मोहिनी अवतार
समुद्र मन्थन ख़त्म हुआ था।
अमृत बाहर आया। एक स्वर्ण-कलश में। धन्वन्तरि के हाथ में।
देवों की आँखें चमकीं। राक्षसों की भी।
”अमृत हमारा।”
पर एक problem थी। राक्षस तेज़ थे। और झगड़ालू।
उन्होंने धन्वन्तरि के हाथ से कलश छीना। अपने बीच में ले गए।
”हम पहले पीएँगे। फिर देवता, अगर बचा।”
देवता घबराए। उन्होंने विष्णु को पुकारा।
विष्णु ने एक clever plan बनाया।
उन्होंने अपना रूप बदला। एक स्त्री। बहुत सुन्दर।
बहुत सुन्दर मतलब, ऐसी सुन्दर कि देखकर सब अपना दिमाग़ खो दें।
उन्होंने एक रेशम की साड़ी पहनी। बालों में फूल। कानों में bali। आँखों में kajal।
और मुस्कान, जो दुनिया हिला दे।
वो धीरे-धीरे राक्षसों के बीच आईं। हाथ में एक छोटा कलश।
राक्षसों ने उन्हें देखा। अमृत-कलश छोड़कर देखने लगे।
”यह कौन है?”
”कितनी सुन्दर है।”
मोहिनी (यह उनका नाम था) मुस्कुराईं।
”मैं तुम्हारे झगड़े को solve करने आई हूँ। मेरे साथ क्यों झगड़ रहे हो? मुझे अमृत बाँटने दो।”
एक राक्षस-नेता बोला, ”क्यों नहीं? तुम बाँटो। हम तो लड़ रहे थे, हो जाएगा।”
दैत्यानां मोहयित्वैव दैवानां जयकारकम् ॥
उस स्त्री-रूप ने राक्षसों को मोहित करके, देवों की जीत निश्चित की। यह वैष्णवी-शक्ति की एक अद्भुत लीला थी।
मोहिनी ने एक shrewd रास्ता निकाला।
”ठीक है। पर एक शर्त। देवता एक तरफ़ बैठेंगे, राक्षस दूसरी तरफ़। मैं बारी-बारी से बाँटूँगी।”
”और मुझ पर कोई शक नहीं। मेरी एक request, जब मैं कह रही हूँ, तुम पीना। बिना सोचे।”
राक्षस तैयार। उन्हें लगा, हम पहले पी लेंगे, फिर देखेंगे।
मगर मोहिनी ने clever बात की।
उन्होंने पहले देवताओं की तरफ़ देखा। उन्हें देवों की लाइन की तरफ़ मुड़ने का इशारा किया।
देवताओं के सामने वो खड़ी हुई। पहले एक देव को पिलाया। फिर दूसरे को। फिर तीसरे को।
राक्षस बैठे देख रहे थे। वो उठ नहीं रहे थे। क्यों? क्योंकि मोहिनी ने उन्हें कहा था, ”शान्त रहो। जब मेरी बारी हो, तब मैं तुम्हें दूँगी।”
एक राक्षस का नाम राहु था। वो clever था।
उसे शक हुआ। उसने सोचा, ”यह औरत हमें ठगने वाली है।”
उसने अपना रूप बदला। एक देव की तरह। और देवों की लाइन में बैठा।
मोहिनी ने उसे अमृत दिया। राहु ने पी लिया।
मगर सूर्य और चन्द्र को शक हुआ। उन्होंने मोहिनी को बताया, ”यह तो राक्षस है!”
मोहिनी ने तुरंत अपना सुदर्शन चक्र निकाला (असली रूप में जो उनके पास था) और राहु का सिर काट दिया।
मगर देर हो चुकी थी।
अमृत राहु के गले से नीचे जा चुका था। सिर अमर। बाक़ी शरीर मरा।
राहु का सिर अब अमर था। उसने सूर्य और चन्द्र को कभी माफ़ नहीं किया, क्योंकि उन्होंने उसे expose किया।
तब से, राहु सूर्य और चन्द्र को कभी-कभी निगलता है। उसे ”ग्रहण” कहते हैं।
मगर वो असल में खा नहीं सकता, क्योंकि उसके पास सिर्फ़ सिर है, पेट नहीं। तो थोड़ी देर निगलकर वापस छोड़ देता है।
वापस मुख्य कथा पर।
मोहिनी ने सब अमृत देवों को दिया। राक्षस ख़ाली हाथ। उन्होंने ग़ुस्से में लड़ाई शुरू की। मगर देव अब अमर थे। बिना डर के लड़े। राक्षस फिर हार गए।
और मोहिनी? जब काम पूरा, उन्होंने अपना रूप त्याग किया। फिर विष्णु बने।
देव हाथ जोड़कर बोले, ”प्रभु, धन्यवाद!”
विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, ”एक चालाकी से बहुत बड़ी समस्या हल हो गई। जब सीधा रास्ता काम नहीं करे, तो tilted रास्ता।”
मोहिनी-अवतार भागवतम् का एक unusual moment है।
विष्णु, जो पुरुष-रूप में जाने जाते हैं, यहाँ एक स्त्री-रूप लेते हैं। और एक काम करते हैं, राक्षसों को धोखा देते हैं।
क्या यह सही है? धोखा?
भागवतम् यह सवाल नहीं उठाता। बस presentation करता है।
एक तरह से, यह कथा एक middle finger है normal morality को।
देवता ”अच्छे” थे। राक्षस ”बुरे”। पर अमृत के लिए तो दोनों इकट्ठा थे।
और जब लड़ाई शुरू हुई, तब विष्णु ने नीतिशास्त्र नहीं देखा। उन्होंने pragmatic रास्ता चुना।
यह एक interesting theology है। भगवान हमेशा rules से बँधे नहीं हैं। वो जैसा चाहिए, वैसा बनते हैं। पुरुष, स्त्री, मछली, सूअर, बौना। हर रूप अलग।
और दूसरी बात। राहु की कथा हमें कुछ सिखाती है। एक छोटा सा deception, एक तरह की चालाकी, उसने अमर हो जाने में मदद की। मगर साथ ही, उसके पेट के बिना अमरता एक तरह का curse भी बन गई। हर ग्रहण में वो याद आता है।
जब हम कुछ ”चुराते” हैं, चाहे वो attention हो, सम्मान हो, या credit, हम पूरी चीज़ नहीं ले पाते। बस एक हिस्सा। और वो आधा हिस्सा हमें disturbed रखता है।