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अंग 513

अंग
513
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक गुरमुखि उबरे जि आपि मेले करतारि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिन गुरमुखों को करतार ने खुद (अपने साथ) जोड़ा है वही इस (लालच रूपी समुंद्र) में से बच निकलते हैं। 2।
पउड़ी ॥
भगत सचै दरि सोहदे सचै सबदि रहाए ॥
हरि की प्रीति तिन ऊपजी हरि प्रेम कसाए ॥
हरि रंगि रहहि सदा रंगि राते रसना हरि रसु पिआए ॥
सफलु जनमु जिन॑ी गुरमुखि जाता हरि जीउ रिदै वसाए ॥
बाझु गुरू फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआए ॥11॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। बंदगी करने वाले सच्चे प्रभू की हजूरी में शोभा पाते हैं।(प्रभू की हजूरी में वह) सच्चे शबद के द्वारा टिके रहते हैं। उनके अंदर प्रभू का प्यार पैदा होता है।(वह) प्रभू के प्यार के खिंचे हुए हैं। वह सदा प्रभू के प्यार में रहते हैं।प्रभू के रंग में रंगे रहते हैं और जीभ से प्रभू का नाम-रस पीते हैं। जिन्होंने गुरू के सन्मुख हो के रॅब को पहचाना है और दिल में बसाया है उनका पैदा होना मुबारक है। गुरू के बिना सृष्टि और-और प्यार में गलतान है बिलकती फिरती है। 11।
सलोकु मः 3 ॥
कलिजुग महि नामु निधानु भगती खटिआ हरि उतम पदु पाइआ ॥
सतिगुर सेवि हरि नामु मनि वसाइआ अनदिनु नामु धिआइआ ॥
विचे ग्रिह गुर बचनि उदासी हउमै मोहु जलाइआ ॥
आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ धंनु जणेदी माइआ ॥
ऐसा सतिगुरु सोई पाए जिसु धुरि मसतकि हरि लिखि पाइआ ॥
जन नानक बलिहारी गुर आपणे विटहु जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ इस झमेलों भरे जगत में परमात्मा का नाम (ही) खजाना है।जिसने बंदगी करके (ये खजाना) कमा लिया है उसने प्रभू (का मेल रूप) उच्च दर्जा पा लिया है। गुरू के हुकम में चल के उसने प्रभू का नाम अपने मन में बसाया है और हर वक्त नाम सिमरा है। सतिगुरू के वचन में (चल के) वह गृहस्थ में ही उदासी है (क्योंकि) उसने अहंकार से मोह जला लिया है। वह (इस झमेलों भरे संसार-समुंद्र से) खुद लांघ गया है।सारे जगत को भी लंघाता है।धंन है उसकी पैदा करने वाली माँ !ऐसा गुरू (जिसको मिल के मनुष्य ‘आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ’) उसी आदमी को मिलता है जिसके माथे पर धुर से करतार ने (बंदगी करने के लेख) लिख के रख दिए हैं। हे दास नानक ! (कह) मैं अपने गुरू से सदके हूँ जिसने मुझे भटके हुए को सद्-मार्ग पर डाला है। 1।
मः 3 ॥
त्रै गुण माइआ वेखि भुले जिउ देखि दीपकि पतंग पचाइआ ॥
पंडित भुलि भुलि माइआ वेखहि दिखा किनै किहु आणि चड़ाइआ ॥
दूजै भाइ पड़हि नित बिखिआ नावहु दयि खुआइआ ॥
जोगी जंगम संनिआसी भुले ओन॑ा अहंकारु बहु गरबु वधाइआ ॥
छादनु भोजनु न लैही सत भिखिआ मनहठि जनमु गवाइआ ॥
एतड़िआ विचहु सो जनु समधा जिनि गुरमुखि नामु धिआइआ ॥
जन नानक किस नो आखि सुणाईऐ जा करदे सभि कराइआ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (सारे जीव। क्या विद्वान और क्या त्यागी) त्रैगुणी माया को देख के (जीवन के सही राह से) भटक रहे हैं (और दुखी हो रहे हें) जैसे पतंगा (दीपक को) देख के दीपक पर ही जलता है; पण्डित (वैसे तो औरों को कथा सुनाते हैं। पर) बार-बार भटक के माया की ओर ही देखते हैं कि देखें किसी ने कुछ ला के भेटा रखी है (अथवा नहीं)। सो माया के प्यार में वह (असल में) सदा माया (की संथ्या ही) पढ़ते हैं।परमात्मा ने उनको (अपने) नाम से वंचित कर दिया है। जोगी-जंगम और सन्यासी (अपनी तरफ से संयासी बने हुए हैं।पर ये भी जीवन के राह से) भटके हुए हैं (क्योंकि एक तो अपने ‘त्याग’ का ही) इनके गुमान ने अहंकार को बढ़ाया हुआ है। गृहस्थियों से आदर-मान से मिला कपड़ा व भोजन-रूप भिक्षा नहीं लेते (भाव।थोड़ी चीज मिलने पर उन्हें घूरते हैं;सो।इन्होंने भी) मन के हठ से (इस धारण किए हुए ‘त्याग’ के कारण) अपनी जिंदगी व्यर्थ गवाई है। इन सभी में से वही मनुष्य पूर्ण-अवस्था वाला है जिसने सनमुख हो के नाम सिमरा है।पर। हे दास ! (इस त्रैगुणी माया के हाथ से) और किस के आगे पुकार करें।सभी तो प्रभू के प्रेरे हुए ही काम कर रहे हैं।(सो।इस माया से बचने के लिए प्रभू के आगे की हुई अरदास ही सहायता करती है)। 2।
पउड़ी ॥
माइआ मोहु परेतु है कामु क्रोधु अहंकारा ॥
एह जम की सिरकार है एन॑ा उपरि जम का डंडु करारा ॥
मनमुख जम मगि पाईअनि॑ जिन॑ दूजा भाउ पिआरा ॥
जम पुरि बधे मारीअनि को सुणै न पूकारा ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै गुरमुखि निसतारा ॥12॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ माया का मोह।काम।क्रोध व अहंकार (ये। जैसे) भूत हैं; ये सारे जमराज की प्रजा हैं।इन पर यमराज का डंडा (तगड़ा शासन) चलता है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे जिन्हें माया का प्यार मीठा लगता है जमराज के राह पर पाए जाते हैं (भाव।वह यम की रईअत कामादिकों के वश पड़ जाते हैं)। वह मनमुख जम-पुरी में बंधे हुए (भाव।जम की प्रजा कामादिकों के वश में पड़े हुए) मारे जाते हैं (दुखी होते हैं)।कोई उनकी पुकार नहीं सुनता (भाव।इन कामादिकों के पँजों से उन्हें कोई छुड़ा नहीं सकता)। जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहर करे उसको गुरू मिलता है।गुरू के द्वारा (इन भूतों से) छुटकारा होता है। 12।
सलोकु मः 3 ॥
हउमै ममता मोहणी मनमुखा नो गई खाइ ॥
जो मोहि दूजै चितु लाइदे तिना विआपि रही लपटाइ ॥
गुर कै सबदि परजालीऐ ता एह विचहु जाइ ॥
तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥
नानक माइआ का मारणु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ अहंकार और ममता (स्वरूप वाली माया।जैसे) चुड़ैल है जो मन-मर्जी करने वालों को हड़प कर जाती है। जो मनुष्य (ईश्वर को छोड़ के किसी) और के मोह में चित्त जोड़ते हैं उनको चिपक के अपने वश में कर लेती है। अगर गुरू के शबद से इसे अच्छी तरह जलाएं (जैसे। चिपके हुए भूतों-चुड़ैलों को मांदरी लोग आग से जलाने का डरावा देते सुने जाते हैं) तो ये अंदर से निकलती है; शरीर और मन स्वच्छ हो जाता है; प्रभू का नाम मन में आ बसता है। हे नानक ! इस माया (संख्या को कुश्ता करने।बेअसर करने) की बूटी एक हरी-नाम ही है जो गुरू से ही मिल सकती है। 1।
मः 3 ॥
इहु मनु केतड़िआ जुग भरमिआ थिरु रहै न आवै जाइ ॥
हरि भाणा ता भरमाइअनु करि परपंचु खेलु उपाइ ॥
जा हरि बखसे ता गुर मिलै असथिरु रहै समाइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (मनुष्य का) ये मन कई जुग भटकता रहता है (परमात्मा में) टिकता नहीं और पैदा होता मरता रहता है; पर ये बात प्रभू को (इसी तरह) भाती है कि उसने ये ठॅगने वाली (जगत खेल बना के) (जीवों को इसमें) भरमाया हुआ है। जब प्रभू (स्वयं) मेहर करता है तो (जीव को) गुरू मिलता है।(फिर) यह (प्रभू में) जुड़ के टिका रहता है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिन गुरमुखों को करतार ने खुद (अपने साथ) जोड़ा है वही इस (लालच रूपी समुंद्र) में से बच निकलते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।