वराह अवतार
बहुत पहले की बात है। शायद कल्प की शुरुआत।
ब्रह्मा ने सृष्टि शुरू की थी। पहले देव, फिर ऋषि। फिर वो पृथ्वी को बनाने वाले थे।
तभी एक राक्षस उठा।
नाम था हिरण्याक्ष। हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई। एक पुराने शाप से जन्मा।
वो बहुत powerful था। और उसका एक बड़ा hobby था, हर चीज़ चुराना।
उसने पृथ्वी देखी। ”यह कितनी सुंदर है। मेरी हो जाए।”
और उसने पृथ्वी को उठाया। एक चटाई की तरह रोल किया। और गहरे समुद्र के नीचे ले गया।
वहाँ उसने पृथ्वी को छुपाया। एक deep ocean cavity में।
अब पृथ्वी कहीं नहीं। सूरज की रोशनी पानी पर ही पड़ती थी।
बाक़ी सृष्टि रुक गई। बिना पृथ्वी के, कुछ नहीं हो सकता था। पेड़ नहीं, जीव नहीं, मनुष्य नहीं।
ब्रह्मा देख रहे थे। उन्हें यह बात पता चली।
वो विष्णु के पास गए।
”प्रभु! हिरण्याक्ष ने पृथ्वी चुरा ली। अब क्या करें?”
विष्णु ने सोचा। ”इस राक्षस को मारना होगा। और पृथ्वी को बाहर निकालना होगा। पर पानी के नीचे जाने के लिए कोई form चाहिए।”
उन्होंने एक अद्भुत काम किया।
वो ब्रह्मा की नाक से छींक के रूप में निकले।
पहले एक छोटे सूअर के रूप में। अंगूठे के size के।
ब्रह्मा देख रहे थे। यह क्या है?
वो सूअर बढ़ने लगा। हाथी जैसा। पहाड़ जैसा। एक विशाल पर्वत जैसा।
उद्धरन् यत् पुरा निमग्नां पृथिवीं वराहरूपवान् ॥
वही महाविष्णु, जिनकी शक्ति अप्रमेय है, अपनी ही रची हुई पृथ्वी को बाहर लाने के लिए वराह-रूप बने।
एक विशाल वराह। काले बाल। दो विशाल दाँत। चमकती आँखें।
उसने एक ज़ोरदार गर्जन किया। पूरा ब्रह्मांड हिल गया।
फिर वो समुद्र में कूदा।
पानी एक तरफ़ बँट गया। वराह तेज़ी से नीचे उतरा।
गहरे, गहरे। जब तक उसे पृथ्वी नहीं मिली।
और वहाँ उसके सामने हिरण्याक्ष खड़ा था।
”कौन है तू, बकवास सूअर?”
”मैं? तुझे पृथ्वी वापस लेने आया।”
”हाहा! तू एक सूअर। तू क्या मुझसे लड़ेगा?”
लड़ाई शुरू हुई।
पानी के नीचे। दो विशाल forms। एक सूअर, एक राक्षस।
वो लड़ाई हज़ार साल चली। पुराण कहते हैं।
हर पल, हर आक्रमण। हिरण्याक्ष के पास सब शस्त्र थे। मगर वराह के पास सिर्फ़ दाँत और thr शक्ति।
अंत में, एक मौक़ा आया।
वराह ने अपने दाँत हिरण्याक्ष के सीने में डाले।
उसने एक दहाड़ मारी। फिर मरा।
वराह ने पृथ्वी को उठाया। अपने दो दाँतों के बीच।
और ऊपर तैरकर आया।
पानी के बाहर। पृथ्वी को अपनी जगह पर रखा। सूरज की रोशनी फिर पृथ्वी पर पड़ी।
देव, ऋषि, सब ने जयकार किया।
ब्रह्मा ने हाथ जोड़े।
”प्रभु, आपकी कथा अद्भुत है। एक सूअर का रूप लेकर, समुद्र के नीचे जाकर, राक्षस को मारकर, पृथ्वी को बाहर लाना।”
”ऐसा अवतार कौन ले? आप ही। और एक काम कर के, फिर मानव-समाज के लिए एक मिसाल भी छोड़ी।”
वराह ने मुस्कुराकर अपना रूप त्याग किया। फिर विष्णु के असली रूप में लौट आए।
वराह-अवतार भागवतम् के पहले अवतारों में से है।
इसका एक clear message है। जब हमारा ”ज़मीन” (foundation) चली जाती है, हमें बचाने के लिए ख़ुद भगवान को आना पड़ता है।
हिरण्याक्ष ने पृथ्वी छुपाई, गहरे पानी में। यह एक रूपक है। हम सब अपनी ज़िंदगी में किसी न किसी पल पाते हैं कि हमारी foundation गायब है। हम जिस ज़मीन पर खड़े थे, वो नहीं।
तब क्या करें?
भागवतम् कह रहा है, इंतज़ार करो। एक अवतार आएगा। शायद वो कोई बड़ा हीरो नहीं होगा। एक सूअर। एक साधारण सी चीज़।
मगर वो काम कर देगा।
और एक बात। वराह ने पृथ्वी को अपने दाँतों के बीच रखा। बहुत carefully। एक माँ की तरह।
भगवान जब हमें बचाते हैं, हम सोचते हैं वो बहुत बड़ी ताक़त से करते हैं। पर अक्सर वो बड़ी कोमलता से करते हैं। दाँतों के बीच, मगर बिना नुक़सान के।