पूतना
कंस ने एक राक्षसी को बुलाया। नाम था पूतना।
वो साधारण राक्षसी नहीं थी। उसकी एक specialty थी। वो रूप बदल सकती थी, और जिस रूप में होती, उसमें परम सुंदर लगती। पर उसकी छाती में ज़हर था। जो बच्चा उसका दूध पीता, तुरंत मर जाता।
कंस ने उसे बताया, ”गोकुल जा। जो भी बच्चा छह दिन से छह महीने का हो, उसे ढूँढ। और हर एक को अपना दूध पिला। ख़ास तौर पर, यशोदा का जो बच्चा है।”
पूतना मान गई। उसे यह काम पहले भी मिल चुके थे। उसने कई बच्चे मारे थे।
उसने अपना रूप बदला।
एक सुंदर युवती। सोने के गहने पहने। रेशम की साड़ी। माथे पर बिंदी। हाथों में चूड़ियाँ। बालों में मोगरे के फूल।
वो आसमान से उतरी, गोकुल के पास। पैदल चलते हुए गाँव में आई।
गोकुल की औरतें उसे देखकर हैरान। कौन है यह नई औरत? इतनी सुंदर। शायद कोई राजकुमारी।
पूतना ने मुस्कुराकर पूछा, ”यशोदा का घर कहाँ है?”
एक औरत ने उसे रास्ता दिखाया।
पूतना यशोदा के दरवाज़े पर पहुँची। यशोदा बाहर आई।
पूतना ने अपनी sweet आवाज़ में कहा, ”बहन, मैं दूर से आई हूँ। तुम्हारे नए-नवेले बच्चे के बारे में सुना। मेरी इच्छा थी एक बार उसे देख लूँ, और थोड़ा सा अपना दूध पिला दूँ। मेरा अपना दूध बहुत pious माना जाता है। आओगी?”
यशोदा सरल थी। उसे शक नहीं हुआ। एक sweet-दिखने वाली औरत, क्या ख़तरा होगा?
रोहिणी, जो वसुदेव की दूसरी पत्नी थी और बलराम की माँ, वो वहीं थी। उसको भी कुछ नहीं लगा।
”अंदर आओ।”
पूतना अंदर गई। कृष्ण पालने में था। एक छोटा सा बच्चा। कुछ महीने का।
उसने उसे उठाया।
पर तभी कुछ हुआ।
जैसे ही उसने बच्चे को उठाया, उसे एक हलकी सी uneasiness हुई। यह बच्चा कुछ और था। उसने अपने ज़हरीले दूध की तरफ़ देखा। पर अब लौटना नहीं था।
उसने बच्चे को छाती से लगाया।
कृष्ण ने अपने छोटे होंठ उसकी छाती पर रखे। दूध पीने लगा।
पूतना का इरादा था ज़हर देकर मारना।
पर कृष्ण ने कुछ और किया।
उसने दूध के साथ-साथ, धीरे-धीरे, पूतना के प्राण भी चूस लिए।
सूर्यकान्ते यथा ज्योतिः सहसैव विनिर्गतम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.6.10 का भाव)
कृष्ण ने उसके दूध के साथ-साथ उसके प्राण भी चूस लिए, जैसे सूर्यकान्त मणि से एक झटके में पूरा प्रकाश निकल जाता है।
पूतना ने पहले एक हलकी सी uneasiness महसूस की। फिर weakness। फिर उसके पूरे शरीर में दर्द शुरू हुआ।
उसका रूप बदलने लगा। सुंदर नौजवान औरत का रूप गिरने लगा। उसकी असली देह बाहर आने लगी।
एक विशाल राक्षसी। शरीर पहाड़ जैसा। बाल जंगल जैसे। मुँह में बड़े-बड़े दाँत। हाथ-पाँव लंबे, सख़्त।
वो दर्द से चिल्लाई। ज़ोर से। उसकी चीख इतनी थी कि पास के पेड़ हिल गए। गोकुल के घरों के दरवाज़े खुल गए।
वो भागने की कोशिश की। पर कृष्ण उसके सीने से चिपके थे। उसने उन्हें छोड़ने की कोशिश की, मगर वो टस से मस नहीं हुए।
वो गाँव के बाहर पहुँची। एक बड़े मैदान में। और वहाँ गिर पड़ी।
उसकी देह विशाल थी, इतनी कि उसके गिरने से कई पेड़ नीचे दबे। पास के झोपड़े टूट गए।
और कृष्ण? वो अभी भी उसकी छाती पर। दूध पीते हुए। मुस्कुराते हुए।
जब उसके आख़िरी प्राण चूस लिए, तब उन्होंने मुँह हटाया। मुस्कान के साथ।
गाँव वाले भागकर आए।
”क्या हुआ?” ”यह क्या है?” ”हमारा बच्चा कहाँ?”
उन्होंने देखा कि उस विशाल राक्षसी की छाती पर एक छोटा सा बच्चा बैठा है, मुस्कुरा रहा है, चारों ओर देख रहा है।
यशोदा भागकर आई। बच्चे को उठाया। उसे कस के गले लगाया।
नंद बाबा और बाक़ी ग्वालों ने पूतना की देह को टुकड़ों में काटा। उसे एक बड़े यज्ञ-अग्नि में जलाया, ताकि उसकी राख से कोई और शाप पैदा न हो।
जब वो जल रही थी, तो उसके शरीर से एक अद्भुत खुशबू आई। चन्दन-जैसी।
क्यों?
क्योंकि एक चीज़ हुई थी, जो किसी ने notice नहीं की थी।
पूतना ने ज़हर दिया था, यह सही है। पर उसने स्तनपान भी कराया था। एक माँ की तरह।
और कृष्ण उसे एक माँ की तरह treat किया। उसकी छाती से दूध पीते वक़्त उन्होंने उसे ”माँ” का दर्जा दिया।
जब वो मरी, तो वो किसी राक्षसी की मृत्यु नहीं थी। वो कृष्ण की एक माँ की मृत्यु थी।
और कथा कहती है, उसे ”मातृ-गति” मिली। यानी, माताओं की मुक्ति। वो उस दर्जे पर पहुँची जहाँ देवकी और यशोदा थीं।
क्यों? क्योंकि intent पाप था, मगर action में एक छोटी सी positive चीज़ थी, स्तनपान। और कृष्ण ने सिर्फ़ उस छोटी सी चीज़ को counted।
बाक़ी सब, ज़हर, हत्या का इरादा, राक्षसी रूप, सब को उन्होंने नज़रअंदाज़ किया।
पूतना की कथा भागवतम् के सबसे अनोखे moments में से है।
एक राक्षसी आती है बच्चे को मारने। बच्चा उसे मारता है। यह तो उम्मीद के अनुसार है।
Unexpected यह है कि कथा के अंत में, मरते-मरते, उसे मातृ-गति मिलती है। यानी वो उन माताओं के साथ है जिन्होंने प्रेम से कृष्ण को पाला।
क्यों? क्योंकि भागवतम् कह रहा है कि भगवान intent और action दोनों को देखते हैं। पूतना का intent पाप था, पर action में एक छोटी सी positive चीज़ थी, उसने अपनी छाती से कृष्ण को दूध पिलाया। बच्चे को pose किया। चाहे ज़हरीला हो, चाहे fake, पर उस moment में वो ”माँ” की posture में थी।
कृष्ण ने सिर्फ़ उस छोटी सी positive को count किया। बाक़ी सब को नज़रअंदाज़ कर दिया।
यह एक radical theology है। हम सब अपने आप को अपने worst intentions से judge करते हैं। और दूसरों को भी। पर भागवतम् कह रहा है, भगवान आपकी best moment की posture को देखते हैं, और उसी पर आपको measure करते हैं।
एक और बात। पूतना का दूध ज़हरीला था। पर पीने वाला कौन था? वो जो हर ज़हर को अमृत में बदल देता है। तो हमारा ज़हर हम सब रोज़ ले के आते हैं। डर का, ग़ुस्से का, ईर्ष्या का। पर अगर हम उसे सच में अर्पण कर दें, तो वो ज़हर हमारे return आते-आते अमृत हो चुका होता है।