राजा वेन और पृथु

कथा 36 · भागवतम् की कथाएँ

राजा वेन और पृथु

From a Dead King’s Thigh and Arm
स्कन्ध 4, अध्याय 13-16

अंग नामक एक राजा थे। बहुत धार्मिक।

उनकी पत्नी सुनीथा थी। पर उनकी कोई संतान नहीं थी।

एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ। मन्त्र-प्रसाद से एक बच्चा हुआ। पर वो बच्चा बहुत अजीब था।

उसकी आँखों में क्रोध था, बचपन से। उसके स्वभाव में अहंकार।

नाम रखा वेन।

अंग ने उसे पालने की पूरी कोशिश की। पर वेन जैसा था, वैसा ही रहा।

एक दिन अंग दुखी होकर रात में महल से निकल गए। कहीं चले गए। फिर कभी नहीं लौटे।

वेन छोटा था। पर ब्राह्मणों ने उसे राजा बना दिया, क्योंकि पिता-स्थान खाली था।

वेन के राज्य में चीज़ें ख़राब होने लगीं।

उसने हुक्म दिया, ”अब कोई भगवान को पूजेगा नहीं। मैं ही भगवान हूँ। मेरी ही पूजा करो।”

ब्राह्मण आए। समझाने की कोशिश की।

”राजन्, यह नहीं हो सकता। आप राजा हैं, पर भगवान नहीं।”

वेन ग़ुस्से में आ गया।

”तुम लोग बकवास हो। मैं ही सब कुछ हूँ।”

ब्राह्मणों ने आपस में बात की।

”इस राजा को अब ऐसे नहीं छोड़ सकते। यह पूरे राज्य को नष्ट कर देगा।”

उन्होंने एक मन्त्र पढ़ा। ”हुं!”

एक तरह की spiritual force। और वेन वहीं गिर पड़ा। मर गया।

अब राज्य फिर बिना राजा। और ब्राह्मणों ने एक अद्भुत काम किया।

वो वेन के शव के पास आए।

मथिते तस्य देहे च जायतेऽग्नेरग्रजः ।
निषादजीवनिषोऽनेकशो वने वसन् ॥

वेन की देह का मन्थन करने पर, पहले निषाद उत्पन्न हुआ, जो जंगल में रहता है। उसमें वेन के सब पाप समा गए।

उन्होंने पहले उसकी जाँघ का मन्थन किया। एक मन्त्र-तकनीक से।

उसमें से एक छोटा सा पुरुष निकला। बहुत बौना। काला। कुरूप।

”यह कौन है?”

ब्राह्मण बोले, ”यह वेन के सब पापों का concentrated रूप। निषाद।”

”इसे ले जाओ। जंगल में। यह वहीं रहेगा, अपनी जाति बनाएगा।”

निषाद चला गया। (इस से, पुराण के अनुसार, निषाद-जाति शुरू हुई, जो जंगलों में रहती है।)

अब वेन की देह में पाप कम। ब्राह्मणों ने उसकी भुजाओं का मन्थन किया।

और इस बार एक सुन्दर रूप निकला। तेजस्वी। हाथ में धनुष-बाण।

उसके साथ एक स्त्री। उसकी पत्नी, अर्ची।

ब्राह्मणों ने हाथ जोड़े। ”यह पृथु। राजा।”

पृथु को राज-तिलक हुआ। वो एक अच्छे राजा बने।

मगर एक problem थी। पृथु जब राजा बने, पृथ्वी पर बहुत सूखा था।

क्यों? क्योंकि पृथ्वी ने अपनी सब उपज छुपा ली थी। वो वेन के राज्य में अपमान महसूस कर रही थी, इसलिए कुछ नहीं दे रही थी।

पृथु को पता चला।

उन्होंने अपना धनुष-बाण लिया। पृथ्वी की तरफ़ दौड़े।

पृथ्वी एक गाय का रूप ले के भागी।

”हे राजा! मुझे मत मार!”

”तो दूध दो। मेरे राज्य के लोग भूखे हैं।”

पृथ्वी रुकीं। ”ठीक है, बच्चा-बछड़ा बनाओ। मुझे दुहो।”

पृथु ने एक बछड़े का रूप बनाया। पृथ्वी को दुहा। दूध निकला, मगर वो दूध सब प्रकार के अनाज था। चावल, गेहूँ, दालें।

पूरी पृथ्वी पर अनाज बरस गए।

लोगों को खाना मिला।

पृथु ने एक काम और किया। उन्होंने पृथ्वी को समतल कर दिया। पहले पहाड़-पथरीली थी। उन्होंने रास्ते बनाए, खेत बनाए।

”पृथ्वी” का नाम भी पृथु से ही है। ”पृथु से जुड़ी।”

पृथु ने सालों राज किया। बहुत अच्छा। जब आख़िरी समय आया, वो ख़ुद वन में चले गए। तपस्या की। और वैकुण्ठ चले गए।

अर्ची, उनकी पत्नी, उनके साथ। एक ideal couple।

मन्थन

वेन-पृथु की कथा एक पुराण-symbolism से भरी है।

एक दुष्ट राजा। उसे मार दिया। पर मारने वाले ब्राह्मण थे, सैनिक नहीं। यह एक interesting detail है।

और फिर उसकी देह से दो रूप निकले। पाप का concentrated form (निषाद), और पुण्य का concentrated form (पृथु)।

इस कथा का एक deep संदेश है। हम सब के अंदर ये दोनों हैं। पाप और पुण्य। एक ही देह में।

जब हम सच में, deeply, अपने आप को examine करते हैं, तब हमें यह बात दिखती है। हम सिर्फ़ अच्छे नहीं हैं। हम सिर्फ़ बुरे भी नहीं हैं। हम दोनों हैं।

और जब हम अपने पाप को ”अलग कर” सकते हैं, उसे एक तरफ़ रख सकते हैं (जंगल में निषाद की तरह), तब हमारा पुण्य निखरकर सामने आता है (पृथु की तरह)।

यह अलग करना mental work है। शायद meditation। शायद कथा-श्रवण। शायद सत्संग। पर यह possible है।

और दूसरी बात। पृथु ने पृथ्वी को धमकाकर अनाज माँगा। पृथ्वी ने दिया, मगर एक specific arrangement में। ”एक बछड़ा बनाओ, फिर दुहो।”

यानी पृथ्वी से चीज़ें माँगने का एक तरीक़ा है। उसे भी respect चाहिए। उसे भी रिश्ता चाहिए।

आज हम पृथ्वी से बहुत कुछ ले रहे हैं, मगर बिना उस relationship के। शायद इसीलिए वो हमें कम-कम दे रही है।