ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥
सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥
मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सि तरिआ ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥
सिरि सिरि रिजकु संबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥2॥
ऊडै ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥
उन कवनु खलावै कवनु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥3॥
सभ निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥
जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥
अंतरि मैलु न उतरै हउमै बिनु गुर बाजी हारी ॥1॥
मेरे ठाकुर रखि लेवहु किरपा धारी ॥
कोटि मधे को विरला सेवकु होरि सगले बिउहारी ॥1॥ रहाउ ॥
सासत बेद सिम्रिति सभि सोधे सभ एका बात पुकारी ॥
बिनु गुर मुकति न कोऊ पावै मनि वेखहु करि बीचारी ॥2॥
अठसठि मजनु करि इसनाना भ्रमि आए धर सारी ॥
अनिक सोच करहि दिन राती बिनु सतिगुर अंधिआरी ॥3॥
धावत धावत सभु जगु धाइओ अब आए हरि दुआरी ॥
दुरमति मेटि बुधि परगासी जन नानक गुरमुखि तारी ॥4॥1॥2॥
हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥
निमख न बिसरउ मन ते हरि हरि साधसंगति महि पाइआ ॥1॥
माई खाटि आइओ घरि पूता ॥
हरि धनु चलते हरि धनु बैसे हरि धनु जागत सूता ॥1॥ रहाउ ॥
हरि धनु इसनानु हरि धनु गिआनु हरि संगि लाइ धिआना ॥
हरि धनु तुलहा हरि धनु बेड़ी हरि हरि तारि पराना ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गूजरी महला 5 चउपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।