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यदुवंश का अन्त

कथा 59 · भागवतम् की कथाएँ

यदुवंश का अन्त

Krishna’s Own People, Destroyed
स्कन्ध 11, अध्याय 30

उस दिन परीक्षित् बहुत देर ख़ामोश रहे, और शुकदेव के मुख की ओर देखते रहे, जैसे कोई बात पूछना चाहते हों पर ज़बान साथ न दे रही हो।

”भगवन्,” आख़िर वे बोले, ”आपने उद्धव की विदाई की कथा सुनाई। मन भारी है। पर एक बात मुझे रात भर सोने नहीं देती। जिनके एक इशारे पर सृष्टि चलती है, जिन्होंने कंस को मारा, गोवर्धन उठाया, मेरे ही प्राण माँ की कोख में बचाए, उन श्रीकृष्ण ने अपने ही कुल का अन्त अपनी आँखों के सामने होते देखा। ऐसा क्यों हुआ? और वे स्वयं इस संसार से किस तरह गए?”

शुकदेव की आँखें एक पल को नीचे झुकीं। फिर उन्होंने धीमे से कहा, ”राजन्, जो आता है वह जाता भी है, यहाँ तक कि भगवान् का वह रूप भी जिसे हम प्रेम करते हैं। पर उनके जाने में भी एक करुणा है। सुनिए, और घबराइए मत।”

उद्धव बद्रिकाश्रम को चले गए थे। द्वारका में श्रीकृष्ण अब अकेले-से रह गए थे, केवल बलराम पास।

एक कथा बहुत पहले की है, राजन्।

कुछ नौजवान यादव एक ऋषि-समूह से हँसी-ठट्ठा कर रहे थे। शरारत सूझी, तो उन्होंने एक लड़के के पेट पर कपड़ा लपेटकर उसे गर्भवती स्त्री का रूप दे दिया।

”मुनिवर,” वे ठहाका मारकर बोले, ”बताइए, इसके बेटा होगा कि बेटी?”

ऋषियों का मुख तमतमा उठा। उनकी वाणी शान्त थी पर भीतर आग थी।

Rich painterly classical-Indian color illustration: a circle of furious bearded sages in ochre and saffron robes confronting a cluster of young Yadava men, one boy still wearing cloth wound about his belly to mimic a pregnant woman; the sages raise hands and utter the curse, eyes blazing, faces flushed with restrained anger, the youths' laughter freezing into dread; forest hermitage backdrop near the sea, warm earthen palette.

”आप लोगों ने तपस्वियों का उपहास किया। तो सुनिए, इसी पेट से एक लोहे का मूसल जनमेगा। वही मूसल आपके पूरे कुल को मिटा देगा।”

हँसी होंठों पर ही जम गई। काँपते हाथों से उन्होंने कपड़ा खोला।

और सचमुच, कपड़े के भीतर से लोहे का एक छोटा-सा मूसल निकल आया।

अब डर ने उनकी हँसी की जगह ले ली। उन्होंने उस मूसल को रगड़-रगड़कर चूरा किया और समुद्र में बहा दिया, जैसे शाप को भी पानी में घोला जा सकता हो।

पर लोहे का एक रेज़ा बच रहा। उसे एक मछली निगल गई। वही मछली आगे चलकर एक मछुआरे के जाल में फँसी, और उसके पेट से निकले उस नुकीले टुकड़े को उसने अपने तीर की नोक पर जड़ लिया।

इस तरह वह शाप बरसों तक चुपचाप अपनी घड़ी का इंतज़ार करता रहा।

वर्ष बीते। यदुवंश फैलता गया, हज़ारों की गिनती में। बल था, ऐश्वर्य था, और उसी के साथ वह मद भी जो कुल को भीतर से दीमक की तरह खाता है।

Rich painterly classical-Indian color illustration: dark-blue four-armed Krishna with yellow silk pitambara and vanamala standing in the ornate Sudharma assembly hall of Dwarka, addressing seated Yadava elders, gesturing toward windows where ominous portents fill sky, earth and air; troubled noble faces, golden pillars, sense of foreboding; jewel-tone palette of indigo, gold and crimson.

एक दिन द्वारका में बड़े-बड़े उत्पात होने लगे, आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अशुभ चिह्न दिखाई देने लगे। श्रीकृष्ण ने सुधर्मा-सभा में बैठे यदुवंशियों से कहा, ”श्रेष्ठ यदुवंशियो, ये उत्पात साक्षात् यमराज की ध्वजा के समान हमारे अनिष्ट के सूचक हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिए। स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध शंखोद्धार-क्षेत्र को चले जाएँ, और हम सब प्रभास-क्षेत्र को चलें, जहाँ सरस्वती पश्चिम की ओर बहकर समुद्र में जा मिली हैं। वहाँ स्नान करके हम पवित्र होंगे, उपवास करेंगे, देवताओं की पूजा करेंगे और ब्राह्मणों को गौ, भूमि, सोना और वस्त्र देकर मंगल-कृत्य करेंगे।” सब वृद्ध यदुवंशियों ने यह बात मानी, और नौकाओं से समुद्र पार करके रथों पर प्रभास की यात्रा की।

वहाँ पहुँचकर यादवों ने श्रीकृष्ण के आदेश के अनुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति-पाठ आदि मंगल-कृत्य किए।

पर दैव ने उनकी बुद्धि हर ली, और वे मैरेय नाम की मदिरा पीने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। एक प्याला, फिर दूसरा, फिर गिनती जाती रही।

नशे में पुरानी रंजिशें जाग उठीं। पहले बात बढ़ी, फिर हाथ उठे, फिर धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा और तोमर। प्रद्युम्न और साम्ब, अक्रूर और भोज, अनिरुद्ध और सात्यकि, गद और सुमित्र, सब एक-दूसरे पर टूट पड़े। दशार्ह, वृष्णि, अन्धक, भोज, मधु, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, कुकुर और कुन्ति, सब वंशों के लोग सौहार्द भुलाकर आपस में मार-काट करने लगे।

अन्त में जब उनके सब बाण समाप्त हो गए, धनुष टूट गए और शस्त्रास्त्र नष्ट हो गए, तब उन्होंने समुद्र-तट पर उगी एरका नाम की घास उखाड़नी शुरू की। यही वह घास थी जो ऋषियों के शाप से जन्मे लोहे के मूसल के चूरे से उपजी थी।

Rich painterly classical-Indian color illustration on the Prabhasa seashore: drunken Yadava warriors, weapons spent and bows broken, tearing up eraka reeds that turn to iron pestle-clubs in their hands and striking one another in frenzied mutual slaughter, son against father, brother against brother; sea and red sky behind, scattered fallen bodies, chaotic violent energy in deep reds, ochres and stormy blues.

उनके हाथों में आते ही हर तिनका वज्र के समान कठोर मूसल बन गया। उन्हीं घास-मूसलों से यादव एक-दूसरे पर टूट पड़े। बेटा बाप पर, भाई भाई पर, भानजा मामा पर, मित्र मित्र पर। कोई हाथ रोक नहीं पा रहा था, क्योंकि नशा बाहर था और शाप भीतर।

श्रीकृष्ण ने उन्हें रोकना चाहा, पर उनकी बुद्धि ऐसी मूढ़ हो रही थी कि वे श्रीकृष्ण और बलराम को भी अपना शत्रु समझकर उन्हीं की ओर दौड़ पड़े। वह पूरा कुल अपने ही हाथों मिट्टी में लेट गया, जो कभी श्रीकृष्ण के दरबार की शोभा था। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि समस्त यदुवंशियों का संहार हो चुका, तो उन्होंने सन्तोष की साँस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया।

बलराम यह सब देखते रहे। फिर वे समुद्र के किनारे जा बैठे, चित्त एकाग्र किया, और योग धारण करके अपने आत्मा को आत्मस्वरूप में ही स्थिर करके मनुष्य-देह छोड़ दी।

अब श्रीकृष्ण अकेले रह गए।

जब उन्होंने देखा कि बलराम परमपद में लीन हो गए, तब वे एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर चुपचाप धरती पर जा बैठे।

Rich painterly classical-Indian color illustration: serene four-armed Krishna, rain-cloud dark with the Shrivatsa mark, silken yellow pitambara and forest-flower garland, radiant like smokeless fire, seated calmly on the earth beneath a peepal tree, his left foot resting on his right thigh with the reddish sole glowing like a red lotus; quiet forest glade, soft golden divine aura, peaceful contemplative mood.

उस समय उन्होंने अपनी अंगकान्ति से देदीप्यमान चतुर्भुज रूप धारण कर रखा था, धूम-रहित अग्नि के समान दिशाओं को प्रकाशमान करता हुआ रूप। वर्षाकालीन मेघ-सा साँवला शरीर, उस पर श्रीवत्स का चिह्न, रेशमी पीताम्बर, गले में वनमाला, और मूर्तिमान होकर सेवा करते आयुध। उन्होंने अपना दाहिनी जाँघ पर बायाँ चरण रख लिया, जैसे कोई थका पथिक सुस्ताने बैठा हो। लाल-लाल तलवा रक्त-कमल के समान चमक रहा था।

तभी उस वन में एक बहेलिया आ निकला, नाम जरा।

दूर झुरमुट में उसे केवल वह तलवा दिखा, और उसे लगा वह किसी हिरन का मुख है।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the hunter Jara, a lean tribal bowman in simple garb, crouched in distant forest thicket drawing back his arrow whose tip bears the small embedded iron sliver, taking aim at what he mistakes for a deer's face glimpsed through the leaves; in the far background the seated dark four-armed Krishna's glowing reddish sole peeks from behind foliage; tense dappled-green forest, warm earthy palette.

उसने अपना तीर निकाला, वही तीर जिसकी नोक पर बरसों पहले का वह लोहे का रेज़ा जड़ा था।

निशाना साधा। तीर छूटा।

और वह जा लगा श्रीकृष्ण के चरण में।

शिकार समेटने जरा दौड़ा आया, और जो देखा उससे पाँव वहीं गड़ गए। हिरन नहीं, एक चतुर्भुज पुरुष, साँवला, शान्त, और चरण से बहता रक्त।

”हाय! यह मैंने क्या कर दिया।” उसके हाथ से धनुष छूट गया। वह डरकर भगवान् के चरणों पर सिर रखकर गिर पड़ा।

”हे मधुसूदन, मैंने अनजाने में यह पाप किया है। सर्वव्यापक प्रभो, महात्मा लोग कहते हैं कि आपके स्मरणमात्र से मनुष्यों का अज्ञान-अन्धकार नष्ट हो जाता है, और बड़े खेद की बात है कि मैंने स्वयं आप ही का अनिष्ट कर दिया। आप मुझ निरपराध हिरनों को मारने वाले महापापी को अभी मार डालिए, ताकि मैं फिर कभी आप-जैसे महापुरुषों का ऐसा अपराध न करूँ।”

पर जिसे उसने बेधा था, वह शान्त थे। पीड़ा उनके मुख पर थी ही नहीं, केवल एक गहरी शान्ति।

”आप डरिए मत, उठिए। यह तो आपने हमारे मन का ही काम किया है। जाइए, हमारी आज्ञा से आप उस स्वर्ग में निवास कीजिए, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानों को होती है।”

जरा की आँखों के आगे का परदा हटा, और उसे सब समझ आ गया।

भगवान् का यह आदेश पाकर उसने उनकी तीन बार परिक्रमा की, हाथ जोड़े, सिर झुकाया, और विमान पर सवार होकर स्वर्ग को चला गया।

इधर श्रीकृष्ण का सारथि दारुक अपने स्वामी को ढूँढ़ता हुआ वहाँ आया। तुलसी की गन्ध से युक्त वायु सूँघकर उसने उनके होने के स्थान का अनुमान लगाया, और चलता-चलता उसी पीपल के नीचे जा पहुँचा। वहाँ श्रीकृष्ण को बैठे देखकर उसका हृदय भर आया। वह रथ से कूदकर भगवान् के चरणों पर गिर पड़ा।

”प्रभो, रात के समय चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर राह चलने वाले की जैसी दशा होती है, आपके चरण-कमलों का दर्शन न पाकर मेरी भी वैसी ही दशा हो गई है। न मुझे दिशाओं का ज्ञान है, न मेरे हृदय में शान्ति है।”

श्रीकृष्ण ने उसे आदेश दिया, ”दारुक, आप द्वारका जाइए, और वहाँ यदुवंशियों के आपसी संहार, बलराम की परम गति और हमारे स्वधाम-गमन की बात कहिए। उनसे कहिएगा कि अब उन्हें अपने परिवार-वालों के साथ द्वारका में नहीं रहना चाहिए, हमारे न रहने पर समुद्र उस नगरी को डुबो देगा। सब लोग अपनी-अपनी धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब और हमारे माता-पिता को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इन्द्रप्रस्थ चले जाएँ। और दारुक, आप हमारे उपदिष्ट भागवत-धर्म का आश्रय लीजिए, ज्ञाननिष्ठ होकर इस सब की उपेक्षा कर दीजिए, और इस दृश्य को हमारी माया की रचना समझकर शान्त हो जाइए।”

दारुक ने उनकी परिक्रमा की, उनके चरण-कमल अपने सिर पर रखकर बारम्बार प्रणाम किया, और उदास मन से द्वारका के लिए चल पड़ा।

उधर पीपल के नीचे श्रीकृष्ण ने धीरे से आँखें मूँद लीं।

उनकी साँस ठहर गई, और देह से जैसे एक शीतल आभा फैलकर ऊपर उठने लगी, अपने धाम की ओर लौटती हुई। जिस रूप में कान्हा यशोदा की गोद में खेले थे, जिसने वंशी से व्रज को बाँधा था, वह रूप अब इस संसार से विदा ले रहा था।

मन्थन

परीक्षित् बहुत देर कुछ न बोल सके। उनके अपने सिर पर भी सात दिन का शाप मँडरा रहा था, और शायद इसीलिए यह कथा उन्हें औरों से अधिक भीतर तक छू गई।

”भगवन्,” आख़िर वे बोले, ”एक छोटी-सी शरारत, और उसका अन्त एक पूरे कुल का सर्वनाश। जिनके स्वामी स्वयं श्रीहरि थे, वही अपने हाथों मिटे। यह न्याय है, या केवल वेदना?”

शुकदेव की वाणी धीमी रही। ”राजन्, जो बीज बोया जाता है वह फल देता ही है, चाहे बोने वाला राजा हो या रंक। यादवों को भगवान् की निकटता मिली थी, पर निकटता मद बन गई, और मद ऋषियों के अपमान तक पहुँच गया। शाप तो केवल उसी आग को नाम दे रहा था जो भीतर पहले से सुलग रही थी।”

”और स्वयं श्रीकृष्ण?” परीक्षित् ने पूछा। ”जिस बाण से वे गए, उसका भय तो उस बहेलिये के मन में रह ही गया होगा।”

”यही तो उनकी करुणा है,” शुकदेव बोले। ”जिसके हाथों वह बाण छूटा, उसी जरा को भगवान् ने डरने तक न दिया। उलटे कहा कि आपने तो हमारे मन का काम किया है, और उसे स्वर्ग की राह दिखाकर विदा हुए। जो शरणागत की रक्षा करता है, वह अपने वधिक को भी अपना आश्रय देता है।”

परीक्षित् देर तक शुकदेव के मुख की ओर देखते रहे, जहाँ अब भी वही शान्ति ठहरी थी।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध, अध्याय 30 पर आधारित है। प्रभास क्षेत्र में यादवों का आपसी संहार, बलराम का योग धारण करके अपने स्वरूप में लौटना, और श्रीकृष्ण का जरा के बाण से देह-त्याग, सब इसी अध्याय में आता है। द्वारका के समुद्र में डूब जाने की बात यहाँ श्रीकृष्ण की भविष्यवाणी के रूप में आती है; अर्जुन का द्वारका आकर अन्त्येष्टि करना और वज्र का राज्याभिषेक भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 15 का प्रसंग है, इस अध्याय का नहीं।

ऋषि-शाप से जन्मे लोहे के मूसल की कथा भागवत के एकादश स्कन्ध में पहले आती है, और यहाँ उसी का फल फलता है। इसी प्रसंग के साथ भागवत द्वापर का अन्त और कलियुग का आरम्भ दर्शाता है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

जिस कुल को भगवान् की निकटता मिली थी, वही अभिमान और मद में अपने हाथों मिट गया। बड़ाई जब भीतर सड़ने लगती है, तो उसे गिराने के लिए बाहर से किसी शत्रु की ज़रूरत नहीं रहती। और जो सबका लेखा चुकाता है, वह अपना भी चुपचाप चुका जाता है, शान्त भाव से।