राजा वेन और पृथु
परीक्षित् ने हाथ जोड़कर शुकदेव की ओर नज़र उठाई।
”मुनिवर, हम भी एक राजा रहे हैं। हमने अपनी प्रजा के लिए जो कर सकते थे, किया। पर मन में एक काँटा रह जाता है, कि राजा अगर बिगड़ जाए तो उस धरती का क्या हो जो उसके भरोसे बैठी है? क्या ऐसा राजा कभी हुआ है, जिसने अपनी ही प्रजा को निचोड़ डाला हो?”
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, ऐसा एक राजा हुआ था। उसका नाम था वेन। और उसी की देह से वह राजा भी निकला जिसके नाम पर यह धरती आज तक पुकारी जाती है। सुनिए।”
एक राजा थे, अंग। बड़े शीलवान्, साधुस्वभाव, ब्राह्मण-भक्त और महात्मा। धर्म उनके रोम-रोम में बसा था, यज्ञ उनकी साँस में। पर वर्षों बीत गए और उनकी गोद सूनी रही।

पुत्र की कामना से उन्होंने एक महायज्ञ का अनुष्ठान किया। ऋत्विजों ने जब श्रीविष्णु के पूजन के लिए चरु की आहुति दी, अग्निकुण्ड से एक पुरुष प्रकट हुआ, सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से सजा, हाथ में स्वर्ण-पात्र में सिद्ध खीर लिये। अंग ने वह खीर बड़ी प्रसन्नता से अपनी पत्नी सुनीथा को दी, और उसी से समय पर एक पुत्र हुआ। पर जिस घड़ी वह जन्मा, घर में हर्ष की जगह एक अनकही आशंका उतर आई।
शिशु की आँखों में दूध माँगने की पुकार नहीं, एक ठंडी जलन थी। नाम रखा गया वेन।
सुनीथा स्वयं मृत्यु की पुत्री थीं, और जो रक्त नाना मृत्यु से उतरा, वही इस शिशु की रग-रग में बहता था। इसीलिये वेन जन्म से ही अधर्म की ओर झुका हुआ था।
अंग ने उसे सीने से लगाकर पालने की हर कोशिश की। नरमी से, कड़ाई से, अदब सिखाकर। पर वेन को वे किसी भी भाँति सुमार्ग पर न ला सके। वह जैसा जन्मा था, वैसा ही बढ़ता गया, हर बीतते बरस के साथ कुछ और कठोर।
इसी दुःख से अंग का चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। एक रात, जब सब सो रहे थे, वे चुपचाप उस महान् ऐश्वर्य से भरे राजमहल की देहरी लाँघ गए। किसी से कुछ नहीं कहा। फिर कभी नहीं लौटे। प्रजा, पुरोहित और मन्त्री बहुत खोजते रहे, पर महाराज का कहीं पता न चला।
राजगद्दी ख़ाली थी। राजा के बिना प्रजा पशुओं के समान उच्छृंखल होने लगी। ऋषियों ने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी, भारी मन से वेन का राज्याभिषेक कर दिया, इस उम्मीद में कि मुकुट शायद उसे सँभाल ले।
सिंहासन पाते ही वेन ऐश्वर्य-मद में अंधा हो गया। अपने को सब महापुरुषों से ऊपर मानकर वह रथ पर चढ़कर, अंकुश-रहित गजराज की तरह, पृथ्वी और आकाश को कँपाता हुआ चारों ओर घूमने लगा।
फिर एक दिन उसने पूरे राज्य में भेरी बजवाकर ढिंढोरा पिटवाया, ”अब कोई द्विज किसी प्रकार का यज्ञ, दान या हवन नहीं करेगा। यज्ञ का हविष्य मुझे चढ़ेगा। पूजा मेरी होगी, क्योंकि मुझसे भिन्न अग्र-पूजा का अधिकारी और कोई नहीं।”
ऋषि-मुनि अपना क्रोध छिपाकर दरबार में आए। बहुत अदब से, बहुत धीरज से, प्रिय वचनों से समझाया।

”राजन्, हमारी बात पर ध्यान दीजिए। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्ति की वृद्धि होगी। आप प्रजा के रक्षक हैं, स्वामी नहीं। जिस श्रीयज्ञपुरुष हरि से यह सारा जगत् चलता है, उन्हीं की आराधना से आपका सिंहासन भी टिका है। धर्म नष्ट होने पर राजा भी ऐश्वर्य से च्युत हो जाता है।”
वेन की आँखों की वही पुरानी जलन भड़क उठी।
”आप लोग बड़े मूर्ख हैं। जिसकी आप में इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वरुण, ये सब-के-सब तो राजा के शरीर में ही रहते हैं। इसलिये राजा ही सर्वदेवमय है। मुझे छोड़कर आप किसी और की उपासना न करें।”
ऋषि चुपचाप उठे और बाहर आ गए। उन्होंने आपस में नज़रें मिलाईं।
”इसे यूँ छोड़ देना धर्म नहीं, अधर्म है। यह राजा पूरी सृष्टि के विधान को रौंद देगा। यह तो साक्षात् श्रीहरि की निन्दा कर रहा है, और प्रजा इसी की भूख में पिस जाएगी।”

उस निर्लज्ज की निन्दा से कुपित होकर ऋषियों ने अपने हृदय में बसे मन्त्र को जगाया और केवल हुंकारों से ही उसका काम तमाम कर दिया। केवल एक शब्द, ”हुं।”
उस ध्वनि में जप का बल था। वेन काँपा, और वहीं गिर पड़ा। उसकी साँस उसी क्षण थम गई।
राजा के मर जाते ही देश में अराजकता फैल गई। चोर-डाकू बढ़ गए, और प्रजा लुटेरों के कारण भारी संकट में पड़ गई। ऋषि जानते थे कि बिना राजा के यह धरती सौंपी नहीं जा सकती। वेन की शोकाकुल माता सुनीथा ने मन्त्र आदि के बल से अपने पुत्र के शव की रक्षा कर रखी थी। ऋषियों ने उस शव को घेर लिया।
ऋषियों ने पहले वेन की जाँघ का मन्थन किया, ठीक वैसे जैसे अरणि से अग्नि निकाली जाती है।

उसमें से एक छोटे क़द का पुरुष निकला। कौए-सा काला, बौना, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, छोटी टाँगें, चपटी नाक, लाल नेत्र और ताँबे-से रंग के केश। चेहरे पर वही जलन, जो कभी वेन की आँखों में थी।
उसने बड़ी दीनता और नम्रता से पूछा, ”मैं क्या करूँ?”
ऋषि बोले, ”निषीद, बैठ जा।” उसी ”निषीद” से वह ”निषाद” कहलाया। उसने जन्म लेते ही वेन के सारे भयंकर पाप अपने ऊपर ले लिए थे, मानो वेन का सारा पाप गठरी की तरह बँधकर एक देह में उतर आया हो।
निषाद सिर झुकाए वन की ओर चल पड़ा। उसी से आगे वन और पर्वतों में बसने वाली निषाद-जाति चली, जो हिंसा और लूट-पाट में रत रहती है, यही पुराण कहता है।
वेन की देह अब हल्की हो चुकी थी, पाप उससे निकल चुका था। ऋषियों ने इस बार उसकी भुजाओं का मन्थन किया, और दाहिनी भुजा से एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ।

जो पुरुष प्रकट हुआ, उसके सामने दरबार की रोशनी फीकी पड़ गई। तेज से दमकता एक वीर, हाथ में धनुष और बाण, दाहिने हाथ में चक्र का चिह्न और चरणों में कमल का चिह्न।
उसके साथ ही एक तेजस्विनी, गुण और आभूषणों से अलंकृत सुन्दरी प्रकट हुई, उसकी सहधर्मिणी अर्ची।
ब्रह्मवादी ऋषियों ने हाथ जोड़ दिए। ”यह साक्षात् श्रीविष्णु की विश्वपालिनी कला से प्रकट हुआ है, इनका नाम पृथु। और यह स्त्री श्रीलक्ष्मी का अवतार है, इनकी अनपायिनी सहचरी अर्ची। राजाओं में यही प्रथम और परम यशस्वी सम्राट् होगा। यही हमारा राजा है।”
वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का विधिवत् राज्याभिषेक किया। उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग और पृथ्वी, सबने भाँति-भाँति के उपहार भेंट किए। मुकुट जिस माथे पर रखा गया, वह झुका हुआ था, गद्दी की भूख से नहीं, धर्म के भार से।
पर राजा बनते ही पृथु के सामने पहली विपदा खड़ी थी। वेन के कुशासन में धरती सूख चुकी थी, अन्न का एक दाना तक उगना बंद हो गया था।
धरती ने अपनी सारी उपज अपने भीतर समेट ली थी। वेन के अधर्मी राज में कोई योग्य रक्षक न रहा, तो उसने सारे अन्न के बीज अपने भीतर छिपा लिए थे।
पृथु को जब प्रजा की भूख की ख़बर मिली, उनका मन काँप उठा।
उन्होंने अपना धनुष उठाया, बाण चढ़ाया, और धरती की ओर बढ़े। उनका हाथ काँपा तक नहीं, पर मन में अपनी भूखी प्रजा के चेहरे थे, और एक रक्षक का संकल्प, जो अपने लोगों को भूख से मरते नहीं देख सकता।
धरती भयभीत होकर गाय का रूप धरकर भागी, दसों दिशाओं में दौड़ी, पर पृथु का बाण उसके पीछे ही रहा। आख़िर हारकर वह रुकी, थरथराती हुई।
”हे राजन्, मुझ पर बाण न चलाइए। स्त्री-वध का पाप आप क्यों लेंगे?”
”तो अपनी उपज लौटाइए। मेरे राज्य के लोग भूखे सो रहे हैं, और एक राजा से उनकी भूख नहीं देखी जाती।”
गाय-रूपी धरती ने सिर झुका लिया। ”तो एक उपाय है, राजन्। कोई योग्य बछड़ा खड़ा कीजिए, उपयुक्त पात्र रखिए, और मुझे प्रेम से दुहिए। जो रोककर रखा है, वह स्नेह से ही उतरेगा, बल से नहीं।”

पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाया, अपने ही हाथ को पात्र, और धरती को दुहा। जो धार निकली वह दूध नहीं, हर तरह का अन्न था, चावल, गेहूँ, जौ, दालें।
सूखी पड़ी धरती फिर हरी हो उठी। खलिहान भरने लगे, चूल्हे जलने लगे, और प्रजा के घरों में फिर से अन्न की महक लौट आई।
पृथु यहीं नहीं रुके। धरती पहले ऊबड़-खाबड़ थी, पहाड़ और पत्थर से भरी। उन्होंने उसे समतल किया, खेत काटे, रास्ते बनाए, बस्तियाँ बसाईं, ताकि मनुष्य धरती पर ठीक से जी सके।
उन्हीं पृथु के नाम से इस धरती का नाम पड़ा, ”पृथ्वी।”
पृथु ने बरसों धर्म से राज किया। न प्रजा को भूख रही, न अन्याय। जब उनका अंतिम समय आया, उन्होंने राजपाट छोड़ दिया और वन की ओर चल पड़े, तपस्या में लीन होने। अंत में वे श्रीहरि के धाम चले गए।
अर्ची उनसे एक क़दम भी पीछे नहीं रहीं। पति की चिता को ही अपना मार्ग मानकर, उन्होंने भी देह छोड़ी और उसी धाम में उनके साथ हो लीं।
परीक्षित् देर तक चुप रहे।
”मुनिवर, एक बात मन में अटक गई है। एक ही देह से पहले निषाद निकला, फिर पृथु। एक में सारा पाप, दूसरे में सारा तेज। वही वेन, और वही पिता का रक्त।”
शुकदेव मुस्कुराए। ”आपने ठीक देखा, राजन्। मनुष्य की एक ही देह में दोनों बसते हैं। जो उस पाप को पहचानकर वन की ओर बहा देता है, उसी का भीतरी तेज पृथु की तरह उठ खड़ा होता है।”
”और यह उठ खड़ा होना ही धर्म है। देखिए, ऋषियों ने वेन को मारा अवश्य, पर अपने हाथ से उसी की देह से एक रक्षक भी गढ़ा। दण्ड का अंत नाश में नहीं, फिर से धर्म खड़ा करने में है।”
”और एक बात, राजन्। पृथु ने धरती को बाण दिखाया, पर अन्न बल से नहीं, उसकी सहमति से निकला। धरती ने स्वयं कहा, बछड़ा खड़ा कीजिए, पात्र रखिए, प्रेम से दुहिए। राजा वही श्रेष्ठ है जो अपनी प्रजा को, अपनी धरती को, दुहता तो है, पर पालने वाले के स्नेह से, लुटेरे की भूख से नहीं।”
परीक्षित् ने सिर झुका लिया। उन्हें अपने ही राज के बीते दिन याद आए, और एक हल्की-सी शान्ति उनके चेहरे पर उतर आई।
शुकदेव ने कहा, ”जिसने अपने भीतर का वेन वन को सौंप दिया, उसी के भीतर पृथु जागता है।”
साहित्यिक-संदर्भ
वेन और पृथु की कथा श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 13 से 16 तक है। राजा वेन के अधर्मी राज से प्रजा त्रस्त हुई। ऋषियों ने ‘हुं’ मन्त्र से उसका वध किया, फिर उसकी जाँघ का मन्थन कर निषाद को निकाला, जिसमें वेन के सब पाप उतर गए, और उसकी भुजाओं के मन्थन से श्रीहरि के अंश पृथु तथा उनकी पत्नी अर्ची का प्राकट्य हुआ।
पृथु ने गाय का रूप धारण किए पृथ्वी से, स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर, समस्त अन्न का दोहन किया, और धरती को कृषि-योग्य बनाया। ‘पृथ्वी’ नाम इन्हीं पृथु महाराज से पड़ा।
दर्शन-दृष्टि
इस कथा का मर्म एक ही पंक्ति में है, कि राजा धरती और प्रजा का स्वामी नहीं, रक्षक है। वेन ने स्वयं को स्वामी माना, और सब निगल गया। पृथु ने स्वयं को सेवक माना, और धरती ने उन्हीं के आगे अपना सब कुछ खोल दिया।
धरती बल से नहीं, स्नेह से दुहती है। जो उसे माता मानकर पालता है, उसी की गोद में अन्न उतरता है। जो उसे केवल भोग की वस्तु समझता है, उसके सामने वह अपना सीना बंद कर लेती है। पृथु महाराज इसी धर्म के चिर-स्मरणीय प्रतीक हैं।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
हर पीढ़ी के सामने यही प्रश्न खड़ा रहता है, कि जिसके हाथ में दूसरों का जीवन सौंपा गया है, वह उसे पालता है या निचोड़ता है। वेन और पृथु एक ही देह के दो उत्तर हैं। जो भीतर का अहंकार वन को सौंप दे, उसी के भीतर रक्षक जागता है, और तभी धरती फिर से अन्न देती है।
यही कथा वहाँ भी
- हरिवंश · वेन और पृथु
हरिवंश का वेन और पृथु प्रसंग