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मृत्यु कहाँ से आई: राजा अनुकम्पक और मृत्यु-देवी की कथा

अब युधिष्ठिर रणभूमि की ओर देखते हुए कहते हैं, “ये पृथ्वीपति, जो अपने-अपने सैन्य के बीच धरती पर पड़े हैं, ये महाबली राजा अब निष्प्राण हैं। हर एक में दस सहस्र हाथियों का बल था, फिर भी ये मारे गए। इन सबके लिए कहा जा रहा है कि ये ‘मर’ गए। मेरे मन में सन्देह उठा है, प्राण कहाँ से आते हैं और मृत्यु कहाँ से? कौन मरता है, और मृत्यु प्राणियों को क्यों ले जाती है? हे पितामह, यह बताइए।”
भीष्म जी कहते हैं, “प्राचीन कृतयुग में अनुकम्पक नाम का एक राजा था। युद्ध में उसके रथ, हाथी, घोड़े और सैनिक घट गए, और वह शत्रुओं के वश में आ गया। उसका पुत्र हरि, जो नारायण-सा बलवान था, उस युद्ध में अपने सब अनुचरों सहित मारा गया। पुत्र-शोक से व्याकुल और स्वयं बन्दी राजा शान्ति के जीवन में लग गया। एक दिन भटकते हुए उसे पृथ्वी पर देवर्षि नारद मिले। राजा ने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। तब नारद ने उसके शोक को दूर करने के लिए यह कथा सुनाई।
“नारद बोले, हे राजन्, सृष्टि के आरम्भ में पितामह ब्रह्मा ने बहुत-से प्राणी रचे। वे इतने बढ़े कि किसी की मृत्यु ही न होती थी। विश्व का कोई भाग प्राणियों से रहित न रहा; तीनों लोक मानो साँस लेने को भी जगह न पाते हुए फूलने लगे। तब ब्रह्मा के मन में चिन्ता उठी कि इस बढ़ती जनसंख्या का संहार कैसे हो। बहुत सोचने पर भी जब उपाय न सूझा, तब स्वयम्भू को क्रोध आ गया, और उस क्रोध से उनकी देह से अग्नि निकली। उस अग्नि ने स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और समूचे चराचर जगत् को जलाना आरम्भ किया।
“तब करुणामय स्थाणु (शिव), जो वेदों और शास्त्रों के स्वामी हैं, ब्रह्मा को प्रसन्न करने आए। ब्रह्मा ने उनसे कहा, ‘आप वर के योग्य हैं। आपकी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ?’ स्थाणु बोले, ‘हे पितामह, मेरी प्रार्थना आपके रचे प्राणियों के लिए है। इन पर क्रोध न कीजिए। आपके तेज से उपजी अग्नि सब प्राणियों को जला रही है; इन्हें इस दशा में देखकर मैं करुणा से भर गया हूँ। ये प्राणी एक बार नष्ट हो गए तो लौटेंगे नहीं। अपनी इस ऊर्जा को अपनी ही ऊर्जा से शान्त कीजिए। कोई ऐसा उपाय निकालिए कि ये प्राणी न जलें, पर बार-बार मरकर लौटते रहें।’
“ब्रह्मा बोले, ‘मैं क्रोधी नहीं, न मेरी इच्छा है कि सब प्राणी मिट जाएँ। यह तो केवल पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए है। भार से पीड़ित पृथ्वी-देवी मानो जल में डूबती हुई-सी मुझसे संहार की प्रार्थना कर रही थीं। बहुत सोचकर भी उपाय न मिला, तब क्रोध ने मुझे घेर लिया।’ तब ब्रह्मा ने स्थाणु की प्रार्थना से उस अग्नि को अपने हृदय में दबा लिया, और सब प्राणियों के लिए जन्म और मृत्यु दोनों की व्यवस्था की।”
समझने की कुंजी (वंश/नाम): स्वयम्भू = स्वयं उत्पन्न ब्रह्मा। स्थाणु = शिव का एक नाम (अचल, स्तम्भ-सा स्थिर)। यह आख्यान युधिष्ठिर के शोक का उत्तर है, मृत्यु कोई आकस्मिक अन्याय नहीं; वह सृष्टि-व्यवस्था का अनिवार्य अंग है, जिसे स्वयं ब्रह्मा ने पृथ्वी का भार सँभालने के लिए रचा।
मृत्यु-देवी का इनकार और ब्रह्मा का समाधान
नारद आगे कहते हैं, “अग्नि दबा लेने के बाद ब्रह्मा के शरीर के सब छिद्रों से एक देवी प्रकट हुई, काले और लाल वस्त्र पहने, काली आँखों और काली हथेलियों वाली, सुन्दर कुण्डल और दिव्य आभूषणों से सजी। वह ब्रह्मा की दाहिनी ओर खड़ी हो गई। तब ब्रह्मा ने उसे नमस्कार करके कहा, ‘हे मृत्यु, इन प्राणियों का संहार कीजिए। क्रोध और संहार की इच्छा से मैंने आपको बुलाया है। मूर्ख हो या विद्वान, किसी का पक्ष किए बिना सब प्राणियों का नाश कीजिए; इससे आपको परम समृद्धि मिलेगी।’
“यह सुनकर कमलों की माला पहने वह देवी शोक से सोचने लगी और आँसू बहाने लगी। पर उसने आँसू गिरने न दिए, उन्हें अपनी अंजुलि में थाम लिया। फिर हाथ जोड़कर, लता-सी झुककर वह बोली, ‘हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आप ही से उत्पन्न मुझ-सी स्त्री यह भयानक कार्य कैसे करे, जो सब प्राणियों को भय से भर दे? मैं पाप करने से डरती हूँ। मुझे ऐसा काम दीजिए जो धर्म-सम्मत हो। मैं प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं, पिताओं को नहीं काट सकूँगी। इनके स्वजन मुझे शाप देंगे; शोक-संतप्त लोगों के आँसू मुझे सदा जलाएँगे। हे वरदायी देव, मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे कठोर तप करने की अनुमति दीजिए।’
“ब्रह्मा बोले, ‘हे मृत्यु, आपको मैंने प्राणियों के संहार के लिए ही रचा है। जाइए, सबको मारने में लग जाइए। उचित-अनुचित का विचार मत कीजिए; यह होना ही है।’ पर देवी मौन खड़ी रही, मानो स्वयं प्राण-हीन हो। ब्रह्मा ने बार-बार कहा, पर वह कुछ न बोली। तब ब्रह्मा मुस्कुराकर शान्त हो गए, और देवी उनके पास से दूर चली गई।
“वह धेनुक नामक पवित्र स्थान गई और एक पैर पर खड़े होकर पन्द्रह अरब वर्ष तक घोर तप किया। ब्रह्मा ने फिर आज्ञा दी, पर उसने और बीस अरब वर्ष एक पैर पर तप किया। फिर हिरनों के साथ वन में, फिर केवल वायु पर निर्वाह करते हुए, फिर जल में मौन-व्रत से, फिर कौशिकी नदी, फिर गंगा, फिर मेरु पर्वत, फिर हिमालय के शिखर पर, जहाँ देवताओं ने महायज्ञ किया था, वहाँ पैरों के अँगूठों पर खड़ी होकर सौ अरब वर्ष तप किया।
“बार-बार ब्रह्मा आए, और हर बार वह यही कहती रही, ‘मैं प्राणियों को नहीं काट सकती, मुझे क्षमा कीजिए।’ अन्ततः ब्रह्मा ने उसे आश्वस्त किया, ‘हे मृत्यु, इसमें कोई पाप नहीं लगेगा। आपकी आँखों से गिरे ये आँसू, जो आपने अंजुलि में थाम रखे हैं, भयानक रोगों का रूप लेंगे, और वे ही समय आने पर प्राणियों को मारेंगे। आप काम और क्रोध को प्राणियों की ओर भेजिएगा; इससे आपको अपार पुण्य मिलेगा, पाप नहीं, क्योंकि आप सबके प्रति समान रहेंगी। प्राणी रोग से पीड़ित होकर मरेंगे और दोष आप पर नहीं, अपनी ही दशा पर डालेंगे।’
“तब शाप के भय से मृत्यु ने ‘जैसी आज्ञा’ कहा। उसी समय से वह काम और क्रोध को प्राणियों की अन्तिम घड़ी में भेजने लगी, और उसी के द्वारा प्राणों को रोकने लगी। उसके गिराए आँसू ही वे रोग हैं जिनसे मनुष्यों की देह पीड़ित होती है।
“इसलिए, हे राजन्, प्राणियों के नाश पर शोक नहीं करना चाहिए। जैसे गहरी निद्रा में इन्द्रियाँ लुप्त होती और जागने पर लौट आती हैं, वैसे ही मनुष्य देह छोड़कर परलोक जाते और फिर लौटते हैं। देवता भी पुण्य क्षीण होने पर पृथ्वी पर मरणधर्मा होकर जन्म लेते हैं, और पुण्य पाकर मनुष्य देवत्व पाते हैं। इसलिए, हे राजन्, अपने पुत्र के लिए शोक मत कीजिए; वह स्वर्ग पाकर वहाँ महान सुख भोग रहा है।”
एक उप-कथा (वायु ही जीवन): इसी प्रसंग में नारद कहते हैं कि भयंकर ऊर्जा और गर्जना वाला वायु-तत्त्व ही सब प्राणियों में ‘जीवन’ के रूप में काम करता है। जब देह नष्ट होती है, तो यही वायु पुरानी देह से निकलकर नई देह में नए काम सँभालता है। इसीलिए वायु को इन्द्रियों का स्वामी और स्थूल देह के अन्य भूतों से श्रेष्ठ कहा गया है।
सार: ब्रह्मा ने पृथ्वी का भार हटाने को मृत्यु-देवी रची, पर उसने करुणावश संहार से इनकार किया और युगों तप किया। अन्त में ब्रह्मा ने व्यवस्था दी, उसके आँसू रोग बनें, और वह काम-क्रोध के साथ निष्पक्ष होकर प्राणियों को ले जाए, ताकि पाप न लगे। मृत्यु पर शोक व्यर्थ है, यह जन्म-मृत्यु का सहज चक्र है।
धर्म क्या है: संकट-काल का आचरण और सत्य का स्थान
युधिष्ठिर पूछते हैं, “हे पितामह, यह धर्म जिसे कहते हैं, क्या है और कहाँ से आता है? क्या वह इस लोक के लिए है, परलोक के लिए, या दोनों के लिए?”
भीष्म जी कहते हैं, “सत्पुरुषों का आचरण, स्मृतियाँ और वेद, ये तीन धर्म के स्रोत हैं; और विद्वानों ने चौथा स्रोत यह भी बताया है, वह प्रयोजन जिसके लिए कोई कर्म किया जाए। धर्म दोनों लोकों में सुख देता है। संकट के समय में मनुष्य असत्य बोलकर भी सत्य बोलने का पुण्य पा सकता है, जैसे अधर्म-सा दिखने वाला कर्म करके भी धर्म का पुण्य पाया जा सकता है। आचरण ही धर्म का आश्रय है; आचरण के सहारे ही जानो कि धर्म क्या है।
“सत्य बोलना श्रेष्ठ है; सत्य से ऊँचा कुछ नहीं। सब कुछ सत्य पर टिका है। पापी और क्रूर लोग भी आपस में सत्य की शपथ लेकर ही अपने काम चलाते हैं; यदि वे एक-दूसरे से झूठ बोलें तो तुरन्त नष्ट हो जाएँ। दूसरे का धन न लेना सनातन कर्तव्य है। बलवान इसे दुर्बलों का बनाया नियम मानते हैं, पर जब उनका भाग्य पलटता है, तब वही नियम उन्हें भी भाता है।
“चोर हर किसी से डरता है, मानो जंगल से गाँव में भगाया गया हिरन। वह औरों को भी अपने जैसा पापी समझता है। पर जो शुद्ध-हृदय है, वह सदा प्रसन्न रहता है और किसी ओर से नहीं डरता। जो पीड़ा अपने को अप्रिय लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करे। जो दूसरे की पत्नी का प्रेमी बन जाता है, वह दूसरे ऐसे ही अपराधी से क्या कहे? पर वही, जब अपनी स्त्री को किसी और प्रेमी के साथ देखता है, क्षमा नहीं कर पाता। जो अपने लिए जो चाहता है, वही दूसरे के लिए भी चाहे। अपने अधिक धन से वह दरिद्रों के अभाव दूर करे।
“प्राचीन काल में सृष्टिकर्ता ने धर्म को इस सामर्थ्य से युक्त किया कि वह संसार को जोड़े रखे। धर्म के लक्षण मैंने आपको बताए। इसलिए किसी भी अधर्म-कर्म में अपनी बुद्धि कभी न लगाइए।”
समझने की कुंजी (राजनीति/नीति): आपद्-धर्म = विपत्ति-काल का धर्म। सामान्य काल में जो वर्जित है (जैसे असत्य), वह असाधारण संकट में, सही प्रयोजन से, क्षम्य हो सकता है। महाभारत यहाँ नैतिकता का सपाट नियम नहीं देता; वह मानता है कि धर्म छुरे की धार-सा सूक्ष्म है, और प्रयोजन तथा परिस्थिति उसका रूप तय करते हैं। यही जटिलता आगे युधिष्ठिर के अगले प्रश्न को जन्म देती है।
सार: धर्म के स्रोत हैं सत्पुरुषों का आचरण, स्मृति, वेद, और प्रयोजन। सत्य सबका आधार है। संकट-काल में सही प्रयोजन से किया असत्य भी धर्म का फल दे सकता है। जो स्वयं को अप्रिय लगे, वह दूसरों से न कीजिए।
युधिष्ठिर का गहरा सन्देह: धर्म छुरे की धार-सा सूक्ष्म
युधिष्ठिर कहते हैं, “आप कहते हैं कि धर्म सूक्ष्म विचारों पर टिका है, सत्पुरुषों के आचरण से जाना जाता है, अनेक संयमों से भरा है, और इसके लक्षण वेदों में हैं। पर मुझे भीतर एक प्रकाश-सा अनुभव होता है, जिससे मैं अनुमान से सही-गलत में भेद कर पाता हूँ।
“सब देही प्राणी अपने स्वभाव से ही जन्मते, रहते और देह छोड़ते जान पड़ते हैं। तब धर्म और अधर्म केवल शास्त्र-पाठ से कैसे निश्चित हों? सम्पन्न व्यक्ति का धर्म एक प्रकार का है, और विपत्ति में पड़े व्यक्ति का दूसरा। संकट-काल का धर्म केवल शास्त्र पढ़कर कैसे जाना जाए? आप कहते हैं सत्पुरुषों के कर्म धर्म हैं, पर सत्पुरुष भी तो उनके कर्मों से ही पहचाने जाते हैं; तो यह तो वही प्रश्न लौटकर आ गया।
“देखा जाता है कि कोई साधारण व्यक्ति धर्म करते-करते अधर्म कर बैठता है, और कोई असाधारण व्यक्ति अधर्म-से दिखने वाले कर्मों से धर्म साध लेता है। फिर हर युग में वेदों के विधान क्रमशः लुप्त होते जाते हैं, कृत के धर्म और हैं, त्रेता के और, द्वापर के और, कलि के बिल्कुल भिन्न। इससे लगता है कि धर्म हर युग की मनुष्य-शक्ति के अनुसार ही रखे गए हैं।
“श्रुति से स्मृति निकली; यदि वेद हर बात के प्रमाण हैं तो स्मृति भी प्रमाण होगी। पर जब श्रुति और स्मृति एक-दूसरे का खण्डन करें, तब कौन प्रमाण माने? धर्म छुरे की धार से भी सूक्ष्म है और पर्वत से भी स्थूल। यज्ञ-आदि धर्म पहले तो दूर आकाश में धुएँ के रमणीय भवन-से दिखते हैं, पर विद्वान जब उन्हें परखता है, तो वे लुप्त हो जाते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि प्राचीन विद्वानों ने जिसे धर्म कहा, वही आज भी धर्म है, और उसी आचरण से संसार की मर्यादाएँ सनातन बनी हैं।”
सार: युधिष्ठिर तर्क रखते हैं कि धर्म की कसौटी ‘सत्पुरुषों का आचरण’ तो स्वयं चक्र-दोष (वही प्रश्न लौटाने) में फँसती है; वेद युग-दर-युग लुप्त होते हैं, श्रुति-स्मृति में विरोध है, और धर्म छुरे की धार-सा सूक्ष्म है। अन्ततः प्राचीन विद्वानों का निर्धारण ही टिकता है।
तुलाधार और जाजलि: तराजू थामे वैश्य की धर्म-शिक्षा

भीष्म जी इस प्रसंग पर तुलाधार और जाजलि का पुराना आख्यान सुनाते हैं। “जाजलि नाम का एक ब्राह्मण समुद्र-तट पर घोर तप करता था, चिथड़े और मृग-चर्म पहने, शरीर मैल-कीचड़ से लिपटा, अनेक व्रत और उपवास साधते हुए, वाणी रोककर वर्षों तक। एक दिन जल के भीतर बैठा वह सोचने लगा, ‘इस चराचर जगत् में मेरे समान कोई नहीं। कौन मेरे साथ तारों-ग्रहों में विचर सकता है और फिर जल में रह सकता है?’ तभी अदृश्य पिशाचों ने उससे कहा, ‘ऐसा मत कहिए। वाराणसी में तुलाधार नाम का एक प्रसिद्ध व्यापारी है, क्रय-विक्रय का काम करता है। वह भी ऐसे वचन कहने योग्य नहीं समझता, जैसे आप कह रहे हैं।’
“यह सुनकर जाजलि बोला, ‘मैं उस तुलाधार को देखूँगा।’ तब वे प्राणी उसे समुद्र से उठाकर मार्ग बता गए। उदास मन से चलकर जाजलि वाराणसी पहुँचा और तुलाधार से मिला। ब्राह्मण को आया देख दुकानदार तुलाधार उठकर खड़ा हुआ और उचित अभिवादन से अतिथि का सत्कार किया।
“तुलाधार बोला, ‘हे ब्राह्मण, मुझे ज्ञात है कि आप क्यों आए हैं। समुद्र-तट पर आपने घोर तप किया, पर आपको यह बोध न था कि आपने कोई पुण्य पाया। जब आपको तप-सिद्धि मिली, तब आपके सिर पर कुछ पक्षी जन्मे। आपने उन छोटे जीवों की बड़ी देखभाल की। जब वे पंख पाकर भोजन की खोज में इधर-उधर जाने लगे, तब इन चटक-पक्षियों के जन्म में सहायक बनने के कारण आपके भीतर अभिमान उठा कि आपने महान पुण्य पाया।’
भीष्म जी बीच में जाजलि की पूर्व-कथा कहते हैं, “जाजलि वर्षा में खुले आकाश तले, शरद में जल में, ग्रीष्म में धूप-वायु में रहता था, फिर भी स्वयं को पुण्यवान नहीं मानता था। एक बार वह वन में लकड़ी के खूँटे-सा निश्चल खड़ा रहा। उसकी जटाओं में एक जोड़ी कुलिंग (चटक) पक्षियों ने घोंसला बना लिया। करुणावश ऋषि ने उन्हें रहने दिया, हिला तक नहीं। पक्षियों ने अण्डे दिए, बच्चे निकले, बड़े हुए, पंख निकले; जाजलि तब भी अचल रहा। बच्चे उड़ने लगे, साँझ को लौट आते; फिर पाँच-पाँच दिन बाहर रहकर छठे दिन आते; अन्त में महीनों न लौटे। तब जाजलि वह स्थान छोड़कर सोचने लगा कि उसने तप-सिद्धि पा ली, और अभिमान उसके मन में घर कर गया। उसने बाँह ठोककर आकाश में पुकारा, ‘मैंने महान पुण्य पाया।’ तभी आकाशवाणी हुई, ‘जाजलि, आप धर्म में तुलाधार के समान नहीं हैं।’ यही सुनकर जाजलि क्रुद्ध होकर वाराणसी आया था।”
जाजलि तुलाधार से पूछता है, “आप तो रस, गन्ध, वृक्षों की छाल-पत्ते, फल-मूल बेचते हैं। आपको यह स्थिर बुद्धि और ज्ञान कहाँ से मिला?” तुलाधार उत्तर देता है, “हे जाजलि, मैं उस सनातन धर्म को उसके सब रहस्यों सहित जानता हूँ, जो सर्व-मित्रता और सब प्राणियों के हित में है। सब प्राणियों के प्रति पूर्ण अहिंसा, या अनिवार्य होने पर न्यूनतम हिंसा, पर टिका जीवन ही परम धर्म है। मैं इसी रीति से जीता हूँ।
“यह मेरा घर दूसरों के हाथों काटे काठ-तृण से बना है। लाख का रंग, कमल की जड़ें, सुगन्धित द्रव्य और अनेक तरल पदार्थ, मदिरा को छोड़कर, मैं औरों से खरीदकर बिना छल बेचता हूँ। मैं किसी से याचना नहीं करता, किसी से झगड़ता नहीं, किसी से द्वेष या इच्छा नहीं रखता। मैं सब प्राणियों पर समान दृष्टि डालता हूँ; मेरा तराजू सब प्राणियों के प्रति बराबर है। मैं किसी के कर्म की न प्रशंसा करता हूँ, न निन्दा; जगत् की यह विविधता मुझे आकाश की विविधता-सी जान पड़ती है।
“मैं मिट्टी के ढेले, पत्थर के टुकड़े और सोने की डली में कोई भेद नहीं देखता। जब मनुष्य किसी प्राणी से नहीं डरता और स्वयं किसी को भयभीत नहीं करता, जब वह न किसी की इच्छा रखता है, न द्वेष, तब वह ब्रह्म को पाता है।”
समझने की कुंजी (नाम/अवधारणा): तुलाधार शब्द का अर्थ ही है ‘तराजू थामने वाला’। यह आख्यान महाभारत की एक गहरी पलट है, घोर तप करने वाले ब्राह्मण जाजलि से ऊँचा धर्म एक वैश्य व्यापारी ने केवल छल-रहित व्यापार और सब प्राणियों के प्रति अहिंसा से पा लिया। धर्म जन्म या आडम्बर का नहीं, आचरण और भीतरी समता का विषय है।
एक उप-कथा (नहुष और गो-वध): तुलाधार पशु-हिंसा की निन्दा करते हुए राजा नहुष का दृष्टान्त देता है। ऋषियों ने नहुष से कहा कि उसने गाय (जो माता-सी है) और बैल (जो साक्षात् सृष्टिकर्ता-सा है) का वध किया, यह घोर पाप है। नहुष को शुद्ध करने के लिए ऋषियों ने उस पाप को एक सौ एक भागों में बाँटकर, रोगों के रूप में सब प्राणियों में बाँट दिया, क्योंकि उन्होंने तप-बल से जान लिया कि नहुष ने जान-बूझकर वह पाप नहीं किया था।
यज्ञ का सच्चा अर्थ: जाजलि का प्रत्युत्तर और तुलाधार का समाधान
जाजलि आपत्ति करता है, “आपका यह धर्म तो सबके लिए स्वर्ग का द्वार बन्द कर देता है और जीविका के साधन ही रोक देता है। खेती से अन्न होता है, अन्न से आपका भी निर्वाह; पशु, फसल और औषधियों से ही मनुष्य जीते हैं। पशु और अन्न से यज्ञ चलते हैं। आपकी बातों से नास्तिकता की गन्ध आती है। यदि जीवन के साधन ही छोड़ दिए जाएँ तो संसार समाप्त हो जाएगा।”
तुलाधार बोलता है, “हे ब्राह्मण, मैं नास्तिक नहीं, न यज्ञ की निन्दा करता हूँ। पर वह विरला है जो यज्ञ को सचमुच जानता है। मैं उस यज्ञ को नमस्कार करता हूँ जो ब्राह्मणों के लिए नियत है, और उन्हें भी जो उसे जानते हैं। खेद है कि ब्राह्मण अपना नियत यज्ञ (जप-तप) छोड़कर क्षत्रियों वाले (पशु-वध वाले) यज्ञ करने लगे हैं। कई लोभी, श्रुति का सच्चा अर्थ समझे बिना, झूठ को सत्य का रूप देकर तरह-तरह के यज्ञ गढ़ लेते हैं, और इससे चोरी और अनेक बुरे कर्म पनपते हैं।
“जान लीजिए कि केवल वही यज्ञ-सामग्री देवताओं को तृप्त करती है जो धर्म से अर्जित हो। देवताओं की पूजा व्रतों से, अग्नि में आहुति से, वेद-पाठ से, और औषधि-वनस्पति से हो सकती है। यज्ञ से सन्तान वैसी ही जन्मती है, अधर्मी से अधर्मी, लोभी से लोभी, सन्तुष्ट से सन्तुष्ट। जो यज्ञ फल की इच्छा से नहीं किए जाते, वे शुद्ध जल-से निर्मल फल देते हैं। आहुति सूर्य तक उठती है, सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न, अन्न से प्राणी, ऐसा चक्र चलता है। पुराने समय में लोग फल की इच्छा से यज्ञ नहीं करते थे; पृथ्वी बिना जोते अन्न देती थी और ऋषियों का आशीर्वाद ही वनस्पति उगाता था।
“जो लोभ-रहित, संग्रह-रहित और ईर्ष्या-रहित होकर परम लक्ष्य (मोक्ष) चाहते हैं, वे सत्य और आत्म-संयम को ही अपना यज्ञ बनाते हैं। जो देह और आत्मा का भेद जानते हैं, योग में लगे हैं, और प्रणव (ॐ) का ध्यान करते हैं, वे औरों को भी तृप्त करते हैं। ऐसे सच्चे पुरुष वृक्ष, औषधि, फल-मूल को ही यज्ञ की आहुति मानते हैं, और किसी प्राणी की हिंसा किए बिना यज्ञ करते हैं।
“दोनों प्रकार के यज्ञकर्ता देव-मार्ग पर चलते हैं, पर फल में भेद है, जो फल की इच्छा से यज्ञ करते हैं उन्हें लौटना पड़ता है, और जो सचमुच ज्ञानी हैं उन्हें लौटना नहीं पड़ता। जो शुद्ध-आत्मा है वही गाय की बलि दे सकता है (अर्थात् ऐसा पात्र विरल है); इसलिए जो वैसे नहीं हैं, वे वृक्ष-वनस्पति से ही यज्ञ करें।”
जाजलि कहता है, “हे वणिक्-पुत्र, ये मानस-यज्ञ करने वाले तपस्वियों के गूढ़ सिद्धान्त हमने पहले नहीं सुने थे। ये अत्यन्त दुर्बोध हैं। यदि आप कहते हैं कि केवल पशु-मन वाले ही आत्मा की भूमि में यज्ञ नहीं कर पाते, तो वे किन कर्मों से सुख पाएँ? बताइए, आपके वचनों में मेरी बड़ी श्रद्धा है।”
तुलाधार उत्तर देता है, “श्रद्धा-हीन के यज्ञ यज्ञ नहीं बनते; ऐसे लोग किसी यज्ञ के योग्य नहीं। श्रद्धालु के लिए तो गाय ही (दूध, दही, घी, बाल, सींग, खुर के द्वारा बिना उसे मारे) सब यज्ञों को सँभालने के लिए पर्याप्त है। पशु-वध छोड़कर, केवल घी आदि अर्पित करके, साधक श्रद्धा को ही अपनी पत्नी बनाकर यज्ञ कर सकता है। पशुओं के बदले पिण्ड (चावल का गोला) ही योग्य आहुति है। सब नदियाँ सरस्वती-सी पवित्र हैं, सब पर्वत पवित्र हैं; और हे जाजलि, आत्मा ही तीर्थ है। तीर्थों के लिए पृथ्वी पर मत भटको।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): प्रणव = ॐ, सब देवताओं की आत्मा-स्वरूप मूल ध्वनि। मानस-यज्ञ = बाहरी पशु-वध के बजाय भीतर सत्य, संयम और ज्ञान की आहुति देना; आत्मा को ही वेदी और तीर्थ मानना। तुलाधार यज्ञ को नकारता नहीं, उसका भीतरी, अहिंसक अर्थ खोलता है।
सार: तुलाधार नास्तिक नहीं; वह कहता है कि लोभ से गढ़े पशु-यज्ञ पाप फैलाते हैं। सच्चा यज्ञ धर्म से अर्जित, फल-कामना-रहित और अहिंसक है, सत्य-संयम-ज्ञान की आहुति। आत्मा ही तीर्थ है।
श्रद्धा की महिमा और पक्षियों की गवाही

तुलाधार जाजलि से कहता है, “अपनी आँखों से देखिए कि इस धर्म-मार्ग को किसने अपनाया है, सत्पुरुषों ने या औरों ने। देखिए, आकाश में अनेक पक्षी मँडरा रहे हैं, उनमें वे भी हैं जो आपके सिर पर पले थे। वे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। उन्हें पुकारिए। निःसन्देह आप उनके पिता हैं, हे जाजलि; अपने बच्चों को बुलाइए।”
भीष्म जी कहते हैं, “तब जाजलि के बुलाने पर वे पक्षी उसी अहिंसा-धर्म के अनुसार उत्तर देते हुए आए। बिना हिंसा के किए गए सब कर्म इस लोक और परलोक दोनों में हितकर होते हैं; पर हिंसा वाले कर्म श्रद्धा का नाश करते हैं, और श्रद्धा नष्ट होने से कर्ता का नाश। जो लाभ-हानि में सम हैं, श्रद्धालु, संयमी और शान्त-चित्त हैं, और केवल कर्तव्य-भाव से यज्ञ करते हैं, उन्हीं के यज्ञ फल देते हैं।
“ब्रह्म-विषयक श्रद्धा सूर्य की पुत्री है, हे ब्राह्मण; वह रक्षिका है, सद्-जन्म देने वाली है। श्रद्धा वेद-पाठ और ध्यान के पुण्य से भी श्रेष्ठ है। वाणी के दोष से दूषित कर्म को श्रद्धा बचा लेती है, मन के दोष से दूषित कर्म को भी श्रद्धा बचाती है; पर श्रद्धा-हीन कर्म को न वाणी बचा सकती है, न मन।
“प्राचीन ज्ञानी एक प्रसंग सुनाते हैं, ब्रह्मा से देवताओं ने पूछा कि शुद्ध पर श्रद्धा-हीन व्यक्ति की आहुति और अशुद्ध की आहुति में, तथा वेदज्ञ पर कंजूस व्यक्ति के अन्न और उदार सूदखोर के अन्न में, कौन ग्रहण-योग्य है। पहले उन्होंने इन्हें बराबर माना, पर ब्रह्मा ने कहा कि वे भूल रहे हैं, उदार का अन्न श्रद्धा से पवित्र हो जाता है, और श्रद्धा-हीन का अन्न श्रद्धा के अभाव से व्यर्थ हो जाता है। उदार सूदखोर का अन्न ग्राह्य है, पर कंजूस का नहीं। संसार में केवल वही व्यक्ति देवताओं को आहुति देने के अयोग्य है जो श्रद्धा-हीन है।
“श्रद्धा तीन प्रकार की है, सत्त्व, रजस् और तमस् से प्रभावित; और मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही कहलाता है। हे जाजलि, श्रद्धा का आश्रय लीजिए, तो आप श्रेष्ठ को पाएँगे।”
भीष्म जी कहते हैं, “थोड़े ही समय बाद तुलाधार और जाजलि, दोनों महाज्ञानी, अपने-अपने कर्मों से अर्जित स्थानों को पाकर स्वर्ग गए और वहाँ सुख से विचरने लगे। इस प्रकार तुलाधार ने अनेक गूढ़ सत्य दृष्टान्तों सहित कहे, और जाजलि शान्ति को प्राप्त हुआ।”
सार: जाजलि के पाले पक्षी अहिंसा-धर्म की जीवित गवाही बने। अहिंसक कर्म दोनों लोकों में हितकर हैं। श्रद्धा (सूर्य की पुत्री) वाणी-मन के दोष को ढाँपती है, पर श्रद्धा-हीनता को कुछ नहीं बचाता। अन्त में दोनों स्वर्ग गए।
राजा विचख्नु: गो-वध-यज्ञ पर करुणा

भीष्म जी एक और पुराना आख्यान सुनाते हैं। “राजा विचख्नु ने एक गो-वध-यज्ञ में बैल का क्षत-विक्षत शरीर देखा और गायों की अत्यन्त पीड़ादायक चीत्कार सुनी, तथा वहाँ जुटे क्रूर ब्राह्मणों को देखा। तब राजा ने कहा, ‘संसार की सब गायों का कल्याण हो।’ वध आरम्भ होते ही उसने इन असहाय पशुओं के लिए यह आशीर्वचन कहा।
“राजा ने आगे कहा, ‘केवल वे ही, जो मर्यादा के उल्लंघनकर्ता हैं, बुद्धि-हीन हैं, नास्तिक और सन्देही हैं, और यज्ञ-कर्मों से कीर्ति चाहते हैं, यज्ञों में पशु-वध की प्रशंसा करते हैं। धर्मात्मा मनु ने सब धार्मिक कर्मों में अहिंसा की प्रशंसा की है। मनुष्य केवल फल की इच्छा से ही यज्ञों में पशुओं का वध करते हैं। सब प्राणियों के प्रति अहिंसा ही परम धर्म है।
“‘मदिरा, मछली, मधु, मांस, सुरा और चावल-तिल के व्यंजन, इन्हें धूर्तों ने प्रचलित किया है; इनका यज्ञ में प्रयोग वेदों में नियत नहीं। इनकी चाह अभिमान, विवेक-भ्रम और लोभ से उपजती है। सच्चे ब्राह्मण हर यज्ञ में विष्णु की उपस्थिति देखते हैं, और उनकी पूजा सुस्वादु पायस (खीर) से करनी चाहिए। वेदों में बताए वृक्षों के पत्ते-फूल, और शुद्ध-हृदय, ज्ञान और पवित्रता में श्रेष्ठ पुरुष जिसे शुद्ध मानें, वही परमदेव को अर्पित करने योग्य है।’”
युधिष्ठिर पूछते हैं, “देह और नाना संकट-विपत्तियाँ तो निरन्तर एक-दूसरे से युद्ध करती रहती हैं। फिर जो हिंसा की इच्छा से पूर्णतः मुक्त है, और इसी कारण कोई कर्म ही नहीं कर सकता, वह अपनी देह कैसे टिकाए?”
भीष्म जी उत्तर देते हैं, “मनुष्य को, जब सम्भव हो, ऐसे पुण्य अर्जित करने और ऐसे कर्म करने चाहिए कि उसकी देह क्षीण न हो, पीड़ा न पाए, और मृत्यु न आए।”
सार: राजा विचख्नु ने गो-वध-यज्ञ की निन्दा करते हुए अहिंसा को परम धर्म कहा; पशु-वध केवल फल-कामना से होता है, वेद-सम्मत नहीं। युधिष्ठिर के व्यावहारिक प्रश्न पर भीष्म कहते हैं, देह की रक्षा भर के लिए सम्भव-सीमा में आचरण कीजिए।
चिरकारी: देर से सोचकर कर्म करने वाले पुत्र की कथा
युधिष्ठिर पूछते हैं, “हे पितामह, जब बड़ों की आज्ञा एक ओर खींचे और उसमें निहित क्रूरता दूसरी ओर रोके, तब कर्म के विषय में, उसे करना या छोड़ना, कैसे निर्णय करें, शीघ्रता से या विलम्ब से?”
भीष्म जी कहते हैं, “इस पर अंगिरा-वंश में जन्मे चिरकारी की पुरानी कथा है। दुगुना धन्य वह मनुष्य है जो कर्म से पहले देर तक सोचता है। गौतम के पुत्र चिरकारी हर बात पर बहुत देर तक विचार करके ही कोई काम करते थे, इसी से उनका नाम ‘चिरकारी’ (देर से करने वाला) पड़ा। उन्हें आलसी और मूर्ख तक कहा जाता था।
“एक दिन गौतम ने अपनी पत्नी का कोई बड़ा दोष देखकर, अपने अन्य पुत्रों को छोड़कर, क्रोध में इसी चिरकारी को आज्ञा दी, ‘इस स्त्री का वध कर दो।’ इतना बिना अधिक विचारे कहकर, योगी गौतम वन को चले गए। चिरकारी ने ‘जैसी आज्ञा’ तो कह दिया, पर अपने स्वभाव के अनुसार देर तक सोचने लगे, ‘पिता की आज्ञा कैसे मानूँ और माता का वध कैसे टालूँ? इन विरोधी कर्तव्यों के बीच फँसकर पाप में कैसे न डूबूँ? पिता की आज्ञा परम धर्म है, पर माता की रक्षा भी स्पष्ट कर्तव्य।
“‘पिता पालन और शिक्षा देने के कारण परम गुरु और परम धर्म है; पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है, पिता परम तप है; पिता के प्रसन्न होने पर सब देवता प्रसन्न होते हैं। अब माता पर विचार करूँ। पाँच भूतों के इस संयोग में, जो मेरा मनुष्य-जन्म है, माता ही प्रधान कारण है, जैसे अरणि (मन्थन-काठ) अग्नि का। माता सब विपत्तियों की औषधि है। माता-सी छाया नहीं, माता-सा आश्रय नहीं, माता-सा रक्षक नहीं, माता-सा प्रिय कोई नहीं। माता अपनी देह-सी है। कौन विवेकी अपनी माता का वध करेगा?
“‘फिर, स्त्री कोई दोष नहीं करती; दोष तो पुरुष करता है। व्यभिचार करके पुरुष ही पाप से लिप्त होता है। मेरी माता ने अपनी पवित्र देह उसे सौंपी जो पति के रूप और वेश में आया था (इन्द्र छल से गौतम का रूप धरकर आया था)। स्त्री निर्दोष है। और उस घटना में स्वयं इन्द्र का अपराध है। मेरी माता निश्चय ही निर्दोष है। जिसका वध करने को मुझे कहा गया, वह स्त्री है, और वह स्त्री मेरी माता है, अतः और भी अधिक पूज्य।’
“इसी प्रकार देर तक विचार करते हुए चिरकारी ने बहुत समय बिता दिया और वध न किया। बहुत दिन बीते तो गौतम लौट आए। तब तक उनके विचार ने भी पलटा खाया था; पश्चात्ताप और शास्त्र-जनित शान्ति से वे रो पड़े और बोले, ‘त्रिलोक-स्वामी पुरन्दर (इन्द्र) ब्राह्मण के वेश में अतिथि बनकर मेरे आश्रम आए थे। मैंने उनका विधिवत् सत्कार किया, फिर भी उन्होंने दुर्व्यवहार किया। इसमें न मेरी पत्नी अहल्या का दोष, न मेरा, न उस इन्द्र का जिसने आकाश से जाते हुए मेरी पत्नी को देखकर अपने होश खो दिए। दोष तो मेरी योग-शक्ति की असावधानी का है।
“‘हाय, मैंने एक स्त्री का, और वह भी अपनी पत्नी का, वध करा दिया। मुझे इस पाप से कौन उबारे? यदि आज मेरा पुत्र अपने नाम के अनुरूप सिद्ध हो, यदि उसने देर लगाकर वह काम न किया हो, तो वही मुझे इस पाप से बचा ले। धन्य हो, चिरकारी! आज आप सचमुच अपने नाम के योग्य सिद्ध हुए।’ ऐसा पश्चात्ताप करते हुए गौतम ने अपने पुत्र को पास बैठे देखा।
“पिता को लौटा देख, शोक से अभिभूत चिरकारी ने शस्त्र फेंक दिया और सिर झुकाकर पिता को शान्त करने लगे। पुत्र को चरणों में झुका और पत्नी को लज्जा से मानो पथराई हुई देख, ऋषि महान हर्ष से भर गए। उस दिन से वे अपनी पत्नी और सावधान पुत्र से अलग नहीं रहे। उन्होंने पुत्र की देर तक प्रशंसा की, बहुत देर तक उसका सिर सूँघा, बहुत देर तक उसे गले लगाया, और आशीर्वाद दिया, ‘चिरंजीवी हों! सदा देर तक सोचकर ही कर्म कीजिए। अपनी इसी देरी से आपने आज मुझे सदा के लिए सुखी कर दिया।’
“फिर गौतम ने उन पुरुषों की प्रशंसा में श्लोक कहे जो देर तक सोचकर कर्म करते हैं, ‘यदि मित्र को त्यागना हो या आरम्भ किया काम छोड़ना हो, तो देर से करना चाहिए। देर तक परखकर बनी मित्रता देर तक टिकती है। क्रोध, अभिमान, झगड़े, पाप-कर्म और अप्रिय कार्यों में जो देर लगाता है, वही प्रशंसा-योग्य है। जब किसी सम्बन्धी, मित्र, सेवक या पत्नी का अपराध स्पष्ट सिद्ध न हो, तब दण्ड देने में जो देर करता है, वह सराहा जाता है।’
“इस प्रकार, हे भारत, गौतम अपने पुत्र की उस देरी से प्रसन्न हुए। हर कर्म में मनुष्य को इसी तरह देर तक विचार करके ही निश्चय करना चाहिए। जो क्रोध को देर तक मन में नहीं पालता, और कर्म से पहले देर तक सोचता है, वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिससे पीछे पछताना पड़े।”
एक उप-कथा (इन्द्र, अहल्या और शाप का बँटवारा): इस कथा की पृष्ठभूमि में इन्द्र का अहल्या-प्रसंग है। चिरकारी के चिन्तन में संकेत है कि एक तीसरा भाग ब्रह्म-हत्या का पाप, जिसका इन्द्र स्वयं दोषी था, पहले स्त्री-जाति पर डाला गया था; इसी से स्त्री की ‘स्वाभाविक दुर्बलता’ और याचना के प्रति झुकाव की बात उठती है। महाभारत यहाँ नैतिक उत्तरदायित्व का जटिल ताना-बाना बुनता है, चिरकारी स्त्री को निर्दोष ठहराता है और दोष पुरुष पर तथा स्वयं गौतम अपनी असावधानी पर डालते हैं; न्याय का प्रश्न सपाट नहीं छोड़ा जाता।
समझने की कुंजी (नाम): चिरकारी = ‘देर से करने वाला’; गौतम को यहाँ मेधातिथि भी कहा गया है। पुरन्दर = इन्द्र का नाम (नगरों को तोड़ने वाला)। कथा का मर्म, क्रोध में दी गई आज्ञा का तुरन्त पालन विनाश ला सकता है; गम्भीर और अपरिवर्तनीय कर्मों में, विशेषकर जहाँ अपराध सिद्ध न हो, धैर्य और देर तक विचार ही धर्म है।
सार: गौतम ने क्रोध में पुत्र चिरकारी को माता-वध की आज्ञा दी। चिरकारी ने स्वभाववश देर तक पिता-गौरव और माता-गौरव पर विचार किया, स्त्री को निर्दोष पाया, और वध टाल दिया। पिता लौटकर पश्चात्ताप करते हैं और पुत्र की देरी को आशीर्वाद देते हैं। मर्म, गुरुतर और संदिग्ध कर्मों में धैर्यपूर्वक विचार ही श्रेष्ठ धर्म है।
चिरकारी की कथा का अन्त, और बहुत देर तक सोचने वालों की प्रशंसा

शर-शय्या पर लेटे भीष्म ने युधिष्ठिर को गौतम-पुत्र चिरकारी की कथा सुनाते हुए कहा कि वह तरुण इसी सोच-विचार में लगा रहा। उसके पिता ने उसे माता का वध करने का आदेश दिया था, परन्तु वह अपने स्वभाव के अनुसार किसी भी कार्य से पहले बहुत देर तक विचार करता था, इसी से उसका नाम चिरकारी पड़ा। वह सोचता रहा कि स्त्री से कोई दोष नहीं होता, दोष तो पुरुष ही करता है। व्यभिचार का कलंक उसी पर लगता है जो वह कर्म करता है। उसने मन में कहा कि पति स्त्री के लिए परम आश्रय और परम देवता होता है। हमारी माता ने तो अपना पवित्र शरीर उसी को सौंपा जो हमारे पिता के रूप और वेश में आया। स्त्री निर्दोष है। फिर इन्द्र का दोष भी प्रत्यक्ष है, जिसने वह कुकर्म किया।
चिरकारी ने आगे विचार किया कि जिस स्त्री को मारने का हमें आदेश मिला है, वह हमारी माता हैं। माता वध के अयोग्य हैं, यह तो अबोध पशु भी जानते हैं। पिता समस्त देवताओं का समुच्चय हैं, किन्तु माता में तो समस्त प्राणियों और सब देवताओं का संयोग है। इसी दीर्घ चिन्तन में बहुत दिन बीत गए, और वह वध नहीं कर सका।
इस बीच उसके पिता मेधातिथि गौतम लौट आए। तपस्या में लगे, महान बुद्धि वाले उस ऋषि ने इतने समय विचार करके यह जान लिया कि अपनी पत्नी को दण्ड देने का आदेश अनुचित था। शोक से जलते और आँसू बहाते हुए, उन्होंने कहा, “तीनों लोकों के स्वामी पुरन्दर हमारे आश्रम में ब्राह्मण के वेश में आतिथ्य माँगते आए। हमने उन्हें उचित वचनों से आदर दिया, पाद्य-अर्घ्य दिया, विश्राम दिया, और कहा कि हमें आप में रक्षक मिल गया। फिर भी उन्होंने दुर्व्यवहार किया, तो इसमें हमारी पत्नी अहल्या का कोई अपराध नहीं। न हमारा, न हमारी पत्नी का, न आकाश से जाते हुए जिसने उसका रूप देखा उस इन्द्र का। दोष तो हमारी योग-शक्ति की असावधानी का है।”
उन्होंने स्वयं को धिक्कारते हुए कहा कि सब विपत्तियाँ ईर्ष्या से उपजती हैं, और ईर्ष्या निर्णय की भूल से। “अरे, हमने एक स्त्री का, और वह भी अपनी पत्नी का, वध करा दिया। जो पति के संकट बाँटने के कारण ‘वसिता’ कहलाई और जिसके भरण-पोषण के दायित्व के कारण वह ‘भार्या’ हुई। हमें इस पाप से कौन उबारेगा? हमने ही असावधान होकर चिरकारी को आदेश दिया। यदि आज वह अपने नाम के अनुरूप विलम्ब कर रहा हो, तो हमें इस पाप से बचा ले। धन्य हैं आप, हे चिरकारक! आज यदि आपने यह कार्य टाल दिया, तो आप सचमुच अपने नाम के योग्य हैं।”
ऐसा पश्चात्ताप करते हुए गौतम ने अपने पुत्र चिरकारी को पास बैठा देखा। पिता को लौटा देख, शोक से अभिभूत उस पुत्र ने उठाया हुआ शस्त्र फेंक दिया और सिर झुकाकर पिता को शान्त करने लगा। पुत्र को सिर झुकाए प्रणाम करते और पत्नी को लज्जा से प्राय: पाषाण-सी निश्चल देख, ऋषि महान आनन्द से भर उठे। उस दिन से वे महान ऋषि उस एकान्त आश्रम में अपनी पत्नी और सावधान पुत्र से अलग नहीं रहे।
पिता ने पुत्र को बहुत देर तक प्रशंसा की, बहुत देर तक उसका मस्तक सूँघा, बहुत देर तक उसे गले लगाया, और आशीर्वाद दिया, “आप दीर्घ-जीवी हों! धन्य हैं आप, हे चिरकारक! आप सदा किसी कार्य से पहले बहुत देर तक विचार किया कीजिए। आज अपने विलम्ब से आपने हमें सदा के लिए सुखी कर दिया।” तब उन्होंने उन शीतल-मन पुरुषों के गुणों पर श्लोक कहे जो हाथ बढ़ाने से पहले बहुत देर तक विचार करते हैं, “यदि बात मित्र के वध की हो, तो उसे बहुत देर बाद करना चाहिए। क्रोध, अहंकार, गर्व, विवाद, पापकर्म, और अप्रिय कार्यों में जो देर लगाता है वह प्रशंसा का पात्र है। जब किसी सम्बन्धी, मित्र, सेवक या पत्नी पर अपराध स्पष्ट सिद्ध न हो, तो दण्ड देने से पहले बहुत देर तक विचार करने वाला सराहा जाता है।” इस प्रकार गौतम अपने पुत्र के विलम्ब से प्रसन्न हुए, और अन्त में अपने पुत्र सहित स्वर्ग को सिधारे।
समझने की कुंजी (आपद्-धर्म = विपत्ति-काल का धर्म): यहाँ से भीष्म का उपदेश दो धाराओं में बहता है। पहली, आपद्-धर्म, अर्थात संकट में राजा और मनुष्य के आचरण के नियम। दूसरी, मोक्ष-धर्म, अर्थात मुक्ति का मार्ग, सांख्य-योग और परम तत्त्व का विवेचन। चिरकारी की कथा का सार यह है कि कठोर और अपरिवर्तनीय निर्णयों में जल्दबाजी विनाशकारी हो सकती है।
सार: क्रोध, दण्ड और अपरिवर्तनीय कार्यों में विलम्ब और गहरा विचार बुद्धिमत्ता है। बहुत देर तक सोचकर कार्य करने वाला पश्चात्ताप से बच जाता है।
द्युमत्सेन और सत्यवान का संवाद, राजा बिना किसी को आहत किए कैसे रक्षा करे

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, राजा अपनी प्रजा की रक्षा बिना किसी को हानि पहुँचाए कैसे करे? हे श्रेष्ठ पुरुषों में अग्रणी, यह हमें बताइए।”
भीष्म बोले, “इस विषय में द्युमत्सेन और राजा सत्यवान का पुराना संवाद कहा जाता है। हमने सुना है कि अपने पिता द्युमत्सेन की आज्ञा से जब कुछ व्यक्ति वध के लिए लाए गए, तब राजकुमार सत्यवान ने वे वचन कहे जो पहले किसी ने नहीं कहे थे। उन्होंने कहा, ‘कभी धर्म अधर्म का रूप ले लेता है, और अधर्म धर्म का। यह कभी सम्भव नहीं कि व्यक्तियों का वध धर्म-कार्य हो।’”
द्युमत्सेन ने कहा, “हे सत्यवान, यदि वध-योग्य को छोड़ देना धर्म है, यदि डाकू छोड़ दिए जाएँ, तो धर्म और अधर्म का भेद ही मिट जाएगा। ‘यह मेरा है’, ‘यह उसका नहीं है’, ऐसे विचार कलियुग में टिकेंगे नहीं। दुष्ट को दण्ड न मिले तो संसार के व्यवहार ठप हो जाएँगे। यदि आप जानते हों कि बिना दुष्ट को दण्डित किए संसार कैसे चल सकता है, तो हमें बताइए।”
सत्यवान ने कहा, “तीन वर्ण, अर्थात क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, ब्राह्मणों के नियन्त्रण में रखे जाएँ। यदि ये तीनों धर्म की मर्यादा में रहें, तो संकर वर्ग भी उन्हीं का अनुकरण करेंगे। जो इनमें ब्राह्मणों की आज्ञा का उल्लंघन करे, उसकी सूचना राजा को दी जाए। ब्राह्मण की ऐसी शिकायत पर कि ‘यह हमारी आज्ञा नहीं मानता’, राजा अपराधी को दण्ड दे, परन्तु उसका शरीर नष्ट किए बिना, शास्त्रों के अनुसार दण्ड दे। दुष्ट का वध करके राजा वस्तुत: बहुत-से निर्दोषों का वध करता है। देखिए, एक डाकू को मारने से उसकी पत्नी, माता, पिता और बच्चे, सब मारे जाते हैं, क्योंकि वे जीविका से वंचित हो जाते हैं।”
सत्यवान ने आगे कहा, “कभी-कभी दुष्ट मनुष्य धार्मिक से सदाचार सीख लेता है। फिर दुष्टों से भी अच्छी सन्तान उत्पन्न हो सकती है। इसलिए दुष्टों को जड़ से उखाड़ना उचित नहीं। हल्के दण्ड से, धन छीनकर, बेड़ियों और कारावास से, अंग-विकृति से, वे अपने अपराध का प्रायश्चित कर सकते हैं। उनके सम्बन्धियों को मृत्युदण्ड देकर सताया न जाए। यदि वे पुरोहित आदि के समक्ष शरण की इच्छा से स्वयं को सौंप दें और शपथ लें कि ‘हे ब्राह्मण, हम फिर कभी पाप-कर्म नहीं करेंगे’, तो वे बिना दण्ड के छोड़े जाने के योग्य हैं। यही स्वयं विधाता की आज्ञा है। जो बड़े लोग अपराध करें, उनका दण्ड उनकी महानता के अनुपात में हो। और जो बार-बार अपराध करें, वे पहली बार की भाँति बिना दण्ड के छोड़े जाने योग्य नहीं।”
द्युमत्सेन ने कहा, “जब तक वे मर्यादाएँ नहीं तोड़ी जातीं जिनमें मनुष्य को बाँधना चाहिए, तब तक वे धर्म कहलाती हैं। यदि उन मर्यादाओं को तोड़ने वालों को मृत्यु-दण्ड न मिले, तो वे मर्यादाएँ शीघ्र नष्ट हो जाएँगी। प्राचीन और प्राचीनतर काल के मनुष्य सरलता से शासित होते थे। वे सत्यवादी थे, विवाद और कलह से दूर। उन दिनों अपराधी पर ‘धिक्’ कहना ही पर्याप्त दण्ड था। फिर कठोर वचन और निन्दा का दण्ड आया। फिर अर्थदण्ड और सम्पत्ति-हरण का। और इस युग में मृत्यु-दण्ड प्रचलित हो गया है। दुष्टता इतनी बढ़ गई है कि एक को मारने से भी दूसरे नहीं रुकते। डाकू का न मनुष्यों से, न देवताओं से, न गन्धर्वों से, न पितरों से कोई सम्बन्ध है। श्रुति यही कहती है। जो उन दुष्टों से कोई वचन या शपथ लेकर उस पर भरोसा करे, वह मूर्ख है।”
सत्यवान ने कहा, “यदि आप उन दुष्टों को वध-रहित उपायों से सुधार और बचा नहीं पाते, तो उन्हें यज्ञ करके समाप्त कीजिए। राजा अपनी प्रजा को समृद्धि से चलाने के लिए कठोर तप करते हैं। जब उनके राज्य में चोर-डाकू बढ़ते हैं, तब वे लज्जित होते हैं, और चोरी-डकैती को दबाने तथा प्रजा को सुखी करने के लिए तप करते हैं। प्रजा केवल भयभीत करके सीधी की जा सकती है। अच्छे राजा प्रतिशोध से दुष्ट का वध नहीं करते। और यदि करते हैं, तो यज्ञ में करते हैं, जब उद्देश्य वध किए गए का कल्याण हो। यदि राजा ठीक आचरण करे, तो श्रेष्ठ प्रजा उसका अनुकरण करती है, और निम्न प्रजा अपने से ऊँचों का।”
उन्होंने कहा कि जो राजा स्वयं को संयमित किए बिना दूसरों को रोकना चाहे, वह सबकी हँसी का पात्र बनता है, क्योंकि वह स्वयं इन्द्रियों का दास होकर सब भोग भोगता है। जो दूसरों को रोकना चाहे, उसे पहले अपने आप को रोकना चाहिए। आवश्यक हो तो वह मित्रों और निकट सम्बन्धियों को भी कठोर दण्ड दे। फिर सत्यवान ने उस उपदेश को दोहराया जो उन्हें एक करुणावान ब्राह्मण और प्राचीन पितामह से मिला था, “कृतयुग में राजा प्रजा को पूर्णत: अहिंसक उपायों से शासित करें। त्रेता में धर्म जब चौथाई घट जाता है, उसके अनुरूप आचरण करें। द्वापर में धर्म जब आधा घट जाता है, और उसके बाद के युग में जब धर्म तीन-चौथाई घट जाता है, उसके अनुरूप। जब कलियुग आता है, तब राजाओं की दुष्टता और युग के स्वभाव से उस बचे हुए चौथाई भाग के भी पन्द्रह अंश लुप्त हो जाते हैं, और मात्र सोलहवाँ भाग ही शेष रहता है।”
“हे सत्यवान, यदि पहली विधि अर्थात अहिंसा अपनाने से अव्यवस्था फैले, तो राजा मनुष्य के जीवन-काल, उसके बल और काल के स्वभाव को देखकर दण्ड दे। स्वयम्भू मनु ने मनुष्यों पर करुणा करके वह मार्ग बताया है जिससे मनुष्य मुक्ति के लिए हिंसा के स्थान पर ज्ञान का आश्रय ले सकें।”
समझने की कुंजी (युगों का धर्म-ह्रास, संख्या-समतुल्य): मूल यहाँ धर्म को चार चरणों वाला बैल मानता है। कृतयुग में चारों चरण पूर्ण (16/16), त्रेता में 12/16, द्वापर में 8/16, और कलियुग में मात्र 1/16 धर्म शेष। यही कारण है कि भीष्म कहते हैं कि दण्ड की कठोरता युग के साथ बढ़ी।
सार: राजा का धर्म सुधार है, संहार नहीं। दण्ड युग और अपराध की गम्भीरता के अनुपात में हो। मृत्यु-दण्ड अन्तिम उपाय है, और राजा को पहले अपने ऊपर संयम रखना चाहिए। यहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता प्रकट है, क्योंकि सत्यवान भी मानते हैं कि कभी-कभी दण्ड अनिवार्य हो जाता है।
कपिल और स्यूमरश्मि का संवाद, कर्म-मार्ग बनाम ज्ञान-मार्ग, यज्ञ में पशु-वध का प्रश्न
युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, आपने बताया कि योग का धर्म, जो छह प्रसिद्ध गुणों की ओर ले जाता है, बिना किसी प्राणी को हानि पहुँचाए कैसे अपनाया जाए। अब उस धर्म के विषय में बताइए जो दोनों फल देता है, अर्थात भोग और मोक्ष। इन दोनों में, गृहस्थ-धर्म और योग-धर्म में, दोनों जो एक ही लक्ष्य तक पहुँचते हैं, श्रेष्ठ कौन है?”
भीष्म बोले, “दोनों मार्ग अत्यन्त कल्याणकारी हैं, दोनों ही दुष्कर हैं, दोनों ही उच्च फल देते हैं। मैं अब इन दोनों की प्रामाणिकता पर आपके संशय मिटाने के लिए कहूँगा। इस विषय में कपिल और गौ का पुराना संवाद उद्धृत है।”
“पुराने समय की बात है, जब देवता त्वष्टा राजा नहुष के यहाँ आए, तो नहुष आतिथ्य-धर्म के अनुसार वेदों के सच्चे, प्राचीन और शाश्वत विधान के अनुसार एक गौ का वध करने को उद्यत हुए। उस गौ को वध के लिए बँधी देख, सत्त्वगुणी, इन्द्रिय-निग्रही, सच्चे ज्ञान वाले कपिल ने एक बार यह वचन कहा, ‘हाय वेदो!’ उसी क्षण स्युमरश्मि नामक एक ऋषि योग-बल से उस गौ के रूप में प्रवेश करके बोले, ‘अरे कपिल! यदि वेद प्रमाण हैं, क्योंकि उनमें जीवों के वध की अनुमति देने वाली घोषणाएँ हैं, तो वे अन्य धर्म, जो सर्व-प्राणियों के प्रति पूर्ण अहिंसा से युक्त हैं, प्रमाण कैसे माने गए? जिनके पास श्रुति और ज्ञान रूपी नेत्र हैं, वे वेदों के विधानों को साक्षात ईश्वर के वचन मानते हैं। फिर उन वेदों की निन्दा या प्रशंसा कोई कैसे कर सकता है, जब वे उस परम पुरुष के वचन हैं?’”
कपिल ने कहा, “हम वेदों की निन्दा नहीं करते। हमने सुना है कि भिन्न-भिन्न आश्रमों के लिए निर्धारित भिन्न धर्म-मार्ग सब एक ही लक्ष्य तक पहुँचते हैं। संन्यासी उच्च गति पाता है, वानप्रस्थ भी, गृहस्थ और ब्रह्मचारी भी उसी गति को पाते हैं। चारों आश्रम सदा देव-यान मार्ग माने गए हैं। एक ओर वेद कहते हैं, ‘ऐसे कर्म कीजिए जो स्वर्ग दें’, और दूसरी ओर कहते हैं, ‘कर्म मत कीजिए।’ यदि कर्म से विरति पुण्य है, तो कर्म करना अत्यन्त निन्दनीय होना चाहिए। जब शास्त्र ऐसे विरोधी हों, तो किसकी प्रबलता मानें? यदि आप अहिंसा-धर्म से श्रेष्ठ कोई धर्म जानते हों जो शास्त्र के स्थान पर प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर हो, तो हमें बताइए।”
स्युमरश्मि ने उत्तर दिया कि श्रुति बार-बार कहती है, “स्वर्ग की इच्छा से यज्ञ कीजिए।” बकरा, घोड़ा, गौ, पक्षी, औषधियाँ और पौधे, ये सब अन्य जीवों के भोजन हैं। श्रुति पशुओं और अन्न को यज्ञ के अंग कहती है। सृष्टि-स्वामी ने इन्हें यज्ञ के साथ रचा। सात गृह्य और सात वन्य पशु यज्ञ-योग्य बताए गए, और प्रत्येक उत्तरवर्ती पूर्ववर्ती से निम्न है। वेद कहते हैं कि समस्त ब्रह्माण्ड यज्ञ के लिए नियुक्त है, और जिसे पुरुष कहते हैं उसे भी इसी हेतु नियुक्त किया गया।
स्युमरश्मि ने यज्ञ के सत्रह अंग गिनाए, अर्थात क्षयशील औषधियाँ, पशु, वृक्ष, लताएँ, घृत, दूध, दही, मांस, भूमि, दिशाएँ, श्रद्धा, बारह की संख्या लाने वाला काल, ऋक्, यजुस्, साम, यजमान, और गृहपति रूपी अग्नि। उन्होंने कहा कि गौ अकेली ही घृत, दूध, दही, गोबर, चर्म, पूँछ के बाल, सींग और खुर से यज्ञ की सब सामग्री दे सकती है। परन्तु उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति इस विश्वास से यज्ञ करता है कि यज्ञ करना ही कर्तव्य है, फल की इच्छा से नहीं, वह किसी प्राणी को हानि नहीं पहुँचाता और किसी से शत्रुता नहीं रखता। ‘ओम्’ से वेद उपजे हैं, इसलिए हर कर्म ओम् से आरम्भ हो। जिसने ओम्, नमस्, स्वाहा, स्वधा और वषट् का उच्चारण किया और यथाशक्ति यज्ञ किए, उसे तीनों लोकों में अगले जीवन का भय नहीं।
एक उप-कथा: गौ-रूपी ऋषि स्युमरश्मि का वाद-विवाद केवल तर्क के लिए नहीं था। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे विवाद-प्रिय नहीं; ज्ञान के अभिलाषी हैं, जिनके मन में गहरा संशय बैठा है। यह संवाद कर्म-काण्ड और ज्ञान-मार्ग के बीच का अत्यन्त संतुलित विवेचन है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करते हैं।
कपिल ने आगे कहा, “यह देखकर कि कर्मों से प्राप्त सब फल नश्वर हैं, शाश्वत नहीं, यति आत्म-संयम और शान्ति अपनाकर ज्ञान के मार्ग से ब्रह्म को पाते हैं। वे द्वन्द्वों से मुक्त हैं, किसी के आगे सिर नहीं झुकाते, सब बन्धनों से ऊपर हैं। जब यह परम लक्ष्य प्राप्ति की पहुँच में है, तो गृहस्थ-धर्म की क्या आवश्यकता?”
स्युमरश्मि ने उत्तर दिया कि यदि वही परम लक्ष्य है, तो गृहस्थ-धर्म का महत्त्व स्वत: सिद्ध हो जाता है, क्योंकि गृहस्थ-धर्म के बिना कोई अन्य आश्रम सम्भव ही नहीं। जैसे सब प्राणी अपनी-अपनी माता पर निर्भर होकर जीते हैं, वैसे ही तीनों अन्य आश्रम गृहस्थ-आश्रम पर निर्भर रहते हैं। गृहस्थ यज्ञ करता है, तप करता है। सब प्राणी सन्तान-उत्पत्ति को महान सुख मानते हैं, और सन्तान-उत्पत्ति गृहस्थ-धर्म के बिना असम्भव है। फिर वह कौन सत्य कहता है जो कहे कि गृहस्थी मोक्ष नहीं दे सकती? केवल वे जो श्रद्धा, बुद्धि और विवेक से रहित हैं, आलसी और श्रम से थके हुए हैं, वे ही भिक्षु-जीवन में शान्ति की पूर्णता देखते हैं।
स्युमरश्मि ने कहा कि गर्भाधान से लेकर शव-दाह, पितरों के लिए पिण्डदान, और गोदान तक, हर कर्म में वैदिक मन्त्र आवश्यक हैं। पितरों की तीन श्रेणियाँ, अर्थात अर्चिष्मान, बर्हिषद और क्रव्याद, मृतक के लिए मन्त्रों की आवश्यकता को स्वीकार करती हैं। जब वेद यह इतने ऊँचे स्वर में कहते हैं, और जब मनुष्य पर पितरों, ऋषियों और देवताओं के ऋण हैं, तो कोई मोक्ष कैसे पाएगा? निष्क्रिय मुक्ति का यह मिथ्या सिद्धान्त उन विद्वानों ने प्रचलित किया जो समृद्धि से वंचित और आलस्य से ग्रस्त थे।
कपिल ने उत्तर दिया, “यदि कर्म अनिवार्य हैं, तो बुद्धिमान के लिए दर्श, पौर्णमास, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य जैसे कर्म हैं, जिनमें शाश्वत पुण्य है। फिर क्रूरता वाले कर्म क्यों करें? जो संन्यास-धर्म में हैं, सब कर्मों से विरत हैं, ब्रह्म-ज्ञानी हैं, वे उस ज्ञान से ही देवताओं, ऋषियों और पितरों के ऋण चुका देते हैं।” फिर कपिल ने उस चार-द्वार वाले शरीर का वर्णन किया, अर्थात दो भुजाएँ, वाणी, उदर और जननेन्द्रिय। उन्होंने कहा कि इन द्वारों को नियन्त्रित करना चाहिए। पासे न खेले, दूसरे का धन न ले, नीच के यज्ञ में सहायता न करे, क्रोध में हाथ-पैर से किसी को न मारे, इससे हाथ-पैर वश में रहते हैं। गाली-निन्दा न करे, व्यर्थ वचन न बोले, सत्य का व्रत रखे, इससे वाणी वश में रहती है। न तो पूर्ण उपवास करे न अति-भोजन, केवल इतना खाए जितना प्राण-रक्षा के लिए चाहिए, इससे उदर वश में रहता है। विवाहित पत्नी के रहते अन्य स्त्री को कामवश न ग्रहण करे, ऋतु-काल के अतिरिक्त स्त्री को शय्या पर न बुलाए, इससे जननेन्द्रिय वश में रहती है।
कपिल ने कहा, “जिसके चारों द्वार सुसंयमित हैं, वही सच्चा द्विज है। जिसके द्वार वश में नहीं, उसका सब कुछ व्यर्थ है, उसका तप क्या करेगा, उसके यज्ञ क्या लाएँगे?” उन्होंने ब्राह्मण के लक्षण बताए कि जो किसी प्राणी से नहीं डरता और जिससे कोई प्राणी नहीं डरता, जो स्वयं को सब प्राणियों की आत्मा मानता है, वही ब्राह्मण है। उन्होंने यह भी कहा कि यज्ञों के विधान बहुत कठिन हैं, यदि निश्चित हों तो पालन कठिन, और यदि पालन हो तो उनके फल नश्वर हैं। इसलिए ज्ञान का मार्ग ग्रहण करना चाहिए।
स्युमरश्मि ने पूछा कि वेद कर्म का समर्थन भी करते हैं और विरोध भी, तो उनका प्रमाण कैसे? कपिल ने उत्तर दिया, “सत्पुरुषों के मार्ग, अर्थात योग को अपनाकर, इसी जीवन में अपनी इन्द्रियों के प्रत्यक्ष प्रमाण से उसका फल प्राप्त कीजिए। आप कर्मियों के अन्य लक्ष्यों के प्रत्यक्ष फल कहाँ हैं?” स्युमरश्मि ने नम्रता से कहा, “मैं स्युमरश्मि हूँ, ज्ञान के लिए आया हूँ, विवाद के लिए नहीं। आप शिष्य को गुरु की भाँति समझाइए।” फिर उसने माना कि कोई भी मनुष्य पूर्णत: सब वस्तुएँ नहीं त्याग सका, न पूर्णत: सन्तुष्ट है, न शोक से परे। आप जैसे पुरुष भी हर्ष और शोक में आ जाते हैं।
कपिल ने उत्तर दिया कि जिस शास्त्र के अनुसार मनुष्य कर्म करता है, उसके विधान निष्फल नहीं होते। परन्तु जो भी मत हो, मनुष्य योग के आत्म-संयम का पालन करके ही परम गति पाता है। ज्ञान उसी को इस जन्म-मृत्यु की नदी पार कराता है जो ज्ञान का अनुसरण करता है। उन्होंने तमोगुण की निन्दा की, कि जिसका आश्रय तमस है, उसमें ईर्ष्या, काम, क्रोध, गर्व, झूठ और घमण्ड निरन्तर बढ़ते हैं, क्योंकि गुणों का स्रोत स्वभाव में है। इसी से यति सब भले-बुरे को छोड़कर योग का आश्रय लेते हैं।
स्युमरश्मि ने अन्त में नम्रता से कहा, “जो आचरण समता के अनुकूल है, वही शास्त्र के अनुकूल है। केवल वही मनुष्य जो योग में लीन हो, जिसने सब कर्तव्य पूरे किए हों, जो केवल अपने शरीर पर निर्भर रहकर सर्वत्र विचर सके, जिसने आत्मा को पूर्ण वश में किया हो, वही वेद के कर्म-विधानों का उल्लंघन करके मोक्ष की बात कह सकता है। पर जो सम्बन्धियों के बीच रहता है, उसके लिए यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। हे ब्राह्मण, अब मुझे उस मोक्ष के विषय में विलम्ब किए बिना बताइए। मैं आपके चरणों में शिष्य की भाँति बैठा हूँ।”
समझने की कुंजी (देव-यान, चार द्वार): देव-यान वह मार्ग है जो देवलोक की ओर ले जाता है, पितृ-यान के विपरीत जो पुनर्जन्म की ओर। कपिल जिन “चार द्वारों” की बात करते हैं वे शरीर के चार कर्मेन्द्रिय-समूह हैं, जिनसे पाप प्रवेश करता है, अर्थात भुजाएँ (कर्म), वाणी, उदर (भोजन-लोभ) और जननेन्द्रिय (काम)। इन्हें संयमित करना ही ब्राह्मणत्व की कुंजी है।
सार: कपिल कर्म-मार्ग की निन्दा नहीं करते, परन्तु ज्ञान को परम मानते हैं, क्योंकि कर्म के फल नश्वर हैं। स्युमरश्मि गृहस्थ-धर्म की रक्षा करते हैं, यह दिखाते हुए कि सब आश्रम उसी पर टिके हैं। दोनों एक ही लक्ष्य, अर्थात हृदय की शुद्धि और मोक्ष, की ओर इशारा करते हैं।
कपिल का परम उत्तर, शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म, हृदय की शुद्धि ही फल
कपिल ने कहा, “वेद सबके द्वारा प्रमाण माने जाते हैं। ब्रह्म दो प्रकार का है, अर्थात शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म जो परम और अगोचर है। जो शब्द-ब्रह्म का ज्ञाता है, वह पर-ब्रह्म को पाता है। गर्भाधान के संस्कारों से जो शरीर पिता वैदिक मन्त्रों से रचता है, वह जन्म के बाद वैदिक मन्त्रों से शुद्ध किया जाता है। जब शरीर संस्कारों से शुद्ध हो जाता है, तब वह ब्राह्मण कहलाता है और ब्रह्म-ज्ञान का पात्र बनता है। जान लो कि कर्मों का फल हृदय की शुद्धि है, जो अकेली मोक्ष की ओर ले जाती है। हृदय शुद्ध हुआ या नहीं, यह केवल उसी को ज्ञात होता है जिसने उसे प्राप्त किया, न वेदों से न अनुमान से।”
कपिल ने प्राचीन काल के उन गृहस्थों का वर्णन किया जो किसी अपेक्षा के बिना, धन-संग्रह के बिना, राग-द्वेष से मुक्त होकर, केवल कर्तव्य मानकर यज्ञ करते थे। पात्र को दान देना ही समस्त धन का सदुपयोग है। ऐसे अनेक राजा भी थे, जैसे जनक, जो योग में लीन थे, और याज्ञवल्क्य जैसे ब्राह्मण भी। वे सब प्राणियों के प्रति समान आचरण करते थे, सच्चे थे, सन्तुष्ट थे, और ज्ञान में निश्चित थे। उन्होंने पहले अपने हृदय शुद्ध किए, फिर सब उत्तम व्रत निभाए। विपत्ति और कठिनाई में भी वे धर्म से नहीं डिगे। मिलकर पुण्य-कर्म करते थे और उसी में महान सुख पाते थे। चूँकि वे कभी नहीं गिरे, उन्हें कोई प्रायश्चित नहीं करना पड़ा।
कपिल ने कहा कि वे ब्राह्मण अनन्त ब्रह्म के समान हो गए, और मरने के बाद आकाश में नक्षत्र और तारे बनकर चमकते हैं। यदि ऐसे पुरुषों को फिर जन्म लेना भी पड़े, तो वे पूर्व-कर्मों के अवशिष्ट पापों से कलंकित नहीं होते। उन्होंने त्याग, संन्यास और ज्ञान को सब आश्रमों के लिए समान बताया, “त्याग ब्राह्मण के लिए परम आवश्यक है और शाश्वत है, जो गुरु से शिष्य तक चला आता है। त्याग सर्व-कल्याणकारी है, केवल दुर्बल ही उसका पालन नहीं कर पाता।”
स्युमरश्मि ने पूछा कि भोग में लगे लोगों में जो दान करते हैं, यज्ञ करते हैं, वेद पढ़ते हैं, और जो धन भोगकर अन्त में संन्यास लेते हैं, उनमें मरने के बाद स्वर्ग में अग्र-स्थान कौन पाता है? कपिल ने कहा कि गृहस्थ शुभ हैं और हर प्रकार की उत्कृष्टता पाते हैं, परन्तु त्याग का सुख वे नहीं भोग सकते। फिर स्युमरश्मि ने पूछा कि जब सब आश्रमों का अन्त मोक्ष ही है, तो श्रेष्ठता-निम्नता का भेद कैसा? कपिल ने उत्तर दिया, “कर्म केवल शरीर को शुद्ध करते हैं। ज्ञान ही परम लक्ष्य है। जब हृदय के सब दोष कर्मों से दूर हो जाते हैं, तब करुणा, क्षमा, शान्ति, सत्य, सरलता, अहिंसा, निरभिमानता, विनय, त्याग और निष्कर्मता का उदय होता है। यही ब्रह्म तक ले जाने वाला मार्ग है।”
कपिल ने वेद-ज्ञानी का लक्षण बताया कि जो वेद को, वेद के विषय को, और कर्म की सूक्ष्मता को जानता है, वही वेद का ज्ञाता है, अन्य तो केवल वायु का थैला है। उन्होंने कहा कि यह सम्पूर्ण विश्व है भी और नहीं भी, ज्ञानी के लिए यह सत् भी है और असत् भी। जब पूर्ण त्याग होता है, तब मनुष्य पर्याप्त पाता है, फिर परम सन्तोष आता है जो मोक्ष पर टिकता है। वह मोक्ष परम है, सब चर-अचर का आत्मा है, द्वैत-रहित है, परम आनन्द है, ब्रह्म है, अव्यक्त है और कारण भी। “इन्द्रिय-निग्रह, क्षमा, और इच्छा के अभाव से कर्म से विरति, ये तीन परम आनन्द के कारण हैं। इन्हीं तीन गुणों से, ज्ञान-रूपी नेत्र वाले मनुष्य उस अजन्मा, अविनाशी, अपरिवर्तनीय ब्रह्म तक पहुँचते हैं। मैं उस ब्रह्म को नमन करता हूँ, जो उसके ज्ञाता से अभिन्न है।”
समझने की कुंजी (शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म): शब्द-ब्रह्म वह ब्रह्म है जो वेद-ध्वनि और मन्त्रों में प्रकट होता है, साधना का प्रारम्भिक रूप। पर-ब्रह्म वह परम, अगोचर, निराकार सत्ता है जो उससे परे है। कपिल कहते हैं कि शब्द-ब्रह्म की साधना पर-ब्रह्म तक पहुँचने की सीढ़ी है। सत्, असत् = व्यक्त और अव्यक्त, अर्थात जो प्रत्यक्ष दिखता है और जो प्रकट होने को है।
सार: कर्म शरीर को शुद्ध करते हैं, ज्ञान आत्मा को मुक्त करता है। कर्म का सच्चा फल हृदय की शुद्धि है, जिससे करुणा, क्षमा और त्याग के गुण फूटते हैं। यही ब्रह्म-मार्ग है।
कुण्डधार का वरदान, धन से अधिक धर्म का सुख

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, वेद धर्म, अर्थ और काम की चर्चा करते हैं। इनमें किसकी प्राप्ति श्रेष्ठ मानी जाती है?”
भीष्म ने उस प्राचीन कथा को सुनाया कि कैसे कुण्डधार ने अपने भक्त पर उपकार किया। एक निर्धन ब्राह्मण धन की इच्छा से, यज्ञ करने हेतु, पुण्य अर्जित करना चाहता था। उसने कठोर तप किया, देवताओं की आराधना की, पर धन नहीं मिला। तब उसने सोचा, “वह कौन देवता है, जो अब तक किसी ने पूजा न हो, जो शीघ्र मुझ पर प्रसन्न हो?” तभी उसने अपने सामने देवताओं के सेवक, कुण्डधार नामक मेघ को खड़ा देखा। उस ब्राह्मण ने सोचा कि यह अवश्य मुझे समृद्धि देगा, क्योंकि यह देवताओं के निकट रहता है और अब तक किसी ने इसकी पूजा नहीं की। उसने धूप, गन्ध, पुष्प-मालाओं और विविध भेंटों से कुण्डधार की पूजा की।
प्रसन्न होकर कुण्डधार ने कहा, “ब्रह्म-हत्या, मद्यपान, चोरी या व्रत-त्याग का प्रायश्चित विद्वानों ने बताया है, पर कृतघ्न का कोई प्रायश्चित नहीं। अपेक्षा की सन्तान है अधर्म। क्रोध ईर्ष्या की सन्तान है, लोभ कपट की सन्तान है, पर कृतघ्नता बंजर है, उसकी कोई सन्तान नहीं।” फिर वह ब्राह्मण कुश-शय्या पर लेटा और कुण्डधार की शक्ति से उसने स्वप्न में सब जीवों को देखा। उसने मणिभद्र को देवताओं के बीच आज्ञा देते देखा, जहाँ देवता मनुष्यों के अच्छे कर्मों से उन्हें राज्य और धन देते थे और बुरे कर्मों पर छीन लेते थे।
कुण्डधार ने देवताओं के समक्ष सिर झुकाया। मणिभद्र ने पूछा, “कुण्डधार क्या चाहता है?” कुण्डधार ने उत्तर दिया, “यदि देवता मुझ पर प्रसन्न हैं, तो वह ब्राह्मण मेरी बड़ी आराधना करता है। उस पर कोई कृपा हो, ऐसा कुछ जो उसे सुख दे।” मणिभद्र ने कहा, “उठिए, कुण्डधार, आपका कार्य सफल है। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता है, तो जितना चाहे, उतना अपार धन दिया जाएगा।”
परन्तु कुण्डधार ने मनुष्यता की स्थिति की क्षणभंगुरता पर विचार किया और ब्राह्मण को तप की ओर प्रवृत्त करना उचित समझा। उसने कहा, “हे धन-दाता, मैं इसके लिए धन नहीं माँगता। मैं न मोतियों के पर्वत चाहता हूँ, न रत्न, न समस्त धरती। मैं चाहता हूँ कि यह धार्मिक हो, इसका हृदय धर्म में रमे, धर्म इसका आश्रय बने, धर्म इसका परम लक्ष्य हो। यही वरदान मुझे स्वीकार है।” मणिभद्र ने कहा, “धर्म का फल सदा सार्वभौमिकता और सुख है। यह वही फल भोगे, सब शारीरिक पीड़ा से मुक्त।”
देवता प्रसन्न हुए। मणिभद्र ने कहा कि वह ब्राह्मण धर्मात्मा होगा, उसका मन धर्म में लगेगा। तब उस ब्राह्मण ने अपने चारों ओर बहुमूल्य वस्त्र बिखरे देखे, पर उन पर ध्यान न देकर वह संसार से विरक्त हो गया। उसने कहा, “जब यह स्वयं अच्छे कर्मों का मूल्य नहीं समझता, तो और कौन समझेगा? मैं वन में जाकर धर्म का जीवन बिताऊँगा।”
देवताओं की कृपा से वह वन में गया और कठोरतम तप करने लगा। पहले फल-मूल, फिर पत्ते, फिर केवल जल, और फिर केवल वायु पर निर्वाह करते हुए भी उसका बल नहीं घटा। बहुत समय बाद उसने दिव्य-दृष्टि पाई। उसने सोचा, “यदि मैं किसी पर प्रसन्न होकर धन दूँ, तो मेरा वचन कभी झूठा न होगा।” और कठोर तप करके उसने यह शक्ति पाई कि वह संकल्प-मात्र से परम वस्तुएँ रच सके।
तब कुण्डधार पुन: प्रकट हुआ। ब्राह्मण ने उसकी पूजा की, पर कुछ आश्चर्य अनुभव किया। कुण्डधार ने कहा, “अब आपको उत्तम दिव्य नेत्र मिला है। इस दृष्टि से देखिए कि राजाओं को कौन-सी गति मिलती है।” ब्राह्मण ने अपनी दिव्य-दृष्टि से दूर हजारों राजाओं को नरक में डूबे देखा। कुण्डधार ने कहा, “मेरी भक्ति-पूजा के बाद यदि आपको दु:ख ही मिलता, तो मेरी कृपा का क्या मूल्य? देखिए, मनुष्य किस अन्त के लिए भोग चाहते हैं। उनके लिए स्वर्ग का द्वार बन्द है।” ब्राह्मण ने काम, क्रोध, लोभ, भय, गर्व, निद्रा, आलस्य और निष्क्रियता में बँधे मनुष्यों को देखा।
कुण्डधार ने कहा, “इन्हीं दोषों से सब मनुष्य जकड़े हैं। देवता मनुष्यों से डरते हैं, और देवताओं की आज्ञा से ये दोष हर ओर मनुष्यों को भटकाते हैं। बिना देवताओं की अनुमति के कोई धार्मिक नहीं हो सकता। उनकी अनुमति से ही आप तप द्वारा राज्य और धन देने योग्य बने हैं।” तब ब्राह्मण ने सिर झुकाकर कहा कि उसने पहले कुण्डधार के स्नेह को न पहचानकर भूल की थी। कुण्डधार ने कहा, “मैंने आपको क्षमा किया”, और गले लगाकर अन्तर्धान हो गया। भीष्म ने कहा, “धन में थोड़ा सुख हो सकता है, पर धर्म में सुख का परिमाण बहुत बड़ा है।”
समझने की कुंजी (कुण्डधार, मणिभद्र): कुण्डधार एक मेघ-देवता है, देवताओं का सेवक, जो जल-वृष्टि का प्रतीक है। मणिभद्र यक्षों का अधिनायक है, जो देवताओं की आज्ञा से मनुष्यों को कर्म-फल बाँटता है। इस कथा का मर्म यह है कि सच्चा मित्र भक्त को धन नहीं, धर्म-निष्ठा का वर देता है।
सार: धन क्षणिक सुख देता है, धर्म स्थायी। कुण्डधार ने भक्त के लिए धन के बजाय धर्म माँगा, और वही परम वरदान सिद्ध हुआ। कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित नहीं।
सत्य नामक ब्राह्मण और मृग बने धर्म, अहिंसक यज्ञ की कथा

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, अनेक प्रकार के यज्ञों में, जिनका एक ही उद्देश्य है, वह कौन-सा यज्ञ है जो केवल धर्म के लिए नियत है, न स्वर्ग के लिए न धन के लिए?”
भीष्म ने नारद द्वारा कही उस ब्राह्मण की कथा सुनाई जो उञ्छ-वृत्ति से जीवन-यापन करता था, अर्थात खेत में गिरे दानों को चुनकर। एक श्रेष्ठ राज्य में, जो अपने धर्म के लिए विख्यात था, एक ब्राह्मण रहता था जो तप में लीन और उञ्छ-वृत्ति से जीता था। वह यज्ञों में विष्णु की आराधना करता था। वह श्यामाक अन्न, सूर्यपर्णी, सुवर्चला और अन्य कड़वी-स्वाद-हीन शाक खाता, पर तप के प्रभाव से वे मीठी लगतीं। किसी प्राणी को न सताते हुए, वन-वासी जीवन बिताकर उसने तप-सिद्धि पाई।
उस ब्राह्मण का नाम सत्य था, और उसकी पत्नी पुष्करधारिणी थी। वह पवित्र-मन और अनेक कठोर व्रतों से कृश थी। स्वभाव से दयालु होने के कारण, और पति को क्रूर यज्ञों में लगा देख, वह उसके आचरण से सहमत नहीं थी। पर शाप के भय से, यज्ञ में उसके साथ बैठने को बुलाए जाने पर, उसने पति के आचरण से मन को समझा लिया। उसका वस्त्र मोर के झड़े पंखों का था। अनिच्छा से भी उसने पति की आज्ञा से वह यज्ञ किया, जिसमें पति होता बना था।
उस वन में, ब्राह्मण के आश्रम के पास, शुक्र-वंश का धार्मिक पर्णाद रहता था, जिसने मृग का रूप धरा था। उसने सत्य से स्पष्ट वाणी में कहा, “यदि आपका यह यज्ञ मन्त्रों और विधि में दोषपूर्ण रह गया, तो आप अनुचित करेंगे। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे मारकर, मेरे टुकड़े करके अग्नि में आहुति दें। ऐसा करके निर्दोष होकर स्वर्ग को जाइए।” तब सूर्य-मण्डल की अधिष्ठात्री देवी सावित्री स्वयं उस यज्ञ में आईं और ब्राह्मण से वही करने का आग्रह किया जो मृग चाहता था। पर ब्राह्मण ने कहा, “मैं इस मृग को नहीं मारूँगा जो मेरे इसी पड़ोस में रहता है।”
ऐसा सुनकर देवी सावित्री रुक गईं और यज्ञ के अन्य दोषों को न देखने की इच्छा से पाताल देखने हेतु अग्नि में प्रवेश कर गईं। मृग ने फिर हाथ जोड़कर सत्य से प्रार्थना की कि उसे काटकर अग्नि में डाला जाए। पर सत्य ने उसे मित्रता से गले लगाकर “जाइए” कहकर विदा कर दिया। मृग आठ पग जाकर लौटा और बोला, “सचमुच मुझे मारिए। आपके हाथ मरकर मैं अवश्य धार्मिक गति पाऊँगा। मैं आपको दिव्य-दृष्टि देता हूँ। देखिए दिव्य अप्सराओं और गन्धर्वों के सुन्दर विमान।”
उस दृश्य को देर तक लालसा-भरी आँखों से देख, और यह सोचकर कि स्वर्ग-वास केवल वध से मिलता है, ब्राह्मण ने मृग की बात मान ली। पर वह मृग वस्तुत: धर्म ही था, जो उन वनों में वर्षों से रहता था। ब्राह्मण को इस प्रलोभन में फँसा देख, धर्म ने उसके उद्धार के लिए कहा, “यह, अर्थात जीवों का वध, यज्ञ के विधान के अनुकूल नहीं है।” जिस ब्राह्मण के मन ने मृग को मारने की इच्छा की थी, उसका विशाल तप उस विचार-मात्र से बहुत घट गया। जीवों को सताना यज्ञ का अंग नहीं।
तब धर्म ने अपना वास्तविक रूप धरकर स्वयं पुरोहित-कर्म करके उस ब्राह्मण का यज्ञ सम्पन्न कराया। इसके बाद, पुन: तप करके, ब्राह्मण ने वही मन:स्थिति पाई जो उसकी पत्नी की थी। अहिंसा वही धर्म है जो अपने फल में पूर्ण है। क्रूरता का धर्म केवल इतना लाभकारी है कि वह स्वर्ग तक ले जाता है, जिसका अन्त होता है। भीष्म ने कहा, “यही उस सत्य के धर्म की कथा है जो ब्रह्म के उद्गाताओं का धर्म है।”
समझने की कुंजी (उञ्छ-वृत्ति): उञ्छ-वृत्ति वह अति-पवित्र जीवन-वृत्ति है जिसमें मनुष्य खेतों-बाजारों में गिरे हुए अन्न के दाने चुनकर निर्वाह करता है, बिना माँगे या संचय किए। इस कथा में धर्म स्वयं मृग बनकर ब्राह्मण की परीक्षा लेता है। पर्णाद और सावित्री का प्रलोभन वस्तुत: यह दिखाने के लिए था कि सच्चा यज्ञ अहिंसक होता है।
सार: अहिंसा का यज्ञ पूर्ण फल देता है, हिंसा का यज्ञ केवल नश्वर स्वर्ग। वध की इच्छा-मात्र से तप घट जाता है। धर्म स्वयं मृग बनकर इस सत्य की रक्षा करता है।
पाप, धर्म, त्याग और मोक्ष कैसे आते हैं, और मोक्ष के उपाय
युधिष्ठिर ने पूछा, “मनुष्य किससे पापी बनता है, किससे धर्म पाता है, किससे त्याग को पहुँचता है, और किससे मोक्ष जीतता है?”
भीष्म ने कहा, “आप सब धर्म जानते हैं, यह प्रश्न केवल अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए है। पाँच विषयों, अर्थात रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श, में से किसी एक को देखकर पहले इच्छा उसके पीछे दौड़ती है। इन्द्रियों की पहुँच में उन्हें पाकर राग या द्वेष उपजता है। फिर मनुष्य उस वस्तु के लिए परिश्रम-भरे कर्म आरम्भ करता है। धीरे-धीरे आसक्ति, द्वेष, लोभ और निर्णय की भूलें उठती हैं। लोभ और भूल से अभिभूत मन कभी धर्म की ओर नहीं मुड़ता। तब मनुष्य कपट से अच्छे कर्म करने लगता है, कपट से धर्म और धन पाना चाहता है। जब वह कपट से धन जीत लेता है, तब पूर्णत: उसी में मन लगाता है। फिर वह सज्जनों के समझाने पर भी पाप-कर्म करता है, और शास्त्र-सम्मत-से दिखने वाले तर्कों से उत्तर देता है।”
भीष्म ने कहा कि आसक्ति और भूल से उपजे उसके तीन प्रकार के पाप, अर्थात मन से, वाणी से और कर्म से, तेजी से बढ़ते हैं। ऐसे पापी की सज्जन निन्दा करते हैं, और उसके जैसे ही दुष्ट उससे मित्रता करते हैं। वह यहाँ भी सुख नहीं पाता, परलोक में कैसे पाएगा? इस प्रकार मनुष्य पापी बनता है।
फिर भीष्म ने धार्मिक का वर्णन किया, “जो दूसरों का भला चाहता है, वह अपना भला पाता है। जो बुद्धि से पहले ही दोषों को देख लेता है, जो सुख-दु:ख और उनके कारणों को पहचानता है, और सज्जनों की आदर से सेवा करता है, वह धर्म में आगे बढ़ता है। उसका मन धर्म में रमता है। यदि वह धन चाहता भी है, तो केवल वैसा जो धर्म से मिले। ऐसे मनुष्य को धर्म का फल, अर्थात शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध पर इन्द्रिय-आधिपत्य, मिलता है। पर उसे पाकर भी वह हर्ष में नहीं डूबता। उन दृश्य फलों से असन्तुष्ट होकर, ज्ञान-नेत्र से प्रेरित होकर, वह त्याग की ओर बढ़ता है। तब वह सब लोकों को नश्वर देखकर, धर्म को भी उसके स्वर्ग-फल सहित त्यागकर, उन उपायों से मोक्ष पाने का यत्न करता है।”
सार: पाप का बीज इन्द्रिय-विषय की ओर दौड़ती इच्छा है, जो आसक्ति, लोभ और कपट में बदलती है। धर्म का मूल दूसरों का हित और सत्संग है। धर्म-फल भोगकर भी उससे ऊपर उठकर त्याग, और फिर मोक्ष, साधा जाता है।
तब युधिष्ठिर ने पूछा कि वे उपाय कौन-से हैं जिनसे मोक्ष मिलता है। भीष्म ने कहा कि जैसे घड़ा बनाने का संकल्प घड़ा बन जाने पर मिट जाता है, वैसे ही धर्म को उन्नति का मूल मानने वाली प्रेरणा मोक्ष-अभिलाषी में नहीं रहती। उन्होंने मोक्ष के अनेक सूत्र क्रम से बताए, “क्षमा से क्रोध मिटाना चाहिए, संकल्प छोड़कर इच्छा को उखाड़ना चाहिए। सत्त्वगुण से निद्रा को जीतना चाहिए। सावधानी से भय दूर करना चाहिए, आत्म-चिन्तन से श्वास को जीतना चाहिए। धैर्य से काम-द्वेष-लोभ हटाने चाहिए। सत्य के अध्ययन से भ्रम, अज्ञान और संशय मिटाने चाहिए। ज्ञान की खोज से असावधानी और निरर्थक जिज्ञासा छोड़नी चाहिए। मिताहार से रोग दूर करने चाहिए। सन्तोष से लोभ और मूढ़ता मिटानी चाहिए। करुणा से अधर्म को जीतना चाहिए। सब प्राणियों के प्रति सम-दृष्टि से धर्म अर्जित करना चाहिए। यह विचार करके कि सब क्षणिक है, स्नेह त्यागना चाहिए। योग से भूख को जीतना चाहिए। उद्यम से आलस्य, और निश्चय से संशय को जीतना चाहिए।”
भीष्म ने आगे कहा, “वाणी और मन को बुद्धि से वश में करना चाहिए, और बुद्धि को ज्ञान-नेत्र से। ज्ञान को आत्म-ज्ञान से, और अन्तत: आत्मा को आत्मा से वश में करना चाहिए। यह अन्तिम वही पाते हैं जो शुद्ध-कर्मा और शान्त-आत्मा हैं। काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा, इन पाँच योग-विघ्नों को जीतकर, वाणी को संयमित करके, चिन्तन, अध्ययन, दान, सत्य, विनय, सरलता, क्षमा, हृदय-शुद्धि, आहार-शुद्धि और इन्द्रिय-निग्रह का अभ्यास करना चाहिए। इन्हीं से तेज बढ़ता है, पाप मिटते हैं, और ज्ञान मिलता है। अज्ञान का त्याग, अनासक्ति, काम-क्रोध से मुक्ति, योग से प्राप्त शक्ति, गर्व का अभाव, चिन्ता से मुक्ति, और घर-परिवार जैसे बन्धनों से अनासक्ति, यही मोक्ष का मार्ग है। वह मार्ग आनन्दमय, निर्मल और शुद्ध है।”
समझने की कुंजी (आत्मा को आत्मा से वश में करना): यह श्रृंखला गीता के “उद्धरेदात्मनात्मानम्” से मिलती-जुलती है। इन्द्रियाँ मन से, मन बुद्धि से, बुद्धि ज्ञान से वश में होती है, और अन्त में शुद्ध आत्मा ही अहंकार-ग्रस्त आत्मा को वश में करती है। पाँच योग-विघ्न = काम, क्रोध, लोभ, भय, निद्रा।
सार: मोक्ष का एक ही मार्ग है, और वह क्रमबद्ध आत्म-विजय है, जहाँ प्रत्येक दोष का विरोधी गुण उसे जीतता है। यही भीष्म के मोक्ष-धर्म के सूत्र हैं।
नारद और असित-देवल का संवाद, सांख्य की सृष्टि-रचना और जीव का स्वरूप
भीष्म ने नारद और असित-देवल के संवाद का स्मरण कराया। नारद ने वृद्ध देवल से पूछा, “हे ब्राह्मण, चर-अचर का यह ब्रह्माण्ड कहाँ से रचा गया? सर्व-विनाश कब आता है, और किसमें यह विलीन होता है?”
असित ने उत्तर दिया, “जिनसे परम-आत्मा अस्तित्व की इच्छा से अनेक रूपों में सब प्राणियों को रचता है, वे पाँच महाभूत कहलाते हैं। फिर बुद्धि से प्रेरित काल उन पाँच मूल तत्त्वों से अन्य वस्तुएँ रचता है। जो इनके अतिरिक्त किसी और के अस्तित्व का दावा करे, उसका कथन व्यर्थ है। ये पाँच, अर्थात जल, आकाश, पृथ्वी, वायु और तेज, शाश्वत हैं, अविनाशी, आदि-अन्त-रहित। काल को छठा मानने पर ये स्वभावत: महान शक्ति वाले हैं।”
असित ने आठ शाश्वत तत्त्व गिनाए जो सब प्राणियों के जन्म-मरण के कारण हैं, अर्थात पाँच भूत, काल (या जीव), कर्मों की वासना, और अज्ञान। जब प्राणी नष्ट होते हैं तो इन्हीं में लीन होते हैं, और जब जन्म लेते हैं तो इन्हीं से। शरीर पृथ्वी से बना, कान आकाश से, नेत्र तेज से, प्राण-गति वायु से, और रक्त जल से। दो नेत्र, नासिका, दो कान, त्वचा और जिह्वा, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। रूप, गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द, ये पाँच विषय इन पाँच इन्द्रियों से पाँच प्रकार से ग्रहण होते हैं। पर वस्तुत: ये विषय इन्द्रियों से नहीं; आत्मा से इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण होते हैं, क्योंकि इन्द्रियाँ जड़ हैं।
असित ने अन्त:करण की श्रेणी बताई, “इन्द्रिय-समूह से चित्त श्रेष्ठ है, चित्त से मन, मन से बुद्धि, और बुद्धि से क्षेत्रज्ञ। पहले प्राणी इन्द्रियों से विषयों को देखता है, फिर मन से उन पर विचार करता है, फिर बुद्धि से निश्चय पाता है।” उन्होंने ज्ञान के आठ अंग गिनाए, अर्थात पाँच इन्द्रियाँ, चित्त, मन और बुद्धि। फिर पाँच कर्मेन्द्रियाँ, अर्थात हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय और मुख, और छठा कर्म-अंग, अर्थात पेशीय शक्ति।
असित ने जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की व्याख्या की। उन्होंने सत्रह की संख्या बताई, अर्थात पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पेशीय-शक्ति, मन, बुद्धि, चित्त, और सत्त्व-रजस्-तमस तीन गुण। अठारहवाँ वह है जो शरीर का स्वामी है, अर्थात देही। अविद्या को जोड़कर ये अठारह, देही के साथ, और उदर-अग्नि को बीसवाँ मानकर, “पंचक का संयोग” कहलाते हैं। एक ‘महत्’ नामक तत्त्व है जो प्राण-वायु की सहायता से इस बीस वस्तुओं वाले संयोग को धारता है।
असित ने कहा, “जो भी प्राणी जन्म लेता है, अपने पुण्य-पाप क्षीण होने पर पुन: पाँच तत्त्वों में लीन हो जाता है, और उसी जीवन के पुण्य-पाप से प्रेरित होकर कर्म-जनित दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। अविद्या, इच्छा और कर्म से उसके निवास बनते हैं, और वह एक के बाद एक शरीर त्यागते हुए, काल से प्रेरित होकर, घर-दर-घर बदलने वाले की भाँति भटकता है। बुद्धिमान इस भटकाव को देखकर शोक नहीं करते। यह जीव न किसी का सम्बन्धी है, न उसका कोई। वह सदा अकेला है, और स्वयं ही अपना शरीर और अपना सुख-दु:ख रचता है। यह जीव न कभी जन्म लेता है न मरता है। शरीर के बन्धन से मुक्त होकर वह कभी परम गति पाता है।”
समझने की कुंजी (सांख्य की गणना): असित-देवल यहाँ सांख्य-दर्शन का ढाँचा देते हैं। पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) + काल + वासना + अविद्या = आठ कारण। अन्त:करण की सीढ़ी इन्द्रिय → चित्त → मन → बुद्धि → क्षेत्रज्ञ (आत्मा)। देही (शरीर का स्वामी) इन सब से परे है। यह “पंचक का संयोग” शरीर की संरचना का सांख्यिक चित्र है।
सार: सृष्टि पाँच महाभूतों और काल से रची जाती है। जीव इनसे भिन्न, अजन्मा, अमर है, जो कर्म-वासना से शरीर-दर-शरीर भटकता है। ज्ञान से ही पुण्य-पाप क्षीण होते हैं और जीव ब्रह्म को पाता है।
विदेहराज और माण्डव्य, धन-तृष्णा कैसे शान्त हो

युधिष्ठिर ने आर्त होकर कहा, “हम कितने क्रूर और पापी हैं, हमने भाइयों, पितरों, पौत्रों, बन्धुओं, मित्रों और पुत्रों का वध किया। हे पितामह, इस धन-तृष्णा को हम कैसे मिटाएँ, जिसके कारण हमने इतने पाप किए?”
भीष्म ने विदेहराज और जिज्ञासु माण्डव्य का संवाद सुनाया। विदेहराज ने कहा, “मेरे पास इस संसार में कुछ नहीं, फिर भी मैं महान सुख से जीता हूँ। यदि मेरी समस्त मिथिला आग में जल जाए, तो मेरा कुछ नहीं जलेगा। मूल्यवान वस्तुएँ ज्ञानी के लिए शोक का स्रोत हैं, जबकि अल्प-मूल्य की वस्तुएँ भी मूर्ख को मोहती हैं।” उन्होंने कहा कि इच्छा-पूर्ति का सब सुख और स्वर्ग का सुख भी, इच्छा के पूर्ण लोप से मिलने वाले आनन्द के सोलहवें अंश के बराबर नहीं। “जैसे गौ के बढ़ने के साथ उसके सींग बढ़ते हैं, वैसे ही धन की प्राप्ति के साथ धन की तृष्णा बढ़ती है।”
विदेहराज ने कहा, “जिस वस्तु से आसक्ति हो, वही खोने पर पीड़ा का स्रोत बनती है। इच्छा का पोषण नहीं करना चाहिए। धन मिले, तो उसे धर्म में लगाना चाहिए, और तब भी इच्छा त्याग देनी चाहिए। ज्ञानी सब प्राणियों को अपने समान देखता है। सत्य और असत्य, शोक और हर्ष, प्रिय और अप्रिय, भय और निर्भयता को त्यागकर मनुष्य शान्ति पाता है। वह तृष्णा, जिसे मूर्ख त्याग नहीं पाते, जो शरीर के क्षीण होने पर भी क्षीण नहीं होती, जिसे ज्ञानी घातक रोग मानते हैं, उसे त्यागने वाला सुख पाता है।” यह सुनकर ब्राह्मण माण्डव्य आनन्द से भर गया और मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ा।
सार: धन-तृष्णा घातक रोग है जो प्राप्ति से बढ़ती है। इच्छा का पूर्ण लोप ही परम सुख है, स्वर्ग-सुख से भी सोलह गुना बढ़कर। विदेहराज की “मिथिला जले तो मेरा कुछ नहीं जलता” वाली अनासक्ति युधिष्ठिर के शोक का उत्तर है।
पिता और पुत्र मेधावी का संवाद, मृत्यु की चेतावनी
युधिष्ठिर ने पूछा, “काल, जो सब प्राणियों के लिए भयकारी है, अपनी गति चला रहा है। वह कल्याण-स्रोत क्या है जिसके पीछे यत्न करना चाहिए?”
भीष्म ने एक पिता और पुत्र का संवाद सुनाया। एक केवल वेद-अध्ययन में लगे ब्राह्मण का अत्यन्त बुद्धिमान पुत्र मेधावी मोक्ष-धर्म का ज्ञाता था। उसने अपने पिता से पूछा, “हे पिताजी, जब मनुष्य का आयु-काल तेजी से बीत रहा है, तब बुद्धिमान को क्या करना चाहिए?” पिता ने कहा, “ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेद पढ़कर, फिर पितरों के उद्धार हेतु सन्तान की इच्छा करे, अग्नि स्थापित कर यज्ञ करे, फिर वन में जाकर मुनि बने।”
पुत्र ने कहा, “जब संसार चारों ओर से घेरा जा रहा है और अप्रतिरोध्य वज्र हर दिशा में गिर रहे हैं, तब आप इतने शान्त कैसे बोल सकते हैं?” पिता ने चकित होकर पूछा कि वे कौन-से वज्र हैं। पुत्र ने कहा, “संसार मृत्यु से घेरा जा रहा है, जरा से घिरा है। दिन और रात निरन्तर वज्रों की भाँति गिर रहे हैं। आप इन पर ध्यान क्यों नहीं देते? जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नहीं करती; बिना सूचना के सबको छीन ले जाती है, तो मैं अज्ञान के आवरण में लिपटा कैसे प्रतीक्षा करूँ?”
मेधावी ने कहा, “जब हर रात बीतने के साथ आयु क्षीण होती है, जब हमारी स्थिति छिछले जल में मछली-सी है, तब कौन सुखी हो सकता है? मृत्यु मनुष्य को उसके कार्यों के बीच ही, लक्ष्य-प्राप्ति से पहले ही, फूल चुनते हुए असावधान की भाँति दबोच लेती है। जो कल करना हो, उसे आज कर लेना चाहिए। जो दोपहर के लिए सोचा हो, उसे प्रात: कर लेना चाहिए। मृत्यु यह नहीं देखती कि मनुष्य ने कर्म किया या नहीं। कौन जानता है कि मृत्यु आज ही न आ जाए?”
मेधावी ने मृत्यु के अनेक उपमान दिए, “जैसे बाघ सोते हिरन को उठा ले जाता है, वैसे ही पुत्रों-पशुओं में आसक्त मन वाले को मृत्यु पकड़ ले जाती है। जैसे भेड़िया भेड़ को, वैसे भोग में अतृप्त मनुष्य को मृत्यु ले उड़ती है। ‘यह हो गया’, ‘यह करना शेष है’, ‘यह आधा हुआ’, कहते हुए ही मृत्यु दबोच लेती है।” उसने कहा कि मृत्यु की सेना के विरुद्ध एक ही वस्तु टिकती है, अर्थात सत्य का बल, क्योंकि सत्य में ही अमरत्व बसता है। “मनुष्यों के बीच रहने का सुख मृत्यु का आवास है। श्रुति कहती है कि वन ही देवों का गोचर है, जबकि लोगों के बीच रहने का सुख बन्धन की रस्सी है। धार्मिक उसे काट निकल भागते हैं, पापी नहीं काट पाते।”
मेधावी ने कहा, “मैं काम-क्रोध से परे होकर, हिंसा से बचकर, सत्य अपनाकर, अमर की भाँति मृत्यु से बचूँगा। मैं वाणी, मन और कर्म के यज्ञ करूँगा जब सूर्य उत्तरायण में हो। मुझ-जैसा कैसे क्रूरता-भरा पशु-यज्ञ करे? ज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं, ज्ञान के समान कोई पुरस्कार नहीं, आसक्ति के समान कोई शोक नहीं, और त्याग के समान कोई सुख नहीं। मुझे न धन की आवश्यकता, न सम्बन्धियों की, न पत्नी की। आप ब्राह्मण हैं और आपको मृत्यु से सामना करना है। गुफा में छिपी अपनी आत्मा को खोजिए। आपके पितामह कहाँ गए, और आपके पिता कहाँ?” भीष्म ने कहा कि यह सुनकर पिता ने वैसा ही आचरण किया।
समझने की कुंजी (आत्म-यज्ञ, उत्तरायण): मेधावी जिस “आत्म-यज्ञ” की बात करता है, वह बाह्य पशु-यज्ञ के विपरीत आन्तरिक यज्ञ है, अर्थात वाणी, मन और कर्म का संयम। उत्तरायण सूर्य की उत्तर-दिशा यात्रा का काल है, जिसे शुभ और मुक्ति-अनुकूल माना जाता है (वही जिसकी प्रतीक्षा भीष्म स्वयं कर रहे थे)।
सार: मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती, इसलिए धर्म युवावस्था में ही आरम्भ करना चाहिए, टालना नहीं चाहिए। सत्य ही मृत्यु पर विजय है, और आत्म-यज्ञ ही सच्चा यज्ञ है। पुत्र की चेतावनी ने पिता को भी मार्ग दिखाया।
संन्यासी के आचरण के नियम, हारीत का मार्ग
युधिष्ठिर ने पूछा कि उस अपरिवर्तनीय ब्रह्म-स्थान को, जो प्रकृति से परे है, पाने के लिए मनुष्य का आचरण, कर्म, ज्ञान और निष्ठा कैसी हो। भीष्म ने उत्तर दिया कि जो मोक्ष-धर्म में लीन, मिताहारी और इन्द्रिय-जयी है, वही उस परम स्थान को पाता है। घर त्यागकर, लाभ-हानि को समान देखकर, इन्द्रियों को रोककर, और भोग सामने आने पर भी उनकी उपेक्षा करके मनुष्य संन्यास-जीवन अपनाए।
भीष्म ने संन्यासी के विस्तृत नियम बताए, “न नेत्र से, न वचन से, न विचार से किसी की निन्दा करे। किसी की बुराई न कहे, सामने हो या न हो। किसी प्राणी को न सताए, और सूर्य की गति का अनुसरण करे। किसी से अमित्र-भाव न रखे, अपमान-भरे वचनों की उपेक्षा करे, और अहंकार से स्वयं को किसी से श्रेष्ठ न माने। दूसरा क्रोध दिलाने का यत्न करे तो भी प्रिय वचन कहे। निन्दा होने पर निन्दा न लौटाए। भिक्षा के लिए कई घरों के चक्कर न लगाए, न पूर्व-निमन्त्रण पर किसी घर जाए।”
भीष्म ने कहा कि संन्यासी गृहस्थ के घर तब भिक्षा माँगे जब धुआँ उठना बन्द हो, मूसल की ध्वनि शान्त हो, चूल्हे की आग बुझ गई हो, और सब निवासी भोजन कर चुके हों। वह केवल इतना ही ले जितना प्राण-रक्षा के लिए चाहिए। न मिले तो असन्तोष न करे, मिले तो हर्ष न करे। न भोजन में दोष ढूँढे (बासी आदि कहकर), न उसकी प्रशंसा करे। वह सूना घर, वृक्ष-मूल, वन या गुफा को शय्या-आसन के लिए चुने। योग से जुड़कर और संगति से अलग होकर, वह सम और स्थिर रहे। न कर्म से पुण्य कमाए न पाप।
भीष्म ने कहा कि संन्यासी सदा सन्तुष्ट, प्रसन्न-मुख, निर्भय, मन्त्र-जप में लीन, मौन और त्याग-निष्ठ रहे। अपने शरीर के बार-बार बनने-बिगड़ने और अन्य प्राणियों के आने-जाने को देखकर वह इच्छा-मुक्त हो और सब पर समदृष्टि रखे। वह वाणी, मन, क्रोध, ईर्ष्या, भूख और काम के वेगों को रोके। निन्दा को हृदय में स्थान न दे। सब प्राणियों के प्रति तटस्थ होकर, प्रशंसा-निन्दा को समान मानकर रहे। यही संन्यास का परम पवित्र मार्ग है। “वह उन स्थानों को न जाए जो उसने पूर्व आश्रमों में देखे हों, न उन मनुष्यों के पास जिन्हें जानता हो। बिना स्थिर घर के, सब प्राणियों के प्रिय होकर, वह आत्म-चिन्तन में लीन रहे।” ऋषि हारीत ने इसी को मोक्ष का मार्ग बताया।
सार: संन्यासी का आचरण निन्दा-रहित, सम-दृष्टि, अनासक्त और मौन हो। वह भिक्षा तब ले जब गृहस्थ भोजन कर चुके हों, बिना हर्ष-शोक के, बिना भोजन की प्रशंसा-निन्दा के। हारीत-मार्ग यही है। यहाँ आपद्-धर्म से मोक्ष-धर्म की ओर पूर्ण संक्रमण हो चुका है।
वृत्र की कथा का आरम्भ, जीव के रंग और कर्म-फल
युधिष्ठिर ने व्यथा से कहा, “सब हमें भाग्यशाली कहते हैं, पर सचमुच हमसे अधिक दु:खी कोई नहीं। देवताओं से उत्पन्न होकर भी, जब इतना शोक हमारे भाग्य में आया, तो लगता है कि देह-धारण में जन्म ही सब शोक का मूल है। हम कब त्याग-जीवन अपनाएँगे? और हमारी अन्तिम गति क्या होगी?”
भीष्म ने कहा, “हर वस्तु का अन्त है, हर वस्तु की सीमा है। यहाँ तक कि पुनर्जन्म का भी अन्त है। आप सोचते हैं कि यह समृद्धि दोष है। आप धर्म-ज्ञ हैं, इसलिए निश्चय ही समय पर आप शोक के अन्त, अर्थात मोक्ष को पाएँगे।” फिर भीष्म ने कहा कि देह-युक्त जीव अपने पुण्य-पाप का कर्ता नहीं; अज्ञान के अन्धकार से ढका रहता है। उन्होंने उपमा दी कि जैसे सुरमे की धूल से युक्त वायु, स्वयं रंग-हीन होकर भी, मनशिल के कणों को उठाकर दिशाओं को रंग देती है, वैसे ही रंग-हीन जीव अज्ञान से ढककर कर्म-फलों से रंग जाता है और शरीर-दर-शरीर भटकता है।
भीष्म ने दैत्यों के गुरु शुक्र द्वारा गाई कथा सुनाई, अर्थात जब वृत्र अपनी समस्त समृद्धि से वंचित हो गया, तब उसका आचरण कैसा रहा। राज्य छिनने पर भी, शत्रुओं के बीच, वह शोक में नहीं डूबा। उसके गुरु उशनस् (शुक्राचार्य) ने पूछा, “हे दानव, हार से आपको कोई शोक तो नहीं?” वृत्र ने कहा, “सत्य और तप के बल से सब प्राणियों के आने-जाने को समझकर मैंने शोक और हर्ष दोनों त्याग दिए हैं। काल से प्रेरित प्राणी असहाय होकर नरक में गिरते हैं, कुछ स्वर्ग जाते हैं। अपने पुण्य-पाप का कुछ अंश शेष रहने पर वे काल से प्रेरित होकर पुन: जन्म लेते हैं।”
उशनस् ने वृत्र से, जो सृष्टि के परम आश्रय की बात कर रहा था, पूछा कि वह ऐसी बातें क्यों कह रहा है। वृत्र ने अपनी कथा सुनाई कि उसने विजय के लोभ से कठोर तप किया था, अपने तेज से फूलकर तीनों लोकों को पीड़ित किया, आकाश में निर्भय विचरण किया, फिर अपने ही कर्मों से वह समृद्धि खोई। पर वह शोक नहीं करता। उसने बताया कि इन्द्र से युद्ध की इच्छा में उसने उस परम पुरुष नारायण को देखा था, जो वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुञ्जकेश, हरिश्मश्रु और समस्त प्राणियों के पितामह कहलाते हैं। उस दर्शन-तप का कुछ फल अब भी शेष है, इसी से वह कर्म-फल के विषय में पूछना चाहता है, “किस वर्ग पर ब्रह्म-समृद्धि टिकी है? वह कैसे घटती है? प्राणी किससे उपजते और जीते हैं? वह परम फल क्या है, जिसे पाकर जीव ब्रह्म रूप में शाश्वत जीता है?”
एक उप-कथा: वृत्र, जो परम्परा में इन्द्र का दानव-शत्रु है, यहाँ एक विरक्त ज्ञानी के रूप में प्रकट होता है। पराजय और राज्य-विनाश में भी उसकी समता दिखाती है कि महाभारत अपने “खलनायकों” को भी एकरंगा नहीं बनाता। वृत्र की विष्णु-भक्ति और मृत्यु-काल का उसका वैराग्य इस पूरे प्रसंग की धुरी है।
तब उशनस् ने वृत्र को विष्णु की परम महिमा सुनानी आरम्भ की। इसी बीच ऋषि सनत्कुमार उनके संशय मिटाने आ पहुँचे। उशनस् ने उनसे प्रार्थना की कि वे दानव-राज को विष्णु की परम महिमा सुनाएँ।
समझने की कुंजी (वृत्र, उशनस्, सनत्कुमार): वृत्र = इन्द्र का प्रसिद्ध असुर-शत्रु, यहाँ विष्णु-भक्त ज्ञानी। उशनस् = शुक्राचार्य, दैत्यों के गुरु। सनत्कुमार = ब्रह्मा के मानस-पुत्र, परम ज्ञानी ऋषि। वृत्र का यह प्रश्न कि “जीव की अन्तिम गति क्या है” वस्तुत: युधिष्ठिर के अपने प्रश्न का दर्पण है।
सार: जीव स्वयं रंग-हीन है, पर अज्ञान और कर्म-फल से रंग जाता है। वृत्र पराजय में भी समता रखता है, क्योंकि उसने सत्य और तप से जन्म-मृत्यु के चक्र को समझ लिया है। उसका प्रश्न मोक्ष-धर्म का अगला सूत्र खोलता है।
सनत्कुमार का विष्णु-माहात्म्य, जीव के छह रंग और मोक्ष का क्रम
सनत्कुमार ने दानव-राज से कहा, “हे दैत्य, सुनिए। समस्त ब्रह्माण्ड विष्णु पर टिका है। वही चर-अचर सब प्राणियों को रचते हैं, काल में सबको समेटते हैं, और काल में पुन: प्रकट करते हैं। हरि में सब प्रलय-काल में लीन होते हैं और उन्हीं से पुन: निकलते हैं। उन्हें न शास्त्र-ज्ञान से, न तप से, न यज्ञ से पाया जा सकता है। उन्हें पाने का एक ही उपाय है, इन्द्रिय-निग्रह। पर यज्ञ पूर्णत: व्यर्थ भी नहीं, क्योंकि बाह्य-आन्तरिक कर्मों और अपने मन पर निर्भर रहकर मनुष्य अपनी बुद्धि से उन्हें शुद्ध कर सकता है।”
सनत्कुमार ने उपमाएँ दीं, “जैसे सुनार बार-बार आग में डालकर धातु का मैल साफ करता है, वैसे ही जीव सैकड़ों जन्मों की यात्रा से स्वयं को शुद्ध करता है। कोई एक ही जन्म में महान यत्न से शुद्ध हो जाता है। जैसे तिल के कुछ ही फूलों से सुगन्धित नहीं होते, पर बहुत फूलों से बार-बार सुवासित किए जाने पर अपनी गन्ध छोड़कर फूलों की गन्ध ले लेते हैं, वैसे ही दोष अनेक जन्मों में सत्त्व-गुण की बड़ी मात्रा और अभ्यास से मिटते हैं।”
सनत्कुमार ने विष्णु के विराट रूप का वर्णन किया, “पृथ्वी उनके चरण हैं, स्वर्ग उनका मस्तक, दिशाएँ उनकी भुजाएँ, अन्तरिक्ष उनके कान, सूर्य उनके नेत्र का प्रकाश, चन्द्रमा में उनका मन, जल में उनकी जिह्वा। ग्रह उनकी भौंहों के बीच, तारे-नक्षत्र उनके नेत्र-प्रकाश से। वे सत्त्व-रजस्-तमस के स्वामी हैं, सब आश्रमों के फल हैं, सब कर्मों के फल हैं। वे ब्रह्म हैं, परम धर्म हैं, सत् हैं और असत् हैं। वे ही मित्र, वरुण, यम और कुबेर हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही दिव्य सत्ता के वश में है।”
सनत्कुमार ने कल्प का परिमाण बताया कि एक सृष्टि के अस्तित्व का काल कल्प कहलाता है, और जीव अरबों कल्पों तक रहते हैं। फिर उन्होंने एक सृष्टि-काल को अनेक सरोवरों की उपमा से समझाया, “एक योजन चौड़ा, एक क्रोश गहरा, और पाँच सौ योजन लम्बा सरोवर सोचिए। ऐसे हजारों सरोवर सोचिए। अब इन्हें केवल दिन में एक बार, एक बाल की नोक भर जल लेकर सुखाने लगिए। उन्हें पूर्णत: सुखाने में जितने दिन लगेंगे, उतना ही एक सृष्टि का जीवन-काल है।”
सनत्कुमार ने जीव के छह रंग बताए, “परम प्रमाण कहता है कि प्राणियों के छह रंग हैं, अर्थात कृष्ण (काला), धूम्र (तामड़ा), नील, रक्त (लाल), पीत (पीला) और श्वेत। ये रंग सत्त्व-रजस्-तमस के विविध अनुपातों के मिश्रण से बनते हैं।” उन्होंने प्रत्येक रंग का गुण-अनुपात समझाया, “जहाँ तमस अधिक, सत्त्व कम और रजस् मध्यम हो, वहाँ कृष्ण रंग। श्वेत रंग सर्व-श्रेष्ठ है, राग-द्वेष से मुक्त होने के कारण निष्पाप, शोक-रहित। इसलिए श्वेत रंग मोक्ष की ओर ले जाता है। जीव हजारों गर्भज जन्मों के बाद सिद्धि पाता है।”
सनत्कुमार ने कहा कि जीव की गति उसके रंग पर निर्भर है, और रंग काल के स्वभाव पर। जीव के जन्म-स्तर अनगिनत नहीं; चौदह लाख हैं, जिनके कारण जीव ऊपर चढ़ता, ठहरता या गिरता है। उन्होंने वर्णन किया कि कृष्ण-नील रंग का जीव नरक में सड़ता है, फिर धूम्र रंग पाकर मध्यवर्ती प्राणी बनता है, फिर सत्त्व बढ़ने पर रक्त रंग पाता है, फिर पीत (देवता) बनता है, और अन्त में श्वेत रंग पाकर मुक्ति के निकट पहुँचता है। मोक्ष की इच्छा वाला जीव सात सौ प्रकार के सत्त्व-प्रधान कर्मों के आश्रय से रक्त और पीत से होकर श्वेत तक पहुँचता है, और तब उस निर्मल, तेजस्वी, मोक्ष-स्वरूप अवस्था को पाता है।
सनत्कुमार ने तुरीय अवस्था बताई, अर्थात वह अवस्था जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों से परे है, जो श्वेत-वर्ण जीव का परम लक्ष्य है। उन्होंने सात (पाँच इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) के योग-ज्ञान से दमन और उनके त्याग का वर्णन किया, जिससे जीव अविनाशी, अनन्त अवस्था पाता है, जिसे कोई महादेव का, कोई विष्णु का, कोई ब्रह्मा का, कोई शेष, नर, चित् या सर्व-व्यापी का स्थान कहते हैं। “जो ज्ञान से अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को पूर्णत: जला देते हैं, वे प्रलय-काल में ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार, हे महान दानव, मैंने आपको नारायण की महिमा सुनाई।”
वृत्र ने कहा, “आपके ये वचन सत्य के पूर्ण अनुकूल हैं। इन्हें सुनकर मैं हर प्रकार के शोक और पाप से मुक्त हो गया। हे ऋषि, मैं देख रहा हूँ कि परम-तेजस्वी अनन्त विष्णु का यह काल-चक्र महान ऊर्जा से घूम रहा है। वही विष्णु परम-आत्मा हैं, सब प्राणियों में अग्रणी, जिनमें यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड टिका है।” भीष्म ने कहा, “यह कहकर, हे कुन्ती-पुत्र, वृत्र ने अपने प्राण त्याग दिए, अपनी आत्मा को परम-आत्मा में योग द्वारा मिलाकर, और परम स्थान पाया।”
युधिष्ठिर ने पूछा कि क्या यही जनार्दन (कृष्ण) वह परम पुरुष हैं जिनके विषय में सनत्कुमार ने वृत्र को कहा। भीष्म ने उत्तर दिया, “परम देवता, जो छह गुणों से युक्त हैं, मूल में स्थित हैं। वहाँ रहकर परम-आत्मा अपनी शक्ति से ये सब विविध वस्तुएँ रचते हैं। जान लो कि यह अविनाशी केशव उनके आठवें अंश से हैं। केशव अपने आठवें अंश से तीनों लोक रचते हैं। मूल में स्थित वही परम सत्ता प्रलय-काल में जल में लेटती है, सब वस्तुओं के सम्भावित बीज रूप में।”
तब युधिष्ठिर ने आशंका से पूछा कि वृत्र तो श्वेत-वर्ण, शुद्ध कुल का था, फिर भी मुक्त हुआ। पर हम तो शोक, उदासीनता और हर्ष देने वाली वस्तुओं में आसक्त और दु:खी हैं। हमारी अन्तिम गति क्या होगी, नील या कृष्ण? भीष्म ने आश्वासन दिया, “आप पाण्डव हैं, निर्मल कुल में जन्मे, कठोर व्रत वाले। देवलोकों में सुख भोगकर आप मनुष्य-लोक लौटेंगे, और अगली सृष्टि में देवताओं में गिने जाएँगे, और अन्त में सिद्धों में। कोई भय न कीजिए, प्रसन्न रहिए।”
समझने की कुंजी (छह वर्ण, तुरीय, कल्प): यहाँ “वर्ण” का अर्थ जाति नहीं; जीव का आन्तरिक रंग है, जो उसके गुण-अनुपात (सत्त्व-रजस्-तमस) से बनता है। कृष्ण नीचतम, श्वेत परम। तुरीय = “चौथी” अवस्था, जो जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति से परे चेतना की परम अवस्था है (मांडूक्य उपनिषद का प्रसिद्ध सूत्र)। कल्प = एक सृष्टि का पूरा जीवन-काल, सरोवर-उपमा से उसकी अकल्पनीय लम्बाई दिखाई गई है।
सार: जीव अपने गुणों के अनुपात से छह रंगों में बँटता है, और सत्त्व-प्रधान कर्मों से धीरे-धीरे श्वेत तक चढ़कर मोक्ष पाता है। वृत्र, श्वेत-वर्ण होकर, विष्णु में लीन हुआ। भीष्म पाण्डवों को आश्वस्त करते हैं कि उनकी अन्तिम गति शुभ है।
वृत्र-वध की कथा, ज्वर का जन्म और इन्द्र की रक्षा

युधिष्ठिर ने पूछा, “वृत्र, जो धर्म-प्रेमी, विष्णु-भक्त और उपनिषद-वेदान्त के सत्य-ज्ञाता था, इन्द्र से कैसे पराजित हुआ? वह युद्ध कैसे हुआ, विस्तार से बताइए।”
भीष्म ने कहा कि इन्द्र देव-सेना सहित रथ पर निकले और वृत्र को पर्वत-सा खड़ा देखा। वह पाँच सौ योजन ऊँचा और तीन सौ योजन घेरे का था। तीनों लोकों से भी अजेय उस रूप को देखकर इन्द्र भय और चिन्ता से भर उठे, उनके पैर काँपने लगे। पर वृत्र को इन्द्र को देखकर न भय हुआ, न उत्साह, न युद्ध की तैयारी की इच्छा। तब दोनों ओर शंख-नगाड़े बजे, और देवों-असुरों में घोर युद्ध हुआ। आकाश तलवारों, कुल्हाड़ियों, भालों, गदाओं, शिलाओं और दिव्यास्त्रों से ढक गया। ब्रह्मा सहित देवता, ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व और अप्सराएँ युद्ध देखने आए।
वृत्र ने आकाश और इन्द्र को शिला-वृष्टि से ढक दिया। देवताओं ने बाण-वर्षा से वह वृष्टि बिखेर दी। फिर वृत्र ने अपनी माया से इन्द्र को मोहित कर दिया। जब इन्द्र मूर्च्छित-से हो गए, तब ऋषि वसिष्ठ ने “सोमनस्” मन्त्र से उन्हें होश में लाया। वसिष्ठ ने कहा, “हे देवराज, आप देवताओं में अग्रणी हैं, तीनों लोकों का बल आप में है, फिर क्यों मलिन हो रहे हैं? वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सोम और परम ऋषि आपको देख रहे हैं। साधारण जन की भाँति दुर्बलता न दिखाइए। दृढ़ संकल्प से शत्रु का वध कीजिए।”
वसिष्ठ के वचनों से इन्द्र का बल बढ़ा। उन्होंने योग का आश्रय लेकर वृत्र की माया दूर की। फिर बृहस्पति और श्रेष्ठ ऋषि वृत्र का पराक्रम देखकर महादेव के पास गए और तीनों लोकों के हित हेतु उस असुर के संहार की प्रार्थना की। महादेव का तेज तब घोर ज्वर का रूप लेकर वृत्र की देह में प्रविष्ट हुआ। और विष्णु, ब्रह्माण्ड की रक्षा हेतु, इन्द्र के वज्र में प्रवेश कर गए। तब बृहस्पति, वसिष्ठ और ऋषियों ने इन्द्र से कहा, “हे पुरुष-श्रेष्ठ, बिना विलम्ब वृत्र का वध कीजिए।”
महेश्वर ने कहा, “हे शक्र, वहाँ महान वृत्र खड़ा है, ब्रह्माण्ड की आत्मा, सर्वत्र जाने में समर्थ, महान माया वाला। उसने साठ हजार वर्ष कठोर तप करके ब्रह्मा से योगियों की महिमा, महान माया, अति-बल और अति-तेज के वर पाए हैं। मैं आपको अपना तेज देता हूँ। अब उस दानव में शीतलता नहीं रही, उसे अपने वज्र से मारिए।” इन्द्र ने कहा, “हे देव-श्रेष्ठ, आपकी कृपा से, आपके सामने, मैं इस अजेय दिति-पुत्र का अपने वज्र से वध करूँगा।”
भीष्म ने कहा कि जब वह महान असुर उस ज्वर से ग्रस्त हुआ, तब देव-ऋषि हर्षित होकर जयघोष करने लगे, सहस्रों नगाड़े-शंख बजे। असुर अचानक स्मृति-लोप से ग्रस्त हो गए, उनकी माया विलीन हो गई। ज्वर से ग्रस्त वृत्र जँभाई लेने लगा और अमानवीय चीखें भरने लगा। जैसे ही वह जँभाई ले रहा था, इन्द्र ने वज्र फेंका। युग-अन्त की प्रलयाग्नि-सा वह वज्र क्षण में विशाल वृत्र को गिरा गया। देवताओं ने पुन: जयघोष किया। विष्णु से व्याप्त उस वज्र को लेकर इन्द्र स्वर्ग को चले।
पर तभी मारे गए वृत्र की देह से ब्रह्म-हत्या (ब्रह्मण-वध का पाप) मूर्तिमान होकर निकली, घोर, भयानक, कुरूप, काली-तामड़ी, बिखरे केशों वाली, भयंकर नेत्रों वाली, खोपड़ियों की माला पहने, रक्त से सनी, चिथड़ों और वल्कलों में लिपटी। वह इन्द्र को पकड़ने दौड़ी, और जब इन्द्र स्वर्ग जा रहे थे, तो उसने उन्हें जा पकड़ा और उसी क्षण से चिपक गई। भयभीत इन्द्र कमल-नाल के रेशों में वर्षों छिपे रहे, पर ब्रह्म-हत्या ने पीछा न छोड़ा। उससे ग्रस्त इन्द्र समस्त तेज खो बैठे। अन्तत: वे ब्रह्मा के पास गए।
ब्रह्मा ने ब्रह्म-हत्या को मधुर वचनों से शान्त किया, “हे सुन्दरी, मेरे प्रिय देवराज को छोड़ दीजिए। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?” ब्रह्म-हत्या ने कहा, “जब तीनों लोकों के रचयिता मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी इच्छाएँ पूरी हुईं। अब मेरा निवास नियत कीजिए।” ब्रह्मा ने “तथास्तु” कहा, और इन्द्र से उसे हटाने का उपाय खोजा। उन्होंने अग्नि को स्मरण किया और कहा, “मैं इस ब्रह्म-हत्या को कई भागों में बाँटूँगा। शक्र को मुक्त करने के लिए आप इसका चौथाई भाग लीजिए।” अग्नि ने अपनी मुक्ति का उपाय पूछा। ब्रह्मा ने कहा, “जो मनुष्य तमोगुण से ग्रस्त होकर आपको प्रज्वलित रूप में देखकर भी बीज, औषधि और रस की आहुति न दे, उसी में आपका वह भाग चला जाएगा।”
इसी प्रकार ब्रह्मा ने वृक्षों-औषधियों-घासों से चौथाई लेने को कहा, और उनकी मुक्ति यह बताई कि जो मूढ़ पर्व-दिनों में उन्हें काटे, वह पाप उसी में जाएगा। फिर अप्सराओं ने चौथाई लिया, और उनका भाग उस मनुष्य में जाने को नियत हुआ जो ऋतु-काल में स्त्री से संगम करे। अन्त में जल ने चौथाई लिया, और उनका भाग उस मनुष्य में जाने को नियत हुआ जो उनमें कफ, मूत्र और मल डाले। इस प्रकार ब्रह्म-हत्या इन्द्र को छोड़कर अपने नियत निवासों को चली गई। ब्रह्मा की अनुमति से इन्द्र ने अश्वमेध यज्ञ करके स्वयं को शुद्ध किया, और अपनी समृद्धि पुन: पाई।
भीष्म ने कहा कि वृत्र के रक्त से ऊँची-कलगी वाले मुर्गे उपजे, इसी से वे पक्षी द्विजों और दीक्षित तपस्वियों के लिए अभक्ष्य हैं। उन्होंने कहा, “हे कुन्ती-पुत्र, आप भी इस पृथ्वी पर अजेय होकर दूसरे इन्द्र और शत्रु-संहारक बनेंगे। जो हर पर्व-दिन ब्राह्मणों के बीच वृत्र की यह पवित्र कथा सुनाएँगे, वे किसी पाप से कलंकित न होंगे।”
समझने की कुंजी (ब्रह्म-हत्या का बँटवारा): इन्द्र को वृत्र-वध से ब्रह्म-हत्या का पाप लगा, क्योंकि वृत्र ब्रह्म-ज्ञानी था। यह पाप मूर्तिमान देवी रूप में चित्रित है। ब्रह्मा उसे चार भागों में बाँटते हैं, अर्थात अग्नि (आहुति न देने वाले में), वृक्ष-औषधि (पर्व-दिन काटने वाले में), अप्सराएँ (अनुचित संगम करने वाले में), और जल (दूषित करने वाले में)। यह कथा अनेक लोक-निषेधों, अर्थात पर्व-दिन वृक्ष न काटना, जल को अपवित्र न करना, का पौराणिक मूल है।
सार: वृत्र अजेय था, पर महादेव-जनित ज्वर ने उसे ग्रस्त किया और जँभाई के क्षण इन्द्र ने वज्र से वध किया। वध का ब्रह्म-हत्या-पाप ब्रह्मा ने चार भागों में बाँटकर इन्द्र को मुक्त किया। यहाँ भी वृत्र की मृत्यु में उसकी विष्णु-भक्ति और गति की महिमा बनी रहती है।
ज्वर की उत्पत्ति, और दक्ष-यज्ञ का विध्वंस
युधिष्ठिर ने पूछा, “वह ज्वर कैसे उत्पन्न हुआ जिसने पहले वृत्र को मूर्च्छित किया? इसका मूल विस्तार से बताइए।”

भीष्म ने कहा कि प्राचीन काल में मेरु पर्वत का एक सावित्री नामक शिखर था, रत्नों से जड़ा, अपार विस्तार वाला, जहाँ कोई पहुँच न सकता था। उस शिखर पर महादेव स्वर्ण-शय्या-सी आसन पर शोभा पाते, और उनके पास पर्वत-राज की पुत्री (पार्वती) बैठी रहतीं। वसु, अश्विनीकुमार, यक्ष-राज वैश्रवण, उशनस्, सनत्कुमार आदि ऋषि, गन्धर्व विश्वावसु, नारद, पर्वत, अप्सराएँ, सब वहाँ महादेव की सेवा में आते। नन्दी लांछन-सी ज्वाला वाला भाला लिए खड़े रहते, और गंगा मूर्तिमान होकर सेवा करतीं।
कुछ काल बाद प्रजापति दक्ष ने प्राचीन वैदिक रीति से अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया। इन्द्र सहित सब देवता उसमें जाने को उद्यत हुए, और महादेव की अनुमति से रथों पर चढ़कर गंगा के उद्गम-स्थल की ओर चले। देवताओं को जाते देख पार्वती ने पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं। महेश्वर ने कहा कि दक्ष अश्वमेध में देवताओं की आराधना कर रहे हैं। पार्वती ने पूछा, “आप वहाँ क्यों नहीं जाते?” महेश्वर ने कहा, “हे देवी, पुराने समय में देवताओं ने ऐसी व्यवस्था की कि सब यज्ञों में मुझे कोई भाग न दिया जाए। उसी पुरानी रीति के अनुसार देवता मुझे यज्ञ-भाग नहीं देते।”
पार्वती ने कहा, “हे महादेव, सब प्राणियों में आप ही परम पराक्रमी हैं। पुण्य, तेज, यश और समृद्धि में आप किसी से न्यून नहीं; सब से ऊपर, परम हैं। फिर भी यज्ञ-भाग की इस वंचना से मैं महान शोक से भर गई हूँ, और मेरा सिर से पैर तक काँप उठा है।” यह कहकर देवी मौन हो गईं, हृदय शोक से जलता रहा। महादेव ने उनके मन की बात समझकर नन्दी से कहा, “आप देवी के पास ठहरिए।” फिर समस्त योग-बल समेटकर वह पिनाक-धारी महादेव अपने भयंकर अनुचरों सहित दक्ष के यज्ञ-स्थल पहुँचे और उस यज्ञ को विध्वंस कर दिया।
उनके अनुचरों ने भयानक कोलाहल किया, कुछ ने रक्त से यज्ञ-अग्नियाँ बुझाईं, कुछ ने यज्ञ-स्तम्भ उखाड़कर घुमाए, कुछ ने यज्ञ-कर्मियों को निगलना चाहा। तब वह यज्ञ मृग का रूप धरकर आकाश में भागने लगा। महादेव ने धनुष-बाण लेकर उसका पीछा किया। क्रोध से उनके ललाट पर एक भयंकर स्वेद-बिन्दु प्रकट हुआ, और जब वह बिन्दु पृथ्वी पर गिरा, तो युग-अन्त की प्रलयाग्नि-सी एक धधकती आग प्रकट हुई। उस आग से एक भयंकर प्राणी निकला, छोटे कद का, रक्त-नेत्रों और हरी दाढ़ी वाला, बाज या उल्लू-से रोमों से ढका, खड़े केशों वाला, श्याम वर्ण, रक्त-वस्त्र। वह यज्ञ की देह को निगल गया और देवताओं-ऋषियों की ओर दौड़ा। देवता भयभीत होकर भागे, उसके पाँव से पृथ्वी काँप उठी।
तब ब्रह्मा ने महादेव को प्रकट होकर कहा, “हे महादेव, अब से देवता आपको यज्ञ-भाग देंगे। अपने इस क्रोध को समेट लीजिए। हे शत्रु-दमन, यह प्राणी जो आपके स्वेद से उपजा है, यह ‘ज्वर’ नाम से प्राणियों के बीच विचरेगा। पर यदि इसका सारा तेज एक स्थान पर रहे, तो पृथ्वी इसे सह न सकेगी। इसे अनेक भागों में बाँट दीजिए।” महादेव ने “तथास्तु” कहकर अपना यज्ञ-भाग स्वीकार किया, और सब प्राणियों की शान्ति हेतु ज्वर को अनेक भागों में बाँटा।
भीष्म ने बताया कि महादेव ने ज्वर को इन रूपों में बाँटा, अर्थात हाथियों के सिर की गर्मी, पर्वतों का शिलाजीत, जल पर तैरती काई, साँपों की केंचुली, बैलों के खुरों के घाव, खारी बंजर भूमि, पशुओं की धुँधली दृष्टि, घोड़ों के गले के रोग, मोरों की कलगी, कोयल का नेत्र-रोग, भेड़ों का यकृत-रोग, तोतों की हिचकी, और बाघों की थकान। मनुष्यों में ज्वर जन्म, मृत्यु और अन्य अवसरों पर देह में प्रवेश करता है। यही ज्वर महेश्वर का भयंकर तेज है, और सबके द्वारा आदर-योग्य है। भीष्म ने कहा, “जो यह ज्वर-उत्पत्ति की कथा एकाग्र और प्रसन्न मन से पढ़ेगा, वह रोग-मुक्त होकर सुखी रहेगा।”
फिर जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा कि वैवस्वत मनु के युग में दक्ष का अश्वमेध कैसे नष्ट हुआ, और कैसे महादेव की कृपा से दक्ष ने यज्ञ के बिखरे अंग पुन: जोड़े। वैशम्पायन ने विस्तार से कहा कि दक्ष ने हिमवान के वक्ष पर, जहाँ गंगा निकलती है, यज्ञ किया। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस, हाहा-हूहू गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुत, सब इन्द्र के साथ आए।
उन्हें देख ऋषि दधीचि शोक-क्रोध से भर उठे और बोले, “यह न यज्ञ है न धर्म-कर्म, क्योंकि इसमें रुद्र की आराधना नहीं। आप सब मृत्यु और बन्धन को न्योत रहे हैं। काल की गति कितनी विषम है। भ्रम से ग्रस्त आप नहीं देखते कि विनाश आपके द्वार पर खड़ा है।” दधीचि ने योग-दृष्टि से भविष्य देखा। उन्होंने कहा, “जो पूज्य की पूजा न करके अपूज्य की पूजा करता है, वह सदा हत्या के पाप का भागी होता है। मैंने कभी असत्य नहीं कहा, न कहूँगा। देवों-ऋषियों के बीच सत्य कहता हूँ कि सब प्राणियों के रक्षक, ब्रह्माण्ड के रचयिता, सब के स्वामी शीघ्र इस यज्ञ में आएँगे।”
दक्ष ने कहा, “हमारे पास ग्यारह रुद्र हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, पर यह नया महेश्वर कौन है, यह नहीं जानता।” दधीचि ने कहा, “मुझे महेश्वर से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं दिखता, इसलिए मैं निश्चित हूँ कि दक्ष का यह यज्ञ विनाश को प्राप्त होगा।” इसी बीच पार्वती ने महादेव से पूछा कि किन व्रतों-तपों से उनके पति यज्ञ-भाग का आधा या तिहाई पा सकें। महादेव ने हँसते हुए कहा, “हे देवी, आप मुझे नहीं जानतीं। यज्ञों में स्तुति-गायक मुझे ही स्तुति देते हैं, सामगान-गायक मेरे ही रथन्तर गाते हैं, वेद-ज्ञ ब्राह्मण मेरे लिए ही यज्ञ करते हैं, और अध्वर्यु मुझे ही यज्ञ-भाग समर्पित करते हैं।”
देवी ने कहा कि साधारण लोग भी अपनी पत्नी के सामने आत्म-प्रशंसा करते हैं। महादेव ने कहा कि वे आत्म-प्रशंसा नहीं कर रहे; अब वे एक प्राणी रचकर उस यज्ञ का (जिसने देवी को रुष्ट किया) विध्वंस दिखाएँगे। उन्होंने अपने मुख से एक भयंकर प्राणी रचा, जिसकी देह से ज्वालाएँ निकलती थीं, अनेक भुजाओं में अस्त्र थे। उसने पूछा, “क्या आज्ञा है?” महादेव ने कहा, “जाइए, दक्ष के यज्ञ को नष्ट कीजिए।”
देवी का क्रोध दूर करने हेतु, उस सिंह-पराक्रमी प्राणी ने बिना पूरा बल लगाए और बिना सहायता के यज्ञ-विध्वंस का संकल्प किया। उमा ने स्वयं महाकाली रूप धरकर उस विध्वंस को अपनी आँखों देखने का निश्चय किया, क्योंकि वही विध्वंस तो उन्हीं का था। वह प्राणी, तेज-बल-रूप में महेश्वर-सा, “वीरभद्र” नाम से प्रसिद्ध हुआ, अर्थात देवी के क्रोध का निवारक। उसने अपने रोम-कूपों से “रौम्य” नामक भूत-प्रमुखों के दल रचे, जो वज्र-वेग से दक्ष के यज्ञ-स्थल की ओर दौड़े।
उन भयंकर भूत-गणों ने आकाश को चीखों से भर दिया, पर्वत फटे, पृथ्वी काँपी, बवण्डर चले, समुद्र उमड़ा, अग्नियाँ बुझ गईं, सूर्य मन्द पड़ा, ग्रह-तारे-चन्द्र निस्तेज हुए, और चारों ओर अन्धकार छा गया। रुष्ट रुद्र-गणों ने सब कुछ जला डाला, यज्ञ-स्तम्भ उखाड़े, यज्ञ-पात्र तोड़े। दूध, घृत और खीर की नदियाँ बहीं, गुड़ के सरोवर बने। अन्त में उन्होंने यज्ञ का सिर काटकर हर्ष-गर्जना की।
तब ब्रह्मा सहित देवता और दक्ष ने हाथ जोड़कर उस प्राणी से पूछा, “आप कौन हैं?” वीरभद्र ने कहा, “मैं न रुद्र हूँ, न देवी उमा। न मैं यज्ञ-भोजन के लिए आया, न कौतूहल से। उमा के क्रोध को जानकर, सब प्राणियों की आत्मा-स्वरूप परम प्रभु ने क्रोध किया है। मैं आपका यह यज्ञ नष्ट करने आया हूँ। मैं वीरभद्र हूँ, रुद्र के क्रोध से उपजा। यह मेरी संगिनी भद्रकाली, देवी के क्रोध से उपजी है। आप उस देव-देव, उमा-पति की शरण लीजिए। किसी अन्य देवता के वरदान से उन परम देव का क्रोध भी श्रेष्ठ है।”
यह सुनकर दक्ष ने महेश्वर को प्रणाम कर स्तुति की, “मैं उस तेजस्वी ईशान के चरणों में स्वयं को समर्पित करता हूँ, जो शाश्वत, अपरिवर्तनीय, अविनाशी हैं, सब देवों में अग्रणी, उच्च-आत्मा, समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं।” स्तुति सुनकर महादेव यज्ञ-अग्नि के कुण्ड से प्रकट हुए, सहस्र सूर्यों के तेज वाले, और हँसते हुए दक्ष से बोले, “हे ब्राह्मण, मैं आपके लिए क्या करूँ?”
तब देवताओं के गुरु ने मोक्ष-खण्ड के वैदिक श्लोकों से महादेव की स्तुति की। दक्ष ने भय और आँसुओं से भरकर कहा, “यदि महादेव मुझ पर प्रसन्न हैं, यदि मैं उनकी कृपा का पात्र हूँ, तो मेरी वे सब वस्तुएँ जो जली, खाई, पी, निगली, नष्ट, टूटी और दूषित हुईं, वे सब मेरे काम आएँ। यही वर मैं माँगता हूँ।” भग के नेत्र-विनाशक हर ने कहा, “तथास्तु!” वर पाकर दक्ष ने झुककर बैल-लांछन वाले उस देव की एक हजार आठ नामों से स्तुति की।
एक उप-कथा: दक्ष-यज्ञ का यह आख्यान शैव परम्परा का एक केन्द्रीय मिथक है। ध्यान दीजिए कि महाभारत यहाँ देवताओं के बीच की उस ईर्ष्या-भरी व्यवस्था को नहीं छिपाता जिसने महादेव को यज्ञ-भाग से वंचित रखा था, और न ही महादेव के प्रचण्ड क्रोध को नरम करता है। पार्वती का शोक, महादेव का अहंकार-भरा उत्तर, और वीरभद्र-भद्रकाली का संहार, सब अपनी पूरी जटिलता में रखे गए हैं।
समझने की कुंजी (दक्ष, वीरभद्र, यज्ञ-भाग): दक्ष = प्रजापति, प्राणियों के प्रजनक। यज्ञ-भाग = यज्ञ में देवता को मिलने वाला आहुति-अंश, जो उसकी मान्यता का प्रतीक है। महादेव को भाग न देना उनका अपमान था। वीरभद्र = महादेव के क्रोध से उपजा संहारक, और भद्रकाली देवी के क्रोध से। ज्वर का जन्म महादेव के स्वेद-बिन्दु से होता है, जो उसी क्रोध का भौतिक रूप है।
सार: ज्वर महादेव के क्रोध-स्वेद से उपजा और प्राणियों-वस्तुओं में बाँटा गया। यज्ञ-भाग से वंचित महादेव ने वीरभद्र के द्वारा दक्ष-यज्ञ नष्ट किया, फिर प्रसन्न होकर दक्ष को सब लौटा दिया और हजार-आठ नामों से पूजे गए। यहीं भीष्म का यह आपद्-धर्म और मोक्ष-धर्म का खण्ड दक्ष की शिव-नाम-स्तुति की ओर मुड़ता है।
दक्ष का स्तोत्र: महादेव के सहस्र नाम और रूप
युधिष्ठिर ने कहा, “हे तात, मुझे वे नाम बताइए जिनसे प्रजापति दक्ष ने उस महान देव की अर्चा की। हे निष्पाप, एक श्रद्धामय कौतूहल मुझे उन्हें सुनने को प्रेरित करता है।” भीष्म ने कहा, “हे भरत, सुनिए, देवताओं के उस देव के, विलक्षण कर्मों के उस देवता के, गुप्त व्रतों के उस तपस्वी के, गुप्त और प्रकट दोनों नाम।”
दक्ष ने कहा, “मैं आपको प्रणाम करता हूँ, हे सब देवताओं के स्वामी, असुर-सेनाओं के संहारक। आप स्वयं देवराज के बल को पंगु करने वाले हैं। आप देव और दानव, दोनों से पूज्य हैं। आप सहस्राक्ष हैं, आप प्रचण्ड-नेत्र हैं, और आप त्रिनेत्र हैं। आप यक्षराज के मित्र हैं। आपके हाथ-पैर सब दिशाओं में, सब स्थानों तक फैले हैं। आपकी आँखें, शिर और मुख भी सब ओर मुड़े हैं। आपके कान भी ब्रह्माण्ड में सर्वत्र हैं, और आप स्वयं सर्वत्र हैं, हे प्रभु!”
दक्ष आगे कहता है, आप शर-कर्ण हैं, बृहत्-कर्ण हैं, घट-कर्ण हैं। आप समुद्र के आगार हैं। गायत्री के उच्चारक गायत्री में आपकी स्तुति गाते हैं, और सूर्य-उपासक सूर्य की अर्चा में आपकी अर्चा करते हैं। ऋषि आपको ब्रह्मा, इन्द्र, और (असीम) आकाश रूप में मानते हैं। हे महान-रूप, समुद्र और आकाश आपके दो रूप हैं। सब देवता आपके रूप में वसते हैं, जैसे गाएँ बाड़े में। आपके शरीर में मैं सोम, अग्नि, जल-स्वामी, आदित्य, विष्णु, ब्रह्मा और बृहस्पति को देखता हूँ।
दक्ष कहता है, हे तेजस्वी, आप कारण, कार्य, क्रिया और हर असत्-सत् वस्तु के साधन हैं, और आप ही सृष्टि और संहार हैं। आपको प्रणाम जो भव, सर्व और रुद्र कहलाते हैं। आपको प्रणाम जो वर-दाता हैं, सब प्राणियों के स्वामी हैं। आपको प्रणाम जो अन्धक के संहारक हैं। आपको प्रणाम जो तीन जटाएँ धरते हैं, तीन शिर वाले हैं, उत्तम त्रिशूल-धारी हैं; जो तीन नेत्र वाले हैं और इसी से त्र्यम्बक और त्रिनेत्र कहलाते हैं! आपको प्रणाम जो त्रिपुर-संहारक हैं!
समझने की कुंजी (कुछ नामों के अर्थ): त्र्यम्बक/त्रिनेत्र = तीन नेत्रों वाले, जिनका तीसरा नेत्र भयानक है। वृष = वर्षा-कर्ता; गोवृष = नन्दि-रूप; कटंकट = नित्य-गमनशील; दण्ड = नियन्ता। अनाहत-शब्द = कान से अग्राह्य, उद्गम-अवस्था का नाद। पिनाक का व्युत्पत्ति-अर्थ “पाणि से जो सुख दे”।
दक्ष की अर्चा अनेक रूपों को छूती है। आपको प्रणाम जिनके दाँत और केश ऊपर उठे हैं, जो निर्मल-श्वेत हैं और सारे ब्रह्माण्ड में फैले हैं; जो रक्त हैं, जो कपिल हैं, जो नील-कण्ठ हैं! आपको प्रणाम जो अनुपम रूप, भयानक रूप और परम मंगल रूप वाले हैं। आप सूर्य हैं, गले में सूर्यों की माला वाले, और सूर्य-चिह्न की ध्वजा-पताका वाले। आपको प्रणाम जो प्रेत-गणों के स्वामी हैं, वृष-ग्रीव हैं, धनुर्धारी हैं; जो सब शत्रुओं को पीसते हैं, जो दण्ड की मूर्ति हैं, और जो वृक्ष-पत्तों तथा चीथड़ों में वस्त्रित हैं।
दक्ष कहता है, आपको प्रणाम जो उदर में स्वर्ण धरते हैं, स्वर्ण-कवच में हैं, स्वर्ण-शिखर हैं, संसार के सब स्वर्ण के स्वामी हैं! आपको प्रणाम जो अर्चित हुए, अर्चना के योग्य हैं, और अभी भी अर्चित हो रहे हैं; जो सब कुछ हैं, सब कुछ निगलते हैं, सब की आत्मा हैं! आपको प्रणाम जो (यज्ञों में) होता हैं, उच्चारित (वैदिक) मन्त्र हैं, और श्वेत ध्वज-पताका वाले हैं।
आपको प्रणाम जो नृत्य के प्रेमी हैं और जो अपने फूले गालों को पीटकर अपने मुख को नगाड़ा बनाते हैं। आपको प्रणाम जो नदियों में खिलते कमलों के प्रेमी हैं, और सदा गायन-वादन के प्रेमी हैं। आपको प्रणाम जो ज्येष्ठ-जन्मा हैं, सब प्राणियों में श्रेष्ठ हैं, और असुर वल के पीसने वाले हैं। आपको प्रणाम जो काल के स्वामी हैं, कल्प की मूर्ति हैं; जो हर प्रकार के संहार, बड़े और छोटे, के मूर्तिमान रूप हैं।
दक्ष आगे कहता है, आप काम हैं, सब कामनाओं के दाता हैं, सब कामनाओं के हन्ता हैं, और तृप्त-अतृप्त के बीच विवेक करने वाले हैं। आप सब वस्तुएँ हैं, सब वस्तुओं के दाता, और सब के संहारक। आप सन्ध्या-आकाश के रंग हैं। आप सांख्य हैं, सांख्यों में श्रेष्ठ हैं, और सांख्य-योग के प्रवर्तक हैं। आपको प्रणाम जिनके पास रथ है और जिनके पास रथ नहीं (अबाध गति के लिए)। आप ईशान हैं, वज्र-सी कठोर देह वाले, और हरित जटाओं वाले।
आप ही अन्न हैं, आप ही अन्न खाने वाले, आप ही अन्न-दाता, अन्न-वर्धक और अन्न के स्रष्टा हैं। आप ही अन्न पकाते हैं और पका अन्न खाते हैं, और आप ही वायु और अग्नि हैं! हे सब देव-स्वामियों के स्वामी, आप ही प्राणियों के चार वर्ग हैं, जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज। आप ही चर-अचर ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, और आप ही उनके संहारक! आप ही ऋच् और सामन हैं, और ओम् अक्षर। आप वर्ष हैं, ऋतुएँ, मास और पक्ष। आप युग हैं, पलक झपकने का समय, काष्ठा, नक्षत्र, ग्रह और काल हैं।
दक्ष की स्तुति परम-गूढ़ तत्त्व को भी छूती है। आप ही अविनाशी रूप में चित् हैं जो मनुष्य-रूप में वसती है। गुणों से युक्त होकर आप संहार के अधीन होते हैं। आप ही जीव हैं, वह जो गुणों से रहित होने पर कभी संहार के अधीन नहीं। आप पूर्ण हैं, फिर भी देह-रूप में, जो जीव की संगिनी है, ह्रास और मृत्यु के अधीन हो जाते हैं। आप जीवन-श्वास हैं, और आप सत्त्व, रजस्, तमस् हैं, और आप भ्रम के अधीन नहीं।
एक उप-कथा (मछली की उपमा): स्तोत्र में महादेव को “जल में विचरती मछली, और जाल में फँसी मछली” कहा गया है। यह उपमा जीव की दशा खोलती है, चित् जल (अनन्त) में स्वच्छन्द विचरती मछली-सी है; पर अन्धकार या माया से ढककर वही जीव जन्म लेने को विवश, जाल में फँसी मछली-सी हो जाता है। महादेव दोनों हैं, क्योंकि वे जीव और परम, दोनों के स्वरूप हैं।
दक्ष कहता है, आप राग और द्वेष हैं; आसक्ति और मोह; क्षमा और अक्षमा। आप परिश्रम और धैर्य; लोभ, काम और क्रोध; विजय और पराजय। आप धर्म हैं जो दस गुणों से युक्त है; आप हर प्रकार का अर्थ; और आप काम। आप गंगा, समुद्र, नदियाँ, सरोवर और तालाब हैं। आप सूक्ष्म और स्थूल लताएँ, सब प्रकार की घास और पतझड़ी ओषधियाँ हैं। आप सब निम्न पशु और पक्षी हैं। आप वेदों के आदि और अन्त; आप गायत्री और ओम्। आप हरित, रक्त, नील, श्याम, रुधिर-वर्ण, सूर्य-वर्ण, कपिल, भूरे और गहरे-नील हैं, और आप वर्ण-रहित, श्रेष्ठ-वर्ण, वर्ण-कर्ता और अनुपम हैं।
स्तोत्र देवदेव की समता पर पहुँचता है। आप ही वह अग्नि हैं जिस पर यज्ञ-घी डाला जाता है; आप ही वह जो घी डालता है; आप ही वह जिसके सम्मान में घी डाला जाता है; और आप ही वह घी; और आप ही सब के पराक्रमी स्वामी। आप यजुस् में सतरुद्रिय खण्ड हैं। आप परम पवित्र, सब मंगलों में मंगल हैं। आप ही जड़ देह को सचेत करते हैं। आप ही चित् हैं जो मनुष्य-रूप में वसती है। हे भव, मेरा मन, मेरी बुद्धि और मेरा चित्त, सब आप में वसते हैं, हे देव!
ये स्तुतियाँ सुनकर सब प्राणियों के स्वामी महादेव (दक्ष पर और चोट करने का विचार) त्याग देते हैं। अत्यन्त प्रसन्न होकर तेजस्वी देव दक्ष से कहते हैं, “हे उत्तम-व्रत दक्ष, आपकी इन स्तुतियों से मैं प्रसन्न हुआ हूँ। अब और स्तुति की आवश्यकता नहीं। आप मेरा सान्निध्य पाएँगे। मेरी कृपा से, हे प्रजापति, आप (इस एक अधूरे यज्ञ के बदले) एक हज़ार अश्वमेधों और सौ वाजपेयों का फल पाएँगे।”
फिर महादेव ने दक्ष को सान्त्वना दी, “आप इस यज्ञ पर हुए इन आघातों का शोक न कीजिए। देखा गया है कि पिछले कल्पों में भी मुझे आपका यज्ञ विध्वंस करना पड़ा था। हे उत्तम-व्रत, मैं आपको फिर कुछ और वर देता हूँ।” तब महादेव ने पाशुपत धर्म का उल्लेख किया, वह धर्म जो उन्होंने प्राचीन काल में निकाला था, जो सब आश्रमों के मनुष्यों के लिए खुला है, जो मुक्ति की ओर ले जाता है, जो रहस्य में लिपटा है, और जिसे ज्ञान-हीन निन्दनीय मानते हैं। यह कहकर महादेव, अपनी पत्नी उमा और सब अनुचरों समेत, दक्ष की दृष्टि से ओझल हो गए।
सार: दक्ष का यह सहस्र-नाम स्तोत्र महादेव को त्र्यम्बक, सांख्य-योग-प्रवर्तक, अन्न और अन्न-भोक्ता, चित् और जीव, राग-द्वेष, और चर-अचर सब रूपों में देखता है, एक ही देव में विरोधी जोड़ों का मेल। प्रसन्न होकर महादेव दक्ष को सहस्र-अश्वमेध का फल और पाशुपत धर्म का संकेत देते हैं, फिर अन्तर्धान हो जाते हैं।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म उपपर्व, अध्याय 129-353; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)