राग गूजरी
सुबह की देर की धुन, नर्म विनती।
गुजरी राग सुबह की देर का है। उसी समय का जब काम शुरू हो चुका हो, मगर सुबह की ताज़गी अभी छूटी नहीं हो। एक तरह की नर्म विनती के स्वर में बैठा है।
नाम का स्रोत संदिग्ध है, गुजरात से इसका कोई सीधा सम्बन्ध शायद नहीं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय परम्परा में "गुर्जरी टोडी" इसी कुल से जुड़ा हो सकता है, मगर निश्चय कठिन है।
"काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥" गूजरी M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (7)
- तेरा नामु करी चनणाठीआ जे मनु उरसा होइ ॥अंग 489
- नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥अंग 489
- एक नगरी पंच चोर बसीअले बरजत चोरी धावै ॥अंग 503
- कवन कवन जाचहि प्रभ दाते ता के अंत न परहि सुमार ॥अंग 503
- ऐ जी जनमि मरै आवै फुनि जावै बिनु गुर गति नही काई ॥अंग 504
- ऐ जी ना हम उतम नीच न मधिम हरि सरणागति हरि के लोग ॥अंग 504
- भगति प्रेम आराधितं सचु पिआस परम हितं ॥अंग 505
महला 3 (74)
- ध्रिगु इवेहा जीवणा जितु हरि प्रीति न पाइ ॥अंग 490
- हरि की सेवा ते मनहु चिंदिआ फलु पाईऐ दूजी सेवा जनमु बिरथा जाइ जी ॥1॥अंग 490
- जुग माहि नामु दुलंभु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥अंग 490
- राम राम सभु को कहै कहिऐ रामु न होइ ॥अंग 491
- तिसु जन सांति सदा मति निहचल जिस का अभिमानु गवाए ॥अंग 491
- ना कासी मति ऊपजै ना कासी मति जाइ ॥अंग 491
- एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥अंग 492
- निरति करी इहु मनु नचाई ॥अंग 506
- इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥अंग 508
- अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥अंग 508
- आपणा आपु उपाइओनु तदहु होरु न कोई ॥अंग 509
- साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ ॥अंग 509
- सचा नामु धिआईऐ सभो वरतै सचु ॥अंग 509
- संजोगु विजोगु उपाइओनु स्रिसटी का मूलु रचाइआ ॥अंग 509
- सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥अंग 509
- गुर की सिख को विरला लेवै ॥अंग 509
- माइआ मोहु अगिआनु है बिखमु अति भारी ॥अंग 509
- कबीर मुकति दुआरा संकुड़ा राई दसवै भाइ ॥अंग 509
- नानक मुकति दुआरा अति नीका नान॑ा होइ सु जाइ ॥अंग 509
- प्रभि संसारु उपाइ कै वसि आपणै कीता ॥अंग 510
- सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥अंग 510
- माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥अंग 510
- ढाढी करे पुकार प्रभू सुणाइसी ॥अंग 510
- सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥अंग 510
- रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥अंग 510
- सभु जगु फिरि मै देखिआ हरि इको दाता ॥अंग 510
- काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥अंग 510
- एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥अंग 511
- मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥अंग 511
- ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥अंग 511
- मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥अंग 511
- बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥अंग 511
- जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥अंग 511
- ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥अंग 511
- सतु संतोखु सभु सचु है गुरमुखि पविता ॥अंग 512
- ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु कहीऐ जि अनदिनु हरि लिव लाए ॥अंग 512
- अंतरि कपटु मनमुख अगिआनी रसना झूठु बोलाइ ॥अंग 512
- जिना हुकमु मनाइओनु ते पूरे संसारि ॥अंग 512
- गुरमुखि धिआन सहज धुनि उपजै सचि नामि चितु लाइआ ॥अंग 512
- सतिगुरु जिना न सेविओ सबदि न लगो पिआरु ॥अंग 512
- भगत सचै दरि सोहदे सचै सबदि रहाए ॥अंग 513
- कलिजुग महि नामु निधानु भगती खटिआ हरि उतम पदु पाइआ ॥अंग 513
- त्रै गुण माइआ वेखि भुले जिउ देखि दीपकि पतंग पचाइआ ॥अंग 513
- माइआ मोहु परेतु है कामु क्रोधु अहंकारा ॥अंग 513
- हउमै ममता मोहणी मनमुखा नो गई खाइ ॥अंग 513
- इहु मनु केतड़िआ जुग भरमिआ थिरु रहै न आवै जाइ ॥अंग 513
- काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥अंग 514
- वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥अंग 514
- वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥अंग 514
- बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥अंग 514
- वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥अंग 514
- वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥अंग 514
- ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥अंग 514
- वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥अंग 514
- वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥अंग 515
- हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥अंग 515
- वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥अंग 515
- वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥अंग 515
- सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥अंग 515
- वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥अंग 515
- बिनु सतिगुर सेवे साति न आवई दूजी नाही जाइ ॥अंग 516
- ढाढी तिस नो आखीऐ जि खसमै धरे पिआरु ॥अंग 516
- गूजरी जाति गवारि जा सहु पाए आपणा ॥अंग 516
- सदा सदा सालाहीऐ सचे कउ बलि जाउ ॥अंग 516
- अंसा अउतारु उपाइओनु भाउ दूजा कीआ ॥अंग 516
- एहु सभु किछु आवण जाणु है जेता है आकारु ॥अंग 516
- मनु कुंचरु पीलकु गुरू गिआनु कुंडा जह खिंचे तह जाइ ॥अंग 516
- तिसु आगै अरदासि जिनि उपाइआ ॥अंग 516
- खेति मिआला उचीआ घरु उचा निरणउ ॥अंग 517
- मिठा सो जो भावदा सजणु सो जि रासि ॥अंग 517
- प्रभ पासि जन की अरदासि तू सचा सांई ॥अंग 517
- आसा करता जगु मुआ आसा मरै न जाइ ॥अंग 517
- आसा मनसा मरि जाइसी जिनि कीती सो लै जाइ ॥अंग 517
- आपे जगतु उपाइओनु करि पूरा थाटु ॥अंग 517
महला 4 (8)
- हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥अंग 492
- गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥अंग 492
- जो जनु सुणै सरधा भगति सेती करि किरपा हरि निसतारे ॥1॥अंग 493
- होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥अंग 493
- गुरमुखि सखी सहेली मेरी मो कउ देवहु दानु हरि प्रान जीवाइआ ॥अंग 493
- जिन सतिगुरु पुरखु जिनि हरि प्रभु पाइआ मो कउ करि उपदेसु हरि मीठ लगावै ॥अंग 494
- माई बाप पुत्र सभि हरि के कीए ॥अंग 494
- हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥अंग 506
महला 5 (97)
- सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥अंग 495
- किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥अंग 495
- हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥अंग 495
- जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥अंग 496
- मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥अंग 496
- नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥अंग 496
- जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥अंग 497
- प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥अंग 497
- दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥अंग 497
- पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥अंग 498
- है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥अंग 498
- मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥अंग 498
- दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥अंग 498
- मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन॑े बसि अपनही ॥अंग 498
- दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥अंग 499
- मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥अंग 499
- आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥अंग 499
- खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥अंग 499
- तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥अंग 499
- करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥अंग 500
- ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥अंग 500
- अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥अंग 500
- बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥अंग 500
- जन की पैज सवारी आप ॥अंग 500
- कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥अंग 500
- रसना राम राम रवंत ॥अंग 501
- छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥अंग 501
- आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥अंग 501
- गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥अंग 501
- अहंबुधि बहु सघन माइआ महा दीरघ रोगु ॥अंग 502
- आराधि स्रीधर सफल मूरति करण कारण जोगु ॥अंग 502
- तूं समरथु सरनि को दाता दुख भंजनु सुख राइ ॥अंग 502
- राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥अंग 507
- नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥अंग 508
- अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥अंग 517
- रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥अंग 517
- अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥अंग 518
- जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥अंग 518
- किती बैहनि॑ बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥अंग 518
- तुधु धिआइनि॑ बेद कतेबा सणु खड़े ॥अंग 518
- चंगिआइंी आलकु करे बुरिआइंी होइ सेरु ॥अंग 518
- कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥अंग 518
- हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥अंग 518
- साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥अंग 518
- पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥अंग 518
- नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥अंग 518
- कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥अंग 519
- सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥अंग 519
- सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥अंग 519
- मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥अंग 519
- द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥अंग 519
- जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥अंग 519
- लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥अंग 519
- बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥अंग 519
- पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥अंग 519
- प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥अंग 520
- तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥अंग 520
- होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥अंग 520
- नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥अंग 520
- जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥अंग 520
- आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥अंग 520
- बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥अंग 520
- सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥अंग 520
- सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥अंग 520
- विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥अंग 520
- जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥अंग 521
- तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥अंग 521
- कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥अंग 521
- खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥अंग 521
- आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥अंग 521
- लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥अंग 521
- पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥अंग 521
- वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥अंग 521
- जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥अंग 521
- रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥अंग 521
- भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥अंग 521
- कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 522
- पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥अंग 522
- सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥अंग 522
- किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥अंग 522
- नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥अंग 522
- सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥अंग 522
- धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥1॥अंग 522
- सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥अंग 522
- तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥अंग 522
- काम क्रोध मद लोभ मोह दुसट बासना निवारि ॥अंग 523
- खांदिआ खांदिआ मुहु घठा पैनंदिआ सभु अंगु ॥अंग 523
- जिउ जिउ तेरा हुकमु तिवै तिउ होवणा ॥अंग 523
- जीवदिआ न चेतिओ मुआ रलंदड़ो खाक ॥अंग 523
- जीवंदिआ हरि चेतिआ मरंदिआ हरि रंगि ॥अंग 523
- आदि जुगादी आपि रखण वालिआ ॥अंग 523
- आदि मधि अरु अंति परमेसरि रखिआ ॥अंग 523
- तिस नो मंनि वसाइ जिनि उपाइआ ॥अंग 523
- निंदक मारे ततकालि खिनु टिकण न दिते ॥अंग 523
- रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥अंग 524
- कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 524
- सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥अंग 524
भगत कबीर जी (2)
भगत नामदेव जी (2)
भगत रविदास जी (1)
- दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥अंग 525