रागु गूजरी महला 1 चउपदे घरु 1 ॥
तेरा नामु करी चनणाठीआ जे मनु उरसा होइ ॥
करणी कुंगू जे रलै घट अंतरि पूजा होइ ॥1॥
पूजा कीचै नामु धिआईऐ बिनु नावै पूज न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
बाहरि देव पखालीअहि जे मनु धोवै कोइ ॥
जूठि लहै जीउ माजीऐ मोख पइआणा होइ ॥2॥
पसू मिलहि चंगिआईआ खड़ु खावहि अंम्रितु देहि ॥
नाम विहूणे आदमी ध्रिगु जीवण करम करेहि ॥3॥
नेड़ा है दूरि न जाणिअहु नित सारे संम॑ाले ॥
जो देवै सो खावणा कहु नानक साचा हे ॥4॥1॥
नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥
ता को अंतु न जाई लखणा आवत जात रहै गुबारि ॥1॥
प्रीतम किउ बिसरहि मेरे प्राण अधार ॥
जा की भगति करहि जन पूरे मुनि जन सेवहि गुर वीचारि ॥1॥ रहाउ ॥
रवि ससि दीपक जा के त्रिभवणि एका जोति मुरारि ॥
गुरमुखि होइ सु अहिनिसि निरमलु मनमुखि रैणि अंधारि ॥2॥
सिध समाधि करहि नित झगरा दुहु लोचन किआ हेरै ॥
अंतरि जोति सबदु धुनि जागै सतिगुरु झगरु निबेरै ॥3॥
सुरि नर नाथ बेअंत अजोनी साचै महलि अपारा ॥
नानक सहजि मिले जगजीवन नदरि करहु निसतारा ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह परब्रह्म परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान है,वह निर्वेर है, वस्तुतः सब जीवों पर उसकी समान दृष्टि है, वह कालातीत है, वह जन्म-मरण से रहित।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।