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अंग 491

अंग
491
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इहु कारणु करता करे जोती जोति समाइ ॥4॥3॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा खुद ही ये सबब बनाता है।(गुरू की शरण पड़े मनुष्य की) आत्मा।परमात्मा की ज्योति में लीन हो जाती है। 4। 3। 5।
गूजरी महला 3 ॥
राम राम सभु को कहै कहिऐ रामु न होइ ॥
गुर परसादी रामु मनि वसै ता फलु पावै कोइ ॥1॥
अंतरि गोविंद जिसु लागै प्रीति ॥
हरि तिसु कदे न वीसरै हरि हरि करहि सदा मनि चीति ॥1॥ रहाउ ॥
हिरदै जिन॑ कै कपटु वसै बाहरहु संत कहाहि ॥
त्रिसना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि ॥2॥
अनेक तीरथ जे जतन करै ता अंतर की हउमै कदे न जाइ ॥
जिसु नर की दुबिधा न जाइ धरम राइ तिसु देइ सजाइ ॥3॥
करमु होवै सोई जनु पाए गुरमुखि बूझै कोई ॥
नानक विचहु हउमै मारे तां हरि भेटै सोई ॥4॥4॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 3 ॥ (अगर) हरेक मनुष्य (सिर्फ जीभ के साथ ही) परमात्मा का नाम कहता रहे।(तो निरी जीभ से) परमात्मा का नाम कहने से (सफलता) नहीं मिलती। जब किसी मनुष्य के मन में गुरू की कृपा से परमात्मा आ बसे।तब उसे उस सिमरन का फल मिलता है। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के लिए प्यार बनता है। परमात्मा उस मनुष्य को कभी भूलता नहीं।(जिन मनुष्यों के अंदर प्यार बनता है) वह सदा अपने मन में चित्त में परमात्मा को याद करते रहते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) जिन मनुष्यों के हृदय में ठॅगी बसती है, पर बाहरी भेष से (अपने आप को वे) संत कहलवाते हैं उनके अंदर माया की तृष्णा कभी नहीं खत्म होती।आखिर जब वे जगत से चल पड़ते हैं तब हाथ मलते हैं। 2। (हे भाई !) अगर कोई मनुष्य अनेकों तीर्थों पर स्नान का यत्न करता रहे तो भी इन यत्नों से उसके अंदर की अहंकार की मैल नहीं उतरती।और। जिस मनुष्य के मन का बिखराव दूर नहीं होता (वह माया के मोह में भटकता रहता है) उसको धर्मराज सजा देता है। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा की) बख्शिश हो वही मनुष्य परमात्मा को मिलता है।(पर वैसे) कोई विरला मनुष्य ही गुरू की शरण पड़ के (ये भेद) समझता है। हे नानक ! (कह) जब कोई मनुष्य अपने मन में से अहंकार को मार देता है तब वही मनुष्य परमात्मा को मिलता है। 4। 4। 6।
गूजरी महला 3 ॥
तिसु जन सांति सदा मति निहचल जिस का अभिमानु गवाए ॥
सो जनु निरमलु जि गुरमुखि बूझै हरि चरणी चितु लाए ॥1॥
हरि चेति अचेत मना जो इछहि सो फलु होई ॥
गुर परसादी हरि रसु पावहि पीवत रहहि सदा सुखु होई ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु भेटे ता पारसु होवै पारसु होइ त पूज कराए ॥
जो उसु पूजे सो फलु पाए दीखिआ देवै साचु बुझाए ॥2॥
विणु पारसै पूज न होवई विणु मन परचे अवरा समझाए ॥
गुरू सदाए अगिआनी अंधा किसु ओहु मारगि पाए ॥3॥
नानक विणु नदरी किछू न पाईऐ जिसु नदरि करे सो पाए ॥
गुर परसादी दे वडिआई अपणा सबदु वरताए ॥4॥5॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 3 ॥ हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य का अहंकार दूर कर देता है।उस मनुष्य को आत्मिक शांति प्राप्त हो जाती है।उसकी बुद्धि (माया-मोह में) डोलने से हट जाती है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के (ये भेद) समझ लेता है।और।परमात्मा के चरणों में अपना चित्त जोड़ता है।वह मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन जाता है। 1। हे (मेरे गाफिल मन !) परमात्मा को याद करता रह।आपको वही फल मिलेगा जो आप मांगेगा। (गुरू की शरण पड़) गुरू की कृपा से आप परमात्मा के नाम का रस हासिल कर लेगा।और आप उस रस को पीता रहेगा।तो तूझे सदा आनंद मिलता रहेगा। 1।रहाउ। हे भाई ! जब किसी मनुष्य को गुरू मिल जाता है तब वह पारस बन जाता है (वह और मनुष्यों को भी ऊँचे जीवन वाला बनाने के लायक हो जाता है)।जब वह पारस बनता है तब लोगों से आदर-मान पाता है। जो भी मनुष्य उसका आदर करता है वह (उच्च आत्मिक जीवन-रूप) फल प्राप्त करता है।(पारस बना हुआ मनुष्य औरों को उच्च जीवन की) शिक्षा देता है।और।सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के सिमरन की बुद्धि देता है। 2। (पर। हे भाई !) पारस बने बिना (दुनिया से) आदर-मान नहीं मिलता।(क्योंकि) अपना मन सिमरन में पतीजे बिना ही वह मनुष्य औरों को (सिमरन की) शिक्षा देता है। जो मनुष्य खुद तो ज्ञान से वंचित है।खुद तो माया के मोह में अंधा हुआ पड़ा है।पर अपने आप को गुरू कहलवाता है वह किसी और को (सही रास्ते पर) नहीं डाल सकता। 3। हे नानक ! (किसी के वश की बात नहीं) परमात्मा की मेहर की निगाह के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता (आत्मिक जीवन की दाति नहीं मिलती)। जिस मनुष्य पर मेहर की नजर करता है वह मनुष्य ये दाति हासिल कर लेता है।गुरू की कृपा की बरकति से परमात्मा (जिस मनुष्य को) वडिआई बख्शता है उसके हृदय में अपनी सिफत सालाह की बाणी बसाता है। 4। 5। 7।
गूजरी महला 3 पंचपदे ॥
ना कासी मति ऊपजै ना कासी मति जाइ ॥
सतिगुर मिलिऐ मति ऊपजै ता इह सोझी पाइ ॥1॥
हरि कथा तूं सुणि रे मन सबदु मंनि वसाइ ॥
इह मति तेरी थिरु रहै तां भरमु विचहु जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि चरण रिदै वसाइ तू किलविख होवहि नासु ॥
पंच भू आतमा वसि करहि ता तीरथ करहि निवासु ॥2॥
मनमुखि इहु मनु मुगधु है सोझी किछू न पाइ ॥
हरि का नामु न बुझई अंति गइआ पछुताइ ॥3॥
इहु मनु कासी सभि तीरथ सिम्रिति सतिगुर दीआ बुझाइ ॥
अठसठि तीरथ तिसु संगि रहहि जिन हरि हिरदै रहिआ समाइ ॥4॥
नानक सतिगुर मिलिऐ हुकमु बुझिआ एकु वसिआ मनि आइ ॥
जो तुधु भावै सभु सचु है सचे रहै समाइ ॥5॥6॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 3 पंचपदे ॥ हे भाई ! ना ही काशी (आदि तीर्थों पर) जाने से सद्-बुद्धि पैदा होती है, ना ही काशी (आदि तीर्थों पर) ना जाने से सद्-बुद्धि दूर हो जाती है गुरू को मिलने से (मनुष्य के अंदर) सबुद्धि पैदा होती है।तब मनुष्य को यह समझ आती है। 1। हे मेरे मन ! आप परमात्मा की सिफत सालाह सुना कर।हे भाई ! गुरू के शबद को अपने मन में बसाए रख। जब (सिफत सालाह की बरकति से।गुरू के शबद की बरकति से) आपकी यह बुद्धि माया के मोह में डोलने से बची रहेगी।तब आपके अंदर से भटकना दूर हैं जाएगी। 1।रहाउ। हे भाई ! आप परमात्मा के चरण अपने हृदय में संभाल।आपके पाप नाश हैं जाएंगे। अगर आप (प्रभू-चरणों की बरकति से) कामादिक पाँचों के वश में आए हुए मन को अपने वश में कर ले।तो (समझ ले कि) आप तीर्थों पर ही निवास कर रहा है। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का यह मन (सदा) मूर्ख (ही टिका रहता) है।उसको (उच्च आत्मिक जीवन की) थोड़ी सी भी समझ नहीं पड़ती। वह परमात्मा के नाम (की कद्र) को नहीं समझता।आखिर वह हाथ मलता ही (जगत से) चला जाता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को सतिगुरू ने (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श दी (उसके वास्ते) यह मन ही काशी है।ये मन ही सारे तीर्थ है। ये मन ही सारी स्मृतियां हैं।उस मनुष्य के साथ अढ़सठ ही तीर्थ बसते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में सदा परमात्मा बसा रहता है (उनके वास्ते ये मन ही काशी है)। 4। हे नानक ! अगर मनुष्य गुरू को मिल जाए तो वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है।तो एक परमात्मा उसके मन में आ बसता है। (वह मनुष्य सदा यूँ यकीन रखता है और कहता है, हे प्रभू !) जो कुछ आपको ठीक लगता है वह सदा अटल नियम है।(हे भाई ! यदि मनुष्य को गुरू मिल जाए तो वह) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 5। 6। 8।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा खुद ही ये सबब बनाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।