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चुना हुआ कथा-पाठ
देवकी के सामने प्रकट हुए बालक को वसुदेव रात में लेकर निकलते हैं। विष्णुपुराण के इस प्रसंग में जन्म का आनन्द और उसे बचाने की चिंता साथ चलते हैं।

पहचान और भय
पराशर, मैत्रेय को कृष्ण के जन्म का प्रसंग सुनाते हैं। देवकी के गर्भ से भगवान् का आविर्भाव होता है और कथा उस क्षण को पूरे संसार के लिए मंगलमय कहती है। दिशाएँ निर्मल हैं, प्रचंड हवा शांत है और आकाश से फूल बरसते हैं। उस दिव्य उत्सव के बीच माता-पिता के सामने एक दूसरी सच्चाई भी बनी हुई है: कंस का भय।
वसुदेव नवजात को चार भुजाओं और वक्ष पर श्रीवत्स-चिह्न के साथ देखते हैं। वे स्तुति करते हैं, फिर प्रार्थना रखते हैं कि यह दिव्य रूप समेट लिया जाए। देवकी भी यही चाहती हैं। वे उस बालक की असाधारण सत्ता पहचानती हैं, मगर कंस को उसके आने का पता लगना उन्हें भयभीत करता है। माँ के सामने भगवान् हैं और अपना बच्चा भी है; दृश्य इन दोनों पहचानों को एक साथ रखता है।
भगवान् देवकी की पहले की पुत्र-प्रार्थना पूरी होने की बात कहते हैं। उसके बाद वसुदेव बालक को उठाते हैं और रात में बाहर निकलते हैं। इस अध्याय में पिता का अगला काम लंबे उपदेश का नहीं, बच्चे को सुरक्षित जगह पहुँचाने का है।
यमुना की वह रात
योगनिद्रा के प्रभाव से पहरेदार और मथुरा के द्वारपाल अचेत हैं। वसुदेव आगे बढ़ते हैं। बादल बरस रहे हैं; शेष अपने फण फैलाकर उनके पीछे चलते हुए वर्षा रोकते हैं। वसुदेव कृष्ण को लेकर यमुना पार करते हैं। पाठ नदी को गहरी और भँवरों से भरी कहता है, फिर बताता है कि उनके पार जाते समय उसका जल घुटनों तक रह गया।
दूसरे तट पर नन्द और दूसरे गोप कंस का कर देने आए हुए हैं। उसी समय यशोदा के यहाँ योगनिद्रा कन्या के रूप में जन्म लेती हैं। यशोदा और आसपास के लोग उसके प्रभाव से सोए हुए हैं। वसुदेव बालक को यशोदा की शय्या पर सुलाते हैं, कन्या को उठाते हैं और लौट आते हैं। जागने पर यशोदा अपने पास नीलकमल-से श्याम शिशु को देखकर आनंदित होती हैं।
वसुदेव कन्या को देवकी की शय्या पर रखकर पहले की तरह वहीं ठहर जाते हैं। उनके लिए बाहर की यात्रा समाप्त है। पर महल के भीतर अगला संकट उसी रोने की आवाज़ से खुलता है जिससे सामान्यतः जन्म का समाचार मिलता है। पहरेदार उठते हैं और कंस को खबर देते हैं।
कंस के हाथ से छूटती कन्या
कंस आता है और देवकी के रोकने पर भी बच्ची को उठा लेता है। उसे शिला पर पटकने का प्रयास करता है, मगर कन्या उसके हाथ से छूटते ही आकाश में उठ जाती है। वहाँ उसका आठ भुजाओं वाला रूप प्रकट होता है। वह कंस को बताती है कि उसे मारने वाला जन्म ले चुका है। फिर देवगण की स्तुति के बीच चली जाती है।
अध्याय इस खुलासे पर समाप्त होता है। कंस के पास अब वह बालक नहीं है जिसकी उसे तलाश थी। कृष्ण यशोदा के पास हैं। कथा अगले अध्याय में कंस की प्रतिक्रिया सुनाएगी; यहाँ रात की यात्रा अपना काम पूरा कर चुकी है।
पढ़ते हुए
इस चयन में ज़रा माता-पिता की भाषा पर ध्यान दीजिए। दिव्य रूप पहचान लेने से उनका भय अपने आप नहीं मिटता। स्तुति के तुरंत बाद रक्षा की चिंता आती है और फिर आवश्यक काम। यह हमारा पाठकीय संकेत है: कथा की महिमा को देखते हुए उस छोटे, ठोस काम को भी देखिए जिसे वसुदेव उस रात अपने हाथों में उठाते हैं।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का सम्पूर्ण विष्णुपुराण, संस्कृत तथा मुनिलाल गुप्त का हिन्दी अनुवाद।
इस कथा का पाठ: विष्णुपुराण 5.3.1 से 29
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए प्रसंग का स्वतंत्र कथा-गद्य और अलग चिह्नित पाठकीय मनन; श्लोकानुसार अनुवाद नहीं।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पाँचवें अंश के तीसरे अध्याय का चयन है। भागवत और अन्य कृष्णकथाओं के अतिरिक्त दृश्य इसमें नहीं मिलाए गए हैं। नदी का घुटनों तक होना इसी पाठ का कथन है।
तुलना के पाठ: गीता प्रेस का संस्कृत-हिन्दी संस्करण (विष्णुपुराण 5.3.1 से 29); मैककोमस टेलर, एएनयू प्रेस, 2021 (विष्णुपुराण 5.3.1 से 29)।