हिरण्याक्ष का युद्ध
हिरण्याक्ष को मरने में हज़ार साल लगे।
वो आसानी से मरने वाला नहीं था।
उसकी कहानी थोड़ी पीछे जाती है। वो वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय और विजय, का एक जन्म था। तीन जन्म राक्षस बनने का शाप। पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। दोनों भाई।
उसमें हिरण्याक्ष बड़ा था। ज़्यादा aggressive। उसने पृथ्वी चुराने वाला काम किया।
जब वराह उसके सामने आया, हिरण्याक्ष को लगा यह कोई एक झटके का काम है।
”एक सूअर! मेरे सामने!”
उसने अपनी गदा निकाली। बहुत भारी। बस उसके बल पर ही उठती थी।
”आ, सूअर। तुझे आज मारता हूँ।”
वराह ने एक बार अपने दाँत साफ़ किए। फिर एक हलकी मुस्कान। मगर एक सूअर की मुस्कान, इसलिए अजीब।
लड़ाई शुरू।
पहले गदा-युद्ध। हिरण्याक्ष ने पूरी ताक़त लगाई। वराह ने अपनी गदा से counter किया।
उन दोनों की गदाएँ टकराईं। ध्वनि इतनी कि पानी थर्रा गया।
घंटे बीते। दिन बीते। साल।
हिरण्याक्ष को आख़िर कुछ शक हुआ। ”यह कोई साधारण सूअर नहीं।”
उसने अपनी magic विद्या निकाली। हवा में ग़ायब हो गया। फिर सब तरफ़ से प्रकट हुआ। अलग-अलग रूप।
वराह ने उसके हर रूप को पहचाना। और हर एक को counter किया।
देहाद्धरेरेकनिशं देवचक्षुषमायिता ॥
दो पार्षद थे नारायण के। शाप से वो राक्षस बने। पर हर बार, अपने ही प्रभु के हाथ से मरकर वैकुण्ठ लौटे।
एक मौक़े पर हिरण्याक्ष ने तीर बरसाए। हज़ार-हज़ार।
वराह ने सब रोके।
एक मौक़े पर हिरण्याक्ष ने पहाड़ उठाए। फेंके।
वराह ने उन्हें दाँत से तोड़ा।
एक मौक़े पर उसने तूफ़ान बुलाया। समुद्र हिल गया।
वराह स्थिर खड़ा रहा।
अब हिरण्याक्ष को डर लगने लगा।
”यह कौन है?”
वराह ने पहली बार बात की।
”मैं विष्णु। तेरे पुराने मित्र। मैंने ही तुझे शाप दिया था, वैकुण्ठ-द्वार पर। तू भूल गया।”
हिरण्याक्ष का चेहरा पीला।
उसे एक झलक हुई। पुरानी कथा। जय और विजय। चार-कुमारों का शाप।
”तो यह सब…”
”हाँ। यह सब तेरे ही script के अनुसार। तू ने ख़ुद चुना था राक्षस-रूप। मुझसे लड़ने के लिए। मुझे मारने के लिए।”
”क्योंकि तू जानता था, मेरे हाथ से मरकर, तेरा शाप ख़त्म होगा। तेरी मुक्ति यहीं है।”
हिरण्याक्ष चुप।
”चल, अब मेरा काम पूरा कर। तेरे आख़िरी आक्रमण।”
हिरण्याक्ष ने अपनी पूरी ताक़त इकट्ठी की। एक आख़िरी प्रहार। अपनी सब magic, सब power।
वराह ने उसे झेला। फिर एक मूल झटका। अपने दाँतों से।
हिरण्याक्ष के सीने में दाँत घुसे। उसका शरीर पानी में गिरा।
उसकी आँखें एक पल को खुलीं। उसने वराह को देखा। और एक अद्भुत चीज़ हुई।
उन आँखों में एक gratitude थी। एक relief।
और तब वो मर गया।
उसकी जान निकलकर सीधे वैकुण्ठ गई। एक तीन-जन्म-शाप का पहला जन्म पूरा।
अगला जन्म हिरण्यकशिपु। और प्रह्लाद के बहाने नृसिंह से मारा गया।
तीसरा जन्म रावण। राम के हाथ।
तीनों जन्म, हर बार भगवान के विरोध में। और हर बार भगवान के ही हाथ से मरकर मुक्ति।
यह एक interesting paradox है। उन्हें भगवान का दुश्मन बनकर भगवान को पाना था।
और हम सब, जो भगवान के मित्र बनकर भगवान को ढूँढते हैं, कई बार कहीं नहीं पहुँचते।
हिरण्याक्ष की कथा एक uncomfortable theology है।
वो एक राक्षस था। हर तरह से दुष्ट। उसने पृथ्वी चुराई। उसने हज़ार साल भगवान से लड़ाई की।
मगर वो आख़िर में मुक्ति पाया।
क्यों? क्योंकि उसका focus, चाहे ग़ुस्से में, चाहे दुश्मनी में, हमेशा भगवान पर था।
भागवतम् यहाँ कहता है, कुछ लोग प्रेम से भगवान को पाते हैं। कुछ ग़ुस्से से। कुछ डर से। कुछ मित्रता से। कुछ दुश्मनी से।
बस one common factor, वो लगातार उनके बारे में सोचते रहते हैं।
हिरण्याक्ष हर पल भगवान के बारे में सोचता था। ”उसे कैसे मारूँ। उसकी इस सृष्टि को कैसे नष्ट करूँ।” यह नकारात्मक सोच थी, मगर भगवान-केंद्रित।
और हज़ार साल की लड़ाई में, उसका दिमाग़ बस उन्हीं पर था।
यह कहीं हमारी अपनी ज़िंदगी का भी सबक है। हम जिसके बारे में सब से ज़्यादा सोचते हैं, हम उसी की तरफ़ खिंचते हैं। चाहे प्रेम हो, चाहे नफ़रत।
तो शायद, हम जिसे avoid करना चाहते हैं, हम उसी के बारे में सोचते रहते हैं। और हम जिसे पाना चाहते हैं, उसे भूल जाते हैं।
अगर सच में मुक्ति चाहिए, तो attention कहाँ है, यह देखें।