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अंग 521

अंग
521
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मः 5 ॥
जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
नानक सो सहु आहि जा कै आढलि हभु को ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (जैसे) धरती पानी में (अडोल) बसती है और पानी को आसरा भी देती है।(जैसे) लकड़ी (अपने अंदर) आग (छुपा के) रखती है। (वैसे) वह पति (प्रभू) जिस के आसरे हरेक जीव है।(इस सारे जगत में अडोल छुपा हुआ) है। 2।
पउड़ी ॥
तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
सोई वरतै जगि जि कीआ तुधु धुरे ॥
बिसमु भए बिसमाद देखि कुदरति तेरीआ ॥
सरणि परे तेरी दास करि गति होइ मेरीआ ॥
तेरै हथि निधानु भावै तिसु देहि ॥
जिस नो होइ दइआलु हरि नामु सेइ लेहि ॥
अगम अगोचर बेअंत अंतु न पाईऐ ॥
जिस नो होहि क्रिपालु सु नामु धिआईऐ ॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) जो जो काम तूने किए हैं यह आप ही कर सकता है। जगत में वही कुछ हैं रहा है जो करने के वास्ते तूने धुर से हुकम कर दिया है। आपकी कुदरति देख-देख के हम हैरान हैं रहे हैं। (आपके) दास आसरा लेते हैं (मैं भी आपकी शरण आया हूँ।हे प्रभू ! मेहर) कर।मेरी भी आत्मिक अवस्था ऊँची हो जाए। (आपके नाम का) खजाना आपके (अपने) हाथ में है।अगर आपको अच्छा लगे उसे आप (ये खजाना) देता है। जिस जिस को दयाल हैं के हरी-नाम (देता है) वही जीव आपका नाम-खजाना प्राप्त करते हैं। हे अपहुँच ! हे अगोचर ! हे बेअंत प्रभू ! आपका अंत नहीं पाया जा सकता। आप जिस मनुष्य पर प्रसन्न होता है वह आपका नाम सिमरता है। 11।
सलोक मः 5 ॥
कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
सेई मुख दिसंनि॑ नानक रते प्रेम रसि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! कड़छीआं (दाल-भाजी के बर्तनों में) फिरती हैं (पर वह उस दाल-भाजी) का स्वाद नहीं जानतीं (क्योंकि वे) खाली (ही रहती) हें। (इस तरह) वह मुंह (सुंदर) दिखते हैं जो प्रेम के स्वाद में रंगे गए हैं (सिर्फ बातें करने वाले मुँह कड़छियों की तरह ही हैं)। 1।
मः 5 ॥
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
तै सहि दिती वाड़ि नानक खेतु न छिजई ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (जिन कामादिकों ने मेरी खेती) उजाड़ दी थी उनका खोज मैंने खोज निकालने वाले (गुरू) के द्वारा ढूँढ लिया है। आप पति ने मेरी खेती को (गुरू की सहायता की) वाड़ दे दी है।अब नानक की खेती नहीं उजड़ती। 2।
पउड़ी ॥
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
दुहा सिरिआ खसमु आपि खिन महि करे रासि ॥
तिआगहु सगल उपाव तिस की ओट गहु ॥
पउ सरणाई भजि सुखी हूं सुख लहु ॥
करम धरम ततु गिआनु संता संगु होइ ॥
जपीऐ अंम्रित नामु बिघनु न लगै कोइ ॥
जिस नो आपि दइआलु तिसु मनि वुठिआ ॥
पाईअनि॑ सभि निधान साहिबि तुठिआ ॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को सिमरो।जिसके वश में हरेक पदार्थ है जो (माया की कशिश और नाम-रस) दोनों पक्ष का मालिक है (भाव।जो माया के मोह में फंसाने वाला भी है और नाम-रस की दाति देने वाला भी है)।जो (जीवों के काम) एक पलक में पूरे कर देता है। (हे भाई !) अन्य सारे तरीकों को छोड़ो और उस परमात्मा का आसरा लो। दौड़ के उस प्रभू की शरण पड़ो और सबसे अच्छा सुख हासिल करो। अगर संतों की संगति मिले तो वह ऊँची समझ (प्राप्त) होती है जो (मानो) सब कर्मों-धर्मों का निचोड़ है। अगर प्रभू का अमृत नाम सिमरें तो (जीवन की राह में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहरवान हो उसके मन में स्वयं आ बसता है। प्रभू मालिक के प्रसन्न होने पर (मानो) सारे खजाने पा लेते हैं। 12।
सलोक मः 5 ॥
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
इको सिरजणहारु नानक बिआ न पसीऐ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जब मेरे प्यारे पति ने (मेरे पर) बख्शिश की तो मैंने ढूँढने योग्य प्रभू को ढूँढ लिया। (अब) हे नानक ! एक करतार ही (हर जगह) दिखाई दे रहा है।कोई और नहीं दिखता। 1।
मः 5 ॥
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
गुर मंत्रड़ा चितारि नानक दुखु न थीवई ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! सॅच (भाव।सिमरन) का तीर तान के चंदरे पापों को भगा के। सतिगुरू का सोहाना मंत्र चेते कर।(इस तरह) दुख नहीं व्याप्ता। 2।
पउड़ी ॥
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
जीअ जंत मिहरवानु तिस नो सदा जापि ॥
दइआ धारी समरथि चुके बिल बिलाप ॥
नठे ताप दुख रोग पूरे गुर प्रतापि ॥
कीतीअनु आपणी रख गरीब निवाजि थापि ॥
आपे लइअनु छडाइ बंधन सगल कापि ॥
तिसन बुझी आस पुंनी मन संतोखि ध्रापि ॥
वडी हूं वडा अपार खसमु जिसु लेपु न पुंनि पापि ॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) उस करतार को ‘धन्य धन्य’ कह जिस ने (आपके अंदर) स्वयं ठंड डाली है। उस प्रभू को याद कर जो सब जीवों पर मेहरवान है। समर्थ प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की है उसके सारे प्रलाप समाप्त हो गए हैं। पूरे गुरू के प्रताप से उसके (सारे) कलेश।दुख और रोग दूर हो गए। (जिन) गरीबों (भाव।जो दर पे आ गिरे हैं) को निवाज के पीठ ठोक के (उनकी) रक्षा उस (प्रभू) ने खुद की है। उनके सारे बंधन कट के उनको (विकारों से) उसने खुद छुड़ा लिया है। संतोष से तृप्त हो जाने के कारण उनके मन की आस पूरी हो गई है उनकी तृष्णा मिट गई है। (पर) बेअंत (प्रभू) पति सबसे बड़ा है उसको (जीवों के किए) पुन्य अथवा पाप से (जाती तौर पर) कोई लाग-लबेड़ नहीं होता। 13।
सलोक मः 5 ॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
नानक प्रीति लगी तिन राम सिउ भेटत साध संगात ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! जिन मनुष्यों पर प्रभू जी कृपा करते हैं वही हरी-नाम जपते हैं। साध-संगति में मिलने के कारण परमात्मा के साथ उनकी प्रीति बन जाती है। 1।
मः 5 ॥
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
नानक नामि अराधिऐ बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे बड़े भाग्य वालो ! उस परमात्मा को सिमरो जो पानी में धरती के अंदर धरती के ऊपर (हर जगह) मौजूद है। हे नानक ! यदि प्रभू का नाम सिमरें तो (जीवन राह में) कोई रुकावट नहीं होती। 2।
पउड़ी ॥
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
भगता तेरी टेक रते सचि नाइ ॥
जिस नो होइ क्रिपालु तिस का दूखु जाइ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ बंदगी करने वाले मनुष्यों का वचन मानने के लायक होता है।प्रभू की दरगाह में (भी) कबूल होता है। हे प्रभू ! भक्तों को आपका आसरा होता है।वे सच्चे नाम में रंगे रहते हैं। प्रभू जिस मनुष्य पर मेहरवान होता है उसका दुख दूर हो जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ हे नानक ! (जैसे) धरती पानी में (अडोल) बसती है और पानी को आसरा भी देती है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।