दूखु दरदु वड रोगु न पोहे तिसु माइ ॥
भगता एहु अधारु गुण गोविंद गाइ ॥
सदा सदा दिनु रैणि इको इकु धिआइ ॥
पीवति अंम्रित नामु जन नामे रहे अघाइ ॥14॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥
नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥1॥
पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥
घड़ी मुहतु नह वीसरै नानक रवीऐ नित ॥2॥
सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥
दस नारी अउधूत देनि चमोड़ीऐ ॥
जिणि जिणि लैनि॑ रलाइ एहो एना लोड़ीऐ ॥
त्रै गुण इन कै वसि किनै न मोड़ीऐ ॥
भरमु कोटु माइआ खाई कहु कितु बिधि तोड़ीऐ ॥
गुरु पूरा आराधि बिखम दलु फोड़ीऐ ॥
हउ तिसु अगै दिनु राति रहा कर जोड़ीऐ ॥15॥
किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥
कोटि कलेसा ऊपजहि नानक बिसरै नाउ ॥1॥
नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥
हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे होवै मुकति ॥2॥
सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥
सो सतिगुरु वाहु वाहु जिनि हरि सिउ जोड़िआ ॥
नामु निधानु अखुटु गुरु देइ दारूओ ॥
महा रोगु बिकराल तिनै बिदारूओ ॥
पाइआ नामु निधानु बहुतु खजानिआ ॥
जिता जनमु अपारु आपु पछानिआ ॥
महिमा कही न जाइ गुर समरथ देव ॥
गुर पारब्रहम परमेसुर अपरंपर अलख अभेव ॥16॥
उदमु करेदिआ जीउ तूं कमावदिआ सुख भुंचु ॥
धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥1॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥2॥
तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥
जिसु मिलि जपीऐ नाउ तिसु जीउ अरपीऐ ॥
आइऐ चिति निहालु साहिब बेसुमार ॥
तिस नो पोहे कवणु जिसु वलि निरंकार ॥
सभु किछु तिस कै वसि न कोई बाहरा ॥
सो भगता मनि वुठा सचि समाहरा ॥
तेरे दास धिआइनि तुधु तूं रखण वालिआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दयालु प्रभू ! बंदगी करने वाले बंदे आपके हैं के रहते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।