नही नही चीनि॑आ परमानंदा ॥1॥ रहाउ ॥
घरि घरि खाइआ पिंडु बधाइआ खिंथा मुंदा माइआ ॥
भूमि मसाण की भसम लगाई गुर बिनु ततु न पाइआ ॥2॥
काइ जपहु रे काइ तपहु रे काइ बिलोवहु पाणी ॥
लख चउरासीह जिनि॑ उपाई सो सिमरहु निरबाणी ॥3॥
काइ कमंडलु कापड़ीआ रे अठसठि काइ फिराही ॥
बदति त्रिलोचनु सुनु रे प्राणी कण बिनु गाहु कि पाही ॥4॥1॥
अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
सरप जोनि वलि वलि अउतरै ॥1॥
अरी बाई गोबिद नामु मति बीसरै ॥ रहाउ ॥
अंति कालि जो इसत्री सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
बेसवा जोनि वलि वलि अउतरै ॥2॥
अंति कालि जो लड़िके सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
सूकर जोनि वलि वलि अउतरै ॥3॥
अंति कालि जो मंदर सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
प्रेत जोनि वलि वलि अउतरै ॥4॥
अंति कालि नाराइणु सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥
बदति तिलोचनु ते नर मुकता पीतंबरु वा के रिदै बसै ॥5॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
परमादि पुरखमनोपिमं सति आदि भाव रतं ॥
परमदभुतं परक्रिति परं जदिचिंति सरब गतं ॥1॥
केवल राम नाम मनोरमं ॥
बदि अंम्रित तत मइअं ॥
न दनोति जसमरणेन जनम जराधि मरण भइअं ॥1॥ रहाउ ॥
इछसि जमादि पराभयं जसु स्वसति सुक्रित क्रितं ॥
भव भूत भाव समब्यिअं परमं प्रसंनमिदं ॥2॥
लोभादि द्रिसटि पर ग्रिहं जदिबिधि आचरणं ॥
तजि सकल दुहक्रित दुरमती भजु चक्रधर सरणं ॥3॥
हरि भगत निज निहकेवला रिद करमणा बचसा ॥
जोगेन किं जगेन किं दानेन किं तपसा ॥4॥
गोबिंद गोबिंदेति जपि नर सकल सिधि पदं ॥
जैदेव आइउ तस सफुटं भव भूत सरब गतं ॥5॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जै चंद ! सारी दुनिया (इसी भुलेखे में) भूली पड़ी है (कि निरा फकीरी भेष धारण करने से परमात्मा मिल जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।