Lulla Family

पूतना

कथा 10 · भागवतम् की कथाएँ

पूतना

जो मारने आई थी, उसे माँ का दर्जा मिला
स्कन्ध 10, अध्याय 6

गंगा का जल उस सुबह धीमे बह रहा था, जैसे वह भी सुनने को रुक गया हो। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, अभी आपने कंस के भय की बात कही। एक बात मेरे भीतर अटकी रह गई है। मैंने अपने पूरे जीवन में सुना है कि जो भगवान् को मारने आता है, उसे दण्ड मिलता है। पर क्या ऐसा कोई हुआ है, जो छल से, ज़हर ले के पास आया हो, और फिर भी भगवान् ने उसे अपना लिया हो?”

शुकदेव मुस्कुराए। उनकी आवाज़ धीमी हुई, जैसे कोई बहुत कोमल चीज़ छूने जा रहा हो। ”राजन्, ऐसा एक हुआ था। एक राक्षसी। वह बच्चे को मारने आई थी, और उसे वह स्थान मिला जो माँओं को मिलता है। सुनिए।”

कंस ने एक राक्षसी को बुलाया। नाम था पूतना।

वह कोई मामूली राक्षसी न थी। रूप बदलना उसे आता था, और जिस रूप में आती, उसमें ऐसी सुंदर लगती कि देखने वाला ठगा रह जाता। पर उसकी छाती में ज़हर भरा था। जो बच्चा उसका दूध पीता, उसी घड़ी प्राण छोड़ देता।

Painterly classical-Indian color scene inside King Kamsa's Mathura palace hall: the crowned, dark-bearded tyrant Kamsa seated on a jeweled throne, leaning forward and commanding the demoness Putana who stands before him in fearsome rakshasi form; he points outward toward distant villages and cowherd hamlets, ordering her to seek out every small child; tense torch-lit interior, rich royal reds and golds.

कंस ने उससे कहा, ”नगर हो, गाँव हो, या अहीरों की बस्ती, जहाँ कहीं कोई छोटा बच्चा मिले, उसे ढूँढिए। हर एक को अपना दूध पिलाइए, और एक-एक को मार डालिए।”

पूतना मान गई। यह काम उसके लिए नया न था। कितने ही घरों के पालने उसने सूने कर दिए थे।

उसने अपना रूप बदला।

एक नौजवान औरत खड़ी थी, सोने के गहनों में, रेशम की साड़ी में। माथे पर बिंदी, हाथों में चूड़ियाँ, बालों में मोगरे के फूल जिनकी ख़ुशबू दूर तक जाती।

Painterly classical-Indian color scene of Putana now disguised as a ravishingly beautiful young woman in a silk sari, gold jewelry, bindi, glass bangles and white mogra jasmine flowers in her hair, holding a lotus, descending from the sky-path near Nanda's Gokul and walking on foot into the cowherd village at dusk; warm dust still rising from returning cows; awed gopis pausing to stare as if Lakshmi herself had come; lush green pastoral Vraj backdrop, golden evening light.

वह आकाश-मार्ग से उतरी, नन्द-बाबा के गोकुल के पास, और फिर पैदल चलती हुई गाँव में आई। उसके पैरों के नीचे की धूल अभी गायों के लौटने से गरम थी।

गोकुल की औरतें उसे देखकर ठिठक गईं। कौन है यह नई औरत, इतनी सुंदर? जब वह हाथ में कमल लिए चली आ रही थी, तो गोपियों को लगा, मानो स्वयं लक्ष्मीजी अपने पति का दर्शन करने आ रही हों।

पूतना बालकों के लिए तो काल का दूसरा रूप थी। इधर-उधर बच्चों को ढूँढ़ती हुई, अनायास ही वह नन्द-बाबा के घर में जा घुसी।

भीतर पालने में कृष्ण लेटे थे, कुछ ही दिनों के नन्हे, आँखें मूँदे। पर ये आँखें मुँदी हुई नहीं थीं। चर-अचर सबके आत्मा भगवान् ने उसी क्षण जान लिया कि यह वही बच्चों को मार डालने वाली पूतना है, और जैसे राख की ढेरी में आग अपने तेज को छिपा लेती है, वैसे ही उन्होंने अपना प्रचण्ड तेज भीतर समेट लिया, आँखें मूँद लीं।

रोहिणी भी वहीं थीं, वसुदेव की दूसरी पत्नी, बलराम की माँ, और यशोदा भी। दोनों ने उस रूपवती राक्षसी को घर के भीतर आई देखा, पर उसकी सौन्दर्य-प्रभा से ऐसी हतप्रभ रह गईं कि कोई रोक-टोक न कर सकीं, चुपचाप खड़ी देखती रहीं।

पूतना ने कृष्ण को गोद में उठाया।

Painterly classical-Indian color scene inside Nanda's home: the disguised beautiful Putana seated, cradling the newborn infant Krishna (blue-hued, only a few days old, peaceful with eyes gently closed) in her lap and fearlessly offering her poison-filled breast to his tiny mouth as he begins to suckle; Yashoda and Rohini stand nearby spellbound and unable to intervene; soft domestic interior with cradle, lamplight, earthen pots; sense of hidden danger beneath tender appearance.

उसकी छाती में वह भयंकर विष भरा था, जिसे कोई पचा न सके। उसी ज़हर-भरे स्तन को उसने निडर होकर कृष्ण के मुँह में दे दिया।

कृष्ण ने अपने नन्हे होंठ उसकी छाती पर रखे और दूध पीने लगे।

पूतना का इरादा था, ज़हर देकर इस बच्चे को मार डालना।

कृष्ण ने कुछ और ही किया। उन्होंने क्रोध को अपना साथी बनाया, और दोनों हाथों से उसके स्तनों को ज़ोर से दबाकर, दूध के साथ-साथ, धीरे-धीरे उसके प्राण भी पीने शुरू कर दिए।

पूतना के प्राणों के सारे मर्म-स्थान फटने लगे। वह पुकार उठी, ”अरे छोड़ दीजिए, छोड़ दीजिए, अब बस कीजिए!” वह बार-बार अपने हाथ-पाँव पटक-पटककर रोने लगी। उसकी आँखें उलट गईं, और सारा बदन पसीने से लथपथ हो गया।

उसका रूप दरकने लगा। नौजवान औरत का चेहरा झड़ता गया, और भीतर से उसकी असली देह उभर आई।

एक विशाल राक्षसी, शरीर पहाड़ सा, बाल जंगल से, मुँह में लंबे-लंबे दाँत, हाथ-पाँव अकड़े हुए।

उसकी चिल्लाहट का वेग ऐसा भयंकर था कि उसके प्रभाव से पहाड़ों समेत पृथ्वी और ग्रहों समेत अन्तरिक्ष डगमगा उठा। सातों पाताल और दिशाएँ गूँज उठीं। बहुत-से लोग वज्रपात की आशंका से ज़मीन पर गिर पड़े।

उसने भागना चाहा। पर कृष्ण उसके सीने से ऐसे लगे थे कि छुड़ाए न छूटें। उसने हज़ार ज़ोर लगाया, वे टस से मस न हुए।

Painterly classical-Indian color scene of Putana reverted to her colossal true rakshasi form, body like a mountain with wild matted hair, long tusk-like fangs and stiff limbs, staggering and crashing down at a cowshed on the outskirts of Vraj like Vritra felled by Indra's thunderbolt; her falling body crushes trees across a wide stretch; tiny infant Krishna clings unshaken and smiling at her breast; terrified villagers fallen to the ground; dramatic dawn sky, dust and uprooted trees.

दौड़ती-लड़खड़ाती वह व्रज के बाहर एक गोशाला तक पहुँची, और जैसे इन्द्र के वज्र से घायल होकर वृत्रासुर गिर पड़ा था, वैसे ही वहीं ढह गई।

देह इतनी बड़ी थी कि गिरते-गिरते उसने छः कोस के भीतर के पेड़ों को कुचल डाला। उसका मुँह हलके के समान तीखी और भयंकर दाढ़ों से भरा था, नथुने पहाड़ की गुफा से, स्तन पहाड़ से गिरी चट्टानों से, और लाल-लाल बाल चारों ओर बिखरे हुए।

और कृष्ण? वे अब भी उसी छाती पर थे, दूध पीते हुए, मुस्कुराते हुए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

जब उसके आख़िरी प्राण भी पी लिए, तब जाकर उन्होंने मुँह हटाया, उसी मीठी हँसी के साथ।

गाँव वाले हाँफते हुए दौड़े आए।

”क्या हुआ?” ”यह क्या बला है?” ”हमारा लाला कहाँ है?”

Painterly classical-Indian color scene: the breathless cowherd villagers of Gokul rush in and discover the tiny infant Krishna playing fearlessly, laughing and looking about, upon the chest of the gigantic slain demoness Putana, as if seated in someone's lap; Yashoda and Rohini lunge forward ahead of the crowd to snatch and clutch the child to their breasts; in the background gopis perform protective rites with a cow's tail, cow-dung and cow-urine; relief and wonder on the faces, morning light over the massive fallen body.

और उन्होंने देखा, उस पहाड़ सी राक्षसी की छाती पर एक नन्हा बच्चा निडर होकर खेल रहा है, हँस रहा है, इधर-उधर ताक रहा है, जैसे किसी की गोद में बैठा हो।

यशोदा और रोहिणी सब से आगे दौड़ीं। बच्चे को झपटकर उठाया, सीने से ऐसे भींचा जैसे फिर कभी न छोड़ेंगी, और उनकी साँस तब जाकर लौटी। फिर गोपियों ने गाय की पूँछ घुमाने आदि उपायों से, गोबर और गोमूत्र से, और भगवान् के नामों का न्यास करके बालक की हर ओर से रक्षा की।

नंद बाबा और बाक़ी ग्वालों ने पूतना की देह के टुकड़े कुल्हाड़ियों से किए, उन्हें दूर ले जाकर लकड़ियों के ढेर पर रखकर जला दिया।

पर जब वह देह जल रही थी, उसमें से जो धुआँ उठा, उसमें अगर की सी सुगन्ध थी, जो दूर-दूर तक हवा में फैल गई।

ऐसा क्यों?

क्योंकि उस पूरे प्रसंग में एक बात ऐसी घटी थी, जिस पर किसी की नज़र न पड़ी थी।

पूतना ज़हर ले के आई थी, यह सच है। पर उसने अपनी छाती से दूध भी पिलाया था, ठीक एक माँ की तरह।

और कृष्ण ने उसके साथ एक माँ का सा बरताव किया। उसकी छाती से दूध पीते समय, उन्होंने उसे माँ का ही दर्जा दे दिया।

और जिस माँ ने श्रीहरि को अपनी छाती से लगाया हो, उसकी विदाई एक माँ की विदाई होती है। अगर की वही सुगन्ध उसी की गवाही दे रही थी।

कथा कहती है, उसे मातृ-गति मिली। माताओं को मिलने वाली वही मुक्ति, वही ऊँचा स्थान उसे मिला जो श्रीहरि को दूध पिलाने वाली माँओं को मिलता है।

इरादा उसका पाप का था, पर उस इरादे के नीचे एक छोटी सी सच्ची बात दबी थी, स्तनपान। कृष्ण ने उसी छोटी सी बात को थाम लिया।

ज़हर, हत्या का इरादा, वह भयावह राक्षसी रूप, इन सबको उन्होंने अनदेखा कर दिया।

मन्थन

परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, यह तो मेरी समझ से परे है। जो मारने आई, उसे माँओं का स्थान? मैंने तो आज तक यही जाना था कि कर्म का फल इरादे से तय होता है।”

शुकदेव ने धीमे से कहा, ”राजन्, एक राक्षसी बच्चे को मारने आए और बच्चा उसे मार दे, इसमें अचरज क्या। अचरज इसमें है कि मरते-मरते उसे वह गति मिली जो प्रेम से कृष्ण को पालने वाली माँओं को मिलती है।”

”पर किसलिए, मुनिवर?”

”क्योंकि श्रीहरि इरादे के नीचे की उस एक सच्ची बात को भी देख लेते हैं। पूतना का मन तो विष से भरा था, पर उसने अपनी छाती कृष्ण के मुँह से लगाई, क्षण भर को सही, माँ के ही रूप में लगाई। उसी एक क्षण को भगवान् ने थाम लिया, और बाक़ी सब छोड़ दिया।”

परीक्षित् की आँखें भर आने को थीं। शुकदेव ने आगे कहा, ”राजन्, किसी जीव के भीतर जो एक सच्ची बात कहीं दबी पड़ी रहती है, श्रीहरि उसी को ढूँढ़ निकालते हैं, और उसी के सहारे उसे पार उतार देते हैं।”

”और राजन्,” उन्होंने जोड़ा, ”उसका दूध तो ज़हरीला था, पर पीने वाला वह था जो हर विष को अमृत कर देता है। जो भी अपने भीतर का ज़हर, डर का, क्रोध का, ईर्ष्या का, सच्चे मन से उन्हें सौंप देता है, उसके लौटते-लौटते वही ज़हर अमृत बन जाता है।”

गंगा का जल उसी धीमी चाल से बहता रहा। परीक्षित् ने हाथ बढ़ाकर उसमें उँगलियाँ डुबो दीं, और देर तक उसी बहते जल को बहते देखते रहे, जिसकी सतह पर सुबह की रोशनी काँप रही थी।

साहित्यिक-संदर्भ

पूतना-प्रसंग श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 6 में है। केन्द्रीय श्लोक 10.6.35 कहता है कि मारने के इरादे से ही सही, अपना स्तन देकर पूतना सद्गति को प्राप्त हुई। उसके पूर्वजन्म की जो कथाएँ अन्यत्र मिलती हैं, वे इस प्रसंग का अंग नहीं; यहाँ कथा उतनी ही है जितनी शुकदेव परीक्षित् को सुनाते हैं।

दर्शन-दृष्टि

इस कथा में एक ही छाती से दो धाराएँ बहती हैं, विष की और दूध की। जो विष देने आई थी, उसी के स्तन से, उसी क्षण में, उसकी मुक्ति का मार्ग खुल गया। पाप अपनी जगह सारा का सारा बना रहा; उस पर भगवान् का स्पर्श पड़ा, और उतने से ही सब बदल गया।

शत्रु का बैर भी जब उन तक पहुँचता है, तो वहाँ पहुँचकर बदल जाता है। पूतना के साथ जो हुआ, वही आगे कंस, शिशुपाल और हिरण्यकशिपु के साथ अपने-अपने ढंग से होगा। बैर से भी जो उन्हें बिना पल भर रुके स्मरण करता है, वह भी अन्ततः उन्हीं में मिल जाता है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

कंस ने पूतना को भेजा था नन्हे कृष्ण को विष-भरे स्तन से मारने। उस बच्चे ने उसके प्राण भी लिए, और उसे माँओं की गति भी दी। जो छल और बैर लेकर श्रीहरि के पास पहुँचता है, वह वहाँ पहुँचकर ही पिघल जाता है, और बैर तक उन्हीं में जा मिलता है।