वराह अवतार
गंगा का जल उस सुबह कुछ धीमे बह रहा था, जैसे वह भी सुनने को रुक गया हो। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और हाथ जोड़े।
”भगवन्, मेरे जीवन के दिन अब गिनती में हैं। कल आपने कहा था कि भगवान् बार-बार उतरते हैं, हर बार एक नए रूप में। मैं यह जानना चाहता हूँ, जब कोई आपत्ति इतनी नीचे चली जाए कि उसका कोई छोर ही न दिखे, तब वे किस रूप में आते हैं?”
शुकदेव की आँखों में एक शांत हँसी तैरी। ”राजन्, परम गहरे अंधकार के लिए भगवान् ने अत्यन्त विनम्र रूप चुना। सुनिए। यह सृष्टि के आरम्भ की बात है, जो स्वयं मुनिवर मैत्रेय ने विदुर को सुनाई थी।”
ब्रह्मा ने अभी-अभी रचना का काम छेड़ा था। उन्होंने आदिराज स्वायम्भुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा को जन्म दिया, और दोनों ने हाथ जोड़कर ब्रह्मा से कहा, ”आप ही समस्त जीवों के जन्मदाता और जीविका देनेवाले पिता हैं। हम आपकी ऐसी कौन-सी सेवा करें, जिससे इस लोक में हमारी कीर्ति हो और परलोक में सद्गति मिले?”
ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, ”तात! आप दोनों का कल्याण हो। आप अपने ही समान गुणवती सन्तान उत्पन्न करके धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन कीजिए और यज्ञों के द्वारा श्रीहरि की आराधना कीजिए। प्रजा का पालन ही मेरी परम बड़ी सेवा होगी।”
मनु ने फिर हाथ जोड़कर पूछा, ”पापों का नाश करनेवाले पिताजी, आज्ञा का पालन हम अवश्य करेंगे। किन्तु मेरी और मेरी भावी प्रजा के रहने के लिए स्थान तो बताइए। यह पृथ्वी तो इस समय प्रलय के जल में डूबी हुई है। आप ही इसके उद्धार का यत्न कीजिए।”

ब्रह्मा ने देखा, धरती सचमुच अथाह जल में डूबी पड़ी है। सूरज की किरण पानी की सतह पर आकर ही ठहर जाती, उसके नीचे उतरने को कुछ बचा ही न था।
बाक़ी रचना वहीं थम गई। धरती के बिना न पेड़ उग सकता था, न कोई जीव साँस ले सकता था, न मनुष्य का पाँव कहीं टिक सकता था।
ब्रह्मा बहुत देर तक मन में यही सोचते रहे, ”इसे कैसे निकालूँ?” अन्त में उन्होंने अपने उद्गम, सर्वशक्तिमान् श्रीहरि का ही स्मरण किया, जिनके संकल्पमात्र से उनका अपना जन्म हुआ था। वे ही यह काम पूरा करेंगे।
और फिर जो हुआ, उसे देखकर ब्रह्मा की आँखें खुली रह गईं।

ब्रह्मा के नासाछिद्र से अकस्मात् एक नन्हा वराह-शिशु बाहर निकला, अँगूठे भर का, इतना छोटा कि हथेली पर ठहर जाए।
ब्रह्मा टकटकी लगाए देखते रहे। यह कौन-सा खेल है?
फिर वह नन्हा रूप बढ़ने लगा। एक ही क्षण में हाथी जितना, फिर पहाड़ी जितना, फिर एक पूरे पर्वत जितना, आकाश को छूता हुआ।
एक विशाल वराह। देह पर घने काले रोएँ, दो चमकते हुए सफ़ेद दाँत, और नेत्रों से ऐसा तेज निकल रहा था कि देखनेवाले की आँखें झप जाएँ। उसी समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।
उसने एक गर्जना की। वह ध्वनि लोकों को चीरती चली गई, और जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक के मुनिगण उसे सुनकर तीनों वेदों के परम पवित्र मन्त्रों से उनकी स्तुति करने लगे।
फिर वह समुद्र में कूद पड़ा।

पानी दो ओर फटकर हट गया, और वराह अपने बाण के समान पैने खुरों से जल को चीरते हुए तीर की तरह नीचे उतरता चला गया।
गहरे, और गहरे, जब तक नथुनों ने सूँघकर धरती का पता न पा लिया। गंध के सहारे वह उस अपार जलराशि के उस पार, रसातल तक जा पहुँचा, जहाँ धरती दबी पड़ी थी।
वराह ने धरती को अपने दोनों दाँतों के बीच उठाया, और धीरे-धीरे ऊपर की ओर तैरने लगे।
और तभी, जल के भीतर ही, एक राक्षस उनके मार्ग में आ खड़ा हुआ। नाम था हिरण्याक्ष, दिति का पुत्र, हिरण्यकशिपु का भाई, महापराक्रमी। धरती को बाहर जाते देख वह क्रोध में भर उठा, और उठती हुई वराह-देह पर उसने अपनी गदा से प्रहार किया।
”एक सूअर मुझसे भिड़ेगा?” उसने तिरस्कार से दहाड़ कर कहा, और बार-बार गदा घुमाकर वार करने लगा।
वराह का क्रोध चक्र के समान तीखा हो उठा। पर उनके मुख में अब भी धरती थी, और उनके मन में कोई जल्दबाज़ी न थी। उन्होंने उस राक्षस को ऐसे ही खेल-खेल में मार डाला, जैसे कोई सिंह किसी हाथी को मार डालता है।
राक्षस के रक्त से वराह की थूथनी और कनपटी सन गई, और वे ऐसे जान पड़े मानो कोई गजराज लाल मिट्टी के टीले से टकरा कर आया हो।
और वराह धरती को अपनी दाढ़ों पर सँभाले धीरे-धीरे ऊपर तैरते आए, जैसे कोई हाथ अपनी अत्यन्त नाज़ुक चीज़ को सँभालकर ऊपर लाता हो।

जल की सतह को चीरकर वे बाहर निकले, और धरती को उसके अपने स्थान पर, जल के ऊपर, धीरे से रख दिया। सूरज की किरण फिर उसकी मिट्टी तक उतर आई, और हवा में पहली बार गीली ज़मीन की गंध फैली।
देवता और ऋषि एक साथ जय-जयकार कर उठे। मरीचि आदि मुनिजन, सनकादि और स्वायम्भुव मनु, सब हाथ जोड़कर वेदवाक्यों से उनकी स्तुति करने लगे।
”भगवन्, आपकी जय हो, जय हो,” ऋषियों ने कहा। ”आपने पृथ्वी के उद्धार के लिए ही यह सूकर-रूप धारण किया है, आपको नमस्कार है। आपके इस शरीर के दर्शन भी दुराचारियों को सुलभ नहीं, क्योंकि यह तो साक्षात् यज्ञ-रूप है। इसकी त्वचा में गायत्री आदि छन्द हैं, रोमों में कुश, नेत्रों में घृत, और चारों चरणों में यजमान, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा, चारों ऋत्विजों के कर्म हैं। आपकी थूथनी इडा है, सोम आपका वीर्य है, और आपके सात धातु सात यज्ञ-संस्थाएँ हैं। समस्त मन्त्र, देवता, द्रव्य और कर्म आपके ही स्वरूप हैं।”
ब्रह्मा ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े।
”प्रभु, यह आपके सिवा और कौन कर सकता था। एक सूअर का विनम्र रूप धरकर, रसातल के अँधेरे में उतरकर, उस महाबली राक्षस को परास्त कर, और धरती को इतनी कोमलता से वापस लाना। आपकी दाढ़ों की नोक पर रखी यह पर्वतों से मण्डित पृथ्वी ऐसी सुशोभित हो रही है, जैसे किसी गजराज के दाँतों पर पत्तों सहित कमलिनी रखी हो।”
”आपने केवल धरती नहीं उठाई। आपने यह भी दिखा दिया कि परम बड़ा उद्धार अति साधारण रूप में आ सकता है।”
वराह ने एक बार धरती की ओर देखा, फिर वह विशाल रूप शांत जल की तरह विलीन हो गया, और श्रीहरि अपने रूप में लौट आए।
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा का जल पास ही बह रहा था।
परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”भगवन्, मुझे एक बात बार-बार छू रही है। जिस मुँह से उन्होंने राक्षस को चीरा, उसी मुँह में उन्होंने धरती को उठाकर रखा। वही दाँत, जो संहार के थे, माँ की गोद बन गए।”
शुकदेव की आँखों में वह शांत हँसी फिर तैरी। ”राजन्, आपने ठीक देखा। जिसकी मार में प्रलय है, उसी की पकड़ में इतनी कोमलता कि धरती पर एक खरोंच तक न आए। श्रीहरि जब उतरते हैं, तो किसी बड़े वीर का रूप नहीं खोजते। एक नन्हा सूअर, जो ब्रह्मा के नासाछिद्र से निकला, सब के लिए पर्याप्त है।”
”और सुनिए, राजन्। इस अवतार की कथा इतनी सुभद्र है कि जो इसे भक्ति से सुनता या सुनाता है, उसके हृदय में भक्तवत्सल भगवान् बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। जो उन्हें अनन्य भाव से भजता है, उसे वे अन्तर्यामी स्वयं अपना परम पद ही दे देते हैं।”
परीक्षित् ने सिर झुका लिया। उनके भीतर जो सात दिनों की घड़ी चल रही थी, उसकी आवाज़ इस समय कहीं दूर सुनाई दे रही थी।
गंगा बहती रही, और धूप जल पर उतरकर ठहर गई, ठीक वैसे ही जैसे कभी वराह की पीठ पर उतरी होगी।
साहित्यिक-संदर्भ
वराह-प्रादुर्भाव (manifestation) की यह कथा श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में आती है, जहाँ मुनिवर मैत्रेय इसे विदुर को सुनाते हैं। पृथ्वी प्रलय के जल में रसातल को चली जाती है, और श्रीहरि वराह-रूप धारण कर उसे बाहर लाते हैं; हिरण्याक्ष मार्ग रोकता और गदा-प्रहार करता है, जिसे भगवान् लीला से ही मार डालते हैं। हिरण्याक्ष के युद्ध और वध का विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों (अठारहवें-उन्नीसवें) में आता है।
गीता प्रेस की वाचना में यह अवतार-कथाओं की उसी शृंखला का अंग है जिसमें जय-विजय तीन जन्मों तक भगवान् के विरोधी होकर जन्म लेते हैं; हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु उनका पहला जन्म हैं। इसी अध्याय में मुनिगण वराह-शरीर की विस्तृत यज्ञ-पुरुष-स्तुति करते हैं, जिसमें भगवान् के एक-एक अंग को यज्ञ के एक-एक अंग के रूप में देखा गया है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
श्रीहरि ने परम ज़रूरी उद्धार के लिए अति साधारण रूप चुना, एक सूअर का, जो कीचड़ में उतरने से नहीं हिचकता। जो काम परम नीचे उतरकर, अत्यन्त गंदे स्थान में किया जाता है और जिसे लोग देखना तक नहीं चाहते, उसी में अक्सर सब की ज़मीन टिकी होती है। वराह-कथा यही दृष्टि देती है।