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मन को मन रहने मत दीजिए: इन्द्रियों के पार जाने का सूत्र
शर-शय्या (बाणों की सेज) पर लेटे भीष्म पितामह की वाणी अब विपत्ति-धर्म से मोक्ष-धर्म की ओर मुड़ चुकी थी। वे युधिष्ठिर से कह रहे थे कि जो प्राणी सदा अनिष्ट लाने वाले इन्द्रिय-विषयों में आसक्त रहता है, वह असहाय हो जाता है, और जो महात्मा इनमें नहीं फँसते, वे परम पद को पाते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को संसार को देखना चाहिए कि वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, शोक, रोग और चिन्ता से भरा पड़ा है, और इसी से उसे मोक्ष (मुक्ति, बन्धन से छुटकारा) के लिए यत्न करना चाहिए।
पितामह बोले कि साधक को वाणी, मन और देह से शुद्ध, अभिमान-रहित, शान्त-आत्मा और ज्ञानवान होकर भिक्षा पर जीवन बिताना चाहिए, बिना किसी सांसारिक आसक्ति के। यदि प्राणियों पर दया के कारण मन में आसक्ति बँधे, तो यह देखकर कि सारा जगत कर्मों का ही फल है, उसे दया के विषय में भी उदासीन रहना चाहिए। हर शुभ-अशुभ कर्म का फल कर्ता ही चखता है, अतः वाणी, मन और कर्म से केवल शुभ करे। सुख वही पाता है जो अहिंसा, सत्य-वचन, सब प्राणियों के प्रति निष्कपटता, क्षमा और अप्रमाद (सावधानी) का अभ्यास करता है। बुद्धि को साधकर मन को सब प्राणियों के प्रति शान्ति में लगाए; किसी का बुरा सोचे न, सामर्थ्य से ऊपर की वस्तु की लालसा न करे, अनस्तित्व की ओर मन न मोड़े, और दृढ़ प्रयत्न से मन को ज्ञान की ओर लगाए।
भीष्म जी ने एक मार्मिक उपमा दी। बोले कि जैसे चोर भेड़ों की लूट उठाए राजा के पहरे वाले मार्गों से बचता फिरता है और बचना चाहे तो लूट छोड़ देता है, वैसे ही जो व्यक्ति कल्याण चाहता है, उसे रजोगुण और तमोगुण से प्रेरित सब कर्म छोड़ देने चाहिए। संसार वाणी में बँधा है। जो सब विषयों के त्याग की ओर झुका हो, उसे नम्रता और निर्मल बुद्धि से अपने ही दोषों को स्वीकार करना चाहिए।
फिर उन्होंने योग का सोपान बताया। धैर्यवान और शुद्ध-आत्मा व्यक्ति पहले अपनी बुद्धि को वश में करे, उस बुद्धि से मन को, और मन से इन्द्रिय-विषयों को। मन के वश में होते ही इन्द्रियाँ प्रकाशमान हो जाती हैं और प्रसन्नता से ब्रह्म में प्रवेश करती हैं। जब इन्द्रियाँ मन में समा जाती हैं तो उसमें ब्रह्म प्रकट होता है। योग-शक्ति का प्रदर्शन कभी न करे; उसी से इन्द्रियों को रोके। पितामह ने यहाँ तक कहा कि योगी को अपनी योग-शक्ति को जीविका का साधन न बनाते हुए भिक्षा में मिले टूटे अन्न-कण, पकी फलियाँ, तेल निकाली हुई खली, साग, अधपका जौ, भुने अन्न का आटा, फल और कन्द पर ही रहना चाहिए। देश-काल पर विचार करके व्रत और उपवास के नियम रखे, और जो आरम्भ कर दे उसे बीच में न छोड़े। धीरे-धीरे आग सुलगाने वाले की भाँति ज्ञान-प्रेरित कर्म को बढ़ाए, जिससे ब्रह्म उसमें सूर्य की भाँति प्रकाशित हो।
समझने की कुंजी (तीन गुण): सांख्य-दर्शन प्रकृति (मूल पदार्थ) के तीन गुण मानता है। सत्त्व (शुद्धता, प्रकाश, सुख-शान्ति का स्रोत), रजस् (राग, चंचलता, असन्तोष-क्रोध का स्रोत), और तमस् (अन्धकार, मोह, आलस्य-निद्रा का स्रोत)। मोक्ष इन तीनों से ऊपर उठने में है। ब्रह्म इन गुणों से परे है, केवल ज्ञान-स्वरूप है।
सार: मोक्ष-धर्म का आरम्भ इन्द्रिय-विषयों से अनासक्ति है। बुद्धि से मन को, मन से इन्द्रियों को साधिए; शुभ कर्म, सत्य, अहिंसा और क्षमा का अभ्यास कीजिए; योग को जीविका मत बनाइए, और धीरे-धीरे जलती आग की तरह ज्ञान को बढ़ाइए, तब ब्रह्म भीतर सूर्य-सा उगता है।
स्वप्न का रहस्य और चार विषय: प्रकट और अप्रकट
भीष्म जी ने स्वप्न के विषय पर चर्चा की। जो योगी निर्दोष ब्रह्मचर्य का सदा अभ्यास करना चाहता है और स्वप्न के दोषों को जानता है, उसे पूरे हृदय से निद्रा त्यागने का यत्न करना चाहिए, क्योंकि स्वप्न में देहधारी आत्मा, रजोगुण और तमोगुण से प्रभावित होकर, मानो दूसरी देह धारण करके इच्छा-वश घूमती और कर्म करती प्रतीत होती है। ज्ञान के अध्ययन, निरन्तर चिन्तन और पुनरावृत्ति से योगी सदा जाग्रत रहता है।
उन्होंने इस प्रश्न को उठाया कि वह कौन-सी अवस्था है जिसमें देहधारी अपने को विषयों और कर्मों से घिरा हुआ मानता है, जबकि इन्द्रियाँ वस्तुतः शान्त (निष्क्रिय) पड़ी होती हैं। पितामह बोले कि योग के स्वामी, हरि नामक देव, यथार्थतः जानते हैं कि यह कैसे होता है, और महर्षि उनके इस उत्तर को युक्ति-संगत मानते हैं। विद्वान कहते हैं कि इन्द्रियाँ थकान से शान्त हो जाती हैं, किन्तु मन कभी लुप्त नहीं होता, और इसी से स्वप्न उठते हैं। जैसे जाग्रत व्यक्ति की कल्पनाएँ केवल मन की रचनात्मक शक्ति से उठती हैं, वैसे ही स्वप्न के संस्कार भी केवल मन के होते हैं। राग और आसक्ति वाला व्यक्ति अनगिनत पिछले जन्मों के संस्कारों पर आधारित वे कल्पनाएँ पाता है। जो भी एक बार मन पर अंकित हो जाता है, वह कभी नष्ट नहीं होता, और आत्मा उन सबको जानती हुई उन्हें अन्धकार से बाहर ले आती है।
पितामह ने सुषुप्ति (गहरी, स्वप्न-रहित निद्रा) की भी व्याख्या की। उसमें यह प्रकट मनुष्य-देह, जो स्वप्नों का द्वार है, मन में लीन हो जाती है। देह में रहता हुआ मन उस आत्मा में प्रवेश करता है जिस पर समस्त सत् और असत् वस्तुएँ टिकी हैं, और निश्चयात्मक बोध वाला जाग्रत साक्षी बन जाता है। इस प्रकार शुद्ध चैतन्य में, जो सब वस्तुओं की आत्मा है, स्थित रहकर वह चैतन्य और जगत दोनों से परे माना जाता है।
फिर उन्होंने चार विषय (चार बातें जिन्हें जाने बिना कोई ब्रह्म को नहीं जानता) गिनाए: स्वप्न, सुषुप्ति, गुणों सहित (सगुण) ब्रह्म, और गुणों से परे (निर्गुण) ब्रह्म। साथ ही प्रकट (अर्थात देह) और अप्रकट (चित्-आत्मा) को भी जानना आवश्यक है, जिन्हें महर्षि नारायण ने ‘तत्त्वम्’ कहा है। जो प्रकट है वह मरणशील है; जो अप्रकट है (चित्-आत्मा) वह मृत्यु से परे है।
पितामह बोले कि महर्षि नारायण ने प्रवृत्ति-धर्म (कर्म-प्रधान, जिसमें संसार और चराचर प्राणी टिके हैं) बताया, और निवृत्ति-धर्म (कर्म से लौटना, संन्यास) अप्रकट और शाश्वत ब्रह्म की ओर ले जाता है। प्रवृत्ति का अर्थ पुनर्जन्म या लौटना है, निवृत्ति का अर्थ परम पद। फिर उन्होंने प्रकृति और पुरुष का भेद बताया: दोनों अनादि और अनन्त हैं, दोनों शाश्वत और अविनाशी हैं, दोनों परम से भी परम हैं। यहाँ तक वे समान हैं। उनमें भेद यह है कि प्रकृति तीन गुणों वाली है और सृष्टि में लगी है, जबकि क्षेत्रज्ञ (पुरुष या आत्मा) के लक्षण भिन्न हैं। पुरुष प्रकृति के सब विकारों को जानने वाला है, पर स्वयं जाना नहीं जाता; अपने मूल स्वरूप में सब गुणों से परे है।
समझने की कुंजी (प्रकृति और पुरुष): सांख्य में प्रकृति अचेतन मूल पदार्थ है जिससे सारा जगत बनता है, तीन गुणों वाली और सक्रिय। पुरुष चेतन आत्मा है, साक्षी, निर्गुण, अकर्ता। क्षेत्र अर्थात देह-इन्द्रिय-मन का समूह; क्षेत्रज्ञ अर्थात उस क्षेत्र को जानने वाली आत्मा। पगड़ी का दृष्टान्त: जैसे पगड़ी पहनने वाला पगड़ी से अलग है, वैसे ही तीन गुणों में लिपटी आत्मा उन गुणों से अलग है।
उन्होंने योग को फिर खोला: देह का योग है ब्रह्मचर्य और अहिंसा; मन का योग है मन और वाणी का संयम; योग का फल ज्ञान है, और ब्रह्म-ज्ञान उठते ही जन्म-मृत्यु की विवशता पीछा छोड़ देती है। कुछ साधक ब्रह्म की प्रतिमा में उपासते हैं, कुछ सगुण रूप में, कुछ उस परम दिव्यता को बिजली की चमक-सा अनुभव करते हैं; तपस्या से पाप जला चुके सब महात्मा परम पद पाते हैं। अन्त में पितामह बोले कि वही दिव्य महर्षि नारायण, समस्त प्राणियों पर करुणा से, अमरत्व के ये उपाय स्पष्ट कर गए।
सार: स्वप्न केवल मन की रचना और पूर्व-संस्कारों का खेल है; सुषुप्ति में देह मन में लीन होती है। ब्रह्म को जानने के लिए चार विषय जानने पड़ते हैं। प्रवृत्ति लौटाती है, निवृत्ति मुक्त करती है। प्रकृति सक्रिय और सगुण है, पुरुष साक्षी और निर्गुण; इन दोनों के भेद को जान लेना ही मुक्ति का सूत्र है।
जनक और पंचशिख: मिथिला का राजा और सांख्य का आचार्य
अब युधिष्ठिर ने एक सीधा प्रश्न रखा: “हे सब आचरणों के ज्ञाता, मोक्ष-धर्म में निपुण मिथिला के राजा जनक ने किस आचरण से, सब सांसारिक भोग त्यागकर, मोक्ष पाया?”
भीष्म जी ने एक पुराना आख्यान सुनाया। मिथिला में जनक-वंश का जनदेव नामक राजा था, जो ब्रह्म-प्राप्ति के मार्गों पर सदा चिन्तन करता रहता था। उसके महल में सौ आचार्य रहते थे जो उसे भाँति-भाँति की जीवन-शैलियों के धर्म पर उपदेश देते। वेदों का अध्येता होकर भी वह आत्मा के स्वरूप पर अपने गुरुओं की बातों से, और इस सिद्धान्त से कि देह नष्ट होते ही सब समाप्त है या मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है, पूरी तरह सन्तुष्ट न था।
एक दिन कपिल के पुत्र पंचशिख नामक महान तपस्वी सारे संसार में घूमते हुए मिथिला आए। संन्यास से जुड़े सब विषयों पर निश्चित निष्कर्ष वाले, सब द्वन्द्वों (सरदी-गरमी, सुख-दुःख जैसे जोड़ों) से ऊपर, और सन्देह-रहित, वे ऋषियों में अग्रगण्य माने जाते थे। भीष्म जी ने उनकी कथा भी सुनाई। वे आसुरि के शिष्यों में प्रमुख थे और ‘अमर’ कहलाते थे; उन्होंने हजार वर्ष चलने वाला मानस-यज्ञ किया था। वे आत्मा को ढकने वाले पाँच कोशों के पूर्ण ज्ञाता थे।
एक उप-कथा: पंचशिख कपिल के पुत्र क्यों कहलाए, यह भी पितामह ने बताया। आसुरि ने अपने गुरु से आत्म-ज्ञान पूछा था और गुरु के उपदेश तथा अपनी तपस्या से देह और आत्मा का भेद समझकर दिव्य-दृष्टि पाई थी। आसुरि की पत्नी एक ब्राह्मणी थीं, जिनका नाम कपिला था। पंचशिख को उन्होंने पुत्र-रूप में स्वीकार किया और वे उनका स्तनपान करते रहे; इसी से वे ‘कपिल के पुत्र’ कहलाए और उनकी बुद्धि ब्रह्म पर स्थिर हो गई। यह सारी बात पितामह को एक दिव्य महर्षि ने सुनाई थी।
पंचशिख जनक के पास पहुँचे और यह जानते हुए कि वह राजा अपने सब आचार्यों का समान आदर करता है, उन्होंने उस सौ आचार्यों की मण्डली को प्रचुर युक्तियों भरे उपदेश से चकित कर दिया। कपिलेय (कपिल-पुत्र) की प्रतिभा देखकर जनक उन पर अत्यन्त आकृष्ट हो गया, और अपने सौ आचार्यों को छोड़कर उन्हीं का अनुसरण करने लगा।
तब कपिलेय ने शिष्य की भाँति सिर झुकाए जनक को सांख्य-ग्रन्थों में बताया मोक्ष-धर्म सुनाना आरम्भ किया। पहले उन्होंने जन्म के दुःख बताए, फिर कर्मों के दुःख, फिर ब्रह्मा के परम लोक तक की सब अवस्थाओं के दुःख। उन्होंने उस माया का भी वर्णन किया जिसके लिए धर्म, कर्म और उनके फल किए जाते हैं और जो अत्यन्त अविश्वसनीय, नश्वर, अस्थिर और अनिश्चित है।
समझने की कुंजी (पाँच कोश): वेदान्त-सांख्य परम्परा में आत्मा को ढकने वाले पाँच आवरण माने जाते हैं: अन्नमय (देह), प्राणमय (प्राण), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि), और आनन्दमय (आनन्द)। पंचशिख इन पाँचों के, और इनसे परे आत्मा के, पूर्ण ज्ञाता बताए गए हैं। आसुरि और कपिल सांख्य-परम्परा के आदि-आचार्य माने जाते हैं।
देह ही आत्मा है क्या? पंचशिख का खण्डन
पंचशिख ने जनक के सामने उन वादियों के मत भी रखे जो आत्मा का पृथक अस्तित्व नहीं मानते। नास्तिक कहते हैं कि जब देह की मृत्यु सबके सामने प्रत्यक्ष देखी जाती है, तो जो शास्त्र-श्रद्धा से देह से भिन्न किसी आत्मा का अस्तित्व मानते हैं, वे तर्क में हार जाते हैं। उनका कहना है कि मृत्यु का अर्थ आत्मा का ही नाश है, और शोक, बुढ़ापा तथा रोग आत्मा की आंशिक मृत्यु हैं।
उन्होंने नास्तिकों के दृष्टान्त भी सुनाए। बरगद के बीज में पत्ते, फूल, फल, जड़ और छाल उत्पन्न करने की सामर्थ्य भरी होती है। गाय जो घास-पानी खाती है, उससे दूध और मक्खन बनते हैं जिनका स्वरूप मूल कारण से भिन्न है। भाँति-भाँति के पदार्थ जल में कुछ काल सड़ने पर मदिरा बनाते हैं, जिसका स्वरूप उन पदार्थों से सर्वथा भिन्न है। इसी प्रकार, नास्तिक कहते हैं, वीर्य-बीज से देह और उसके सब गुण, बुद्धि, चेतना और मन उत्पन्न होते हैं। दो लकड़ियाँ रगड़ने से अग्नि उठती है; सूर्यकान्त मणि सूर्य-किरण के स्पर्श से अग्नि उत्पन्न करती है। जैसे लोहचुम्बक लोहे को हिलाता है, वैसे ही मन इन्द्रियों को चलाता है, बस।
“किन्तु,” पंचशिख ने कहा, “नास्तिक भ्रम में हैं।” इसका प्रमाण यह है कि देह के निर्जीव होते ही केवल चेतना उड़ती है, देह तत्काल विलीन नहीं हो जाती। यदि देह और आत्मा एक ही होते, तो दोनों एक ही क्षण में लुप्त होते। पर मृत्यु के बाद भी मृत देह कुछ काल तक दिखती है; अतः मृत्यु का अर्थ है देह से किसी ऐसी वस्तु का निकल जाना जो देह से भिन्न है। दूसरा तर्क: जो लोग आत्मा का पृथक अस्तित्व नकारते हैं, वे ही देवताओं की प्रार्थना करते हैं, जो दिखते-छुए नहीं जाते, सूक्ष्म रूप में माने जाते हैं। तो जब बिना स्थूल देह के देवता मानने में उनकी बुद्धि बाधित नहीं होती, तो बिना स्थूल देह के आत्मा मानने में क्यों हो?
फिर उन्होंने पुनर्जन्म के एक मत का खण्डन किया। कुछ कहते हैं कि अविद्या (मूल अज्ञान) ही आत्मा है, कर्म वह बीज है जो उस भूमि में बोया जाता है, और इच्छा वह जल है जो उस बीज को उगाता है; एक देह नष्ट होते ही दूसरी तुरन्त उठ खड़ी होती है, और जब ज्ञान से वह जल जाती है तो अस्तित्व का नाश या निर्वाण होता है। पंचशिख ने स्पष्ट कहा कि यह मत भी भ्रान्त है। यदि पुनर्जन्म वाला प्राणी स्वभाव, जन्म और पुण्य-पाप में बिलकुल भिन्न है, तो उसे पहले वाले से एक मानें ही क्यों? और यदि वह सचमुच भिन्न है, तो दान, ज्ञान या तप का फल किसी और जन्म वाले को मिलेगा, तो करने वाले को क्या सन्तोष? एक के पाप से दूसरा दुःखी हो, यह भी ठीक नहीं ठहरता।
एक उप-कथा: गांगुली की टीका यहाँ स्पष्ट करती है कि क्षणिक चेतना का यह मत बौद्धों का है। पंचशिख तर्क देते हैं कि यदि पूर्व चेतना अनित्य और देह के साथ ही समाप्त हो जाने वाली थी, तो वही अन्त-वाली वस्तु अपने अन्त के बाद उठने वाली दूसरी चेतना का कारण कैसे बने? और यदि पूर्व चेतना का नाश ही दूसरी का कारण मानें, तो मोटे डण्डे से किसी की देह मारने पर उसी मरी देह से दूसरी देह उठ खड़ी होनी चाहिए, जो होता नहीं।
पंचशिख ने एक नित्य, अपरिवर्तनीय आत्मा के उस मत पर भी आपत्ति उठाई जो आत्मा को बुद्धि, चेतना आदि सभी से सर्वथा असंबद्ध मानता है: तब तो संसार के सब कर्म, श्रुति की प्रेरणाएँ और दान आदि के फल निरर्थक हो जाएँगे, क्योंकि बुद्धि-मन से असंबद्ध आत्मा को शुभ कर्मों का फल भोगने वाला ही कोई न होगा। इस प्रकार अनेक मत मन में उठते हैं, और किसका मत सही है यह निश्चित करने का साधन नहीं। पंचशिख बोले कि वेद ही, ऐसे भटके लोगों को सही मार्ग पर लौटाकर, महावत की भाँति उन्हें राह पर ले चलते हैं।
अन्त में उन्होंने वैराग्य का सूत्र दिया: जिसका जीवन अस्थिर है और जो नाश की ओर बढ़ रहा है, उसे कुटुम्ब, मित्र, पत्नियों और सम्पत्ति से क्या? जो इन सबको त्यागकर मृत्यु का सामना करता है, वह सहज ही संसार से पार हो जाता है और लौटकर नहीं आता। पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु इस देह को सदा सँभालते और पोषते हैं; ऐसी देह से कोई प्रेम कैसे करे जो नाशवान है और जिसमें कोई आनन्द नहीं? पंचशिख के ये छल-रहित, मोह-रहित, हितकारी और आत्मा-विषयक वचन सुनकर राजा जनदेव विस्मय से भर उठा।
सार: पंचशिख ने तीन मतों को क्रम से खण्डित किया: देह-मात्र को आत्मा मानने वाला नास्तिक मत, क्षणिक-चेतना वाला बौद्ध मत, और अति-असंबद्ध आत्मा वाला मत। प्रमाण देह की मृत्यु के बाद भी देह के बने रहने में है, जो दिखाता है कि कुछ देह से भिन्न निकल गया। निष्कर्ष: देह नाशवान है, उसमें आसक्ति व्यर्थ है।
यदि कुछ शेष नहीं रहता तो ज्ञान का लाभ क्या? जनक का दूसरा प्रश्न
जनदेव ने फिर पूछा: “हे भगवन्, यदि मृत्यु के बाद कोई ज्ञान शेष नहीं रहता, तो अज्ञान और ज्ञान में अन्तर ही क्या? ज्ञान से हम क्या पाते हैं और अज्ञान से क्या खोते हैं? यदि मोक्ष ऐसा ही है, तो सब धर्म-कर्म और व्रत केवल नाश में ही समाप्त होते हैं। यदि मोक्ष का अर्थ सब सुखद भोगों से वियोग है, तो मनुष्य कर्म की इच्छा क्यों करे, या आरम्भ करके उसके साधन क्यों जुटाए? इस विषय में सत्य क्या है?”
राजा को घोर अन्धकार में, भ्रम से मूढ़ और असहाय देखकर विद्वान पंचशिख ने उसे शान्त किया। बोले कि मोक्ष में परिणति न तो नाश है और न ही कोई ऐसा अस्तित्व जिसकी सहज कल्पना की जा सके। जो हम देखते हैं वह देह, इन्द्रिय और मन का संयोग है, जो स्वतन्त्र रूप से रहते हुए भी एक-दूसरे को नियन्त्रित करते कर्म करते रहते हैं। देह के पदार्थ हैं जल, आकाश, वायु, अग्नि और पृथ्वी; ये अपने स्वभाव से मिलकर देह बनाते और अपने स्वभाव से ही फिर बिखर जाते हैं। देह कोई एक तत्त्व नहीं।
फिर पंचशिख ने तत्त्वों, इन्द्रियों और मन का विस्तृत भेद बताया। श्रवण, स्पर्श, रस, दर्शन और गन्ध, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जिन्होंने अपने गुण मन से पाए हैं। चित् के गुण-रूप मन की तीन अवस्थाएँ हैं: सुख, दुःख, और दोनों का अभाव। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और उनके आश्रय-पदार्थ, मृत्यु-क्षण तक, ज्ञान-उत्पत्ति के कारण हैं। विद्वान कहते हैं कि सत्य का निश्चय अस्तित्व का परम प्रयोजन है और मोक्ष का बीज है।
उन्होंने पाँच कर्मेन्द्रियाँ भी गिनाईं: दो हाथ कर्म के अंग, दो पैर गमन के, जननेन्द्रिय सुख और सन्तति के लिए, अधोद्वार मल-त्याग के लिए, और वाणी शब्द-अभिव्यक्ति के लिए। इस प्रकार ज्ञान और कर्म की ग्यारह इन्द्रियाँ (मन सहित) हैं। श्रवण में तीन कारण साथ चाहिए: दो कान, शब्द और मन; इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में। ये पन्द्रह उपकरण भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षों के लिए चाहिए।
फिर तीन गुणों के लक्षण: हर्ष, सन्तोष, आनन्द, सुख और शान्ति सत्त्व के लक्षण; असन्तोष, पश्चात्ताप, शोक, लोभ और प्रतिशोध-भाव रजस् के; मिथ्या-निर्णय, मोह, प्रमाद, स्वप्न और निद्रा तमस् के। उन्होंने ग्यारह इन्द्रियों पर बारहवीं बुद्धि का अधिष्ठान बताया, और यह कि ये बारह आत्मा के साथ नहीं, आपस में ही साथ रहते हैं; आत्मा इनसे पृथक है। यदि ये बारह एक-साथ न होते, तो सुषुप्ति में मृत्यु हो जाती; पर सुषुप्ति में मृत्यु नहीं होती, अतः ये एक-साथ रहते हैं, पर आत्मा से अलग।
समझने की कुंजी (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ): आत्म-विद्या के ज्ञाता इन्द्रियों-मन-बुद्धि के इस पूरे समूह को क्षेत्र (देह) कहते हैं। जो सत्ता मन पर टिकी रहती है, उसे क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कहते हैं। आत्मा नित्य है, अविनाशी; देह नश्वर। पंचशिख का तर्क: जब आत्मा नित्य कही गई है तो उसका नाश कैसे संभव?
पंचशिख ने मुक्ति के अद्भुत दृष्टान्त दिए। जैसे छोटी नदियाँ बड़ी में मिलकर अपना रूप और नाम खो देती हैं, और बड़ी नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना रूप-नाम खोती हैं, वैसे ही मोक्ष नामक जीवन-विलय होता है। जब गुणों वाला जीव विश्व-आत्मा में मिल जाता है और उसके सब गुण लुप्त हो जाते हैं, तब वह अलग पहचान का विषय कैसे रहे? जो मोक्ष की ओर मुड़ी बुद्धि वाला है और सावधानी से आत्मा को जानना चाहता है, वह कर्मों के कुफल से वैसे ही नहीं लिपटता जैसे जल में डूबा कमल-पत्र भी भीगता नहीं।
उन्होंने रेशम-कीट का सुन्दर दृष्टान्त दिया: जैसे रेशम-कीट अपने ही बुने धागों के घर में रहता है और मुक्त होकर उस घर को छोड़ देता है, वैसे ही जीव अविद्या-वश अपने कर्मों के घर में रहता है और फिर उसे छोड़ देता है; तब उसके शोक मिट्टी के ढेले की भाँति चट्टान पर गिरकर टूट जाते हैं। जैसे रुरु मृग अपने पुराने सींग या साँप अपनी केंचुली त्यागकर बिना किसी हलचल के चला जाता है, वैसे ही अनासक्त व्यक्ति अपने सब शोक त्याग देता है।

एक उप-कथा: पंचशिख ने जनदेव के अपने ही पूर्वज जनक की कथा याद दिलाई। मिथिला के राजा जनक ने अपनी नगरी को आग में जलते देखकर स्वयं घोषणा की थी: “इस अग्नि में मेरा कुछ नहीं जल रहा।” यही अनासक्ति का चरम है। इन अमृत-तुल्य वचनों को सुनकर और हर बात पर भली भाँति विचार करके सत्य तक पहुँचकर राजा जनदेव ने अपने शोक त्याग दिए और महान आनन्द में जीवन बिताया।
सार: मोक्ष न पूर्ण नाश है न साधारण अस्तित्व। देह केवल पाँच तत्त्वों और ग्यारह इन्द्रियों का संयोग है; आत्मा इनसे पृथक, नित्य साक्षी। मुक्ति वह है जैसे नदी समुद्र में मिलकर नाम-रूप खो दे। जनक का “मेरा कुछ नहीं जल रहा” इसी अनासक्ति का सूत्र है।
आत्म-संयम: सुख-दुःख और भय से छुटकारे का मूल
युधिष्ठिर ने पूछा: “हे भारत, किस कर्म से मनुष्य सुख पाता है और किससे दुःख? और किससे वह भय-मुक्त होकर संसार में सफल रहता है?”
भीष्म जी बोले कि पूर्वजों ने आत्म-संयम (इन्द्रिय-निग्रह) को सब वर्णों के लिए, विशेषकर ब्राह्मणों के लिए, सर्वोपरि धर्म कहा। जो आत्म-संयमी नहीं, उसके धर्म-कर्म सफल नहीं होते। धर्म-कर्म, तप और सत्य, सब आत्म-संयम पर टिके हैं। संयमी निष्पाप और निर्भय होकर महान फल पाता है; वह सुख से सोता और सुख से जागता है, संसार में प्रसन्न-मन रहता है। हर उत्तेजना संयम से शान्त हो जाती है।
उन्होंने संयमी के लक्षण गिनाए: श्रेष्ठता, शान्त स्वभाव, सन्तोष, श्रद्धा, क्षमा, सरलता, वाचालता का अभाव, नम्रता, गुरुजनों के प्रति आदर, सब प्राणियों पर दया, स्पष्टता, और राजाओं तथा सत्ताधारियों पर तथा झूठी-व्यर्थ चर्चाओं से और दूसरों की स्तुति-निन्दा से विरति। संयमी मोक्ष का इच्छुक होता है, वर्तमान सुख-दुःख को शान्ति से सहता है, भावी की कल्पना से न उल्लसित होता है न खिन्न। समुद्र की भाँति शान्त, बुद्धि से भरा वह किसी प्राणी से न डरता है न किसी को डराता है। जो बड़ी प्राप्ति पर भी प्रसन्न नहीं होता और विपत्ति में दुःखी नहीं होता, वह सन्तुष्ट-बुद्धि और संयमी कहलाता है।
इसके विपरीत, दुष्ट-आत्मा वाले परोपकार, क्षमा, शान्ति, सन्तोष, मधुर-वाणी, सत्य और उदारता के मार्ग पर नहीं चलते; उनका मार्ग काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और आत्म-प्रशंसा का होता है। ब्राह्मण को काम-क्रोध जीतकर, ब्रह्मचर्य पालकर, इन्द्रियों का पूर्ण स्वामी बनकर, कठोरतम तपों में सहनशीलता से लगे रहकर इस संसार में अपने समय की प्रतीक्षा इस भाव से करनी चाहिए मानो उसके पास देह तो है पर वह जानता है कि वह नाश के अधीन नहीं।
सार: सुख-दुःख और भय से मुक्ति की जड़ आत्म-संयम है। संयमी के लक्षण क्षमा, सन्तोष, सरलता, दया और स्तुति-निन्दा से उदासीनता हैं। काम-क्रोध-लोभ का मार्ग दुःख की ओर ले जाता है, संयम का मार्ग शान्ति की ओर।
उपवास तप है क्या? और सच्चा तप कौन-सा है
युधिष्ठिर ने एक व्यावहारिक प्रश्न उठाया: तीनों द्विज-वर्ण कभी-कभी सन्तान और स्वर्ग की इच्छा से देवताओं के यज्ञों के अवशेष, जिनमें मांस और मदिरा भी होती है, खा लेते हैं; इस कर्म का स्वरूप क्या है?
भीष्म जी बोले कि जो वेदोक्त यज्ञ-व्रत का पालन किए बिना निषिद्ध भोजन करते हैं, वे स्वच्छन्द (पतित) माने जाते हैं। पर जो वेद-विहित यज्ञों और व्रतों के अनुसार, स्वर्ग और सन्तान की इच्छा से ही, वैसा भोजन करते हैं, वे स्वर्ग चढ़ते हैं, किन्तु पुण्य क्षीण होते ही गिर जाते हैं।
फिर युधिष्ठिर ने पूछा: सामान्य लोग उपवास को तप कहते हैं; क्या उपवास सचमुच तप है, या तप कुछ और है? भीष्म जी ने स्पष्ट किया कि लोग महीनों, पखवाड़ों या दिनों से नापे उपवास को तप मानते हैं, पर सज्जनों के मत में वह तप नहीं; वह तो आत्म-ज्ञान की प्राप्ति में बाधा है। कर्मों का त्याग और नम्रता (सब प्राणियों की पूजा और उनके प्रति विचार) ही परम तप है। ऐसे तप में लगा व्यक्ति सदा उपवासी और सदा ब्रह्मचारी माना जाता है, गृहस्थ में रहते हुए भी मुनि, देवता, सदा जागरूक और धर्म-पथ पर ही चलने वाला।
युधिष्ठिर ने पूछा कि ऐसा गृहस्थ सदा उपवासी, ब्रह्मचारी, यज्ञावशेष पर रहने वाला और अतिथि-सेवी कैसे कहलाएगा। भीष्म जी ने व्यावहारिक नियम दिए: जो दिन में एक बार और रात में एक बार नियत समय पर ही खाए, बीच में कुछ न खाए, वह सदा उपवासी; जो सदा सत्य बोले, ज्ञान का अनुसरण करे और केवल ऋतु-काल में पत्नी के पास जाए, वह ब्रह्मचारी; जो यज्ञ हेतु न मारे गए पशु का मांस न खाए, वह कठोर शाकाहारी; जो सदा दानशील रहे, वह सदा शुद्ध; जो दिन में निद्रा त्यागे, वह सदा जागरूक। जो सेवकों और अतिथियों को खिलाकर ही खाता है, वह अमृत-भोजी; जो देवों, पितरों, सेवकों और अतिथियों को तृप्त करने के बाद बचा खाता है, वह यज्ञावशेष-भोजी। ऐसे जन अगले जन्म में असंख्य सुख-लोक पाते हैं।
सार: केवल भूखे रहना तप नहीं, वह तो आत्म-ज्ञान में बाधा बन सकता है। सच्चा तप है कर्मों का त्याग और सब प्राणियों के प्रति विनम्रता। नियत समय भोजन, सत्य, ऋतु-काल मर्यादा, अहिंसक आहार, दान और जागरूकता; इन्हीं से गृहस्थ भी उपवासी, ब्रह्मचारी और यज्ञावशेष-भोजी कहलाता है।
प्रह्लाद और इन्द्र: कर्ता कौन है?
युधिष्ठिर ने एक गहरा प्रश्न उठाया: संसार में शुभ-अशुभ कर्म फल भोगने के लिए मनुष्य से जुड़ते हैं; तो क्या मनुष्य उनका कर्ता है या नहीं? “हे पितामह, इस विषय में मेरा मन सन्देह से भरा है; मैं इसे विस्तार से सुनना चाहता हूँ।”
भीष्म जी ने प्रह्लाद और इन्द्र का पुराना संवाद सुनाया। दैत्यों का स्वामी प्रह्लाद सब सांसारिक वस्तुओं से अनासक्त था, उसके पाप धुल चुके थे; मोह और अभिमान से रहित, सत्त्वगुण में स्थित, अनेक व्रतों में लगा वह स्तुति और निन्दा को समान मानता था। एक एकान्त कक्ष में वह आत्म-संयमी होकर समय बिताता। सोने और मिट्टी के ढेले को समान दृष्टि से देखने वाला, आत्म-अध्ययन और मोक्ष-साधना में स्थिर था।

एक दिन शक्र (इन्द्र) उसके पास आए और उसे जगाने की इच्छा से बोले: “हे राजन्, मैं आप में वे सब गुण स्थित देखता हूँ जिनसे व्यक्ति सबका आदर पाता है। आपकी बुद्धि शिशु-सी राग-द्वेष से मुक्त लगती है। आप आत्मा को जानते हैं। आप अब बन्धन में हैं, अपने पूर्व स्थान से गिरे, शत्रुओं के वश में, और समृद्धि से वंचित। आपकी दशा शोक उपजाने योग्य है। फिर भी, हे प्रह्लाद, आप शोक क्यों नहीं करते? यह ज्ञान के कारण है या धैर्य के?”
प्रह्लाद ने मधुर और प्रज्ञा-भरे वचनों में उत्तर दिया। बोला कि जो सब सृष्ट वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश को नहीं जानता, वही मोहित होता है; जो इन दोनों को जानता है, वह कभी मोहित नहीं होता। सब सत् और असत् अपने ही स्वभाव से उत्पन्न और लीन होते हैं; इसके लिए किसी पुरुष-प्रयत्न की आवश्यकता नहीं। अतः यह स्पष्ट है कि इस सबकी उत्पत्ति का कोई व्यक्तिगत कर्ता नहीं। यद्यपि वस्तुतः पुरुष (चित्) कुछ नहीं करता, फिर भी अज्ञान के प्रभाव से उस पर “मैं कर्ता हूँ” की चेतना छा जाती है। जो स्वयं को शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दूषित है और वह सत्य से अनभिज्ञ है।
प्रह्लाद ने तर्क रखा: “हे शक्र, यदि पुरुष सचमुच कर्ता होता, तो उसके अपने हित के सब कर्म अवश्य सफल होते, कोई विफल न होता। पर देखिए, अति प्रयत्न करने वालों के भी अनिष्ट का निवारण और इष्ट की प्राप्ति नहीं होती; तो पुरुष-प्रयत्न का क्या? और कुछ लोगों का बिना किसी प्रयत्न के अनिष्ट टल जाता और इष्ट सध जाता है। यह स्वभाव (प्रकृति) का ही फल है। कोई श्रेष्ठ बुद्धि वाला होकर भी कुरूप और अल्प-बुद्धि वालों से धन माँगता है। जब सब गुण, अच्छे या बुरे, स्वभाव की प्रेरणा से व्यक्ति में आते हैं, तो अपनी श्रेष्ठता पर गर्व करने का आधार क्या? यह सब स्वभाव से बहता है। यही मेरा निश्चय है। मोक्ष और आत्म-ज्ञान भी, मेरे मत में, इसी स्वभाव से बहते हैं।”
उसने एक तीखा दृष्टान्त दिया: जैसे कौआ खाते समय अपनी बार-बार की काँव-काँव से उस भोजन की उपस्थिति घोषित करता है, वैसे ही हमारे सब कर्म केवल स्वभाव के संकेत घोषित करते हैं। जो केवल प्रकृति के विकारों को जानता है, पर उस परम और स्वयंभू प्रकृति को नहीं, वह अज्ञान-वश मोहित होता है। प्रह्लाद बोला: “मैं जब जानता हूँ कि सब वस्तुएँ अस्थिर हैं और नैतिकता के सब विधानों का मूल क्या है, तब, हे शक्र, मैं शोक करने में असमर्थ हूँ। बिना आसक्ति, बिना अभिमान, बिना इच्छा-आशा के, सब बन्धनों से मुक्त, मैं सृष्ट वस्तुओं के उदय-अस्त को देखता हुआ महान सुख में समय बिता रहा हूँ।”
शक्र ने नम्रता से पूछा कि यह ज्ञान और यह शान्ति किस उपाय से प्राप्त हो। प्रह्लाद बोला: “सरलता से, सावधानी से, आत्मा को शुद्ध करने से, इन्द्रियों को जीतने से, और वृद्ध-गुरुजनों की सेवा से, हे शक्र, व्यक्ति मोक्ष पाता है। पर यह भी जान लीजिए कि बुद्धि भी प्रकृति से ही आती है, और शान्ति की प्राप्ति भी उसी से। जो कुछ और आप देखते हैं, वह सब प्रकृति का ही है।” यह सुनकर शक्र विस्मय से भर गए, प्रसन्न-मन उन वचनों की सराहना की, दैत्य-स्वामी की पूजा करके अपने धाम लौट गए।
समझने की कुंजी (कर्ता-भाव और स्वभाव): सांख्य की दृष्टि में पुरुष (आत्मा) अकर्ता साक्षी है; सब कर्म प्रकृति के गुण करते हैं। “मैं कर्ता हूँ” यह अभिमान अज्ञान से उपजता है। प्रह्लाद का प्रमाण यह है कि भरपूर प्रयत्न करने पर भी इष्ट नहीं मिलता और कभी बिना प्रयत्न के मिल जाता है; इसी से उनका निश्चय है कि अच्छे-बुरे सब गुण स्वभाव से आते हैं, इसलिए गर्व का कोई आधार नहीं, और ज्ञान तथा मोक्ष भी इसी स्वभाव से बहते हैं।
सार: कर्ता कौन के प्रश्न पर प्रह्लाद का उत्तर: पुरुष अकर्ता है, सब प्रकृति के स्वभाव से बहता है। इसी निश्चय से, बँधा और गिरा हुआ प्रह्लाद भी शोक से मुक्त रहता है। ज्ञान, शान्ति और मोक्ष तक स्वभाव से ही आते हैं।
वासव और वलि: समृद्धि छिन जाने पर राजा कैसे जिए
युधिष्ठिर ने विपत्ति-धर्म का मर्म पूछा: “हे पितामह, समृद्धि से वंचित और काल के भारी मुद्गर से कुचला हुआ राजा किस बुद्धि का सहारा लेकर इस पृथ्वी पर जीवित रहे?”
भीष्म जी ने वासव (इन्द्र) और विरोचन-पुत्र वलि का पुराना संवाद सुनाया। एक दिन इन्द्र सब असुरों को जीतकर पितामह (ब्रह्मा) के पास गए और हाथ जोड़कर पूछा कि वलि अब कहाँ है, वह वलि जिसका धन कितना ही लुटाने पर घटता न था, जो वायु था, वरुण था, सूर्य था, सोम था, अग्नि था जो सब प्राणियों को तपाता था, जो जल बनकर सबके काम आता था। “मुझे नहीं मिलता कि वह अब कहाँ है; हे ब्रह्मन्, बताइए।”
ब्रह्मा बोले: “हे मघवन्, इस समय वलि के विषय में ऐसा पूछना आपको शोभा नहीं देता। पर पूछे जाने पर असत्य भी नहीं बोलना चाहिए, इसलिए बता देता हूँ। हे सचीपति, वलि अब ऊँट, बैल, गधे या घोड़े में जन्म लेकर, अपनी जाति में अग्रणी होकर, किसी सूने स्थान में रह रहा होगा।” इन्द्र ने पूछा कि सूने स्थान में मिलने पर वे उसे मारें या छोड़ें। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा: “हे शक्र, वलि को मत मारना; वह वध-योग्य नहीं। इसके विपरीत, उससे धर्म का उपदेश माँगना।”
इन्द्र ऐरावत पर सवार होकर पृथ्वी पर घूमे और वलि को सूने स्थान में, गधे का रूप धारण किए, पाया। इन्द्र बोले: “हे दानव, अब आप गधा बने भूसा खाते हैं। यह जन्म निश्चय ही नीचा है। आप इसके लिए शोक करते हैं या नहीं? जो मैंने पहले कभी नहीं देखा वह आज देख रहा हूँ: आप शत्रुओं के वश में, समृद्धि और मित्रों से रहित, तेज और पराक्रम से हीन। पहले आप हजारों रथों और हजारों कुटुम्बियों के साथ संसारों में बढ़ते थे, सबको अपने तेज से तपाते और हमें कुछ न गिनते थे। आज आपको इस घोर विपत्ति में देख रहा हूँ; आप शोक करते हैं या नहीं?”
इन्द्र ने उसका बीता वैभव गिनाया: समुद्र के पूर्व तट पर बँटता उसका विशाल धन, उसके आगे नाचती हजारों दिव्य अप्सराएँ, कमल-मालाओं से सजी, स्वर्ण-सी कान्ति वाली; उसका रत्नजड़ित स्वर्ण-छत्र; उसके आगे नाचते बयालीस हजार गन्धर्व; उसके यज्ञ का पूरा स्वर्ण-निर्मित यूप-स्तम्भ; उसका लाखों गायें दान करना; शम्या-निक्षेप के विधान का पालन करते उसकी समस्त पृथ्वी की परिक्रमा। “अब मैं आपका वह स्वर्ण-कलश, वह छत्र, वे चामर नहीं देखता; हे असुर-राज, वह माला भी नहीं देखता जो आपको पितामह ने दी थी।”
वलि ने शान्ति से उत्तर दिया: “हे वासव, अब आप मेरा कलश, छत्र, चामर और पितामह की दी माला नहीं देखते। मेरी वे बहुमूल्य वस्तुएँ अब किसी गुफा के अन्धकार में दबी हैं। जब मेरा समय फिर आएगा, आप उन्हें फिर देखेंगे। पर आपका यह आचरण आपकी कीर्ति या जन्म के योग्य नहीं। आप समृद्धि में हैं और मुझ विपत्ति-ग्रस्त का उपहास करना चाहते हैं। जिन्होंने प्रज्ञा पाई और उससे सन्तोष, जो शान्त-आत्मा, सद्गुणी और श्रेष्ठ हैं, वे न विपत्ति में शोक करते हैं न सुख में हर्ष। तुच्छ बुद्धि से प्रेरित होकर आप डींग हाँकते हैं, हे पुरन्दर! जब आप मेरी जैसी दशा में पहुँचेंगे, तब ऐसे वचन न बोलेंगे।”
समझने की कुंजी (वलि): वलि विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का वंशज, दैत्यों का प्रतापी राजा था जिसने तीनों लोकों पर राज किया था। भीष्म आगे बताते हैं कि देवासुर-संग्राम के बाद वलि राजा बना था और विष्णु ने उसे छलकर इन्द्र को फिर देवताओं का राज्य दिलाया। यहाँ शान्ति-पर्व उसे विपत्ति में भी अविचल ज्ञानी के रूप में दिखाता है, जो काल के नियम को समझकर समृद्धि के लौटने तक धैर्य रखता है।
काल ही कर्ता है: वलि का उत्तर

इन्द्र फिर हँसते हुए, साँप-सा फुफकारते वलि से पहले से तीखे वचन बोले। पुनः उसका बीता वैभव और अब का एकाकीपन गिनाकर पूछा कि वह शोक करता है या नहीं।
वलि ने काल का दर्शन खोला: “हे शक्र, यह सब अनित्य मानकर, काल की गति का फल जानकर, मैं शोक नहीं करता। प्राणियों की ये देहें सब क्षणभंगुर हैं। इस गधा-रूप में कोई मेरा दोष नहीं। प्राण और देह अपने स्वभाव से साथ उत्पन्न होते, साथ बढ़ते और साथ नष्ट होते हैं। जैसे सब नदियों का अन्तिम विश्राम-स्थल समुद्र है, वैसे ही सब देहधारियों का अन्त मृत्यु है। जो यह भली भाँति जानते हैं, वे मोहित नहीं होते।”
वलि बोला कि जब कोई किसी को मारता है, तो केवल उसकी देह मारता है; और जो सोचता है कि “मैं ही मारता हूँ” वह स्वयं मारा जाता है, क्योंकि दोनों ही, मारने वाला और मारा जाने वाला, सत्य से अनभिज्ञ हैं। जो किसी को जीतकर अपने पुरुषार्थ की डींग हाँकता है, उसे जानना चाहिए कि वह कर्ता नहीं; कर्म किसी और वास्तविक कर्ता ने किया है। पृथ्वी, तेज, आकाश, जल और वायु, इन पाँच से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं; तो इस दशा-परिवर्तन पर मैं क्या शोक करूँ?
“विद्वान हो या अल्पज्ञ, बलवान हो या निर्बल, सुन्दर हो या कुरूप, भाग्यवान हो या अभागा, सब काल की अपनी ऊर्जा से बहा ले जाए जाते हैं, जो काल इतना गहरा है कि थाह नहीं। जब मैं जानता हूँ कि मुझे काल ने जीता है, तो शोक क्या? जो जलाता है, वह पहले से जली वस्तु जलाता है; जो मारता है, वह पहले से मरे को मारता है। यह काल समुद्र-सा है, जिसमें कोई द्वीप नहीं, कोई दूसरा तट नहीं, कोई सीमा नहीं। यदि मैं न समझता कि काल ही सब प्राणियों का नाश करता है, तो शायद हर्ष, अभिमान और क्रोध के भाव अनुभव करता।”
वलि ने इन्द्र को ललकारा भी: “आप मुझे यह सोचकर धिक्कारने आए कि मैं भूसा खाने वाले गधे का रूप धारण किए सूने स्थान में दिन काट रहा हूँ? यदि मैं चाहूँ तो अभी भी ऐसे भयानक रूप धारण कर सकता हूँ कि उनमें से किसी एक को देखकर आप भाग खड़े हों। काल ही सब देता है, काल ही सब छीन लेता है, काल ही सब विधान करता है। हे शक्र, अपने पुरुषार्थ की डींग मत हाँकिए।” फिर बोला कि कोई कुलीन, सुन्दर और पराक्रमी होकर भी अपने मन्त्रियों-मित्रों सहित दुःख में जीता है, क्योंकि ऐसा विधान था; और कोई नीच कुल में, ज्ञान-हीन, जन्म पर कलंक लिए भी सुख में जीता है, क्योंकि ऐसा विधान था। “हम जो हुए, यह हमारे किसी कर्म से नहीं, हे शक्र; और आप जो हैं, यह आपके किसी कर्म से नहीं। समृद्धि और उसका विपरीत बारी-बारी आते हैं।”
वलि ने काल को ब्रह्म कहा: “वेदज्ञ कहते हैं कि काल (अनन्तता) ही ब्रह्म है। पखवाड़े और मास उसकी देह हैं, दिन-रात उसके वस्त्र, ऋतुएँ उसकी इन्द्रियाँ, वर्ष उसका मुख। कोई इस सम्पूर्ण विश्व को ही ब्रह्म कहते हैं; पर वेद सिखाते हैं कि आत्मा को ढकने वाले पाँच कोशों को ब्रह्म मानना चाहिए। ब्रह्म गहरा और अगम्य है, जल के विशाल समुद्र-सा। वह न आदि वाला न अन्त वाला, अविनाशी भी और विनाशशील भी कहा जाता है। स्वयं निर्गुण होकर भी वह सब वस्तुओं में प्रवेश करके गुण धारण कर लेता है।”
वलि ने इन्द्रों की परम्परा गिनाई: “हजारों इन्द्र बीत चुके, हे वासव, हर एक महान बल और पराक्रम वाला। आप भी उसी प्रकार बीत जाएँगे। काल सब बहा ले जाता है; इसलिए, हे इन्द्र, डींग मत हाँकिए। यह राज-समृद्धि जिसे आप अतुलनीय मानते हैं, पहले मेरी थी; यह अस्थिर और असार है, एक स्थान पर देर तक नहीं ठहरती। आपसे पहले हजारों इन्द्रों में बसी, सब आपसे श्रेष्ठ थे। अस्थिर होने से, मुझे छोड़कर अब आप तक आई है। फिर डींग मत हाँकिए; शान्त हो जाइए। आपको अभिमान से भरा जानकर वह बहुत शीघ्र आपको छोड़ देगी।”
सार: वलि का परम-तत्त्व यह है कि न मैं कर्ता हूँ, न इन्द्र, न कोई और; काल ही कर्ता है, काल ही ब्रह्म है, काल ही रक्षा और संहार करता है। समृद्धि अस्थिर है, बारी-बारी सबके पास आती-जाती है। इसी ज्ञान से विपत्ति में राजा अविचल रहता है: न शोक, न अभिमान।
श्री वलि को छोड़कर इन्द्र में बसती है

इसके बाद सौ-यज्ञ वाले इन्द्र ने देखा कि उस महात्मा वलि की देह से समृद्धि की देवी, अपने तेजोमय साकार रूप में, बाहर निकल रही है। शिरोभूषण से अलंकृत, बाहों पर स्वर्ण-केयूर पहने, चारों ओर तेज की आभा बिखेरती उस देवी को देखकर इन्द्र ने विस्मय से फैली आँखों से वलि से पूछा कि यह कौन है जो उसकी देह से निकल रही है।
वलि बोला: “मैं नहीं जानता कि वह असुर-कन्या है, देव-कन्या है, या मानवी। आप स्वयं उससे पूछ लें; जो आपको रुचे, वही करें।” इन्द्र ने देवी से उसका नाम और परिचय पूछा।
श्री ने उत्तर दिया: “विरोचन ने मुझे नहीं जाना, और विरोचन-पुत्र यह वलि भी नहीं जानता। विद्वान मुझे दुःसहा कहते हैं, कुछ विधित्सा कहते हैं। मेरे और भी नाम हैं, हे वासव: भूति, लक्ष्मी और श्री। हे शक्र, न आप मुझे जानते हैं, न देवों में कोई।” इन्द्र ने पूछा कि वह वलि में दीर्घकाल बसकर अब उसे क्यों छोड़ रही है; क्या यह उसके किसी कर्म से है या वलि के किसी कर्म से। श्री बोली: “न ब्रह्मा मुझ पर शासन करते हैं, न विधाता; काल ही मुझे एक से दूसरे स्थान ले जाता है। हे शक्र, वलि की अवहेलना मत करना।”
इन्द्र ने फिर पूछा कि वह वलि को क्यों छोड़कर उनके पास क्यों आ रही है। श्री ने स्पष्ट कारण बताए: “मैं सत्य में, दान में, उत्तम व्रतों में, तप में, पराक्रम में और सद्गुण में बसती हूँ। वलि इन सब से च्युत हो गया है। पहले वह ब्राह्मणों के प्रति समर्पित, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था। बाद में वह ब्राह्मणों से शत्रुता रखने लगा और मलिन हाथों से घृत छूने लगा। पहले वह सदा यज्ञों में लगा रहता था; अन्त में, अज्ञान से अन्धा और काल से पीड़ित होकर, सबके सामने डींग हाँकने लगा कि मेरी उसकी उपासना निरन्तर है। इन दोषों के कारण उसे छोड़कर अब, हे शक्र, मैं आप में बसूँगी। आप मुझे अप्रमाद से, तप और पराक्रम से सँभालिए।”
इन्द्र ने सच्चाई से कहा कि देवों, मनुष्यों और सब प्राणियों में कोई ऐसा नहीं जो उसे सदा सँभाल सके। श्री ने भी स्वीकार किया कि देवों, गन्धर्वों, असुरों या राक्षसों में कोई उसे सदा धारण नहीं कर सकता। इन्द्र ने पूछा कि वह कैसे आचरण करे कि श्री सदा उसमें बसी रहे। श्री ने उपाय बताया: “हे देव-श्रेष्ठ, वेदोक्त विधान से मुझे चार भागों में बाँट दे।”
तब इन्द्र ने भार उठाने की सामर्थ्य के अनुसार श्री के चार भाग बाँटे। बोले: “मनुष्यों में पृथ्वी, सब वस्तुओं की जननी, सबको धारण करती है; वह आपका एक चौथाई धारण करेगी।” श्री ने एक चौथाई पृथ्वी पर स्थापित किया। दूसरा भाग जल में, क्योंकि जल अपने द्रव-रूप से मनुष्यों की भाँति-भाँति सेवा करता है। तीसरा भाग अग्नि में, क्योंकि वेद, यज्ञ और देवता अग्नि में स्थित हैं। और अन्तिम चौथाई उन सज्जनों में जो ब्राह्मणों के प्रति समर्पित और सत्यवादी हैं, क्योंकि सज्जनों में उसे धारण करने की सामर्थ्य है। श्री ने अपने चारों भाग इन्हें सौंपकर इन्द्र से अपनी रक्षा करने को कहा। इन्द्र ने वचन दिया कि जो भी इन भागों में श्री का अपराध करेगा, उसे वे दण्ड देंगे।
एक उप-कथा: श्री के जाने पर भी वलि अविचल रहा और बोला कि अभी सूर्य पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण समान चमकता है; पर जब वह सब दिशाओं से सिमटकर केवल सुमेरु के मध्य ब्रह्मा के लोक पर ही चमकेगा, तब देवों और असुरों में फिर महायुद्ध होगा और उसमें वह सबको जीतेगा। इन्द्र ने उत्तर दिया कि ब्रह्मा ने उसे मारने से मना किया है, इसी से वे वज्र नहीं चलाते; वलि जहाँ चाहे जाए, उसे शान्ति मिले। पर सूर्य कभी केवल मध्याह्न से ही नहीं चमकेगा, क्योंकि स्वयंभू ने पहले ही सूर्य की गति के नियम बना दिए हैं: छह मास उत्तरायण, छह मास दक्षिणायन, जिससे शीत और ग्रीष्म बनते हैं। तब वलि दक्षिण की ओर चला गया, पुरन्दर उत्तर की ओर, और इन्द्र वलि के अभिमान-रहित वचन सुनकर आकाश में आरूढ़ हो गए।
सार: समृद्धि (श्री-लक्ष्मी) किसी में सदा नहीं रहती; काल उसे एक से दूसरे में ले जाता है। वह सत्य, दान, व्रत, तप और ब्राह्मण-भक्ति में बसती है, और इनके लोप से छोड़कर चली जाती है। इन्द्र उसे पृथ्वी, जल, अग्नि और सज्जनों में बाँटकर स्थिर करते हैं। राजा के लिए सीख: समृद्धि को बाँटिए और धर्म से धारण कीजिए, तो वह टिकती है।
नमुचि का उपदेश: शोक से कुछ नहीं सुधरता
भीष्म जी ने इन्द्र और असुर नमुचि का पुराना संवाद भी सुनाया। नमुचि, जो सब प्राणियों के जन्म-मृत्यु का ज्ञाता था, अपने स्थान से गिरा, बँधा और समृद्धि से वंचित होकर भी विशाल शान्त समुद्र-सा अविचल बैठा था। पुरन्दर ने उससे पूछा: “हे नमुचि, स्थान से गिरे, रस्सियों में बँधे, शत्रुओं के वश में और समृद्धि से हीन आप शोक करते हैं या प्रसन्न दिन बिताते हैं?”
नमुचि ने उत्तर दिया: “जिस शोक को टाला नहीं जा सकता, उसमें डूबकर व्यक्ति केवल अपनी देह घटाता और शत्रुओं को प्रसन्न करता है। फिर, कोई दूसरे का शोक उसका कुछ अंश लेकर हल्का नहीं कर सकता। इन्हीं कारणों से, हे शक्र, मैं शोक नहीं करता। यह सब जो आप देखते हैं, उसका एक ही अन्त है। शोक रूप, समृद्धि, आयु और धर्म तक को नष्ट कर देता है।” फिर उसने एकमेव विधाता का सिद्धान्त रखा: “एक ही विधाता है, दूसरा नहीं; उसका नियन्त्रण गर्भ में पड़े प्राणी तक पर है। उसके चलाए मैं वैसे ही चलता हूँ जैसे ढलान पर बहता जल। अस्तित्व और मोक्ष को जानता हूँ, और यह भी कि मोक्ष श्रेष्ठ है, फिर भी मैं उसके लिए विशेष यत्न नहीं करता; धर्म की ओर और उसके विपरीत दोनों दिशा के कर्म करता हुआ, जैसे वह मुझे चलाता है वैसे चलता हूँ।”
नमुचि बोला: “मनुष्य काल-क्रम से बारी-बारी आने वाले सुख-दुःख से प्रभावित होते हैं; इसमें किसी का व्यक्तिगत कर्तृत्व नहीं। शोक यहीं है कि जो शोक से घृणा करता है, वही स्वयं को कर्ता मानता है। ऋषियों, देवों, महान असुरों, त्रिवेदज्ञों और वनवासी तपस्वियों में, ऐसा कौन है जिसके पास विपत्ति न आती हो? पर जो आत्मा और अनात्मा को जानते हैं, वे विपत्ति से नहीं डरते। प्रज्ञावान हिमवान-सा अचल खड़ा रहता है, क्रोध को वश में रखता है, इन्द्रिय-विषयों में नहीं फँसता, शोक में म्लान या सुख में हर्षित नहीं होता।” फिर उसने गौतम का उदाहरण दिया कि बुद्धिमान वृद्धावस्था में सीधी विपत्ति से अपने स्थान से गिर भी जाए, तो भी मूढ़ नहीं होता।
नमुचि ने नियति का अन्तिम सूत्र दिया: “मन्त्र, बल, ऊर्जा, प्रज्ञा, पराक्रम, आचरण या धन की समृद्धि, इनमें से किसी से भी क्या कोई वह पा सकता है जो उसके लिए पाना नियत नहीं था? तो जिस पर मन लगाया उसके न मिलने का शोक क्या? मेरे जन्म से पहले ही जिनके हाथ में यह है, उन्होंने तय कर दिया कि मुझे क्या करना और सहना है; मैं वही पूरा कर रहा हूँ। तो मृत्यु मेरा क्या बिगाड़ेगी? जो पाना नियत है वही मिलता है, जहाँ जाना नियत है वहीं जाते हैं। जो यह पूरी तरह जानकर मूढ़ नहीं होता और सुख-दुःख दोनों में सन्तुष्ट रहता है, वही श्रेष्ठ है।”
सार: नमुचि का उपदेश विपत्ति-धर्म का व्यावहारिक रत्न है: शोक से कुछ नहीं सुधरता, उल्टा देह, समृद्धि, आयु और धर्म घटते हैं। एक ही विधाता है; जो नियत है वही होगा। आत्म-ज्ञानी हिमवान-सा अचल रहता है, सुख-दुःख दोनों में सन्तुष्ट।
धैर्य ही परम हित: वलि-वासव की दूसरी भेंट
युधिष्ठिर ने पूछा: “जब मित्र छिन जाएँ या राज्य चला जाए, ऐसी घोर विपत्ति में डूबे व्यक्ति के लिए परम हितकर क्या है? आप ही हमारे आचार्यों में अग्रणी हैं; बताइए।”
भीष्म जी बोले कि जिसके पुत्र, पत्नियाँ, सब प्रकार के भोग और धन छिन गए और जो घोर विपत्ति में पड़ा है, उसके लिए धैर्य ही परम हित है। धैर्यवान की देह दुबली नहीं होती; शोक-रहितता में सुख और श्रेष्ठ सम्पदा-रूपी स्वास्थ्य निहित है, और इसी देह-स्वास्थ्य से फिर समृद्धि पाई जा सकती है। जो विपत्ति में भी धर्म-आचरण पर डटा रहता है, वह समृद्धि, धैर्य और अपने सब उद्देश्यों की सिद्धि पाता है।
फिर भीष्म जी ने वलि और वासव की दूसरी भेंट सुनाई। देवों-असुरों के युद्ध के बाद वलि राजा बना, पर विष्णु से छला गया, और इन्द्र फिर देवों का अधिपति हुआ। चारों वर्ण अपने-अपने धर्म में फिर स्थापित हुए, तीनों लोक समृद्धि से उमड़े। तब रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनों, ऋषियों, गन्धर्वों और सिद्धों से घिरे इन्द्र चार-दाँतों वाले ऐरावत पर सवार होकर लोकों में विचरण करने लगे। एक दिन समुद्र-तट की एक पर्वत-गुफा में उन्होंने विरोचन-पुत्र वलि को देखा।
वलि को निर्भय और अविचल देखकर इन्द्र ने ऐरावत की पीठ से पूछा: “हे दैत्य, आप इतने अविचल कैसे हैं? यह आपकी वीरता से है, या वृद्धों की सेवा से, या तप से शुद्ध मन से? जो भी हो, ऐसा मन-भाव बहुत कठिन है। परम ऊँचे स्थान से गिरे, सब सम्पत्ति से वंचित, शत्रुओं के वश में, फिर भी शोक का अवसर होते हुए आप शोक नहीं करते। आप पहले देवता थे, अपने पितरों के सिंहासन पर बैठे। आज शत्रुओं से लुटे हुए, वरुण-पाश में बँधे और मेरे वज्र से आहत, आपकी पत्नियाँ और धन छिन गए, फिर भी आप शोक नहीं करते; यह तो परम विस्मय है।”
वलि ने निर्भय उत्तर दिया: “हे शक्र, जब विपत्ति ने मुझे दबा रखा है, तब इस डींग से आपको क्या मिलता है? आज आप वज्र उठाए मेरे सामने खड़े हैं; पर पहले आप ऐसा न कर सकते थे, अब किसी प्रकार वह शक्ति पा गए हैं। जो दण्ड देने में समर्थ होकर भी, वश में आए वीर शत्रु पर दया करता है, वही सच्चा श्रेष्ठ पुरुष है। जब दो लड़ते हैं तो विजय अनिश्चित रहती है; एक जीतता है, एक हारता है। हे देव-श्रेष्ठ, यह मत समझिए कि आपने अपने बल से सबको जीतकर सबका अधिपति बना। हम जो हुए, वह हमारे किसी कर्म से नहीं; आप जो हुए, वह आपके किसी कर्म से नहीं। आज मैं जो हूँ, कल आप वही होंगे।”
वलि ने काल का सिद्धान्त और गहराई से खोला: “माता-पिता की सेवा, देवों की उपासना, किसी सद्गुण का अभ्यास, इनमें से कोई सुख नहीं दे सकता। न ज्ञान, न तप, न दान, न मित्र, न कुटुम्बी काल से पीड़ित को बचा सकते हैं। हजार उपायों से भी आती विपत्ति टलती नहीं; बुद्धि और बल वहाँ व्यर्थ हैं। आपका स्वयं को कर्ता मानना ही सब शोक की जड़ है। यदि प्रत्यक्ष कर्ता ही वास्तविक कर्ता होता, तो वह स्वयं किसी और की कृति न होता; पर चूँकि वह किसी और का बनाया है, वही दूसरा परम सत्ता है जिससे ऊपर कुछ नहीं। काल की सहायता से मैंने आपको जीता था, काल की सहायता से आपने मुझे।”
वलि ने बीते दैत्य-राजाओं की विशाल सूची गिनाई, जो काल से अधिक बलवान सिद्ध हुआ। पृथु, ऐल, मय, भीम, नरक, सम्वर, अश्वग्रीव, पुलोमन, स्वर्भानु, प्रह्लाद, नमुचि, दक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन, हृनिषेव, सुहोत्र, भूरिहन, और अनेक और; हिरण्यकशिपु और दानव कैटभ तक, ये सब और बहुत-से अनाम, सुदूर युगों के महान दैत्य-दानव-राक्षस। सब धर्म-परायण थे, महान यज्ञ करते थे, आकाश में विचरण कर सकते थे, युद्ध में पीठ न दिखाते थे, सत्य-व्रत के दृढ़, वेद-वेदाङ्ग के ज्ञाता, महान बल और समृद्धि वाले; फिर भी किसी में सम्प्रभुता का अभिमान न था, सब उदार और सबके प्रति उचित आचरण करते थे। पर वे सब काल से बहा दिए गए। काल सबको परास्त कर देने वाला सिद्ध हुआ।
वलि ने इन्द्र को चेताया: “हे शक्र, स्पष्ट है कि पृथ्वी भोगकर जब आपको भी इसे छोड़ना होगा, आप अपना शोक रोक न सकेंगे। भोग और प्रिय वस्तुओं की यह लालसा त्याग दीजिए; समृद्धि से उपजे इस अभिमान को त्याग दीजिए; तभी सम्प्रभुता के लोप का शोक सह सकेंगे। दुःख की घड़ी में शोक मत कीजिए, सुख की घड़ी में हर्ष मत कीजिए। भूत और भविष्य की उपेक्षा करके वर्तमान में सन्तोष से जिएँ। आपके शासन के वे हजार दिव्य वर्ष भी समाप्त होंगे; तब आप भी गिरेंगे और आपके अंग मेरे जैसे दुर्बल हो जाएँगे। मैं और आप, और भविष्य के सब देवराज, उसी मार्ग पर जाएँगे जिस पर आपसे पहले सैकड़ों इन्द्र जा चुके। काल अप्रतिरोध्य है।”
वलि ने अन्त में स्पष्ट कहा: “मैं कर्ता नहीं, आप कर्ता नहीं, और कोई कर्ता नहीं; जो वास्तव में सर्वशक्तिमान है, वही कर्ता है। वह काल मुझे वृक्ष पर पके फल की तरह गिराने को पका रहा है। समय आने पर वही आपको भी पकाएगा। काल के गुणों से परिचित होकर, जब काल ने ही मुझ पर आक्रमण किया है, तब मुझे शोक नहीं करना चाहिए। शोक हमारा कोई हित नहीं करता; उल्टे शोक हमारी शक्ति नष्ट करता है। इसी से मैं शोक नहीं करता।”
दैत्य-राज के ये वचन सुनकर सौ-यज्ञ वाले सहस्र-नेत्र इन्द्र ने अपना क्रोध रोका और बोले कि उनकी वज्र-सज्जित उठी भुजा और वरुण के पाश देखकर स्वयं संहारक तक की बुद्धि डगमगा जाती, पर वलि की सत्य-दर्शी बुद्धि अपने धैर्य के कारण अविचल रही। इन्द्र ने माना कि वे भी जानते हैं यह जगत अनित्य है और काल की छिपी, सतत जलती, अनन्त ज्वाला में पड़ा है। काल का कोई स्वामी नहीं, वह सदा जागरूक है और सबको अपने भीतर पका रहा है; जो “यह आज करूँगा, वह कल” कहता है, उसे नदी की धारा-सा बहा ले जाता है; धन, सुख, पद, समृद्धि, सब काल के शिकार हैं।
समझने की कुंजी (काल): इन वलि-वासव संवादों में ‘काल’ केवल बीतता समय नहीं; सर्वशक्तिमान विधाता-तत्त्व है, जिसे वलि ब्रह्म से एक करता है। राजनीतिक सीख यह है कि विजय-पराजय और समृद्धि-दरिद्रता काल का खेल हैं; इसलिए विजेता को विनम्र और विजित को धैर्यवान रहना चाहिए। महाभारत यहाँ कर्तृत्व के अभिमान को ही दुःख की जड़ बताता है।
इन्द्र ने वलि की प्रशंसा करते हुए, अहिंसा को परम धर्म कहकर, करुणा से उसे बन्धन-मुक्त करने की इच्छा प्रकट की। बोले कि वरुण के ये पाश काल-क्रम में मनुष्यों के दुराचार से अपने-आप ढीले पड़ेंगे: जब बहू सास से काम कराएगी, पुत्र मोह-वश पिता को अपने लिए काम करने का आदेश देगा, चारों वर्ण सब मर्यादाएँ तोड़ देंगे, तब आपके ये बन्धन एक-एक करके ढीले होंगे। “हमसे आपको कोई भय नहीं; शान्त रहिए, सुखी रहिए, शोक-रहित होइए, आपका मन प्रसन्न रहे, आपको कोई रोग न हो।” यह कहकर इन्द्र अपने धाम लौट गए, और अग्नि फिर घृत-आहुतियाँ ग्रहण करने लगी।
सार: विपत्ति में राजा के लिए परम हित धैर्य है; धैर्य से स्वास्थ्य, स्वास्थ्य से फिर समृद्धि आती है। वलि-वासव संवाद का सार: सैकड़ों इन्द्र और दैत्य-राज काल से बहा दिए गए; कर्तृत्व का अभिमान ही शोक की जड़ है। विजेता इन्द्र भी अन्ततः अहिंसा और करुणा अपनाकर शत्रु को मुक्त करता है।
श्री और शक्र: समृद्धि के आने-जाने के लक्षण
युधिष्ठिर ने पूछा कि व्यक्ति के भावी उत्थान और भावी पतन के लक्षण क्या हैं। भीष्म जी बोले कि मन ही व्यक्ति की भावी समृद्धि और पतन के पूर्व-संकेत देता है, और श्री तथा शक्र का पुराना संवाद सुनाया।
महान तपस्वी नारद एक दिन भोर में स्नान के लिए गंगा गए, जहाँ वह ध्रुव नामक मार्ग से निकलती है। वहीं सहस्र-नेत्र इन्द्र भी आए। ऋषि और देवता, दोनों संयमी, स्नान और मौन-जप के बाद साथ बैठ गए और प्राचीन इतिहास की कथाएँ कहने-सुनने लगे। तभी उन्होंने उगते सूर्य की विपरीत दिशा में आकाश में एक तेजोमय वस्तु देखी, मानो दूसरा सूर्य हो, जो धीरे-धीरे उनकी ओर आ रही थी। गरुड़ और सूर्य से अलंकृत विष्णु के वाहन पर सवार वह तेज स्वयं श्री थीं, अनेक अप्सराओं से घिरी, मानो विशाल सूर्य-मण्डल हो।
इन्द्र ने सादर पूजा करके पूछा कि वे कौन हैं और किस प्रयोजन से आई हैं। श्री बोलीं: “तीनों लोक मंगल-बीजों से भरे हैं और सब प्राणी पूरे मन से मुझसे संयोग चाहते हैं। मैं वही पद्मा, श्री, हूँ जो सूर्य-किरणों के स्पर्श से खिले कमल से, सब प्राणियों की समृद्धि के लिए, प्रकट हुई। मैं लक्ष्मी, भूति और श्री कहलाती हूँ। मैं श्रद्धा हूँ, बुद्धि हूँ, सम्पदा हूँ, विजय हूँ, स्थिरता हूँ, धैर्य हूँ, सिद्धि हूँ, समृद्धि हूँ; मैं स्वाहा, स्वधा, श्रद्धा, भाग्य और स्मृति हूँ। मैं विजयी और धर्मात्मा राजाओं की पताकाओं पर, उनके घरों-नगरों में बसती हूँ। मैं उन वीरों के साथ रहती हूँ जो विजय के अभिलाषी हैं और युद्ध से नहीं हटते, और उनके साथ जो धर्म में दृढ़, बुद्धिमान, सत्यवादी, नम्र और उदार हैं। पहले मैं असुरों के साथ रहती थी, क्योंकि वे सत्य और पुण्य से बँधे थे; पर अब वे विपरीत स्वभाव के हो गए हैं, इसलिए उन्हें छोड़कर आप में बसना चाहती हूँ।”
इन्द्र ने पूछा कि असुरों के किस आचरण से वे उनके साथ रहती थीं और अब क्या देखकर छोड़ आईं। श्री ने दानवों के पुराने सद्गुण गिनाए: वे घर स्वच्छ रखते, यज्ञ-अग्नि में आहुति देते, गुरुओं की सेवा करते, इन्द्रिय-संयमी, ब्राह्मणों के आज्ञाकारी और सत्यवादी थे; श्रद्धालु, क्रोध-विजयी, दानशील, ईर्ष्या-रहित, कृतज्ञ और मधुर-भाषी; पवित्र-दिनों पर स्नान, सुगन्ध-धारण और व्रत-उपवास करते; दीन, वृद्ध, दुर्बल, रोगी और स्त्रियों पर दया करके अपना सब-कुछ बाँटते; पितरों-देवों-अतिथियों को तृप्त करके ही बचा खाते; पर-स्त्री के पास न जाते; सब पर अपने-समान दया करते; दान, सरलता, नम्रता और क्षमा में अग्रणी थे। इन्हीं गुणों से श्री सृष्टि के आरम्भ से अनेक युगों तक उनके साथ रहीं।
“पर समय बदला,” श्री बोलीं, “और दानवों का चरित्र बदल गया। धर्म उन्हें छोड़ गया; वे काम-क्रोध के वश हो गए। निम्न लोग श्रेष्ठ-योग्य वृद्धों से शत्रुता करने और सभाओं में उन पर हँसने लगे; युवक उठकर अभिवादन न करते; पुत्र पिता के सामने अधिकार जताने और उन पर शासन करने लगे, पत्नियाँ पतियों पर। हवन-अग्नियों की उज्ज्वल ज्वालाएँ बुझ गईं, रात में चीख-पुकार बढ़ी। माता-पिता, वृद्ध, गुरु और अतिथि आदर खोने लगे।”
श्री ने पतन की पूरी सूची गिनाई: देवों-पितरों को अर्पण और दान-अंश दिए बिना सब स्वयं खा जाते; रसोइए शुद्धि न रखते; अन्न आँगन में बिखरा कौओं-चूहों के हवाले रहता; धोए बिना हाथों से घृत छूते; गृहणियाँ घर और पशुओं की देखभाल छोड़ देतीं; अपने दासों के लिए भोजन बनातीं पर देवों-अतिथियों के लिए नहीं; यज्ञ में न मारे पशु का मांस खातीं; सूर्योदय के बाद तक सोतीं; घर-घर कलह होता; शूद्र तप करने लगे, अयोग्य लोग श्राद्ध में खिलाए जाते; शिष्य गुरु-सेवा छोड़ देते और गुरु शिष्यों को मित्र-समान मानते; वृद्ध माता-पिता पुत्रों से भीख माँगने को विवश हुए; लोग कृतघ्न और पापी होकर गुरु-पत्नियों से व्यभिचार, निषिद्ध भोजन और सब मर्यादाओं का भंग करने लगे। इन्हीं दुष्ट लक्षणों को देखकर श्री उन्हें छोड़ इन्द्र के पास आ गईं।
श्री ने यह भी कहा कि वे जहाँ रहती हैं, वहाँ जया को आठवीं मानकर सात अन्य देवियाँ भी रहना चाहती हैं, जो उनसे प्रेम करती और उन पर निर्भर हैं: आशा, श्रद्धा, बुद्धि (धृति), सन्तोष, विजय, उन्नति और क्षमा; और आठवीं जया, जो उनमें अग्रणी है। ये सब असुरों को छोड़कर इन्द्र के लोक में आ गई हैं। तब नारद और इन्द्र ने श्री का सहर्ष स्वागत किया; वायु मधुर सुगन्ध लिए धीरे बहने लगा; देवता शुभ स्थान में एकत्र हुए; आकाश से अमृत बरसा; बिना बजाए दुन्दुभियाँ बज उठीं; इन्द्र ने ऋतु-ऋतु में फसलों पर वर्षा की; कोई धर्म-पथ से न डिगा; पृथ्वी रत्नों की खानों से सज गई; गायें मधुर दूध देने लगीं; कठोर वचन रुक गए। जो इस श्री-गौरव-गान को ब्राह्मण-सभाओं में पढ़ते-सुनते हैं, वे महान समृद्धि पाते हैं।
सार: समृद्धि-पतन के लक्षण मन और आचरण में हैं। श्री सत्य, संयम, सेवा, दान और मर्यादा वाले समाज में बसती है; और जहाँ बड़ों का अनादर, अधर्म से धन, मर्यादा-भंग और कृतघ्नता फैलती है, वहाँ से चली जाती है। दैत्यों के उत्थान और पतन की यह कथा हर राजा और समाज के लिए दर्पण है।
जैगीषव्य, नारद और व्यास-शुक: काल और परम तत्त्व पर
युधिष्ठिर ने पूछा कि किस स्वभाव, किस आचरण, किस ज्ञान और किस ऊर्जा से व्यक्ति उस अविनाशी ब्रह्म को पाता है जो प्रकृति की पकड़ से परे है। भीष्म जी बोले कि निवृत्ति-धर्म में लगा, अल्पाहारी और जितेन्द्रिय व्यक्ति उस ब्रह्म को पाता है, और जैगीषव्य तथा असित का संवाद सुनाया।
असित-देवल ने महाप्रज्ञ जैगीषव्य से पूछा: “स्तुति से आप प्रसन्न नहीं होते, निन्दा से क्रुद्ध नहीं होते। आपकी यह प्रज्ञा कौन-सी है? कहाँ से पाई? और उसका आश्रय क्या है?” जैगीषव्य ने उत्तर दिया कि वे जो स्तुति और निन्दा करने वालों के प्रति समान रहते हैं, जो अपने व्रत-सत्कर्म छिपाते हैं, जो आक्षेप नहीं करते, जो हित-वचन भी तब नहीं कहते जब वह लाभ के बजाय हानि पहुँचाए, और जो उपकार-बदले-अपकार की कामना नहीं करते, वे ही प्रज्ञावान हैं। वे भविष्य के लिए शोक नहीं करते, केवल वर्तमान-कर्तव्य से जुड़े रहते हैं, बीते का शोक या स्मरण नहीं करते। निन्दा से क्यों खिन्न और स्तुति से क्यों प्रसन्न हों? जिसने वस्तुओं का सत्य समझ लिया, उसे अनादर भी अमृत-सा तृप्त करता है, और आदर विष-सा खटकता है। जिसने सब इन्द्रियाँ जीत लीं, वह मानो सब यज्ञ कर चुका, और उस ब्रह्म को पाता है जो शाश्वत है और प्रकृति की पकड़ से परे है।
युधिष्ठिर ने पूछा कि वह कौन व्यक्ति है जो सबको प्रिय है, सबको आनन्दित करता है और हर गुण-कौशल से युक्त है। भीष्म जी ने केशव (कृष्ण) के वे वचन सुनाए जो उन्होंने उग्रसेन के पूछने पर नारद के गुणों के विषय में कहे थे। वासुदेव ने नारद के गुण गिनाए: वे शास्त्रों में जितने विद्वान, आचरण में उतने ही सज्जन और पवित्र, फिर भी अभिमान-रहित; असन्तोष, क्रोध, चपलता और भय उनमें नहीं; आलस्य से मुक्त, साहसी, इच्छा या लोभ से वचन न तोड़ने वाले; आत्म-ज्ञान के सिद्धान्तों के ज्ञाता, शान्ति-प्रिय, निष्कपट, सत्यवादी; सबको समान दृष्टि से देखने वाले, इसलिए न किसी से प्रेम न द्वेष; सुनने वाले को प्रिय वचन कहने वाले; मधुर-भाषी, निर्मल-काय, ईर्ष्या-रहित; योग में अतृप्त, सदा सावधान और उद्यमी; दूसरों के रहस्य न खोलने वाले; बड़ी प्राप्ति पर भी हर्ष-रहित और हानि पर भी दुःख-रहित। इन्हीं गुणों से नारद सर्वत्र पूजे जाते हैं।
अन्त में युधिष्ठिर ने सब प्राणियों के आदि-अन्त, उनके ध्यान-कर्म, काल के विभाग और युगों में आयु जानने की इच्छा प्रकट की। भीष्म जी ने व्यास और उनके पुत्र शुक का संवाद सुनाया। समस्त वेद, उनके अंग और उपनिषद् पढ़कर ब्रह्मचर्य-जीवन के इच्छुक शुक ने अपने पिता, द्वीप-जन्मा (व्यास) से वही प्रश्न पूछे। शुक ने पूछा कि सब प्राणियों का सृष्टा कौन है, काल के ज्ञान से कैसे जाना जाता है, और ब्राह्मण के क्या कर्तव्य हैं।
व्यास बोले: “केवल ब्रह्म, जो अनादि-अनन्त, अजन्मा, तेजोमय, अक्षय, अपरिवर्तनीय, अविनाशी, अचिन्त्य और ज्ञान से परे है, सृष्टि से पहले रहता है।” फिर उन्होंने ऋषियों द्वारा नापे काल के विभाग बताए: पन्द्रह निमेष से एक काष्ठा; तीस काष्ठा से एक कला; तीस कला और एक कला का दसवाँ अंश मिलाकर एक मुहूर्त; तीस मुहूर्त से एक दिन-रात; तीस दिन-रात से एक मास; बारह मास से एक वर्ष, जो दो अयनों (उत्तरायण और दक्षिणायन) से बनता है। मनुष्यों का एक मास पितरों का एक दिन-रात है; मनुष्यों का एक वर्ष देवों का एक दिन-रात है।
व्यास ने युगों का माप बताया: देवों के चार हजार वर्ष कृत-युग की अवधि है, जिसकी सन्ध्या चार सौ और सन्ध्यांश चार सौ वर्ष, अर्थात कुल चार हजार आठ सौ। आगे के युगों में अवधि एक-एक चौथाई घटती है: त्रेता तीन हजार (सन्ध्या-सन्ध्यांश तीन-तीन सौ), द्वापर दो हजार (दो-दो सौ), कलि एक हजार (एक-एक सौ)। कृत में सब धर्म पूरे, सत्य सहित; आगे के युगों में धर्म एक-एक चौथाई घटता है, और चोरी, असत्य तथा छल से पाप बढ़ता है। कृत में सब निरोग और चार सौ वर्ष जीते; आगे आयु घटती जाती है। कृत में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ, और कलि में केवल दान प्रधान है। देवों के ये बारह हजार वर्ष एक युग कहलाते हैं; ऐसे एक हजार युग ब्रह्मा का एक दिन हैं, उतनी ही उनकी रात। ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सृष्टि उठती है; प्रलय में सृष्टा योग-निद्रा में सोता है, और निद्रा बीतने पर जागता है।
समझने की कुंजी (काल के विभाग, आधुनिक समतुल्य): निमेष अर्थात पलक झपकना। पन्द्रह निमेष = एक काष्ठा; तीस काष्ठा = एक कला; लगभग तीस कला = एक मुहूर्त (लगभग 48 मिनट); तीस मुहूर्त = एक दिन-रात। देव-वर्ष = मनुष्य के 360 वर्ष। चार युग (कृत-त्रेता-द्वापर-कलि) मिलाकर देवों के बारह हजार वर्ष = एक महायुग; एक हजार महायुग = ब्रह्मा का एक दिन (कल्प)। यह सांकेतिक काल-विज्ञान सृष्टि को चक्रीय (उठती-लीन होती) दिखाता है, रेखीय नहीं।
सार: परम तत्त्व अनादि-अनन्त, निर्गुण ब्रह्म है, जो सृष्टि से पहले अकेला रहता है। काल निमेष से कल्प तक नापा जाता है; सृष्टि चक्रीय है, ब्रह्मा के दिन-रात के साथ उठती-लीन होती है। युग-क्रम में धर्म और आयु घटते हैं; हर युग का अपना प्रधान साधन है: तप, ज्ञान, यज्ञ, दान। जैगीषव्य और नारद के चरित्र दिखाते हैं कि स्तुति-निन्दा में समता और आत्म-संयम ही उस ब्रह्म तक का व्यावहारिक मार्ग है।
योगी की चढ़ाई: पाँच तत्त्वों पर स्वामित्व और अव्यक्त में प्रवेश
भीष्म जी शर-शय्या पर लेटे हुए हैं और युधिष्ठिर उनके पास बैठे सुन रहे हैं। यहाँ भीष्म जी एक पुरानी कथा सुना रहे हैं, जिसमें द्वैपायन व्यास अपने पुत्र शुक को उपदेश देते हैं। उसी उपदेश के सहारे भीष्म जी युधिष्ठिर को मोक्ष-धर्म की ओर ले चल रहे हैं।
व्यास जी कहते हैं, “योगी अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलकर धीरे-धीरे पाँच तत्त्वों पर अधिकार पाता है। पहले पृथ्वी पर, फिर वायु पर, फिर आकाश (खाली स्थान, जिसमें ध्वनि टिकती है) पर, फिर जल पर, फिर अग्नि पर। इसके बाद वह अहंकार (मैं-पन का भाव) और बुद्धि पर भी स्वामित्व पाता है, और अन्त में अव्यक्त (जो जन्म-वृद्धि-क्षय-मृत्यु से परे है, इन्द्रियों से जिसका ज्ञान नहीं होता) तक पहुँचता है।
“जो योगी अपनी स्थूल देह को छोड़ने का अभ्यास करता है, वह अपने भीतर आत्मा के सूक्ष्म रूप क्रम से देखता है। पहली अवस्था में उसे लगता है मानो आकाश हल्के कुहासे-से सूक्ष्म पदार्थ से भर गया हो; यही देह-मुक्त आत्मा का प्रथम रूप है। कुहासा छँटने पर हृदय के भीतर जल का रूप दिखता है, फिर अग्नि का, फिर वायु का, जो घिसे-तराशे शस्त्र-सा चमकता है; यह वायु-रूप महीन जाले-सा होते-होते आकाश की परम श्वेतता और सूक्ष्मता तक पहुँचता है।
“अब इन अवस्थाओं के फल सुनिए। जिसने पृथ्वी-तत्त्व जीत लिया, वह सृष्टि की शक्ति पाता है, मानो दूसरा प्रजापति हो, और अपनी देह से अनेक प्राणी रच सकता है। जिसने वायु पर स्वामित्व पाया, वह केवल अपने पैर के अँगूठे या हाथ-पैर से समूची पृथ्वी को हिला सकता है। जिसने आकाश पर अधिकार पाया, वह आकाश में उज्ज्वल रूप से रह सकता है और इच्छा से अदृश्य हो सकता है। जल पर स्वामित्व पाने वाला (अगस्त्य की भाँति) नदियों, झीलों, समुद्रों को पी सकता है। अग्नि पर स्वामित्व पाने वाला इतना तेजस्वी हो जाता है कि उसका रूप देखा नहीं जा सकता; वह तभी दिखता है जब अपने मैं-पन के बोध को बुझा देता है।
“जब बुद्धि, जो इन पाँच तत्त्वों और अहंकार की आत्मा-सी है, जीत ली जाती है, तब योगी सर्वसमर्थता और सन्देह-रहित पूर्ण ज्ञान पाता है। तब व्यक्त (जो दिखता है, बनता-बिगड़ता है) अव्यक्त परमात्मा में लीन हो जाता है, उसी अव्यक्त में जिससे यह संसार निकलता है और ‘व्यक्त’ कहलाता है।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): व्यक्त वह है जिसमें चार लक्षण हों, जन्म, वृद्धि, क्षय और मृत्यु। अव्यक्त वह है जिसमें ये चार न हों, यानी जो सदा एक-सा रहे। सांख्य गिनती-वाला दर्शन है (पच्चीस तत्त्वों की गणना से ज्ञान), और योग साधना-वाला मार्ग है। व्यास जी कहते हैं कि दोनों में पच्चीस विषय लगभग एक ही ढंग से बताए गए हैं; जो भेद दिखता है वह कहने वाले के ढंग का भेद है, मूल में दोनों एक ही ओर ले जाते हैं।
व्यास जी सांख्य के अनुसार कहते हैं, “वेदों में दो आत्माओं की बात है। पहली जीवात्मा है, जिसमें वही चार लक्षण हैं और जिसमें चार पुरुषार्थों, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, की चाह रहती है; यह अव्यक्त परमात्मा से जन्मी है। सांख्य का सिद्धान्त है कि मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से स्वयं को अलग रखे।
“जो योगी आसक्ति और अभिमान से मुक्त है, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी जैसे सब द्वन्द्वों के पार है, जो क्रोध और घृणा को रास्ता नहीं देता, झूठ नहीं बोलता, जिसकी निन्दा या प्रहार करने वाले के प्रति भी मित्रता रखता है, जो किसी का बुरा सोचता तक नहीं, जो वाणी, कर्म और मन इन तीनों को संयत रखता है, और सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखता है, वह ब्रह्म के समीप पहुँचता है। जो मिट्टी के ढेले और सोने के टुकड़े को एक दृष्टि से देखता है, जो मित्र और शत्रु के प्रति समान है, जो स्तुति और निन्दा को बराबर लेता है, जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है और अपने व्रतों में दृढ़ है, वही सांख्य के अनुसार मुक्ति पाता है।”
सार: योगी क्रम से पृथ्वी-वायु-आकाश-जल-अग्नि, फिर अहंकार और बुद्धि, और अन्त में अव्यक्त पर अधिकार पाता है; तत्त्वों पर स्वामित्व के अलग-अलग फल हैं, पर अन्तिम लक्ष्य व्यक्त का अव्यक्त ब्रह्म में लीन होना है। सांख्य और योग दो नाम हैं, मार्ग एक।
ज्ञान की नाव: किसको ज्ञान कहें, और कौन वस्तुतः ब्राह्मण है
व्यास जी कहते हैं, “जीवन के समुद्र में ऊपर-नीचे डोलता हुआ जो साधक ध्यान कर सकता है, वह ज्ञान की नाव पकड़ता है और अपनी मुक्ति के लिए ज्ञान का ही सहारा लेता है, इधर-उधर दूसरे सहारे के लिए हाथ नहीं फैलाता।”
शुक पूछते हैं, “वह ज्ञान क्या है? क्या वह विद्या जिससे भ्रम मिटने पर सत्य प्रकट होता है? या वह कर्मों की पंक्ति जिनके करने से अभीष्ट मिलता है? या कर्म से विरति, जिससे आत्मा का विस्तार खोजा जाए? बताइए, ताकि जन्म और मृत्यु दोनों से बचा जा सके।”
व्यास जी उत्तर देते हैं, “जो मूर्ख यह मानता है कि सब कुछ अपने ही स्वभाव से, बिना किसी आधार के, बना हुआ है, और शिष्यों के मन में यही भर देता है, अपने तर्क-कौशल से उनके विरोधी प्रश्नों को दबा देता है, वह किसी सत्य को नहीं पाता। जो दृढ़ता से मानते हैं कि सारे कारण केवल वस्तुओं के स्वभाव से हैं, वे ज्ञानी पुरुषों या ऋषियों को सुनकर भी सत्य नहीं पाते। स्वभाव को ही कारण मानने वाला यह विश्वास, भ्रम से जन्मा हुआ, मनुष्य का नाश कर देता है।
“बुद्धि (विवेक से साधन जुटाना) ही प्रयोजनों की सिद्धि कराती है। बुद्धि से ही राजा शासन करते और भोगते हैं, यद्यपि प्रजा उन्हीं के समान गुणों वाली होती है। प्राणी चार प्रकार से जन्म लेते हैं, जरायुज (गर्भ से), अण्डज (अण्डे से), उद्भिज्ज (वनस्पति), और स्वेदज (मैल-पसीने से)। चलने वाले अचल से श्रेष्ठ, दो पैर वाले बहु-पाद से श्रेष्ठ, भूमि पर रहने वाले श्रेष्ठ। इनमें जो वर्ण-धर्म पालते हैं वे श्रेष्ठ, उनमें जो कर्तव्य जानते हैं, उनमें जो वेद जानते हैं, उनमें जो वेद का उपदेश देते हैं, और इन सबमें परम वे जो आत्मा को जानते हैं, क्योंकि वे जन्म-मृत्यु का अर्थ जानते हैं।
“जिनके पास सच्चा ज्ञान है, वे अपनी आत्मा को भीतर और बाहर दोनों ओर देखते हैं। ऐसे पुरुष ही, हे पुत्र, सच्चे अर्थों में द्विज (दूसरे जन्म वाले) हैं, और ऐसे ही देवता हैं। इन्हीं पर यह प्राणि-जगत् टिका है, इन्हीं में यह सारा विश्व बसता है। इनकी महिमा के बराबर कुछ नहीं।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): द्विज का अर्थ है ‘दो बार जन्मा’; पहला जन्म माता से, दूसरा उपनयन (यज्ञोपवीत) और वेदाध्ययन से। व्यास जी यहाँ इस शब्द को गहरा कर रहे हैं, असली द्विज वही है जो आत्मा को जानता है, केवल कर्मकाण्ड जानने वाला नहीं। प्रवृत्ति = कर्म में लगे रहना; निवृत्ति = कर्म से हटना। वेद दोनों मार्ग बताते हैं।
सार: ज्ञान ही मुक्ति की नाव है। स्वभाव को अकेला कारण मानने वाला सत्य नहीं पाता। प्राणियों में जो आत्मा को भीतर-बाहर देखता है, वही सच्चा द्विज और देवता है।
कर्म, युग और काल: ब्राह्मण के अनिवार्य कर्म तथा समय का चक्र
व्यास जी आगे कहते हैं, “ये ब्राह्मण के लिए नियत किए गए अनिवार्य कर्म हैं। ज्ञानी पुरुष विहित कर्म करता हुआ सफलता पाता है। यदि कर्म के विषय में सन्देह न रहे, तो किए गए कर्म अवश्य सफल होते हैं। सन्देह यह है कि कर्म अनिवार्य हैं या इच्छानुसार। इस पर कहना होगा कि यदि कर्म इसलिए नियत हैं कि उनसे ज्ञान उपजे (और ज्ञान से ही ब्रह्म या मोक्ष मिले), तो भी उन्हें अनिवार्य ही मानना चाहिए, इच्छानुसार नहीं।
“कर्म के कारण पर लोग भिन्न मत रखते हैं। कोई पुरुषार्थ को कारण कहता है, कोई नियति (भाग्य) को, कोई स्वभाव को, कोई काल को; कोई इनके मेल को। पर जो योगी हैं, वे ब्रह्म को ही सबका कारण देखते हैं। त्रेता, द्वापर और कलि के मनुष्य सन्देहों से भरे रहते हैं; किन्तु कृतयुग के मनुष्य तपस्या में रत, शान्त-चित्त और धर्मनिष्ठ होते हैं। उस युग में सब लोग ऋक्, साम और यजु को, ऊपर से भिन्न दिखने पर भी, एक ही मानते हैं।
“ब्राह्मण का यज्ञ जप (मनन और पाठ) में है, क्षत्रिय का देवताओं के लिए पशुओं के वध में, वैश्य का खेती और पशुपालन में, और शूद्र का अन्य तीन वर्णों की सेवा में। अपने नियत कर्तव्यों का पालन करके और वेदादि का अध्ययन करके मनुष्य द्विज होता है। पर चाहे कोई कुछ भी करे या न करे, सब प्राणियों का मित्र बनकर ही मनुष्य सच्चा ब्राह्मण होता है।
“त्रेता के आरम्भ में वेद, यज्ञ, वर्ण और आश्रम पूरे थे। द्वापर में आयु घटने से इनमें ह्रास हुआ; कलि में वेद उलझनों से ग्रस्त होते हैं, और कलि के अन्त तक यह सन्देह बना रहता है कि वे आँख से दिखें भी या नहीं। तब वर्ण-धर्म लुप्त होते हैं, मनुष्य पाप से पीड़ित होते हैं, गायों, पृथ्वी, जल और औषधियों के रस तक घट जाते हैं।
“काल अनेक रूप धरता है। उसका न आदि है, न अन्त। काल ही सब प्राणियों को उत्पन्न करता है और फिर उन्हें निगल जाता है। काल ही प्राणियों का उद्गम है, काल ही उन्हें बढ़ाता है, काल ही उनका नाशक है, और काल ही उनका शासक है।”
समझने की कुंजी (वंश/काल): चार युग, कृत (सत्य) परम धर्ममय, त्रेता, द्वापर, और कलि जिसमें धर्म घटता जाता है। हर युग में आयु और धर्म-बल क्रम से घटते हैं, इसीलिए हर युग के लिए कर्तव्य अलग बताए गए। यही आगे युधिष्ठिर के इस प्रश्न की जड़ बनेगा कि धर्म स्थिर कैसे माना जाए।
सार: कर्म ज्ञान के लिए नियत हैं, इसलिए अनिवार्य हैं। हर वर्ण का अपना यज्ञ है, पर सब प्राणियों का मित्र बनना ही ब्राह्मणत्व का सार है। काल ही उद्गम, वर्धक, नाशक और शासक है।
शरीर की रचना और सत्रहवाँ तत्त्व: आत्मा को मन के दीपक से देखना
शुक पूछते हैं, “जो ज्ञानी, वेदज्ञ, यज्ञनिष्ठ और द्वेष-रहित है, वह उस ब्रह्म को कैसे पाए जो न प्रत्यक्ष से, न अनुमान से जाना जा सकता, और जिसे वेद भी संकेत-मात्र से ही दिखा पाते हैं? क्या तपस्या से, ब्रह्मचर्य से, सब कुछ त्यागने से, बुद्धि से, सांख्य से, या योग से?”
व्यास जी कहते हैं, “ज्ञान-प्राप्ति, तप, इन्द्रिय-निग्रह और सर्वत्याग, इनके सिवा किसी और उपाय से कोई सफल नहीं होता। पाँच महाभूत स्वयम्भू की पहली रचना हैं। देह पृथ्वी से बनी है, शरीर के रस जल से, आँखें तेज से। प्राण-अपान आदि वायु के आश्रित हैं, और देह के सब खाली छिद्र (नथुने, कान के विवर आदि) आकाश के हैं।
“कान, त्वचा, आँख, जीभ और नाक, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, अपने-अपने विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) को ग्रहण करने के लिए। ये विषय इन्द्रियों से अलग समझने चाहिए। जैसे सारथी अच्छे सधे घोड़ों को इच्छित मार्ग पर चलाता है, वैसे मन इन्द्रियों को चलाता है। मन को, उसकी बारी में, हृदय में बैठा ज्ञान (बुद्धि) चलाता है। मन इन्द्रियों का स्वामी है, और बुद्धि मन की स्वामिनी।
“विवेकी पुरुष सत्रहवें तत्त्व, यानी आत्मा को, सोलह तत्त्वों (पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच विषय और मन) से घिरा हुआ, अपने ज्ञान में मन की सहायता से देखता है। आत्मा आँख से या किसी इन्द्रिय से नहीं दिखती; सबके पार होकर वह केवल मन के दीपक के प्रकाश से दिखाई देती है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से रहित, अविनाशी, बिना देह और बिना इन्द्रिय के, फिर भी वह देह के भीतर ही देखी जाती है। अव्यक्त और परम, वह सब मरणधर्मा देहों में बसती है। गुरु और वेद के मार्गदर्शन से जो उसे देखता है, वह आगे चलकर ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है।
“ज्ञानी समान दृष्टि से देखते हैं, ज्ञानी ब्राह्मण को, गाय को, हाथी को, कुत्ते को और चाण्डाल को भी। जब प्राणी अपनी आत्मा को सब वस्तुओं में और सब वस्तुओं को अपनी आत्मा में देख लेता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कहलाता है। काल अपने ही बल से सब प्राणियों को अपने भीतर पकाता है; पर वह कौन है जिसमें काल स्वयं पकता है, यह कोई नहीं जानता। उस परम तत्त्व के हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें-सिर-मुख सब ओर, कान सब ओर; वह सबको ढाँपे हुए है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और सब प्राणियों का हृदय है।”
एक उप-कथा: व्यास जी यहाँ ‘नौ द्वारों वाले भवन’ का चित्र खींचते हैं। देह को एक नगर कहा गया है जिसके नौ द्वार हैं, दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुख, और दो निचले द्वार। यद्यपि आत्मा निर्गुण और अकर्ता है, तो भी वह इस नौ-द्वार वाले भवन में प्रवेश करके कर्म में लगी-सी दिखती है। एक ही आत्मा अविनाशी रूप में अकर्ता है और कर्म-वाले रूप में कर्ता-सी; जो इस भेद को जान लेता है, वह जन्म-मरण से छूट जाता है।
सार: देह पाँच भूतों से बनी; इन्द्रियों का स्वामी मन, मन का स्वामी बुद्धि। आत्मा सत्रहवाँ तत्त्व है, इन्द्रियों से अगोचर, केवल मन के दीपक से दिखती है। जो आत्मा को सबमें और सबको आत्मा में देख ले, वह ब्रह्म पाता है।
योग का मार्ग: पाँच विघ्न, इन्द्रिय-संयम और छह मास का अभ्यास
व्यास जी कहते हैं, “हे उत्तम पुत्र, अब मैं योग के अनुसार वही बताता हूँ। बुद्धि, मन और सब इन्द्रियों तथा सर्वव्यापी आत्मा का एक साथ जुड़ना ही श्रेष्ठ ज्ञान है। यह ज्ञान उसे मिलता है जो शान्त-चित्त हो, इन्द्रियों को जीते, ध्यान से आत्मा की ओर दृष्टि मोड़ सके, ध्यान में आनन्द ले, और कर्म में शुद्ध हो।
“योग के पाँच विघ्न त्यागने चाहिए, काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा। क्रोध शान्त-स्वभाव से जीता जाता है, काम सब संकल्प छोड़ने से, निद्रा विचारणीय विषयों पर बुद्धि से चिन्तन करने से। हाथ-पैरों की रक्षा आँखों से, आँख-कान की मन से, मन और वाणी की कर्म से करनी चाहिए। भय सावधानी से और अभिमान विद्वानों की सेवा से जीतना चाहिए।
“साँझ के शान्त समय में या उषा से पहले, इन्द्रियों और मन को बाहर के विषयों से खींचकर, दृष्टि भीतर लगाकर, मन को ज्ञान पर टिकाना चाहिए। यदि पाँच में से एक भी इन्द्रिय खुली छूट जाए, तो सारी बुद्धि उससे ऐसे बह जाती है जैसे चमड़े की मशक के तले के बिन-ढके छेद से पानी। मछुआरा पहले उस मछली को बस में करता है जिससे जाल को सर्वाधिक खतरा हो; वैसे ही योगी पहले मन को साधे, फिर कान, फिर आँख, फिर जीभ, फिर नाक को।
“जब ये इन्द्रियाँ और छठा मन ज्ञान में स्थिर होकर अविचल हो जाते हैं, तब ब्रह्म धूम-रहित प्रज्वलित अग्नि-सा या तेजस्वी सूर्य-सा प्रत्यक्ष होता है। तब मनुष्य अपने भीतर अपनी आत्मा को आकाश में बिजली-सी देखता है। जो योगी छह मास तक एकान्त में इस प्रकार दृढ़ व्रत से रहता है, वह अविनाशी ब्रह्म के समान हो जाता है।
“योग से अनेक सिद्धियाँ मिलती हैं, अति-सूक्ष्म होना, विस्तार पाना, एक ही देह में अनेक रूप दिखाना, दिव्य गन्ध-शब्द-रूप, स्वाद और स्पर्श के सुख, शीत-उष्ण में समता, वायु-सी गति, शास्त्रों का अन्तर्ज्ञान, दिव्य अप्सराओं का सान्निध्य। पर योगी को इन सबकी उपेक्षा करके इन्हें ज्ञान में ही लीन कर देना चाहिए। यदि कोई निम्न वर्ण का हो या स्त्री हो, वह भी इसी मार्ग पर चलकर परम गति पाता है।”
भीष्म जी जोड़ते हैं, “गुरुओं के मुख से सुनकर और मन से चिन्तन करके, बुद्धिमान पुरुष उस ब्रह्म-समता को पाते हैं जो सृष्टि के प्रलय तक बनी रहती है।”
सार: योग के पाँच विघ्न काम-क्रोध-लोभ-भय-निद्रा हैं। इन्द्रियों को क्रम से साधकर ज्ञान में स्थिर करने पर ब्रह्म प्रत्यक्ष होता है। छह मास के एकान्त-अभ्यास से योगी अविनाशी हो जाता है; सिद्धियाँ आएँ तो उन्हें भी त्याग दे। यह मार्ग स्त्री और निम्न वर्ण के लिए भी खुला है।
कर्म और ज्ञान के दो मार्ग: नाशवान और अविनाशी
शुक कहते हैं, “वेद दो प्रकार से बोलते हैं। एक बार आदेश देते हैं, ‘सब कर्म कीजिए’; और दूसरी बार कहते हैं, ‘कर्म छोड़ दीजिए’। मैं पूछता हूँ, ज्ञान से मनुष्य किस गति को जाते हैं और कर्म से किस गति को? ये दोनों घोषणाएँ तो परस्पर विरुद्ध-सी जान पड़ती हैं।”
भीष्म जी बताते हैं कि पराशर-पुत्र व्यास ने अपने पुत्र से यों कहा, “मैं आपको दो मार्ग बताता हूँ, नाशवान और अविनाशी, जो क्रमशः कर्म और ज्ञान पर टिके हैं। ज्ञान से पहुँचे स्थान और कर्म से पहुँचे स्थान का भेद उतना ही बड़ा है जितना असीम आकाश। आपके इस प्रश्न ने मुझे वैसी ही पीड़ा दी जैसी श्रद्धालु को नास्तिक की बात से होती है।
“कर्म से प्राणी का बार-बार नाश होता है, ज्ञान से वह मुक्त होता है। इसीलिए जो योगी जीवन-समुद्र के उस पार को देखते हैं, वे कर्म का सहारा नहीं लेते। कर्म से मनुष्य को मृत्यु के बाद सोलह अंगों वाली देह के साथ फिर जन्म लेना पड़ता है; ज्ञान से वह सनातन, अव्यक्त और अपरिवर्तनीय में बदल जाता है। थोड़ी बुद्धि वाले लोग कर्म की प्रशंसा करते हैं, और इसलिए बार-बार देह धारण करते हैं। जिनकी दृष्टि कर्तव्यों में पैनी है, वे कर्म की प्रशंसा नहीं करते, जैसे जिन्हें नदियों का जल मिलता है वे कुओं-तालाबों की प्रशंसा नहीं करते।
“कर्म का फल सुख-दुःख, अस्तित्व-अनस्तित्व है। ज्ञान से मनुष्य वहाँ पहुँचता है जहाँ शोक का अवसर नहीं, जहाँ जन्म-मृत्यु से छुटकारा है, जहाँ बुढ़ापा नहीं, जहाँ ब्रह्म है, परम, अव्यक्त, अपरिवर्तनीय, सदा विद्यमान, अगोचर, पीड़ा से परे, अमर। उस अवस्था को पाकर वे सब पर समान दृष्टि डालते हैं, सबके मित्र और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
“जान लीजिए कि ज्ञानी पुरुष, बिना नाश के, सदा बना रहता है, जैसे कृष्ण-पक्ष की अन्तिम तिथि का चन्द्रमा सूक्ष्म रूप में बचा रहता है (यह बात महर्षि याज्ञवल्क्य ने बृहदारण्यक में विस्तार से कही है)। और कर्म वाले पुरुष की दशा नये चन्द्रमा-सी है, जो आकाश में झुके धागे-सा दिखता है।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): क्षेत्रज्ञ = आत्मा, जो देह-रूपी ‘क्षेत्र’ को जानती है। तमस्, रजस् और सत्त्व ज्ञान (बुद्धि) के गुण हैं; बुद्धि देह में स्थित जीवात्मा का गुण है; और जीवात्मा परमात्मा से आती है। जो इन सात लोकों को रचने वाले को जानते हैं, वे कहते हैं कि वह जीव से भी ऊपर है।
सार: कर्म का मार्ग नाशवान है, बार-बार जन्म देता है; ज्ञान का मार्ग अविनाशी है, ब्रह्म तक ले जाता है। दोनों में आकाश-सा अन्तर है। ज्ञानी अन्तिम तिथि के चन्द्रमा-सा बचा रहता है, कर्मी नये चन्द्रमा-सा फिर-फिर उगता है।
चार आश्रम: ब्रह्मचर्य और गृहस्थ का धर्म
शुक कहते हैं कि वेदों में दोनों घोषणाएँ हैं, कर्म कीजिए और कर्म छोड़ दीजिए; इनमें से किसका औचित्य निश्चय करें? व्यास जी उत्तर देते हैं, “जो आचरण ब्रह्मा ने पहले स्थापित किया, उसी का पालन प्राचीन ऋषियों ने किया। महर्षि ब्रह्मचर्य के पालन से सब लोकों को जीतते हैं, वन में फल-मूल पर रहकर, तीर्थों में विचरते हुए, सर्व-हित करते हुए, और उचित समय पर वन-कुटियों में भिक्षा माँगते हुए, जब वहाँ का धुआँ शान्त हो और ओखली का शब्द थम गया हो।
“ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी, चारों अपने-अपने आश्रम-धर्म का ठीक पालन करके एक ही परम गति पाते हैं। अथवा एक ही पुरुष काम और द्वेष से मुक्त होकर क्रम से चारों आश्रमों का पालन करे, तो वह ब्रह्म को समझने योग्य हो जाता है। चार आश्रम मानो ब्रह्म तक पहुँचने की सीढ़ियाँ हैं।
“जीवन के पहले चौथाई भाग में ब्रह्मचारी अपने गुरु या गुरु-पुत्र के पास रहे। वह गुरु के सोने के बाद सोए और गुरु के जागने से पहले उठे। जो काम शिष्य को करने चाहिए और जो सेवक को, वह सब करे। वह सरलता से रहे, बुरी वाणी से बचे, और तभी पाठ ग्रहण करे जब गुरु बुलाएँ। वह गुरु के खाने से पहले न खाए, गुरु के पीने से पहले न पिए, गुरु के बैठने से पहले न बैठे, गुरु के सोने से पहले न सोए। हाथ की हथेलियाँ ऊपर करके वह गुरु के चरण छुए, दायाँ पैर दाएँ हाथ से और बायाँ बाएँ से।
“वह आदरपूर्वक कहे, ‘हे आचार्य, हमें पढ़ाइए। हम यह कार्य पूरा करेंगे; यह दूसरा कार्य हमने पूरा कर लिया। आप जो आज्ञा दें, हम उसे करने को तत्पर हैं।’ इस प्रकार जीवन का चौथाई भाग वेदाध्ययन और व्रत-उपवास में बिताकर, गुरु को अन्तिम दक्षिणा देकर, विधिपूर्वक आज्ञा लेकर वह घर लौटे, और गृहस्थ-जीवन में प्रवेश करे, विधि से पत्नियाँ लाकर और गृह-अग्नि स्थापित करके।”
व्यास जी गृहस्थ-धर्म पर कहते हैं, “गृहस्थ के लिए चार प्रकार के आचरण कहे गए हैं। एक, तीन वर्ष तक का अन्न-भण्डार रखना; दूसरा, एक वर्ष का; तीसरा, बिना कल की चिन्ता किए दिन-भर का प्रबन्ध; चौथा, कबूतर की भाँति (दाना-दाना बीनकर) संग्रह करना। इनमें बाद वाला पहले से अधिक श्रेष्ठ है।
“गृहस्थ केवल अपने लिए भोजन न पकाए, और यज्ञ के सिवा पशु-वध न करे। वह दिन में, रात के पहले या अन्तिम पहर में न सोए। उसके घर में कोई ब्राह्मण बिना भोजन या आदर के न रहे। वह ‘विघस’ खाने वाला और ‘अमृत’ खाने वाला बने, बचा हुआ भोजन ही ग्रहण करे। वह अपनी विवाहिता पत्नी से सन्तुष्ट रहे, इन्द्रिय-संयमी हो, और अपने ऋत्विक्, पुरोहित, गुरु, मामा, अतिथि, आश्रित, वृद्ध, बालक, रोगी, चिकित्सक, बन्धु, माता-पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, पुत्री और सेवकों से कभी कलह न करे। इनसे विवाद टालकर गृहस्थ सब पापों से मुक्त होता है।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): गृहस्थ के दो विशेष शब्द, अमृत = यज्ञ में अर्पण के बाद बचा हुआ अन्न (घी मिला हुआ), जिसे खाना पवित्र माना गया; और विघस = सब आश्रितों-सेवकों को भोजन कराने के बाद बचा हुआ अन्न। इन्हीं को खाना गृहस्थ का संयम है, यानी अपने से पहले औरों को खिलाना।
सार: चार आश्रम ब्रह्म तक की सीढ़ियाँ हैं। ब्रह्मचारी गुरु की सेवा और वेदाध्ययन में जीवन का चौथाई भाग बिताए। गृहस्थ अतिथि-सेवा करे, औरों को खिलाकर बचा खाए, और किसी से कलह न करे; इससे वह पाप-मुक्त होता है।
वानप्रस्थ और संन्यास: वन का तप और परम त्याग
भीष्म जी कहते हैं, “हे युधिष्ठिर, गृहस्थ-धर्म आपने सुना। अब वानप्रस्थ का धर्म सुनिए।” व्यास जी बताते हैं, “जब गृहस्थ अपनी देह पर झुर्रियाँ, सिर पर श्वेत केश और अपने पुत्रों के भी पुत्र देख ले, तब वह वन की ओर जाए। जीवन का तीसरा भाग वह वानप्रस्थ-व्रत में बिताए। वह उन्हीं अग्नियों की सेवा करे जिनकी गृहस्थ रहते करता था, देवताओं की पूजा करे, व्रती और मिताहारी रहे, दिन के छठे भाग में केवल एक बार भोजन करे, अतिथियों को खिलाकर बचा खाए।
“वानप्रस्थ के लिए भी चार आचरण कहे गए, कोई केवल दिन-भर का संग्रह करे, कोई मास-भर का, कोई बारह वर्ष तक का। वे वर्षा में खुले में रहें, शरद में जल में, ग्रीष्म में चार अग्नियों के बीच सूर्य के नीचे बैठें (पंचाग्नि-तप)। कुछ केवल दाँतों से अन्न छीलते हैं, कुछ केवल पत्थर से। कुछ केवल मूल, कुछ केवल फल, कुछ केवल पुष्प पर रहते हैं, वैखानस-विधि का पालन करते हुए।
“चौथा आश्रम संन्यास है, जो उपनिषदों पर आधारित है। इसी युग में अनेक ब्राह्मणों ने इसका पालन किया, अगस्त्य, सप्तर्षि (अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, वसिष्ठ, नारद और क्रतु), मधुच्छन्दा, अघमर्षण, सांकृति, सुदिवातण्डि, अहोवीर्य, काव्य, ताण्ड्य, विद्वान मेधातिथि, महातेजस्वी कर्मनिर्वाक और अति-यत्नशील शून्यपाल, ये सब इन धर्मों के रचयिता थे और स्वयं इनका पालन करके स्वर्ग गए।
“जीवन के अन्तिम भाग में, जब बुढ़ापे और रोग से देह क्षीण हो, तब वानप्रस्थ-धर्म छोड़कर संन्यास ग्रहण करे। एक दिन में पूरा होने वाला यज्ञ करके, जिसमें सब कुछ दक्षिणा में दे दे, वह स्वयं अपना श्राद्ध करे। सब अग्नियों को अपनी ही आत्मा में स्थापित कर ले, सब बन्धन और आसक्ति छोड़ दे। वह वेद-पाठ और जन्म-सूचक यज्ञोपवीत भी त्याग दे, और यम-नियम के कर्तव्यों का पालन करते हुए, आत्मज्ञ होकर, अपने लक्ष्य को पाए।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): यम = बाहरी संयम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि); नियम = भीतरी अनुशासन (शौच, सन्तोष, तप आदि)। श्राद्ध मृत पूर्वजों के लिए किया जाता है; संन्यास लेते समय साधक अपना ही श्राद्ध करता है, मानो पुराना सामाजिक ‘मैं’ मर गया हो और अब केवल आत्मा शेष रहे।
सार: वृद्धावस्था में गृहस्थ वन जाए, मिताहार और पंचाग्नि-तप करे। अन्त में संन्यास ले, सब अग्नियाँ आत्मा में स्थापित करे, अपना श्राद्ध स्वयं करे, और आत्मज्ञ होकर परम गति पाए।
संन्यासी के लक्षण: अहिंसा सब धर्मों का सार
शुक पूछते हैं कि श्रेष्ठ आश्रम में रहता हुआ साधक अपनी आत्मा को योग में कैसे लगाए। व्यास जी कहते हैं, “पहले दो आश्रमों, ब्रह्मचर्य और गृहस्थ, से शुद्धि पाकर, तीसरे में आत्मा को योग में लगाए, फिर श्रेष्ठतम संन्यास में प्रवेश करे। योग अकेले, बिना किसी साथी के, साधे। बिना अग्नि और बिना निश्चित निवास के, वह गाँव में केवल भिक्षा के लिए जाए, कल के लिए संग्रह न करे, और हृदय परम पर टिकाए। वह दिन में एक ही बार और वह भी नियम से थोड़ा खाए।
“संन्यासी के अन्य लक्षण हैं, पीने के पात्र के रूप में मनुष्य का कपाल, वृक्षों की छाया में आश्रय, चिथड़े वस्त्र, किसी का साथ न रखते हुए एकान्त, और सब प्राणियों के प्रति उदासीनता। जिसके भीतर शब्द भयभीत हाथियों की भाँति कुएँ में गिरकर लौटते नहीं, वही इस आश्रम के योग्य है। वह किसी के बुरे कर्म पर ध्यान न दे, किसी की निन्दा न सुने, विशेषकर ब्राह्मण की निन्दा से बचे। अपनी निन्दा सुनकर भी मौन रहे; यही उसका उपचार है।
“देवता उसी को ब्राह्मण मानते हैं जो, जो मिले उसी से तन ढाँपे, जो मिले उसी पर निर्वाह करे, और जहाँ जगह मिले वहीं सोए; जो संगति से ऐसे डरे जैसे साँप से, तृप्ति-भर भोजन से ऐसे डरे जैसे नरक से, और स्त्री से ऐसे डरे जैसे शव से; जो आदर पाकर प्रसन्न न हो और अपमान पाकर क्रुद्ध न हो, और जिसने सब प्राणियों को अभय का वचन दे रखा हो। वह न मृत्यु को आनन्द से देखे, न जीवन को; सेवक की भाँति केवल अपने समय की प्रतीक्षा करे।
“जैसे चलने वाले सब प्राणियों के पद-चिह्न हाथी के पद-चिह्न में समा जाते हैं, वैसे ही सब आचरण योग में समा जाते हैं; और हर कर्तव्य अहिंसा (किसी प्राणी को न सताने) के एक ही धर्म में समा जाता है। जो किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है। सब प्राणियों को अभय का दान देना सब दानों में परम है। जो आरम्भ में ही हिंसा का धर्म छोड़ देता है, वही मोक्ष पाता है।”
एक उप-कथा: व्यास जी यहाँ एक तीखा चित्र देते हैं, संन्यासी वह है जो किसी स्थान को इतना एकान्त बना ले कि हज़ारों मनुष्यों और वस्तुओं से भरी जगह भी उसे पूर्णतः सुनसान जान पड़े, और वह स्वयं इतना अकेला हो जाए जैसे पूर्व का खाली आकाश। भीड़ में रहकर भी अकेलापन, यही उसकी भीतरी अवस्था है।
सार: संन्यासी भिक्षा पर निर्वाह करे, एकान्त में रहे, निन्दा-स्तुति में सम रहे, और सब प्राणियों को अभय दे। सब कर्तव्य अहिंसा में समा जाते हैं; अभय-दान परम दान है और हिंसा-त्याग मोक्ष का द्वार।
परम तत्त्व का क्रम और जीवन की नदी पार करना
व्यास जी क्रम बताते हैं, “इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से आत्मा (जो महत् भी कहलाती है), महत् से अव्यक्त (प्रकृति), और अव्यक्त से ब्रह्म। ब्रह्म से ऊँचा कुछ नहीं; वही श्रेष्ठता की और लक्ष्य की परम सीमा है। परमात्मा हर प्राणी में छिपा है, साधारण आँखों को नहीं दिखता; केवल सूक्ष्म दृष्टि वाले योगी उसे अपनी पैनी बुद्धि से देखते हैं।
“समस्त इच्छाओं को नष्ट करके स्थूल बुद्धि को सूक्ष्म बुद्धि में लीन कर देना चाहिए; तब साधक मानो दूसरा कालंजर पर्वत-सा अचल हो जाता है। हृदय की शुद्धि से योगी धर्म और अधर्म दोनों के पार जाता है। उस शुद्धि का चिह्न यह है कि जो अचेतनता गहरी स्वप्न-रहित निद्रा में मिलती है, वैसी अचेतनता (बाहरी जगत् के प्रति) जागते हुए भी बनी रहे। ऐसा योगी उस दीप-शिखा-सा स्थिर रहता है जो बिल्कुल शान्त वायु वाले स्थान में जलती हो।
“यह उपदेश, हे पुत्र, सब वेदों का सार है। यह केवल अनुमान या शास्त्र-पाठ से नहीं समझा जा सकता; इसे श्रद्धा से स्वयं समझना होता है। सब धर्म-ग्रन्थों और सत्य-वचनों के धन को, तथा दस सहस्र ऋचाओं को मथकर, मैंने आपके लिए यह अमृत निकाला है, जैसे दही से मक्खन और काठ से अग्नि। यह उपदेश शान्त-आत्मा, संयमी, तपस्वी, वेदज्ञ, गुरु-सेवी, और श्रद्धालु को ही देना चाहिए, तर्क-विवाद में लिप्त या नीच व्यक्ति को कभी नहीं।”
आगे शुक के प्रश्न पर व्यास जी अध्यात्म समझाते हैं, “पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये पाँच महाभूत सब प्राणियों के अंग हैं, और एक होते हुए भी समुद्र की लहरों-सी अलग-अलग गिनी जाती हैं। जैसे कछुआ अपने अंग फैलाता और फिर समेट लेता है, वैसे ही ये महाभूत अनगिनत छोटे रूपों में बसकर सृष्टि और संहार के रूप में बदलते रहते हैं। आकाश का गुण शब्द, वायु का स्पर्श, तेज का रूप, जल का रस, और पृथ्वी का गन्ध है। मन (जिसका स्वभाव सन्देह है), बुद्धि (जो निश्चय करती है), और प्रकृति, ये तीन अपनी पूर्व अवस्था से उपजते हैं।
“मनुष्य में पाँच इन्द्रियाँ हैं, छठा मन, सातवीं बुद्धि, और आठवीं आत्मा। आँख आदि केवल रूप आदि का बोध लेते हैं, मन उन पर सन्देह करता है, बुद्धि सन्देह सुलझाती है, और आत्मा केवल साक्षी है, बिना मिले हुए देखती है। सत्त्व, रजस् और तमस्, ये तीन गुण अपने-अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं। हर्ष, प्रसन्नता, समता और सन्तोष सत्त्व के; अभिमान, असत्य, लोभ और प्रतिशोध रजस् के; और बुद्धि का मोह, प्रमाद, निद्रा, आलस्य तमस् के लक्षण हैं।”
व्यास जी जीवन-नदी का रूपक देते हैं, “यह जीवन की नदी भयंकर है। पाँच इन्द्रियाँ इसके मगरमच्छ हैं, मन और उसके संकल्प इसके दो तट, लोभ और मोह इस पर तैरते घास-तिनके, काम और क्रोध इसमें रहने वाले भयानक सर्प। सत्य इसके कीचड़-भरे तट पर तीर्थ है, असत्य इसकी लहरें, क्रोध इसका कीचड़। यह अव्यक्त से उपजती है, इसका वेग तीव्र है, और अशुद्ध-आत्मा वाले इसे पार नहीं कर सकते। बुद्धि के सहारे इस नदी को पार कीजिए, जिसमें इच्छाएँ घड़ियाल-सी हैं। पार करके आप हर आसक्ति से मुक्त होकर, शान्त-हृदय, आत्मज्ञ और शुद्ध हो जाएँगे, और पर्वत-शिखर से नीचे रेंगते प्राणियों को देखने वाले की भाँति संसार को देखेंगे।
“ब्रह्म का न पुरुष-लिंग है, न स्त्री-लिंग, न नपुंसक। वह न शोक है, न सुख। चाहे कोई स्त्री हो या पुरुष, जो ब्रह्म को जान लेता है उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): तत्त्वों का क्रम, इन्द्रियों से परे विषय, विषयों से परे मन, मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे आत्मा (महत्), उससे परे अव्यक्त (प्रकृति), और अव्यक्त से परे ब्रह्म। यह सीढ़ी सांख्य की रीढ़ है। तीन गुण, सत्त्व (प्रकाश, शान्ति), रजस् (गति, चाह, शोक), तमस् (जड़ता, मोह, निद्रा), अपने-अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं, सीधे नहीं दिखते।
सार: तत्त्वों का चढ़ता क्रम ब्रह्म पर समाप्त होता है। यह उपदेश वेदों का मथा हुआ अमृत है, श्रद्धा से ही समझ में आता है। बुद्धि की नाव से जीवन-नदी पार कीजिए; ब्रह्म लिंग-रहित है, उसे जानने वाला, स्त्री हो या पुरुष, फिर जन्म नहीं लेता।
इच्छा का वृक्ष और देह-रूपी नगर
व्यास जी एक रूपक देते हैं, “मनुष्य के हृदय में ‘इच्छा’ नाम का एक विचित्र वृक्ष है। यह ‘भ्रम’ नामक बीज से उगता है। क्रोध और अभिमान इसका बड़ा तना हैं, कर्म की चाह इसकी जड़ सींचने वाला थाला, अज्ञान इसकी जड़, और प्रमाद इसका जल। ईर्ष्या इसके पत्ते हैं, पिछले जन्मों के बुरे कर्म इसे बल देते हैं, विवेक-नाश और चिन्ता इसकी टहनियाँ, शोक इसकी बड़ी शाखाएँ, और भय इसका अंकुर। नाना विषयों की तृष्णा इस पर चढ़ने वाली बेलें हैं। अति-लोभी मनुष्य लोहे की ज़ंजीरों में बँधे इस वृक्ष के चारों ओर बैठकर इसके फल की आशा में इसकी पूजा करते हैं। जो उन ज़ंजीरों को तोड़कर समाधि की तलवार से इस वृक्ष की जड़ काट देता है, वह सुख-दुःख दोनों के पार जाता है।
“देह को एक नगर कहा गया है। बुद्धि इस नगर की स्वामिनी है, मन उसका मन्त्री जिसका काम निश्चय करना है, और इन्द्रियाँ वे नागरिक जिन्हें मन काम पर लगाता है। इन नागरिकों के पोषण के लिए मन नाना कर्मों की ओर झुकता है। इन कर्मों में दो बड़े दोष दिखते हैं, तमस् और रजस्। मन ही पहले रजस् से मित्रता करता है, और फिर आत्मा, बुद्धि और इन्द्रियों को पकड़कर, मानो एक झूठा मन्त्री शत्रु से मिलकर राजा और प्रजा को बन्दी बना ले, उन्हें रजस् के हवाले कर देता है।”
सार: इच्छा का वृक्ष भ्रम से उगता है, अज्ञान इसकी जड़, और लोभी इसके फल की पूजा करते हैं; समाधि की तलवार से इसकी जड़ काटो। देह एक नगर है, बुद्धि स्वामिनी, मन मन्त्री; पर मन रजस् से मिलकर राजा-प्रजा को बन्दी बना सकता है।
तत्त्वों के पचास गुण: युधिष्ठिर का प्रश्न
भीष्म जी कहते हैं, “हे पुत्र, अब द्वैपायन व्यास के तत्त्व-गणना सम्बन्धी वचन फिर सुनिए, जो उन्होंने अपने पुत्र से कहे थे। पृथ्वी के गुण हैं, स्थिरता, भार, कठोरता, उत्पादकता, गन्ध, घनत्व, गन्ध सोखने की क्षमता, जुड़ाव, धारण-क्षमता और सहनशीलता। जल के गुण, शीतलता, रस, आर्द्रता, तरलता, कोमलता, जमने और गलाने की क्षमता आदि। अग्नि के गुण, अदम्य ऊर्जा, ज्वलनशीलता, ताप, प्रकाश, वेग और ऊपर उठने की प्रवृत्ति। वायु के गुण, न शीत न उष्ण स्पर्श, गति-स्वातन्त्र्य, बल, वेग, श्वास का आना-जाना। आकाश के गुण, शब्द, विस्तार, और आश्रय की आवश्यकता का अभाव। ये पचास गुण पाँच भूतों के सार हैं।
“मन के गुण, धैर्य, तर्क, स्मृति, विस्मृति (भूल), कल्पना, सहनशीलता, अच्छाई की ओर झुकाव, बुराई की ओर झुकाव, और चंचलता। बुद्धि के पाँच गुण, स्वप्न-रहित निद्रा (अच्छे-बुरे विचारों का अभाव), दृढ़ता, एकाग्रता, निश्चय और प्रत्यक्ष प्रमाण पर टिका निर्णय।”
युधिष्ठिर पूछते हैं, “हे पितामह, बुद्धि के पाँच ही गुण कैसे? और पाँच इन्द्रियाँ पाँच भूतों के गुण कैसे कही जाएँ? यह बहुत गूढ़ जान पड़ता है, मुझे समझाइए।”
भीष्म जी उत्तर देते हैं, “बुद्धि के कुल साठ गुण कहे गए हैं, क्योंकि बुद्धि में पाँच भूत भी समाविष्ट हैं (पाँच भूत, उनके पचास गुण और बुद्धि के अपने पाँच गुण)। ये सब गुण आत्मा से जुड़े रहते हैं। वेद कहते हैं कि ये भूत और उनके गुण, मन-बुद्धि सहित, उसी अविनाशी ने रचे हैं; इसलिए ये सब (इकहत्तर तत्त्व) आत्मा-सी नित्य नहीं हैं। इन सबको ठीक से समझकर, परब्रह्म के ज्ञान का बल पाकर, हृदय की शान्ति खोजिए।”
समझने की कुंजी (संख्या): गणना यों है, पाँच भूत, उनके पचास गुण और बुद्धि के अपने पाँच गुण, इस तरह बुद्धि से जुड़े कुल साठ गुण कहे जाते हैं। इनमें मन और उसके नौ गुण तथा स्वयं बुद्धि जोड़ने पर पूरी सूची इकहत्तर तत्त्वों की बनती है, जो सब रचे हुए और इसलिए नश्वर हैं; केवल आत्मा नित्य है।
सार: पाँच भूतों के पचास गुण, मन के नौ, बुद्धि के पाँच गिनाए गए। ये सब रचे हुए और नश्वर हैं; आत्मा अकेली नित्य है। इन्हें जानकर परब्रह्म-ज्ञान से शान्ति पाइए।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म उपपर्व, अध्याय 129-353; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)