Lulla Family

अंग 517

अंग
517
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु अपणा सेवि सभ फल पाइआ ॥
अंम्रित हरि का नाउ सदा धिआइआ ॥
संत जना कै संगि दुखु मिटाइआ ॥
नानक भए अचिंतु हरि धनु निहचलाइआ ॥20॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: अगर सतिगुरू के हुकम में चलें तो (जैसे) सारे फल मिल जाते हैं। प्रभू का अमृत-नाम सदा सिमर सकते हैं। गुरमुखों की संगति में रहके (द्वैत भाव का) दुख मिटा सकते हैं।और। हे नानक ! कभी ना नाश होने वाला नाम-धन कमा के बेफिक्र हो जाते हैं। 20।
सलोक मः 3 ॥
खेति मिआला उचीआ घरु उचा निरणउ ॥
महल भगती घरि सरै सजण पाहुणिअउ ॥
बरसना त बरसु घना बहुड़ि बरसहि काहि ॥
नानक तिन॑ बलिहारणै जिन॑ गुरमुखि पाइआ मन माहि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ बादल देख के (किसान) खेत के बंद (किनारे की हदबंदियां) ऊँची कर देता है (और वर्षा का पानी उस खेत में ठहर जाता है)।(वैसे ही। जिस जीव-) स्त्री के हृदय में भक्ति (का उछाल) आता है वहाँ प्रभू मेहमान बन के (भाव।रहने के लिए) आ जाता है। हे मेघ ! (हे सतिगुरू !) अगर (नाम की) बरखा करनी है तो वर्षा (अब) कर।(मेरी उम्र बीत जाने पर) फिर किस लिए बरसेगा। हे नानक ! मैं सदके हूँ उनसे जिन्होंने गुरू के माध्यम से प्रभू को हृदय में पा लिया है। 1।
मः 3 ॥
मिठा सो जो भावदा सजणु सो जि रासि ॥
नानक गुरमुखि जाणीऐ जा कउ आपि करे परगासु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (असल) प्यारा वह है जो सदा अच्छा लगता रहे।(असल) मित्र वह है जिससे सदा बनी रहे (पर ‘द्वैत भाव’ वह है जिससे ना सदा बनी रहती है ना ही सदा साथ निभता है)। हे नानक ! जिसके अंदर प्रभू खुद प्रकाश करे उसको गुरू के द्वारा ही ये समझ आती है। 2।
पउड़ी ॥
प्रभ पासि जन की अरदासि तू सचा सांई ॥
तू रखवाला सदा सदा हउ तुधु धिआई ॥
जीअ जंत सभि तेरिआ तू रहिआ समाई ॥
जो दास तेरे की निंदा करे तिसु मारि पचाई ॥
चिंता छडि अचिंतु रहु नानक लगि पाई ॥21॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के सेवक की अरदास प्रभू की हजूरी में (यूँ होती) है, (हे प्रभू !) आप सदा रहने वाला मालिक है। आप सदा ही रखवाला है।मैं आपको सिमरता हूँ। सारे जीव-जंतु आपके ही हैं।आप इनमें मौजूद है। जो मनुष्य आपकी बंदगी करने वाले की निंदा करता है आप उसको (आत्मिक मौत) मार के ख्वार करता है। हे नानक ! आप भी प्रभू के चरणों में लग और (दुनियावी) चिंताएं त्याग के बेफिक्र रह। 21।
सलोक मः 3 ॥
आसा करता जगु मुआ आसा मरै न जाइ ॥
नानक आसा पूरीआ सचे सिउ चितु लाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जगत (दुनियावी) आशाएं बना-बना के मर जाता है।पर ये आशा कभी नहीं मरती;कभी खत्म नहीं होती (भाव।कभी तृष्णा खत्म नहीं होती।कभी संतोष नहीं होता)। हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले प्रभू से चित्त जोड़ने से मनुष्य की आशाएं पूरी हो जाती हैं (भाव।तृष्णा समाप्त हो जाती है)। 1।
मः 3 ॥
आसा मनसा मरि जाइसी जिनि कीती सो लै जाइ ॥
नानक निहचलु को नही बाझहु हरि कै नाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ ये दुनियावी आशा।ये माया के फुरने तब ही खत्म होंगे जब वह प्रभू खुद खत्म करेगा जिसने ये (आसा मनसा) पैदा की। (क्योंकि) हे नानक ! (तब ही यकीन बनेगा कि) परमात्मा के नाम के बिना कोई और सदा-स्थिर रहने वाला नहीं (फिर किस की आस करें।)। 2।
पउड़ी ॥
आपे जगतु उपाइओनु करि पूरा थाटु ॥
आपे साहु आपे वणजारा आपे ही हरि हाटु ॥
आपे सागरु आपे बोहिथा आपे ही खेवाटु ॥
आपे गुरु चेला है आपे आपे दसे घाटु ॥
जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख काटु ॥22॥1॥ सुधु
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मुकम्मल बनतर (सम्पूर्ण संरचना) बना के प्रभू ने स्वयं ही जगत पैदा किया। वह स्वयं ही साहूकार है, स्वयं ही व्यापारी एवं स्वयं ही हाट बाजार है। यहाँ प्रभू खुद ही समुंद्र है।खुद ही जहाज है और खुद ही मल्लाह है। यहाँ खुद ही गुरू है।खुद ही सिख है।और खुद ही (उस पार का) पक्तन दिखाता है। हे दास नानक ! आप उस प्रभू का नाम सिमर और अपने सारे पाप दूर कर ले। 22। 1।सुधु।
रागु गूजरी वार महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 5 ॥
अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥
नेत्री सतिगुरु पेखणा स्रवणी सुनणा गुर नाउ ॥
सतिगुर सेती रतिआ दरगह पाईऐ ठाउ ॥
कहु नानक किरपा करे जिस नो एह वथु देइ ॥
जग महि उतम काढीअहि विरले केई केइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी वार महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 5॥ मन में गुरू को याद करना।जीभ से गुरू का नाम जपना। आँखों से गुरू को देखना।कानों से गुरू का नाम सुनना- अगर अपने गुरू (के प्यार) में रंगे जाएं तो (प्रभू की) हजूरी में जगह मिलती है। ये दाति।कह। हे नानक ! उस मनुष्य को प्रभू देता है जिस पर मेहर करता है। ऐसे बंदे जगत में श्रेष्ठ कहलवाते हैं।(पर ऐसे होते) कोई विरले-विरले हैं। 1।
मः 5 ॥
रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥
गुर की पैरी पाइ काज सवारिअनु ॥
होआ आपि दइआलु मनहु न विसारिअनु ॥
साध जना कै संगि भवजलु तारिअनु ॥
साकत निंदक दुसट खिन माहि बिदारिअनु ॥
तिसु साहिब की टेक नानक मनै माहि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ रक्षा करने वाले परमात्मा ने जिन लोगों की मदद की।उनको उसने खुद (विकारों से) बचा लिया है। उनको गुरू के पैरों पे डाल के उनके सारे काम उसने सवार दिए हैं। जिन पर प्रभू स्वयं दयालु हुआ है।उनको उसने (अपने) मन से विसारा नहीं। उनको गुरमुखों की संगति में (रख के) संसार-समुंद्र पार करवा दिया। जो उसके चरणों से टूटे हुए हैं।जो निंदा करते रहते हैं।जो गंदे आचरण वाले हैं।उनको एक पल में उसने मार दिया है। नानक के मन में भी उस मालिक का आसरा है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर सतिगुरू के हुकम में चलें तो (जैसे) सारे फल मिल जाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।