रुक्मिणी हरण
विदर्भ देश। राजधानी कुण्डिनपुर। राजा भीष्मक।
उनकी एक बेटी थी, रुक्मिणी। बहुत सुन्दर। और एक secret थी।
वो कृष्ण के बारे में बहुत सुनती थी। मथुरा में आए द्वारका वाले व्यापारियों से। नारद-जैसे विजिटिंग ऋषियों से। हर किसी से।
और उसके अंदर एक भावना। कि शायद इस इंसान से शादी हो।
उसने सीधे अपने पिता से कहा नहीं। मगर मन में तय किया।
इधर उसका बड़ा भाई रुक्मी, उसका दुश्मन था। (नहीं, बहन का दुश्मन नहीं। मगर कृष्ण का।) कारण कोई और था, मगर रुक्मी कृष्ण से नफ़रत करता था।
रुक्मी ने अपने पिता को कहा, ”रुक्मिणी की शादी शिशुपाल से करा देते हैं।”
शिशुपाल चेदि का राजा था। एक powerful, मगर बहुत crude आदमी। रुक्मिणी को वो पसंद नहीं था।
पर भीष्मक ने हाँ कर दी। तारीख़ तय हुई।
रुक्मिणी का दिल टूटा। पर वो रोई नहीं।
उसने एक काम किया। एक पत्र लिखा।
द्वारका कृष्ण के लिए।
”श्री कृष्ण,” उसने लिखा। ”मैंने आपके बारे में सुना। आपकी कथाएँ, आपकी लीलाएँ, आपका रूप। मेरा मन तय हो गया, मेरे पति आप ही होंगे।”
”मेरे पिता ने मेरी शादी शिशुपाल से तय की है। तीन दिन बाद की।”
”अगर आपको मैं नहीं चाहिए, तो ठीक है। मैं ख़ुद को मार दूँगी। मगर अगर आप आना चाहते हैं, तो आज ही आइए।”
”एक trick है। मेरी शादी से पहले एक रिवाज है, मैं हमारी कुल-देवी के मन्दिर जाऊँगी। पूजा के लिए। उस वक़्त मैं अकेली होऊँगी, बाहर के आँगन में। वहीं से आप मुझे ले जा सकते हैं।”
”यह कोई हरण नहीं होगा, यह मेरा choice है। मैं अपनी इच्छा से चलूँगी।”
उन्होंने पत्र को एक भरोसेमंद ब्राह्मण को सौंपा। ”द्वारका जाओ। यह पत्र कृष्ण को दो। और तुरंत जवाब लेकर लौटो।”
ब्राह्मण द्वारका पहुँचे। कृष्ण को पत्र दिया।
कृष्ण ने पढ़ा।
उन्होंने तुरंत अपना रथ निकाला। और कुण्डिनपुर की तरफ़।
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.52.37)
हे संसार के सबसे सुन्दर! आपके गुण, जो सुनने वालों के कानों के द्वारा अंदर जाते हैं और शरीर के सब ताप हर लेते हैं, मैंने उन्हें सुना है।
इधर शिशुपाल अपनी सेना के साथ आ चुका था। बारात।
रुक्मी ने सब prep कर लिया था। शाम को शादी।
सुबह रुक्मिणी अपनी सहेलियों के साथ देवी-मन्दिर गई। बाहर आँगन में पूजा हुई।
वो बाहर निकली, थोड़ी सी अकेली। उसने इधर-उधर देखा।
और एक रथ खड़ा था। नीला घोड़ा। पीताम्बर पहना सारथी।
कृष्ण।
रुक्मिणी ने एक पल को आँखें मूँदीं। फिर खोलीं। वो सच में था।
वो उठी। आगे बढ़ी। बिना डर के, बिना झिझक के।
कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ा। रथ में बैठाया।
और रथ निकल गया।
लोगों ने देखा। शोर मचा। ”रुक्मिणी हरण हो गई!”
रुक्मी पागल हो गया। अपनी सेना के साथ पीछा।
”उसे रोको। कृष्ण को मारो!”
रास्ते में जंगल आया। वहाँ एक छोटी सी लड़ाई।
रुक्मी कृष्ण से लड़ा। हार गया। पर मरा नहीं।
कृष्ण ने उसका सिर मुंडवा दिया। उसकी बहन के सामने अपमान। फिर छोड़ दिया।
रुक्मी ज़मीन पर बैठा। आँखों में आँसू।
”अब मेरा क्या?” (उसने कसम खाई थी, ”कृष्ण को मारकर ही मथुरा लौटूँगा।” अब कैसे लौटे? अपनी बहन के साथ हराकर।)
वो वहीं रुक गया। उसने एक नया शहर बसाया, ”भोजकट।” और कभी कुण्डिनपुर नहीं लौटा।
रुक्मिणी और कृष्ण द्वारका पहुँचे। वहाँ विवाह।
द्वारका में एक बड़ा उत्सव। कृष्ण की पहली रानी, रुक्मिणी।
और रुक्मिणी ने अपनी बाक़ी ज़िंदगी कृष्ण के साथ, द्वारका में बिताई।
मगर एक छोटी सी बात।
कई साल बाद, जब अनिरुद्ध, रुक्मिणी का पोता, उसका विवाह रुक्मी की बेटी से हुआ। एक तरह से रिश्ता वापस।
रुक्मिणी ने हाथ जोड़े। ”भगवान, परिवार बच जाता है, अंत में।”
रुक्मिणी की कथा एक रोचक paradox है।
रुक्मिणी ने कृष्ण को कभी देखा नहीं था। फिर भी उसने एक पत्र लिखा कि ”आओ, मुझे ले जाओ।”
यह कैसा प्रेम है? बिना देखे?
भागवतम् कह रहा है, यह वो प्रेम है जो सुनने से उठता है। कथा-श्रवण से। ”श्रवण-भक्ति।”
जब आप किसी की कथा सुनते हो, आप उसे एक तरीक़े से जान लेते हो, बिना देखे। और अगर वो सच्ची कथा है, तो उसका असर बहुत गहरा होता है।
रुक्मिणी ने कृष्ण की कथा इतनी सुनी थी कि उसके अंदर एक picture बन गई। और जब वो मिले, तो वो उसे पहचान सकती थी।
हम सब भगवान को नहीं देखते। पर अगर हम उनकी कथाएँ सुनते रहें, धीरे-धीरे एक relationship बन जाती है। और जब वो किसी रूप में आते हैं, हम पहचान सकते हैं।
एक और बात। रुक्मिणी ने अपने भाई के ख़िलाफ़ काम किया। अपने पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़।
क्या यह सही था? भागवतम् यह सवाल नहीं उठाता। बस कथा कहता है।
शायद इसमें एक quiet message है। कभी-कभी अपनी सच्चाई को follow करने के लिए परिवार से थोड़ा सा conflict ज़रूरी होता है। अगर सच में अंदर वो भगवान-समान connection है।