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यदुवंश का अन्त

कथा 59 · भागवतम् की कथाएँ

यदुवंश का अन्त

कृष्ण के अपने कुल का विनाश
स्कन्ध 11, अध्याय 30-31

हँसी होंठों पर ही जम गई। काँपते हाथों से उन्होंने कपड़ा खोला।

और सचमुच, कपड़े के भीतर से लोहे का एक छोटा-सा मूसल निकल आया।

अब डर ने उनकी हँसी की जगह ले ली। उन्होंने उस मूसल को रगड़-रगड़कर चूरा किया और समुद्र में बहा दिया, जैसे शाप को भी पानी में घोला जा सकता हो।

पर लोहे का एक रेज़ा बच रहा। उसे एक मछली निगल गई। वही मछली आगे चलकर एक मछुआरे के जाल में फँसी, और उसके पेट से निकले उस नुकीले टुकड़े को उसने अपने तीर की नोक पर जड़ लिया।

इस तरह वह शाप बरसों तक चुपचाप अपनी घड़ी का इंतज़ार करता रहा।

वर्ष बीते। यदुवंश फैलता गया, हज़ारों की गिनती में। बल था, ऐश्वर्य था, और उसी के साथ वह मद भी जो कुल को भीतर से दीमक की तरह खाता है।

द्वारका में अपशकुन उमड़ पड़े, और श्रीकृष्ण ने सुधर्मा सभा में यदुवंशियों से तुरंत प्रभास-क्षेत्र चलने को कहा।
द्वारका में अपशकुन उमड़ पड़े, और श्रीकृष्ण ने सुधर्मा सभा में यदुवंशियों से तुरंत प्रभास-क्षेत्र चलने को कहा।

एक दिन द्वारका में बड़े-बड़े उत्पात होने लगे, आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अशुभ चिह्न दिखाई देने लगे। श्रीकृष्ण ने सुधर्मा-सभा में बैठे यदुवंशियों से कहा, “श्रेष्ठ यदुवंशियो, ये उत्पात साक्षात् यमराज की ध्वजा के समान हमारे अनिष्ट के सूचक हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिए। स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध शंखोद्धार-क्षेत्र को चले जाएँ, और हम सब प्रभास-क्षेत्र को चलें, जहाँ सरस्वती पश्चिम की ओर बहकर समुद्र में जा मिली हैं। वहाँ स्नान करके हम पवित्र होंगे, उपवास करेंगे, देवताओं की पूजा करेंगे और ब्राह्मणों को गौ, भूमि, सोना और वस्त्र देकर मंगल-कृत्य करेंगे।” सब वृद्ध यदुवंशियों ने यह बात मानी, और नौकाओं से समुद्र पार करके रथों पर प्रभास की यात्रा की।

वहाँ पहुँचकर यादवों ने श्रीकृष्ण के आदेश के अनुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति-पाठ आदि मंगल-कृत्य किए।

पर दैव ने उनकी बुद्धि हर ली, और वे मैरेय नाम की मदिरा पीने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। एक प्याला, फिर दूसरा, फिर गिनती जाती रही।

नशे में पुरानी रंजिशें जाग उठीं। पहले बात बढ़ी, फिर हाथ उठे, फिर धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा और तोमर। प्रद्युम्न और साम्ब, अक्रूर और भोज, अनिरुद्ध और सात्यकि, गद और सुमित्र, सब एक-दूसरे पर टूट पड़े। दशार्ह, वृष्णि, अन्धक, भोज, मधु, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, कुकुर और कुन्ति, सब वंशों के लोग सौहार्द भुलाकर आपस में मार-काट करने लगे।

अन्त में जब उनके सब बाण समाप्त हो गए, धनुष टूट गए और शस्त्रास्त्र नष्ट हो गए, तब उन्होंने समुद्र-तट पर उगी एरका नाम की घास उखाड़नी शुरू की। यही वह घास थी जो ऋषियों के शाप से जन्मे लोहे के मूसल के चूरे से उपजी थी।

यदुवंश के अन्त की कथा में इस विनाश की घड़ी से जुड़ा यह अंश।
यदुवंश के अन्त की कथा में इस विनाश की घड़ी से जुड़ा यह अंश।

उनके हाथों में आते ही हर तिनका वज्र के समान कठोर मूसल बन गया। उन्हीं घास-मूसलों से यादव एक-दूसरे पर टूट पड़े। बेटा बाप पर, भाई भाई पर, भानजा मामा पर, मित्र मित्र पर। कोई हाथ रोक नहीं पा रहा था, क्योंकि नशा बाहर था और शाप भीतर।

श्रीकृष्ण ने उन्हें रोकना चाहा, पर उनकी बुद्धि ऐसी मूढ़ हो रही थी कि वे श्रीकृष्ण और बलराम को भी अपना शत्रु समझकर उन्हीं की ओर दौड़ पड़े। वह पूरा कुल अपने ही हाथों मिट्टी में लेट गया, जो कभी श्रीकृष्ण के दरबार की शोभा था। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि समस्त यदुवंशियों का संहार हो चुका, तो उन्होंने सन्तोष की साँस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया।

बलराम यह सब देखते रहे। फिर वे समुद्र के किनारे जा बैठे, चित्त एकाग्र किया, और योग धारण करके अपने आत्मा को आत्मस्वरूप में ही स्थिर करके मनुष्य-देह छोड़ दी।

अब श्रीकृष्ण अकेले रह गए।

जब उन्होंने देखा कि बलराम परमपद में लीन हो गए, तब वे एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर चुपचाप धरती पर जा बैठे।

बलराम के परमपद में लीन होने पर श्रीकृष्ण अकेले पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए, चतुर्भुज दिव्य रूप धारण किए हुए।
बलराम के परमपद में लीन होने पर श्रीकृष्ण अकेले पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए, चतुर्भुज दिव्य रूप धारण किए हुए।

उस समय उन्होंने अपनी अंगकान्ति से देदीप्यमान चतुर्भुज रूप धारण कर रखा था, धूम-रहित अग्नि के समान दिशाओं को प्रकाशमान करता हुआ रूप। वर्षाकालीन मेघ-सा साँवला शरीर, उस पर श्रीवत्स का चिह्न, रेशमी पीताम्बर, गले में वनमाला, और मूर्तिमान होकर सेवा करते आयुध। उन्होंने अपना दाहिनी जाँघ पर बायाँ चरण रख लिया, जैसे कोई थका पथिक सुस्ताने बैठा हो। लाल-लाल तलवा रक्त-कमल के समान चमक रहा था।

तभी उस वन में एक बहेलिया आ निकला, नाम जरा।

दूर झुरमुट में उसे केवल वह तलवा दिखा, और उसे लगा वह किसी हिरन का मुख है।

बहेलिया जरा ने वन में विश्राम करते श्रीकृष्ण के चरण को हिरन समझकर तीर चला दिया, फिर पछताकर चरणों में गिर पड़ा।
बहेलिया जरा ने वन में विश्राम करते श्रीकृष्ण के चरण को हिरन समझकर तीर चला दिया, फिर पछताकर चरणों में गिर पड़ा।

उसने अपना तीर निकाला, वही तीर जिसकी नोक पर बरसों पहले का वह लोहे का रेज़ा जड़ा था।

निशाना साधा। तीर छूटा।

और वह जा लगा श्रीकृष्ण के चरण में।

शिकार समेटने जरा दौड़ा आया, और जो देखा उससे पाँव वहीं गड़ गए। हिरन नहीं, एक चतुर्भुज पुरुष, साँवला, शान्त, और चरण से बहता रक्त।

“हाय! यह मैंने क्या कर दिया।” उसके हाथ से धनुष छूट गया। वह डरकर भगवान् के चरणों पर सिर रखकर गिर पड़ा।

“हे मधुसूदन, मैंने अनजाने में यह पाप किया है। सर्वव्यापक प्रभो, महात्मा लोग कहते हैं कि आपके स्मरणमात्र से मनुष्यों का अज्ञान-अन्धकार नष्ट हो जाता है, और बड़े खेद की बात है कि मैंने स्वयं आप ही का अनिष्ट कर दिया। आप मुझ निरपराध हिरनों को मारने वाले महापापी को अभी मार डालिए, ताकि मैं फिर कभी आप-जैसे महापुरुषों का ऐसा अपराध न करूँ।”

पर जिसे उसने बेधा था, वह शान्त थे। पीड़ा उनके मुख पर थी ही नहीं, केवल एक गहरी शान्ति।

“आप डरिए मत, उठिए। यह तो आपने हमारे मन का ही काम किया है। जाइए, हमारी आज्ञा से आप उस स्वर्ग में निवास कीजिए, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानों को होती है।”

जरा की आँखों के आगे का परदा हटा, और उसे सब समझ आ गया।

भगवान् का यह आदेश पाकर उसने उनकी तीन बार परिक्रमा की, हाथ जोड़े, सिर झुकाया, और विमान पर सवार होकर स्वर्ग को चला गया।

इधर श्रीकृष्ण का सारथि दारुक अपने स्वामी को ढूँढ़ता हुआ वहाँ आया। तुलसी की गन्ध से युक्त वायु सूँघकर उसने उनके होने के स्थान का अनुमान लगाया, और चलता-चलता उसी पीपल के नीचे जा पहुँचा। वहाँ श्रीकृष्ण को बैठे देखकर उसका हृदय भर आया। वह रथ से कूदकर भगवान् के चरणों पर गिर पड़ा।

“प्रभो, रात के समय चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर राह चलने वाले की जैसी दशा होती है, आपके चरण-कमलों का दर्शन न पाकर मेरी भी वैसी ही दशा हो गई है। दिशाओं का ज्ञान मुझसे छूट गया है और हृदय की शान्ति भी।”

श्रीकृष्ण ने उसे आदेश दिया, “दारुक, आप द्वारका जाइए, और वहाँ यदुवंशियों के आपसी संहार, बलराम की परम गति और हमारे स्वधाम-गमन की बात कहिए। उनसे कहिएगा कि अब वे अपने परिवार-वालों के साथ द्वारका से निकल जाएँ। हमारे प्रस्थान के बाद समुद्र उस नगरी को डुबो देगा। सब लोग अपनी-अपनी धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब और हमारे माता-पिता को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इन्द्रप्रस्थ चले जाएँ। और दारुक, आप हमारे उपदिष्ट भागवत-धर्म का आश्रय लीजिए, ज्ञाननिष्ठ होकर इस सब की उपेक्षा कर दीजिए, और इस दृश्य को हमारी माया की रचना समझकर शान्त हो जाइए।”

दारुक ने उनकी परिक्रमा की, उनके चरण-कमल अपने सिर पर रखकर बारम्बार प्रणाम किया, और उदास मन से द्वारका के लिए चल पड़ा।

उधर पीपल के नीचे श्रीकृष्ण ने धीरे से आँखें मूँद लीं।

उनकी साँस ठहर गई, और देह से जैसे एक शीतल आभा फैलकर ऊपर उठने लगी, अपने धाम की ओर लौटती हुई। जिस रूप में कान्हा यशोदा की गोद में खेले थे, जिसने वंशी से व्रज को बाँधा था, वह रूप अब इस संसार से विदा ले रहा था।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध, अध्याय 30 पर आधारित है। प्रभास क्षेत्र में यादवों का आपसी संहार, बलराम का योग धारण करके अपने स्वरूप में लौटना, और श्रीकृष्ण का जरा के बाण से देह-त्याग, सब इसी अध्याय में आता है। द्वारका के समुद्र में डूब जाने की बात यहाँ श्रीकृष्ण की भविष्यवाणी के रूप में आती है; अर्जुन का द्वारका आकर अन्त्येष्टि करना और वज्र का राज्याभिषेक भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 15 का प्रसंग है, इस अध्याय का नहीं।

ऋषि-शाप से जन्मे लोहे के मूसल की कथा भागवत के एकादश स्कन्ध में पहले आती है, और यहाँ उसी का फल फलता है। इसी प्रसंग के साथ भागवत द्वापर का अन्त और कलियुग का आरम्भ दर्शाता है।

जिस कुल को भगवान् की निकटता मिली थी, वही अभिमान और मद में अपने हाथों मिट गया। बड़ाई जब भीतर सड़ने लगती है, तो उसे गिराने के लिए बाहर से किसी शत्रु की ज़रूरत नहीं रहती। और जो सबका लेखा चुकाता है, वह अपना भी चुपचाप चुका जाता है, शान्त भाव से।

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