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ऋषभदेव का त्याग

कथा 40 · भागवतम् की कथाएँ

ऋषभदेव का त्याग

जिस राजा ने राज छोड़कर मौन की राह पकड़ी
स्कन्ध 5, अध्याय 3-6
भरा-पूरा राज-पाट छोड़कर ऋषभदेव ने मौन की राह पकड़ी, यही वृत्तान्त शुकदेव परीक्षित् को सुनाते हैं।
भरा-पूरा राज-पाट छोड़कर ऋषभदेव ने मौन की राह पकड़ी, यही वृत्तान्त शुकदेव परीक्षित् को सुनाते हैं।

राजा नाभि और रानी मेरुदेवी की कोई सन्तान न थी। बहुत तप के बाद, बहुत प्रार्थना के बाद, यज्ञपुरुष भगवान् स्वयं उनके घर एक पुत्र के रूप में उतर आए। जन्म से ही उस बालक की हथेलियों पर वज्र, अंकुश आदि चिह्न थे, मानो किसी ने भीतर ही भीतर उसे पहचान कर रखा हो।

बालक और बच्चों जैसा न था। उसकी आँखों में एक स्थिर ठहराव था, जैसे भीतर कोई दीया जल रहा हो जो हवा से नहीं काँपता। समता, शान्ति और वैराग्य उसके स्वभाव में दिन पर दिन गहराते गए, और प्रजा, मन्त्री, ब्राह्मण, देवता तक चाहने लगे कि यही पृथ्वी का शासन सँभाले। उसके सुडौल शरीर, बल, यश और शूरवीरता को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम रखा, ऋषभ, जो श्रेष्ठ है।

राजा बनने पर वे न्याय में अटल रहे, दान में खुला हाथ, और प्रजा ऐसी निश्चिंत कि किसी की आँख से नींद नहीं उड़ती थी। एक बार इन्द्र ने ईर्ष्यावश उनके राज्य पर पानी न बरसाया। ऋषभ उस मूर्खता पर बस हँस दिए, और अपनी योगमाया से अपने अजनाभखंड पर इतना जल बरसा दिया कि इन्द्र की कमी किसी ने जानी ही नहीं।

समय आने पर महाराज नाभि ने अपने इस श्रेष्ठ पुत्र को राज्य सौंपा और स्वयं रानी मेरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम चले गए। वहाँ वे ऐसी अहिंसक तपस्या और समाधि में लीन रहे कि भगवान् नर-नारायण की आराधना करते-करते एक दिन उन्हीं के स्वरूप में मिल गए, जैसे जल की एक बूँद जल में मिल जाती है।

उधर ऋषभदेव ने देवराज इन्द्र की दी हुई कन्या जयन्ती से विवाह किया, गृहस्थ-धर्म की मर्यादा निभाई, और उनके सौ पुत्र हुए। सब में बड़े का नाम भरत था, और इसी भरत के नाम से यह भूमि आगे भारतवर्ष कहलाई। भरत से छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक्, विदर्भ और कीकट, ये नौ अजनाभखंड के नौ प्रदेशों के स्वामी हुए। उनसे छोटे इक्यासी पुत्र पिता की आज्ञा मानकर वेद और यज्ञ में लग गए और तप से शुद्ध होकर ब्राह्मण कहलाए। और सब में छोटे नौ, कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन, भगवद्-भक्त होकर देश-देश में भगवान् का नाम लेकर घूमने वाले हुए।

ऋषभदेव ने ब्रह्मावर्त की सभा में अपने पुत्रों को बुलाकर देह और इन्द्रिय-सुख की नश्वरता का उपदेश दिया।
ऋषभदेव ने ब्रह्मावर्त की सभा में अपने पुत्रों को बुलाकर देह और इन्द्रिय-सुख की नश्वरता का उपदेश दिया।

बरसों ऋषभदेव ने धर्म से राज किया। जो काम लोग शास्त्र में पढ़कर भूल जाते हैं, वे उसे जीकर दिखाते। फिर एक दिन, घूमते-घूमते ब्रह्मावर्त पहुँचे, और वहाँ बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की सभा में, प्रजा के सामने ही, उन्होंने अपने पुत्रों को पास बुलाया।

“पुत्रो,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी पर हर शब्द जैसे पत्थर पर खुदा। “इस मर्त्यलोक में यह मनुष्य की देह इन्द्रियों के सुख में बीतने के लिए नहीं मिली। वैसा भोग तो विष्ठा खाने वाले सूकर और कुत्ते तक भोग लेते हैं।”

“इस देह से दिव्य तप होना चाहिए, जिससे अन्तःकरण शुद्ध हो, और अनन्त ब्रह्मानन्द हाथ आए। जो आज नहीं चला, वह किस दिन की प्रतीक्षा करेगा?”

उनकी दृष्टि सब में बड़े पुत्र पर ठहरी। और जो अगली बात उन्होंने कही, उसमें राज्य के स्वामी की नहीं, एक थके पिता की ममता थी।

“भरत, आप ज्येष्ठ हैं। राज्य का भार आप सँभालिए। और इन सब भाइयों को मेरा ही शरीर समझकर इनकी सेवा कीजिए, इनके स्वामी नहीं, इनके सेवक बनकर। यही मेरी सच्ची पूजा है।”

राजवस्त्र त्यागकर, बिना किसी आवरण के, ऋषभदेव ब्रह्मावर्त की सीमा लाँघकर अवधूत का जीवन जीने वन में निकल गए।
राजवस्त्र त्यागकर, बिना किसी आवरण के, ऋषभदेव ब्रह्मावर्त की सीमा लाँघकर अवधूत का जीवन जीने वन में निकल गए।

इतना कहकर ऋषभदेव उठे। उन्होंने केवल अपना यह शरीर अपने पास रखा, और बाकी सब घर पर ही छोड़ दिया। राजवस्त्र शरीर से उतार दिए, और जैसे आए थे वैसे ही, बिना किसी आवरण के, बाल बिखेरे, अग्निहोत्र की आहवनीय आग को अपने ही भीतर लीन करके, ब्रह्मावर्त की सीमा के बाहर निकल गए।

और वन में उन्होंने एक ऐसी राह पकड़ी जिसे देखकर संसार ठिठक जाता है।

उन्होंने अवधूत का जीवन अपनाया। मौन ले लिया, और कोई बात करना चाहता तो भी न बोलते। मानो जड़ हों, अंधे हों, बहरे हों, गूँगे हों। जो इन्द्रादि सब लोकपालों के भी भूषण थे, वे अब पागल और पिशाच जैसी चेष्टा करते जहाँ-तहाँ घूमने लगे, ताकि उनके भीतर का ईश्वरत्व किसी की आँख न पकड़ सके।

कभी नगरों और गाँवों में चले जाते, कभी खानों, किसानों की बस्तियों, सेना की छावनियों, गोशालाओं, अहीरों के डेरों और यात्रियों के पड़ावों में ठहरते, कभी पहाड़ों, जंगलों और आश्रमों में विचरते।

ऋषभदेव पागल जैसी चेष्टा कर गाँवों और जंगलों में भटकते रहे, ईश्वरत्व किसी की आँख न पकड़ सके इसलिए।
ऋषभदेव पागल जैसी चेष्टा कर गाँवों और जंगलों में भटकते रहे, ईश्वरत्व किसी की आँख न पकड़ सके इसलिए।

वे जिस रास्ते से निकलते, मूर्ख और दुष्ट लोग उनके पीछे पड़ जाते, जैसे वन में चलते हाथी के पीछे मक्खियाँ पड़ जाती हैं। कोई धमकी देता, कोई मारता, कोई पेशाब कर देता, कोई थूक जाता, कोई ढेला फेंकता, कोई विष्ठा और धूल फेंक देता, कोई दुर्गन्ध छोड़कर हँसता, कोई खोटी-खरी सुनाकर तिरस्कार करता।

पर इन सब बातों पर उनका ज़रा भी ध्यान न जाता। जिस भ्रम के मारे लोग इस मिट्टी की देह को ‘ऋषभ’ कह रहे थे, उस देह में उनकी अपनी अहंता-ममता तनिक भी न बची थी। वे इस सारे प्रपंच के केवल साक्षी होकर, अपने आत्मस्वरूप में टिके, अकेले पृथ्वी पर विचरते रहे। उनकी लम्बी-लम्बी भूरी जटाएँ मुख के आगे लटक आई थीं, देह धूल और मैल से भरी, और फिर भी उनके अस्फुट हास्य से भरे मुख को देखकर पुरनारियों के मन में कामदेव हिल उठता, और वे आपस में कहतीं, यह कोई बावला है।

एक दिन उन्होंने इस सब से भी ऊपर का एक व्रत ले लिया। उन्होंने अजगर की वृत्ति धारण कर ली। जहाँ हैं वहीं लेट जाते, लेटे-ही-लेटे खाते-पीते, लेटे-ही-लेटे मल-मूत्र त्याग करते, और फिर अपने ही त्यागे मल में लोट-लोटकर शरीर को उसी से सान लेते। पर आश्चर्य, उनके मल में दुर्गन्ध न थी, एक सुगन्ध थी, और वायु उस सुगन्ध को लेकर उनके चारों ओर दस योजन तक सारे देश को महका देती थी।

ऋषभदेव अजगर-वृत्ति धारण कर अपने ही त्यागे मल में लोटते हैं, जिससे दुर्गन्ध की जगह दिव्य सुगन्ध फैलती है।
ऋषभदेव अजगर-वृत्ति धारण कर अपने ही त्यागे मल में लोटते हैं, जिससे दुर्गन्ध की जगह दिव्य सुगन्ध फैलती है।

इसी निर्भार में, मुँह में मौन और देह पर धूल लिए, वे दक्षिण की ओर चल पड़े। कोङ्क, वेङ्क और कुटक, कर्नाटक के उन देशों में होते हुए वे कुटकाचल पर्वत की तलहटी के वन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर अपने मुँह में रख लिया, मानो जीभ को भी अब कुछ कहने की छूट न देनी हो, और उसी उन्मत्त वेष में, बाल बिखेरे, दिगम्बर, उस सूने वन में घूमने लगे।

और इसी समय वन में हवा बदली।

पहले वह एक झोंका थी, फिर झंझावात। सूखे बाँसों के झुरमुट आपस में रगड़ खाने लगे, और उस रगड़ में से एक चटक उठी, एक चिनगारी। बाँस फिर रगड़े, और चिनगारी ने सूखे पत्तों का पहला कौर निगल लिया।

ऋषभदेव वहीं खड़े थे। उन्होंने सिर नहीं घुमाया।

आग पहले नीचे से आई, सूखी घास में सरसराती, टखनों के पास तक। फिर बाँस एक-एक करके फटने लगे, जैसे कोई दूर से तालियाँ बजा रहा हो। धुआँ पेड़ों के बीच भरने लगा, और हवा गरम राख की उस गंध से भारी हो उठी जो जली हुई लकड़ी और जली हुई हरी पत्ती को एक साथ लिए होती है। लपटें अब लाल थीं, और उनकी जीभें ऊपर को लपकतीं, जैसे आग वन को चाट-चाटकर खा रही हो।

उस सारे शोर के बीच एक देह थी जो हिली नहीं। मुँह में अब भी वह पत्थर का टुकड़ा रखा था। साँस वैसी ही धीमी, वैसी ही समान, जैसे कोई सोते में चल रही हो। हाथ आड़ के लिए नहीं उठे और पैर भागने को नहीं मुड़े। गर्मी पहले पीठ पर आई, फिर छाती पर, फिर उन बिखरी भूरी जटाओं तक पहुँची जो वर्षों से किसी कंघी से नहीं छुई थीं, और एक-एक लट चटककर उठती हुई राख बन गई।

भीतर कोई एक भी विचार न उठा। ‘अब अन्त है’ और ‘यह देह मेरी थी’ जैसे विचार भी नहीं। जिस मनुष्य ने राज्य, मान, अपमान, और इस देह की अहंता तक बरसों पहले उतारकर रख दी थी, उसके पास इस घड़ी छोड़ने को कुछ बचा ही न था। आग जिसे जला रही थी, वह जैसे पहले से ही किसी और का छोड़ा हुआ वस्त्र था, यहाँ-वहाँ पड़ा, जिसे अब अग्नि उठाकर ले जा रही थी।

ऋषभदेव राजपाट त्यागकर दिगम्बर वेश में वन की ओर चल पड़े, मन संसार से परे शान्त।
ऋषभदेव राजपाट त्यागकर दिगम्बर वेश में वन की ओर चल पड़े, मन संसार से परे शान्त।

बाँसों के घर्षण से जन्मी वह दावाग्नि अपनी लपटों को चाटती हुई बढ़ी, और उस सारे वन के साथ, उसी वन की एक देह को भी अपने में समेट लिया। धुआँ ऊपर उठा, सीधा, बिना काँपे, और फिर आकाश में घुल गया।

जो भीतर था, वह आग की पहुँच से सर्वथा परे था। वह अपने धाम लौट गया, चुपचाप, जैसे लौटना ही उसका स्वभाव हो।

साहित्यिक-संदर्भ

ऋषभदेव की कथा श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध, अध्याय 3 से 6 में आती है। गीता प्रेस संस्करण में वे भगवान् विष्णु के एक अवतार और आदर्श त्यागी राजा के रूप में वर्णित हैं, जिन्होंने अपने सौ पुत्रों को मुक्ति का मार्ग दिखाकर अवधूत-जीवन अपनाया।

उनका पुत्र भरत इसी स्कन्ध की अगली कथा (जड़भरत) का नायक है। जैन परम्परा भी ऋषभदेव को अपना प्रथम तीर्थंकर मानती है, पर यहाँ कथा गीता प्रेस के भागवत-पाठ के अनुसार ही दी गई है।

एक छोटी टिप्पणी

पंचम स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में ऋषभदेव अपने सौ पुत्रों से जो कहते हैं, वह भागवत के अत्यन्त सघन उपदेशों में गिना जाता है। पर ध्यान देने की बात यह है कि वे जो कहते हैं और जो करते हैं, दोनों के बीच कहीं दूरी नहीं रह जाती। सभा में बोलते हैं, और फिर उसी दिन सभा छोड़ देते हैं।

उनके बारे में एक पुरानी लोकोक्ति चली आती है, जिसे भागवत भी दोहराता है: इन शुद्ध कर्मों वाले राजर्षि नाभि के आचरण का अनुकरण आख़िर कौन कर सकता है, जिनके पुत्र होकर स्वयं श्रीहरि अवतरित हुए?

एक अंतिम विचार

कुटकाचल के उस वन में अब केवल राख है, और हवा में थोड़ी देर ठहरी हुई एक सुगन्ध। बाँसों के रगड़ने से जो आग जन्मी थी, वह वन को लेकर शान्त हो गई। पर जिसके लिए वह आग बस एक खुला द्वार थी, उसका कोई पता उस राख में नहीं मिलेगा। उन्हें समझने के लिए दृष्टि उसी ओर मोड़नी पड़ती है जिस ओर वे देख रहे थे।

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