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प्रह्लाद: भक्ति, आत्मविचार और राज्य में वापसी

कथा · 9

प्रह्लाद: भक्ति, आत्मविचार और राज्य में वापसी

हिरण्यकशिपु के वध के बाद बिखरे दैत्यकुल को सँभालते हुए प्रह्लाद ने उसी विष्णु को अपना आश्रय बनाया, जिनसे उनका कुल भयभीत था। भक्ति ने उन्हें आत्मविचार तक पहुँचाया और आत्मविचार ने दीर्घ समाधि में। जब पाताल अराजक हुआ, विष्णु ने पाँचजन्य की ध्वनि से उन्हें जगाया और जीवन्मुक्त भाव से राज्य सँभालने को कहा।

हिरण्यकशिपु के बाद

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “अब प्रह्लाद का वह प्रसंग सुनिए जिसमें भक्ति से आत्मज्ञान और आत्मज्ञान से शान्ति का क्रम खुलता है।” पाताल में हिरण्यकशिपु का प्रभाव अत्यन्त प्रबल था। उसने अपने बल से देवताओं और असुरों तक को वश में कर लिया था और तीनों लोकों की व्यवस्था भय से काँपती थी। उसके अनेक पुत्रों में प्रह्लाद अपने गुण, विवेक और स्वभाव से अलग पहचाने जाते थे।

हिरण्यकशिपु के अत्याचार से व्यथित देवताओं ने भगवान् विष्णु की शरण ली। विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर उसका वध किया। उस घटना के बाद दैत्यकुल की पुरानी शक्ति टूट गई। पाताल के भवन उजड़ने लगे, परिवार शोक में डूब गए और जो दैत्य बचे थे, वे हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के पास एकत्र हुए। उनके सामने अपने कुल की पराजय और भय से भरा हुआ राज्य था।

प्रह्लाद ने बीते वैभव और वर्तमान दशा को ध्यान से देखा। जो दैत्य स्त्रियाँ कभी देवांगनाओं से सेवा कराती थीं, वे अब दीन थीं। जिनके संकेत पर लोकों के कार्य बदलते थे, वे स्वयं आश्रय खोज रहे थे। उन्होंने मन में विचार किया, “हमने विष्णु से विरोध किया और अपना बल उसी विरोध में क्षीण कर दिया। इस विपत्ति में स्थायी शरण कहाँ है? जिस सामर्थ्य के आगे हमारा गर्व नहीं ठहरा, उसी भगवान् की उपासना हमारे लिए हितकारी होगी।”

उनका विचार धीरे-धीरे निश्चय में बदल गया। प्रह्लाद ने एक कीट के निरन्तर ध्यान से दूसरे कीट के अनुरूप हो जाने का उदाहरण याद किया। चित्त जिस रूप में एकाग्र होता है, उसी का संस्कार गहरा होता जाता है। उन्होंने अपने भीतर नारायण के स्वरूप का ध्यान आरम्भ किया। शंख, चक्र, गदा और पद्म से सुशोभित चार भुजाएँ, वक्षस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ, पीताम्बर, शार्ङ्ग धनुष, नन्दक खड्ग और गरुड़ पर स्थित दिव्य रूप, यह सब उनके मानसिक पूजन का अंग बना।

अन्तःकरण में भगवान् का रूप स्थापित कर उन्होंने विधिपूर्वक पूजा की। फिर अपने भवन में बाहरी उपचारों से भी आराधना आरम्भ की। जल, पुष्प, धूप, दीप, गन्ध, वस्त्र और नैवेद्य अर्पित होते। यह एक दिन का आवेग नहीं रहा। पूजा उनकी नित्य व्यवस्था बन गई। दैत्य अपने कुल के अग्रणी पुरुष को जिस भाव से विष्णु की ओर मुड़ते देखते थे, उसी भाव को उन्होंने भी ग्रहण किया। थोड़े समय में असुरपुर में विष्णु की उपासना फैल गई।

अपने निवास में प्रतिदिन विष्णु की पूजा करते प्रह्लाद

देवताओं को यह समाचार मिला तो वे विस्मित हुए। उन्हें लगा कि पत्थर पर कमल उगने की बात सुनी जा सकती है, पर विष्णु के विरोधी दैत्यों का हरिभक्त हो जाना सहज विश्वास में नहीं आता। वे भगवान् के पास पहुँचे और अपनी चिन्ता कही। विष्णु ने उन्हें आश्वस्त किया, “प्रह्लाद की भक्ति निष्कपट और कल्याणकारी है। उसका अन्तःकरण परिपक्व हुआ है। यह उसका अन्तिम जन्म है और उसका कल्याण निकट है। उससे भय मत कीजिए।” देवताओं ने प्रणाम किया और लौट गए।

विष्णु का वर

प्रह्लाद की आराधना उसी एकाग्रता से चलती रही। पूजा में उनका चित्त इस प्रकार डूबता कि उपासक और उपास्य के बीच की दूरी क्षीण होने लगती। एक दिन भगवान् विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। जिस दिव्य रूप को वे भीतर निरन्तर सँजोते आए थे, वह उनके सम्मुख प्रत्यक्ष था। उन्होंने विनय से भगवान् की स्तुति की और अर्घ्य, पुष्प तथा प्रणाम अर्पित किए।

विष्णु ने कहा, “प्रह्लाद, तुम्हारी आराधना से मैं प्रसन्न हूँ। कोई वर माँगो।”

प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “भगवन्, मुझे वह दीजिए जिससे समस्त कल्याण सिद्ध हो और संसाररूपी भ्रम का अन्त हो।”

भगवान् बोले, “अपने अन्तःकरण में पर्यन्त विचार करो। जो विचार द्रष्टा और दृश्य की जाँच करते हुए अन्तिम सत्य तक पहुँचता है, उसी के द्वारा मोह शान्त होगा और तुम परम पद को जानोगे।”

इतना कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गए। प्रह्लाद अपने भवन में स्वच्छ आसन पर बैठे। पूजा में मिली प्रसन्नता अब एक गम्भीर प्रश्न का रूप ले चुकी थी। उन्होंने चित्त को बाहर से समेटा और स्वयं से पूछा, “इस संसाररूपी विस्तार में बोलने, चलने, देखने, सुनने और अनुभव करने वाला मैं कौन हूँ?”

आत्मा और जगत के विषय में विचार आरम्भ करते प्रह्लाद

आत्मविचार की गहराई

पहले उन्होंने देह को देखा। शरीर हड्डी, मांस, रक्त, त्वचा और प्राणों की गति से बना है। उसका प्रत्येक अंश परिवर्तन के अधीन है। जो जड़ है और जिसका ज्ञान किसी प्रकाश से होता है, वह स्वयं जानने वाला कैसे हो सकता है? उन्होंने दृष्टि को इन्द्रियों की ओर मोड़ा। नेत्र रूप ग्रहण करते हैं, कान शब्द सुनते हैं, त्वचा स्पर्श जानती है, जिह्वा रस लेती है और नासिका गन्ध। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय तक सीमित है और विश्राम में उसकी क्रिया रुक जाती है। इन क्रियाओं को जानने वाला उनसे अधिक व्यापक है।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध भी क्षणभंगुर हैं। मन उनका संयोग बनाता है, स्मृति उन्हें जोड़ती है और बुद्धि निर्णय देती है। मन प्रसन्नता से विषाद, आशा से भय और ग्रहण से त्याग की ओर जाता रहता है। प्रह्लाद ने देखा कि इन सब वृत्तियों की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों जानी जाती हैं। जानने का मूल प्रकाश उनके आने-जाने से नष्ट नहीं होता।

विचार ने उन्हें भीतर के उस निर्मल बोध तक पहुँचाया जो किसी एक वृत्ति का आकार नहीं लेता, फिर भी सभी वृत्तियों को प्रकाशित करता है। उन्होंने अनुभव किया, “मैं वह चैतन्य हूँ जिसके प्रकाश से देह और जगत् जाने जाते हैं। आकाश की व्यापकता, सूर्य का तेज, चन्द्रमा की शीतलता, अग्नि की उष्णता, जल की तरलता और पृथ्वी की स्थिरता भी उसी सत्ता में प्रकट होती है। वह मेरे भीतर सीमित होकर नहीं बैठी। सभी प्राणियों में उसी का प्रकाश है।”

यह अनुभूति विस्तार पाती गई। फूलों की सुगन्ध, पत्तों की कोमलता, नदियों का प्रवाह, पर्वतों का भार, वायु की गति और इन्द्रियों की चेतना, सबके आधार में एक ही सत्ता दिखाई दी। स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, देव, दैत्य, पशु और पक्षी के भिन्न आकार उस चेतना को बाँध नहीं सकते। जन्म और विनाश से गुजरती आकृतियों के बीच वह स्वयं जन्मरहित और अखण्ड है।

प्रह्लाद ने दैत्यकुल के पूर्व गर्व और उसकी हार को भी इसी दृष्टि में रखा। इन्द्र का राज्य, तीनों लोकों की सम्पदा और बाहरी विजय आत्मानन्द के सामने फीकी लगी। उन्होंने मन में कहा, “जिसे मैं शत्रु समझता था, उसमें भी यही आत्मा है। जिसे अपना कहता था, उसकी सत्ता भी इसी प्रकाश से है। तब हानि किसकी और लाभ किसका? जिस चेतना में सब रूप उठते और विलीन होते हैं, मैं उसी में स्थित हूँ।”

उनकी वाणी आत्मस्तुति में बहने लगी। उन्होंने उस बोध को प्रणाम किया जो नेत्रों के देखने, मन के सोचने और बुद्धि के निर्णय लेने को प्रकाशित करता है। उन्होंने उस दीर्घ क्रम को स्मरण किया जिसमें अहंकार ने कभी आशा, कभी भय, कभी मोह और कभी क्रोध के वन में भटकाया था। इच्छाएँ शरीररूपी वृक्ष पर पक्षियों की तरह आतीं, घोंसला बनातीं और नयी व्याकुलता जन्म देतीं। विवेक के जागने पर वह वृक्ष भीतर से साफ दिखाई देने लगा।

उन्होंने अनुभव किया कि विषयों का त्याग किसी नयी कठोरता से नहीं हुआ। विषयों की सीमितता स्पष्ट हुई तो उनकी अनिवार्यता स्वयं ढीली पड़ गई। सुख आए अथवा दुःख, सम्मान मिले अथवा अपमान, देह स्वस्थ रहे अथवा क्षीण हो, आत्मा की सत्ता उनसे घटती-बढ़ती नहीं। मन की चेष्टा शान्त हुई और आशारूपी मृगतृष्णा का आकर्षण मिट गया।

प्रह्लाद ने उस अन्तःशान्ति को बार-बार प्रणाम किया। बुद्धि का बहिर्मुखी प्रवाह रुक गया, विचार अपने प्रयोजन को पूरा कर शांत हो गया और ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय की त्रिपुटी का आग्रह विलीन होने लगा। जहाँ तक शब्द पहुँच सकता था, उन्होंने वहाँ तक आत्मतत्त्व का अभिनन्दन किया। उसके बाद वाणी भी ठहर गई।

पाँच सहस्र वर्षों की समाधि

अपने ही भवन में बैठे प्रह्लाद निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गए। देह चित्र में बनी आकृति की तरह निश्चल थी। बाहर की ध्वनि, स्पर्श और समय का प्रवाह उसमें कोई प्रतिक्रिया नहीं जगा रहे थे। असुरश्रेष्ठों ने अपने स्वामी को जगाने का प्रयत्न किया, पर समय से पहले बीज से अंकुर न निकलने की तरह उनका चित्त बाहर नहीं लौटा। इसी अवस्था में पाँच सहस्र वर्ष बीत गए।

दैत्यसभा के प्रयासों से अप्रभावित समाधि में स्थित प्रह्लाद

हिरण्यकशिपु का वध हो चुका था और उसका पुत्र समाधिस्थ था। पाताल में कोई दूसरा राजा उपस्थित नहीं रहा। आरम्भ में दैत्यों ने प्रह्लाद को जगाने की चेष्टा की। प्रयास निष्फल होने पर शासन का भय और मर्यादा ढीली पड़ने लगी। बलवान दुर्बलों की सम्पत्ति छीनने लगे। नगर के क्रम टूटे, परिवार असुरक्षित हुए और स्त्रियों, धन, मन्त्र तथा शस्त्रों तक की मर्यादा न रही। जिनके घर और साधन छिने, उनका करुण क्रन्दन चारों ओर सुनाई देता था।

अन्न, फल और बन्धु-बान्धवों का अभाव बढ़ा। मार्गों पर भय था, नगर के भाग उजड़ रहे थे और पशु-पक्षी तक उस अव्यवस्था से प्रभावित थे। दैत्यकुल, जिसे प्रह्लाद की उपासना ने कुछ समय के लिए संयत किया था, नेतृत्व के अभाव में फिर बल और स्वार्थ के अधीन हो गया। समाधि में बैठे प्रह्लाद को इन घटनाओं का बाहरी बोध नहीं था। उनकी अवस्था में व्यक्तिगत सुख-दुःख और राज्य की हलचल प्रवेश नहीं कर रही थी।

यह क्रम बहुत दूर तक फैल गया। स्वर्ग में देवताओं की शक्ति बढ़ी, क्योंकि उनका प्रतिपक्ष निष्क्रिय था। पाताल में अराजकता गहराती गई। इसी समय क्षीरसागर में शेष पर स्थित भगवान् विष्णु वर्षा ऋतु की योगनिद्रा से जागे और उन्होंने तीनों लोकों की दशा का अवलोकन किया।

क्षीरसागर से पाताल तक

विष्णु ने देखा कि प्रह्लाद गहन समाधि में हैं, पाताल राजाहीन है और दैत्यकुल का क्रम लगभग टूट चुका है। उन्होंने इस दशा को केवल एक राज्य का संकट समझकर नहीं देखा। उनके विचार में देवता और दैत्य वर्तमान सृष्टि के परस्पर सक्रिय पक्ष थे। यदि दैत्य पूरी तरह लुप्त हो जाएँ, तो देवताओं के सामने कोई प्रतिपक्ष नहीं रहेगा। संघर्ष और उत्तरदायित्व से मुक्त होकर देवता भी अपने पदों से विरक्त हो सकते हैं। तब यज्ञ, तप, शासन और लोकव्यवहार का वह क्रम ढीला पड़ेगा जिसके सहारे यह सृष्टि अपने नियत काल तक चल रही है।

उन्होंने यह भी जाना कि प्रह्लाद का वर्तमान शरीर परम पवित्र है और उनका अन्तिम शरीर है। नियति के अनुसार उसे कल्प के अन्त तक रहना है। ज्ञान के कारण देह से आसक्ति मिट चुकी थी, पर देह का नियत कार्य शेष था। विष्णु ने निश्चय किया कि वे पाताल जाकर प्रह्लाद को जगाएँगे, उन्हें दैत्याधिपत्य ग्रहण कराएँगे और संसार की व्यवस्था को उसकी पूर्व मर्यादा में स्थिर करेंगे।

भगवान् गरुड़ पर आरूढ़ हुए। लक्ष्मी उनके समीप थीं, शंख, चक्र और गदा सहित दिव्य आयुध साथ थे और देवर्षि तथा मुनि उनकी स्तुति कर रहे थे। क्षीरसागर से चलकर वे प्रह्लादनगर पहुँचे। नगर की दुर्दशा पार करते हुए वे उस सुवर्णमय भवन में गए जहाँ प्रह्लाद अपने घर के भीतर अचल, शान्त और बाहरी दृष्टि से रहित बैठे थे।

विष्णु ने पुकारा, “महात्मन्, जागो।” फिर उन्होंने पाँचजन्य का मुख प्रह्लाद की ओर किया और शंख बजाया। वह ध्वनि प्रलयकाल के मेघों और समुद्रों की संयुक्त गर्जना जैसी बताई गई है। उसकी तरंगें नगर और दिशाओं में फैल गईं। भय से दबे प्राणी चौंक उठे, पर वैष्णव जनों के भीतर आश्वस्ति जागी।

दीर्घ समाधि से प्रह्लाद को जगाने आते विष्णु

शंखध्वनि ने प्रह्लाद के श्रवण को स्पर्श किया। भीतर स्थित प्राणशक्ति धीरे-धीरे सक्रिय हुई। जैसे जल से भरते सरोवर में तरंग उठती है, वैसे ही प्राणों से मन में गति आई। इन्द्रियों की चेतना लौटी, देह में स्पन्दन हुआ और उनकी आँखें प्रातःकाल खिलते नीलकमलों की तरह खुलीं। सामने विष्णु को देखकर स्मृति पूर्ण रूप से जागी।

जागरण का संवाद

विष्णु ने कहा, “प्रह्लाद, अपने स्वरूप के साथ अपने दैत्यराज्य और इस शरीर का भी स्मरण करो। संकल्पों से मुक्त इस पवित्र देह में प्रिय और अप्रिय का बन्धन तुम्हें नहीं है। इसलिए अभी उठो। तुम्हारी आयु और इस शरीर का विधान कल्प के अन्त तक है। जीवन्मुक्त भाव से सिंहासन पर स्थित होकर लोकव्यवहार पूरा करो।”

प्रह्लाद को अनासक्त होकर जीवन और शासन का उपदेश देते विष्णु

उन्होंने प्रह्लाद को चारों ओर देखने को कहा। सूर्य, चन्द्रमा और तारों का क्रम चल रहा था, पर्वत स्थिर थे, पृथ्वी जल में विलीन नहीं हुई थी और प्रलयकाल उपस्थित नहीं था। ऐसे समय शुद्ध शरीर का परित्याग अनर्थक होता। जिनकी बुद्धि कामना और अज्ञान से व्याकुल है, उनके लिए मृत्यु दुःख का कारण बनती है। आत्मतत्त्व में स्थिर ज्ञानी के लिए जीवन और मृत्यु का आग्रह शान्त हो जाता है। उसे देह के प्रति मोह भी नहीं रहता और अकाल परित्याग की इच्छा भी नहीं उठती।

प्रह्लाद ने विनय से कहा, “देवाधिदेव, मैं शोक, मोह, वैराग्य के आवेग अथवा देहत्याग की इच्छा से समाधि में नहीं गया था। विचार ने मुझे अपने स्वभाव में विश्राम दिया और उसी निर्मल स्थिति में मैं ठहरा रहा। समाधि और व्युत्थान में मेरा आत्मभाव समान है। अब आपकी आज्ञा के अनुसार जो कार्य उचित है, उसे करूँगा।”

विष्णु ने समझाया कि निष्काम ज्ञानी शरीर में रहते हुए भी उसके सुख-दुःख का स्वामी बनकर नहीं जीता। वह कर्म करता है, पर कर्मफल की पकड़ उसके भीतर घर नहीं बनाती। पवन निरन्तर चलता है, सूर्य प्रकाश देता है और काल अपनी गति में रहता है। उसी प्रकार आत्मस्थ पुरुष प्राप्त कर्तव्य का निर्वाह करता है। उसका भीतर का विश्राम क्रिया से टूटता नहीं।

“तुमने जगत् का व्यवहार भी देख लिया है और परम पद का अनुभव भी पाया है,” भगवान् ने कहा। “देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जो कार्य सामने आए, उसे समबुद्धि से करो। राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर दैत्यों की रक्षा करो। तुम्हारे लिए शासन बन्धन का कारण नहीं बनेगा, क्योंकि चित्त ने स्वामित्व का आग्रह छोड़ दिया है।”

प्रह्लाद ने भगवान् के चरणों में प्रणाम किया। उनके भीतर बाहरी गतिविधि लौट चुकी थी, पर समाधि में पाई हुई स्पष्टता बनी रही। उन्होंने विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की और कहा कि तीनों लोकों में पूजित भगवान् उनके द्वारा स्वभाव से प्राप्त इस अर्चना को स्वीकार करें।

अभिषेक और पुरुषार्थ

विष्णु प्रह्लाद को नगर की सभा में ले गए। पाँचजन्य की ध्वनि से देवता, ऋषि, सिद्ध और दैत्य एकत्र हुए। समुद्रों, गंगा, अन्य जलप्रवाहों और तीर्थों का पवित्र जल मँगाया गया। भगवान् ने अपने हाथों से प्रह्लाद का राज्याभिषेक किया और उन्हें सिंहासन पर बैठाया। जिस पाताल में दीर्घ काल से कोई स्थिर अधिपति नहीं था, वहाँ फिर शासन की मान्य धुरी स्थापित हुई।

विष्णु ने कहा, “जब तक पृथ्वी और सूर्य-चन्द्र का यह क्रम विद्यमान है, तब तक सत्य और समता के साथ राज्य का पालन करो। अनुकूल और प्रतिकूल फल के आग्रह से मुक्त रहो। प्रजा, शत्रु, दण्ड और अनुग्रह के विषय में देश, काल और पात्र के अनुरूप निर्णय करो। आत्मा देह से व्यापक है, इस बोध में स्थित रहकर लाभ और हानि को समान समझो।”

विष्णु ने कहा कि प्रह्लाद के समबुद्धि शासन में देवता और दैत्य परस्पर संहार से विरत रहेंगे। असुर नारियों के आँसू थमेंगे और दोनों पक्षों की स्त्रियाँ अपने अन्तःपुरों में सुरक्षित रहेंगी। दैत्यकुल को अपना राजा मिला, नगर में मर्यादा लौटी और लोकों का परस्पर क्रम फिर चलने लगा। विष्णु क्षीरसागर लौटकर शेष पर स्थित हुए, इन्द्र स्वर्ग में रहे और प्रह्लाद पाताल में जीवन्मुक्त राजा के रूप में शासन करने लगे।

जीवन्मुक्त राजा के रूप में न्यायपूर्ण शासन करते प्रह्लाद

कथा का बाहरी क्रम पूरा हुआ तो श्रीराम ने एक सूक्ष्म प्रश्न रखा, “मुनिवर, प्रह्लाद का मन यदि परम पद में विलीन था, तो पाँचजन्य की ध्वनि ने उसे कैसे जगा दिया?”

वसिष्ठ ने कहा कि मुक्ति की दो स्थितियाँ कही जाती हैं। जीवन्मुक्त में देह और प्रारब्ध का क्रम रहता है, पर मन की बन्धनकारी वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। विदेहमुक्ति में वह अवशिष्ट क्रम भी समाप्त हो जाता है। प्रह्लाद का शरीर अभी अपने नियत अन्त तक पहुँचा नहीं था। उनके भीतर जगत् की लालसा नहीं बची थी, पर भगवान् की इच्छा से उद्बुद्ध होने योग्य एक शुद्ध वासना और शेष प्रारब्ध था। उसी कारण शंखध्वनि जागरण का माध्यम बन सकी।

राम ने पूछा कि यदि भगवान् की कृपा से प्रह्लाद जागे और ज्ञान दृढ़ हुआ, तो साधक के अपने प्रयत्न का स्थान क्या है। वसिष्ठ ने उत्तर दिया कि आत्मा और नारायण का भेद अन्तिम सत्य में टिकता नहीं। प्रह्लाद ने जिस विष्णु की उपासना की, उसी चैतन्य ने उनके भीतर विचार का रूप लिया। विष्णु का वर द्वार खोलता है, पर उस द्वार से मन को विचार, अभ्यास और संयम के साथ स्वयं गुजरना होता है।

“यदि भगवान् बिना पात्रता और प्रयत्न के सबको ज्ञान दे देते,” वसिष्ठ ने कहा, “तो वे समस्त प्राणियों को उसी क्षण मुक्त कर देते। गुरु और ईश्वर मार्ग बताते हैं, चित्त को शुभ दिशा देते हैं और परिपक्व संस्कार को फलने का अवसर देते हैं। इन्द्रियों पर विजय, वैराग्य, निरन्तर अभ्यास और आत्मविचार साधक के पुरुषार्थ से दृढ़ होते हैं। बाहरी पूजा तब सार्थक फल देती है जब वह मन को अन्तर्मुख कर दे।”

उन्होंने मनोनिग्रह को इस पूरे प्रसंग का निर्णायक अनुशासन बताया। विशाल सम्पदा भी संयत मन की शान्ति के बराबर नहीं पहुँचती। विष्णु और महेश की दीर्घ आराधना श्रद्धा को निर्मल कर सकती है, पर अभ्यास और विचार से अछूता मन अपने ही संकल्पों में भटकता रहता है। प्रह्लाद की कथा में भक्ति ने विचार को जन्म दिया, विचार ने आत्मज्ञान को स्पष्ट किया और आत्मज्ञान ने शासन के बीच भी भीतर का विश्राम सुरक्षित रखा।

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