Lulla Family

अंग 493

अंग
493
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दुरमति भागहीन मति फीके नामु सुनत आवै मनि रोहै ॥
कऊआ काग कउ अंम्रित रसु पाईऐ त्रिपतै विसटा खाइ मुखि गोहै ॥3॥
अंम्रित सरु सतिगुरु सतिवादी जितु नातै कऊआ हंसु होहै ॥
नानक धनु धंनु वडे वडभागी जिन॑ गुरमति नामु रिदै मलु धोहै ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाईयो ! बुरी मति पर चलने वाले बद्-किस्मत होते हैं।उनकी अपनी अकल भी हल्की ही रहती है।परमात्मा का नाम सुनते ही उनके मन में (बल्कि) क्रोध आता है। कौए के आगे कोई स्वादिष्ट भोजन रखें (तो उसको खाने की जगह) वह विष्टा खा के विष्टा मुंह में डाल के खुश होता है। 3। हे भाईयो ! सदा-स्थिर हरी का नाम जपने वाला सतिगुरू आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल का सरोवर है।उस गुरू-सरोवर में नहाने से (आत्मिक डुबकी लगाने से) कौआ भी (सदा विकारों के गंद में खुश रहने वाला मनुष्य भी) हंस बन जाता है (हरी-नाम-ज्योति का प्रेमी बन जाता है)। हे नानक ! वो मनुष्य धन्य हैं।बड़े भाग्यशाली हैं।गुरमति से मिला हरी-नाम जिनके हृदय की मैल धोता है। 4। 2।
गूजरी महला 4 ॥
हरि जन ऊतम ऊतम बाणी मुखि बोलहि परउपकारे ॥
जो जनु सुणै सरधा भगति सेती करि किरपा हरि निसतारे ॥1॥
राम मो कउ हरि जन मेलि पिआरे ॥
मेरे प्रीतम प्रान सतिगुरु गुरु पूरा हम पापी गुरि निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि वडभागी वडभागे जिन हरि हरि नामु अधारे ॥
हरि हरि अंम्रितु हरि रसु पावहि गुरमति भगति भंडारे ॥2॥
जिन दरसनु सतिगुर सत पुरख न पाइआ ते भागहीण जमि मारे ॥
से कूकर सूकर गरधभ पवहि गरभ जोनी दयि मारे महा हतिआरे ॥3॥
दीन दइआल होहु जन ऊपरि करि किरपा लेहु उबारे ॥
नानक जन हरि की सरणाई हरि भावै हरि निसतारे ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा के संत जन ऊँचे जीवन वाले होते हैं; उनके बचन श्रेष्ठ होते हैं।ये श्रेष्ठ वचन वे अपने मुंह से लोगों की भलाई के लिए बोलते हैं। जो मनुष्य संत जनों के उत्तम वचन श्रद्धा से सुनता है प्यार से सुनता है।परमात्मा कृपा करके उसको (भव-सागर से) पार लंघा देता है। 1। हे प्यारे राम ! मुझे अपने संत जन मिला। हे भाई ! पूरा सतिगुरू मुझे अपने प्राणों जितना प्यारा है।मुझ पापी को गुरू ने (संसार समुंद्र से) पार लंघा लिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य बड़े भाग्यों वाले बन जाते हैं क्योंकि परमात्मा का नाम उनकी जिंदगी का आसरा बन जाता है। वह आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस प्राप्त कर लेता है।गुरू की मति पर चलने से (उनके अंदर) प्रभू-भक्ति के खजाने भर जाते हैं। 2। पर जिन मनुष्यों ने महापुरुष सतिगुरू के दर्शन नहीं किए वे अपनी किस्मत हार बैठते हैं।आत्मिक मौत ने उन्हें मार लिया होता है। वह मनुष्य कुत्ते।सूअर।गधे आदि जूनियों में पड़े रहते हैं।उन निर्दयी मनुष्यों को परमात्मा ने आत्मिक मौत मार दिया होता है। 3। हे नानक ! (कह) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! अपने दास पर मेहर कर।और।दास को (संसार समुंद्र से) बचा ले। हे भाई ! परमात्मा के सेवक परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं।जब परमात्मा को अच्छा लगता है वह उन्हें (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 4। 3।
गूजरी महला 4 ॥
होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥
सभि सुख सभि गुण सभि निधान हरि जितु जपिऐ दुख भुख सभ लहि जाई ॥1॥
मन मेरे मेरा राम नामु सखा हरि भाई ॥
गुरमति राम नामु जसु गावा अंति बेली दरगह लए छडाई ॥1॥ रहाउ ॥
तूं आपे दाता प्रभु अंतरजामी करि किरपा लोच मेरै मनि लाई ॥
मै मनि तनि लोच लगी हरि सेती प्रभि लोच पूरी सतिगुर सरणाई ॥2॥
माणस जनमु पुंनि करि पाइआ बिनु नावै ध्रिगु ध्रिगु बिरथा जाई ॥
नाम बिना रस कस दुखु खावै मुखु फीका थुक थूक मुखि पाई ॥3॥
जो जन हरि प्रभ हरि हरि सरणा तिन दरगह हरि हरि दे वडिआई ॥
धंनु धंनु साबासि कहै प्रभु जन कउ जन नानक मेलि लए गलि लाई ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 ॥ हे प्रभू ! मेरे पर दयावान होवो।मेरा मन (अपने चरणों में) जोड़े रखो।मैं हर समय सदा आपका ही नाम सिमरता रहूँ। हे मेरे मन ! सारे सुख सारे खजाने उस परमात्मा के ही पास हैं।जिसका नाम जपने से सारे दुख (दूर हो जाते हैं)।(माया की) सारी भूख उतर जाती है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम मेरा मित्र है मेरा भाई है। मैं गुरू की शिक्षा की बरकति से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता हूँ।आखिरी वक्त पर परमात्मा का नाम ही मददगार बनता है।प्रभू की हजूरी में नाम ही सुर्खरू करवाता है। 1।रहाउ। हे हरी ! आप खुद ही सब दातें देने वाला है।आप खुद ही (सबका) मालिक है।आप सबके दिल की जानने वाला है।तूने खुद ही मेहर करके मेरे मन में अपनी भक्ति की चाहत पैदा की हुई है। हे भाई ! मेरे मन में मेरे हृदय में परमात्मा के साथ मिलाप की चाहत पैदा हुई पड़ी है।परमात्मा ने मुझे सतिगुरू की शरण में ला कर मेरी चाहत पूरी कर दी है। 2। हे भाई ! मानस जनम बड़ी किस्मत से मिलता है।पर परमात्मा के नाम सिमरन के बिना (मानस जन्म) धिक्कार-योग्य हो जाता है। नाम के बिना व्यर्थ चला जाता है।मनुष्य प्रभू का नाम भुला के दुनिया के अनेकों किस्म के पदार्थ खाता रहता है।दुख ही सहेड़ता है।मुंह से फीके बोल बोलता रहता है।दुनिया इसे धिक्कारें ही डालती है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं।उनको परमात्मा अपनी हजूरी में आदर मान देता है। हे नानक ! परमात्मा अपने सेवक को ‘धन्य धन्य’ कहता है।‘शाबाश’ कहता है।अपने सेवक को अपने गले से लगा के अपने चरणों में जोड़ लेता है। 4। 4।
गूजरी महला 4 ॥
गुरमुखि सखी सहेली मेरी मो कउ देवहु दानु हरि प्रान जीवाइआ ॥
हम होवह लाले गोले गुरसिखा के जिन॑ा अनदिनु हरि प्रभु पुरखु धिआइआ ॥1॥
मेरै मनि तनि बिरहु गुरसिख पग लाइआ ॥
मेरे प्रान सखा गुर के सिख भाई मो कउ करहु उपदेसु हरि मिलै मिलाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 ॥ हे गुरू के सन्मुख रहने वाले सिखो ! हे मेरी सखी सहेलियो ! मुझे आत्मिक जीवन देने वाले हरि-नाम की दाति दो। मैं उन सिखों का दास हूँ।गुलाम हूँ।जो हर समय सर्व-व्यापक परमात्मा को सिमरते रहते हैं। 1। हे भाईयो ! (मेरे सौभाग्य से परमात्मा ने) मेरे मन में मेरे हृदय में गुरसिखों के चरणों का प्रेम पैदा कर दिया है। हे मेरी जीवात्मा के साथी गुरसिखो ! आप मुझे इस तरह का उपदेश करो।(जिसकी बरकति से) आपका मिलाया परमात्मा मुझे मिल जाए। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाईयो ! बुरी मति पर चलने वाले बद्-किस्मत होते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।