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अंग 489

अंग
489
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु गूजरी महला 1 चउपदे घरु 1 ॥
तेरा नामु करी चनणाठीआ जे मनु उरसा होइ ॥
करणी कुंगू जे रलै घट अंतरि पूजा होइ ॥1॥
पूजा कीचै नामु धिआईऐ बिनु नावै पूज न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
बाहरि देव पखालीअहि जे मनु धोवै कोइ ॥
जूठि लहै जीउ माजीऐ मोख पइआणा होइ ॥2॥
पसू मिलहि चंगिआईआ खड़ु खावहि अंम्रितु देहि ॥
नाम विहूणे आदमी ध्रिगु जीवण करम करेहि ॥3॥
नेड़ा है दूरि न जाणिअहु नित सारे संम॑ाले ॥
जो देवै सो खावणा कहु नानक साचा हे ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: वह परब्रह्म परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान है,वह निर्वेर है, वस्तुतः सब जीवों पर उसकी समान दृष्टि है, वह कालातीत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकट हुआ है, जिसकी लब्धि गुरु की कृपा से होती है। रागु गूजरी महला 1 चउपदे घरु 1 ॥ (हे प्रभू !) अगर मैं आपके नाम (की याद) को चंदन की लकड़ी बना लूँ।अगर मेरा मन (उस चंदन की लकड़ी को घिसाने के लिए) पत्थर बन जाए। अगर मेरा ऊँचा आचरण (इनके साथ) केसर (बन के) मिल जाए।तो आपकी पूजा मेरे हृदय के अंदर ही पड़ी होगी। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए।यही पूजा करनी चाहिए।परमात्मा का नाम सिमरन के बिना और कोई पूजा (ऐसी) नहीं (जो परवान हो सके)। 1।रहाउ। जैसे बाहर देव-मूर्तियों को स्नान करवाते हैं।वैसे ही अगर कोई मनुष्य अपने मन को (नाम सिमरन से) धोए। तो उसके मन के विकारों की मैल उतर जाती है।उसकी जीवात्मा शुद्ध-पवित्र हो जाती है।उसकी जीवन-यात्रा विकारों से आजाद हो जाती है। 2। (इस धरती पर मनुष्य।पशु-पक्षी आदि सबसे सिकदार।उत्तम माना जाता है।पर) पशुओं को सराहना मिलती है।वे घास खाते हैं और (दूध जैसा) उत्तम पदार्थ देते हैं। नाम से विहीन मनुष्यों का जीवन धिक्कारयोग्य है क्योंकि वह (नाम को बिसार के अन्य) काम ही करते हैं। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) हूमारी और प्रभू की बहुत नजदीक की सांझ है (इतना नजदीक की कि) जो कुछ वह हमें देता है वही हम खाते हैं (खा के जीवन निर्वाह करते हैं)। वह (दाता) है भी सदा (हमारे सिर पर) कायम।उसको अपने से दूर ना समझें।वह सदा हमारी सार लेता है।संभाल करता है (मूर्तियों की पूजा करने की जगह हाजिर-नाजर प्रभू को ध्याओ !)। 4। 1।
गूजरी महला 1 ॥
नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥
ता को अंतु न जाई लखणा आवत जात रहै गुबारि ॥1॥
प्रीतम किउ बिसरहि मेरे प्राण अधार ॥
जा की भगति करहि जन पूरे मुनि जन सेवहि गुर वीचारि ॥1॥ रहाउ ॥
रवि ससि दीपक जा के त्रिभवणि एका जोति मुरारि ॥
गुरमुखि होइ सु अहिनिसि निरमलु मनमुखि रैणि अंधारि ॥2॥
सिध समाधि करहि नित झगरा दुहु लोचन किआ हेरै ॥
अंतरि जोति सबदु धुनि जागै सतिगुरु झगरु निबेरै ॥3॥
सुरि नर नाथ बेअंत अजोनी साचै महलि अपारा ॥
नानक सहजि मिले जगजीवन नदरि करहु निसतारा ॥4॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 1 ॥ (पुराणों में कथा आती है कि जिस ब्रहमा के रचे हुए) वेद (पण्डित लोग) मुंह से गले से मीठी सुर में नित्य पढ़ते हैं। वह ब्रहमा विष्णु की नाभि में से उगे हुए कमल की नालि से पैदा हुआ (और अपने जन्म दाते की कुदरति का अंत ढूँढने के लिए उस नालि में चल पड़ा।कई युग उस नालि के) अंधेरे में ही आता जाता रहा।पर उसका अंत ना ढूँढ सका। 1। हे मेरी जिंदगी के आसरे प्रीतम ! मुझे ना भूल आप वह है जिसकी भक्ति पूरन पुरख सदा करते रहते हैं। जिसे ऋषि-मुनि गुरू की बताई हुई समझ के आसरे सदा सिमरते हैं। 1।रहाउ। वह प्रभू इतना बड़ा है कि सूरज और चंद्रमा उसके त्रिभवणीय जगत में (मानो छोटे से) दीपक (ही) हैं।सारे जगत में उसीकी ज्योति व्यापक है। जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चल के उस को दिन-रात मिलता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है।जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसकी जिंदगी की रात (अज्ञानता के) अंधेरे में बीतती है। 2। बड़े-बड़े जोगी (अपने ही उद्यम की टेक रख के) समाधियां लगाते हैं और मन को जीतने के यतन करते हैं (पर जो मनुष्य अपने उद्यम की ही टेक रखे।उसे) वह अंदर बसती ज्योति इन आँखों से नहीं दिखती। (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है) उसका मन वाला झगड़ा गुरू समाप्त कर देता है।उसके अंदर गुरू का शबद-रूप मीठी लगन लग पड़ती है।उसके अंदर परमात्मा की ज्योति जग पड़ती है। 3। हे नानक ! (अरदास कर-) हे देवताओं और मनुष्यों के पति ! हे बेअंत ! हे योनि-रहित ! और अॅटल महल में टिके रहने वाले अपार प्रभू ! हे जगत के जीवन ! (मेहर कर मुझे) अडोलता में निवास मिले। मेहर की निगाह करके मेरा बेड़ा पार कर। 4। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह परब्रह्म परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान है,वह निर्वेर है, वस्तुतः सब जीवों पर उसकी समान दृष्टि है, वह कालातीत है, वह जन्म-मरण से रहित।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।