भरत और हिरण: जड़भरत

कथा 41 · भागवतम् की कथाएँ

भरत और हिरण: जड़भरत

When a King Became a Deer
स्कन्ध 5, अध्याय 7-10

भरत ऋषभदेव के सबसे बड़े बेटे थे। उन्हें राज्य मिला।

वो भी अच्छे राजा। बहुत सालों तक न्याय किया।

एक दिन उन्होंने सोचा, ”अब बस। पिताजी की तरह।”

उन्होंने राज्य अपने बेटों में बाँटा। संन्यास लिया। जंगल में चले गए।

गण्डकी नदी के किनारे एक छोटी कुटिया बनाई। साधना शुरू।

बहुत साल बीते। उनका मन एकाग्र। पाठ-पूजा रोज़।

और एक दिन, एक छोटा सा accident।

वो नदी में स्नान कर रहे थे। तभी एक हिरणी, जो गर्भवती थी, पास आई।

उसने पानी पीने के लिए नदी में सिर डाला।

तभी एक शेर का गर्जन सुनाई दिया।

हिरणी घबराई। उछली। पर उसकी पीठ में एक बच्चा था, गर्भ में।

उछलते वक़्त, उसके पेट से एक छोटा हिरण-बच्चा बाहर गिरा। पानी में।

और शॉक से, माँ-हिरणी ख़ुद मर गई।

बच्चा पानी में बह रहा था।

भरत ने देखा। तुरंत उठे। बच्चे को बचाया।

हाथ में लिया।

वो छोटा सा बच्चा। माँ-रहित। ठंडा। काँपता हुआ।

भरत का दिल पिघल गया।

वो उसे अपनी कुटिया ले आए।

उसे दूध दिया (कुछ गाय जो आसपास रहती थीं)।

उसे गर्म किया।

और बच्चा बच गया।

भरत ने सोचा था, बस आज ही उसे देखूँगा, कल छोड़ दूँगा।

मगर अगले दिन बच्चा उनके पास आया। आँखों में एक innocence।

”ठीक है, एक और दिन।”

दिन हफ़्ता बन गया। हफ़्ता महीना। महीना साल।

बच्चा बड़ा होने लगा। भरत के पास रहा।

और भरत के पाठ-पूजा का focus बदलने लगा।

ममाहं ममेति लोकोऽयं प्रबुद्धोऽसौ बुद्धिमान् भवेत् ।
निःसङ्गः सर्वतो भूतस्तदसङ्गो विशिष्यते ॥

”मेरा” और ”मैं” कहना यह संसार है। जो बुद्धिमान है, वो हर तरफ़ से अलग रहता है। यह असंगता ही श्रेष्ठ है।

अब ध्यान में बैठते, तो ध्यान भगवान पर नहीं, हिरण-बच्चे पर रहता।

”अरे, कहाँ गया? सुरक्षित है?”

रात को सोते, तो उसके पास सोते।

खाते वक़्त, उसे पहले खिलाते।

उनकी सारी सालों की साधना, एक छोटे से हिरण-बच्चे के सामने हार गई।

वो अपने आप को रोकते। ”भरत, यह क्या? तू एक sanyasi है। एक हिरण का attachment क्यों?”

मगर अगले पल उनका दिल फिर हिरण की तरफ़ खींच जाता।

और वर्षों बीते। हिरण बड़ा हुआ।

एक दिन भरत बीमार पड़े। उन्हें अंदर से पता था, अब अंत है।

वो हिरण को पास बुलाया। उसे देखा। और उसी देखने में उनकी जान निकली।

अंतिम सोच, ”मेरा हिरण।”

तो अगले जन्म में, भगवद् गीता 8.6 के नियम से, उन्होंने हिरण का जन्म लिया।

एक हिरण के रूप में।

मगर एक special हिरण। उन्हें सब याद था। पिछले जन्म की सब बातें।

वो जानते थे कि वो जड़ हिरण हैं, मगर अंदर एक चेतना है। एक राजा-संन्यासी की चेतना।

हिरण-रूप में वो जंगल में रहे। दूसरे हिरणों के साथ। मगर अलग।

वो अपने इस जन्म से ज़्यादा attached नहीं थे। बस wait कर रहे थे, अगले जन्म का।

एक दिन उनका हिरण-शरीर भी ख़त्म हुआ।

अगला जन्म।

एक ब्राह्मण-घर में। पर इस बार उन्होंने एक trick की।

वो जन्म से ही ”जड़” दिखे। न बोलते। न उत्तर देते। न लड़ते।

लोग उन्हें ”जड़भरत” कहते। ”वो जड़ भरत।”

बचपन से अपनी बातें छुपाकर रखीं।

बड़े हुए। माँ-बाप मरे। भाइयों ने उन्हें घर से निकाला, क्योंकि वो काम नहीं कर सकते थे।

जंगल में रहे। कोई काम नहीं किया।

एक बार राजा रहूगण उनकी पालकी उठाने वालों में डाला गया (एक accident से, क्योंकि वो जड़ दिखे)। और उस मुठभेड़ ने जड़भरत की पहचान खोल दी। पर वो अगली कथा है।

इस कथा का sबसे ज़रूरी सबक यह है। एक sanyasi ने सालों का तप किया। पर एक छोटे हिरण-बच्चे ने उन्हें फिर बंधन में डाला। और एक पूरा जन्म जानवर का।

मन्थन

भरत-जड़भरत की कथा एक warning है।

एक saint, जिसने सालों साधना की, सब छोड़ा, जंगल में बसा। फिर एक छोटी सी attachment, एक हिरण के बच्चे की, और उन्हें एक पूरा जन्म animal-रूप में बिताना पड़ा।

क्यों?

क्योंकि भगवद् गीता और भागवतम् दोनों कहते हैं, मरते वक़्त जो आख़िरी सोच होती है, वही अगला जन्म।

भरत मरते वक़्त भगवान को नहीं, अपने हिरण को सोच रहे थे। तो अगला जन्म हिरण।

यह कथा डराने वाली है। हम सोचते हैं, ”चलो, तप करते रहेंगे, अंत में सब ठीक हो जाएगा।”

नहीं। तप एक continuous practice है। आख़िरी पल तक।

और attachment कहीं भी, कोई भी, बन सकती है। एक रिश्ता, एक बच्चा, एक pet, एक काम। कुछ भी।

इसका मतलब प्रेम मत करो? नहीं।

इसका मतलब, प्रेम करो, मगर awareness के साथ। यह attachment एक पल को बना हुआ है। उसे final identity मत बनाओ।

और जड़भरत ने अगले जन्म में यह सीख ली। उन्होंने जान-बूझकर अपने आप को जड़ दिखाया। ताकि कोई attachment न बने।

बहुत extreme सीख। मगर भागवतम् हमें इसी रास्ते पर ले जाना चाहता है।