कर्दम और देवहूति

कथा 19 · भागवतम् की कथाएँ

कर्दम और देवहूति

I Will Stay Till the Child Is Born
स्कन्ध 3, अध्याय 21-24

बहुत पहले की बात है। शायद कई कल्प पहले।

ब्रह्मा ने अपने मन से कई पुत्र बनाए। उनमें से एक थे कर्दम। एक तपस्वी ऋषि।

कर्दम ने सरस्वती नदी के किनारे एक छोटी कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने सालों तपस्या की। उन्होंने अग्नि को साधा, श्वास को साधा, मन को साधा।

उन्हें इच्छा थी, एक संगिनी मिले। एक ऐसी पत्नी जो धार्मिक हो, बुद्धिमान हो, उनके तप के योग्य हो।

एक दिन, उनके सामने विष्णु ख़ुद प्रकट हुए। चार-हाथों वाले रूप में।

कर्दम ने हाथ जोड़े।

”हे प्रभु, मुझे एक पत्नी चाहिए। ऐसी जो मेरी साधना के साथ चले।”

विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, ”ठीक है। एक राजकुमारी है, देवहूति। मनु की बेटी। वो तुम्हारी पत्नी होगी। पर एक बात ध्यान रखना।”

”क्या?”

”तुम्हें उसके साथ कुछ समय गृहस्थ-जीवन में बिताना पड़ेगा। और एक बच्चा होगा। वो बच्चा कोई साधारण नहीं, मैं ख़ुद होऊँगा। बच्चे के बड़े होने के बाद, तुम जा सकते हो, अपनी तपस्या में लौट सकते हो।”

कर्दम मान गए।

इधर मनु ने अपनी बेटी देवहूति के लिए वर ढूँढ रहे थे।

देवहूति राजकुमारी थी। बहुत सुंदर। पर साथ ही, वो शास्त्रों की जानकार। तपस्या में रुचि रखती थी। उसने अपने पिता से कहा था, ”मुझे कोई राजकुमार नहीं चाहिए। मुझे एक ऋषि चाहिए।”

मनु ने कर्दम के बारे में सुना। उन्हें मिलने गए। बेटी को साथ ले गए।

कर्दम की कुटिया देखी। साधारण। पर देवहूति ने कर्दम को देखा, और उसके मन में कोई शक नहीं रहा।

”हाँ, पिताजी, यह मेरे योग्य हैं।”

विवाह हुआ।

देवहूति को राजमहल छोड़ना पड़ा। वो कर्दम की छोटी कुटिया में आ गई। उसके पास सब रेशम-कपड़े गए, सब गहने गए। बस उसका शरीर बचा।

उसने यह सब बिना complaint के स्वीकार किया।

कर्दम के साथ रहने लगी।

लेकिन सालों बीत गए। उन्होंने एक-दूसरे को बस ब्रह्मचर्य के नाते देखा। पति-पत्नी पर तपस्वी।

एक दिन देवहूति ने हिम्मत करके कहा।

”स्वामी, मेरी एक बात है।”

”बोलो।”

”हम पति-पत्नी हैं। मगर एक रिश्ता नहीं बना। मैंने कुछ नहीं माँगा है इन सालों में। मगर अब, मेरी एक इच्छा है। एक बच्चा।”

कर्दम ने पत्नी को देखा। उसकी आँखों में सच्ची चाह थी। और एक बात भी, जो पति को पता थी, उसने सब छोड़ा था अपने तप के लिए।

”ठीक है,” उन्होंने कहा।

और तब कर्दम ने अपनी योग-शक्ति से कुछ अद्भुत किया।

उन्होंने एक विशाल aerial palace बनाया। एक divine विमान। उसमें सब comforts थे, सब luxuries। उन्होंने देवहूति को राजकुमारी का रूप वापस दिया। सब गहने, सब कपड़े। और एक हज़ार servant-girls भी।

”आओ। हम कुछ साल यह बच्चा बनाने में बिताते हैं। फिर मैं अपनी तपस्या में लौटूँगा।”

ततस्तस्मादप्रतिमं प्रतिभानमवापि सः ।
व्यजहार स तत्सर्वं स्वमतेनात्मनः परम् ॥

कर्दम ने अपनी योग-शक्ति से एक अद्भुत आकाशीय विमान बनाया, और गृहस्थ-जीवन के हर पहलू को पूरा अनुभव किया, पर अपनी आत्मिक स्थिति को नहीं छोड़ा।

वो दोनों उस विमान में रहे। हिमालय, मेरु, कैलाश, सब पहाड़ों पर घूमे। उन्होंने गृहस्थ-जीवन का हर experience लिया। पर हमेशा एक दूरी रही, हमेशा एक awareness रही कि यह सब temporary है।

देवहूति ने नौ बेटियों को जन्म दिया। सब बहुत बुद्धिमान। बड़ी होकर वो सब महान ऋषियों की पत्नियाँ बनीं।

फिर एक बेटा हुआ।

उस बेटे का नाम कपिल।

और कपिल कोई साधारण बच्चा नहीं था। वो ख़ुद विष्णु का अवतार था।

बच्चा जब बड़ा होने लगा, कर्दम ने अपनी प्रतिज्ञा निभाई।

”अब मेरा वचन पूरा हुआ। मैं जा रहा हूँ।”

देवहूति ने उन्हें रोका नहीं। बस आख़िरी बार उनका माथा छुआ।

कर्दम ने वो सब छोड़ा, वो विमान, वो गहने, वो रिश्ते। और हिमालय में चले गए। फिर कभी नहीं लौटे।

देवहूति अपने बेटे के साथ रही।

कुछ साल बाद, कपिल जब बड़ा हुआ, देवहूति ने उसे एक माँ की नहीं, एक शिष्य की तरह देखा।

”बेटा, मेरे लिए तुम मेरे बेटे नहीं, मेरे गुरु हो। मुझे सिखाओ।”

और कपिल ने अपनी माँ को सांख्य-दर्शन सिखाया। पर वो अगली कथा है।

मन्थन

कर्दम-देवहूति की कथा भागवतम् के सबसे subtle moments में से एक है।

कर्दम एक तपस्वी थे। उन्हें गृहस्थी की कोई इच्छा नहीं थी। पर देवहूति की एक छोटी सी इच्छा सुनकर वो तैयार हो गए।

क्यों? क्योंकि भागवतम् कह रहा है कि एक रिश्ता भी एक तरह का तप है। और तप एकलापन में नहीं, ज़िम्मेदारी में होता है।

कर्दम ने अपना तप एक रिश्ते में पाला। उन्होंने पूरी ईमानदारी से एक पति की भूमिका निभाई, मगर बीच में एक awareness रखी, यह सब temporary है, और मेरा असली काम कुछ और है।

देवहूति ने भी कमाल का काम किया। उन्होंने राजमहल छोड़ा एक ऋषि के लिए। फिर ऋषि से एक बच्चा माँगा। और बच्चा बड़ा होकर उन्हें गुरु मिला।

एक life में, माँ बेटे की शिष्या बन गई। यह एक radical inversion है, और भागवतम् इसे प्रशंसा के साथ बताता है।

कई बार हमारे रिश्ते में जो दूसरा है, वो हमें अंदर का रास्ता दिखा सकता है। बच्चा माँ को। पत्नी पति को। मित्र मित्र को।

बस हम तैयार हों उन्हें इस रूप में देखने को।