गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है।उसको सिफत सालाह की दाति मिलती है।वह हर समय प्रभू का नाम जपता है। 1।
मः 3 ॥ बिनु सतिगुर सेवे साति न आवई दूजी नाही जाइ ॥ जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमै न पाइआ जाइ ॥ जिन॑ा अंतरि लोभ विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥ जंमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥ जिन॑ा सतिगुर सिउ चितु लाइआ सु खाली कोई नाहि ॥ तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥ नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ सतिगुरू की बताई सेवा किए बिना शांति नहीं आती और (सतिगुरू के बिना) और कोई जगह नहीं (जहाँ ये मिल सके) चाहे कितनी ही चाहत करें।मेहर के बिना प्रभू की प्राप्ति नहीं हो सकती। जिन मनुष्यों के हृदय में लोभ का अवगुण है।वे माया के प्यार में भूले हुए है। उनका पैदा होना मरना खत्म नहीं होता और वे अहंकार में कलेश उठाते हैं। जिन मनुष्यों ने अपने सतिगुरू से चित्त जोड़ा है उनमें से (प्रभू के मिलाप से) वंचित कोई नहीं रहा। ना तो उन्हें जम का बुलावा आता है ना ही वे दुख सहते हैं (भाव।उन्हें मौत का सहम नहीं छू सकता)। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हुए हैं।वे (दुखों से) बच गए हैं और सच्चे शबद में लीन रहते हैं। 2।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू के साथ प्यार डालता है।वही प्रभू का ढाढी कहलवा सकता है (भाव।प्रभू की सिफत सालाह वही बंदा कर सकता है)। वह मनुष्य प्रभू की हजूरी में टिक के उसका सिमरन करता है और गुरू के शबद के द्वारा उसके गुणों की विचार करता है। ज्यों-ज्यों वह प्रभू को अपने हृदय में बसाता है।वह प्रभू के चरणों में जुड़ता है (उसे प्रभू की हजूरी प्राप्त होती है)। प्रभू के नाम में प्यार करने से उसके मन की अवस्था बहुत ऊँची हो जाती है।बस। वह ढाढी यही सेवा करता है।यही चाकरी करता है कि वह प्रभू का नाम जपता है।और प्रभू उस को (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 18।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ मोटी जाति की गूजरी कुलवंती स्त्री बन गई (ऊँची जाति वाली हो गई) जब उसने अपना पति ढूँढ लिया; (वैसे ही) वह (जीव-) स्त्री जो सतिगुरू के शबद द्वारा विचार करके हर रोज प्रभू का सिमरन करती है जिसको गुरू मिल जाता है उसके अंदर परमात्मा का डर पैदा होता है,वह कुलवंती हैं जाती है वह पति-प्रभू का हुकम समझ लेती है (पर यह वही जीव-स्त्री करती है) जिस पर करतार ने स्वयं मेहर की हो। (दूसरी तरफ) जिसे पति ने छॅुटड़ छोड़ दिया हैं।वह स्त्री कुचॅजी और खोटे लक्षणों वाली होती है। यदि हृदय में प्रभू का डर आ बसे।तो मन की मैल काटी जाती है।शरीर भी पवित्र हो जाता है; गुणों के खजाने परमात्मा का सिमरन करके अंदर प्रकाश हो जाता है।मति उज्जवल हो जाती है। (ऐसी जीव-स्त्री) परमात्मा के डर में बैठती है।डर में रहती है।डर में कार-व्यवहार करती है। (फिर) उसको इस जीवन में आदर और सुख मिलता है और प्रभू की हजूरी का दरवाजा उसके लिए खुल जाता है। बेअंत प्रभू की ज्योति में आत्मा जोड़ने से और उसके डर में रहने से वह निर्भय प्रभू मिल जाता है।पर। हे नानक ! जिसको करतार स्वयं बख्शिश करे वही जीव-स्त्री पति-प्रभू को प्यारी लगती है।वही अच्छी है। 1।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की ही सदा सिफत-सालाह करनी चाहिए।मैं प्रभू से सदके हूँ।पर। हे नानक ! वह जीभ जल जाए जो एक प्रभू को छोड़ के किसी और (की याद) में लगे। 2।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ देवताओं आदि की भी उत्पक्ति प्रभू ने स्वयं ही की और माया का मोह भी स्वयं ही बनाया। (वह देवते भी) राजाओं की तरह राज करते रहे और दुखों-सुखों की खातिर लड़ते रहे। ब्रहमा और शिव (जैसे बड़े देवते प्रभू को) सिमरते रहे पर उन्हें भी (उस अजब खेल का) भेद नहीं मिला। परमात्मा निडर है।आकार-रहित है और जिसे लक्षित नहीं किया जा सकता।गुरमुख के अंदर प्रगट होता है। गुरमुख अवस्था में (मनुष्य को) चिंता और (प्रभू से) विछोड़ा नहीं सताता।गुरमुख जगत में (माया के मोह से स्थिर) अडोल रहता है। 19।
सलोकु मः 3 ॥ एहु सभु किछु आवण जाणु है जेता है आकारु ॥ जिनि एहु लेखा लिखिआ सो होआ परवाणु ॥ नानक जे को आपु गणाइदा सो मूरखु गावारु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जितना ये जगत दिखाई दे रहा है ये सारा आने-जाने वाला है (भाव।कभी भी एक हालत में नहीं रहता।सो किसी राज-धन मल्कियत आदि पर मान करना मूर्खता है) जिस मनुष्य ने ये बात समझ ली वह (प्रभू की हजूरी में) कबूल होता है; पर। हे नानक ! जो (इस ‘आकार’ के आसरे) अपने आप को बड़ा कहलवाता है (भाव।अहंकार करता है) वह मूर्ख है वह गावार है। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ मन (जैसे) हाथी है; (अगर) सतिगुरू (इसका) महावत (बने और) गुरू की दी हुई मति (इसके सिर पर) अंकुश हो।तो यह मन उधर जाता है जिधर गुरू ले जाता है।पर। हे नानक ! अंकुश के बिना हाथी बार-बार कुमार्ग पर चला जाता है। 2।
पउड़ी ॥ तिसु आगै अरदासि जिनि उपाइआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस प्रभू ने ‘भाव दूजा’ (द्वैत भाव) पैदा किया है।अगर उसकी हजूरी में अरदास करें।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।