Lulla Family

रुक्मिणी हरण

कथा 29 · भागवतम् की कथाएँ

रुक्मिणी हरण

The Princess Who Wrote a Letter
स्कन्ध 10, अध्याय 52-54

गंगा का जल उस सुबह ठहरा हुआ था, जैसे वह भी सुनने को रुक गया हो। परीक्षित् ने मुनिवर की ओर देखा। पिछली कथा में कंस मारा जा चुका था, मथुरा का अँधेरा छँट चुका था, और राजा के मन में एक नई जिज्ञासा उठी थी।

”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”हमने सुना है कि श्रीहरि ने भीष्मक की कन्या रुक्मिणी का राक्षस-विधि से हरण कर उनके साथ विवाह किया। अब हम यह सुनना चाहते हैं कि श्रीहरि ने जरासन्ध, शाल्व आदि राजाओं को जीतकर रुक्मिणी का हरण किस प्रकार किया?”

शुकदेव मुस्कुराए। उनकी आवाज़ धीमी हुई, जैसे किसी प्रिय बात पर हाथ रखते हों। ”राजन्, सुनिए विदर्भ की एक राजकुमारी की बात। उसने श्रीहरि को कभी देखा न था। सिर्फ़ सुना था। और उसी सुनने ने उसका सारा जीवन तय कर दिया।”

विदर्भ देश था, राजधानी कुण्डिनपुर, और वहाँ राज करते थे महाराज भीष्मक।

उनके पाँच पुत्र थे और एक सुन्दरी कन्या। सब में बड़े पुत्र का नाम था रुक्मी, और चार छोटे थे रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली। इन सबकी बहन थी सती रुक्मिणी। उसके चलने में एक ठहराव था जो उसकी उम्र से बड़ा लगता था, और जो भी उससे एक बार बात कर लेता, उसकी बुद्धि की चमक भूल नहीं पाता था।

Rich painterly classical-Indian color illustration: young princess Rukmini in the marble hall of Kundinapura palace in Vidarbha, leaning forward to listen intently as Dwaraka merchants and visiting sages recount Krishna's glories; her face glows with dawning wonder; warm lamplight, jewel-toned silks, no Krishna physically present, only an imagined blue-hued vision faintly forming above the storytellers.

द्वारका से आए व्यापारी जब कुण्डिनपुर के बाज़ार में सौदा करते, तो उनकी बातों में एक नाम बार-बार लौट आता था। जो ऋषि-मुनि उस राज्य से गुज़रते और महल में अतिथि बनते, वे भी उन्हीं की लीलाएँ सुनाते। रुक्मिणी कान लगाए रहती। श्रीहरि का रूप, उनका पराक्रम, उनके गुण, उनका वैभव, यह सब उसके भीतर एक तस्वीर गढ़ते जाते थे, जिसे उसने आँख से कभी नहीं देखा था।

और एक दिन उसके मन में एक बात बैठ गई, जो फिर हिली नहीं। कि जीवन में जिसके साथ चलना है, वह यही हैं।

उधर श्रीहरि भी जानते थे कि रुक्मिणी में बड़े सुन्दर लक्षण हैं, वह परम बुद्धिमती है, और उदारता, सौन्दर्य, शील तथा गुण में अद्वितीय है। उन्होंने भी मन ही मन निश्चय कर लिया कि रुक्मिणी ही उनके अनुरूप पत्नी है।

रुक्मिणी के भाई-बन्धु भी चाहते थे कि उसका विवाह श्रीहरि से ही हो। पर उसका बड़ा भाई रुक्मी श्रीहरि से बड़ा द्वेष रखता था। उसने इस विवाह को रोक दिया।

रुक्मी ने यह तय किया कि रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से ही हो। शिशुपाल चेदि का राजा था।

Classical-Indian color painting: Rukmini, composed and resolute (no tears), seated in her chamber handing a folded palm-leaf letter to a single trusted elderly Brahmin who stands with folded reverence; soft interior with carved pillars, brass lamp, a maid in the background; intimate, decisive mood.

जब रुक्मिणी को यह मालूम हुआ कि उसका बड़ा भाई रुक्मी उसे शिशुपाल के साथ ब्याहना चाहता है, तो वह बहुत उदास हो गई। बहुत सोच-विचार कर उसने एक काम किया। एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को बुलाया, और उसके हाथ श्रीहरि के नाम एक सन्देश भेजने का निश्चय किया।

आँख से एक बूँद न गिरी। उसके भीतर कुछ कस गया, और उसी कसाव में एक निश्चय भी आ गया।

द्वारका के लिए, श्रीहरि के नाम।

”हे श्रीकृष्ण,” उसने कहलवा भेजा। ”तीनों लोकों को सुन्दर बनानेवाले भगवन्! आपके गुण सुननेवालों के कानों के रास्ते हृदय में प्रवेश करके सारी जलन बुझा देते हैं, और आपका रूप देखनेवालों के नेत्रों के सारे लाभ पूरे कर देता है। उन्हीं को सुनकर मेरा मन लज्जा और संकोच सब छोड़कर आप ही में प्रवेश कर रहा है, हे अच्युत!”

”कुल, शील, स्वभाव, सौन्दर्य, विद्या, अवस्था और धन-धाम, सभी में आप अद्वितीय हैं। भला ऐसी कौन कुलीन और धैर्यवती कन्या होगी, जो योग्य समय आने पर आपको ही पति-रूप में न वरेगी? इसीलिए, प्रियतम, मैंने आपको ही पति-रूप में वरा है। मैं आपको आत्म-समर्पण कर चुकी हूँ। आप आकर मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिए।”

”ऐसा न हो कि सिंह के भाग को कोई सियार छू ले, और शिशुपाल आकर मेरा स्पर्श कर जाए। यदि मैंने जन्म-जन्म में पूर्त, इष्ट, दान, व्रत और देवता-ब्राह्मण की पूजा से भगवान् की ही आराधना की हो, तो श्रीहरि आकर मेरा पाणिग्रहण करें; शिशुपाल या और कोई पुरुष मेरा स्पर्श न कर सके।”

”हे अजित! जिस दिन मेरा विवाह होनेवाला हो, उससे एक दिन पहले आप गुप्त रूप से हमारी राजधानी में आ जाइए, और बड़े-बड़े सेनापतियों के साथ शिशुपाल तथा जरासन्ध की सेनाओं को मथकर मुझे राक्षस-विधि से ले चलिए।”

”यदि आप सोचें कि अन्तःपुर में पहरे के भीतर रहनेवाली कन्या को, भाई-बन्धुओं को मारे बिना, कैसे ले जाया जा सकता है, तो उसका उपाय यह है। हमारे कुल की रीति है कि विवाह से एक दिन पहले कन्या नगर के बाहर कुल-देवी अम्बिका के मन्दिर में पूजा करने जाती है। उसी घड़ी आप मुझे वहाँ से ले चलिए।”

पत्र लिखकर उसने उस भरोसेमंद ब्राह्मण के हाथ में रखते हुए कहा, ”आप द्वारका जाइए। यह सन्देश श्रीहरि को उन्हीं के हाथ में देना, और उत्तर लेकर तुरंत लौट आना।”

ब्राह्मण ने योजनों का रास्ता पार किया और द्वारका जा पहुँचा। श्रीहरि के सामने उसने वह सन्देश रखा।

श्रीहरि ने सन्देश सुना। सुनकर हँसते हुए ब्राह्मण का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

”जैसे विदर्भ-राजकुमारी मुझे चाहती हैं, वैसे ही मैं भी उन्हें चाहता हूँ,” उन्होंने कहा। ”मेरा चित्त उन्हीं में लगा रहता है। मैं जानता हूँ कि रुक्मी ने द्वेषवश यह विवाह रोक दिया है। पर मैं उन क्षत्रिय-कुल के कलंकों को मथकर उस परम सुन्दरी राजकुमारी को ले आऊँगा।”

Vivid classical-Indian color illustration in Dwaraka: charioteer Daruka yoking exactly four named horses (Shaibya, Sugriva, Meghapushpa, Balahaka) to Krishna's grand chariot bearing the Garuda banner; blue-skinned Krishna in yellow pitambara stepping aboard while the Brahmin is already seated on the chariot; golden sea-city architecture, urgent dawn light.

उसी घड़ी उन्होंने सारथी दारुक को रथ जोतने की आज्ञा दी। दारुक रथ में शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक चार घोड़े जोतकर ले आया और हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। श्रीहरि उस ब्राह्मण को पहले रथ पर चढ़ाकर फिर स्वयं सवार हुए, और उन तेज़ घोड़ों के बल पर एक ही रात में आनर्त-देश से विदर्भ जा पहुँचे।

उधर शिशुपाल के पिता, चेदि-नरेश दमघोष, अपने पुत्र के विवाह की मंगल-तैयारी कराकर मद चुआते हाथियों, सजे रथों, पैदल और घुड़सवारों की सेना लेकर कुण्डिनपुर पहुँच चुके थे। शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्र, विदूरथ और पौण्ड्रक आदि शिशुपाल के हज़ारों मित्र राजा भी आ पहुँचे थे। ये सब श्रीहरि और बलराम के विरोधी थे, और इस विचार से आए थे कि कहीं कृष्ण आकर कन्या को हरने की चेष्टा न करे।

रुक्मी ने सब तैयारी करा दी थी। नगर के राजपथ और गली-कूचे झाड़-बुहार दिए गए थे, उन पर छिड़काव हो चुका था। झंडियाँ और पताकाएँ लगा दी गई थीं, तोरण बँध गए थे।

उधर रुक्मिणी श्रीहरि के शुभागमन की प्रतीक्षा कर रही थीं। ब्राह्मण के अब तक न लौटने पर वे बड़ी चिन्ता में पड़ गईं। ”अहो, अब मेरे विवाह में केवल एक रात की देरी है, और मेरे प्रियतम अब भी नहीं पधारे! मेरे सन्देश ले जानेवाले ब्राह्मण भी अभी तक नहीं लौटे।”

तभी उनकी बायीं जाँघ, भुजा और नेत्र फड़कने लगे, जो प्रियतम के आगमन का प्रिय संकेत सूचित कर रहे थे। इतने ही में वह ब्राह्मण आ पहुँचा, और उसने प्रसन्न मुख से कहा कि श्रीहरि पधार गए हैं, और उन्होंने उन्हें ले जाने की सत्य प्रतिज्ञा की है।

Festive classical-Indian color procession: Rukmini walking on foot toward goddess Ambika's temple outside the city, surrounded by her mothers and girl-companions, armed valiant royal soldiers guarding her with weapons raised, musicians playing mridanga, conch, drum, trumpet and bheri; flower garlands, flags and toranas, morning sunlight.

दूसरे दिन प्रातः रुक्मिणी अपनी माताओं और सखी-सहेलियों से घिरी हुई, श्रीहरि के चरण-कमलों का ध्यान करती हुई, अम्बिका के मन्दिर की ओर पैदल चलीं। शूरवीर राजसैनिक हाथों में अस्त्र-शस्त्र उठाए उनकी रक्षा कर रहे थे, और मृदंग, शंख, ढोल, तुरही तथा भेरी बज रही थीं।

मन्दिर पहुँचकर उन्होंने हाथ-पाँव धोए, आचमन किया, और भीतर जाकर देवी की विधिवत् पूजा की। बड़ी-बूढ़ी ब्राह्मणियों ने भगवती भवानी और भगवान् शंकर को रुक्मिणी से प्रणाम कराया। रुक्मिणी ने भगवती से एक ही प्रार्थना दोहराई, ”अम्बिका माता! आप ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि श्रीहरि ही मेरे पति हों।”

पूजा पूरी कर, मौन व्रत तोड़कर, वे एक सहेली का हाथ पकड़े गिरिजा-मन्दिर से बाहर निकलीं। उनकी आँखें भीड़ में किसी को ढूँढ रही थीं।

तभी उन्होंने उन्हें देखा। एक रथ खड़ा था, और उस पर पीताम्बर ओढ़े वह खड़े थे, जिनका रूप उन्होंने वर्षों से सुना भर था।

श्रीहरि।

Dramatic classical-Indian color illustration: blue-skinned Krishna in yellow pitambara sweeping Rukmini up from the crowd and lifting her onto his Garuda-bannered chariot before the eyes of hundreds of astonished, helpless kings; defiant heroic motion, dust and fluttering banners, the assembled rival monarchs frozen in shock.

वहाँ आए हुए बड़े-बड़े यशस्वी वीर रुक्मिणी की वह अपूर्व छबि देखकर मोहित हो गए। पर रुक्मिणी रथ पर चढ़ना ही चाहती थीं कि श्रीहरि ने समस्त शत्रुओं के देखते-देखते उनकी भीड़ में से रुक्मिणी को उठा लिया, और उन सैकड़ों राजाओं के सिर पर मानो पाँव रखकर उन्हें अपने उस रथ पर बैठा लिया, जिसकी ध्वजा पर गरुड़ का चिह्न लगा हुआ था।

फिर जैसे सिंह सियारों के बीच से अपना भाग ले जाता है, वैसे ही रुक्मिणी को लेकर श्रीहरि बलराम आदि यदुवंशियों के साथ वहाँ से चल पड़े।

आँगन में हलचल मच गई। ”रुक्मिणी को कोई ले गया!” का शोर एक मुँह से दूसरे तक दौड़ा। जरासन्ध के वशवर्ती अभिमानी राजा अपना यह तिरस्कार और यश-कीर्ति का नाश सहन न कर सके। वे सब चिढ़कर बोले, ”अहो, हमें धिक्कार है। आज हम धनुष धारण कर खड़े ही रहे, और ये ग्वाला, जैसे सिंह के भाग को हरिन ले जाए, वैसे ही हमारा सारा यश छीन ले गया!”

Classical-Indian color battle scene: Jarasandha's army showering arrows upon the Yadava warriors as the chariot flees; Rukmini on the chariot glancing at Krishna in shy fear while he smiles reassuringly; arrows darkening the sky, elephants, horses and chariots of the pursuing kings, the Garuda banner streaming overhead.

क्रोध से आगबबूला होकर सब राजा कवच पहन अपने-अपने वाहनों पर सवार हो गए और श्रीहरि के पीछे दौड़े। जरासन्ध की सेना ने यदुवंशियों पर बाणों की वर्षा की। रुक्मिणी ने देखा कि उनके पति की सेना बाण-वर्षा से ढक गई है, तब उन्होंने लज्जा और भय से भगवान् की ओर देखा। श्रीहरि ने हँसकर कहा, ”सुन्दरी! डरिए मत। आपकी सेना अभी इनकी सेना को नष्ट किए डालती है।”

गद और संकर्षण आदि यदुवंशी वीर शत्रुओं का यह पराक्रम अधिक न सह सके। उन्होंने अपने बाणों से शत्रुओं के हाथी, घोड़े और रथ छिन्न-भिन्न कर डाले, और जरासन्ध आदि सभी राजा युद्ध से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।

उधर रुक्मी से अपनी बहन का हरण सहा न गया। वह क्रोध से जल उठा। उसने कवच पहन, धनुष धारण कर समस्त राजाओं के सामने यह प्रतिज्ञा की कि कृष्ण को मारे और रुक्मिणी को लौटाए बिना वह कुण्डिनपुर में पाँव न रखेगा। और अपनी एक अक्षौहिणी सेना लेकर वह अकेला ही रथ के पीछे दौड़ा।

”रथ रोको! आज इस ग्वाले को नहीं छोड़ूँगा!” वह ललकारता रहा।

रुक्मी ने जा घेरा और श्रीहरि पर तीन बाण मारे। श्रीहरि मुसकराए, और उसका धनुष काट डाला। रुक्मी बार-बार नए धनुष उठाता, और श्रीहरि उन्हें काटते जाते। फिर उसके परिघ, शूल, ढाल और तलवार, जो भी अस्त्र उसने उठाया, सब काट डाले। अन्त में रुक्मी हाथ में तलवार लेकर श्रीहरि की ओर झपटा। श्रीहरि ने उसकी ढाल-तलवार भी तिल-तिल कर काट दी, और उसे मारने को तीखी तलवार उठा ली।

रुक्मिणी यह देखकर भय से विह्वल हो गईं। वे रथ से उतरीं और श्रीहरि के चरणों पर गिरकर करुण स्वर में बोलीं, ”योगेश्वर! देवताओं के भी आराध्य! आप कल्याण-स्वरूप हैं। प्रभो! मेरे भाई को मारना आपके योग्य काम नहीं है।”

Classical-Indian color illustration: Krishna binding the defeated Rukmi with Rukmi's own upper-cloth and shaving patches of his beard, moustache and head-hair with a sword to disfigure him; Rukmi humiliated and half-dead on the ground, broken bow and weapons scattered; Rukmini watching anxiously nearby, Krishna calm and restrained, not killing him.

श्रीहरि रुक गए। पर रुक्मी की अनिष्ट-चेष्टा से विमुख न हुए। उन्होंने उसे उसी के दुपट्टे से बाँध दिया, और तलवार से उसकी दाढ़ी, मूँछ तथा सिर के बाल कई जगह से मूँड़कर उसे कुरूप कर दिया।

तब तक यदुवंशी वीरों ने शत्रु की सेना तहस-नहस कर दी थी। लौटकर उन्होंने देखा कि रुक्मी बँधा हुआ अधमरा पड़ा है। बलराम को बड़ी दया आई, और उन्होंने उसके बन्धन खोल दिए।

बलराम ने श्रीहरि से कहा, ”कृष्ण! आपने यह अच्छा नहीं किया। किसी के बाल-दाढ़ी मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकार का वध ही है।” फिर रुक्मिणी की ओर मुड़कर बोले, ”साध्वी! आपके भाई का रूप विकृत कर दिया गया, यह सोचकर हम लोगों से बुरा न मानिए। जीव को सुख-दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं, वह तो अपने ही कर्म का फल भोगता है।”

रुक्मी ज़मीन पर बैठ गया, कटे बालों के बीच, और उसका सिर झुक गया। उसने प्रतिज्ञा की थी कि कृष्ण को मारे बिना न लौटेगा, और अब न तो प्रतिज्ञा पूरी हुई थी, न वह इस रूप में बहन की बारात के बीच लौट सकता था।

वह कुण्डिनपुर नहीं गया। वहीं, उसी जगह, उसने भोजकट नाम की एक बड़ी नगरी बसाई। अपनी प्रतिज्ञा की लाज में वह क्रोध करके वहीं रह गया।

रुक्मिणी और श्रीहरि द्वारका पहुँचे। वहाँ श्रीहरि ने उनसे विधि-पूर्वक विवाह किया।

सारी द्वारका सज उठी। घर-घर उत्सव मनाया गया। शंख और नगाड़े बजे, मणियों के कुण्डल पहने स्त्री-पुरुष आनन्द में भर गए। रुक्मिणी श्रीहरि की पटरानी बनीं।

और रुक्मिणी ने अपना बाक़ी जीवन श्रीहरि के साथ द्वारका में बिताया, उसी प्रेम में जो कभी आँख से नहीं, सिर्फ़ कान से शुरू हुआ था।


शुकदेव यहाँ रुक गए। गंगा पर एक चिड़िया पानी छूकर ऊपर उठ गई।

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ”भगवन्, उसने उन्हें देखा तक न था। फिर भी आँगन में, सारे राजाओं के बीच, उसके पाँव एक बार भी न काँपे। यह निश्चय उसके भीतर कहाँ से आया?”

”सुनने से, राजन्,” शुकदेव ने कहा। ”जिसने श्रीहरि के गुण सच्चे मन से सुने, उसके भीतर वे गुण घर कर लेते हैं। फिर आँख का देखना केवल उस बात की पुष्टि रह जाता है जो कान पहले ही जान चुके होते हैं।”

परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया। ”तो जो हम इन दिनों आपसे सुन रहे हैं…”

शुकदेव ने वाक्य पूरा नहीं होने दिया। ”वह भी एक ही काम कर रहा है, राजन्। तक्षक आए न आए, अब आपके भीतर भी कोई पहचान बस रही है।” गंगा बहती रही, और एक दिन और घट गया।

मन्थन

रुक्मिणी की कथा एक अजीब बात अपने भीतर रखती है।

उसने श्रीहरि को कभी देखा न था। फिर भी उसने सन्देश भेजा, ”आइए, और मुझे ले चलिए।”

बिना देखे, यह कैसा प्रेम?

भागवत कहता है, यह वही प्रेम है जो सुनने से उठता है। कथा सुनने से। नौ प्रकार की भक्ति में सब में पहली यही है, श्रवण।

जो कोई किसी की कथा बार-बार सुनता है, वह आँख से देखे बिना भी उसे एक तरह से जान लेता है। और यदि वह कथा सच्ची हो, तो उसका रंग मन में बैठ जाता है।

रुक्मिणी ने श्रीहरि की कथा इतनी सुनी थी कि उनका एक रूप उसके भीतर गढ़ा जा चुका था। इसीलिए जिस दिन सामने आए, उसे पहचानने में पल भर भी न लगा।

अधिकांश लोग भगवान को आँख से नहीं देखते। पर जो उनकी कथाएँ सुनता रहता है, उसके भीतर धीरे-धीरे एक नाता बन जाता है। और जिस दिन वे किसी रूप में सामने आते हैं, मन उन्हें पहचान लेता है।

एक बात और। रुक्मिणी ने अपने बड़े भाई की इच्छा के विरुद्ध जाकर यह किया।

क्या यह उचित था? भागवत यह सवाल नहीं उठाता। वह बस कथा कहता है, और निर्णय सुनने वाले पर छोड़ देता है।

शायद इतना भर इशारा है कि कभी-कभी अपने भीतर की परम सच्ची पुकार के पीछे चलने के लिए घर से थोड़ी अनबन भी मोल लेनी पड़ती है, बशर्ते वह पुकार सचमुच श्रीहरि की ओर हो।

साहित्यिक-संदर्भ

रुक्मिणी-हरण श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 52 से 54 में आता है। रुक्मिणी का सन्देश (10.52.37 से 43) इस प्रसंग का हृदय है, जहाँ उनकी बुद्धि और संकल्प दोनों खुलकर सामने आते हैं।

शास्त्र की दृष्टि से यह विवाह ‘राक्षस’ विधि का माना जाता है, क्योंकि वर कन्या को बलपूर्वक ले जाता है; पर यहाँ कन्या की पूर्व-सहमति इसे विशिष्ट बना देती है। श्रीधर स्वामी की भावार्थ-दीपिका इसी भाव से प्रसंग को पढ़ती है, कि यह प्रेम श्रवण से उपजी भक्ति का रूप है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

रुक्मिणी ने जिसे कभी देखा न था, उसे कान से पहचान लिया, और घर की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर अपने मन की पुकार पर चल पड़ी। यह वही दुविधा है जो हर पीढ़ी में लौटती है, जब भीतर की सच्चाई और परिवार की इच्छा आमने-सामने आ खड़ी होती हैं।