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भागवतम् की राम-कथा

कथा 12 · भागवतम् की कथाएँ

भागवतम् की राम-कथा

Ramayana in One Chapter
स्कन्ध 9, अध्याय 10-11

गंगा के किनारे परीक्षित् कुछ देर जल की ओर देखते रहे, फिर शुकदेव की ओर मुड़े। ”भगवन्, सुना है कि जिन्हें सारे जगत् ने भगवान् माना, वे राम भी इसी इक्ष्वाकु वंश में आए, जिसमें मैं जन्मा हूँ। पर मन में एक काँटा है। यदि वे स्वयं श्रीहरि थे, तो उन्होंने मनुष्य की कड़वी-से-कड़वी पीड़ाएँ क्यों सहीं? पिता का बिछोह, पत्नी का वियोग, अकेलापन। मेरे पास थोड़े ही दिन बचे हैं, मुनिवर; मुझे यह जानना है कि भगवान् दुख से बचते नहीं, तो भक्त किस आसरे जिए।”

शुकदेव कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, यही तो राम-कथा का मर्म है। तत्त्वदर्शी ऋषियों ने सीतापति श्रीराम का चरित्र बहुत कुछ गाया है, और आपने भी उसे अनेक बार सुना है। पर व्यास ने यहाँ थोड़े-से श्लोकों में वही कहा जिसे और किसी ने इतने ठहराव से नहीं कहा। सुनिए।”

इक्ष्वाकु वंश की अयोध्या। खट्वांग के पुत्र दीर्घबाहु, दीर्घबाहु के परम यशस्वी पुत्र रघु, रघु के अज, और अज के पुत्र महाराज दशरथ। तीन रानियाँ, कौसल्या, कैकेयी, सुमित्रा। राजमहल भरा था, पर एक कोना सूना रहता था, जहाँ कोई बालक की किलकारी नहीं गूँजती थी।

A luminous classical-Indian color illustration: the supreme Lord Sri Hari, blue-hued and radiant, descending in answer to the gods' prayer and manifesting as four newborn princes in King Dasharatha's Ayodhya palace; devas with folded hands hover in golden clouds above the burdened earth, the four infants Rama, Lakshmana, Bharata and Shatrughna cradled in the royal household; warm temple-mural palette, gold halos.

तब देवताओं ने प्रार्थना की, क्योंकि पृथ्वी पर राक्षसों का भार बढ़ चला था। उस प्रार्थना से साक्षात् परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीहरि अपने अंशांश से चार रूप धारण कर के राजा दशरथ के पुत्र हुए। उनके नाम थे, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।

कौसल्या से राम जन्मे, कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न। राजमहल का सूना कोना भर उठा, और चारों भाई साथ-साथ पलने लगे।

बालक बड़े हुए। राम ज्येष्ठ थे, और उनकी आँख में बचपन से ही कोई ऐसी शान्ति थी जो बड़ों को भी थमा देती थी।

A grand Mithila svayamvara hall in rich color: young blue-skinned Rama effortlessly lifting Shiva's colossal bow (which three hundred warriors had barely carried), bending the string and snapping it into two pieces like a baby elephant breaking sugarcane; King Janaka's assembly of chosen heroes watching astonished, princess Sita radiant nearby ready to garland him; classical-Indian painterly style, festive banners, jewel tones.

विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए उन्हें वन में ले गए। वहीं लक्ष्मण के सामने ही राम ने मारीच और दूसरे राक्षसों को मार गिराया। फिर मिथिला में जनक का स्वयंवर। संसार भर के चुने हुए वीरों की सभा में शिव का वह भयंकर धनुष रखा था, इतना भारी कि तीन सौ वीर बड़ी कठिनाई से उसे सभा में ला सके थे। राम ने उसे बात-की-बात में उठाया, उस पर डोरी चढ़ाई, और खींचते-खींचते उसके दो टुकड़े कर दिए, जैसे हाथी का बच्चा खेलते-खेलते ईख तोड़ डाले। इस तरह सीता उनकी हुईं, जो गुण, शील, अवस्था और सौन्दर्य में सर्वथा राम के अनुरूप थीं।

अयोध्या लौटते समय मार्ग में उन परशुरामजी से भेंट हुई, जिन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-वंश से रहित कर दिया था। राम ने उनके बढ़े हुए गर्व को वहीं शान्त कर दिया। फिर अयोध्या पहुँचे तो राज-तिलक की तैयारी होने लगी। पर एक ही रात में हवा पलट गई।

A tender, sober color scene in the Ayodhya palace: calm composed Rama, face untroubled, bowing before his grief-choked aged father Dasharatha and accepting exile to honor the king's word; Rama shedding silken robes for bark garments, with devoted Sita and Lakshmana quietly standing beside him ready to follow into the forest; muted dawn light, classical-Indian miniature style, restrained emotion.

दशरथ अपने वचन से बँध गए, और वचन तथा पुत्र के बीच फँसे एक बूढ़े पिता का गला रुँध गया। उन्होंने जैसे-तैसे राम से कह दिया। राम के चेहरे पर एक रेखा तक नहीं काँपी। पिता का वचन सत्य करने के लिए उन्होंने उसी घड़ी वनवास स्वीकार कर लिया, और इतना ही कहा, ”पिताजी, आपका वचन है। मैं आज ही निकल जाऊँगा।”

राज्य, लक्ष्मी, प्रिय, हितैषी, मित्र और महल, सब उन्होंने वैसे ही छोड़ दिया जैसे मुक्तसंग योगी प्राणों को छोड़ देता है। रेशमी वस्त्र उतरे, वल्कल चढ़ा। सीता और लक्ष्मण बिना एक शब्द कहे साथ हो लिए, मानो वन उनका भी घर हो।

वन में पहुँच कर भगवान् के सुकुमार चरण काँटों से चलते-चलते थक जाते, तब हनुमान् और लक्ष्मण उन्हें दबा-दबा कर थकावट मिटाते। वहीं शूर्पणखा के नाक-कान काट कर उसे विरूप किया गया, और उसी से लंका के साथ बैर की रेख खिंच गई। फिर सीता का हर लिया जाना, हनुमान् का मिलना, सुग्रीव से बँधी मित्रता, और राक्षसों से घमासान। शूर्पणखा के पक्षधर खर, दूषण, त्रिशिरा आदि चौदह हजार राक्षसों को राम ने हाथ में महान् धनुष लेकर नष्ट कर डाला।

शुकदेव ने यह सब एक साँस में कह दिया, जैसे कोई दूर से पहाड़ की पूरी कतार एक नज़र में दिखा दे। ”राजन्, इसे विस्तार से तो तत्त्वदर्शी ऋषि गा चुके। मुझे जिस ठौर पर ठहरना है, वह आगे है।”

वे राम-कथा के अन्तिम मोड़ पर आ कर रुके, जहाँ शूरता पीछे छूट जाती है और केवल सहना बचता है।

A dramatic battlefield color illustration before Lanka: Rama, drawn bow in hand, loosing a thunderbolt-like arrow that pierces the heart of ten-headed Ravana; Ravana atop his Pushpaka aerial chariot vomiting blood from all ten mouths as he topples and falls; vanara warriors and Vibhishana in the background of the burning city, classical-Indian painterly battle palette of crimson, gold and storm-grey.

समुद्र पर पत्थरों का तैरता सेतु बँधा, और विभीषण की सलाह से राम सुग्रीव, नील, हनुमान् आदि वीरों तथा वानर-सेना के साथ लंका में घुसे, जो श्रीहनुमान् के हाथों पहले ही जल चुकी थी। फिर वह घमासान, जिसमें कुम्भकर्ण और मेघनाद सहित रावण के सारे अनुचर गिरे। अन्त में रावण क्रोध में पुष्पक विमान पर चढ़ कर सामने आया, और राम ने अपने धनुष पर चढ़ाया हुआ बाण उस पर छोड़ा। वह बाण वज्र की तरह उसके हृदय को चीर गया, और रावण अपने दसों मुखों से खून उगलता हुआ विमान से गिर पड़ा।

रावण के गिरने के बाद राम अयोध्या लौटे। राज मिला, प्रजा झूम उठी, ब्रह्मा आदि लोकपालों ने मार्ग में पुष्पों की वर्षा की। और इसी रोशनी के बीच एक फुसफुसाहट उठने लगी।

राम एक बार रात को छिपकर, बिना किसी को बताए, अपनी प्रजा की दशा देखने निकले। तब उन्होंने किसी की यह बात सुनी, जो अपनी पत्नी से कह रहा था, ”अरी, आप पराये घर रह आई हैं। राम भले ही सीता को रख लें, पर मैं आपको फिर नहीं रख सकता।”

राम के भीतर कुछ बैठ गया, एक भारी पत्थर जो साँस के साथ नीचे को खिंचता रहा। पर वे राजा थे, और लोकापवाद से कुछ भयभीत-से हो गए। उन्होंने सीता को वन भिजवा दिया। गर्भ से भरी सीता को, अकेले, उसी वन में जहाँ वे कभी साथ-साथ फिरे थे।

वाल्मीकि के आश्रम की छाँव में सीता ने लव और कुश को जन्म दिया, और दो बालकों के सहारे बरस काटे। वाल्मीकि मुनि ने उनके जात-कर्म आदि संस्कार किए।

राम के भीतर भी विरह की वही व्याधि चलती रही। बार-बार सीता के पवित्र गुण उन्हें स्मरण आते, और बुद्धि से रोकना चाहते हुए भी वे अपने शोक को रोक न सके।

A solemn, luminous color scene at sage Valmiki's forest ashram: Sita, having handed her two sons Lava and Kusha to the sage, meditating on Rama's lotus feet and gazing down as the earth splits open; the goddess Prithvi (Earth) receiving Sita, who descends into the earth-realm from which she once arose in Janaka's furrow; classical-Indian devotional style, soft green forest, golden parting earth, hushed reverence.

उधर वाल्मीकि के आश्रम में सीता ने अपने दोनों पुत्रों को मुनि के हाथों सौंप दिया, और श्रीराम के चरणकमलों का ध्यान करती हुई धरती की ओर देखा। धरती फटी, और सीता पृथ्वीदेवी के लोक में समा गईं, उसी मिट्टी में लौट कर जहाँ से वे कभी जनक के हल की रेख में निकली थीं।

दूर अयोध्या में राम वहीं रह गए, राजा भी, पति भी, और भगवान् भी, और तीनों एक-दूसरे को चीरते हुए।

शुकदेव यहाँ ठहरे। ”देखिए राजन्, श्रीहरि जब मनुष्य का चोला पहन लेते हैं, तो मनुष्य की पीड़ा से भी मुँह नहीं मोड़ते। वे उसे ओढ़ते हैं, पूरे का पूरा, ताकि कोई दुखी प्राणी यह न कह सके कि भगवान् ने उसका दर्द जाना ही नहीं।”

आगे राम ने तेरह हजार वर्ष तक अखण्ड रूप से अग्निहोत्र किया। फिर एक दिन उन्होंने अपने उन चरणकमलों को, जो दण्डक वन के काँटों से बिंध चुके थे, अपना स्मरण करने वाले भक्तों के हृदय में स्थापित कर दिया, और अपने स्वयंप्रकाश परम ज्योतिर्मय धाम चले गए, जहाँ से वे आए थे।

परीक्षित् देर तक मौन रहे। फिर इतना ही बोले, ”मुनिवर, अब मेरा वह काँटा निकल गया।” गंगा की लहर एक बार किनारे से टकरा कर लौट गई।

मन्थन

भागवत की राम-कथा धीमे स्वर में कही गई है, पर उसका एक अपना ढंग है।

वाल्मीकि की रामायण पराक्रम की कथा है, एक के बाद एक युद्ध, एक वीर का चढ़ता हुआ मार्ग।

भागवत की दृष्टि कहीं और टिकती है, राम के सहने पर। उनके एक-एक त्याग पर। उस चुप्पी पर जिसके साथ उन्होंने हर चोट को अपने भीतर उतार लिया।

पिता का वचन रखने को राज छोड़ देना। प्रजा की बात रखने को अपनी ही पत्नी को वन भेज देना। और अन्त में सब कुछ बाँट कर स्वयं अकेले रह जाना।

धर्म की रक्षा के साथ-साथ भागवत यह दिखाता है कि राम चुपचाप सहने का ढंग जी कर दिखा गए, बिना शिकायत के, बिना मन में कोई कड़वाहट पाले।

रावण को मार गिराना तो शूरता थी, और शूरमा बहुत हुए हैं। पर सीता के वन जाने के बाद भी उनके प्रति प्रेम को अक्षत रखना, यह करुणा की कोई और ही ऊँचाई थी।

साहित्यिक-संदर्भ

भागवत में राम-कथा नवम स्कन्ध, अध्याय दस-ग्यारह में संक्षेप से आती है। यह वाल्मीकि-रामायण की पूरी घटना-सूची नहीं, उसके भीतर बैठा एक भक्ति-केन्द्रित पठन है, जहाँ राम धर्मनिष्ठ राजा भर नहीं, साक्षात् अवतार हैं। ताड़का-वध, कैकेयी के वर और लव-कुश के विस्तृत प्रसंग वाल्मीकि की परम्परा के हैं; भागवत इन्हें नहीं दोहराता, और कुछ विवरण (जैसे विश्वामित्र-यज्ञ पर मारीच का वध, धनुष ढोने वाले तीन सौ वीर, परशुराम के गर्व का शमन, खर-दूषण-त्रिशिरा सहित चौदह हजार राक्षस) अपने ही ढंग से रखता है।

तुलसीदास के रामचरितमानस की अवधी राम-छवि इस भागवत-पाठ से अलग है। यह विभेद कि भागवत का राम दर्शन-योग्य अवतार है, आधुनिक राम-कथा-अध्ययन का एक प्रमुख विषय रहा है; फ़िलिप लुटगेन्डॉर्फ ने ‘द लाइफ़ ऑफ़ अ टेक्स्ट’ में इस पर विस्तार से लिखा है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

पूरी रामायण के लिए वाल्मीकि हैं। भागवत वही कथा एक मुट्ठी में रख देता है, केवल उसका सार, ताकि जिसके पास समय कम हो वह भी राम के सहने का मर्म एक बैठक में पा ले। आज, जब किसी के पास ठहरने को घड़ी-भर नहीं, यही संक्षेप सब में पास आ जाता है।