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व्यास की असन्तुष्टि

कथा 22 · भागवतम् की कथाएँ

व्यास की असन्तुष्टि

सब कुछ रच कर भी, भीतर एक सूनापन
स्कन्ध 1, अध्याय 4-5

गंगा की धारा उस सुबह बहुत धीमी बह रही थी, मानो वह भी कान लगाए हो। परीक्षित् देर तक उस जल को देखते रहे, फिर शुकदेव की ओर मुड़े।

”भगवन्, कल रात मैं सोचता रहा। यह भागवत जो आप मुझे सुना रहे हैं, यह आया कहाँ से? किसने इसे पहले-पहल रचा, और किस बेचैनी ने उसके हाथ में लेखनी थमाई? मेरे पास गिनती के छह दिन बचे हैं, और मैं उस आरम्भ को जान लेना चाहता हूँ जहाँ से यह अमृत फूटा।”

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। उनकी अँगुलियाँ घुटने पर एक लय में हिलीं, फिर रुक गईं। तब वे बोले।

”राजन्, यह कथा मेरे पिता की है। उसी पुरुष की, जिसने वेद को चार में बाँटा और जिसने यह सारा ग्रन्थ रचा जो अब आपके कानों में पड़ रहा है। पर पहले यह जान लीजिए कि जब उन्होंने वह सब रच लिया था, तब भी उनका हृदय सन्तुष्ट नहीं था।”


द्वापर का तीसरा युग था। पराशर के पुत्र, सत्यवती के गर्भ से जन्मे, श्रीहरि के ही एक अंश। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि युग ढल रहा है, धर्म की संकरता आ रही है, लोगों की स्मरण-शक्ति घट रही है, और एक अखण्ड वेद को कण्ठ में सँभाले रखना अब किसी के बस का नहीं रहा। तब उन्होंने वह काम किया जिसके कारण आगे की हर पीढ़ी उन्हें व्यास कहकर पुकारेगी, बाँटनेवाला।

Sage Vyasa, dark-complexioned ascetic with matted hair and beard in ochre robes, seated in a forest hermitage handing four bound palm-leaf Veda bundles to four disciples kneeling before him, labelled by posture as Paila, Jaimini, Vaishampayana and Sumantu, a fifth manuscript of Itihasa-Purana set aside for Romaharshana; rich painterly classical Indian color illustration, golden ashram light, no Mahabharata battle imagery

उन्होंने एक वेद को चार में बाँट दिया, ऋक्, यजुः, साम, अथर्व। और हर भाग एक शिष्य के हाथ सौंप दिया, जैसे कोई पिता अपने चार बेटों को घर का एक-एक कोना सौंप जाता है। ऋक् पैल को मिला, साम जैमिनि को, यजुः वैशम्पायन को, अथर्व सुमन्तु को, जिन्हें दारुणि भी कहते हैं। और इतिहास-पुराण, जिसे ज्ञानी पाँचवाँ वेद कहते हैं, उन्होंने रोमहर्षण को दिया, उसी सूत के पिता को जिसकी बानी से यह कथा आगे चलकर बहेगी। फिर इन ऋषियों ने अपनी-अपनी शाखाओं को और भी अनेक भागों में बाँट दिया, और शिष्य, प्रशिष्य के हाथ वेद की असंख्य शाखाएँ फैलती चली गईं।

Vyasa seated cross-legged at a low writing desk composing the Mahabharata on palm leaves, while around him gather attentive ordinary folk excluded from Vedic study, women and laborers listening with folded hands; warm compassionate scene, classical Indian color painting, soft amber tones, the sage's face tender and absorbed

फिर भी कुछ रह गया था। स्त्री, शूद्र, और जिनका जन्म तो द्विज का था पर जो वेद-पाठ से वंचित रह गए, इन्हें वेद-श्रवण का अधिकार नहीं था, और इसी से ये कल्याण के मार्ग से छूट जाते थे। व्यास से यह देखा न गया। उनके भीतर का करुण-वत्सल हृदय बोला, इनका भी कोई हाथ थामे। और उन्होंने महाभारत-इतिहास की रचना की, ताकि जो वेद की भाषा तक नहीं पहुँच सकते, वे एक कथा के सहारे अपने धर्म-कर्म को छू लें।

राजा, ऋषि, रण, नीति, मोक्ष, सब कुछ उसमें भर दिया। महाभारत के बहाने उन्होंने वेद के अर्थ को खोल दिया, जिससे स्त्री और शूद्र तक अपने-अपने धर्म को जान लें।

और तब, जब सब रच चुका, जब लेखनी रखने का समय आया, उनके भीतर वह उठा जिसका उन्हें नाम नहीं मिल रहा था।

Vyasa sitting alone on the pure bank of the Sarasvati river at dawn, the rising sun spreading red light across the rippling water, having just sipped water in achaman; a solitary clean meditation spot, yet his face shadowed with unrest; serene yet melancholic classical Indian color illustration, rose and gold sunrise palette

वे सरस्वती के पवित्र तट पर बैठे थे। सूर्य अभी-अभी जल के पार से उठ रहा था और उसकी लाली नदी पर बिखरी थी। एक एकान्त, शुचि स्थान, जहाँ उन्होंने जल का आचमन किया था और बैठ गए थे। पर उनका मन उस जल जैसा था जिस पर हवा एक पल को भी ठहरने नहीं देती।

ब्रह्मतेज से वे भरे हुए थे। यह वे जानते थे। उन्होंने निष्कपट भाव से ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का पालन किया था, वेद, गुरुजन और अग्नियों का सम्मान किया था, और उनकी आज्ञा का पालन किया था। और फिर भी हृदय एक कोने से अपूर्णकाम-सा पड़ा था, जैसे थाल सजा हो, सब व्यंजन परोसे हों, और बीच में एक पात्र अनछुआ रह गया हो।

उन्होंने अपने ही से, मन-ही-मन पूछा। ”मैंने निष्कपट भाव से व्रतों का पालन किया, वेद और गुरु का सम्मान किया। महाभारत के बहाने वेद का अर्थ तक खोल दिया, जिससे स्त्री और शूद्र भी अपना धर्म जान लें। यद्यपि मैं ब्रह्मतेज से सम्पन्न और समर्थ हूँ, फिर भी मेरा हृदय अपूर्णकाम-सा क्यों जान पड़ता है? कौन-सा पात्र है जो भरा नहीं?”

तब उनके भीतर एक उत्तर-सा कौंधा। अवश्य ही अब तक उन्होंने भगवान् को प्राप्त करानेवाले धर्मों का प्रायः निरूपण नहीं किया, और वे ही धर्म परमहंसों को और स्वयं भगवान् को प्रिय हैं। पर यह विचार पूरा खुले, उससे पहले ही कुछ और हुआ।

तभी हवा में वीणा का एक तार बोला।

दूर से, फिर पास से। नारद।

Vyasa rising suddenly to honor the divine sage Narada who arrives carrying a veena; Vyasa offers a seat and bows at Narada's feet with lowered eyes like a humble disciple; Narada radiant and fair with a tuft of hair, holding the veena, a faint knowing smile; riverbank dawn setting, glowing painterly classical Indian color art

वे यों ही आते थे, बिना ख़बर के, तीनों लोक नापते हुए, पर सदा ठीक उसी घड़ी जब किसी का भीतर सब से अधिक रिक्त होता। व्यास सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवताओं के द्वारा सम्मानित उस देवर्षि का विधिपूर्वक पूजन किया, आसन दिया, और चरणों में नमन किया। पर पूजन करते समय भी उनकी आँखें नीची थीं, जैसे कोई शिष्य गुरु के सामने खड़ा हो, न कि वह व्यास जिसने अभी-अभी वेद को चार में बाँटा था।

नारद आसन पर बैठे और मुसकरा दिए। यह उनकी आदत थी, बात कहने से पहले हलका मुसकरा देना, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि सामनेवाला क्या पूछने जा रहा है।

”पराशर-पुत्र,” उन्होंने कहा, ”आपका शरीर और मन, दोनों अपने-अपने कर्म से सन्तुष्ट हैं न? आपने जो यह महाभारत रचा, वह बड़ा ही अद्भुत है। उसमें धर्म आदि सभी पुरुषार्थ भरे हैं। सनातन ब्रह्मतत्त्व को भी आपने खूब विचारा और जान लिया। फिर भी, प्रभु, आप अकृतार्थ पुरुष के समान अपने विषय में शोक क्यों कर रहे हैं?”

व्यास ने सिर झुका लिया। ”देवर्षि, आपने मेरे विषय में जो कुछ कहा वह सब ठीक ही है। वैसा होने पर भी मेरा हृदय सन्तुष्ट नहीं। पता नहीं, इसका क्या कारण है। आपका ज्ञान अगाध है, आप तो साक्षात् ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं, समस्त गोपनीय रहस्यों को जानते हैं। आप ही बताइए, मुझमें कौन-सी कमी रह गई।”

नारद ने वीणा को धीरे से एक ओर टेक दिया। एक क्षण वे व्यास की आँखों में देखते रहे, उस तरह जैसे कोई वैद्य नाड़ी पर अँगुली रखकर रोग का नाम पहचानता है।

”आपने भगवान् के निर्मल यश का गान प्रायः नहीं किया,” वे बोले, और इस बार वे मुसकराए नहीं। ”आपने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सब पुरुषार्थों का निरूपण किया। पर जिससे यह सारा जगत् पवित्र होता है, उस वासुदेव की महिमा का गान वैसा नहीं हुआ। जिससे भगवान् सन्तुष्ट न हों, वह शास्त्र या ज्ञान अधूरा ही है।”

व्यास चुप रहे।

”व्यास, सुनिए,” नारद का स्वर अब और नरम हुआ, पर बात कठोर थी। ”जिस वाणी में भगवान् के यश का स्वर नहीं, वह चाहे रस से भरी हो, अलंकारों से सजी हो, छन्द में बँधी हो, वह उस स्थान के समान अपवित्र मानी जाती है जहाँ कौओं के लिए जूठन फेंकी जाती है। और जिस श्लोक में, भले उसकी रचना सुन्दर न हो, भगवान् का एक नाम भी आ जाए, वही पापों को धो डालता है। ब्रह्मधाम में विहार करनेवाले परमहंस भक्त उस गन्दे जल में कभी नहीं उतरते, जैसे मानसरोवर के कमल-वन में विहार करनेवाले हंस।”

व्यास के चेहरे पर एक छाया उतरी। उन्होंने जो रचा था, सब उनकी आँखों के सामने एक पल को गुज़र गया, और उस सबमें वह स्वर कहीं नहीं था।

”तो जो मैंने जोड़ा,” उन्होंने धीरे से कहा, ”वह कौओं की जूठन है?”

नारद ने उत्तर सीधे नहीं दिया। उन्होंने वीणा को फिर गोद में उठाया, उँगली से एक तार छुआ, और उसे बजने दिया, बहुत देर तक, जब तक वह स्वर अपने आप मौन में न डूब गया।

”मैं आपको अपनी ही कथा सुनाता हूँ,” वे बोले, ”अपने पिछले कल्प के, पूर्वजन्म की। तब मैं नारद नहीं था। तब मैं किसी का बेटा था, और वह कोई बड़ी माँ नहीं थी।”

Narada's past-life memory: a small humble servant boy, son of a maidservant in a household of Vedic brahmins, quietly serving a group of yogis during the four monsoon months, scrubbing vessels and carrying water, eyes downcast and devoted; rainy season hut, muddy paths outside, soft monsoon greys and warm lamplight; classical Indian color illustration

और नारद ने वह कथा कही। एक वेदवादी ब्राह्मणों के घर काम करनेवाली दासी का बालक। वर्षा के चार महीने जब बाहर कीचड़ और जल होता और राह बन्द हो जाती, तब कुछ योगी उसी एक स्थान पर चातुर्मास बिताने ठहरे थे। नन्हा-सा बालक उनकी सेवा में लगा दिया गया। वह बहुत कम बोलता, खेल-कूद से दूर रहता, जितेन्द्रिय था, बरतन माँजता, जल भरता, और आज्ञानुसार उन साधुओं की सेवा करता रहता। एक दिन, उनकी अनुमति लेकर, उसने उनके पात्र में बचा हुआ जूठा प्रसाद खा लिया। बस एक बार। और उसी एक कौर से, नारद ने कहा, उसके सारे पाप धुल गए। उसी जूठन से, जिसे लोग अपवित्र कहते हैं, उसका हृदय निर्मल हो उठा, और जैसा वे महात्मा भजन-पूजन करते थे, वैसी ही उस बालक की भी रुचि हो गई।

”उन महात्माओं की कृपा से,” नारद बोले, और उनका स्वर अब किसी दूर की चीज़ को छू रहा था, ”मैं प्रतिदिन उनके पास बैठकर श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ सुनता रहा। श्रद्धा से, एक-एक पद। और जाते समय उन दीनवत्सल महात्माओं ने मुझ पर कृपा करके वह गुह्यतम ज्ञान दिया जो स्वयं भगवान् ने उन्हें दिया था। उसी एक बीज से यह नारद उपजा है, व्यास। न उस दासी के घर का जूठा प्रसाद, न वह कथा, तो आज ब्रह्मा का यह पुत्र भी नहीं।”

व्यास ने यह सब सुना, बहुत ध्यान से, सिर झुकाए। और उस कथा के भीतर उन्हें वह ख़ाली पात्र मिल गया, जिसे वे नाम नहीं दे पा रहे थे। एक दासी के बेटे को जिस जूठन ने पावन कर दिया, वह व्यास के सारे ब्रह्मतेज से बड़ी थी, क्योंकि उसमें भगवान् का नाम घुला था। और वही नाम उनके सारे श्लोकों में से छूट गया था।

Narada standing with the veena slung over his shoulder, gently instructing the seated Vyasa to enter samadhi and remember the lilas of the Lord; Vyasa listening with bowed head; departure moment at the Sarasvati bank, the veena about to be played as Narada turns to leave; luminous painterly classical Indian color art, evening-gold light

नारद उठ खड़े हुए। उन्होंने वीणा को कन्धे पर डाला। ”अब बैठिए, व्यास। समस्त जीवों को बन्धन से मुक्त करने के लिए समाधि में उतरिए, इस बार उस अचिन्त्य-शक्ति भगवान् की लीलाओं का स्मरण करते हुए। आप पुरुषोत्तम के अंश हैं। आपकी दृष्टि अमोघ है। जो आपने अब तक नहीं देखा, वह आपको कोई बताएगा नहीं। आप स्वयं देखेंगे।”

वीणा का स्वर दूर होता गया, और एक क्षण आया जब वह बिलकुल सुनाई देना बन्द हो गया। व्यास उसी मौन में अकेले रह गए।

वे सरस्वती के तट पर फिर बैठ गए। पीठ सीधी, हाथ गोद में, हथेलियाँ ऊपर। उन्होंने आँखें मूँदीं।

इस बार मन नहीं भागा।

उन्होंने एक लम्बी साँस भीतर ली, और जैसे वह साँस छाती में उतरती गई, बाहर की आवाज़ें एक-एक कर पीछे छूटने लगीं। पहले पक्षी का बोलना दूर हुआ, फिर नदी का बहना, फिर अपनी ही धड़कन का स्वर। एक गहरा सन्नाटा भीतर खुला, उस तरह का सन्नाटा जो भरा हुआ होता है, ख़ाली नहीं। उस सन्नाटे में उनकी भक्ति-निर्मल दृष्टि उस ओर खुली, जिसका नारद ने संकेत किया था।

Vyasa in deep meditation on the riverbank, eyes closed, tears streaming, beholding in inner vision the supreme Purushottama Lord from whom the whole universe arises, abides and dissolves, and his own Maya by which beings forget the Lord; radiant blue divine form revealed within a halo of light beyond the silence; transcendent classical Indian color illustration, luminous gold and indigo

और वहाँ, उस गहरे मौन के पार, उन्हें वह पुरुषोत्तम दिखाई दिए जिनसे यह सारा विश्व प्रकट होता है, स्थिति पाता है, और लय को प्राप्त होता है। उन्होंने देखा कि वही परम पुरुष भगवान् इस सम्पूर्ण जगत् के रूप में हैं, और फिर भी इससे सर्वथा विलक्षण हैं। उन्होंने अपनी ही माया को देखा, उस माया को जिसके आश्रय यह जीव अपने को कर्ता और भोक्ता मानकर संसार में भटकता है, और जिसके बल से वह भगवान् को भूल जाता है।

व्यास के बन्द नेत्रों से जल बहने लगा। वे रोक नहीं पाए। उनकी समझ में आ गया कि वह ख़ाली पात्र किस अमृत के लिए तरस रहा था। जिस पुरुषोत्तम की लीला से जीव इस माया के पार जाता है, उसी का यश उन्होंने अपने ग्रन्थों में नहीं गाया था।

हर रूप उनकी भीतरी आँखों के आगे साँस ले रहा था, इतना पास कि हाथ बढ़ाकर छू लें। और छूने पर भी वह टूटता नहीं।

व्यास के होंठ काँपे। ”यह था,” उन्होंने अपने ही भीतर कहा, और स्वर रुँध गया। ”यह सब था, और मैंने नहीं गाया। मैंने धर्म और नीति का निरूपण तो किया, पर इस पुरुषोत्तम का वह यश जिससे हृदय प्रेम करता है, वह तो मैं छोड़ ही आया।”

देर तक वे यों ही बैठे रहे, आँखें मूँदे, आँसू बहते। फिर उन्होंने आँखें खोलीं। सूर्य अब ऊपर चढ़ आया था। नदी वैसी ही बह रही थी। पर वह ख़ाली पात्र भर चुका था।

उन्होंने लेखनी उठाई।

और श्रीहरि की पुण्यमयी कथा रची, उस पुरुषोत्तम का यश-कीर्तन, जिसका संकेत नारद दे गए थे। उन्होंने इसे पूरा किया, और फिर अपने पुत्र को, मुझे, इसे कण्ठस्थ कराया।

शुकदेव यहाँ एक पल रुके।

”राजन्, मैं जन्म से ही ऐसा था जिसे संसार से न कुछ लेना था न देना। न किसी वस्तु में रस, न किसी मुख में मोह। पर जब पिता ने यह कथा मेरे सामने गाई, तो मैं वहीं रुक गया। जो आत्माराम था, जिसकी कोई कामना न थी, वह भी इस एक कथा का बँधुआ हो गया। और राजन्, जो कथा मुझ-जैसे विरक्त को ठहरा गई, वही कथा आज आपके अन्तिम दिनों में आपके कानों में पड़ रही है।”


गंगा-तट पर परीक्षित् देर तक चुप रहे। उनका हाथ अनजाने में अपनी छाती पर जा टिका था, वहाँ जहाँ अब तक तक्षक का डर बैठा रहता था, और इस घड़ी वहाँ कुछ और था।

”भगवन्,” वे धीरे से बोले, ”तो वह सूनापन कोई रोग न था।”

शुकदेव ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा, और बहुत शान्त स्वर में कहा, ”एक दासी के बेटे को जिस जूठन ने तारा, और जिस ख़ालीपन ने व्यास से यह पुराण लिखवाया, राजन्, वे दोनों एक ही हाथ की उँगलियाँ हैं। जिस हृदय में वह प्यास उठे, समझिए वहाँ कोई पहले से बुला रहा है।”

परीक्षित् ने कुछ नहीं कहा। नदी पर सुबह की धूप काँप रही थी, और एक दिन और बीत चला था।

मन्थन

व्यास ने एक वेद को चार में बाँटा। हर भाग एक शिष्य को सौंपा, पैल को ऋक्, जैमिनि को साम, वैशम्पायन को यजुः, सुमन्तु को अथर्व, और रोमहर्षण को वह पाँचवाँ वेद, इतिहास-पुराण। फिर भी सरस्वती के तट पर एक सूर्योदय उन्हें ख़ाली छोड़ गया।

नारद ने उन्हें कोई सिद्धान्त नहीं दिया। उन्होंने एक दासी के बेटे की कथा सुनाई, और एक तार बजने दिया जब तक वह अपने आप मौन में न डूबा।

व्यास के पास सारा ब्रह्मतेज था। दासी के उस बालक के पास साधुओं के पात्र की एक जूठन थी, बस एक कौर।

और दोनों में से जो हृदय पहले भरा, वह किसका था?

साहित्यिक-संदर्भ

व्यास की असन्तुष्टि श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 4 और 5 में आती है। द्वापर में पराशर और सत्यवती से जन्मे व्यास एक वेद को चार में बाँटते हैं और शिष्यों को सौंपते हैं, पैल को ऋक्, जैमिनि को साम, वैशम्पायन को यजुः, सुमन्तु (दारुणि) को अथर्व, और रोमहर्षण को इतिहास-पुराण, जिसे पाँचवाँ वेद कहा गया है (1.4.20-22)। स्त्री, शूद्र और वेद से वंचित द्विजों के कल्याण के लिए वे महाभारत रचते हैं, फिर भी सरस्वती-तट पर उनका हृदय सन्तुष्ट नहीं होता।

वीणा लिए नारद आते हैं और उस अधूरेपन पर उँगली रखते हैं (1.5)। जिस वाणी में हरि का यश न हो, वह कौओं की जूठन के स्थान-सी अपवित्र है, यह उपमा वहीं से है। फिर नारद अपने पूर्वजन्म की कथा कहते हैं, एक दासी के बालक की, जो साधुओं की जूठन पाकर पावन हुआ और आगे ब्रह्मा का मानस-पुत्र हुआ। अन्त में वे व्यास को समाधि में भगवान् की लीलाओं के स्मरण का आदेश देते हैं (1.5.13), जिसी से आगे भागवत का बीज पड़ता है।

जिस घड़ी से यह सब फूटा

एक सूर्योदय। सरस्वती का तट। वेद को चार में बाँट चुका पुरुष, जिसके पास सब था, आँखें मूँदे बैठा है और भीतर एक कोना ख़ाली पड़ा है। दूर से वीणा का एक तार आता है, और उसी रिक्त कोने में आ टिकता है। जो ग्रन्थ आगे चलकर मुक्तों को भी बाँधेगा, वह यहीं से, इसी एक घड़ी से, जन्म लेने को है।