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अंग 495

अंग
495
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गूजरी महला 5 चउपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥
सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥
मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सि तरिआ ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥
सिरि सिरि रिजकु संबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥2॥
ऊडै ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥
उन कवनु खलावै कवनु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥3॥
सभ निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥
जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 चउपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे मन ! आप (उस रिजक की खातिर) क्यों सोचें सोचता रहता है जिस (रिजक को पहुँचाने के) आहर में परमात्मा स्वयं लगा हुआ है।(देख।) पहाडों के पत्थरों में (परमात्मा के) जीव पैदा किए हुए हैं उनका रिजक उसने पहले ही तैयार करके रख दिया होता है। 1। हे मेरे प्रभू जी ! जो मनुष्य आपकी साध-संगति में मिलते हैं वह (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। गुरू की कृपा से वे मनुष्य सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर लेते हैं।वह ऐसे हरे (आत्मिक जीवन वाले) हो जाते हैं जैसे कोई सूखे वृक्ष हरे हो जाएं। 1।रहाउ। हे मन ! माता।पिता।और लोग।पुत्र।स्त्री- इनमें से कोई भी किसी का आसरा नहीं। परमात्मा खुद हरेक जीव के वास्ते रिजक पहुँचाता है।हे मन ! आप (रिजक के लिए) क्यों सहम करता है। 2। (हे मन ! देख।कूँज) उड़ती है।और उड़ के (अपने घोंसले से) सैकड़ों कोस (दूर) आ जाती है।उसके बच्चे उसके पीछे अकेले पड़े रहते हैं।(बता।) उन बच्चों को कौन (चोगा) खिलाता है।कौन चोगा चुगाता है।(कूँज) अपने मन में उनको याद करती रहती है (परमात्मा की कुदरति ! इस याद से ही वह बच्चे पलते रहते हैं)। 3। (हे मन ! दुनिया के) सारे खजाने।अठारह सिद्धियां (करामाती ताकतें) – ये सब परमात्मा के हाथों की तलियों पर टिके रहते हैं। हे नानक ! उस परमात्मा से सदके सदा कुर्बान होते रहना चाहिए (और अरदास करते रहना चाहिए कि हे प्रभू !) आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।आपका इस पार और उस पार का अंत नहीं पाया जा सकता। 4। 1।
गूजरी महला 5 चउपदे घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥
अंतरि मैलु न उतरै हउमै बिनु गुर बाजी हारी ॥1॥
मेरे ठाकुर रखि लेवहु किरपा धारी ॥
कोटि मधे को विरला सेवकु होरि सगले बिउहारी ॥1॥ रहाउ ॥
सासत बेद सिम्रिति सभि सोधे सभ एका बात पुकारी ॥
बिनु गुर मुकति न कोऊ पावै मनि वेखहु करि बीचारी ॥2॥
अठसठि मजनु करि इसनाना भ्रमि आए धर सारी ॥
अनिक सोच करहि दिन राती बिनु सतिगुर अंधिआरी ॥3॥
धावत धावत सभु जगु धाइओ अब आए हरि दुआरी ॥
दुरमति मेटि बुधि परगासी जन नानक गुरमुखि तारी ॥4॥1॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 चउपदे घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! दुनियादार मनुष्य कर्म-काण्ड करते हैं।(स्नान।संध्या आदि) छे (प्रसिद्ध निहित धर्मिक) कर्म कमाते हैं।इन कर्मों में ही ये लोग व्यस्त रहते हैं। पर इनके मन में टिकी हुई अहंकार की मैल (इन कामों से) नहीं उतरती।गुरू की शरण पड़े बिना वह मानस जनम की बाजी हार जाते हैं। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! कृपा करके मुझे (दुर्मति) से बचाए रख। (मैं देखता हूँ कि) करोड़ों मनुष्यों में से कोई विरला मनुष्य (आपका सच्चा) भगत है (कुमति के कारण) और सारे मतलबी ही हैं (अपने मतलब के कारण देखने को धार्मिक काम कर रहे हैं)। 1।रहाउ। हे भाई ! सारे शास्त्र। वेद।सारी ही स्मृतियां।ये सारे हमने पड़ताल के देख लिए हैं।ये सारे भी यही एक बात पुकार-पुकार के कह रहे हैं कि गुरू की शरण आए बिना कोई मनुष्य (माया के मोह आदि से) निजात नहीं पा सकता।हे भाई ! आप भी बेशक मन में विचार करके देख लो (यही बात ठीक है)। 2। हे भाई ! लोग अढ़सठ तीर्थों के स्नान करके।और।सारी धरती पे घूम के आ जाते हैं। दिन-रात और अनेकों पवित्रता के साधन करते रहते हैं।पर।गुरू के बिना उनके अंदर माया के मोह का अंधकार टिका रहता है। 3। हे नानक ! (कह) भटक-भटक के सारे जगत में भटक के जो मनुष्य आखिर परमात्मा के दर पर आ गिरते हैं। परमात्मा उनके अंदर से दुर्मति मिटा के उनके मन में सद्-बुद्धि का प्रकाश कर देता है।गुरू की शरण पा के उनको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। 4। 1। 2।
गूजरी महला 5 ॥
हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥
निमख न बिसरउ मन ते हरि हरि साधसंगति महि पाइआ ॥1॥
माई खाटि आइओ घरि पूता ॥
हरि धनु चलते हरि धनु बैसे हरि धनु जागत सूता ॥1॥ रहाउ ॥
हरि धनु इसनानु हरि धनु गिआनु हरि संगि लाइ धिआना ॥
हरि धनु तुलहा हरि धनु बेड़ी हरि हरि तारि पराना ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे माँ ! परमात्मा का नाम-धन ही (मेरे वास्ते देव-पूजा के लिए खास मंत्रों का) जाप है।हरि-नाम-धन ही (मेरे लिए) धूणियों को तपाना है; परमात्मा का नाम-धन ही (मेरे आत्मिक जीवन के लिए) खुराक है।और ये खुराक मुझे अच्छी लगी है। हे माँ ! आँख झपकने जितने समय के लिए भी मैं अपने मन को नहीं भुलाता।मैंने ये धन साध-संगति में (रह के) पा लिया है। 1। हे माँ ! (किसी माँ का वह) पुत्र कमा के घर आया समझ। जो चलते बैठते जागते सोए हुए हर समय हरि-नाम-धन का ही व्यापार करता है। 1।रहाउ। हे माँ ! जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम-धन को ही तीर्थ-स्नान समझा है नाम-धन को ही शास्त्र आदि का विचार समझ लिया है।जो मनुष्य परमात्मा के चरणों में ही सुरति जोड़ता है (इसी को समाधि लगानी समझता है)। जिस मनुष्य ने संसार नदी से पार लांघने के लिए हरि-नाम-धन को तुलहा बना लिया है।बेड़ी बना ली है।परमात्मा उसे संसार समुंद्र में से तैरा के परले पासे पहुँचा देता है। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गूजरी महला 5 चउपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।