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मोहिनी अवतार

कथा 33 · भागवतम् की कथाएँ

मोहिनी अवतार

जब श्रीहरि ने मोहिनी का रूप धरा
स्कन्ध 8, अध्याय 8-9

गंगा की लहरें उस सुबह बहुत धीमी थीं, मानो वे भी सुनने को रुक गई हों। परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा और कहा, ”मुनिवर, कल आपने समुद्र-मन्थन की कथा सुनाई। मन्दराचल, वासुकि, वह हलाहल जिसे शिव ने कंठ में रोक लिया। पर एक बात मन में अटकी रह गई। अमृत तो निकल आया, फिर देवताओं के हाथ कैसे लगा? असुर भी तो वहीं खड़े थे, और बल में कम न थे।”

शुकदेव की आँखों में एक हलकी मुस्कान तैरी, जैसे कोई पुरानी प्यारी बात याद आ गई हो। ”राजन्, जहाँ सीधा बल काम नहीं आता, वहाँ श्रीहरि अपनी माया से काम लेते हैं। और उस दिन उन्होंने जो रूप धरा, वैसा न उससे पहले किसी ने देखा था, न बाद में।”

वे क्षण भर ठहरे। फिर बोले, ”सुनिए।”

मन्थन से जो अमृत निकला, वह आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्वन्तरि के हाथ में था। साक्षात् श्रीविष्णु के अंशांश अवतार, और उनके हाथ में वह स्वर्ण-कलश, जिसमें वह तरल भरा था जो बुढ़ापे और मृत्यु को हर लेता है।

देवताओं की आँखें उस पर टिकी थीं। असुरों की भी।

Painterly classical-Indian color illustration on the ocean-of-milk shore just after the churning: muscular dark-complexioned asuras lunge and snatch the golden amrita-kalasha away from Dhanvantari, the four-armed physician-form of Vishnu holding the nectar pot, while the asuras then grapple and wrestle each other for the vessel; gods stand aside watching anxiously, Mandara mountain and Vasuki the serpent faint in the background, jewel-tone palette, gold and turquoise sea.

पर असुर देर न करते थे। उन्होंने झपटकर धन्वन्तरि के हाथ से वह कलश बलपूर्वक छीन लिया। फिर तो वे आपस ही में उलझ पड़े। एक के हाथ से दूसरा छीनता, दूसरे से तीसरा, मानो डाकू एक-दूसरे को लूट रहे हों।

”अमृत हमारा है,” हर एक चिल्लाता। ”पहले मैं पीऊँगा, पहले मैं। आप नहीं, आप नहीं।”

उनमें जो दुर्बल थे, वे बलवान् असुरों की दुहाई देने लगे, ”भाई, हमने भी तो उतना ही परिश्रम किया है, हमें भी भाग मिलना चाहिए।” पर सुनता कौन।

देवताओं के पाँव तले ज़मीन खिसक गई। हार सामने थी। उन्होंने हाथ जोड़े, आँखें मूँदीं, और श्रीहरि को पुकारा।

”खेद न कीजिए, देवताओ,” श्रीहरि का स्वर भीतर से उठा। ”अपनी माया से इनमें फूट डालकर मैं आपका काम बना देता हूँ।”

श्रीहरि ने उत्तर बल से नहीं दिया।

वे सब उपायों के जानने वाले स्वामी थे। उन्होंने अपना रूप पलट दिया। जहाँ क्षण भर पहले कुछ और था, वहाँ अब एक स्त्री खड़ी थी। ऐसी, जिसे देखकर साँस अपनी जगह भूल जाए।

Lush classical-Indian color portrait of the newly manifested Mohini, a supremely beautiful young woman with dark blue-lotus (shyama) complexion, glittering jeweled earrings (mani-kundala) swinging at both ears, fine high nose and lovely cheeks, full bosom with a slender waist, tinkling anklets (nupura) on her feet, a few black bees hovering near her fragrant breath; she stands radiant and alluring, holding the amrita-kalasha; soft golden glow, rich ornaments, flowing silks.

उनके शरीर का रंग नील-कमल-सा श्याम था। नई जवानी, अंग-अंग ऐसा गढ़ा हुआ कि आँख हट न सके। दोनों कानों में चमकीले मणि-कुण्डल झूलते, सुन्दर कपोल, ऊँची नासिका, रमणीय मुख। नई उम्र के कारण भरे हुए वक्षःस्थल का भार ढोते-ढोते कमर पतली पड़ गई थी। पैरों में नूपुर मधुर झंकार करते। और साँस की सुगन्ध पर मँडराते भौंरे, जिनसे आँखों में एक हलकी घबराहट तैर आती।

उनकी एक तिरछी चितवन, एक सलज्ज मुस्कान, और तीनों लोक एक पल को ठहर गए।

वे धीरे-धीरे असुरों के बीच चली आईं, हाथ में अमृत से भरा वही कलश, चाल में कोई जल्दी नहीं।

असुर अमृत भूल गए। आपस की लाग-डाँट भूल गए। आँखें उस रूप पर अटक गईं।

”यह कौन है?” एक ने फुसफुसाकर पूछा।

”कितना अनुपम सौन्दर्य है,” दूसरे ने कहा, और आगे कुछ कह न सका। ”कमल-सी आँखों वाली, आप कौन हैं, कहाँ से आ रही हैं? हमारे मन में तो आपने खलबली मचा दी।”

”हम जानते हैं,” तीसरा बोला, ”अब तक देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व, चारण, किसी ने आपको छुआ तक न होगा। फिर मनुष्य तो आपको कैसे पाते।”

मोहिनी, यही नाम उस रूप का था, हलके से मुस्कुराईं।

Painterly classical-Indian color scene of Mohini, the blue-complexioned enchantress, standing gracefully amid a crowd of mesmerized asuras who gaze at her spellbound, the amrita-kalasha in her hand; she speaks with a honeyed smile offering to divide the nectar; the asuras lean forward entranced, their earlier quarrel forgotten, warm twilight palette, ornate jewelry, lotus motifs.

”आप लोग आपस में क्यों उलझे हैं?” उनका स्वर शहद-सा था। ”इतना-सा झगड़ा। यह कलश मुझे दे दीजिए, बँटवारा मैं कर देती हूँ।”

असुरों ने सिर झुकाया, मानो कोई आज्ञा हो। ”हम सब कश्यप जी के पुत्र हैं, सगे भाई। हमने अमृत के लिए बड़ा पुरुषार्थ किया है। आप न्याय से बाँट दीजिए, फिर हममें कोई झगड़ा न रहे।”

मोहिनी ने तनिक हँसकर एक अनोखी बात कही।

”आप लोग महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, और मैं ठहरी स्वच्छन्द स्त्री। विवेकी पुरुष तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते। ऐसी स्त्री और कुत्ते की मित्रता टिकती नहीं, दोनों नित नए साथी ढूँढ़ते रहते हैं। फिर आप मुझ पर न्याय का भार क्यों डाल रहे हैं?”

पर असुरों को इस परिहास की बारीकी समझ न आई। उल्टे उन्हें और भरोसा हो गया, इतनी सुन्दर स्त्री भला छल क्यों करेगी। उन्होंने हँसकर वह कलश मोहिनी के हाथ में दे दिया।

मोहिनी ने कलश हाथ में लेकर तनिक मुस्कुराते हुए कहा, ”मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि आप लोगों को स्वीकार हो, तभी मैं यह अमृत बाँटूँगी।”

बड़े-बड़े दैत्यों ने यह मीठी बात सुनी और एक स्वर से कह दिया, ”स्वीकार है।” उन्हें मोहिनी के वास्तविक स्वरूप का पता ही न था।

Painterly classical-Indian color illustration after the day's fast and bath: devas seated in one row and daityas seated in a separate row, all facing east, hands folded; Mohini the blue-lotus-hued woman walks first toward the devas' line pouring nectar drop by drop from the golden kalasha into a god's hands, the asuras waiting and watching; ritual fire-altar smoke and brahmins faint behind, golden morning light, serene jewel tones.

फिर एक दिन का उपवास हुआ, स्नान-हवन हुआ, ब्राह्मणों से स्वस्त्ययन कराया गया। देवता और दैत्य अपनी-अपनी पंक्तियों में, पूर्व की ओर मुँह करके बैठ गए। मोहिनी कलश लेकर पहले देवताओं की ओर मुड़ीं।

एक देव को पिलाया। फिर दूसरे को। फिर तीसरे को। बूँद-बूँद नापकर, ठहर-ठहरकर।

असुर बैठे देखते रहे, पर उठे नहीं। उन्हें तो अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना था, और मन में डर भी था कि कहीं मोहिनी से प्रेम-सम्बन्ध टूट न जाए। हर बार मोहिनी उनकी ओर एक नज़र फेर देतीं, और वह नज़र किसी बन्धन-सी बाँध लेती। ”धैर्य रखिए,” वे मुस्कुराकर कहतीं। ”आपकी बारी अभी आई।”

उन्हीं असुरों में एक था, नाम राहु। बाक़ियों से ज़्यादा सतर्क।

उसकी आँखों में संदेह उतर आया। ”यह स्त्री हमें ठग रही है,” उसके भीतर एक आवाज़ बोली, और वह चुप न रह सका।

उसने चुपके से अपना रूप बदल लिया, ठीक एक देवता-सा, और देवताओं की पंक्ति में जा बैठा, सूर्य और चन्द्र के ठीक बीच।

मोहिनी ने बारी आने पर उसके हाथ में अमृत रखा। राहु ने घूँट भर लिया।

पर सूर्य और चन्द्र उसके पास बैठे थे। उन्होंने उस वेश के पीछे असुर को पहचान लिया। ”ठहरिए,” वे बोले। ”यह तो असुर है।”

Dramatic classical-Indian color illustration of the moment Mohini hurls her spinning sharp-edged Sudarshana chakra and beheads the disguised asura Rahu, whose head separates from his body as he sits in the devas' row between the radiant Surya and Chandra who have just exposed him; a single nectar drop at his throat, blood and golden light, the other gods recoiling, intense jewel-tone palette.

एक पल भी न बीता। मोहिनी के हाथ में तीखी धारवाला चक्र घूमा, और राहु का सिर धड़ से अलग हो गया।

पर देर हो चुकी थी।

अमृत गले से नीचे उतर चुका था। सिर तक पहुँच चुका था, धड़ तक नहीं। सिर अमर रह गया, बाक़ी देह गिर पड़ी।

ब्रह्मा ने उस अमर सिर को एक ग्रह बना दिया, और वही कटा सिर आज भी आकाश में है। उसने सूर्य और चन्द्र को कभी क्षमा नहीं किया, जिन्होंने उसका भेद खोल दिया था।

इसीलिए राहु पर्व के दिनों में, पूर्णिमा और अमावस्या को, वैर-भाव से सूर्य और चन्द्र पर टूट पड़ता है। उसी को लोग ग्रहण कहते हैं।

पर वह केवल एक सिर है। थोड़ी देर बाद सूर्य-चन्द्र उसकी पकड़ से निकल आते हैं और फिर चमक उठते हैं।

उधर कलश ख़ाली हो चला था। सारा अमृत देवताओं के भीतर जा चुका था। असुरों के हाथ कुछ न लगा।

ठगे जाने का पता चला तो वे ग़ुस्से में टूट पड़े। पर अब देवता अमर थे, और जो अमर है वह बिना डर के लड़ता है। असुर एक बार फिर हार गए।

और मोहिनी? काम पूरा हुआ तो सब देवताओं के सामने ही वह रूप जैसे हवा में घुल गया, और वहाँ फिर श्रीहरि खड़े थे।

देवताओं ने हाथ जोड़े। उनके पास कहने को शब्द न थे।

श्रीहरि गरुड़ पर सवार हुए और देवताओं को अमृत पिलाकर अपने धाम लौट चले। जाते-जाते उन्होंने एक दृष्टि डाली, जिसमें वही करुणा थी जो हर युग में अपनों को बचाने उतर आती है।

मन्थन

परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, एक बात समझ नहीं आई। जो भगवान् सदा पुरुष-रूप में पुकारे जाते हैं, वे यहाँ स्त्री बन गए। और छल भी किया। क्या यह उन्हें शोभा देता है?”

शुकदेव ने गंगा की ओर देखा, जहाँ पानी धूप में काँप रहा था।

”राजन्, जिसका कोई एक रूप नहीं, उसके लिए स्त्री और पुरुष किनारे की रेखाएँ हैं। मछली, कछुआ, सूअर, बौना, और वह मोहिनी, सब एक ही माया के पर्दे हैं। जिसके पीछे एक ही श्रीहरि खड़े हैं।”

वे ठहरे। ”और छल किसके साथ? जो अमृत की हवस में अपने सगे भाइयों से भी लड़ रहे थे। माया उन्हीं को बाँधती है जो लोभ से पहले ही बँधे हैं। जिसका मन श्रीहरि पर टिका है, उसे वह रूप मोहता नहीं, खींचता है।”

”राहु को देखिए,” शुकदेव ने धीरे से कहा। ”उसने अमृत चुराकर पीना चाहा। पूरा न मिला, बस गले तक। अमर तो हुआ, पर अधूरा। बिना देह का एक सिर, जो हर ग्रहण में अपनी चोरी दोहराता है, और कभी तृप्त नहीं होता।”

”जो छीनकर पाया जाता है, वह कभी पूरा नहीं मिलता, राजन्। और जो अधूरा मिलता है, वही सबमें लंबी प्यास बन जाता है।”

परीक्षित् ने सिर हिलाया। उन्हें अमृत की चाह न थी। सात दिनों में जो बचा था, वह कथा सुनने को काफ़ी था। ऊपर एक चील धीमे घेरे काटती हुई धूप में खो गई, और गंगा अपनी ही धुन में बहती रही।

साहित्यिक-संदर्भ

मोहिनी-अवतार की कथा श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 8 और 9 में आती है। समुद्र-मन्थन से निकले अमृत को असुरों से बचाने के लिए श्रीहरि स्त्री-रूप धारण करते हैं, और राहु का सिर काटे जाने तथा ग्रहण की कथा इसी प्रसंग में जुड़ी है।

केरल की शास्त्रीय नृत्य-शैली मोहिनीअट्टम् का नाम इसी मोहिनी-रूप से लिया गया है, जहाँ नर्तकी की गति में वही लीला-भरी कोमलता उतारी जाती है जिसका वर्णन कथा में है।

कथा का सार

समुद्र-मन्थन से अमृत निकला तो वह पहले धन्वन्तरि के हाथ आया, और असुर उसे छीनकर आपस ही में झगड़ने लगे। श्रीहरि ने मोहिनी का रूप धरा, असुरों को मोह में बाँधकर अमृत देवताओं में बाँट दिया, और राहु का छल इसी बीच खुला। बल नहीं, माया से रची गई एक लीला, जिसमें वही एक श्रीहरि हर रूप के पीछे खड़े हैं।