जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
नानक सो सहु आहि जा कै आढलि हभु को ॥2॥
तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
सोई वरतै जगि जि कीआ तुधु धुरे ॥
बिसमु भए बिसमाद देखि कुदरति तेरीआ ॥
सरणि परे तेरी दास करि गति होइ मेरीआ ॥
तेरै हथि निधानु भावै तिसु देहि ॥
जिस नो होइ दइआलु हरि नामु सेइ लेहि ॥
अगम अगोचर बेअंत अंतु न पाईऐ ॥
जिस नो होहि क्रिपालु सु नामु धिआईऐ ॥11॥
कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
सेई मुख दिसंनि॑ नानक रते प्रेम रसि ॥1॥
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
तै सहि दिती वाड़ि नानक खेतु न छिजई ॥2॥
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
दुहा सिरिआ खसमु आपि खिन महि करे रासि ॥
तिआगहु सगल उपाव तिस की ओट गहु ॥
पउ सरणाई भजि सुखी हूं सुख लहु ॥
करम धरम ततु गिआनु संता संगु होइ ॥
जपीऐ अंम्रित नामु बिघनु न लगै कोइ ॥
जिस नो आपि दइआलु तिसु मनि वुठिआ ॥
पाईअनि॑ सभि निधान साहिबि तुठिआ ॥12॥
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
इको सिरजणहारु नानक बिआ न पसीऐ ॥1॥
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
गुर मंत्रड़ा चितारि नानक दुखु न थीवई ॥2॥
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
जीअ जंत मिहरवानु तिस नो सदा जापि ॥
दइआ धारी समरथि चुके बिल बिलाप ॥
नठे ताप दुख रोग पूरे गुर प्रतापि ॥
कीतीअनु आपणी रख गरीब निवाजि थापि ॥
आपे लइअनु छडाइ बंधन सगल कापि ॥
तिसन बुझी आस पुंनी मन संतोखि ध्रापि ॥
वडी हूं वडा अपार खसमु जिसु लेपु न पुंनि पापि ॥13॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
नानक प्रीति लगी तिन राम सिउ भेटत साध संगात ॥1॥
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
नानक नामि अराधिऐ बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
भगता तेरी टेक रते सचि नाइ ॥
जिस नो होइ क्रिपालु तिस का दूखु जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ हे नानक ! (जैसे) धरती पानी में (अडोल) बसती है और पानी को आसरा भी देती है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।