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नौ दिन बीत गए, और युधिष्ठिर का धैर्य टूट गया
नौ दिन से कुरुक्षेत्र का मैदान भीष्म के बाणों से जलता आ रहा था। नवें दिन भी जब सूर्य अस्त हुआ और सन्ध्या की वह भयानक बेला आ पहुँची जिसमें युद्ध का कुछ भी दिखाई नहीं देता, तब युधिष्ठिर ने देखा कि उनकी अपनी सेना भीष्म के हाथों मारी जाकर शस्त्र फेंक चुकी है, भय से भागी जा रही है, और सोमक-वीर हारकर निराश खड़े हैं। राजा ने कुछ क्षण विचार किया और सेना को पीछे हटा लेने की आज्ञा दी। दूसरी ओर कौरवों ने भी अपनी सेना समेट ली, और दोनों ओर के महारथी अपने-अपने शिविरों में लौट गए। भीष्म ने उस दिन भी पाण्डवों और सृंजयों को परास्त किया था, इसलिए धृतराष्ट्र-पुत्र उनकी प्रशंसा करते हुए, हर्षित होकर, उन्हें अपने शिविर तक ले गए।

समझने की कुंजी (वंश): भीष्म शान्तनु और गंगा के पुत्र हैं, इसी से वे “गांगेय”, “शान्तनुपुत्र” और “देवव्रत” कहलाते हैं। पाण्डव और कौरव, दोनों के लिए वे पितामह (दादा) हैं, क्योंकि वे इन दोनों कुलों के पिता-पक्ष के परम वृद्ध और परम आदरणीय पुरुष हैं। सृंजय और सोमक पाण्डवों के पक्ष के पांचाल-वंशी योद्धा-समूह हैं।

रात्रि उतर आई, वह रात्रि जो समस्त प्राणियों की चेतना हर लेती है। उसी घोर बेला में पाण्डव, वृष्णि और अजेय सृंजय एक मन्त्रणा के लिए एकत्र हुए। तब युधिष्ठिर ने बहुत देर सोचकर, वासुदेव कृष्ण पर दृष्टि डालते हुए ये वचन कहे, “हे कृष्ण, उस उग्र पराक्रमी महात्मा भीष्म को देखिए। जैसे हाथी सरकंडों के वन को कुचल डाले, वैसे वे मेरी सेना को कुचल रहे हैं। हम उस महात्मा की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते। प्रचण्ड दावानल की भाँति वे मेरी सेना को चाट जाते हैं। हाथ में धनुष लिए, क्रोध से भरे, बाण बरसाते हुए वे तक्षक नाग के समान भयंकर हो उठते हैं। क्रुद्ध यम जीते जा सकते हैं, वज्रधारी इन्द्र भी, पाशधारी वरुण भी, और गदाधारी कुबेर भी, पर क्रोध में भरे भीष्म युद्ध में अजेय हैं।”
युधिष्ठिर का स्वर भीतर से टूट चुका था। उन्होंने कहा, “हे अजेय, मैं अपनी बुद्धि की दुर्बलता से शोक के समुद्र में डूब गया हूँ। मैं वन में चला जाऊँगा, वही मेरे लिए श्रेयस्कर है। अब मुझे युद्ध की इच्छा नहीं रही। जैसे पतिंगा जलती अग्नि में कूदकर केवल मृत्यु पाता है, वैसे ही मैं भीष्म पर टूटता हूँ। राज्य के लिए पराक्रम दिखाते हुए, हाय, मैं विनाश की ओर ले जाया जा रहा हूँ। मेरे वीर भाई बाणों से अत्यन्त पीड़ित हैं। मुझ बड़े भाई के स्नेह में उन्हें राज्य से वंचित होकर वन जाना पड़ा। हे मधुसूदन, मेरे ही कारण द्रौपदी इस संकट में डूबी। यदि भाइयों सहित मैं आपकी कृपा के योग्य हूँ, तो हे कृष्ण, अपने धर्म का उल्लंघन किए बिना मेरे हित का उपाय बताइए।”
उनके ये वचन और सारी स्थिति सुनकर कृष्ण ने करुणा से, युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए, उत्तर दिया, “हे धर्मपुत्र, हे सत्य में दृढ़ रहने वाले, शोक मत कीजिए, जिनके अर्जुन और भीमसेन जैसे शत्रुनाशक भाई हों। ये दोनों वायु और अग्नि के समान तेजस्वी हैं, और माद्री के दोनों पुत्र इन्द्र के समान वीर हैं। हमारे बीच जो सद्भाव है, उसके नाते मुझे भी इस कार्य में लगाइए। मैं स्वयं भीष्म से युद्ध करूँगा। आपकी आज्ञा से ऐसा क्या है जो मैं इस महायुद्ध में न कर सकूँ? यदि अर्जुन उन्हें मारना न चाहें, तो मैं अकेला, एक ही रथ पर चढ़कर, धृतराष्ट्र-पुत्रों के सामने उस वृद्ध पितामह को मार गिराऊँगा। पर हे राजन्, यदि आप भीष्म के वध में ही विजय निश्चित देखते हैं, तो यह कार्य अर्जुन के लिए भी भारी नहीं। पहले उपप्लव्य में पार्थ ने अनेक लोगों के सामने प्रतिज्ञा की थी कि वे गंगापुत्र का वध करेंगे। उन बुद्धिमान पार्थ के वचन निभाए जाने चाहिए।”
युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबाहो, ऐसा ही है जैसा आप कहते हैं। जहाँ आप मेरे पक्ष में हों, वहाँ मैं इन्द्र-सहित देवताओं को भी जीत लूँ, भीष्म की तो बात ही क्या। पर हे कृष्ण, अपने महत्त्व के लिए मैं आपके वचन को मिथ्या नहीं कर सकता। आपने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि आप मेरे लिए युद्ध नहीं करेंगे, केवल परामर्श देंगे। इसलिए हे माधव, बिना युद्ध किए ही मेरी सहायता कीजिए। और एक बात है, जो मेरे मन में आई है। भीष्म ने मुझसे कहा था कि वे मेरे लिए लड़ेंगे नहीं, पर हित का परामर्श अवश्य देंगे। तो हम सब आपके साथ चलकर देवव्रत के पास जाएँ, और उन्हीं से उनकी मृत्यु का उपाय पूछें। हम बालक थे, अनाथ थे, उन्होंने ही हमारा पालन किया। वही पितामह, हमारे पिता के भी पिता, हाय, उन्हीं से मैं आज उनकी मृत्यु का मार्ग पूछना चाहता हूँ। धिक्कार है इस क्षत्रिय-वृत्ति को।”
सार: नौ दिन के संहार से टूटकर युधिष्ठिर ने वन जाने तक की बात कह डाली। कृष्ण ने स्वयं शस्त्र उठाने का प्रस्ताव रखा, पर युधिष्ठिर ने उन्हें उनकी प्रतिज्ञा (युद्ध न करने की) याद दिलाई। अन्त में यह निश्चय हुआ कि वे स्वयं भीष्म के पास जाकर उन्हीं से उनकी मृत्यु का उपाय पूछेंगे। यहीं महाभारत की वह विकट नैतिक गाँठ खुलती है, जहाँ शिष्य अपने पूज्य पितामह से उन्हीं को मारने का रहस्य माँगने जाते हैं।
पितामह स्वयं अपनी मृत्यु का द्वार बताते हैं
ऐसा निश्चय करके पाण्डव और वासुदेव, अपने कवच और शस्त्र उतारकर, सब मिलकर भीष्म के शिविर में गए। भीतर पहुँचकर उन्होंने सिर झुकाकर पितामह को प्रणाम किया और उनकी शरण ली। महाबाहु भीष्म ने उनसे स्नेह-भरे वचन कहे, “हे वृष्णिवंशी, स्वागत है। हे धनंजय, स्वागत है। हे राजा युधिष्ठिर, हे भीम, और हे दोनों जुड़वाँ भाइयो, आप सबका स्वागत है। आपका हर्ष बढ़ाने के लिए अब मैं क्या करूँ? चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो, मैं उसे अपने सम्पूर्ण मन से करूँगा।”
बार-बार इतने स्नेह से कहने वाले गंगापुत्र से युधिष्ठिर ने प्रसन्न हृदय से, प्रेमपूर्वक कहा, “हे सर्वज्ञ, हम विजय कैसे पाएँ, राज्य कैसे पाएँ, और प्राणियों का यह संहार कैसे रुके? यह सब मुझे बताइए, हे प्रभु। अपनी मृत्यु का उपाय बताइए। हे वीर, हम युद्ध में आपको कैसे सह सकेंगे? आप तो शत्रु को छिद्र तक नहीं देते। आपके धनुष को सदा मण्डलाकार खिंचा देखकर कोई जान ही नहीं पाता कि आप कब बाण उठाते हैं, कब साधते हैं, और कब छोड़ते हैं। हे पितामह, वह उपाय बताइए जिससे हम आपको जीत सकें, राज्य पा सकें, और मेरी सेना का यह विनाश रुक सके।”
यह सुनकर शान्तनुपुत्र ने पाण्डुपुत्र से कहा, “हे कुन्तीपुत्र, जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक युद्ध में आपकी विजय नहीं हो सकती, यह मैं सत्य कहता हूँ। पर जब मैं युद्ध में परास्त हो जाऊँ, तब आपको विजय मिल सकती है। इसलिए यदि विजय चाहते हैं, तो मुझे बिना देर किए गिरा दीजिए। हे पृथापुत्रो, मैं आपको अनुमति देता हूँ, जैसे चाहें वैसे मुझ पर प्रहार कीजिए। मेरे मारे जाने पर शेष सब मारे जाएँगे, इसलिए जैसा मैं कहता हूँ वैसा कीजिए।”
युधिष्ठिर ने फिर पूछा, “क्रोध में आप गदाधारी काल के समान हो उठते हैं। वज्रधारी इन्द्र, वरुण या यम जीते जा सकते हैं, पर आप तो इन्द्र-सहित देवताओं और असुरों से भी अजेय हैं। फिर वह उपाय क्या है?”
भीष्म ने कहा, “हे महाबाहु, जो आप कहते हैं वह सत्य है। जब मैं धनुष-बाण लेकर सावधानी से युद्ध करता हूँ, तब इन्द्र-सहित देवता और असुर भी मुझे नहीं जीत सकते। पर यदि मैं शस्त्र रख दूँ, तो ये महारथी मुझे मार सकते हैं। जिसने शस्त्र फेंक दिए हों, जो गिर पड़ा हो, जिसका कवच उतर गया हो, जिसकी ध्वजा गिर गई हो, जो भाग रहा हो, जो भयभीत हो, जो कहे ‘मैं आपकी शरण में हूँ’, जो स्त्री हो, जो स्त्री का नाम धरे, जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो, जिसका एक ही पुत्र हो, या जो नीच कुल का हो, इनसे मैं युद्ध नहीं करता। और सुनिए, मेरा एक संकल्प यह भी है कि कोई अपशकुन देखकर मैं कभी युद्ध नहीं करता।”
अब भीष्म ने वह द्वार खोल दिया जिसे वे जानते थे। उन्होंने कहा, “आपकी सेना में द्रुपद का पुत्र है, जिसे शिखण्डी कहते हैं, जो युद्ध में क्रोधी, वीर और सदा विजयी है। वह पहले स्त्री था और पीछे पुरुष हुआ, यह बात आप सब भली भाँति जानते हैं। कवच धारण किए हुए अर्जुन शिखण्डी को आगे करके अपने तीखे बाणों से मुझ पर आक्रमण करें। जब वह अपशकुन-रूप, जो पहले स्त्री था, मेरे सामने होगा, तब मैं धनुष-बाण होते हुए भी उस पर प्रहार करने की इच्छा नहीं करूँगा। उसी अवसर को पाकर हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डुपुत्र धनंजय मुझे चारों ओर से अपने बाणों से बेध दें। श्रीकृष्ण और अर्जुन को छोड़कर, तीनों लोकों में मुझे मारने में समर्थ कोई व्यक्ति मैं नहीं देखता। इसलिए अर्जुन शिखण्डी या कुछ और आगे करके मुझे रथ से गिरा दें। तभी विजय निश्चित है।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): शिखण्डी द्रुपद-पुत्री थी जो वरदान से पुरुष हुई, और जिसका सम्बन्ध भीष्म के पूर्वजन्म की उस अम्बा से है जिसने भीष्म से वैर बाँधा था। भीष्म का व्रत है कि वे स्त्री, या स्त्री रूप में जन्मे, या स्त्री-नाम धरे किसी पर शस्त्र नहीं उठाते। यही व्रत उनकी मृत्यु का द्वार बन जाता है। यह महाभारत की उस नैतिक बुनावट का अंग है जहाँ धर्म ही किसी को असुरक्षित कर देता है।
यह सब जानकर पाण्डव पितामह को प्रणाम करके अपने शिविरों को लौट गए। पर परलोक जाने को उद्यत गंगापुत्र की यह बात सुनकर अर्जुन शोक से जल उठे, और लज्जा से उनका मुख झुक गया। उन्होंने कहा, “हे माधव, मैं उस पितामह से युद्ध कैसे करूँ जो आयु में बड़े हैं, बुद्धि और विवेक से सम्पन्न हैं, और हमारे कुल के परम वृद्ध पुरुष हैं? बाल्यकाल में खेलते हुए मैं अपने धूल-भरे शरीर से इन महात्मा की गोद में चढ़ जाता और इनका शरीर मैला कर देता था। ये मेरे पिता पाण्डु के पिता हैं। एक बार बालपन में इनकी गोद में चढ़कर मैंने इन्हें ‘पिताजी’ कह दिया था। तब इन्होंने कहा था, ‘मैं आपका पिता नहीं, आपके पिता का पिता हूँ, हे भारत।’ जिन्होंने यह कहा, उन्हें मैं कैसे मारूँ? चाहे विजय मिले या मृत्यु, मैं उस महात्मा से युद्ध नहीं करूँगा। हे कृष्ण, आप क्या कहते हैं?”
वासुदेव ने कहा, “हे जिष्णु, पहले भीष्म-वध की प्रतिज्ञा करके अब क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध आप उनके वध से कैसे विमुख हो सकते हैं? हे पार्थ, युद्ध में अजेय उस क्षत्रिय को रथ से गिरा दीजिए, क्योंकि गंगापुत्र को मारे बिना आपकी विजय कभी नहीं होगी। यही देवताओं ने पहले से निश्चित कर रखा है, और जो पहले से नियत है वह अवश्य होगा। बृहस्पति ने प्राचीन काल में इन्द्र से यही कहा था कि जो शत्रु बनकर आए, चाहे वह वृद्ध हो, सब गुणों से युक्त हो और पूज्य हो, उसका भी वध कर देना चाहिए। हे धनंजय, क्षत्रिय का यही सनातन धर्म है कि वह बिना द्वेष के युद्ध करे, प्रजा की रक्षा करे और यज्ञ करे।”
अर्जुन ने कहा, “हे कृष्ण, शिखण्डी ही भीष्म की मृत्यु का कारण होगा, क्योंकि पांचाल-राजकुमार को देखते ही भीष्म प्रहार करना छोड़ देते हैं। इसलिए शिखण्डी को आगे और अपने मस्तक पर रखकर हम गंगापुत्र को गिराएँगे। अन्य धनुर्धरों को मैं अपने बाणों से रोक लूँगा, और शिखण्डी अकेले भीष्म से लड़ेंगे, क्योंकि मैंने स्वयं कुरुश्रेष्ठ से सुना है कि वे शिखण्डी पर प्रहार नहीं करेंगे।” यह निश्चय करके, भीष्म की अनुमति लेकर, पाण्डव माधव के साथ प्रसन्न हृदय से लौटे और अपनी-अपनी शय्याओं पर विश्राम को गए।
सार: भीष्म ने स्वयं अपनी मृत्यु का द्वार खोल दिया, शिखण्डी को आगे करना। अर्जुन का बचपन का स्नेह और कृष्ण का कठोर क्षत्रिय-धर्म यहाँ आमने-सामने हैं। कृष्ण ने अर्जुन को उनकी पुरानी प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर कर्तव्य की ओर धकेला। यह वह क्षण है जहाँ भक्ति, धर्म और शोक एक साथ टकराते हैं, और किसी को सहज विजय नहीं मिलती।
दसवें दिन का सूर्योदय, शिखण्डी सब से आगे
धृतराष्ट्र ने पूछा, “हे संजय, शिखण्डी गंगापुत्र की ओर कैसे बढ़े, और भीष्म पाण्डवों की ओर कैसे? यह सब मुझे बताओ।”
संजय ने कहा, “सूर्योदय की बेला में पाण्डव, नगाड़ों, झाँझों और दूधिया शंखों की ध्वनि के साथ, शिखण्डी को अपनी सेना के अग्रभाग में रखकर युद्ध के लिए निकले। शिखण्डी सम्पूर्ण सेना के बिल्कुल आगे खड़े थे। भीमसेन और धनंजय उनके रथ के पहियों के रक्षक बने। उनके पीछे द्रौपदी के पुत्र और वीर अभिमन्यु थे। महारथी सात्यकि और चेकितान सब से पीछे की रक्षा में लगे। उनके पीछे पांचालों से घिरे धृष्टद्युम्न, फिर जुड़वाँ भाइयों सहित स्वयं राजा युधिष्ठिर, फिर विराट, फिर द्रुपद चले। पाँचों केकय-भाई और वीर धृष्टकेतु पाण्डव-सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे।”
संजय ने कहा, “कौरवों ने भी महारथी भीष्म को सम्पूर्ण सेना के अग्रभाग में रखकर प्रयाण किया। उनके पीछे महाधनुर्धर द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा थे, फिर अपने गजदल से घिरे भगदत्त, फिर कृप और कृतवर्मा, फिर काम्बोज-राज सुदक्षिण, मगध-राज जयत्सेन, सुबल-पुत्र शकुनि और बृहद्बल थे। भीष्म प्रतिदिन कभी आसुर, कभी पैशाच और कभी राक्षस व्यूह की रचना करते थे। अर्जुन को आगे रखे, शिखण्डी को अग्रभाग में किए, पाण्डव अनेक प्रकार के बाण बिखेरते हुए भीष्म की ओर बढ़े।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): व्यूह सेना की एक विशेष रचना या साँचा है, जिसमें सैनिक एक निश्चित आकृति में खड़े होते हैं। आसुर, पैशाच और राक्षस व्यूह उन रचनाओं के नाम हैं, जिनकी आकृति और आक्रामकता उनके नाम से ध्वनित होती है। भीष्म प्रतिदिन भिन्न व्यूह रचते थे, ताकि शत्रु उनकी चाल का पूर्वानुमान न लगा सके।
भीष्म के बाणों से बिंधे, रक्त से सने अनेक कौरव-योद्धा परलोक सिधार गए। नकुल, सहदेव और सात्यकि कौरव-सेना को बड़े वेग से पीड़ित करने लगे, और कौरव-सेना उस विशाल पाण्डव-समूह के सामने टिक न सकी, सब ओर भागने लगी। तब धृतराष्ट्र ने पूछा कि क्रुद्ध भीष्म ने अपनी पीड़ित सेना को देखकर क्या किया। संजय ने कहा, “अपनी सेना का वह संहार भीष्म सह न सके। उस अजेय महाधनुर्धर ने अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर पाण्डवों, पांचालों और सृंजयों पर लम्बे, बछड़े के दाँत जैसे और अर्धचन्द्राकार बाणों की झड़ी लगा दी। उन्होंने पाँचों महारथी पाण्डवों को रोक दिया, असंख्य हाथी-घोड़े मार गिराए, और रथियों को रथों से, सवारों को घोड़ों से, और गजारोहियों को हाथियों की पीठ से गिराकर शत्रु में आतंक भर दिया। उनका शक्र-समान धनुष सदा मण्डलाकार खिंचा दिखता था।”

उसी दसवें दिन भीष्म ने शिखण्डी के दल को दावानल की भाँति भस्म कर डाला। तब विषधर सर्प के समान क्रुद्ध शिखण्डी ने भीष्म की छाती के मध्य में तीन बाण मारे। गहरी चोट खाकर भीष्म ने देखा कि यह शिखण्डी है। क्रोध से भरे, पर शिखण्डी से युद्ध करने को अनिच्छुक भीष्म ने हँसकर कहा, “चाहे आप मुझ पर प्रहार करें या न करें, मैं आपसे कभी युद्ध नहीं करूँगा। आप वही शिखण्डी हैं जैसा विधाता ने आपको पहले बनाया था।”
यह सुनकर शिखण्डी क्रोध से अपने होंठ चाटते हुए बोले, “हे महाबाहु, मैं जानता हूँ कि आप क्षत्रिय-कुल के संहारक हैं। मैंने परशुराम से आपके युद्ध की कथा सुनी है, और आपके अमानुषी पराक्रम की भी। फिर भी मैं आज आपसे युद्ध करूँगा। पाण्डवों का और अपना प्रिय करने के लिए, हे शत्रुनाशक, मैं आज आपसे लड़ूँगा। मैं आपको अवश्य मारूँगा, यह मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ। हे सदा विजयी भीष्म, इस संसार को अन्तिम बार देख लीजिए।” यह कहकर शिखण्डी ने पाँच सीधे बाणों से भीष्म को बेध दिया।
एक उप-कथा: शिखण्डी का भीष्म के प्रति यह वैर आकस्मिक नहीं था। महाभारत में पहले आ चुका है कि काशिराज की पुत्री अम्बा को भीष्म ने स्वयंवर से हरण कर लाने पर त्याग दिया, जिससे उसका विवाह नहीं हो सका। अम्बा ने भीष्म से प्रतिशोध का व्रत लेकर तप किया, प्राण त्यागे, और द्रुपद के घर शिखण्डी के रूप में जन्म लिया, जो स्त्री से पुरुष बना। इसी से भीष्म उसे “स्त्री-रूप में जन्मा” मानकर उस पर शस्त्र नहीं उठाते, और यही पूर्वजन्म का वैर उनकी मृत्यु का साधन बनता है।
उनके वचन सुनकर अर्जुन ने, शिखण्डी को भीष्म का संहारक मानकर, उत्साह दिया, “मैं आपके पीछे रहकर शत्रुओं को अपने बाणों से तितर-बितर करूँगा। क्रोध में भरकर भीष्म पर टूट पड़िए। यदि आज आप भीष्म को मारे बिना लौटे, तो मेरे साथ आप भी संसार में उपहास के पात्र बनेंगे। आप पितामह को रोकिए, और मैं द्रोण, अश्वत्थामा, कृप, दुर्योधन, चित्रसेन, विकर्ण, सिन्धुराज जयद्रथ, अवन्ती के विन्द-अनुविन्द, काम्बोज-राज सुदक्षिण, भगदत्त, मगध-राज, सोमदत्त-पुत्र और शेष सब महारथियों को, समुद्र को रोकने वाले तट की भाँति, रोके रखूँगा। आप पितामह का वध कीजिए।”
पितामह का अन्तिम संकल्प, और भीषण द्वन्द्व
धृतराष्ट्र ने पूछा कि क्या भीष्म का रथ या धनुष टूटा। संजय ने कहा, “नहीं, युद्ध में न तो भीष्म का धनुष टूटा, न रथ को कोई क्षति पहुँची। वे सीधे बाणों से शत्रु का संहार कर रहे थे। दसवें दिन उन्होंने शत्रु-सेना को सहस्रों के समूह में चीर डाला। पाण्डव उस महाधनुर्धर को परास्त न कर सके। तब बाएँ हाथ से भी धनुष चलाने वाले धनंजय वहाँ आ पहुँचे, सिंह की भाँति गरजते और बाण बरसाते हुए। उनके गर्जन से भयभीत होकर कौरव-योद्धा सिंह के शब्द से छोटे पशुओं की भाँति भाग खड़े हुए।”
यह देखकर भयभीत दुर्योधन ने भीष्म से कहा, “हे गंगापुत्र, श्वेत अश्वों वाले और कृष्ण को सारथि बनाए हुए पाण्डुपुत्र मेरी सारी सेना को दावानल की भाँति जला रहे हैं। देखिए, मेरे सब सैनिक भागे जा रहे हैं। जैसे ग्वाला वन में पशुओं को हाँकता है, वैसे ही मेरी सेना हाँकी जा रही है। भीम, सात्यकि, चेकितान, माद्री के दोनों पुत्र, वीर अभिमन्यु, धृष्टद्युम्न और राक्षस घटोत्कच, सब मेरी सेना को तोड़ रहे हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ, आपको छोड़कर इन पीड़ित सैनिकों का और कोई आश्रय मुझे नहीं दिखता।”
तब आपके पिता देवव्रत ने क्षण भर सोचकर, दुर्योधन को सान्त्वना देते हुए कहा, “हे दुर्योधन, शान्ति से सुनिए। पहले मैंने आपके सामने प्रतिज्ञा की थी कि प्रतिदिन दस सहस्र उत्तम क्षत्रियों को मारकर ही मैं युद्ध से लौटूँगा। मैं वह प्रतिज्ञा निभाता आया हूँ। आज मैं एक और बड़ा कार्य करूँगा। आज या तो मैं स्वयं मारा जाकर सोऊँगा, या पाण्डवों को मारूँगा। हे नरश्रेष्ठ, आपके दिए अन्न के ऋण से आज मैं आपकी सेना के अग्रभाग में अपने प्राण न्योछावर करके उऋण हो जाऊँगा।” यह कहकर वे क्षत्रियों के बीच बाण बरसाते हुए पाण्डव-सेना पर टूट पड़े।
उस दसवें दिन भीष्म ने अपना पराक्रम दिखाते हुए लाखों योद्धाओं का संहार किया। उन्होंने पांचालों के बीच के तेजस्वी राजाओं की शक्ति को वैसे ही सोख लिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल। दस सहस्र वेगवान हाथी, दस सहस्र घोड़े सवारों सहित, और पूरे दो लाख पैदल सैनिक मारकर वह नरश्रेष्ठ धूमरहित अग्नि की भाँति देदीप्यमान हुए। उत्तरायण में स्थित तपते सूर्य की भाँति उनकी ओर कोई पाण्डव आँख तक न उठा सका।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “दस सहस्र हाथी” या “दो लाख पैदल” जैसी विशाल संख्याएँ महाभारत की काव्य-शैली का अंग हैं, जो किसी एक दिन में हुए संहार की भयावहता को मन में बैठाती हैं। इन्हें शाब्दिक सैन्य-गणना मानने के बजाय अतिशयोक्तिपूर्ण बिम्ब समझना उचित है, जो उस युग की युद्ध-कल्पना की विराटता दर्शाते हैं।
तब अर्जुन ने शिखण्डी से कहा, “पितामह की ओर बढ़िए। आज भीष्म से तनिक भी भय मत कीजिए। मैं स्वयं अपने तीखे बाणों से उन्हें उनके उत्तम रथ से गिरा दूँगा।” यह सुनकर शिखण्डी गंगापुत्र पर टूट पड़े। धृष्टद्युम्न और अभिमन्यु भी हर्षित होकर भीष्म पर झपटे। वृद्ध विराट, द्रुपद और कुन्तिभोज भी कवच धारण किए भीष्म पर बढ़े। नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर और शेष सब योद्धा भी भीष्म की ओर दौड़े।
कौरव-पक्ष के योद्धाओं ने उन्हें रोका। चित्रसेन ने चेकितान को रोका, कृतवर्मा ने धृष्टद्युम्न को, सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा ने भीम को, विकर्ण ने नकुल को, और कृप ने सहदेव को रोका। दुर्योधन ने स्वयं सात्यकि को रोका, और महाधनुर्धर दुःशासन ने शिखण्डी को आगे किए हुए वेग से बढ़ते अर्जुन को रोका। तब वहाँ एक अद्भुत दृश्य देखा गया, अर्जुन दुःशासन के रथ तक पहुँचकर आगे न बढ़ सके, क्योंकि समुद्र को रोकने वाले तट की भाँति दुःशासन ने उन्हें रोक लिया। दोनों रथियों में माया और इन्द्र के प्राचीन द्वन्द्व जैसा भीषण युद्ध हुआ। अर्जुन ने दुःशासन को सौ बाणों से बेधा, और दुःशासन ने अर्जुन के मस्तक में तीन तीखे बाण मारे, जिनसे बिंधे अर्जुन शिखर-युक्त मेरु की भाँति शोभित हुए। अन्ततः, पार्थ से अत्यन्त पीड़ित होकर दुःशासन भीष्म के रथ की ओर भाग गए, और डूबते हुए के लिए भीष्म ही द्वीप बन गए।
उधर ऋष्यशृंग-पुत्र राक्षस अलम्बुष ने सात्यकि को रोका, सुदक्षिण ने अभिमन्यु को, अश्वत्थामा ने विराट और द्रुपद को, और भारद्वाज-पुत्र द्रोण ने स्वयं युधिष्ठिर को रोका। द्रोण के रथ की मेघ-गर्जन सी ध्वनि सुनकर प्रभद्रक काँप उठे, और द्रोण से रुकी युधिष्ठिर की वह विशाल सेना एक पग भी आगे न बढ़ सकी। इस प्रकार भीष्म की रक्षा के लिए कौरव-वीरों ने पाण्डव-महारथियों को जगह-जगह रोके रखा, पर आपके पुत्रों की सेना उस संहार से चारों ओर विचलित होने लगी।
सार: दसवें दिन भीष्म ने जीवन की चिन्ता त्याग दी और अद्वितीय संहार किया, पर भीतर ही भीतर अपनी मृत्यु को आमन्त्रित कर रहे थे। दुर्योधन के लिए अन्न-ऋण चुकाने का संकल्प, और दूसरी ओर शिखण्डी को आगे करके भीष्म तक पहुँचने का पाण्डव-प्रयास, दोनों एक साथ चल रहे थे। हर महारथी की रक्षा-पंक्ति इस बात की साक्षी है कि पितामह को गिराना कितना कठिन था।
अग्नि बन गए भीष्म, और स्वयं ही प्राण-त्याग की इच्छा
धृतराष्ट्र ने फिर पूछा कि उस दसवें दिन भीष्म कैसे लड़े। संजय ने कहा, “उस दिन जब भीष्म और अर्जुन आमने-सामने हुए, तब घोर संहार हुआ। उच्च और दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता शान्तनुपुत्र ने सहस्रों योद्धाओं को बार-बार मारा। अनेक ऐसे वीर, जिनके नाम और कुल भी ज्ञात न थे, पर जो रण से कभी न हटते थे, उस दिन भीष्म के हाथों मारे गए। दस दिन तक पाण्डव-सेना को जलाकर, धर्मात्मा भीष्म ने अपने प्राणों की रक्षा की इच्छा छोड़ दी। ‘अब मैं और अधिक श्रेष्ठ योद्धाओं का वध नहीं करूँगा,’ ऐसा सोचकर वे अपनी सेना के अग्रभाग में अपना ही वध चाहने लगे।”

युधिष्ठिर को पास देखकर भीष्म ने कहा, “हे युधिष्ठिर, हे महाबुद्धिमान, ये धर्ममय और स्वर्ग की ओर ले जाने वाले वचन सुनिए। हे भारत, अब मैं इस शरीर की रक्षा नहीं चाहता। बहुत समय युद्ध में मनुष्यों का संहार करते बीता। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो पार्थ को पांचालों और सृंजयों सहित अपने अग्रभाग में रखकर मुझे मार डालने का यत्न कीजिए।” उनका यह अभिप्राय जानकर युधिष्ठिर ने सृंजयों के सहारे युद्ध की ओर प्रयाण किया। फिर धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिर ने अपनी सेना को प्रेरित किया, “बढ़ो, लड़ो, भीष्म को जीतो। आप सबको अमोघ-लक्ष्य जिष्णु अर्जुन की रक्षा प्राप्त है। हे सृंजयो, आज भीष्म से भय मत कीजिए। शिखण्डी को आगे रखकर हम आज भीष्म को अवश्य जीतेंगे।”

तब पाण्डव शिखण्डी और धनंजय को आगे करके भीष्म पर टूटे, और कौरव भीष्म को आगे रखकर पाण्डवों पर। दोनों सेनाओं के वेग से पृथ्वी काँप उठी। शंखों के नाद और सिंहनाद से कोलाहल भयानक हो उठा, और उठती धूल मेघ-सी छा गई, जिसमें चमकते शस्त्र बिजली की भाँति कौंधते थे। उस संग्राम में, मानो माँस के टुकड़े के लिए दो बाजों के बीच का युद्ध हो, भीष्म ही वह दाँव बने जिस पर कौरव-सेना की विजय टिकी थी।
अभिमन्यु ने भीष्म के लिए दुर्योधन से युद्ध किया, पौरव ने धृष्टकेतु से, और अश्वत्थामा ने सात्यकि से। पौरव और चेदिराज धृष्टकेतु तो रथ टूट जाने पर खड्ग-ढाल लेकर भूमि पर ही भिड़ गए, और एक-दूसरे को मस्तक तथा कन्धे पर घायल करके दोनों गिर पड़े; जयत्सेन पौरव को और सहदेव धृष्टकेतु को रणभूमि से उठा ले गए। उधर अभिमन्यु ने कोसलराज बृहद्बल से, और भीम ने गजसेना से युद्ध किया। पर्वत-समान हाथी भीम के हाथों गिरकर पृथ्वी को अपनी चीत्कारों से भर रहे थे।

अर्जुन गंगापुत्र के पास पहुँचकर उन्हें अनेक बाणों से पीड़ित करने लगे, मानो वन में एक मतवाला हाथी दूसरे पर टूट पड़ा हो। तब अर्जुन ने कुन्तीपुत्र होकर शिखण्डी को पुकारा, “बढ़िए, बढ़िए, भीष्म की ओर, और उन्हें मारिए।” तब अर्जुन शिखण्डी को आगे करके भीष्म की ओर शीघ्रता से बढ़े। उस समय भीष्म का रथ ही उनकी अग्नि-वेदी था, धनुष उस अग्नि की ज्वाला, और तलवारें, भाले तथा गदाएँ उसकी समिधा। वे जो बाण-वर्षा कर रहे थे, वही उस अग्नि की धधकती चिनगारियाँ थीं, जिनसे वे क्षत्रियों को भस्म कर रहे थे।
शिखण्डी ने भीष्म की छाती के मध्य में दस चौड़े बाण मारे। गंगापुत्र ने केवल क्रोध से शिखण्डी की ओर देखा, मानो उस दृष्टि से ही पांचाल-राजकुमार को भस्म कर देंगे, पर उसकी स्त्री-योनि का स्मरण करके सबके देखते हुए उस पर प्रहार नहीं किया। यह शिखण्डी समझ न सका। तब अर्जुन ने कहा, “शीघ्र दौड़िए और पितामह को मारिए। हे वीर, और क्या कहूँ? युधिष्ठिर की सेना में आपको छोड़कर भीष्म से युद्ध करने योग्य मुझे कोई नहीं दिखता।” शिखण्डी ने नाना अस्त्रों से पितामह को ढक दिया, पर देवव्रत उन बाणों की उपेक्षा करके केवल क्रुद्ध अर्जुन को ही रोकते रहे, और अपने तीखे बाणों से पाण्डव-सेना को परलोक भेजते रहे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): भीष्म की यह दशा महाभारत के नैतिक तनाव का चरम है। वे जानते हैं कि शिखण्डी ही उनकी मृत्यु का साधन है, फिर भी अपने व्रत के कारण उस पर शस्त्र नहीं उठाते। यह न तो दुर्बलता है, न पराजय; यह धर्म और व्रत के प्रति निष्ठा है, जो जानते-बूझते अपने ही प्राणों को असुरक्षित कर देती है। शिखण्डी के बाण उन्हें केवल माध्यम बनाते हैं, असली बाण अर्जुन के हैं।
तब भीष्म के बाणों से सात्यकि, भीम, अर्जुन, द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न और शेष पाण्डव-महारथी शोक के समुद्र में डूबने लगे, पर अर्जुन ने सबकी रक्षा की। दुर्योधन ने अपने योद्धाओं से कहा, “सब ओर से अर्जुन पर टूट पड़िए। सेनापति-धर्म के ज्ञाता भीष्म आप सबकी रक्षा करेंगे।” तब विदेह, कलिंग, दशेरक, निषाद, सौवीर, बाह्लीक, दरद, मालव, शूरसेन, शिवि, शाल्व, शक, त्रिगर्त और केकय आदि अनेक जातियों के योद्धा अर्जुन पर टूट पड़े, मानो पतिंगों के झुण्ड अग्नि पर। महाबाहु अर्जुन ने दिव्य अस्त्रों का स्मरण करके, सहस्रों बाण रचकर, उन सबको अग्नि के पतिंगों की भाँति भस्म कर दिया। उन्होंने दुःशासन के घोड़े और सारथि गिराए, विविंशति, कृप, विकर्ण और शल्य को रथविहीन कर दिया, और दोपहर से पहले ही इन महारथियों को परास्त करके धूमरहित दावानल की भाँति देदीप्यमान हुए। पार्थ ने कौरव-सेना को पीठ दिखाने को विवश करके रणभूमि में रक्त की एक नदी बहा दी।
परशुराम की दी हुई विद्या, और दसवें दिन का संहार
संजय ने कहा, “जब दोनों सेनाओं के योद्धा रणभूमि में सजे, तब वे सब अहटल वीर ब्रह्मलोक पर मन लगाकर लड़ने लगे। उस सामान्य संग्राम में एक ही प्रकार के योद्धा एक ही प्रकार के योद्धाओं से नहीं लड़े; रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुड़सवार घुड़सवार से न भिड़कर, मतवालों की भाँति सब आपस में गुँथ गए। हाथी और मनुष्य इस प्रकार मिल गए कि उनका भेद ही जाता रहा।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): “ब्रह्मलोक पर मन लगाकर लड़ना” का अर्थ है कि वीर मृत्यु को वरण करके लड़ रहे थे, इस विश्वास के साथ कि रण में वीरगति पाने वाला क्षत्रिय उत्तम लोकों को जाता है। कुरुक्षेत्र में मरने वालों के लिए यह गति और भी सुलभ मानी गई। यह उस युग के क्षत्रिय-धर्म की वह आस्था है जो युद्ध को भी एक प्रकार का यज्ञ बना देती है।
संजय ने कहा, “प्राचीन काल में बुद्धिमान परशुराम ने भीष्म को वह अस्त्र-विद्या सिखाई थी जो शत्रु-पंक्तियों का संहार करने वाली थी। उसी विद्या के बल पर वे कुरु-पितामह प्रतिदिन रथियों के दस सहस्र योद्धा मारते आए थे। पर दसवें दिन भीष्म ने अकेले दस सहस्र हाथी मारे। फिर मत्स्यों और पांचालों के सात महारथियों को मारा, पाँच सहस्र पैदल, एक सहस्र हाथी और दस सहस्र घोड़े उस शिक्षा के कौशल से मार गिराए। तदुपरान्त उन्होंने विराट के प्रिय भाई शतानीक को, और फिर पूरे एक सहस्र क्षत्रियों को अपने चौड़े बाणों से मारा। धनंजय के पीछे चलने वाले जो भी पाण्डव-क्षत्रिय भीष्म के समीप पहुँचे, सब यमलोक को गए।”
दसवें दिन वे दोनों सेनाओं के बीच धनुष हाथ में लिए ऐसे शोभित हुए कि ग्रीष्म के मध्याह्न-सूर्य की भाँति कोई राजा उनकी ओर देख तक न सका। यह देखकर मधुसूदन कृष्ण ने प्रसन्न होकर अर्जुन से कहा, “वहाँ शान्तनुपुत्र भीष्म दोनों सेनाओं के बीच खड़े हैं। अपना बल लगाकर उन्हें मारिए और विजय जीतिए। जहाँ से वे हमारी पंक्तियाँ तोड़ रहे हैं, वहीं उन्हें रोकिए। हे प्रभु, आपको छोड़कर भीष्म के बाण सहने का साहस और किसी में नहीं।” तब अर्जुन ने उसी क्षण भीष्म को, उनके रथ, घोड़ों और ध्वजा सहित, अपने बाणों से अदृश्य कर दिया, पर भीष्म ने भी अपनी बाण-वर्षा से अर्जुन के बाणों को छिन्न कर दिया।
तब पांचालराज, धृष्टकेतु, भीम, धृष्टद्युम्न, नकुल-सहदेव, चेकितान, पाँचों केकय-भाई, सात्यकि, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, शिखण्डी, कुन्तिभोज, सुशर्मा और विराट, ये तथा अनेक प्रबल योद्धा भीष्म के बाणों से पीड़ित होकर शोक-सागर में डूबने लगे, पर अर्जुन ने सबको उबार लिया। तब शिखण्डी, अर्जुन से रक्षित होकर, अकेले भीष्म पर वेग से टूटे। अर्जुन ने पहले भीष्म के पीछे चलने वालों को मारा, फिर स्वयं उन पर झपटे। सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, माद्री के दोनों पुत्र, अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र, सब उसी अर्जुन की रक्षा में अकेले भीष्म पर टूट पड़े।
उन सब दृढ़ धनुर्धरों ने भीष्म के शरीर के नाना अंगों को सुनिश्चित बाणों से बेध डाला। उन असंख्य बाणों की उपेक्षा करके अविचलित भीष्म पाण्डव-पंक्तियों में घुस गए, और सब बाणों को मानो खेल-खेल में व्यर्थ कर दिया। बार-बार शिखण्डी की ओर हँसकर देखते, पर उसकी स्त्री-योनि का स्मरण करके उस पर एक भी बाण नहीं चलाते। दूसरी ओर उन्होंने द्रुपद के दल के सात महारथियों को मार डाला। तब मत्स्य, पांचाल और चेदि-योद्धाओं में, जो उस अकेले वीर पर टूट रहे थे, हाहाकार मच गया। भागीरथीपुत्र भीष्म, उस अकेले योद्धा को, सबने पैदल, घोड़ों, रथों और बाण-वर्षा से वैसे ढक लिया जैसे मेघ सूर्य को ढक लेते हैं। तब देवासुर-संग्राम जैसे उस युद्ध में, किरीटधारी अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके भीष्म को बार-बार बेधा।
सार: भीष्म ने स्वयं युधिष्ठिर से अपने वध का यत्न करने को कहा, और दसवें दिन परशुराम की दी अस्त्र-विद्या के बल पर अकेले अपार संहार किया। पर अब सब पाण्डव-महारथी, अर्जुन की रक्षा में, शिखण्डी को आगे करके एक साथ उन पर टूट पड़े। शिखण्डी की उपस्थिति भीष्म के हाथ बाँध देती है, और अर्जुन के बाण निरन्तर बरसते रहते हैं। पितामह का अन्त अब निकट है।
रथ से गिरना, और शर-शय्या
संजय ने कहा, “इस प्रकार सब पाण्डव शिखण्डी को आगे करके, भीष्म को चारों ओर से घेरकर, बार-बार बेधने लगे। सब सृंजयों ने मिलकर उन पर भयानक शतघ्नियाँ, कीलोंवाली गदाएँ, फरसे, मुद्गर, छोटी मोटी लाठियाँ, भाले, बरछे, कम्पन, लम्बे बाण, बछड़े के दाँत जैसे बाण और अग्नि-बाण बरसाए। इस प्रकार अनेक योद्धाओं से पीड़ित होकर भीष्म का कवच सब ओर से बिंध गया। पर हर मर्मस्थल में बिंधकर भी भीष्म को पीड़ा नहीं हुई। उल्टे वे शत्रुओं को युगान्त में उठने वाली प्रलयाग्नि-सी जान पड़े। उनका धनुष-बाण उस अग्नि की धधकती ज्वालाएँ थे, अस्त्रों की उड़ान उसकी वायु, रथ-चक्रों की गड़गड़ाहट उसकी ऊष्मा, और वीरों के शरीर उसका प्रचुर ईंधन।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): शतघ्नी एक प्राचीन अस्त्र है, जिसका नाम ही “सौ को मारने वाली” अर्थ देता है; इसे एक प्रकार का कीलोंवाला लम्बा यन्त्र या प्रक्षेपास्त्र माना जाता है। कम्पन भी एक विशेष फेंके जाने वाला शस्त्र है। महाभारत में मृत्यु के समीप भी भीष्म को प्रलयाग्नि की उपमा देना उनकी अदम्यता को दर्शाता है, कि वे गिरने से पहले तक एक योद्धा ही रहे।

भीष्म उन राजाओं के रथ-समूहों के बीच घूमते, कभी उस भीड़ से बाहर निकलते, और फिर उसी के मध्य से गुज़रते। पांचालराज और धृष्टकेतु की उपेक्षा करके वे पाण्डव-सेना के मध्य में घुस गए, और सात्यकि, भीम, अर्जुन, द्रुपद, विराट तथा धृष्टद्युम्न, इन छह योद्धाओं को हर प्रकार के कवच को भेदने वाले अत्यन्त तीखे बाणों से बेध डाला। उन महारथियों ने भी उन बाणों को रोककर, दस-दस बाणों से भीष्म पर बड़े बल से प्रहार किया। तब महारथी शिखण्डी के छोड़े हुए, पत्थर पर तीखे किए और स्वर्ण-पंखों वाले बाण शीघ्रता से भीष्म के शरीर में धँसते चले गए।

तब क्रोध से भरे किरीटधारी अर्जुन ने, शिखण्डी को आगे करके, भीष्म पर झपटकर उनका धनुष काट डाला। यह देखकर द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त, ये सात महारथी अर्जुन के इस कर्म को सह न सके, और क्रोध में भरकर दिव्य अस्त्रों का आह्वान करते हुए उन पर बाण-वर्षा करते टूट पड़े। उनके वेग से उठा कोलाहल युगान्त में उमड़ते समुद्र की गर्जना जैसा था, “मारो, ले आओ, पकड़ो, बेधो, काट डालो”, यही भयंकर शोर अर्जुन के रथ के चारों ओर सुनाई पड़ा। यह सुनकर सात्यकि, भीमसेन, धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव-महारथी अर्जुन की रक्षा के लिए आगे बढ़े।

उधर अर्जुन और शिखण्डी के बाणों से बिंधते हुए भी भीष्म पाण्डव-सेना को बेधते रहे, पर अब अर्जुन के बाण उनके मर्मों में निरन्तर धँसते जा रहे थे, और शिखण्डी की उपस्थिति उनके हाथ बाँधे रखती थी। उनका कवच चूर-चूर हो चुका था, और सारा शरीर बाणों से छिद गया था। सूर्य की उत्तरायण-यात्रा से कुछ ही पहले, सन्ध्या की बेला निकट थी, जब अनगिनत बाणों से बिंधे वह कुरु-पितामह, मानो कुरुवंश का सीमा-वृक्ष, अर्जुन की दिशा में अपने रथ से नीचे की ओर झुकते हुए गिर पड़े।
जब वे सदा-विजयी भीष्म रथ से गिरकर पृथ्वी की सतह की ओर आए, तब सम्पूर्ण प्राणियों में “हाय, हाय” का क्रन्दन फैल गया। पर उनका शरीर पृथ्वी से नहीं छुआ, क्योंकि उनके अंगों में धँसे असंख्य बाण ही उन्हें थामे रहे, और वे उसी बाण-शय्या पर लेट गए, धरती से ऊपर अधर में। उस समय आकाश अन्धकार से ढक गया, सूर्य का तेज मन्द पड़ गया, और पृथ्वी मानो ऊँचे स्वर में चीख उठी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “शर-शय्या” अर्थात बाणों की शय्या वह दृश्य है जिसके लिए महाभारत में भीष्म सर्वाधिक स्मरण किए जाते हैं। उनके शरीर में इतने बाण धँसे थे कि वे ही एक खाट बन गए, और भीष्म का शरीर पृथ्वी को न छूकर उन्हीं पर अधर में टिका रहा। यह उनकी पवित्रता और इच्छा-मृत्यु के वरदान का प्रतीक है, जिससे वे प्राण-त्याग का समय स्वयं चुन सके।
भीष्म के गिरते ही दोनों सेनाओं के क्षत्रियों के हृदय में भय भर गया। शान्तनुपुत्र की ध्वजा गिरी देखकर और कवच कटा देखकर, कौरव और पाण्डव, दोनों उदासी से भर उठे। ऋषि, सिद्ध और चारण आकाश में कहने लगे, “यह वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ है। इसी ने पहले अपने पिता शान्तनु को काम से पीड़ित जानकर अपने वंश-बीज को सोख लेने का व्रत लिया था।” यों उस पुरुषश्रेष्ठ की प्रशंसा होती रही, जब वे शर-शय्या पर लेटे थे।
भीष्म के मारे जाने पर आपके पुत्रों को कुछ न सूझा। उनके मुख शोक से भर गए, और सब लज्जा से सिर झुकाए खड़े रहे। दूसरी ओर पाण्डव, विजय पाकर, अपनी पंक्तियों के अग्रभाग पर खड़े हुए, और उन्होंने अपने स्वर्ण-मण्डित विशाल शंख बजाए। उसी समय भीमसेन को हमने अत्यन्त हर्ष से उछलते देखा। कौरवों पर एक महान मूर्च्छा-सी छा गई, और कर्ण तथा दुर्योधन बार-बार लम्बी साँसें भरने लगे। दुःशासन वेग से द्रोण के दल में गया और उन्हें भीष्म के गिरने का समाचार दिया। यह सुनकर द्रोण अपने रथ से गिर पड़े, फिर सँभलकर उन्होंने कुरु-सेना को युद्ध से रोक दिया। कुरुओं को रुका देख पाण्डवों ने भी दूत भेजकर युद्ध रुकवा दिया।
तकिया, और उत्तरायण की प्रतीक्षा
युद्ध रोककर, कवच उतारकर, दोनों ओर के सहस्रों योद्धा भीष्म के पास वैसे ही आए जैसे देवता प्रजापति के पास आते हों। शर-शय्या पर लेटे पितामह को प्रणाम करके पाण्डव और कौरव खड़े हो गए। तब धर्मात्मा शान्तनुपुत्र ने उनसे कहा, “स्वागत है आप सबका, हे महाभाग्यशालियो, हे महारथियो। आपको देखकर मैं प्रसन्न हूँ, आप तो साक्षात देवताओं के समान हैं।” फिर सिर झुकाए हुए उन्होंने कहा, “मेरा सिर बहुत नीचे लटक रहा है। मुझे एक तकिया दीजिए।”

राजाओं ने अनेक उत्तम, अत्यन्त कोमल और महीन वस्त्रों के तकिए लाकर रखे, पर पितामह ने उन्हें नहीं चाहा। उस नरश्रेष्ठ ने हँसकर कहा, “हे राजाओ, ये वीर की शय्या के योग्य नहीं हैं।” फिर महाबाहु अर्जुन की ओर देखकर बोले, “हे धनंजय, हे महाबाहो, मेरा सिर लटक रहा है। मुझे ऐसा तकिया दीजिए जैसा आप उचित समझें।”
तब अर्जुन ने आँखों में आँसू भरकर, धनुष चढ़ाकर, पितामह को प्रणाम करके कहा, “हे कुरुश्रेष्ठ, हे सब शस्त्रधारियों में प्रथम, आज्ञा दीजिए, मैं आपका दास हूँ। मैं क्या करूँ, हे पितामह?” भीष्म ने कहा, “हे पार्थ, मेरा सिर लटक रहा है। बिना देर किए मुझे ऐसा तकिया दीजिए जो वीर की शय्या के योग्य हो। आप धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं, क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता हैं।” तब अर्जुन ने ‘जो आज्ञा’ कहकर गाण्डीव और कुछ सीधे बाण लेकर, उन्हें मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके, और पितामह की अनुमति लेकर, तीन तीखे बाणों से भीष्म के सिर को नीचे से थाम दिया।

अपने मन का भाव ताड़कर अर्जुन ने यह कार्य किया, यह देखकर धर्म के मर्मज्ञ भीष्म अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन की प्रशंसा की और सब भरतवंशियों पर दृष्टि डालकर कहा, “हे पाण्डुपुत्र, आपने मुझे मेरी शय्या के योग्य तकिया दिया। यदि आप कुछ और करते, तो मैं क्रोध से आपको शाप दे देता। क्षत्रिय को रणभूमि में अपनी बाण-शय्या पर ऐसे ही सोना चाहिए।” फिर सब राजाओं से बोले, “देखिए, पाण्डुपुत्र ने मुझे जो तकिया दिया है। मैं इस शय्या पर तब तक सोऊँगा जब तक सूर्य उत्तरायण की ओर न मुड़ जाए। जब सूर्य अपने सात अश्वों वाले रथ पर कुबेर की दिशा की ओर बढ़ेगा, तब मैं प्रिय मित्र को विदा देते प्रिय मित्र की भाँति अपने प्राण त्याग दूँगा। हे राजाओ, मेरे चारों ओर एक खाई खुदवा दीजिए। सैकड़ों बाणों से बिंधा हुआ मैं सूर्य की आराधना करूँगा। और आप वैर त्यागकर युद्ध से विरत हो जाइए।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): उत्तरायण वह काल है जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर मुड़ता है (लगभग मकर संक्रान्ति से)। इसे शुभ और देवताओं का दिन माना जाता है, और इसी काल में देह त्यागने वाले को उत्तम गति प्राप्त मानी जाती थी। भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने प्राण रोककर उत्तरायण की प्रतीक्षा करने का निश्चय किया। “कुबेर की दिशा” से उत्तर दिशा का अभिप्राय है।

तब अस्त्र-चिकित्सा में कुशल कुछ शल्य-वैद्य अपने उपकरणों सहित बाण निकालने आए। उन्हें देखकर गंगापुत्र ने दुर्योधन से कहा, “इन वैद्यों को उचित आदर देकर, धन देकर विदा कर दीजिए। इस अवस्था में मुझे अब वैद्यों की क्या आवश्यकता? मैंने क्षत्रिय-धर्म की परम और उत्तम गति पा ली है। बाण-शय्या पर पड़े मुझ जैसे के लिए अब चिकित्सा कराना उचित नहीं। इन्हीं बाणों के साथ मेरा दाह-संस्कार हो।” यह सुनकर दुर्योधन ने उन वैद्यों को सत्कारपूर्वक विदा कर दिया, और भीष्म की धर्म-निष्ठा देखकर सब राजा विस्मय से भर उठे।
इस प्रकार पितामह को तकिया देकर, उन्हें प्रणाम करके और तीन बार प्रदक्षिणा करके, उनकी रक्षा के लिए चारों ओर पहरेदार बिठाकर, रक्त से सने शरीर वाले वे वीर, मन में शोक लिए, सन्ध्या समय अपने-अपने शिविरों को लौटे। तब उचित समय पर माधव कृष्ण ने युधिष्ठिर के पास आकर कहा, “हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से आपकी विजय हुई। सौभाग्य से वह भीष्म गिरा, जो मनुष्यों के लिए अवध्य था।” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “आपकी कृपा से विजय है, आपके क्रोध से पराजय। आप ही हमारे शरणदाता हैं। जिनकी रक्षा आप सदा करते हैं, उनकी विजय कोई आश्चर्य नहीं।” यह सुनकर जनार्दन ने मुस्कराकर कहा, “हे राजाओं में श्रेष्ठ, ऐसे वचन आप ही से निकल सकते हैं।”
सार: भीष्म ने तकिए के रूप में कोमल वस्त्र अस्वीकार किए, और अर्जुन ने तीन बाणों से उनका सिर थामकर वीर-शय्या के योग्य तकिया दिया। पितामह ने वैद्यों को विदा कर दिया, और उत्तरायण आने तक प्राण रोककर सूर्य की आराधना करते हुए शर-शय्या पर लेटे रहने का संकल्प किया। दस दिनों के महासंग्राम का सेनापति अब युद्ध से ऊपर उठकर, इच्छा-मृत्यु की प्रतीक्षा में, दोनों कुलों का साझा शोक बन गया।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), भीष्म पर्व, भीष्मवध उपपर्व। यह भाग के. एम. गांगुली, खण्ड XLIII-CXXII (43-122) के क्रम में आता है; गीता प्रेस हिन्दी संस्करण की अध्याय-संख्या इससे भिन्न है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से हुई है। यह भावपूर्ण पुनर्कथन है, शब्दशः अनुवाद नहीं। स्रोतों के बारे में।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)