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भरत और हिरण: जड़भरत

कथा 41 · भागवतम् की कथाएँ

भरत और हिरण: जड़भरत

When a King Became a Deer
स्कन्ध 5, अध्याय 7-9

गंगा की धारा उस दोपहर कुछ धीमी बह रही थी। परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा, और कुछ देर चुप रहे, जैसे कोई बात मन में तौल रहे हों।

”भगवन्,” उन्होंने धीरे कहा, ”मेरे पास अब थोड़े ही दिन बचे हैं। और मैं सोचता हूँ, जिसने जीवन भर तप किया हो, जिसने राज-पाट छोड़ दिया हो, क्या उसका भी अंत समय में पाँव फिसल सकता है? क्या वैराग्य कभी अधूरा रह जाता है?”

शुकदेव कुछ पल मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, एक राजा थे, भरत। ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र। उन्हीं के नाम से इस भूमि का नाम भारत पड़ा। उनकी कथा सुनिए, और फिर यह प्रश्न आप ही से उत्तर माँग लेगा।”


A rich painterly classical-Indian color illustration of young King Bharata, eldest son of Rishabhadeva, in his palace court seated beside his queen Panchajani (daughter of Vishwarupa); around them stand their five sons (Sumati, Rashtrabhrit, Sudarshana, Avarana, Dhumraketu) as boys; jewel-toned royal hall, golden crowns, courtiers, prosperous and peaceful kingdom, no Radha, no Mahabharata motifs.

भरत ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे, और राज्य उन्हीं को मिला। उन्होंने विश्वरूप की कन्या पंचजनी से विवाह किया, और उनके पाँच पुत्र हुए, सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु।

वर्षों तक उन्होंने धर्म से राज किया। प्रजा सुखी रही, कोष भरा रहा, सीमाएँ शान्त रहीं। होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा, इन ऋत्विजों द्वारा कराये जानेवाले यज्ञों से वो श्रद्धापूर्वक श्रीहरि वासुदेव की ही आराधना करते रहे, और भीतर ही भीतर उनका अनुराग बढ़ता गया।

इस प्रकार एक करोड़ वर्ष यों ही बीते। तब उन्होंने जाना कि भोग का प्रारब्ध अब क्षीण हो चला है। और फिर, जैसे पिता ने किया था, उन्होंने राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया और वन की राह ली। मन में न कोई शिकायत थी, न पीछे मुड़कर देखने की इच्छा।

गण्डकी नदी के किनारे, पुलहाश्रम में, उन्होंने एक छोटी कुटिया बना ली। दिन कन्द-मूल और नदी के जल पर बीतने लगे, रातें श्रीहरि के स्मरण में।

बहुत बरस यों ही बीते। मन एकाग्र होता गया, साँस धीमी, संसार पीछे छूटता हुआ। ऐसा लगता था कि अब बस थोड़ी दूर और।

एक सुबह वो गण्डकी में उतरे थे, स्नान और नित्य-नैमित्तिक कर्मों के लिए। जल ठंडा था, ऊपर पक्षी बोल रहे थे, किनारे की घास अभी ओस से भारी थी।

A rich painterly classical-Indian color illustration on the cool banks of the Gandaki river at dawn near Bharata's small hermitage hut at Pulaha-ashrama; an ascetic Bharata in bark robes stands in the river performing morning ablutions; a heavily pregnant doe lowers her muzzle to drink at the water's edge; dewy grass, birds overhead, and a distant lion glimpsed roaring in the forest beyond; soft misty green-gold palette.

तभी एक हिरनी जल पीने नदी तक आई। वह गर्भवती थी, पेट भारी, चाल थकी हुई। उसने पानी में मुँह डाला ही था।

कि दूर जंगल से एक सिंह की दहाड़ उठी।

हिरनी जैसे काठ हो गई। फिर एक ही छलाँग में उसने नदी पार करनी चाही, भारी पेट के साथ, प्राणों के डर से।

उस छलाँग में ही उसके गर्भ से एक नन्हा छौना फिसलकर जल में जा गिरा। और हिरनी, उस पार पहुँचते ही, अपने झुंड से बिछुड़कर थर्राकर किसी गुफा में जा गिरी और वहीं प्राण छोड़ गई।

छौना धारा में बहने लगा, इतना छोटा कि पानी उसे खिलौने की तरह घुमा रहा था।

भरत ने यह सब देखा। बिना सोचे वो आगे बढ़े और बहते हुए छौने को दोनों हथेलियों में उठा लिया।

वह ठंडा था, भीगा हुआ, और इतना दुबला कि हथेली में काँपती हुई एक साँस भर जान पड़ता था। माँ कहीं नहीं, किनारा सूना, ऊपर वही सिंह की गूँज अब तक हवा में थी।

भरत कुछ देर उसे थामे खड़े रहे। फिर, मातृहीन उस बच्चे को आत्मीय के समान अपनी कुटिया ले आए।

उन्होंने उसके खाने-पीने का प्रबन्ध किया, उसे सूखे पत्तों में लपेटकर गरम रखा, और रात भर पास बैठे रहे।

और छौना बच गया।

भरत ने मन में कहा था, बस आज भर इसे देख लूँ, सुबह वन में छोड़ आऊँगा, जहाँ इसके अपने हैं।

पर सुबह वह लड़खड़ाते पैरों पर उठकर उन्हीं की ओर आया, और उसकी सीधी, भोली आँखें उन पर टिक गईं।

”ठीक है,” भरत ने धीरे कहा, ”एक दिन और।”

एक दिन सप्ताह बना, सप्ताह महीना, महीना बरस। छौना बढ़ता गया, और भरत के पास ही बना रहा। वो उसे व्याघ्र आदि से बचाने, लाड़ लड़ाने और पुचकारने की चिन्ता में ही डूबे रहने लगे।

और चुपचाप, बिना उन्हें पता चले, उनके स्मरण की दिशा बदलने लगी। उनके यम, नियम और भगवत्पूजा आदि आवश्यक कर्म एक-एक कर छूटने लगे।

A rich painterly classical-Indian color illustration of the aged ascetic Bharata seated in meditation posture inside his leaf hut, eyes closed, a faint golden vision of Sri Hari Vasudeva fading while the image of the young deer (the grown fawn) glows vividly in his mind; the affectionate deer stands close beside him; warm lamp-lit interior, expression of distracted longing, devotion slipping into attachment.

अब वो ध्यान में बैठते, तो आँखें मूँदते ही श्रीहरि के बदले वही छौना मन में आ खड़ा होता। बीच साधना में मन भटक जाता, ”अरे, कहाँ गया होगा? कहीं किसी भेड़िये या सियार के सामने तो नहीं पड़ गया?”

जब उसे कुश, पुष्प, समिधा और फल-मूलादि लाने वन में जाना होता, तो भेड़ियों और कुत्तों के भय से उसे साथ लेकर ही जाते। रात को वो उसी के पास लेटते, कि कहीं ठिठुर न जाए। कभी उसे गोद में लेकर, कभी छाती से लगाकर उसका दुलार करते।

जिस वैराग्य को साधने में उन्होंने बरसों लगाए थे, वह एक नन्हे मृग की भोली आँखों के आगे चुपचाप पिघलने लगा।

कभी-कभी वो अपने को रोकते, ”भरत, यह क्या कर रहे हो? सब छोड़कर आए थे, और अब एक मृग के मोह में बँध गए?”

पर अगले ही क्षण कोई आहट होती, और उनका मन फिर उसी ओर खिंच जाता। जब वह दिखाई न देता, तो वे धन लुट जाने वाले मनुष्य के समान उद्विग्न हो उठते।

यों वर्षों बीते। मृग बड़ा हुआ, कभी आश्रम से दूर चरने निकल जाता, और भरत भीतर ही भीतर बेचैन रहते, जब तक वह लौट न आए। उस समय भी वे उसके लिए मंगल माँगते, ”बेटा, आपका सर्वत्र कल्याण हो।”

फिर एक दिन भरत का शरीर ढलने लगा। भीतर से उन्हें जान पड़ा कि अब विदा का समय आ गया है।

A rich painterly classical-Indian color illustration of the dying ascetic Bharata lying on a grass mat in his hermitage, gazing tenderly at the grieving young deer that sits beside him like a son; the old sage's last breath leaving as he looks only at the deer's face; muted twilight tones, sorrowful deer with downcast eyes, quiet forest hut, no other figures.

उस अंतिम घड़ी में भी उन्होंने मृग को ही पास बुलाया। वह पुत्र के समान शोकातुर होकर उनके पास बैठा था, और वे उसी के मुख की ओर देखते रहे, उसी देखते-देखते साँस छूट गई।

अंतिम विचार जो मन में रहा, वही था, ”मेरा मृग।”

और अंत समय का स्मरण ही अगली गति बनता है। जिस भाव में प्राण छूटे, उसी रूप में जीव जा गिरता है। सो भरत ने अगला जन्म मृग का ही पाया।

पर यह कोई साधारण मृग न था। भगवदाराधना के प्रभाव से पूर्व-जन्म की एक-एक बात उसे स्मरण थी। वह जानता था कि बाहर से वह केवल एक पशु है, पर भीतर एक राजर्षि की चेतना अब भी जाग रही है।

अपने मृग-रूप होने का कारण जानकर वह अत्यन्त पश्चात्ताप करता रहा। मृग-रूप में वह दूसरे हिरणों के बीच रहा, पर उनमें घुला नहीं। इस बार उसने अपने को किसी से बाँधा नहीं। चुपचाप, सजग, वह केवल इस देह के पूरे होने की प्रतीक्षा करता रहा।

अन्त में, अपनी जन्मभूमि कालञ्जर पर्वत को छोड़कर वह उसी शान्त-स्वभाव मुनियों के प्रिय शालग्राम-तीर्थ, पुलह-आश्रम लौट आया। वहाँ अपने शरीर का आधा भाग गण्डकी के जल में डुबाये रखकर, समय पर वह मृग-शरीर भी छूट गया।

इस बार जन्म एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के घर हुआ। और इस बार भरत ने एक और ही राह चुनी।

A rich painterly classical-Indian color illustration of the reborn Bharata as a boy in a worthy brahmin household, sitting silent and unresponsive, eyes calm and inward, while his parents and others lean toward him puzzled, thinking him dull-witted; simple village brahmin home, white-clad parents, the boy radiating a hidden inner serenity, warm earthen color palette.

वो जन्म से ही जड़-से दिखे। न किसी से बोलते, न किसी के प्रश्न का उत्तर देते, न किसी झगड़े में पड़ते। माँ-बाप समझते रहे कि बालक मन्द-बुद्धि है।

लोग उन्हें जड़भरत कहने लगे, वही गूँगा-सा भरत।

उन्होंने जान-बूझकर अपनी भीतर की चेतना छिपाए रखी, इस आशंका से कि कहीं फिर कोई विघ्न न आ खड़ा हो, ताकि कोई उन्हें मान न दे, और कोई नया बन्धन न बने।

बड़े हुए। माता-पिता चल बसे। भाई उन्हें खेत की क्यारियाँ ठीक करने में लगा बैठे, यह समझकर कि यह तो किसी काम का नहीं।

वो कहीं किसी खेत के किनारे, कभी जंगल में, बिना किसी संग्रह के पड़े रहते। चावल की कनी, खली, भूसी, जो कुछ रूखा-सूखा मिल जाता, उसी को अमृत के समान खा लेते, और भीतर श्रीहरि में डूबे रहते। सर्दी, गरमी, वर्षा और आँधी, सब में वे साँड के समान नंगे पड़े रहते, और उनका ब्रह्मतेज धूल में ढके मूल्यवान् मणि के समान छिपा रहता।

एक बार सिन्धु-सौवीर के राजा रहूगण की पालकी ढोने वालों में एक भारवाहक की कमी पड़ गई, और सेवकों ने इसी जड़-से दिखने वाले को पकड़ पालकी के नीचे जोत दिया। उसी पालकी पर हुई बातचीत में जड़भरत का असली रूप खुलना था। पर वह अगली कथा है, राजन्।

मन्थन

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा की धारा पर दोपहर का प्रकाश काँप रहा था।

”देखिए राजन्,” वो बोले, ”भरत ने राज छोड़ा, पुत्र छोड़े, कोष छोड़ा। यह सब वो हँसते हुए छोड़ आए। फिर एक भीगा हुआ छौना उनकी हथेली में काँपा, और जो सिंहासन न रोक सका था, वह एक मृग की आँख ने रोक लिया।”

परीक्षित् ने धीरे से पूछा, ”तो भगवन्, क्या इतने बरस की साधना व्यर्थ गई?”

”व्यर्थ नहीं, राजन्। उसी साधना का बल था कि मृग बनकर भी उन्हें सब स्मरण रहा, और अगले जन्म में वो जड़भरत बनकर फिर से किसी जाल में न फँसे। पर देखिए कितना सूक्ष्म है यह सब। जिसके मन में अंत समय जो बसा होता है, जीव वहीं जा पहुँचता है। और भरत के मन में उस अंतिम घड़ी वही मृग बसा रह गया, श्रीहरि का स्मरण उससे ढक गया।”

वो रुके। ”इसमें मृग का दोष नहीं। प्रेम का भी दोष नहीं। चूक केवल इतनी थी कि स्मरण एक क्षण को श्रीहरि से हटकर एक रूप पर ठहर गया, और मन वहीं बँध गया।”

परीक्षित् देर तक कुछ न बोले। उन्हें अपने ही सात दिन याद आ रहे थे, और वह प्रश्न जो वो आरम्भ में लाए थे।

शुकदेव ने उनकी ओर देखा, और उनका स्वर और कोमल हो गया। ”इसीलिए, राजन्, अंतिम घड़ी तक स्मरण को कहीं और टिकने न दीजिए। जो आपने अब तक सुना है, उसी को साँस की तरह पास रखिए।”

किनारे की रेत पर एक हिरन पानी पीने उतरा, क्षण भर रुका, और फिर वन की ओर लौट गया। परीक्षित् उसे जाते हुए देखते रहे।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध, अध्याय सात से नौ तक में है। ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत, जिनके नाम से इस भूमि का नाम भारतवर्ष पड़ा, अंत समय में एक मृग-छौने के स्नेह में बँधकर अगले जन्म में मृग हुए, और फिर ब्राह्मण-कुल में जड़भरत के रूप में जन्म लेकर सब बन्धनों से सावधान रहे।

अन्तिम स्मरण की यही शिक्षा गीता (8.6) में भी आती है। आगे रहूगण और जड़भरत का संवाद (5.10-14) इसी कथा का दूसरा भाग है, जहाँ जड़ दिखने वाले भरत मुख खोलते हैं।

दर्शन-दृष्टि

भागवत में भरत की यह गति केवल एक चेतावनी नहीं है। उसके भीतर एक करुणा भी है, कि जिसने सच्चे मन से श्रीहरि की ओर एक बार चल पड़ने का साहस किया, उसकी एक भूल भी उसे रास्ते से नहीं हटा पाती, केवल कुछ देर रोक भर लेती है। मृग बनकर भी भरत भूले नहीं, और जड़भरत बनकर वो फिर सीधे उसी राह पर लौट आए।

इसीलिए जड़भरत का वह मौन उस व्यक्ति का मौन था जो एक बार गिरकर अब हर बन्धन से सावधान हो गया था, और जिसने मान, सम्मान, संग्रह, सब को चुपचाप छोड़ देना ही अपनी रक्षा मान लिया था। जिन्हें वह मन्द-बुद्धि समझते थे, वे उसकी इसी सतर्कता को पढ़ ही न पाए।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

भरत ने जीवन भर का तप किया, फिर भी अंत समय का एक स्नेह उन्हें मृग बना गया। कथा प्रेम से नहीं रोकती। वह केवल इतना कहती है कि जिस ओर मन अंत में टिकता है, जीव वहीं जा पहुँचता है, सो श्रीहरि का स्मरण साँस की तरह अंतिम क्षण तक पास रहे।