नारद का पूर्वजन्म
वृत्तान्त अब बीते युग की एक वर्षा-कालीन झोंपड़ी की ओर मुड़ता है।
“व्यासजी के मन में उस दिन कुछ संशय बाक़ी था, और नारद ने उसे शान्त करने के लिए अपनी ही कथा खोल दी थी।”
“व्यासजी,” नारद बोले थे, “मैं हमेशा से नारद नहीं था।”
“मेरा पिछला जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ। मैं एक दासी का बेटा था।”

“मेरी माँ कुछ वेदवादी ब्राह्मणों के घर में दासी थी। उनके खाना बनाती थी, उनके कपड़े धोती थी, सब करती थी। मेरे पिता का तो मुझे पता नहीं था।”
“मैं माँ के साथ रहता। एक झोंपड़ी में। मैं बहुत छोटा था। पाँच साल का।”
“एक दिन कुछ अद्भुत हुआ।”
“मेरी माँ जिनके घर काम करती थी, उन्हीं ब्राह्मणों के यहाँ कुछ साधु आकर ठहरे। चार महीने के लिए। वो वर्षा-काल था। साधुओं के लिए परंपरा है, चार महीने एक जगह रुकना, इधर-उधर नहीं जाना।”
“वो ब्राह्मण भले लोग थे। उन्होंने साधुओं को अपने घर में जगह दी। उन्हें खाना दिया।”
“मेरी माँ ने उनकी सेवा का काम पाया। और मुझे साथ ले गई।”
“चार महीने मैंने उनके सामने बिताए।”
“वो साधु करते क्या थे? पूरा दिन भगवान का नाम लेते। हरि-कथा कभी सुनते, कभी सुनाते। यज्ञ की धूप का धुआँ आँगन में फैला रहता। शाम ढले उनके कीर्तन की आवाज़ झोंपड़ी तक आती।”
“और जब वो खाना खाते, तो मैं देखता रहता।”

“उनके खाने के बाद, जो उच्छिष्ट (जूठा) बचता, वो मेरी माँ हटाती थी। मेरे शील-स्वभाव को देखकर वो महात्मा मुझ पर बड़े प्रसन्न रहते थे।”
“एक दिन उन्हीं साधुओं ने मुझे अनुमति दी।”
“बरतनों में जो प्रसाद लगा रह गया था, वो मैंने एक बार खा लिया।”
“उसी क्षण मेरे अंदर कुछ हुआ।”
“देह जैसे धुल गया। मन जैसे किसी ने उजाला कर दिया। मैं उठकर खड़ा हो गया। मुँह में अभी उस प्रसाद का स्वाद बाक़ी था, और उसी के साथ भीतर कोई याद उतर आई थी।”
“किसकी याद? मुझे ख़ुद नहीं पता था।”
“वो साधु पूरा दिन श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ गाते-सुनाते थे। उनकी कृपा से मैं भी हर दिन वो कथाएँ सुनने लगा।”
“श्रद्धा से एक-एक पद सुनते-सुनते भगवान की कीर्ति में मेरी रुचि गहरी होती चली गई।”
“चार महीने ख़त्म हुए। साधु चले गए। मैं वहीं रहा।”
“मगर अब मैं वही नहीं था। मेरा हृदय शुद्ध हो चुका था। एक भक्त-समान। पाँच साल का।”
“वो कथाएँ मेरे भीतर गूँजती रहतीं। पूरे दिन। माँ के साथ काम करते-करते भी।”

“फिर कुछ बरस बाद एक रात माँ अँधेरे में बाहर निकली, गाय दुहने। पाँव के नीचे एक साँप था। उसने डँस लिया। माँ वहीं, उसी मिट्टी पर, चल बसी।”
“मैं अकेला हो गया।”
“मेरे पास अब कोई नहीं था। मैंने सोचा, ”अब क्या करूँ?“ मैंने तय किया कि भगवान को ही ढूँढूँगा।”
“मैं उत्तर की तरफ़ निकला। पैदल। एक छोटे बच्चे के लिए लंबा सफ़र।”
“रास्ते में कई जंगल पार किए। हर रात एक पेड़ के नीचे सोता। जो मिल जाता, खा लेता। फल, सूखी रोटी जो लोग दे देते।”
“और हर समय वही कथाएँ, वही नारायण का नाम मन में गूँजता रहता।”
“एक दिन मैं एक घने जंगल में पहुँचा। शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गईं, बड़ी प्यास लगी, भूख तो थी ही। वहीं पास एक नदी मिली। उसके जल में स्नान किया, जलपान किया, आचमन किया, तो थकान मिट गई।”

“उसी निर्जन वन में एक पीपल के नीचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। आँखें मूँदीं। और जैसा उन महात्माओं से सुना था, उसी रूप का अपने हृदय में बैठे परमात्मा का मैं ध्यान करने लगा।”
“और तब, भक्ति से वशीभूत हुए मन के द्वारा भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करते-करते, मेरे हृदय में धीरे-धीरे भगवान प्रकट हो गए।”
“उस समय प्रेम के उद्रेक से मेरा सारा शरीर पुलकित हो उठा। हृदय शान्त और शीतल हो गया। उस आनन्द की बाढ़ में मैं ऐसा डूबा कि अपना और ध्येय का कुछ भी भान न रहा।”
“फिर वो रूप सहसा ओझल हो गया। मैं विकल हो उठा, उठ खड़ा हुआ, मन को हृदय में समेटकर बार-बार उसी रूप को देखना चाहा, पर फिर न देख सका। मैं अतृप्त-सा आतुर हो उठा।”
“तभी उस निर्जन वन में मुझे एक वाणी सुनाई दी। गम्भीर और मधुर, मेरे शोक को शान्त करती हुई।”
“’खेद है कि इस जन्म में आप मेरा दर्शन फिर न कर सकेंगे। जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शान्त नहीं हुईं, उन अधकचरे योगियों को मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है।”’
“’निष्पाप बालक! आपके हृदय में मुझे पाने की लालसा जगाने के लिये ही मैंने एक बार आपको अपने रूप की यह झलक दिखाई। मुझे पाने की आकांक्षा से युक्त साधक धीरे-धीरे हृदय की सम्पूर्ण वासनाओं का त्याग कर देता है।”’
“’इस अल्पकालीन सन्त-सेवा से ही आपकी चित्तवृत्ति मुझमें स्थिर हो गई है। अब इस प्राकृत मलिन शरीर को छोड़कर आप मेरे पार्षद हो जाएँगे। मुझे पाने का यह दृढ़ निश्चय अब कभी न टूटेगा। समस्त सृष्टि का प्रलय हो जाने पर भी मेरी यह स्मृति आपमें बनी रहेगी।”’
“आकाश के समान अव्यक्त, सर्वशक्तिमान परमात्मा इतना कहकर मौन हो रहे। उनकी इस कृपा को पाकर मैंने उन परम श्रेष्ठ भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम किया।”
“फिर लज्जा-संकोच छोड़कर मैं भगवान के मधुर नामों और लीलाओं का कीर्तन और स्मरण करने लगा। स्पृहा और मद-मत्सर तो पहले ही निवृत्त हो चुके थे। अब आनन्द से कल्प के अन्त की प्रतीक्षा करता हुआ मैं पृथ्वी पर विचरता रहा। समय आने पर प्रारब्ध-कर्म समाप्त हो जाने से मेरा यह पाँचभौतिक शरीर गिर गया।”

“प्रलय के समय जब ब्रह्माजी इस सृष्टि को समेटकर नारायण के हृदय में प्रवेश करने लगे, तब उनके साथ मैं भी उनमें प्रवेश कर गया। एक सहस्र चतुर्युगी बीतने पर जब ब्रह्माजी फिर जागे, तब मरीचि आदि ऋषियों के साथ मैं भी उनसे प्रकट हुआ। यही मेरा अगला जन्म, नारद का जन्म, हुआ। एक काम, कि सब को नारायण की कथा सुनाऊँ।”
“व्यासजी, मेरी कहानी यह है।”
व्यास ने हाथ जोड़े। बहुत देर तक कुछ न कहा।
“नारद, अब मैं समझा।”
“इसीलिए,” नारद ने मुस्कुराकर कहा, “आप जो ग्रन्थ लिखने जा रहे हैं, उसमें मेरी यह कथा भी रहे। जहाँ से एक दासी का बेटा चला था, वहीं से यह सब चला।”
नारद उठे। तानपूरे का एक तार छेड़ा, और वह स्वर आँगन की धूप में काँपता हुआ दूर तक फैल गया। फिर वे उसी हवा में, उसी नारायण-नाम के साथ, ओझल हो गए, और व्यासजी देर तक उस खाली आँगन की ओर देखते रहे, जहाँ अब केवल तानपूरे की एक मद्धम गूँज बची थी।
साहित्यिक-संदर्भ
नारद का पूर्वजन्म श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 5-6 में आता है, जहाँ वे इसे स्वयं व्यासजी को सुनाते हैं। दासी-पुत्र से देवर्षि तक की यह यात्रा भागवत में नारद की उस भूमिका की जड़ है, जिसमें वे ध्रुव से लेकर अनेक कथाओं की पहली चिंगारी बनते हैं।
नारद का पूर्वजन्म: एक दासी-पुत्र, जिसने एक बार साधुओं की संगति पाई, अगले जन्म में नारद हो गया। कितनों की भीतरी खोज एक अकेली सत्संग की शाम से शुरू होती है, और बाक़ी सारी उम्र उसी एक शाम का खुलना भर होती है।