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कर्दम और देवहूति

कथा 19 · भागवतम् की कथाएँ

कर्दम और देवहूति

जब तक बालक न जन्मे, मैं ठहरूँगा
स्कन्ध 3, अध्याय 21-24

गंगा का जल उस सुबह धीमे-धीमे बह रहा था, और परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा।

”भगवन्, एक बात मेरे मन में अटकी है। मैं राजा रहा हूँ, मैंने महल भी देखा है और रण भी। अब छह दिन बचे हैं, और मैं सोचता हूँ, क्या गृहस्थी और संसार में रहते हुए भी कोई उस ओर पहुँच सकता है, या इसके लिए सब छोड़कर वन ही जाना पड़ता है?”

शुकदेव कुछ देर मौन रहे, फिर मुस्कुराए। ”राजन्, सुनिए एक ऋषि और एक राज-कन्या की कथा। जो उत्तर आप ढूँढ़ रहे हैं, वह न तो वन में मिला, न महल में। एक हथेली के खुलने में मिला।”

बहुत पुरानी बात है, सृष्टि के आरम्भ की।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the sage Kardama, lean and luminous with matted hair and a long beard, seated in deep meditation on a single stone seat before a humble thatched hut on the green bank of the river Sarasvati; cool dawn light, river mist, his eyes closed in penance, a scene conveying ten thousand years of unbroken tapas.

ब्रह्मा ने अपने संकल्प से जो पुत्र रचे, उनमें एक थे कर्दम। सरस्वती के किनारे उन्होंने अपनी कुटिया बनाई, फूस की छत और एक पत्थर के आसन भर की। वहीं पूरे दस हज़ार वर्ष उन्होंने तप किया। अग्नि को साधा, साँस को साधा, मन को साधा। भोर में नदी का ठंडा पानी, दोपहर की चुप धूप, और रात की वह ख़ामोशी जिसमें केवल अपनी ही साँस सुनाई देती है, यही उनका संसार था। दस हज़ार वर्ष कोई छोटी अवधि नहीं। इतने में पर्वत घिसते हैं, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती हैं। पर कर्दम का आसन उस पत्थर पर वैसा का वैसा रहा, और भीतर एक ही पुकार चलती रही, बिना शब्दों के, बिना ज़ुबान के, केवल हृदय से।

एक इच्छा भी भीतर रह गई थी, जिसे वे स्वयं अपने से छिपाते रहे। एक संगिनी मिले, ऐसी जो धर्म जानती हो, उनके तप के साथ चल सके। तपस्वी होकर भी यह माँगना उन्हें अखरता था, और न माँगना भी।

Rich painterly classical-Indian color illustration: Sri Hari (Vishnu) appearing radiant above Kardama's hut, blue-skinned with a garland of white lotuses and water-lilies and one white lotus held in play in his hand, his feet resting not on the ground but on the shoulders of the eagle Garuda; Kardama prostrate below with folded hands, the air glowing.

एक दिन वह पुकार पूरी हुई। श्रीहरि अपने शब्दब्रह्ममय स्वरूप से उतर आए। कुटिया की वह सूनी हवा जैसे किसी ने भर दी हो। उनके गले में श्वेत कमल और कुमुद की माला थी, मुख नीला और चिकनी अलकों से घिरा, एक हाथ में क्रीड़ा भर का सफ़ेद कमल। उनके चरण किसी भूमि पर नहीं, गरुड़ के कंधों पर टिके थे। कर्दम ने इस मूर्ति को देखा, और दस हज़ार वर्ष की प्यास जैसे एक घूँट में बुझ गई। वे पृथ्वी पर माथा टेककर गिर पड़े, और जब उठे तो हाथ अपने आप जुड़ गए थे।

कर्दम ने हाथ जोड़े।

”प्रभु, आप भवसागर पार उतारने वाले जहाज़ हैं। जो बुद्धिमान हैं वे आपके चरण माँगते हैं। मुझ-जैसा मूढ़ एक स्त्री माँगने आया है। मेरे योग्य कोई शीलवती संगिनी हो, जो मेरे तप के साथ चल सके।”

श्रीहरि की मुसकान में कोई उपहास न था। ”आपके मन की बात मैंने पहले ही जान ली थी, कर्दम, और उसकी व्यवस्था भी कर दी है। परसों स्वायम्भुव मनु अपनी पुत्री देवहूति को लेकर आपके आश्रम आएँगे। वही आपकी पत्नी होगी।”

”परसों,” कर्दम ने धीरे से दोहराया, जैसे दस हज़ार वर्ष की प्रतीक्षा के बाद यह छोटा-सा शब्द उनके मुँह में अजनबी लग रहा हो।

”पर एक बात ध्यान रहे। उसके साथ आपको कुछ वर्ष गृहस्थ का जीवन जीना होगा। फिर आपके घर मैं स्वयं पुत्र-रूप में उतरूँगा। बालक के बड़े होने पर आप मुक्त हैं, अपने तप में लौट जाइए।”

कर्दम मान गए। श्रीहरि अपने लोक को लौट गए, और जाते-जाते जिस स्थान पर खड़े थे, वहाँ की हवा बहुत देर तक कमल की गंध से भरी रही।

उधर मनु अपनी बेटी देवहूति के लिए वर खोज रहे थे।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the young princess Devahuti playing with a ball on the open terrace of her father's palace, golden anklets ringing on her feet, her eyes following the ball; high in the sky the gandharva Vishvavasu, swooning with enchantment, tumbling from his celestial chariot; ornate Indian palace rooftop, bright daytime sky.

देवहूति स्वायम्भुव मनु और महारानी शतरूपा की बेटी थी, प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहन। राजमहल की बेटी होकर भी उसका मन महल में नहीं रमता था। एक बार वह अपने महल की छत पर गेंद से खेल रही थी, पैरों के पायजेब मधुर झनकार कर रहे थे, और गेंद के पीछे दौड़ते उसके नेत्र चंचल हो उठे थे। उसे देखकर आकाश से जाता विश्वावसु गन्धर्व मोह में अचेत होकर अपने विमान से ही गिर पड़ा था। पर उस रूप के भीतर एक और प्यास थी जिसे महल नहीं भर सकता था। नारद से उसने कर्दम के शील और गुणों का वर्णन सुना, और उसी दिन से मन ही मन उन्हीं को अपना पति मान चुकी थी। पिता से उसने कह रखा था, ”मुझे कोई राजकुमार नहीं चाहिए। मेरे लिए कोई ऋषि खोजिए।”

मनु ने कर्दम का नाम सुना और बेटी को सोने के रथ पर बिठाकर मिलने चले।

कुटिया साधारण थी, मिट्टी की दीवारें और धुएँ की हल्की गंध। पर देवहूति ने कर्दम के मुख की ओर देखा, उस मुख पर जो दस हज़ार वर्ष की चुप तपस्या से लम्बा और तेजस्वी हो आया था, और उसके भीतर का संशय वहीं ठहर गया।

”हाँ, पिताजी, यही मेरे योग्य हैं।”

Rich painterly classical-Indian color illustration: emperor Svayambhuva Manu, crowned and regal, weeping as he clasps his daughter Devahuti to his chest in farewell, his tears wetting her hair; a golden chariot waiting nearby, Kardama's simple mud-walled hut in the background, an emotional parting scene.

विवाह की विधि पूरी हुई। फिर बेटी को विदा करने की घड़ी आई। मनु जो जगत् के पहले सम्राट् थे, जिनकी आज्ञा सात द्वीपों पर चलती थी, बेटी का वियोग नहीं सह सके। उन्होंने देवहूति को छाती से चिपटा लिया और ”बेटी, बेटी” कहकर रो पड़े। आँसुओं की झड़ी लग गई, और उन्होंने बेटी के सिर के सारे बाल अपने आँसुओं से भिगो दिए। फिर रथ मुड़ गया।

राजमहल छूट गया। देवहूति कर्दम की छोटी कुटिया में आ बसी। रेशम के वस्त्र उतर गए, गहने एक-एक कर अलग हो गए, बस उसका देह और उसकी सेवा बची रही।

उसने यह सब बिना एक शिकायत के अपना लिया। काम, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मद को छोड़कर बड़ी सावधानी और लगन के साथ वह पति की सेवा में जुटी रही। पति की सेवा में वह इतनी मगन रही कि उसका शरीर दुबला पड़ गया, पर माथे की रेखा कभी न सिकुड़ी।

बरस पर बरस बीतते गए। दोनों एक-दूसरे के पास रहे, पर तपस्वी की तरह, ब्रह्मचर्य के नियम में बँधे। पति भी, पत्नी भी, और साधक भी।

एक दिन देवहूति ने हिम्मत बटोरी।

”स्वामी, मेरी एक बात है।”

”कहिए।”

”हम पति-पत्नी हैं, पर एक गृहस्थ का नाता अब तक नहीं बना। इन बरसों में मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा। पर अब मन में एक इच्छा है, एक संतान की।”

कर्दम ने पत्नी की ओर देखा। उन आँखों में एक सच्ची चाह थी, और साथ ही वह बात जो वे जानते थे, कि इस स्त्री ने अपना सारा वैभव उनके तप के लिए छोड़ दिया था।

”ठीक है,” उन्होंने कहा।

Rich painterly classical-Indian color illustration: Kardama in yogic concentration conjuring a magnificent flying palace-vimana resting on jewelled pillars, with an emerald floor, diamond-paneled doors, golden domes topped with sapphire spires, walls inset with glowing rubies; lifelike artificial swans and pigeons so real that real swans perch beside them; opulent aerial palace.

फिर कर्दम ने अपनी प्रिया की इच्छा पूरी करने के लिए उसी समय योग में स्थित होकर एक विमान रचा, इच्छानुसार सर्वत्र जाने वाला, मणियों के खंभों पर टिका। उसका फ़र्श पन्ने का था, द्वारों में हीरे के किवाड़, शिखरों पर इन्द्रनील मणि के सोने के कलश। दीवारों में जड़े लाल ऐसे चमकते थे मानो विमान की आँखें हों। उसमें जगह-जगह बनाए कृत्रिम हंस और कबूतर इतने सजीव थे कि सच्चे हंस उन्हें अपना समझकर पास आ बैठते और बोली बोलते। इतना सब कर्दम ने स्वयं रचा था, और फिर भी जब वह उसे देखते, तो जैसे किसी और के बनाए को देख रहे हों।

तब सबके भीतर का भाव परखने वाले कर्दम ने स्वयं ही देवहूति से कहा, ”आप पहले उस सरोवर में स्नान कर आइए, फिर विमान पर चढ़ जाइए।”

वह सरोवर कोई साधारण जल न था। बिन्दु-सरोवर। उसी आश्रम के पास, जहाँ कभी श्रीहरि अपने शरणागत भक्त पर इतने करुणा-विभोर हुए थे कि उनके नेत्रों से आँसुओं की बूँदें गिरी थीं, और उन्हीं बूँदों से यह तीर्थ बना था। सरस्वती उसे भरती थी। उसका जल शिव और अमृत के समान मीठा था, उसके किनारे झुंड-के-झुंड मतवाले पक्षी चहक रहे थे, और मतवाले मयूर अपने पंख फैला-फैलाकर नाच रहे थे।

देवहूति उस जल में उतरी। उस समय उसकी साड़ी मैली-कुचैली थी, सिर के बाल उलझकर लटें बन गए थे, शरीर पर तप का मैल जम गया था, और स्तन-कान्ति भी मन्द पड़ गई थी। उसने एक डुबकी लगाई।

और जल के भीतर उसने एक महल देखा।

Rich painterly classical-Indian color illustration: an underwater palace inside the Bindu-sarovar lake where one thousand youthful maidens, lotus-fragrant, rise and bow with folded hands to greet Devahuti as their mistress; they bathe her in scented water, untangle her hair and dress her in two fresh garments, holding up a mirror; shimmering submerged jewelled hall.

उस महल में एक हज़ार कन्याएँ थीं, सब किशोर अवस्था की, और उनके शरीरों से कमल की-सी गंध आ रही थी। देवहूति को देखते ही वे सब सहसा खड़ी हो गईं और हाथ जोड़कर बोलीं, ”हम आपकी दासियाँ हैं। आज्ञा दीजिए, क्या सेवा करें?” उन्होंने बहुमूल्य गन्ध मिले जल से उसे नहलाया, उलझे बाल सुलझाए, मैल छुड़ाया, और दो निर्मल नए वस्त्र पहनाए। फिर एक दर्पण उसके सामने कर दिया।

देवहूति ने दर्पण में अपना मुख देखा, और एक क्षण को पहचान न पाई। वह वही रूप था जो विवाह के दिन था, उससे भी कुछ अधिक। गले में हार, हाथों में कंगन, और पैरों में वही छमछमाते सोने के पायजेब जो कभी महल की छत पर बजते थे। उसके होंठ अपने आप काँपे, पर शब्द न निकले। तप के जिन बरसों में देह ने अपनी कान्ति चुपचाप दे दी थी, वह सब जैसे एक डुबकी में लौटा दिया गया हो। जब उसने पति का स्मरण किया, तो स्वयं को सहेलियों के साथ वहीं पाया, जहाँ कर्दम विमान के पास खड़े थे।

उन्होंने देवहूति को विमान पर चढ़ा लिया।

वे दोनों बरसों उस विमान में रहे। मेरु की घाटियों के ऊपर से उड़े, जहाँ आठों लोकपालों की विहार-भूमि है, जहाँ श्रीगंगा के स्वर्ग से गिरने की मंगलमय ध्वनि निरन्तर गूँजती रहती है, और जहाँ कामदेव को बढ़ाने वाली शीतल सुगन्ध वायु बहती है। वैभ्राजक, नन्दन, पुष्पभद्रक के उपवनों में ठहरे, मानस-सरोवर में नहाए। कर्दम ने गृहस्थ का हर भोग जिया, पूरी ईमानदारी से, पर भीतर उनकी महिमा कभी कम न हुई। योग-बल से सैकड़ों वर्ष उन्होंने यों बिताए कि वह काल एक मुहूर्त के समान बीत गया। समय की वह दूरी, जो साधक को संसार से सदा थोड़ा अलग रखती है, उनमें बनी रही।

देवहूति ने नौ कन्याओं को जन्म दिया। सब सर्वांग-सुन्दरी, उनके शरीरों से लाल कमल की-सी गंध। बड़ी होकर वे नौ की नौ मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और अथर्वा, इन महान ऋषियों की पत्नियाँ बनीं, और इन्हीं से सृष्टि का वंश आगे बढ़ा।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the divine birth of the child Kapila to Devahuti; thunderclouds booming like drums, gandharvas singing, apsaras dancing in the sky, and a rain of celestial flowers falling; the radiant newborn Kapila, who is Sri Hari himself descended, glowing in the humble hermitage.

फिर एक दिन काठ में छिपी अग्नि की तरह देवहूति के गर्भ से एक पुत्र प्रकट हुआ। उस दिन आकाश में मेघ गरज-गरजकर मानो बाजे बजाने लगे, गन्धर्व गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं, और आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी। उस बालक का नाम कपिल पड़ा, और उसी रूप में श्रीहरि स्वयं उतर आए थे, जैसा उन्होंने दस हज़ार वर्ष पहले कर्दम को वचन दिया था।

अब कर्दम का वचन पूरा हो चुका था।

देवहूति जानती थी कि यह दिन आएगा, फिर भी जब आया तो उसने स्वयं को असहाय पाया। वह सिर नीचा किए खड़ी रही, और अपने नख-मणि-जड़े पैर के अँगूठे से ज़मीन कुरेदती रही, मानो वहीं कोई शब्द लिखना चाहती हो जो होंठों पर नहीं आ रहे थे। उसने आँसुओं को भीतर ही रोक लिया। ”भगवन्,” उसने धीरे-धीरे, बहुत मधुर पर काँपती वाणी में कहा, ”आपने जो प्रतिज्ञा की थी, वह सब आपने पूरी निभा दी। पर मैं अब भी आपकी शरणागत हूँ। इन कन्याओं के लिए वर खोजने पड़ेंगे, और आपके चले जाने के बाद मेरे जन्म-मरण के शोक को कोई दूर करने वाला भी तो हो।”

कर्दम जानते थे कि उत्तर उसी के घर में है। उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि उसके अपने गर्भ का बालक उसे राह दिखाएगा, और फिर कन्याओं का विधिपूर्वक मरीचि आदि ऋषियों से विवाह कर दिया।

उसके बाद कर्दम ने वह सब पीछे छोड़ दिया, वह विमान, वे मणि-खंभे, वे नाते। उन्होंने मौन का व्रत लिया, अकेले श्रीहरि की शरण ली, और बिना किसी आसक्ति के, बिना घर के, वन की ओर चल पड़े। मन को ब्रह्म में जोड़े, समदर्शी होकर वे पृथ्वी पर विचरने लगे। फिर कभी नहीं लौटे।

देवहूति अपने पुत्र के साथ रह गईं।

बरस बीते। कपिल बड़े हुए। और एक सुबह वह घड़ी आई जिसे माँ कई दिनों से अपने भीतर टटोल रही थी।

देवहूति अपने बेटे के सामने आकर खड़ी हुई। वही बेटा, जिसे उसने अपनी छाती से दूध पिलाया था, जिसके पैर के नाख़ून उसने अपने अँगूठे की पोर से तराशे थे, जिसकी पहली हँसी उसने अपने कानों में अब भी सँभाल रखी थी। वह उसे देख रही थी और देख नहीं पा रही थी, क्योंकि अब उस मुख में वही था जो कभी सरस्वती के किनारे, चार भुजाओं में, गरुड़ के कंधों पर उतरा था।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the aged mother Devahuti standing before her grown son Kapila on the bank of the river Sarasvati, slowly raising and joining her two palms in reverence as a disciple before a guru; Kapila seated serene and luminous as the divine teacher; flowing river water beside them and a peacock in the distance, a tender devotional moment.

उसने एक लम्बी साँस ली। उसका गला रुँध आया, होंठ खुले और फिर बन्द हो गए। उसने अपने दोनों हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठाए, और जोड़ दिए, जैसे कोई शिष्य अपने गुरु के सामने जोड़ता है। जिन हथेलियों ने इस बालक को सँभाला था, वही अब उसके आगे झुकीं। उसकी छाती में कुछ काँपा, माँ का गर्व और शिष्या की दीनता एक साथ, और दोनों उस झुकी हुई मुद्रा में जुड़ गए। आसपास सरस्वती का जल बह रहा था, और कहीं दूर एक मतवाला मोर बोल उठा।

”भगवन्,” उसकी आवाज़ अब बहुत छोटी थी। ”अब तक परमात्मा से विमुख रहकर इन्द्रियों के सुख में मेरा जो समय बीता, वह व्यर्थ ही गया। पर मैं आपको पहचानने में बहुत देर से नहीं चूकी।” और फिर वह उस सूक्ष्म ज्ञान की ओर मुड़ी जिसके लिए श्रीहरि इस गोद में उतरे थे।

कपिल ने माँ की झुकी हुई हथेलियों को देखा, उन झुर्रियों को जो उसी की सेवा में पड़ी थीं। फिर वे माँ से वह कहने लगे जो आगे सांख्य कहलाया, आत्मा का वह सूक्ष्म मार्ग जो बहुत समय से लुप्त हो चला था, और जिसे फिर से कहने के लिए ही श्रीहरि इस गोद में उतरे थे।

यहाँ शुकदेव क्षण भर ठहरे।

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, कर्दम ने वह उड़ता हुआ महल अपने ही हाथों रचा, बरसों उसमें रहे, और फिर एक दिन उसे वहीं छोड़कर ख़ाली हाथ चल दिए। मेरा सिंहासन भी तो ऐसा ही एक विमान है।”

शुकदेव मुस्कुराए। ”जिस हथेली ने उसे रचा, राजन्, उसी ने उसे जाने भी दिया। और देखिए, उत्तर देवहूति को न वन में मिला, न महल में। अपने ही बेटे की गोद में मिला, जिस गोद में उसने उसे पाला था। जो सब में निकट है, उसे गुरु की तरह देख पाना ही अत्यन्त कठिन है।”

शुकदेव ने इतना कहा और चुप हो गए। गंगा पर सुबह की धूप अब फैल चुकी थी, और जल की सतह पर वह काँपती रोशनी उसी तरह हिल रही थी जैसे किसी झुके हुए माथे के नीचे जुड़े दो हाथ।

मन्थन

एक उड़ता हुआ महल, मणियों के खंभे, हीरे के किवाड़, और जल के भीतर एक हज़ार दासियाँ। कर्दम ने यह सब अपने हाथों रचा, और उसी हाथ ने एक दिन इसे जाने भी दिया।

देवहूति की डुबकी से जो रूप लौटा, वह भी एक दिन इस देह की तरह छूट जाने वाला था। पर उस सबके बीच एक चीज़ बची रही, वे जुड़े हुए दो हाथ, जो पहले पति के सामने झुके, और अन्त में अपने ही बेटे के सामने।

जिस गोद ने दूध पिलाया, वही गोद किस मुहूर्त में झुक जाती है? और जो हर रोज़ हमारे सामने बैठा है, उसमें वह कब दिख जाता है जिसकी खोज में लोग वन को निकल जाते हैं?

साहित्यिक-संदर्भ

कर्दम और देवहूति का प्रसंग श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 21 से 24 तक आता है। इसी क्रम में विवाह, गृहस्थ-तप, और कर्दम का वन-गमन वर्णित है, और फिर कपिल का जन्म, जिनका सांख्य-उपदेश (कपिल-गीता) इसी स्कन्ध में आगे चलता है।

देवहूति की नौ कन्याएँ आगे मरीचि, अत्रि, अंगिरा आदि ऋषियों की पत्नियाँ बनीं, और इसी से सृष्टि-वंश आगे बढ़ा। जिस बिन्दु-सरोवर के किनारे यह सब घटा, वह तीर्थ सरस्वती से भरा हुआ बताया गया है, और कपिल का सांख्य-उपदेश (कपिल-गीता) इसी स्कन्ध में आगे चलता है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

सरस्वती के किनारे एक ऋषि दस हज़ार वर्ष बैठा रहा, फिर एक राज-कन्या आई, फिर एक उड़ता हुआ महल बना और छूट गया। और अन्त में सब कुछ उन दो हथेलियों में सिमट आया जो एक माँ ने अपने ही बेटे के आगे जोड़ दीं। पास बहता रहा वही जल, जिसमें कभी श्रीहरि के आँसू गिरे थे।