लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग गूजरी

राग · M1-M5 + भगत

राग गूजरी

सुबह की देर की धुन, नर्म विनती।

गुजरी राग सुबह की देर का है। उसी समय का जब काम शुरू हो चुका हो, मगर सुबह की ताज़गी अभी छूटी नहीं हो। एक तरह की नर्म विनती के स्वर में बैठा है।

नाम का स्रोत संदिग्ध है, गुजरात से इसका कोई सीधा सम्बन्ध शायद नहीं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय परम्परा में "गुर्जरी टोडी" इसी कुल से जुड़ा हो सकता है, मगर निश्चय कठिन है।

"काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥" गूजरी M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (7)
  1. तेरा नामु करी चनणाठीआ जे मनु उरसा होइ ॥अंग 489
  2. नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥अंग 489
  3. एक नगरी पंच चोर बसीअले बरजत चोरी धावै ॥अंग 503
  4. कवन कवन जाचहि प्रभ दाते ता के अंत न परहि सुमार ॥अंग 503
  5. ऐ जी जनमि मरै आवै फुनि जावै बिनु गुर गति नही काई ॥अंग 504
  6. ऐ जी ना हम उतम नीच न मधिम हरि सरणागति हरि के लोग ॥अंग 504
  7. भगति प्रेम आराधितं सचु पिआस परम हितं ॥अंग 505
महला 3 (74)
  1. ध्रिगु इवेहा जीवणा जितु हरि प्रीति न पाइ ॥अंग 490
  2. हरि की सेवा ते मनहु चिंदिआ फलु पाईऐ दूजी सेवा जनमु बिरथा जाइ जी ॥1॥अंग 490
  3. जुग माहि नामु दुलंभु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥अंग 490
  4. राम राम सभु को कहै कहिऐ रामु न होइ ॥अंग 491
  5. तिसु जन सांति सदा मति निहचल जिस का अभिमानु गवाए ॥अंग 491
  6. ना कासी मति ऊपजै ना कासी मति जाइ ॥अंग 491
  7. एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥अंग 492
  8. निरति करी इहु मनु नचाई ॥अंग 506
  9. इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥अंग 508
  10. अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥अंग 508
  11. आपणा आपु उपाइओनु तदहु होरु न कोई ॥अंग 509
  12. साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ ॥अंग 509
  13. सचा नामु धिआईऐ सभो वरतै सचु ॥अंग 509
  14. संजोगु विजोगु उपाइओनु स्रिसटी का मूलु रचाइआ ॥अंग 509
  15. सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥अंग 509
  16. गुर की सिख को विरला लेवै ॥अंग 509
  17. माइआ मोहु अगिआनु है बिखमु अति भारी ॥अंग 509
  18. कबीर मुकति दुआरा संकुड़ा राई दसवै भाइ ॥अंग 509
  19. नानक मुकति दुआरा अति नीका नान॑ा होइ सु जाइ ॥अंग 509
  20. प्रभि संसारु उपाइ कै वसि आपणै कीता ॥अंग 510
  21. सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥अंग 510
  22. माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥अंग 510
  23. ढाढी करे पुकार प्रभू सुणाइसी ॥अंग 510
  24. सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥अंग 510
  25. रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥अंग 510
  26. सभु जगु फिरि मै देखिआ हरि इको दाता ॥अंग 510
  27. काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥अंग 510
  28. एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥अंग 511
  29. मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥अंग 511
  30. ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥अंग 511
  31. मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥अंग 511
  32. बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥अंग 511
  33. जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥अंग 511
  34. ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥अंग 511
  35. सतु संतोखु सभु सचु है गुरमुखि पविता ॥अंग 512
  36. ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु कहीऐ जि अनदिनु हरि लिव लाए ॥अंग 512
  37. अंतरि कपटु मनमुख अगिआनी रसना झूठु बोलाइ ॥अंग 512
  38. जिना हुकमु मनाइओनु ते पूरे संसारि ॥अंग 512
  39. गुरमुखि धिआन सहज धुनि उपजै सचि नामि चितु लाइआ ॥अंग 512
  40. सतिगुरु जिना न सेविओ सबदि न लगो पिआरु ॥अंग 512
  41. भगत सचै दरि सोहदे सचै सबदि रहाए ॥अंग 513
  42. कलिजुग महि नामु निधानु भगती खटिआ हरि उतम पदु पाइआ ॥अंग 513
  43. त्रै गुण माइआ वेखि भुले जिउ देखि दीपकि पतंग पचाइआ ॥अंग 513
  44. माइआ मोहु परेतु है कामु क्रोधु अहंकारा ॥अंग 513
  45. हउमै ममता मोहणी मनमुखा नो गई खाइ ॥अंग 513
  46. इहु मनु केतड़िआ जुग भरमिआ थिरु रहै न आवै जाइ ॥अंग 513
  47. काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥अंग 514
  48. वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥अंग 514
  49. वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥अंग 514
  50. बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥अंग 514
  51. वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥अंग 514
  52. वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥अंग 514
  53. ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥अंग 514
  54. वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥अंग 514
  55. वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥अंग 515
  56. हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥अंग 515
  57. वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥अंग 515
  58. वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥अंग 515
  59. सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥अंग 515
  60. वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥अंग 515
  61. बिनु सतिगुर सेवे साति न आवई दूजी नाही जाइ ॥अंग 516
  62. ढाढी तिस नो आखीऐ जि खसमै धरे पिआरु ॥अंग 516
  63. गूजरी जाति गवारि जा सहु पाए आपणा ॥अंग 516
  64. सदा सदा सालाहीऐ सचे कउ बलि जाउ ॥अंग 516
  65. अंसा अउतारु उपाइओनु भाउ दूजा कीआ ॥अंग 516
  66. एहु सभु किछु आवण जाणु है जेता है आकारु ॥अंग 516
  67. मनु कुंचरु पीलकु गुरू गिआनु कुंडा जह खिंचे तह जाइ ॥अंग 516
  68. तिसु आगै अरदासि जिनि उपाइआ ॥अंग 516
  69. खेति मिआला उचीआ घरु उचा निरणउ ॥अंग 517
  70. मिठा सो जो भावदा सजणु सो जि रासि ॥अंग 517
  71. प्रभ पासि जन की अरदासि तू सचा सांई ॥अंग 517
  72. आसा करता जगु मुआ आसा मरै न जाइ ॥अंग 517
  73. आसा मनसा मरि जाइसी जिनि कीती सो लै जाइ ॥अंग 517
  74. आपे जगतु उपाइओनु करि पूरा थाटु ॥अंग 517
महला 4 (8)
  1. हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥अंग 492
  2. गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥अंग 492
  3. जो जनु सुणै सरधा भगति सेती करि किरपा हरि निसतारे ॥1॥अंग 493
  4. होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥अंग 493
  5. गुरमुखि सखी सहेली मेरी मो कउ देवहु दानु हरि प्रान जीवाइआ ॥अंग 493
  6. जिन सतिगुरु पुरखु जिनि हरि प्रभु पाइआ मो कउ करि उपदेसु हरि मीठ लगावै ॥अंग 494
  7. माई बाप पुत्र सभि हरि के कीए ॥अंग 494
  8. हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥अंग 506
महला 5 (97)
  1. सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥अंग 495
  2. किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥अंग 495
  3. हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥अंग 495
  4. जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥अंग 496
  5. मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥अंग 496
  6. नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥अंग 496
  7. जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥अंग 497
  8. प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥अंग 497
  9. दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥अंग 497
  10. पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥अंग 498
  11. है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥अंग 498
  12. मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥अंग 498
  13. दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥अंग 498
  14. मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन॑े बसि अपनही ॥अंग 498
  15. दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥अंग 499
  16. मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥अंग 499
  17. आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥अंग 499
  18. खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥अंग 499
  19. तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥अंग 499
  20. करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥अंग 500
  21. ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥अंग 500
  22. अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥अंग 500
  23. बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥अंग 500
  24. जन की पैज सवारी आप ॥अंग 500
  25. कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥अंग 500
  26. रसना राम राम रवंत ॥अंग 501
  27. छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥अंग 501
  28. आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥अंग 501
  29. गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥अंग 501
  30. अहंबुधि बहु सघन माइआ महा दीरघ रोगु ॥अंग 502
  31. आराधि स्रीधर सफल मूरति करण कारण जोगु ॥अंग 502
  32. तूं समरथु सरनि को दाता दुख भंजनु सुख राइ ॥अंग 502
  33. राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥अंग 507
  34. नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥अंग 508
  35. अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥अंग 517
  36. रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥अंग 517
  37. अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥अंग 518
  38. जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥अंग 518
  39. किती बैहनि॑ बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥अंग 518
  40. तुधु धिआइनि॑ बेद कतेबा सणु खड़े ॥अंग 518
  41. चंगिआइंी आलकु करे बुरिआइंी होइ सेरु ॥अंग 518
  42. कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥अंग 518
  43. हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥अंग 518
  44. साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥अंग 518
  45. पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥अंग 518
  46. नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥अंग 518
  47. कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥अंग 519
  48. सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥अंग 519
  49. सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥अंग 519
  50. मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥अंग 519
  51. द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥अंग 519
  52. जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥अंग 519
  53. लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥अंग 519
  54. बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥अंग 519
  55. पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥अंग 519
  56. प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥अंग 520
  57. तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥अंग 520
  58. होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥अंग 520
  59. नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥अंग 520
  60. जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥अंग 520
  61. आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥अंग 520
  62. बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥अंग 520
  63. सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥अंग 520
  64. सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥अंग 520
  65. विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥अंग 520
  66. जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥अंग 521
  67. तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥अंग 521
  68. कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥अंग 521
  69. खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥अंग 521
  70. आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥अंग 521
  71. लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥अंग 521
  72. पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥अंग 521
  73. वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥अंग 521
  74. जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥अंग 521
  75. रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥अंग 521
  76. भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥अंग 521
  77. कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 522
  78. पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥अंग 522
  79. सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥अंग 522
  80. किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥अंग 522
  81. नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥अंग 522
  82. सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥अंग 522
  83. धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥1॥अंग 522
  84. सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥अंग 522
  85. तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥अंग 522
  86. काम क्रोध मद लोभ मोह दुसट बासना निवारि ॥अंग 523
  87. खांदिआ खांदिआ मुहु घठा पैनंदिआ सभु अंगु ॥अंग 523
  88. जिउ जिउ तेरा हुकमु तिवै तिउ होवणा ॥अंग 523
  89. जीवदिआ न चेतिओ मुआ रलंदड़ो खाक ॥अंग 523
  90. जीवंदिआ हरि चेतिआ मरंदिआ हरि रंगि ॥अंग 523
  91. आदि जुगादी आपि रखण वालिआ ॥अंग 523
  92. आदि मधि अरु अंति परमेसरि रखिआ ॥अंग 523
  93. तिस नो मंनि वसाइ जिनि उपाइआ ॥अंग 523
  94. निंदक मारे ततकालि खिनु टिकण न दिते ॥अंग 523
  95. रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥अंग 524
  96. कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 524
  97. सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥अंग 524
भगत कबीर जी (2)
  1. चारि पाव दुइ सिंग गुंग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥अंग 524
  2. मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥अंग 524
भगत नामदेव जी (2)
  1. जौ राजु देहि त कवन बडाई ॥अंग 525
  2. मलै न लाछै पार मलो परमलीओ बैठो री आई ॥अंग 525
भगत रविदास जी (1)
  1. दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥अंग 525
अन्य भगत (3)
  1. अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥अंग 525
  2. अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥अंग 526
  3. परमादि पुरखमनोपिमं सति आदि भाव रतं ॥अंग 526

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