ऋषभदेव का त्याग
ऋषभदेव एक महान राजा थे। बहुत समय पहले।
वो विष्णु का एक अवतार थे, इसी पृथ्वी पर। उनके पिता थे नाभि। उनकी माँ मेरुदेवी।
ऋषभदेव बचपन से अलग थे। बहुत quiet। बहुत powerful। उनकी आँखों में एक चमक थी जो किसी और बच्चे में नहीं थी।
बड़े होकर राजा बने।
एक अच्छे राजा। न्यायी। दानी। प्रजा सुखी।
उनके सौ बेटे हुए। उनमें सबसे बड़े का नाम भरत था। (वही भरत जिनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा।)
ऋषभदेव ने अपने राज्य को कई-कई साल चलाया। फिर एक दिन सोचा।
”अब बस। मेरा काम पूरा। अब मुझे अपनी असली पहचान में वापस जाना है।”
उन्होंने अपने बेटों को बुलाया। सौ बेटे।
उन्हें एक beautiful upadesh दिया, जो भागवतम् में आता है।
”बेटों,” उन्होंने कहा, ”मनुष्य-जन्म इसलिए नहीं कि सिर्फ़ इन्द्रियों के सुख भोगो। ये तो सुअर भी भोगते हैं।”
”मनुष्य-जन्म इसलिए कि तप करो। समझो। अपने असली स्वरूप तक पहुँचो।”
”अभी से नहीं तो कब?”
”भरत, तू सबसे बड़ा। तू राज्य ले। बाक़ी बेटों को मार्गदर्शन दे।”
और ऋषभदेव चले गए। राज-वस्त्र छोड़े। सब कुछ छोड़ा।
वो जंगल में चले गए। नंगे।
और कुछ अद्भुत किया।
उन्होंने ”अवधूत” का रूप ले लिया।
अवधूत मतलब, सब conventions से ऊपर। समाज के नियम नहीं मानते।
ऋषभदेव बाल काटना भी छोड़ दिया। नहाना भी छोड़ दिया। कपड़े भी छोड़ दिए।
वो नंगे घूमते। उनके बाल बिखरे। उनके शरीर पर मल-मूत्र।
लोग उन्हें देखते। और सोचते, ”यह कोई पागल है।”
वो कुछ नहीं बोलते। कोई reply नहीं देते।
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ॥
मनुष्य के इस शरीर का उद्देश्य सिर्फ़ इन्द्रिय-सुख नहीं। ये तो सुअर भी कर सकते हैं। मनुष्य-जन्म इसलिए कि कठिन तप करो।
एक बार जंगल में आग लगी।
ऋषभदेव वहाँ थे। उन्होंने नहीं भागे।
उन्होंने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया।
वो वहीं जल गए।
मगर पुराण कहते हैं, यह कोई suicide नहीं था। यह उनका planned exit था। उनका काम पूरा। उन्होंने अपनी देह छोड़ी।
उनकी आत्मा वैकुण्ठ चली गई।
पीछे रह गई एक legacy।
उनके सौ बेटों में से, एक नौजवान बेटा नब्बे शायद रास्ता भूल गए। अहंकार आ गया। पर पहले बेटे, भरत, उन्होंने एक अलग कथा बनाई।
ऋषभदेव की एक और बात।
वो एक विशेष परंपरा के founder माने जाते हैं। जैन-परंपरा उन्हें अपना पहला तीर्थंकर मानती है।
तो भागवतम् कहता है, हिन्दू-धर्म और जैन-धर्म दोनों ऋषभदेव से जुड़े हैं। अहिंसा। नंगा रहना। अवधूत-जीवन। यह सब उनसे शुरू।
एक राजा जो पागल जैसा जंगल में घूमता था, वो दो धर्मों का बीज था।
ऋषभदेव की कथा एक radical statement है।
एक राजा। उसके पास सब था। राज्य, बेटे, सम्मान। फिर भी उसने वो सब छोड़ा। और एक नंगा-घूमने वाला पागल बन गया।
क्यों?
क्योंकि वो जानता था कि ”राजा” होना एक role है। एक costume है। और उस costume के साथ बहुत सी expectations। अहंकार, attachment, सब।
अगर वो वैसे ही रहता, राजा-cap में, तो वो अपनी असली identity तक नहीं पहुँच पाता।
तो उसने एक opposite move किया। नीचे चला गया। जहाँ कोई respect नहीं। जहाँ लोग पागल समझते थे।
इस position में, कोई attachment नहीं रही। कोई role नहीं। और वहाँ से, ऋषभदेव वैकुण्ठ चले गए।
हम सब अपनी ज़िंदगी में किसी role में हैं। बेटा, बेटी, माँ, बाप, employee, boss। और हम सोचते हैं वो role ही हम हैं।
ऋषभदेव कहते हैं, ”वो role नहीं तुम। वो costume है। costume उतार दो, और देखो कौन है अंदर।”
यह very hard है। कोई अपनी पहचान कैसे छोड़े?
मगर वो कह रहे हैं, अगर सच में मुक्ति चाहिए, तो यह रास्ता है।