँ टकराईं, धरती काँपी, और धूल का एक परदा सूरज को ढक गया। दोनों ओर से ऐसा प्रहार हुआ कि देवता और असुर साँस रोककर देखते रह गए।
वृत्रासुर का बल असीम था। पर उसमें कुछ था जो इन्द्र की समझ में न आता था।
वह लड़ रहा था, पर भीतर कहीं वह लड़ता ही न था। उसका हाथ शस्त्र चला रहा था, और उसका मन कहीं और था।

बीच-बीच में उसके होंठ हिलते। प्रहार करते-करते, घायल होते-होते, वह एक ही पुकार दोहराता रहता।
“नारायण।” “वासुदेव।” “हरि।”
जो उसे मारने आया था, वह यह देख ठिठक जाता: यह राक्षस युद्ध के बीच किसका नाम ले रहा है?
एक क्षण आया जब इन्द्र के प्रहार से वृत्र का मुकुट उड़ गया, और उसके हाथ का शस्त्र छिटककर दूर जा गिरा। वह निहत्था खड़ा था।
पर वह भागा नहीं। उसने इन्द्र की ओर देखा, और उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान आ गई।
“देवराज,” उसने कहा, “देर मत कीजिए। मारिए मुझे।”
इन्द्र का हाथ ठहर गया।
“आप डरते नहीं?”
“डर किस बात का? यह देह एक राक्षस का है, यह सच है। पर इसके भीतर जो बैठा है, वह श्रीहरि का दास है। इस देह का गिरना मेरे लिए बंधन का टूटना है।”
“आप भक्त हैं?”
“शरीर बदल गया, योनि बदल गई। पर हृदय वही रहा। एक पल भी ऐसा नहीं बीता जब वे मेरे स्मरण से उतरे हों।”
उसकी साँस भारी थी, पर स्वर में कोई कड़वाहट न थी।
“अब आप प्रहार कीजिए। मैं अपने स्वामी के पास लौटूँगा।”
इन्द्र ने वज्र उठाया। और वृत्र ने आँखें मूँद लीं।
फिर उसने वह प्रार्थना की जो भागवत के हृदय में आज तक गूँजती है। वह इन्द्र से नहीं, उस श्रीहरि से बोल रहा था जो उसके भीतर बैठे थे।
“हे प्रभु, स्वर्ग, ब्रह्मा का पद, रसातल का राज्य, योग की सिद्धियाँ और मृत्यु से मुक्ति मेरी माँग नहीं हैं। ये सब तो वे माँगें, जिन्हें आपसे बड़ा कुछ और चाहिए।”
“मुझे केवल एक वस्तु चाहिए। अगले जन्म में, चाहे जो रूप मिले, जिस भी योनि में जन्म लूँ, मेरा मन आपके चरणों से न हटे। आपके प्यारे भक्तजनों का संग न छूटे। मेरी वाणी आपके गुण गाती रहे। बस इतना।”
“बाक़ी जो आपकी इच्छा हो, वही हो।”
इन्द्र ने वज्र चलाया।

वृत्र का देह गिरा। पर उसके भीतर से जो ज्योति उठी, वह सीधे श्रीहरि के धाम की ओर गई, बिना ठहरे, बिना मुड़े, जैसे कोई बहुत दूर से अपने घर लौट रहा हो।
और भगवान ने उसकी प्रार्थना रख ली। जो मुक्ति भी न माँगे, उसे वे अपने पास ही रख लेते हैं।
साहित्यिक-संदर्भ
वृत्रासुर की कथा श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध, अध्याय 9 से 13 में आती है। दधीचि की अस्थि-दान और विश्वकर्मा द्वारा वज्र का निर्माण 10वें अध्याय में, युद्ध और वृत्र का भगवद्-स्तवन 11वें-12वें अध्याय में, तथा इन्द्र पर लगे ब्रह्महत्या के पाप का प्रसंग 13वें अध्याय में है।
यहाँ वृत्र का परिचय असुर के रूप में होता है, पर वह पूर्वजन्म का राजा चित्रकेतु है, जिसे पार्वती के शाप से यह योनि मिली (6.17)। मरते समय उसका हरि-स्मरण भागवत की उस दृष्टि का प्रमाण है, जिसमें भक्ति किसी जाति, योनि या रूप की मोहताज नहीं।
वृत्र एक राक्षस था, और फिर भी भक्त। मरते समय उसके होंठों पर श्रीहरि का नाम था। राक्षस का रूप उसके भीतर के भाव को बाँध न सका; जिस प्रेम ने उसके प्राण इन्द्र के वज्र की ओर हँसते हुए भेजे, वह किसी देह की सीमा में नहीं अँटता था।