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शल्य की इन्द्र-कथा: त्वष्टा के तीन सिर वाले पुत्र का वध और वृत्र के मुख में फँसे देवराज
युधिष्ठिर ने शल्य से पूछा, “हे राजश्रेष्ठ, हम जानना चाहते हैं कि यशस्वी इन्द्र और उनकी रानी को ऐसा अद्वितीय दुःख कैसे सहना पड़ा।” शल्य ने कहा, “हे भरतवंशी राजन्, प्राचीन काल की यह कथा सुनिए। एक समय प्रजापति त्वष्टा कठोर तप कर रहे थे। कहा जाता है कि इन्द्र के प्रति विरोध के कारण उन्होंने तीन सिर वाले एक पुत्र को उत्पन्न किया। वह अत्यन्त तेजस्वी, विश्वरूपधारी था और इन्द्र के पद की इच्छा रखता था। उसके तीन मुख सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान थे। एक मुख से वह वेद पढ़ता, दूसरे से मदिरा पीता और तीसरे से दिशाओं को इस प्रकार देखता मानो उन्हें अपने भीतर खींच लेगा। उसका स्वभाव मृदु था, इन्द्रियाँ वश में थीं और वह धर्माचरण तथा अत्यन्त कठोर तप में लगा रहता था। उसकी तपस्या, साहस और सत्यनिष्ठा देखकर इन्द्र को अपने पद की चिन्ता हुई। वे सोचने लगे कि उसे विषयभोगों में कैसे लगाया जाए, इस कठोर तप से कैसे हटाया जाए। यदि तीन सिर वाला वह तपस्वी और शक्तिशाली हो गया, तो सारे जगत को अपने में समा लेगा।” शल्य ने बताया कि इसी भय में इन्द्र ने अप्सराओं को बुलाया और त्वष्टा के पुत्र को मोहित करने का आदेश दिया। उनसे कहा कि वे मोहक वस्त्र और मनोहर हार पहनें, अपने आकर्षक रूप तथा प्रेम की चेष्टाओं से उसे विषयसुख की ओर ले जाएँ। “शीघ्र जाइए,” इन्द्र ने कहा। “हमारा हृदय अशान्त है। हमारे ऊपर आए इस संकट को दूर कीजिए। आपका कल्याण हो।”
अप्सराओं ने आश्वासन दिया कि वे उस तपस्वी को मोहित करने का पूरा प्रयत्न करेंगी और इन्द्र का भय दूर करेंगी। उन्होंने कहा कि जिसकी दृष्टि मानो सबको जला रही है, उसी तपोनिधि को वश में करने वे सब साथ जाएँगी। वे साथ-साथ उसके पास गईं और अपने रूप तथा अनेक प्रेमपूर्ण चेष्टाओं से उसका मन खींचने लगीं। तपस्वी ने उन्हें देखा, पर इच्छा से विचलित नहीं हुआ। इन्द्रियों को वश में किए हुए वह अपनी गम्भीरता में भरे हुए समुद्र के समान स्थिर रहा। अप्सराओं ने यत्न में कमी न की, फिर भी उसे तप से हटा न सकीं। लौटकर हाथ जोड़ते हुए उन्होंने इन्द्र से कहा, “वह दुर्धर्ष पुरुष हमारे प्रयत्नों से विचलित नहीं हो सकता। अब आपको जो उचित लगे, कीजिए।” इन्द्र ने उनका सम्मान करके विदा दी और दूसरे उपाय पर विचार करने लगे। उन्होंने निश्चय किया कि उसी दिन वज्र फेंककर उसे मार देंगे। बलवान् व्यक्ति को भी बढ़ते हुए शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, चाहे वह अभी तुच्छ ही क्यों न लगता हो, ऐसा विचार करके वे वध के लिए दृढ़ हो गए। क्रुद्ध होकर उन्होंने अग्नि के समान भयंकर वज्र तीन सिर वाले तपस्वी पर फेंका। वज्र के प्रहार से वह मारा गया और पर्वत के टूटे हुए शिखर की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा। पर उसका तेज बुझा नहीं। पर्वत के समान विशाल वह मृत देह भी ज्वलन्त लग रहा था। भूमि पर पड़े उसके सिर ऐसे दिखाई देते थे मानो उनमें अब भी जीवन हो। उसे देखकर इन्द्र को शान्ति न मिली। मृतक का तेज उन्हें जला रहा हो, ऐसी व्याकुलता में वे विचार करते खड़े रहे।
उसी समय कन्धे पर कुल्हाड़ी रखे एक बढ़ई उस वन में आया और वहाँ पहुँच गया। भयभीत इन्द्र ने उससे कहा, “हमारा यह काम कीजिए। इसके सिर शीघ्र काट दीजिए।” बढ़ई ने चौड़े कन्धों की ओर देखकर कहा कि उसकी कुल्हाड़ी उन्हें नहीं काट सकेगी। फिर उसने धर्मात्माओं द्वारा निन्दित ऐसा काम करने से भी इनकार किया। इन्द्र ने कहा, “डरिए नहीं। हमारे कहने से आपकी कुल्हाड़ी वज्र के समान हो जाएगी।” बढ़ई ने पूछा, “आज यह भयानक कर्म करने वाले आप कौन हैं? हम आपका ठीक परिचय जानना चाहते हैं। सत्य बताइए।” इन्द्र ने अपना नाम और देवताओं का स्वामी होना बताया, फिर उसे संकोच छोड़कर सिर काटने को कहा। बढ़ई का प्रश्न और कठोर हो गया। “हे इन्द्र, अपने इस अमानवीय कर्म पर आपको लज्जा क्यों नहीं आती? ऋषि के पुत्र को मारकर ब्रह्महत्या के पाप का भय आपको कैसे नहीं होता?” इन्द्र ने उत्तर दिया, “इस दोष से शुद्ध होने के लिए बाद में कोई कठोर धार्मिक अनुष्ठान करेंगे। यह हमारा शक्तिशाली शत्रु था, जिसे हमने वज्र से मारा है। बढ़ई, हमें अब भी शान्ति नहीं मिली; अब भी इससे भय लगता है। इसके सिर शीघ्र काट दीजिए। हम आप पर अनुग्रह करेंगे। यज्ञों में लोग बलिपशु का सिर आपके भाग में दिया करेंगे। यही वर हम आपको देते हैं। हमारी इच्छा शीघ्र पूरी कीजिए।” यह सुनकर बढ़ई ने कुल्हाड़ी से तीनों सिर अलग कर दिए। उन सिरों से पक्षी निकले। जिस मुख से वेदपाठ होता और सोमरस पिया जाता था, उससे तीतर निकले। जो मुख दिशाओं को निगल लेने जैसी दृष्टि से देखता था, उससे बटेर निकले। मदिरा पीने वाले मुख से गौरैया और बाज निकले। सिर कट जाने पर इन्द्र की घबराहट दूर हुई। वे प्रसन्न होकर स्वर्ग चले गए, बढ़ई अपने घर लौट गया और इन्द्र ने समझा कि शत्रु का अन्त करके उनका प्रयोजन सिद्ध हो गया।
त्वष्टा को पुत्र के वध का समाचार मिला तो क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गईं। उन्होंने कहा, “इन्द्र ने हमारे उस पुत्र को मार दिया जिसने कोई अपराध नहीं किया था। वह निरन्तर तप करता था, दयालु था और उसकी इन्द्रियाँ तथा इच्छाएँ वश में थीं। इसलिए इन्द्र का विनाश करने के लिए हम वृत्र उत्पन्न करेंगे। लोक हमारा बल और तप की सामर्थ्य देखें। देवताओं का वह अमानवीय, दुष्टचित्त स्वामी भी उसे देखे।” क्रुद्ध तपस्वी ने जल से आचमन किया, अग्नि में आहुतियाँ दीं और भयंकर वृत्र को उत्पन्न किया। उससे कहा, “इन्द्र का वध करने के लिए जन्मे वीर, हमारे तप के बल से बढ़िए।” वृत्र आकाश की ओर ऊँचा उठता गया। उसका तेज अग्निपुत्र जैसा था। प्रलयकालीन सूर्य की तरह उदित होकर उसने पूछा कि उसे क्या करना है। त्वष्टा ने उत्तर दिया, “इन्द्र का वध कीजिए।” वृत्र देवलोक की ओर चल पड़ा। फिर उसका और इन्द्र का घोर युद्ध हुआ। दोनों क्रोध से भरे थे। वीर वृत्र ने सौ यज्ञ करने वाले देवराज को पकड़ लिया, उन्हें घुमाया और अपने मुख में डाल लिया। इन्द्र निगल लिए गए तो बड़े देवता भी भयभीत हो उठे। उन्होंने वृत्र को मारने के लिए जृम्भिका उत्पन्न की। वृत्र को जँभाई आई और उसका मुख खुला। तभी इन्द्र ने अपने अंग सिकोड़े और उसके मुख से बाहर निकल आए। शल्य कहते हैं कि उसी समय से तीनों लोकों के प्राणियों की श्वास के साथ जँभाई जुड़ गई। इन्द्र के निकल आने पर देवताओं को हर्ष हुआ।

दोनों का युद्ध फिर आरम्भ हुआ और बहुत देर तक चलता रहा। त्वष्टा का प्रबल तपोबल वृत्र में था; उसका अपना बल भी कम न था। अन्ततः वृत्र भारी पड़ने लगा और इन्द्र को पीछे हटना पड़ा। देवराज के लौटने से देवता अत्यन्त दुःखी हुए। त्वष्टा की सामर्थ्य के सामने इन्द्र सहित वे सब अभिभूत थे। ऋषियों के साथ मिलकर उन्होंने विचार किया कि अब क्या करना चाहिए। भय से घिरे हुए वे मन्दर पर्वत के शिखर पर बैठे। वृत्र का वध कैसे हो, इस चिन्ता में उनका ध्यान अविनाशी विष्णु की ओर गया। शल्य की कथा वहाँ तक पहुँच गई थी जहाँ अपने पद की रक्षा के लिए किया गया इन्द्र का प्रहार उन्हें एक और बड़े संकट में डाल चुका था। जिस पुत्र के तेज से वे भयभीत थे, उसके पिता के तप से उत्पन्न वृत्र ने उन्हें निगल लिया था, और उससे बचकर निकल आने के बाद भी देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। अब वे एकत्र होकर सहायता का उपाय सोच रहे थे।
समझने की कुंजी (इन्द्र का भय): त्वष्टा के पुत्र की इन्द्रपद पाने की इच्छा और उसका कठोर तप इन्द्र को अपने राज्य के लिए संकट लगते हैं। उसके वध के बाद भी उनका भय बना रहता है। पुत्र को निरपराध मानने वाले त्वष्टा उसी वध का प्रतिशोध लेने के लिए वृत्र को उत्पन्न करते हैं।
सार: अपने पद के भय से इन्द्र त्वष्टा के तपस्वी पुत्र को मारते हैं और बढ़ई से उसके तीन सिर कटवाते हैं। त्वष्टा प्रतिशोध में वृत्र उत्पन्न करते हैं। वृत्र इन्द्र को निगल लेता है; देवताओं के उपाय से वे निकल आते हैं, पर अगले युद्ध में पीछे हटते हैं। भयभीत देवता और ऋषि विष्णु की सहायता का विचार करते हैं।
वृत्र की सन्धि और समुद्र का फेन: विजय के बाद अपराध-बोध में छिप जाते हैं इन्द्र
मन्दर पर्वत पर इन्द्र ने देवताओं से कहा, “वृत्र ने इस सारे जगत को अपनी शक्ति से घेर लिया है। उसके सामने खड़ा होने योग्य कोई दिखाई नहीं देता। पहले हम समर्थ थे, अब नहीं हैं। क्या करें? हमें तो वह दुर्जेय लगता है। युद्ध में उसका बल अपरिमित है; देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोकों को निगल सकता है। हमारा निश्चय सुनिए। हम सब विष्णु के निवास पर चलें और उनके साथ विचार करें कि इस निर्दय शत्रु का वध किस प्रकार हो।” शल्य ने बताया कि इन्द्र के साथ देवता और ऋषि विष्णु की शरण में पहुँचे। वृत्र के भय से पीड़ित होकर उन्होंने विष्णु के पूर्व पराक्रमों का स्मरण कराया: तीन पगों से तीनों लोकों को ढकना, अमृत प्राप्त कराना, युद्ध में असुरों का संहार करना, बलि को बाँधना और इन्द्र को स्वर्ग के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करना। उन्होंने कहा, “आप देवताओं के स्वामी हैं, सारा जगत आपसे व्याप्त है। इन्द्र सहित हम सभी देवताओं के आश्रय बनिए। वृत्र की शक्ति सारे विश्व में फैल गई है।” विष्णु ने उत्तर दिया कि उनका हित करना उनका कर्तव्य है और वे वृत्र के अन्त का एक उपाय बताएँगे। “ऋषियों और गन्धर्वों को साथ लेकर वृत्र के पास जाइए। उसके साथ सन्धि का व्यवहार कीजिए। इसी उपाय से उसे परास्त कर सकेंगे। हमारे बल से विजय इन्द्र को मिलेगी। हम अदृश्य रहकर उनके श्रेष्ठ अस्त्र वज्र में प्रवेश करेंगे। ऋषियों और गन्धर्वों सहित जाइए और इन्द्र तथा वृत्र के बीच सन्धि कराने में विलम्ब मत कीजिए।”
देवता और ऋषि इन्द्र को आगे करके चले। उन्होंने वृत्र को देखा, जो अपने तेज से दसों दिशाओं को जलाता हुआ और तीनों लोकों को अपने में समेटता हुआ-सा लगता था। उसकी दीप्ति सूर्य अथवा चन्द्र के समान थी। ऋषि उसके पास गए और शान्ति के वचन कहे। “आपकी शक्ति से सारा जगत व्याप्त है। फिर भी आप इन्द्र को परास्त नहीं कर पा रहे। युद्ध आरम्भ हुए बहुत समय हो गया है। देवता, असुर, मनुष्य और दूसरे सभी प्राणी इस संघर्ष से पीड़ित हैं। आपके और इन्द्र के बीच सदा के लिए मित्रता हो जाए। आप सुखी होंगे और इन्द्र के लोक में निरन्तर निवास करेंगे।” वृत्र ने सिर झुकाकर ऋषियों का सम्मान किया और कहा कि उसने उनके तथा गन्धर्वों के वचन सुने हैं। फिर अपनी शंका रखी, “हम और इन्द्र, दोनों परस्पर शत्रु हैं। हमारे बीच सन्धि और मित्रता कैसे हो सकती है?” ऋषियों ने कहा कि सज्जनों के बीच एक बार मिलने से भी मित्रता हो जाती है; ऐसा अवसर छोड़ना नहीं चाहिए। आगे जो दैव ने निश्चित किया है, वह होगा, पर धर्मात्मा का साथ उत्तम धन के समान है। बुद्धिमान् मित्र आवश्यकता पड़ने पर उचित सलाह देता है और उसका सम्बन्ध बहुत उपयोगी होता है। इसलिए धर्मात्मा को मारने की इच्छा उचित नहीं। उन्होंने इन्द्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे सज्जनों से सम्मानित, उदार लोगों के आश्रय, सत्यवादी, निर्दोष, धर्मज्ञ और परिष्कृत बुद्धि वाले हैं। “उनसे स्थायी मित्रता कीजिए। विश्वास रखिए और मन में दूसरा भाव मत आने दीजिए।”
वृत्र ने कहा कि सिद्धिशाली ऋषि उसके लिए सम्माननीय हैं। वे उसकी पूरी बात मान लें तो वह उनका कहा सब स्वीकार करेगा। उसने अपनी शर्तें रखीं: इन्द्र अथवा देवता उसे न सूखी वस्तु से मारें, न गीली से; न पत्थर से, न लकड़ी से; न पास से चलाए जाने वाले अस्त्र से, न दूर फेंके जाने वाले अस्त्र से; न दिन में, न रात में। इन शर्तों पर इन्द्र के साथ स्थायी सन्धि उसे स्वीकार थी। ऋषियों ने कहा, “बहुत अच्छा।” सन्धि हो गई और वृत्र बहुत प्रसन्न हुआ। इन्द्र भी प्रसन्न हुए, पर उनका मन निरन्तर वृत्र के वध का उपाय ढूँढ़ता रहा। वे सन्धि की शर्तों में कोई छिद्र खोजते हुए अशान्त रहते थे। एक दिन भयावह सन्ध्याकाल में उन्होंने समुद्रतट पर वृत्र को देखा। उन्हें वर की शर्तें स्मरण हुईं। उन्होंने सोचा कि यह समय दिन भी नहीं है और रात भी नहीं; उनका सब कुछ छीन लेने वाले उस विशाल शत्रु का वध अवश्य करना चाहिए। छल से भी उसे न मारेंगे तो उनका कल्याण न होगा। विष्णु का स्मरण करते हुए उनकी दृष्टि समुद्र में पर्वत जितने बड़े फेन के ढेर पर पड़ी। उन्होंने विचार किया, “यह न सूखा है, न गीला, और अस्त्र भी नहीं है। इसे वृत्र पर फेंकें तो वह अवश्य मर जाएगा।” इन्द्र ने वज्र से संयुक्त वह फेन वृत्र पर फेंका। विष्णु उस फेन में प्रवेश कर गए और वृत्र का जीवन समाप्त हो गया।
वृत्र के मरते ही दिशाओं का अन्धकार दूर हुआ, सुखद वायु चली और सभी प्राणी प्रसन्न हुए। देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, महानाग और ऋषि इन्द्र की स्तुति करने लगे। सबके अभिवादन के उत्तर में इन्द्र ने उन्हें आश्वासन के वचन कहे। शत्रु का वध हो जाने से उनका और देवताओं का मन आनन्दित था। धर्म का ज्ञान रखने वाले इन्द्र ने विष्णु की पूजा की। पर विजय के बाद मिथ्या व्यवहार का दोष उन पर छा गया और वे अत्यन्त दुःखी हुए। त्वष्टा के तीन सिर वाले पुत्र को मारने की ब्रह्महत्या का पाप भी उन्हें पीड़ित कर रहा था। अपने अपराधों से अभिभूत होकर वे लोकों के अन्त की ओर चले गए। उनकी चेतना और सुधि जाती रही; वे ऐसे हो गए कि पहचाने नहीं जाते थे। छटपटाते सर्प की भाँति जल में छिपकर पड़े रहे। ब्रह्महत्या का भय उन्हें दबाए हुए था। जिस देवराज की विजय पर सभी ने हर्ष मनाया था, वे अब देवताओं की दृष्टि से ओझल थे।
इन्द्र के अदृश्य हो जाने पर पृथ्वी उजड़ी हुई-सी लगने लगी। वृक्ष नष्ट होने लगे, वन सूख गए, नदियों की धारा रुक गई और जलाशय जलहीन हो गए। वर्षा बन्द होने से पशु कष्ट पाने लगे। देवता और महर्षि अत्यन्त भयभीत थे। जगत का राजा दिखाई नहीं देता था और विपत्तियाँ फैल रही थीं। स्वर्ग में देवताओं और देवर्षियों ने चिन्ता की कि अब उनका राजा कौन होगा। कोई भी देवताओं का राज्य सँभालने की इच्छा नहीं करता था। शल्य की कथा में वृत्र का वध हो चुका था, पर इन्द्र और उनकी पत्नी पर आने वाले दुःख का क्रम अभी पूरा नहीं हुआ था। देवताओं के सामने अब रिक्त सिंहासन और पीड़ित संसार का प्रश्न था।
समझने की कुंजी (दो अपराधों का भार): इस प्रसंग में इन्द्र को वृत्र से हुई सन्धि के बाद छल करने का दोष और त्वष्टा के तीन सिर वाले पुत्र के वध की ब्रह्महत्या, दोनों पीड़ित करते हैं। ऋषियों द्वारा इन्द्र को सत्यवादी कहना उनके सन्धि-प्रस्ताव का अंश है। इन्द्र फिर भी उस सन्धि में छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, जिसके लिए ऋषियों ने वृत्र को विश्वास दिलाया था।
सार: विष्णु के परामर्श से इन्द्र और वृत्र के बीच शर्तों वाली सन्धि होती है। इन्द्र सन्ध्याकाल और समुद्र के फेन को उन शर्तों से बाहर मानकर प्रहार करते हैं; विष्णु की शक्ति से वृत्र मर जाता है। विजय के बाद छल और ब्रह्महत्या के दोष से पीड़ित इन्द्र जल में छिप जाते हैं। वर्षा रुकती है और देवता नए राजा की चिन्ता में पड़ते हैं।
नहुष को स्वर्ग का राज्य मिलता है: शची बृहस्पति की शरण में जाती हैं
शल्य ने युधिष्ठिर से कहा कि इन्द्र के चले जाने पर ऋषियों और श्रेष्ठ देवताओं ने नहुष को स्वर्ग का राजा बनाने का निश्चय किया। वे सुन्दर, बलवान्, यशस्वी और सदा धर्म में तत्पर थे। देवता, ऋषि और प्रजापति उनके पास पहुँचे और कहा, “हे पृथ्वीपति, आप हमारे राजा होइए।” नहुष ने अपना हित विचारकर उत्तर दिया, “हम दुर्बल हैं, आपकी रक्षा नहीं कर सकेंगे। आपका राजा तो बलवान् होना चाहिए। इन्द्र सदा बल से सम्पन्न रहे हैं।” ऋषियों सहित देवताओं ने कहा कि अपने तप के प्रभाव से वे उन्हें सामर्थ्य देंगे। सबको कोई न कोई भय लगा हुआ था और स्वर्ग को राजा चाहिए था। उन्होंने वर दिया कि नहुष की दृष्टि के सामने जो भी आएगा, चाहे देवता हो, असुर, यक्ष, ऋषि, पितर अथवा गन्धर्व, उसका तेज उनमें समा जाएगा और उनका बल बढ़ेगा। “धर्म को सबसे आगे रखकर लोकों का शासन कीजिए। स्वर्ग के देवताओं और ब्रह्मर्षियों की रक्षा कीजिए।” नहुष का अभिषेक हुआ। आरम्भ में उन्होंने धर्म को प्रधानता दी और समस्त लोकों का राज्य सँभाला। पर स्वर्ग का राज्य और ऐसा दुर्लभ वर प्राप्त होने पर उनका मन भोगों की ओर मुड़ गया। अप्सराएँ और दिव्य कन्याएँ उनके चारों ओर रहने लगीं। वे नन्दनवन, कैलास, हिमवान् के शिखर, मन्दर, श्वेत पर्वत, सह्य, महेन्द्र और मलय पर, समुद्रों तथा नदियों के तटों पर तरह-तरह के सुख भोगने लगे। कान और मन को बाँध लेने वाली दिव्य कथाएँ सुनते, अनेक वाद्यों की ध्वनि और मधुर गायन का आनन्द लेते। विश्वावसु, नारद, अप्सराओं के समूह, गन्धर्वों के दल और साक्षात् रूप धारण किए हुए 6 ऋतुएँ उनकी सेवा में उपस्थित रहतीं। सुगन्धित, शीतल और सुख देने वाली वायु उनके चारों ओर चलती थी।
एक दिन इस प्रकार सुख भोगते हुए नहुष की दृष्टि इन्द्र की प्रिय रानी शची पर पड़ी। उन्होंने सभासदों से कहा, “इन्द्र की रानी हमारी सेवा में क्यों नहीं आतीं? हम देवताओं के राजा और समस्त लोकों के अधिपति हैं। शची शीघ्र हमारे भवन में आएँ।” यह सुनकर शची दुःखी हुईं और बृहस्पति के पास गईं। “हे ब्राह्मण, इस नहुष से हमारी रक्षा कीजिए। हम आपकी शरण में आई हैं। आप सदा कहते आए हैं कि हमारे शरीर पर शुभ लक्षण हैं, हम देवराज की प्रिय, पतिव्रता और पति में अनुरक्त हैं तथा कभी विधवा नहीं होंगी। अपने उन वचनों को सत्य कीजिए। आपकी कही बात कभी व्यर्थ नहीं हुई। आपने हमारे विषय में जो कहा है, वह भी सत्य होना चाहिए।” भय से व्याकुल शची को बृहस्पति ने आश्वासन दिया कि उनके वचन अवश्य सत्य होंगे। वे शीघ्र ही इन्द्र को फिर देखेंगी; देवराज लौट आएँगे। “हम सत्य कहते हैं, आपको नहुष से कोई भय नहीं है। हम शीघ्र आपका इन्द्र से मिलन कराएँगे।” उधर नहुष को ज्ञात हुआ कि शची अंगिरा के पुत्र बृहस्पति की शरण में चली गई हैं। यह समाचार पाते ही वे अत्यन्त क्रुद्ध हुए। ऋषियों को साथ लेकर देवताओं ने उन्हें समझाया, “हे देवराज, क्रोध छोड़िए। आपके क्रुद्ध होने पर असुरों, गन्धर्वों, किन्नरों और महानागों सहित सारा जगत काँप उठता है। आप जैसे धर्मात्मा अपने को इस प्रकार अशान्त नहीं करते। वे दूसरे की पत्नी हैं। परस्त्री का अपमान करने के पाप से मन हटाइए और धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा कीजिए।”
कामना से विवेक खो चुके नहुष ने उनकी बात नहीं मानी। उन्होंने इन्द्र का उदाहरण देकर उत्तर दिया, “ऋषि की निष्कलंक पत्नी अहल्या के साथ इन्द्र ने उनके पति के जीवित रहते मर्यादा भंग की थी। तब आपने उन्हें क्यों नहीं रोका? पहले भी इन्द्र ने अनेक निर्दय, अधर्मपूर्ण और छल के कर्म किए हैं। तब उन्हें क्यों नहीं रोका गया? शची हमारी इच्छा पूरी करें। इसी में उनका स्थायी हित है और आप देवताओं की भी सुरक्षा है।” देवताओं ने कहा कि वे उनकी आज्ञा के अनुसार शची को ले आएँगे; वे क्रोध त्यागकर शान्त हों। फिर वे ऋषियों सहित बृहस्पति और शची के पास पहुँचे। बृहस्पति से बोले, “हम जानते हैं कि देवरानी आपके यहाँ आश्रय माँगने आई हैं और आपने उन्हें रक्षा का वचन दिया है। फिर भी हम देवता, गन्धर्व और ऋषि आपसे प्रार्थना करते हैं कि उन्हें नहुष को सौंप दीजिए। महान् तेज वाले नहुष इन्द्र से भी श्रेष्ठ हैं। सुन्दर रूप और वर्ण वाली ये देवी उन्हीं को पति स्वीकार करें।” शची की आँखों से आँसू बहने लगे। वे सिसककर विलाप करती हुई बृहस्पति से बोलीं, “हम नहुष को पति नहीं बनाना चाहतीं। हम आपकी शरण में आई हैं। इस महान् संकट से हमें बचाइए।” बृहस्पति अपने निश्चय पर अडिग रहे। उन्होंने कहा कि आश्रय माँगने वाले का वे त्याग नहीं करेंगे। शची धर्मनिष्ठ और सत्यपरायण हैं। स्वयं वे धर्म जानने वाले ब्राह्मण हैं, सत्य का आदर करते हैं और धर्म के विधान से परिचित हैं; ऐसा अनुचित कर्म कभी नहीं करेंगे। उन्होंने देवताओं से लौट जाने को कहा और इस विषय में ब्रह्मा का पुराना उपदेश सुनाया।
बृहस्पति ने कहा, “जो भयभीत होकर रक्षा माँगने वाले को उसके शत्रु के हाथ दे देता है, उसे अपने संकट में रक्षा नहीं मिलती। बोने के समय उसका बीज नहीं उगता और वर्षाकाल में उसके लिए वर्षा नहीं होती। उसके आरम्भ किए हुए कार्य सफल नहीं होते। वह विवेकहीन होकर, अपनी शक्ति खोकर स्वर्ग से गिरता है। देवता उसकी दी हुई आहुति स्वीकार नहीं करते। उसकी सन्तान असमय मरती है और उसके पितर आपस में कलह करते रहते हैं। इन्द्र सहित देवता उस पर वज्र का प्रहार करते हैं। यह जान लीजिए, हम इन्द्र की प्रिय रानी के रूप में विख्यात इन शची को नहीं सौंपेंगे। जिसमें इनका और हमारा हित हो, आप वही उपाय कीजिए। शची को हम कदापि नहीं देंगे।” देवता और गन्धर्व अब अपने गुरु से नीति के अनुकूल कोई उपाय सोचने का आग्रह करने लगे। बृहस्पति ने कहा कि शची नहुष से उनके प्रस्ताव पर विचार करने के लिए कुछ समय माँग लें। इससे शची का भी हित होगा और देवताओं का भी। समय बीतने पर अनेक बाधाएँ उठ सकती हैं; समय आगे नए अवसर भी लाता है। नहुष मिले हुए वर के कारण बलवान् और अभिमानी हो गए हैं। देवता प्रसन्न हुए। उन्हें यह उपाय सबके हित का लगा, पर शची को इसके लिए राजी करना आवश्यक था। अग्नि को आगे करके उन्होंने शची से शान्त स्वर में कहा, “आप समस्त चराचर जगत को सँभाल रही हैं। आप पतिव्रता और सत्यनिष्ठ हैं। नहुष के पास जाइए। आपके लिए कामना से व्याकुल वह दुराचारी शीघ्र पतित होगा और इन्द्र को फिर देवताओं का राज्य मिलेगा।” मन्त्रणा का निष्कर्ष समझकर शची अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए नहुष के पास गईं। उनके मन में संकोच था। भयावह रूप वाले नहुष ने उनकी युवावस्था और सुन्दरता देखी तो अत्यन्त प्रसन्न हुए। शची जिस समय की माँग करने आई थीं, उसी में उनकी रक्षा की आशा रखी गई थी।
समझने की कुंजी (शरण की मर्यादा): बृहस्पति के लिए रक्षा का दिया हुआ वचन देवताओं के दबाव में भी बाध्यकारी है। वे शची की इच्छा के विरुद्ध उन्हें सौंपने से इनकार करते हैं। समय माँगने का उपाय इसी वचन को निभाते हुए संकट से निकलने के लिए सुझाया जाता है।
सार: देवता नहुष को स्वर्ग का राजा बनाकर दूसरों का तेज ग्रहण करने का वर देते हैं। भोगों में डूबे नहुष शची को चाहते हैं। शची बृहस्पति की शरण लेती हैं; वे देवताओं के आग्रह पर भी उन्हें सौंपने से मना कर देते हैं। अन्त में शची को समय माँगने के लिए नहुष के पास भेजा जाता है।
शची समय माँगती हैं: कमल के तन्तुओं में छिपे इन्द्र की खोज
नहुष ने शची को देखकर कहा, “हे मधुर मुसकान वाली देवी, अब हम तीनों लोकों के इन्द्र हैं। आप हमें अपना पति स्वीकार कीजिए।” वे उनके रूप और सुन्दर अंगों की प्रशंसा कर रहे थे। शची भय से ऐसे काँप रही थीं जैसे वायु के झोंकों में केले का तना काँपता है। उन्होंने ब्रह्मा को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर नहुष से बोलीं, “हे देवराज, हमें कुछ समय चाहिए। इन्द्र कहाँ हैं, उनकी क्या दशा हुई है, यह ज्ञात नहीं। पहले उनके विषय में सत्य का पता लगा लें। यदि उनका कोई समाचार नहीं मिलेगा तो आपके पास आएँगी। यह हम सत्य कहती हैं।” नहुष इस उत्तर से प्रसन्न हुए। उन्होंने समय दे दिया और कहा कि समाचार का पता लगाकर वे आएँ; अपने सत्य वचन को स्मरण रखें। उनकी अनुमति पाकर शची वहाँ से निकलीं और बृहस्पति के निवास पर लौट आईं। अग्नि के नेतृत्व में देवताओं ने उनकी बात सुनी और इन्द्र के हित का उपाय विचारने लगे। वे सब विष्णु के पास पहुँचे। चिन्तित देवताओं ने कहा, “इन्द्र ब्रह्महत्या के पाप से दब गए हैं। आप आदिपुरुष, जगत के स्वामी और हमारे आश्रय हैं। आपने प्राणियों की रक्षा के लिए विष्णु का रूप धारण किया है। आपके तेज से वृत्र का वध होने पर इन्द्र ब्रह्महत्या के पाप से अभिभूत हुए। उन्हें मुक्त करने का उपाय बताइए।” विष्णु ने उत्तर दिया कि इन्द्र उन्हें उद्देशित करके यज्ञ करें; वे स्वयं वज्रधारी को पवित्र करेंगे। पवित्र अश्वमेध सम्पन्न करके इन्द्र निर्भय होकर फिर देवराज का पद पाएँगे। दुष्ट बुद्धि वाले नहुष अपने ही बुरे कर्मों से विनाश की ओर जाएँगे। देवताओं को कुछ समय तक सावधान रहते हुए धैर्य रखना होगा।
विष्णु के सत्य और अमृत जैसे मधुर वचन सुनकर देवता अपने गुरु बृहस्पति तथा ऋषियों के साथ उस स्थान पर गए जहाँ इन्द्र भय से व्याकुल थे। वहाँ उनकी शुद्धि के लिए महान् अश्वमेध हुआ। शल्य ने युधिष्ठिर से कहा कि वह यज्ञ ब्रह्महत्या का दोष दूर करने वाला था। इसके बाद इन्द्र ने उस पाप को वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों में बाँट दिया। उनसे अलग हो जाने पर वे उस सन्ताप से मुक्त हुए और उन्हें अपनी सुधि लौटी। पर उसी स्थान पर नहुष को देखकर वे फिर काँप उठे। ऋषियों के दिए वर से नहुष ऐसे दुर्धर्ष थे कि उनके सामने सभी प्राणी दब जाते थे। इन्द्र फिर अदृश्य हो गए। सबकी दृष्टि से ओझल रहकर वे उचित समय की प्रतीक्षा में विचरने लगे। उनके दोबारा लुप्त हो जाने से शची अत्यन्त दुःखी हुईं। उन्होंने प्रार्थना की, “हे इन्द्र, यदि हमने कभी दान दिया है, देवताओं को आहुति दी है, अपने गुरुओं को प्रसन्न किया है, यदि हमारे भीतर सत्य है, तो हमारा पातिव्रत्य अक्षुण्ण रहे। सूर्य के उत्तरायण के इस समय में अपना पवित्र क्रम चलाने वाली रात्रि देवी को हमारा प्रणाम है। हमारी अभिलाषा पूरी हो।” देह और मन को शुद्ध करके उन्होंने रात्रि देवी की पूजा की। अपने सत्य और पातिव्रत्य को आधार बनाकर उन्होंने दिव्य संकेतों से इन्द्र का पता जानना चाहा। भविष्य और गुप्त बातों का ज्ञान कराने वाली देवी से कहा, “हमें वह स्थान दिखाइए जहाँ देवराज हैं। सत्य से सत्य की पुष्टि हो।”
शल्य ने आगे कहा कि वह देवी शची के पास प्रकट हुईं। अपने सामने उस युवा, सुन्दर देवी को खड़ा देखकर शची प्रसन्न हुईं। सम्मानपूर्वक उन्होंने पूछा कि वे कौन हैं। देवी ने कहा, “हम दिव्य संकेतों का ज्ञान कराने वाली हैं और आपके पास आई हैं। आप सत्यनिष्ठ हैं, इसलिए हमारा दर्शन हुआ है। आप पति में अनुरक्त, संयमी और धर्म के अनुष्ठान में लगी रहती हैं। हम आपको वृत्र का वध करने वाले इन्द्र दिखाएँगी। शीघ्र हमारे पीछे आइए। आपका कल्याण हो; आप श्रेष्ठ देवराज को देखेंगी।” देवी आगे चलीं और शची उनके पीछे। वे दिव्य वनों तथा अनेक पर्वतों को पार करती हुई हिमवान् के उत्तर में पहुँचीं। फिर अनेक योजन तक फैले समुद्र के पास पहुँचकर एक बड़े द्वीप पर गईं। उस पर अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएँ थीं। वहाँ पक्षियों से भरा हुआ एक दिव्य सरोवर था। उसकी लम्बाई 800 मील और चौड़ाई भी उतनी ही थी। उसमें 5 रंगों के सहस्रों कमल पूरी तरह खिले थे और उनके चारों ओर भौंरे गूँज रहे थे। सरोवर के बीच कमलों का बड़ा, सुन्दर समूह था। उसी के मध्य ऊँचे डंठल पर एक विशाल श्वेत कमल खड़ा था। देवी शची के साथ उस डंठल के भीतर गईं। उसके तन्तुओं में इन्द्र छिपे हुए थे।
अपने पति को अत्यन्त सूक्ष्म रूप में पड़ा देखकर शची ने भी सूक्ष्म रूप धारण किया। उनके साथ आई देवी भी उसी प्रकार सूक्ष्म हो गईं। शची ने इन्द्र के पुराने प्रसिद्ध पराक्रमों का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति की। इन्द्र ने पूछा, “आप किस प्रयोजन से आई हैं? हमारा पता कैसे लगा?” तब शची ने नहुष का व्यवहार बताया। “हे शतक्रतु, तीनों लोकों का राज्य पाकर नहुष बल और अभिमान से भर गए हैं। उनकी बुद्धि दूषित हो गई है। उन्होंने हमें अपने पास आने की आज्ञा दी है और उसके लिए समय भी निश्चित कर दिया है। यदि आप रक्षा नहीं करेंगे तो वे हमें अपने वश में कर लेंगे। इसी भय से हम आपके पास आई हैं। हे महाबाहु, उन भयानक, दुष्ट बुद्धि वाले नहुष का वध कीजिए। हे दैत्य और दानवों का संहार करने वाले देवराज, प्रकट होइए। अपना बल धारण कीजिए और फिर स्वर्ग का राज्य सँभालिए।” नहुष से मिले समय में शची अपने पति तक पहुँच चुकी थीं। जिनके पुराने पराक्रमों का वे स्मरण करा रही थीं, वे अभी कमल के भीतर छिपे थे; उनसे शची ने अपनी रक्षा और स्वर्ग के शासन में लौटने, दोनों की प्रार्थना की।
समझने की कुंजी (शुद्धि के बाद भी भय): शल्य की कथा में अश्वमेध और पाप का वितरण इन्द्र का सन्ताप दूर करते हैं। उसके बाद भी नहुष को मिला वर उन्हें भयभीत करता है और वे फिर छिप जाते हैं। वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों में पाप बाँटने का वर्णन इसी पुराकथा का अंश है।
सार: शची नहुष से इन्द्र का समाचार खोजने के लिए समय लेती हैं। विष्णु के परामर्श से अश्वमेध होता है और इन्द्र का पाप दूर होता है, पर नहुष के भय से वे फिर छिप जाते हैं। शची की प्रार्थना पर एक देवी उन्हें हिमवान् के उत्तर में कमल के तन्तुओं तक ले जाती हैं। वहाँ वे इन्द्र से रक्षा और राज्य में लौटने की विनती करती हैं।
ऋषियों की उठाई पालकी: शची का प्रस्ताव और अग्नि की खोज
शची की प्रार्थना सुनकर इन्द्र ने कहा, “इस समय पराक्रम दिखाने का अवसर नहीं है। नहुष हमसे अधिक बलवान् हैं। ऋषियों ने देवताओं और पितरों के लिए किए हुए यज्ञों के पुण्य से उनका बल बढ़ाया है। अब हमें नीति का आश्रय लेना होगा। उस उपाय को आपको ही पूरा करना है। उसे गुप्त रखिए और किसी से मत कहिए। अकेले में नहुष के पास जाकर कहिए कि वे ऋषियों द्वारा उठाए हुए सुन्दर वाहन पर बैठकर आपके पास आएँ। तब आप प्रसन्न होकर उनके वश में हो जाएँगी। उनसे यही कहिए।” शची ने सहमति दी और नहुष के पास पहुँचीं। उन्हें देखकर नहुष मुसकराए। वे उनके रूप की प्रशंसा करते हुए स्वागत करने लगे और पूछने लगे कि उनकी क्या इच्छा है। उन्होंने अपने को शची का अनुरक्त बताया, उन्हें संकोच छोड़कर विश्वास करने को कहा और सत्य की शपथ लेकर वचन दिया कि वे उनकी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे। शची ने कहा, “हे लोकनाथ, आपने जो समय दिया था, उसकी हमें आवश्यकता थी। उसके बाद आप हमारे पति होंगे। हमारी एक अभिलाषा है। कृपा करके सुनिए। आपके अनुराग के भरोसे यह इच्छा रखती हैं। उसे पूरा कर देंगे तो हम आपके अधीन हो जाएँगी।” इन्द्र ने जो उपाय बताया था, उसी के अनुसार अब वे नहुष के सामने अपनी माँग रखने लगीं।
शची बोलीं, “इन्द्र के पास सवारी के लिए घोड़े, हाथी और रथ रहे हैं। हम चाहती हैं कि आपका वाहन ऐसा नया हो जो कभी विष्णु, रुद्र, असुरों अथवा राक्षसों के पास भी न रहा हो। अनेक परम आदरणीय ऋषि मिलकर आपको पालकी में उठाएँ। हमें यही अच्छा लगता है। आप अपनी तुलना देवताओं या असुरों से क्यों करें? वे आपकी ओर देखते ही अपना बल खो बैठते हैं; अपने ही तेज से आप सबका तेज खींच लेते हैं। आपके सामने टिक सकने वाला कोई बलवान् नहीं है।” नहुष इस प्रस्ताव पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि ऐसे वाहन का नाम भी कभी नहीं सुना और यह बात उन्हें अत्यन्त प्रिय लगी है। वे शची के वश में हैं। ऋषियों से अपनी सवारी उठवाने वाला व्यक्ति दुर्बल तो हो नहीं सकता। वे तप कर चुके हैं और बलवान् हैं; भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी हैं। उनके क्रोधित हो जाने पर जगत ही न रहे। सारा जगत उन्हीं में प्रतिष्ठित है। देवता, असुर, गन्धर्व, नाग और राक्षस एक साथ मिलकर भी उनके क्रोध का सामना नहीं कर सकते। जिस पर दृष्टि डालते हैं, उसका तेज हर लेते हैं। “आपकी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे, देवी। सप्तर्षि और दूसरे द्विज ऋषि हमें उठाकर चलेंगे। हमारा माहात्म्य और वैभव देखिए।” इतना कहकर उन्होंने शची को विदा किया और तप में लगे अनेक ऋषियों को अपने दिव्य वाहन में लगा दिया। ब्राह्मणों की मर्यादा का ध्यान छोड़कर, शक्ति और अभिमान में डूबे हुए वे उन महर्षियों से अपनी सवारी उठवाने लगे।
शची नहुष के यहाँ से बृहस्पति के पास गईं। उन्होंने कहा, “नहुष ने जो समय दिया था, उसका बहुत थोड़ा भाग शेष है। हम आपका आदर करती हैं; हम पर कृपा कीजिए और शीघ्र इन्द्र का पता लगाइए।” बृहस्पति ने उत्तर दिया, “बहुत अच्छा। आप उन दुष्ट बुद्धि वाले नहुष से भय मत कीजिए। उनका अधिकार अब अधिक दिन नहीं रहेगा। धर्म का अनादर करके और महर्षियों को अपनी सवारी में लगाकर वे अपने पतन का मार्ग ले चुके हैं। हम उनके विनाश के लिए यज्ञ करेंगे और इन्द्र को खोज निकालेंगे। आपका कल्याण हो, भय छोड़िए।” उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित की और देवराज का स्थान जानने के लिए उत्तम आहुतियाँ दीं। फिर अग्नि से कहा, “इन्द्र को खोजिए।” हवन की आहुति ग्रहण करने वाले अग्निदेव ने अपनी इच्छा से एक अद्भुत स्त्रीरूप धारण किया और वहीं से अदृश्य हो गए। मन की गति से वे पर्वतों और वनों में, पृथ्वी पर और आकाश में खोजने लगे। पलक झपकने जितने समय में वे लौट आए। उन्होंने बृहस्पति से कहा कि इन सब स्थानों में इन्द्र कहीं नहीं मिले। केवल जल में खोज बाकी है।
अग्नि ने अपनी कठिनाई बताई, “हम जल में प्रवेश करने से सदा पीछे रहते हैं। उसमें हमारी गति नहीं है। हे ब्राह्मण, आपके लिए क्या करें?” बृहस्पति ने उन्हें जल में भी प्रवेश करने को कहा। अग्नि ने उत्तर दिया, “हम जल में नहीं जा सकते। वहाँ हमारा बुझ जाना निश्चित है। हम अपने को आपके हाथ में रखते हैं। आपका कल्याण हो। अग्नि की उत्पत्ति जल से हुई है, क्षत्रिय की ब्राह्मण से और लोहे की पत्थर से। इनका बल दूसरी वस्तुओं को भेद सकता है, पर जिस मूल से ये निकले हैं, उस पर इनका प्रभाव नहीं चलता।” यह कहकर उन्होंने उस सीमा को स्पष्ट किया जो उन्हें जल में उतरने से रोक रही थी। बृहस्पति ने इन्द्र की खोज का संकल्प लिया था और अग्नि पृथ्वी, आकाश, पर्वत तथा वन देख आए थे। अब बचा हुआ स्थान जल था। वहीं जाने के आदेश पर अग्नि ने अपने उद्गम और अपनी शक्ति की सीमा का तर्क रखा। शची के लिए माँगे हुए समय का थोड़ा ही अंश शेष था; खोज को उसी बाधा से आगे बढ़ना था।
समझने की कुंजी (नहुष के वर का प्रभाव): ऋषियों से मिले बल के कारण इन्द्र अभी नहुष से सीधी लड़ाई करने को तैयार नहीं हैं। उन्हीं ऋषियों को वाहन उठाने में लगवाने का प्रस्ताव शची उनकी सलाह पर रखती हैं। बृहस्पति इसे नहुष के धर्म से हटने और निकट आते पतन का संकेत मानते हैं।
सार: इन्द्र शची को गुप्त उपाय बताते हैं: नहुष से ऋषियों की उठाई सवारी में आने को कहें। नहुष इसे अपना वैभव मानकर स्वीकार करते हैं। शची बृहस्पति से शीघ्र इन्द्र को खोजने की विनती करती हैं। यज्ञ से भेजे गए अग्नि सब ओर खोजते हैं, पर जल में अपने बुझ जाने का भय बताते हैं।
अग्नि इन्द्र को खोज लेते हैं: देवता नहुष के विरुद्ध सहायता का वचन देते हैं
अग्नि की शंका सुनकर बृहस्पति ने उनकी स्तुति की। “हे अग्नि, आप सभी देवताओं के मुख हैं और पवित्र आहुतियाँ उन तक पहुँचाते हैं। साक्षी की भाँति सभी प्राणियों के अन्तःकरण में आपकी पहुँच है। मनीषी आपको एक भी कहते हैं और त्रिविध भी। आपके छोड़ देने पर यह जगत तत्काल नष्ट हो जाए। ब्राह्मण आपको प्रणाम करके अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप पत्नी और पुत्रों सहित अक्षय लोक प्राप्त करते हैं। आप आहुति के वाहक हैं और स्वयं श्रेष्ठ आहुति भी हैं। महान् यज्ञ में निरन्तर अर्पण करके आपकी पूजा होती है। तीनों लोकों की सृष्टि करके, समय आने पर अपने बिना प्रज्वलित किए हुए रूप से आप ही उनका संहार करते हैं। आप समस्त जगत की माता हैं और उसका अन्त भी। विद्वान् आपको मेघ और विद्युत् का रूप कहते हैं। आपकी ज्वालाएँ प्राणियों को धारण करती हैं। सारा जल और यह समस्त जगत आपमें प्रतिष्ठित है। हे पावक, तीनों लोकों में आपसे कुछ अज्ञात नहीं। प्रत्येक प्राणी अपने उत्पन्न करने वाले के प्रति अनुकूल होता है। निर्भय होकर जल में प्रवेश कीजिए। हम वेद के शाश्वत मन्त्रों से आपका बल बढ़ाएँगे।” इस स्तुति से अग्नि प्रसन्न हुए। उन्होंने बृहस्पति के वचनों की प्रशंसा की और सत्य का वचन दिया कि वे उन्हें इन्द्र दिखाएँगे।
शल्य ने कहा कि अग्नि जल में प्रविष्ट हुए। समुद्रों से लेकर छोटे-छोटे जलाशयों तक खोजते हुए वे उस सरोवर में पहुँचे जहाँ इन्द्र छिपे थे। कमलों में खोज करने पर उन्हें एक डंठल के तन्तुओं में देवराज दिखाई दिए। वे शीघ्र लौटे और बृहस्पति को बताया कि इन्द्र सूक्ष्म रूप धारण करके कमल के तन्तुओं की शरण में हैं। बृहस्पति देवताओं, ऋषियों और गन्धर्वों को साथ लेकर वहाँ गए। उन्होंने पुराने पराक्रमों का स्मरण कराते हुए इन्द्र की स्तुति की। “आपने महान् असुर नमुचि का वध किया है और अत्यन्त बलवान् शम्बर तथा वल को भी मारा है। हे शतक्रतु, अपना बल बढ़ाइए और शत्रुओं का नाश कीजिए। उठिए, देवता और ऋषि यहाँ एकत्र हैं। असुरों को मारकर आपने लोकों का उद्धार किया है। जल का फेन पाकर और विष्णु के तेज से समर्थ होकर आपने वृत्र का वध किया। आप समस्त प्राणियों के आश्रय और पूजनीय हैं। आपके समान कोई नहीं। सब प्राणी आपके सहारे हैं और देवताओं का वैभव आपने स्थापित किया है। हे देवराज, अपना बल धारण करके लोकों सहित सबको बचाइए।” इस प्रकार स्तुति किए जाने पर इन्द्र धीरे-धीरे बढ़ने लगे। उन्होंने अपना स्वाभाविक रूप धारण किया और उनका बल लौट आया। सामने खड़े बृहस्पति से पूछा, “अब आपका कौन-सा कार्य शेष है? त्वष्टा के पुत्र का वध हो चुका और लोकों को नष्ट करने वाले विशालकाय वृत्र भी मारे गए हैं।”
बृहस्पति ने कहा कि मनुष्यों के राजा नहुष देवर्षियों के प्रभाव से स्वर्ग का सिंहासन पाकर उन्हें बहुत कष्ट दे रहे हैं। इन्द्र ने पूछा कि नहुष को इतना दुर्लभ पद कैसे मिला, उन्होंने कौन-सा तप किया और उनका बल कितना है। बृहस्पति ने पूरा वृत्तान्त सुनाया। इन्द्र के देवराज का पद छोड़ देने पर भयभीत देवताओं को राजा की आवश्यकता हुई थी। देवता, जगत के पितर, ऋषि और प्रधान गन्धर्व एकत्र होकर नहुष के पास गए और उनसे जगत का रक्षक बनने को कहा। नहुष ने अपनी असमर्थता बताते हुए उनसे अपना तेज और तप का प्रभाव देने को कहा। देवताओं ने उन्हें बल दिया। वे अत्यन्त शक्तिशाली होकर तीनों लोकों के राजा बने और अब महर्षियों को अपने वाहन में लगाकर लोक-लोक में घूम रहे हैं। बृहस्पति ने चेताया, “उन भयानक नहुष को देखने से बचिए। उनकी आँखों से विष निकलता है और वे सबका तेज खींच लेते हैं। देवता इतने भयभीत हैं कि छिपकर घूमते हैं और उनकी ओर दृष्टि भी नहीं डालते।” बृहस्पति यह कह ही रहे थे कि वहाँ लोकपाल कुबेर, सूर्यपुत्र यम, प्राचीन देवता सोम और वरुण आए। उन्होंने इन्द्र के शत्रुओं के मारे जाने पर हर्ष व्यक्त किया और कहा कि त्वष्टा के पुत्र तथा वृत्र का वध हो जाना और इन्द्र को सकुशल देख पाना सौभाग्य है।
इन्द्र ने उन लोकपालों का प्रसन्न होकर विधिपूर्वक स्वागत किया। वे नहुष के विषय में उनकी सहायता चाहते थे। उन्होंने कहा, “भयानक रूप वाले नहुष देवताओं के राजा बने हुए हैं। इस कार्य में हमारी सहायता कीजिए।” लोकपालों ने स्वीकार किया कि नहुष की दृष्टि विष के समान है और वे उनसे भयभीत हैं। उन्होंने कहा कि इन्द्र नहुष को हटाएँ तो उन्हें यज्ञों में अपना भाग प्राप्त होना चाहिए। इन्द्र ने सहमति दी। उनके साथ ही लोकपालों का भी अभिषेक होगा; सभी देवताओं की सहायता से उस भीषण दृष्टि वाले शत्रु को हटाया जाएगा। तब अग्नि ने भी कहा, “हमें यज्ञों में भाग दीजिए। हम भी आपकी सहायता करेंगे।” इन्द्र ने उत्तर दिया कि महान् यज्ञों में अग्नि को भाग मिलेगा और इन्द्र तथा अग्नि का एक संयुक्त भाग होगा। शल्य ने बताया कि इन्द्र ने विचार करके कुबेर को यक्षों और संसार के समस्त धन का अधिकार दिया, यम को पितरों का अधिपत्य और वरुण को जल का राज्य। इन्द्र की खोज पूरी हो चुकी थी। अब उनके सामने नहुष के वर से भयभीत देवताओं को साथ लेकर स्वर्ग का अधिकार फिर प्राप्त करने का कार्य था। सहयोग के साथ यज्ञभाग और अलग-अलग अधिकारों की व्यवस्था भी तय हो गई थी।
समझने की कुंजी (यज्ञभाग और देवताओं के अधिकार): अग्नि के लिए आहुति ग्रहण करना और उसे देवताओं तक पहुँचाना, दोनों गुण स्तुति में आते हैं। आगे सहायता के बदले यज्ञभाग की बात होती है और इन्द्र-अग्नि का संयुक्त भाग निश्चित किया जाता है। कुबेर, यम और वरुण को दिए गए अधिकारों का वर्णन भी इसी समझौते के साथ है।
सार: बृहस्पति के आश्वासन पर अग्नि जल में उतरते हैं और कमल के तन्तुओं में इन्द्र को खोज लेते हैं। देवताओं की स्तुति से इन्द्र अपना रूप और बल धारण करते हैं। नहुष की शक्ति का वृत्तान्त सुनकर वे लोकपालों और अग्नि से सहायता माँगते हैं तथा उनके यज्ञभाग और अधिकार निश्चित करते हैं।
नहुष का पतन और इन्द्र की वापसी: शल्य युधिष्ठिर को आश्वासन देते हैं
इन्द्र लोकपालों और देवताओं के साथ नहुष को हटाने का उपाय सोच ही रहे थे कि महर्षि अगस्त्य वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देवराज का आदर किया और कहा कि त्वष्टा के विश्वरूपधारी पुत्र तथा वृत्र के नाश के बाद उन्हें सकुशल देखना सौभाग्य है। नहुष भी स्वर्ग के सिंहासन से गिर चुके हैं। इन्द्र के सभी शत्रुओं का अन्त हो गया है। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया, यात्रा का कुशल पूछा और पाँव तथा मुख धोने के लिए जल, अर्घ्य और गौ अर्पित की। विधिवत् सम्मान के बाद अगस्त्य आसन पर बैठ गए। तब इन्द्र ने उनसे पूछा कि उन दुष्ट बुद्धि वाले नहुष का स्वर्ग से पतन कैसे हुआ। अगस्त्य ने कहा, “सुनिए, बल के अभिमान में डूबे नहुष के पतन का वृत्तान्त। उन्हें उठाकर चलते हुए ब्राह्मण और देवर्षि परिश्रम से थक गए थे। उन्होंने पूछा कि वेद में गौओं पर जल छिड़कते समय जिन मन्त्रों के पाठ का विधान है, वे प्रमाण हैं अथवा नहीं। तमोगुण से विवेक खो चुके नहुष ने कहा कि वे प्रमाण नहीं हैं। ऋषियों ने उन्हें समझाया कि वे अधर्म की ओर जा रहे हैं; पूर्वकाल के महर्षियों ने उन मन्त्रों को प्रमाण माना है। उसी समय असत्य से प्रेरित होकर नहुष ने हमारे सिर पर अपना पैर रख दिया। ऐसा करते ही उनका बल और रूप जाता रहा। वे भय से व्याकुल हो उठे।”
अगस्त्य ने आगे कहा, “तब हमने उनसे कहा कि ब्रह्मर्षियों द्वारा पढ़े गए निर्दोष वेदमन्त्रों को आपने अप्रामाणिक बताया है, हमारे सिर पर पैर रखा है और ब्रह्मा के समान दुर्धर्ष महर्षियों को भार ढोने वाले पशुओं की भाँति जोत लिया है। इसलिए आपका तेज छिन जाए। आपके पुण्य कर्मों का फल समाप्त हो चुका है; सिर के बल स्वर्ग से नीचे गिरिए। 10,000 वर्ष तक विशाल सर्प का रूप धारण करके पृथ्वी पर विचरिए। वह अवधि पूरी होने पर फिर स्वर्ग में आ सकेंगे। हे इन्द्र, इस प्रकार नहुष स्वर्ग के सिंहासन से नीचे गिरा दिए गए हैं। अब हमारा कुशल है। ब्राह्मणों को कष्ट देने वाला वह काँटा हट गया। आप स्वर्ग में लौटिए, लोकों की रक्षा कीजिए, इन्द्रियों और शत्रुओं को वश में रखिए तथा महर्षियों से सम्मान पाइए।” देवता और महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए। पितर, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व और अप्सराओं के समूह भी हर्षित थे। सरोवरों, नदियों, पर्वतों और समुद्रों तक ने इस आनन्द में भाग लिया। सबने इन्द्र के कुशल का अभिनन्दन किया और अगस्त्य द्वारा नहुष के पतन पर प्रसन्नता व्यक्त की। वह दुष्ट राजा अब सर्प होकर पृथ्वी पर विचरेगा, यह समाचार सबके लिए राहत लाया था।
गन्धर्वों और अप्सराओं की स्तुति के बीच इन्द्र शुभ लक्षणों वाले गजराज ऐरावत पर चढ़े। अग्नि, महर्षि बृहस्पति, यम, वरुण और धन के स्वामी कुबेर उनके साथ थे। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओं से घिरे हुए वे तीनों लोकों में गए। शची से उनका फिर मिलन हुआ और वे बड़े हर्ष से लोकों की रक्षा करने लगे। इसके बाद देवर्षि अंगिरा उनकी सभा में आए। उन्होंने अथर्व के मन्त्रों से इन्द्र की विधिपूर्वक पूजा की। प्रसन्न होकर इन्द्र ने उन्हें वर दिया कि अथर्ववेद में वे अथर्वाङ्गिरस नाम के ऋषि के रूप में प्रसिद्ध होंगे और यज्ञों में भाग भी पाएँगे। उनका सम्मान करके इन्द्र ने उन्हें विदा किया। उन्होंने सभी देवताओं और तपस्वी ऋषियों का आदर किया तथा प्रसन्न होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने लगे। शल्य ने युधिष्ठिर से कहा, “इस प्रकार इन्द्र ने भी अपनी पत्नी के साथ दुःख सहा। शत्रुओं के अन्त का अवसर पाने के लिए उन्हें भी कुछ समय छिपकर रहना पड़ा। इसलिए द्रौपदी और अपने महात्मा भाइयों के साथ महान् वन में जो कष्ट आपने पाया है, उसे हृदय पर मत रखिए। जिस प्रकार वृत्र के वध के बाद इन्द्र को राज्य फिर मिला, उसी प्रकार आपको भी अपना राज्य प्राप्त होगा।”
शल्य ने नहुष का उदाहरण आगे रखा। ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले उस दुर्बुद्धि राजा को अगस्त्य के शाप ने गिरा दिया और दीर्घकाल के लिए उसका वैभव मिट गया। उन्होंने कहा कि उसी प्रकार कर्ण, दुर्योधन और दूसरे दुष्ट बुद्धि वाले शत्रु शीघ्र नष्ट होंगे। युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ समुद्र तक फैली सारी पृथ्वी का राज्य भोगेंगे। “इन्द्र की विजय की यह कथा पवित्रता में वेद के समान है। विजय चाहने वाले राजा को इसे सुनना चाहिए, विशेषकर जब सेना युद्ध के लिए सज चुकी हो। इसलिए हे युधिष्ठिर, हम आपकी विजय के लिए यह कथा कह रहे हैं। महात्माओं की प्रशंसा होने पर उनका उत्कर्ष होता है। दुर्योधन के अपराधों और भीम तथा अर्जुन के बल के कारण महान् क्षत्रियों का विनाश निकट है।” उन्होंने इस कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ने का फल भी बताया: पाप से मुक्ति, सुखमय लोक की प्राप्ति, इस लोक और परलोक में आनन्द, शत्रुओं के भय से छुटकारा, सन्तान बनी रहना, संकटों से रक्षा और दीर्घायु। उनके वचनों में ऐसे पाठक के लिए सर्वत्र विजय और पराजय से मुक्ति का आश्वासन था। शल्य की कथा ने इन्द्र के दुःख, छिपने और फिर राज्य पाने के क्रम को युधिष्ठिर के सामने रखा था। अब वे उसी उदाहरण से उन्हें धैर्य और विजय की आशा दे रहे थे।
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा कि शल्य के वचनों से धैर्य पाकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उनका विधिपूर्वक सम्मान किया। फिर मद्रराज से बोले, “इसमें सन्देह नहीं कि आप कर्ण के सारथी होंगे। तब अर्जुन की प्रशंसा सुनाकर कर्ण का उत्साह घटाइएगा।” शल्य ने उत्तर दिया, “ऐसा ही होगा। आप जैसा कहते हैं, हम वैसा ही करेंगे। इसके अतिरिक्त भी आपके लिए जो कर सकेंगे, वह करेंगे।” यह वचन देकर उन्होंने कुन्तीपुत्रों से विदा ली और अपनी सेना के साथ दुर्योधन के पास चले गए। युधिष्ठिर को दी गई सांत्वना के बाद वही व्यावहारिक बात फिर सामने आई थी जिसके साथ यह भेंट आरम्भ हुई थी: कर्ण और अर्जुन के युद्ध में शल्य की भूमिका। दुर्योधन के साथ जाने से पहले शल्य ने युधिष्ठिर से किए हुए उस वचन की फिर पुष्टि कर दी।
समझने की कुंजी (कथा कहने का प्रयोजन): शल्य इन्द्र के संकट का वर्णन युधिष्ठिर को धैर्य देने के लिए करते हैं। कथा के पाठ से मिलने वाले फल भी उन्हीं के वचनों में आते हैं। अन्त में वे कर्ण का मनोबल घटाने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराकर दुर्योधन की ओर चले जाते हैं।
सार: अगस्त्य बताते हैं कि ऋषियों और वेदमन्त्रों का अपमान करने पर नहुष को 10,000 वर्ष तक सर्प होकर रहने का शाप मिला है। इन्द्र शची से मिलकर फिर धर्मपूर्वक शासन करते हैं। शल्य इसी उदाहरण से युधिष्ठिर को राज्य लौटने का आश्वासन देते हैं और अर्जुन की प्रशंसा से कर्ण का उत्साह घटाने का वचन दोहराकर अपनी सेना सहित दुर्योधन के पास जाते हैं।
सात और ग्यारह अक्षौहिणी: दोनों पक्षों की सेनाएँ एकत्र होती हैं
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा कि सात्वत वंश के महान् वीर युयुधान, जिन्हें सात्यकि भी कहा जाता है, एक विशाल सेना लेकर युधिष्ठिर के पास आए। उसमें पैदल सैनिक, घोड़े, रथ और हाथी थे। अनेक देशों से आए उनके पराक्रमी सैनिक अलग-अलग प्रकार के युद्धास्त्र धारण किए हुए थे। उनके वीर रूप से पाण्डवों की सेना की शोभा बढ़ी। परशु, प्रक्षेपास्त्र, शक्तियाँ, भाले, मुद्गर, गदाएँ, दण्ड, पाश, निर्मल तलवारें, छुरे और अनेक प्रकार के बाण, सभी उत्तम प्रकार से तैयार किए गए थे। उन अस्त्रों से सुशोभित सेना का रंग मेघमय आकाश जैसा जान पड़ता था, मानो बादलों के समूह में बिजली चमक रही हो। सात्यकि की सेना 1 अक्षौहिणी थी। युधिष्ठिर के सैन्यसमूह में मिलने पर वह उसी में इस प्रकार समा गई जैसे छोटी नदी समुद्र में मिलकर अलग दिखाई नहीं देती।
चेदिराज धृष्टकेतु भी 1 अक्षौहिणी सेना लेकर पाण्डुपुत्रों के पास पहुँचे। मगध के बलवान् राजा जयत्सेन युधिष्ठिर के लिए 1 अक्षौहिणी लाए। समुद्र के निकट तटवर्ती देश में रहने वाले पाण्ड्य नरेश अनेक प्रकार की सेना के साथ आए। इन सबके एकत्र होने पर युधिष्ठिर का सैन्यसमूह सुन्दर वेशधारी और अत्यन्त शक्तिशाली सैनिकों से भर गया। द्रुपद की सेना में भी अनेक देशों के वीर और उनके अपने पराक्रमी पुत्र थे। मत्स्यराज विराट पर्वतीय प्रदेश के राजा को साथ लेकर पाण्डवों के पास आए। इस प्रकार अलग-अलग दिशाओं से पाण्डुपुत्रों के लिए कुल 7 अक्षौहिणी सेना एकत्र हुई। अनेक प्रकार की पताकाएँ उसमें लहरा रही थीं। कुरुओं से युद्ध करने के लिए उत्सुक उन सेनाओं को देखकर पाण्डवों का मन प्रसन्न हुआ। पहले भेजे गए निमन्त्रणों के बाद अब सहयोगी राजा अपने सैन्यबल के साथ पहुँच रहे थे।
उधर भगदत्त ने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन को 1 अक्षौहिणी सेना देकर उनका हर्ष बढ़ाया। उनकी दुर्धर्ष सेना में चीन और किरात योद्धा बड़ी संख्या में थे। स्वर्ण के समान दमकते हुए वे कर्णिकार के फूलों से भरे वन जैसे सुन्दर लगते थे। वीर भूरिश्रवा और शल्य भी 1-1 अक्षौहिणी लेकर आए। हृदीकपुत्र कृतवर्मा भोजों, अन्धकों और कुकुरों के साथ 1 अक्षौहिणी सेना लाए। अनेक रंगों के पुष्पहार पहने हुए उनके बलवान् सैनिक ऐसे लगते थे जैसे वन से होकर निकले हुए क्रीड़ारत हाथियों का समूह। जयद्रथ के नेतृत्व में सिन्धु-सौवीर के योद्धा इतने बड़े दल के साथ आए कि उनके पदाघात से पर्वत काँपते-से जान पड़ते थे। उनकी 1 अक्षौहिणी सेना वायु से चलाए जाते मेघसमूह के समान थी। काम्बोज नरेश सुदक्षिण यवनों और शकों सहित 1 अक्षौहिणी लेकर कुरुराज के पास पहुँचे। टिड्डियों के दल जैसी दिखाई देती वह सेना कुरुओं के सैन्यसमूह में मिलकर उसी में समा गई।
माहिष्मती नगर के निवासी राजा नील दक्षिण देश के बलवान् सैनिकों के साथ आए। उनके अस्त्र सुन्दर बनावट के थे। अवन्ति के दोनों राजा विशाल बल के साथ पहुँचे; दोनों अलग-अलग 1 अक्षौहिणी सेना लाए थे। केकय के 5 राजकुमार भाई भी 1 अक्षौहिणी लेकर शीघ्र दुर्योधन के पास आए और उन्हें प्रसन्न किया। अन्य दिशाओं के यशस्वी राजाओं से 3 बड़े सैन्यदल और पहुँचे। वैशम्पायन ने दुर्योधन के पास एकत्र हुई सेना की कुल संख्या 11 अक्षौहिणी बताई। अनेक रूपों की पताकाओं से भरी वह सेना कुन्तीपुत्रों से युद्ध करने को उत्सुक थी। पाण्डवों की ओर 7 अक्षौहिणी और दुर्योधन की ओर 11 अक्षौहिणी युद्ध के लिए आ चुकी थीं। इतने बड़े सैन्यसमूह के आने पर हस्तिनापुर में दुर्योधन की सेना के प्रमुख नायकों तक के लिए स्थान नहीं बचा।
इसलिए कौरवों की सेना बहुत दूर तक फैलाकर ठहराई गई। पाँच नदियों का देश, पूरा कुरुजाङ्गल, सर्वत्र वन्य विस्तार वाला रोहितक वन, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगा के तट, वारण, वातधान और यमुना की सीमा पर स्थित पर्वतीय प्रदेश, सभी सैन्यदल से भर गए। अन्न और धन से सम्पन्न यह सारा विस्तृत भूभाग कौरवों की सेना से ढक गया था। पाँचालराज द्रुपद ने जिस पुरोहित को कुरुओं के पास भेजा था, उन्होंने इस प्रकार व्यवस्थित सेना को देखा। वे पाण्डवों की ओर से शान्ति और उनके अधिकार की बात कहने आए थे। उनके सामने अब दुर्योधन के पक्ष में एकत्र राजाओं का इतना बड़ा सैन्यबल था कि राजधानी से बाहर के अनेक प्रदेशों में उसके पड़ाव फैले हुए थे।

समझने की कुंजी (अक्षौहिणी और सहयोगी दल): अक्षौहिणी में रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सैनिक सम्मिलित होते हैं। वैशम्पायन कई राजाओं के साथ आई अक्षौहिणियों की संख्या अलग से बताते हैं और अन्त में दोनों पक्षों का कुल बल देते हैं। सभी सहयोगियों के लिए अलग संख्या नहीं कही गई है; अन्य दिशाओं से आए 3 बड़े सैन्यदलों को भी यहाँ अलग-अलग अक्षौहिणी नहीं कहा गया।
सार: सात्यकि, धृष्टकेतु, जयत्सेन, पाण्ड्य, द्रुपद और विराट आदि के आने से पाण्डवों का बल 7 अक्षौहिणी होता है। दुर्योधन के सहयोगियों की सेना कुल 11 अक्षौहिणी है। हस्तिनापुर में स्थान न होने से उसका विस्तार आसपास के अनेक समृद्ध प्रदेशों में होता है। द्रुपद के पुरोहित उस एकत्र सेना को देखते हैं।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), उद्योग पर्व; यह अध्याय के. एम. गांगुली, खण्ड I-LXXI (1-71) का क्रम निभाता है; गीता प्रेस हिन्दी संस्करण की अध्याय-संख्या इससे भिन्न है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से हुई है। यह भावपूर्ण पुनर्कथन है, शब्दशः अनुवाद नहीं। स्रोतों के बारे में।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)