हिरण्याक्ष का युद्ध
उस रात परीक्षित् ने कुछ नहीं खाया था, और अब उनकी आँखों में नींद नहीं, एक और ही जागरण था। उन्होंने शुकदेव की ओर देखा।
”भगवन्, कल आपने उस वराह की बात कही थी, जिन्होंने पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठा लिया। पर एक बात मन में अटकी रह गई। जिसने पृथ्वी को जल में डुबाया था, वह असुर कौन था, और उसका अंत कैसा हुआ? मेरे पास गिनती के दिन हैं, मुनिवर। हम जानना चाहते हैं कि भगवान के हाथों मरना किस तरह का मरना होता है।”
शुकदेव कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, ”राजन्, उस असुर का नाम हिरण्याक्ष था। और वह यूँ ही गिर जाने वाला नहीं था।”
”उसकी कथा थोड़ी पीछे से शुरू होती है। वैकुण्ठ के द्वार पर दो पार्षद थे, जय और विजय। सनकादि चार बाल-ऋषियों ने उन्हें शाप दिया, कि वे तीन बार असुर-योनि में जन्म लें। पहले ही जन्म में वे दो भाई बने, हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। प्रजापति कश्यप के वीर्य से दिति के गर्भ में पहले हिरण्यकशिपु स्थापित हुआ, पर दिति के उदर से पहले हिरण्याक्ष निकला। दोनों में अधिक उग्र भी वही था। उसी ने पृथ्वी को समेटकर रसातल के जल में जा छिपाया।”

”पृथ्वी को छिपाकर भी उसकी प्यास न बुझी। वह युद्ध ढूँढ़ता हुआ समुद्र को मथता, उसकी लहरों को अपनी लोहमयी गदा से पीटता, अनेक वर्षों तक भटकता रहा। सामने कोई प्रतिपक्षी न पाकर वह वरुण की राजधानी विभावरी जा पहुँचा। वहाँ जलचरों के स्वामी वरुण को देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाई, नीच मनुष्य की भाँति प्रणाम करते हुए व्यंग्य से बोला, अब हमें युद्ध की भिक्षा दीजिए। वरुण ने अपना क्रोध भीतर ही पी लिया और बोले, अब हमें युद्ध का चाव नहीं रहा। आप-जैसे रणकुशल वीर को जो युद्ध में संतोष दे सके, ऐसा तो एक ही है, वह पुराणपुरुष। उन्हीं के पास जाइए। फिर नारद के बताए मार्ग से हिरण्याक्ष रसातल की ओर चल पड़ा, जहाँ श्रीहरि पृथ्वी को ऊपर ले जा रहे थे।”
”जब वराह उसके सामने आ खड़े हुए, हिरण्याक्ष को लगा कि यह तो एक ही प्रहार का काम है।”
”एक सूअर! हमारे सामने!”
उसने अपनी गदा सँभाली, इतनी भारी कि और कोई हाथ उसे ज़मीन से उठा भी न पाता।
”रे जंगली पशु! इस पृथ्वी को छोड़ दीजिए, नहीं तो आज आपको यहीं ढेर करता हूँ।”

वराह ने पृथ्वी को जल के ऊपर उसके स्थान पर रख दिया और उसमें अपनी आधारशक्ति का संचार किया। उसी समय ब्रह्मा ने उनकी स्तुति की, और देवताओं ने फूल बरसाए। फिर श्रीहरि अपने लाल-लाल चमकीले नेत्रों से उस असुर के तेज को मानो हर लेते हुए, उसके कटु वचनों पर अत्यन्त क्रोधपूर्वक हँसते हुए बोले, ”सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो आप-जैसे श्वानों को ढूँढ़ते फिरते हैं। पर वीर पुरुष आप-जैसे मृत्यु के पाश में बँधे हुए की डींगों पर ध्यान नहीं देते।”
फिर युद्ध छिड़ा।
पहले गदा से गदा। हिरण्याक्ष ने अपनी सारी ताक़त एक ही वार में झोंक दी। वराह ने उसे अपनी गदा पर रोका।
लोहे से लोहा टकराया, और वह आवाज़ ऐसी थी कि रसातल का पूरा जल काँप उठा, ऊपर समुद्र की तह तक थरथराहट दौड़ गई।
तभी एक विचित्र क्षण आया। वराह की भारी गदा उन्हीं के हाथ से छूटकर पृथ्वी पर जा गिरी। पर श्रीहरि ने उसे लीला-भर माना, और झुककर हिरण्याक्ष से कहा, ”आप हमें जीतना चाहते हैं, इसलिए अपना शस्त्र उठा लीजिए और एक बार फिर वार कीजिए।”
हिरण्याक्ष ने फिर गदा घुमाई। वराह ने वह गदा भी आते ही अनायास पकड़ ली, जैसे गरुड़ किसी साँप को पकड़ लें।
अपना उद्यम व्यर्थ हुआ देख उस महादैत्य का घमंड ठंडा पड़ गया। अबकी बार भगवान के देने पर भी उसने वह गदा वापस लेना न चाहा।
तब उसने एक प्रज्वलित अग्नि के समान लपलपाता हुआ त्रिशूल उठा लिया, और श्रीहरि की ओर पूरे वेग से छोड़ दिया।
आकाश में वह त्रिशूल बड़ी तेजी से चमका।

पर वराह ने अपने सुदर्शन चक्र से उसे बीच राह में ही दो टुकड़े कर डाला, जैसे किसी समय इन्द्र ने अपने वज्र से गरुड़ का एक पंख काट डाला था।
अपना त्रिशूल कटा देख हिरण्याक्ष को बड़ा क्रोध हुआ। वह झपटकर पास आया, और जिस वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था, वहाँ उसने कसकर घूँसा मारा। फिर बड़े जोर से गरजकर अन्तर्धान हो गया।
वराह वहीं अडिग खड़े रहे, मानो हाथी पर पुष्पमाला की कोई चोट लगी हो।
अब उस महामायावी दैत्य ने अनेक प्रकार की मायाएँ रचनी शुरू कीं।
बड़ी प्रचंड आँधी चली, धूल से सब ओर अन्धकार छा गया।
फिर सब ओर से पत्थरों की वर्षा होने लगी, मानो किसी क्षेपणयन्त्र से फेंके जा रहे हों।
बिजली की चमचमाहट और कड़क के साथ बादलों ने सूर्य, चन्द्र आदि को ढक लिया, और उनसे रुधिर, मवाद, केश, हड्डियों की वर्षा होने लगी।

हाथों में त्रिशूल लिए, बाल खोले नंगी राक्षसियाँ दिखने लगीं। पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियों पर चढ़े आततायी यक्ष-राक्षस ‘मारो-मारो, काटो-काटो’ का अत्यन्त क्रूर कोलाहल करने लगे।
वराह वहीं अडिग खड़े रहे, जैसे आँधी के बीच कोई पहाड़।
तब इस आसुरी माया-जाल का नाश करने के लिए श्रीहरि ने अपना प्रिय सुदर्शन चक्र छोड़ा, और उस माया का सारा जाल एक ही क्षण में कट गिरा।
उसी क्षण दूर कहीं उसकी माता दिति का हृदय सहसा काँप उठा, और उसके स्तनों से रक्त बहने लगा। कश्यप ने जो चेतावनी दी थी, वह आज सच हो गई।
अपना माया-जाल नष्ट हो जाने पर वह दैत्य फिर भगवान के पास आया। उसने उन्हें क्रोध से दबाकर चूर-चूर करने की इच्छा से अपनी भुजाओं में भर लिया, किंतु देखा कि वे तो बाहर ही खड़े हैं।
इसी बीच ऋषियों के संग ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, ”प्रभो, लोकों का संहार करनेवाली संध्या की भयंकर वेला आने ही वाली है, उससे पहले इस असुर का अंत कर दीजिए। इस समय अभिजित् नामक मंगलमय मुहूर्त का योग भी आ गया है।”
हिरण्याक्ष ने फिर वज्र के समान कठोर मुक्कों से भगवान को मारना शुरू किया।
तब इन्द्र ने जैसे वृत्रासुर पर प्रहार किया था, उसी प्रकार भगवान ने अपनी खुली हथेली का एक तमाचा उसके कान की जड़ पर मारा।

इतना ही। हिरण्याक्ष का विशाल शरीर लड़खड़ाया, उसके नेत्र बाहर निकल आए, हाथ-पैर और बाल छिन्न-भिन्न हो गए, और वह निष्प्राण होकर जल पर ढह गया, जैसे आँधी में कोई पुराना दरख़्त जड़ से उखड़कर गिरे।
उसका तेज तब भी मलिन नहीं हुआ था। उस कराल दाढ़ोंवाले दैत्य को दाँतों से होंठ चबाते पड़ा देख, युद्ध देखने आए ब्रह्मादि देवता उसकी प्रशंसा करने लगे, ”अहो! ऐसी अलभ्य मृत्यु किसको मिल सकती है।”
”ये हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु तो भगवान के ही पार्षद हैं। शापवश इन्हें यह अधोगति प्राप्त हुई है। अब कुछ ही जन्मों में ये फिर अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे।”
देवता हाथ जोड़कर कहने लगे, ”प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है। बड़े आनन्द की बात है कि संसार को कष्ट देनेवाला यह दुष्ट दैत्य मारा गया। अब आपके चरणों की भक्ति के प्रभाव से हमें भी सुख-शान्ति मिल गई।”
इस प्रकार महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध करके आदिवराह अपने अखंड आनन्दमय धाम को पधार गए।
शुकदेव यहाँ कुछ देर रुके।
”राजन्, सोचने की बात यह है कि उन्हें शत्रु बनकर ही अपने स्वामी तक पहुँचना था। और यह कोई छोटी पहुँच न थी।”
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”मुनिवर, यह बात मन को बेचैन कर देती है। वह असुर था, हर तरह से क्रूर। उसने पृथ्वी को जल में डुबाया, देर तक भगवान से जूझता रहा।”
”और अंत में उसे वही मिला, जिसके लिए ऋषि-मुनि जन्म-जन्म तप करते हैं।”
शुकदेव ने हल्के से सिर हिलाया।
”राजन्, उसका मन, चाहे क्रोध में रहा हो या बैर में, एक पल को भी अपने स्वामी से नहीं हटा। कोई प्रेम से उन्हें पाता है, कोई भय से, कोई मित्रता से। कुछ ऐसे भी हैं जो बैर से पाते हैं।”
”एक ही बात सबमें सांझी है। उनका चित्त निरंतर उन्हीं पर लगा रहता है।”
”हिरण्याक्ष हर साँस में यही सोचता रहा, इसे कैसे मारूँ, इसकी इस सृष्टि को कैसे मिटाऊँ। सोच विषैली थी, पर उसका केंद्र भगवान ही थे। वह सारा युद्ध, सच पूछिए तो, एक अखंड स्मरण था।”
परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”तो जिसे हम भुलाना चाहते हैं, उसी को हम निरंतर याद रखते हैं।”
”और जिसे पाना चाहते हैं,” शुकदेव ने वाक्य पूरा किया, ”उसे अकसर बीच राह में ही छोड़ बैठते हैं।”
परीक्षित् देर तक चुप बैठे रहे। तक्षक का नाम आज उन्हें याद ही नहीं आया।
साहित्यिक-संदर्भ
हिरण्याक्ष-वराह युद्ध श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 17 से 19 तक वर्णित है। इस युद्ध के अंत में वराह ने हिरण्याक्ष को अपनी खुली हथेली के एक प्रहार से, कान की जड़ पर मारकर, संहार किया।
यह कथा प्रह्लाद-नृसिंह की पूर्वकथा है, क्योंकि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, दोनों जय-विजय के प्रथम जन्म हैं। जय-विजय का तीन बार असुर-योनि में जन्म लेना और हर बार भगवान के हाथों मुक्ति पाना, यह विस्तृत प्रसंग भागवत के सप्तम स्कन्ध में आता है।
दर्शन-दृष्टि
भागवत का बैर-भक्ति का यह सिद्धांत यहीं अपना पहला और अत्यन्त उग्र रूप पाता है। प्रेम, भय, वात्सल्य, मित्रता, इन सब के साथ-साथ शास्त्र बैर को भी भगवत्प्राप्ति का एक मार्ग मानता है, इस शर्त पर कि चित्त एक क्षण को भी भगवान से न हटे। कंस, शिशुपाल और हिरण्यकशिपु की कथाएँ इसी सूत्र को आगे बढ़ाती हैं।
ध्यान रहे, यह मार्ग किसी के अनुकरण के लिए नहीं है। शुकदेव इसे एक रहस्य की तरह कहते हैं, उपदेश की तरह नहीं। असुर की मुक्ति उसके बैर का फल नहीं, भगवान की उस अहैतुकी करुणा का फल है जो शत्रु को भी अपने धाम लौटा लाती है।
एक आख़िरी बात
जिस पृथ्वी को हिरण्याक्ष ने जल की गहराई में डुबा दिया था, उसे वराह ने अपनी दाढ़ों पर उठाकर फिर से उसके स्थान पर रख दिया। जो डूबता है, वह सदा के लिए नहीं डूबता, बशर्ते कोई उसे उठाने वाला हो। और जो हाथ डुबोने आया था, वही हाथ अंत में उठ जाने का द्वार बन गया।