व्यास की असन्तुष्टि

कथा 22 · भागवतम् की कथाएँ

व्यास की असन्तुष्टि

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स्कन्ध 1, अध्याय 4-6

व्यासजी के पास सब कुछ था।

उन्होंने वेदों को चार हिस्सों में बाँटा, ऋग, यजुष, साम, अथर्व। उन्होंने पुराण लिखे। महाभारत लिखा, जो इतिहास का सबसे बड़ा काव्य है। ब्रह्मसूत्र लिखे। उन्होंने मूलतः पूरी हिन्दू-परंपरा को structure दिया।

वो सरस्वती नदी के किनारे बैठे थे। एक छोटी कुटिया में। महाभारत हाल ही में ख़त्म हुआ था।

और उनके मन में एक खालीपन था।

बहुत साधारण खालीपन नहीं। एक तरह की restlessness। जैसे कुछ अधूरा हो।

वो सोच रहे थे, ”मैंने इतना लिखा। सब को धर्म सिखाया। राजाओं को राजनीति। ब्राह्मणों को कर्म-कांड। ऋषियों को दर्शन। फिर भी, मेरे अंदर यह क्या है?”

उन्होंने आँखें मूँदीं। ध्यान में जाने की कोशिश की। पर मन शान्त नहीं हुआ।

तभी एक तानपूरा की हलकी सी आवाज़ आई।

नारद।

नारद हमेशा ऐसे ही आते थे। बिना announce के। पर हमेशा सही वक़्त पर।

व्यासजी ने उठकर उनका सत्कार किया।

”नारद, आपके सामने मैं एक खुली किताब हूँ। आप मुझे देखो।”

नारद ने एक पल को व्यास को देखा। फिर हाथ में अपना तानपूरा रखा।

”व्यास, तू ने सब लिखा। सच है। पर एक बात की कमी है।”

”क्या?”

”तू ने भगवान की लीला नहीं लिखी।”

व्यासजी ठिठक गए।

”क्या मतलब?”

”तेरे लिखे हुए में धर्म है। नीति है। दर्शन है। कर्म-कांड है। पर एक बात नहीं है, भगवान का व्यक्तित्व। उनकी कथा। उनकी लीला।”

”हाँ, गीता है। पर वो भी एक upadesh है। एक argument। एक philosophy।”

”वो जो भक्तों को चाहिए, वो तू ने नहीं दिया। एक ऐसी कथा जिसमें भगवान चलें, बोलें, हँसें, रोएँ, खेलें। जिसमें वो दूर का concept न रहें, पास के दोस्त बन जाएँ।”

व्यासजी सोचने लगे।

नारद ने आगे कहा। ”मैं तुझे एक कथा सुनाता हूँ। मेरे अपने पिछले जन्म की।”

और नारद ने वो कथा कही जो पिछले अध्याय में है। एक दासी के बच्चे की कथा। साधुओं के जूठन की कथा। फिर एक ब्रह्मा-मानस-पुत्र की।

व्यास ने सुना। ध्यान से। और उसमें उन्हें कुछ मिला।

”नारद, मैं समझा।”

”क्या?”

”मेरे लेखन में argument था। मगर प्रेम नहीं था। मैंने सब को क्या करना है यह बताया। पर किसी को क्यों करना है, यह नहीं।”

”और क्यों का जवाब philosophy नहीं देती। एक कथा देती है। प्रेम देता है।”

”हाँ,” नारद ने कहा। ”अब बैठ। और ध्यान कर। भगवान ख़ुद तुझे यह कथा दिखाएँगे।”

तदप्यनुक्तं चित्रोक्तं कथञ्चन भाषितम् ।
तदाह नारदः शुश्रूषोः सर्वथा वेदितं तव ॥

नारद ने व्यास से कहा, जो तू ने नहीं कहा, मगर कहना चाहिए था, वो भगवान की लीला है। बिना उसके तेरा सब लेखन अधूरा है।

व्यास सरस्वती के किनारे बैठ गए। ध्यान में। बहुत गहराई में।

और तब उनके सामने कुछ खुलने लगा।

उन्हें कृष्ण दिखे। बच्चा। माखन चुराते हुए। यशोदा के पीछे भागते हुए। गोपियों के साथ बाँसुरी बजाते हुए। अर्जुन को गीता सुनाते हुए। सुदामा को गले लगाते हुए।

हर एक scene। हर एक पल। बहुत vivid।

व्यास के मन में आँसू थे। यह सब था, इतना सुंदर, और मैंने नहीं लिखा। मैंने महाभारत में कृष्ण को सिर्फ़ राजनीति में दिखाया। उनकी असली कथा छूट गई।”

उन्होंने आँखें खोलीं।

”अब मैं लिखूँगा।”

और तब उन्होंने भागवतम् लिखना शुरू किया।

18,000 श्लोक। बारह स्कन्ध। हर एक में एक नया रूप।

व्यास ने इसे ख़त्म किया। और अपने बेटे शुकदेव को सिखाया।

और शुकदेव, जो जन्म से ही मुक्त थे, इसे सुनकर इतने moved हुए कि उन्होंने अपना सब छोड़ा और इस text के साथ रहे।

इसलिए परंपरा कहती है, अगर शुकदेव जैसा मुक्त भी भागवतम् से खींचा गया, तो हम क्या?

मन्थन

व्यास की कथा एक writer की कथा है। एक creator की।

उन्होंने सब कुछ बनाया जो technically perfect था। फिर भी संतुष्ट नहीं हुए।

क्यों? क्योंकि perfect नहीं, alive चाहिए था।

नारद ने यह बताया, ”तू ने logic लिखी। प्रेम नहीं।”

हर वो काम जो हम करते हैं, वो दो level पर हो सकता है। एक technical level, जहाँ सब ठीक है, सब सही है, मगर कुछ missing है। एक live level, जहाँ अंदर से ख़ुशी मिलती है, और देखने वाले को भी।

व्यास के पास सब था। पर जब तक उन्होंने भागवतम् नहीं लिखा, उनका काम अधूरा था।

हमारी ज़िंदगी में भी कई बार ऐसा होता है। हम सब checkboxes tick कर देते हैं, मगर कुछ छूट जाता है। वो ”कुछ” अक्सर वो होता है जो रोचक होता है, जो प्रेम-भरा होता है, जो हमारी असली feeling को express करता है।

व्यास का खालीपन कोई कमज़ोरी नहीं था। यह एक creator का wisdom था कि कुछ बाक़ी है।