यदुवंश का अन्त
उद्धव चला गया। बद्रिकाश्रम।
कृष्ण द्वारका में अकेले। बलराम पास थे।
और तब एक अद्भुत घटना।
एक बहुत पहले की कथा। कुछ नौजवान यदुवंशी एक ऋषि-समूह से ठट्ठा कर रहे थे।
उन्होंने एक का पेट बँधा। ”देखो, यह तो pregnant आदमी। बेटा होगा कि बेटी?”
ऋषियों को ग़ुस्सा आया।
”तू ने हमारा अपमान किया? तेरे ”पेट” से एक मूसल निकलेगा। वो मूसल पूरे यदुवंश को मार देगा।”
नौजवान चौंके। उन्होंने पेट खोला।
और सच में, एक छोटा सा लोह-मूसल निकला।
वो डर गए।
उन्होंने उस मूसल को टुकड़ों में काटा। समुद्र में फेंका।
पर एक छोटा सा हिस्सा बच गया। उसको एक मछली ने निगला।
वो मछली एक मछुआरे ने पकड़ी। उसके पेट से एक छोटा सा तीर-बिंदु बनाया।
और इस तरह वो शाप कई साल तक भगवान का इंतज़ार करता रहा।
अब वर्षों बाद। यदुवंश पूरी तरह से बढ़ चुका था। हज़ारों लोग।
एक दिन सब एक तीर्थ-यात्रा पर निकले। प्रभास क्षेत्र। समुद्र के पास।
वहाँ एक उत्सव हुआ। दारू पी। बहुत पी।
नशे में, यदुवंशी एक-दूसरे से लड़ने लगे।
पहले शब्द से। फिर हाथ से। फिर शस्त्र से।
और एक अजीब बात।
जब उन्होंने आसपास देखा, उन्हें ज़मीन पर एक तरह की घास दिखी। उल्टी-कांद। बहुत सख़्त।
उन्होंने वो उठाई।
और वो घास, ऋषियों के शाप से, मूसल बन गई। जैसे उस लोह-मूसल का continuation।
हित्वा देहं स्वशरीरमिवात्मा हरिर्ययौ ॥
इस तरह श्री भगवान ने अपना काम पूरा करके, समाधि में, अपने शरीर को छोड़कर, अपने धाम चले गए।
उन घास-मूसलों से, यदुवंशी एक-दूसरे को मारने लगे।
वो ख़ुद नहीं रोक पा रहे थे। नशे में और शाप में।
एक हज़ार। दस हज़ार।
पूरा यदुवंश एक-दूसरे के हाथों मरा।
बलराम भी देखते रहे। फिर एक पल को उन्हें समझ आया, ”अब वक़्त है।”
वो समुद्र के किनारे गए। वहाँ एक पेड़ के नीचे बैठे। और अपनी असली identity में चले गए। शेषनाग के रूप में, समुद्र में।
कृष्ण अकेले रह गए।
उन्होंने एक छोटा सा जंगल देखा। वहाँ चले गए। एक पेड़ के नीचे बैठे।
उनके पाँव हवा में थे। उनका शरीर नीला, चमकता।
तभी एक मछुआरा-शिकारी आया। नाम था जरा।
वो शिकार पर था। दूर से उसने कृष्ण के पाँव देखे, हवा में।
वो सोचा, ”एक हिरण।”
उसने अपना तीर निकाला। वही तीर जिसमें वो लोह-मूसल का छोटा सा हिस्सा था।
उसने तीर चलाया।
और तीर कृष्ण के पैर में लगा।
जरा भागकर आया। देखा।
”हे प्रभु!”
उसके होश उड़ गए। कृष्ण मुस्कुरा रहे थे।
”चिंता मत कर। यह तो होना था।”
”हे प्रभु, मुझे माफ़ करिए!”
”तू कोई और नहीं। तू पुरानी कथा का एक character है। बाली। तू ने रामायण में मुझे मारा नहीं था। यह तेरा बदला।”
(पुरानी कथा, राम ने बाली को छुपकर मारा था। अब बाली ने अगले जन्म में, छुपकर, कृष्ण को मारा।)
जरा को सब समझ आया।
वो रोने लगा।
कृष्ण ने आँखें मूँदीं।
उनका शरीर एक दिव्य रोशनी में बदला। और वो रोशनी ऊपर उठी।
वैकुण्ठ की तरफ़।
कृष्ण-अवतार ख़त्म।
द्वारका, जो उनकी राजधानी थी, समुद्र में डूब गई। एक प्रलय में।
उद्धव बद्रिकाश्रम में थे। उनको पता चला।
उन्होंने आँसू नहीं बहाए।
बस अपनी साधना जारी रखी।
क्योंकि कृष्ण ने कहा था, ”मेरी कथा को आगे रखना।”
और हम सब आज तक उनकी कथा सुन रहे हैं।
यदुवंश का अन्त भागवतम् का सबसे sad हिस्सा है।
कृष्ण के अपने लोग। उन्हीं की कोख से बच्चे। हज़ारों लोग।
और एक नशे की रात में, वो सब आपस में मार-काट करके मर गए।
एक एक करके।
क्यों?
क्योंकि कुछ साल पहले, उन के जवान-बच्चों ने एक ऋषि-समूह से ठट्ठा किया था। और शाप मिला था।
वो शाप एक छोटे से लोह-मूसल के रूप में आया। फिर एक मछली, एक मछुआरा, एक तीर। सब था।
यह कथा हमें एक बात सिखाती है। कर्म का चक्र। आज जो आप कर रहे हैं, वो दस साल बाद, बीस साल बाद, अगले जन्म में, कहीं न कहीं वापस आएगा।
एक छोटा सा अपमान, हज़ारों लोगों के मरने का कारण बना।
और कृष्ण को भी, अपने ख़ुद के मित्र (राम-रूप में) को मारने का बदला, एक तीर के रूप में मिला।
कोई भी कर्म से ऊपर नहीं। यहाँ तक कि भगवान भी अपने रोल में, कर्म के नियम follow करते हैं।
और एक last बात। कृष्ण मरते वक़्त मुस्कुराए। क्यों? क्योंकि उन्हें यह सब पता था। यह उनका अपना design था।
अंत भी एक script का हिस्सा है।