नारद का पूर्वजन्म

कथा 21 · भागवतम् की कथाएँ

नारद का पूर्वजन्म

The Servant-Boy Who Became a Sage
स्कन्ध 1, अध्याय 5-6

नारद को सब जानते हैं।

वो हर पुराण में आते हैं। एक तानपूरा, ”नारायण नारायण” का जाप, और कहीं भी, कभी भी, किसी के सामने प्रकट हो सकते हैं।

वो देवों के सलाहकार हैं। ऋषियों के मित्र। राक्षसों के परीक्षक। और कुछ ख़ास भक्तों के गुरु।

मगर एक बार उन्होंने ख़ुद अपनी कहानी बताई थी।

व्यासजी को।

जब व्यास भागवतम् लिखने वाले थे, और उन्हें कुछ doubt थे, तब नारद ने अपना पूर्वजन्म सुनाया। यह कथा भागवतम् के पहले स्कन्ध में आती है।

”व्यासजी,” नारद बोले, ”मैं हमेशा से नारद नहीं था।”

”मेरा पिछला जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ। मैं एक दासी का बेटा था।”

”मेरी माँ एक धनवान के घर में काम करती थी। उनके खाना बनाती थी, उनके कपड़े धोती थी, सब करती थी। मेरे पिता का तो मुझे पता नहीं था।”

”मैं माँ के साथ रहता। एक झोंपड़ी में। मैं बहुत छोटा था। पाँच साल का।”

”एक दिन कुछ अद्भुत हुआ।”

”मेरी माँ जिनके घर काम करती थी, उनके यहाँ चार साधु आए। वैष्णव साधु। चार महीने के लिए। वो वर्षा-काल था। साधुओं के लिए परंपरा है, चार महीने एक जगह रुकना, इधर-उधर नहीं जाना।”

”वो धनवान भले आदमी थे। उन्होंने साधुओं को अपने घर में जगह दी। उन्हें खाना दिया।”

”मेरी माँ ने उनकी सेवा का काम पाया। और मुझे साथ ले गई।”

”चार महीने मैंने उनके सामने बिताए।”

”वो साधु क्या करते थे? पूरा दिन भगवान का नाम लेते थे। हरि-कथा सुनते-सुनाते। यज्ञ करते। ध्यान करते।”

”और जब वो खाना खाते, तो मैं देखता रहता।”

”उनके खाने के बाद, जो उच्छिष्ट (जूठा) बचता, वो मेरी माँ हटाती थी। साधु कह जाते, ”इसे फेंक देना, बच्चा है, इसे न देना।” मेरी माँ डरती कि अगर पवित्र भोजन गन्दे हाथ छुएँगे तो दोष लगेगा।”

”पर एक दिन, माँ कहीं और गई थी। मैं भूखा था।”

”साधु की थाली में थोड़ा सा बच गया था। एक चम्मच भर खिचड़ी। मैंने वो उठाया और खाया।”

”उसी क्षण मेरे अंदर कुछ हुआ।”

”मेरा शरीर साफ़ हो गया। मेरा मन साफ़ हुआ। मुझे एक चमक महसूस हुई। बहुत गहराई से। मैं उठकर खड़ा हो गया, और मुझे खाने का स्वाद नहीं था अब, बल्कि एक memory थी।”

”किस की memory? मुझे नहीं पता था।”

उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैः ।
सकृत्स्म भुञ्जे तदपास्तकिल्बिषः ॥
(श्रीमद्भागवत 1.5.25 का भाव)

साधुओं की अनुमति से, मैंने एक बार उनकी थाली का बचा हुआ खाना खाया। उसी क्षण मेरे सब पाप दूर हो गए।

”उन साधुओं ने यह देखा। उन्होंने मुझे एक side में बुलाया।”

””बेटे,” एक ने कहा, ”तुम्हें यह जूठन खाने से एक भक्त का दर्जा मिल गया है। तुम्हारे पिछले पाप जल गए। अब तुम भगवान का नाम ले सकते हो।”’

”और उन्होंने मुझे ”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का मन्त्र दिया।”

”चार महीने ख़त्म हुए। साधु चले गए। मैं वहीं रहा।”

”मगर अब मैं वही नहीं था। मैं एक मन्त्र-धारी था। एक भक्त-समान। पाँच साल का।”

”मैंने मन्त्र का जप शुरू किया। पूरे दिन। माँ के साथ काम करते-करते भी।”

”फिर कुछ साल बाद एक accident हुआ। मेरी माँ एक रात बाहर निकली, गाय का दूध दुहने। एक साँप ने उसे डँसा। वो वहीं मर गई।”

”मैं अकेला हो गया।”

”मेरे पास अब कोई नहीं था। मैंने सोचा, ”अब क्या करूँ?” मैंने तय किया कि भगवान को ही ढूँढूँगा।”

”मैं उत्तर की तरफ़ निकला। पैदल। एक छोटे बच्चे के लिए लंबा सफ़र।”

”रास्ते में कई जंगल पार किए। हर रात एक पेड़ के नीचे सोता। जो मिल जाता, खा लेता। फल, सूखी रोटी जो लोग दे देते।”

”और हर समय वो मन्त्र। ”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”’

”एक दिन मैं एक घने जंगल में पहुँचा। थक गया। एक पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें मूँदीं।”

”और तब, ध्यान में, मुझे एक दर्शन हुआ।”

”भगवान विष्णु। बहुत clear। मेरे सामने।”

”वो मुस्कुराए। बोले, ”बेटा, इस जन्म में तू एक बार मुझे देख चुका है। अब काफ़ी है। तू तब तक मुझे फिर नहीं देख पाएगा जब तक तेरा अगला जन्म नहीं हो।”’

”मेरी आँखें भर आईं। ”क्यों, भगवान?”’

””तेरा पुण्य अभी कम है। पर एक बात है। इस छोटे से दर्शन ने तेरे अंदर एक प्यास पैदा कर दी है। यह प्यास तुझे अगले जन्म में पूरा कर देगी।”’

”उन्होंने एक काम किया। मेरे सिर पर हाथ रखा। और मुझे एक वर दिया।”

”अगले जन्म में, तू देवों के बीच रहेगा। तेरा नाम होगा नारद। तू तानपूरा हाथ में रखेगा, और मेरा नाम लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमेगा।”’

”वो दर्शन ख़त्म हुआ। मैं उठा। एक साल और मैंने पूरे जंगल में घूमते हुए बिताया। फिर एक दिन मेरी देह गिरी।”

”और मैं ब्रह्मा के मन से जन्म लिया। उनका मानस-पुत्र। नारद नाम। एक तानपूरा। एक मन्त्र। एक काम, कि सब को नारायण की कथा सुनाऊँ।”

”व्यासजी, मेरी कहानी यह है।”

व्यास ने हाथ जोड़े।

”नारद, अब मैं समझा। आप ने मुझे यह कथा क्यों बताई?”

”क्योंकि,” नारद ने मुस्कुराकर कहा, ”आप अब भागवतम् लिखने वाले हैं। और भागवतम् में यह कथा सबसे पहले आनी चाहिए। मेरी अपनी।”

”क्यों?”

”क्योंकि पाठक को यह जानना चाहिए कि एक दासी का बेटा भी, साधुओं की एक थाली से, ब्रह्मा का मानस-पुत्र बन सकता है। शुरुआत कहीं से हो सकती है।”

मन्थन

नारद की कथा भागवतम् की पहली कथाओं में से है। और इसकी जगह wisely चुनी गई है।

अगर भागवतम् किसी एक मनुष्य की कथा से शुरू होता, तो शायद कोई राजा की कथा होती। कोई ऋषि की। कोई ज्ञानी की।

मगर नहीं। यह एक दासी के बच्चे की कथा से शुरू होती है।

बच्चा जिसका पिता नहीं था। जो ज़मीन पर बैठकर साधुओं का जूठा खाता था।

और इसी बच्चे को, इसी जन्म-स्थिति में, मन्त्र-दीक्षा मिली। मन्त्र-दीक्षा ने उसकी पूरी ज़िन्दगी बदली। अगले जन्म में वो नारद बने।

भागवतम् यहाँ एक powerful statement कर रहा है। भक्ति की दुनिया में जात-कुल-स्थिति काम नहीं करती। एक दासी का बच्चा भी ब्रह्मा का मानस-पुत्र बन सकता है।

एक छोटी सी जूठन भी, अगर सच्चे साधुओं की हो, और सच्चे intent से खाई जाए, तो एक पूरा जन्म बदल सकती है।

हम सब अपनी ज़िंदगी में जो stuff छोटा-मोटा करते हैं, साधु-संगति, कथा-श्रवण, एक छोटा सा जप, वो सब accumulate होता है। शायद इस जन्म में नहीं। पर बहाव कहीं तो जा रहा है।