अवधूत गीता
अध्याय 6 · सर्व-शिव-निरूपण एवं स्वरूप-स्थिति
आरंभ के बीस श्लोकों की टेक एक ही है, “एकनिरन्तरसर्वशिवम्”, एक, निरंतर, सर्वत्र शिव। जहाँ केवल यही एक शेष रहता है, वहाँ श्लोक बार-बार पूछते हैं, फिर भेद कैसे, क्रिया कैसे, उपमा कैसे। इक्कीसवें श्लोक से स्वर बदल जाता है, “अहमेव शिवः परमार्थः”, मैं ही शिव, यही परमार्थ। यहाँ “शिव” परम-तत्त्व का नाम है, किसी एक देवता का नहीं।
अवधूत यहाँ एक ही धागे को थाम कर बैठते हैं, और वह धागा है “एकनिरन्तरसर्वशिवम्”। श्रुतियाँ अनेक स्वरों में कहती आई हैं कि आकाश से ले कर यह सारा जगत् मृग-तृष्णा के जल जैसा है, दूर से चमकता हुआ, पास जाने पर कुछ भी नहीं। अब अवधूत एक सूक्ष्म प्रश्न रखते हैं, और उसी से पूरी तुलना ढह जाती है। उपमा तो दो को माँगती है, “यह उसके समान है”, पर जहाँ केवल एक शिव शेष रहे, वहाँ किसकी किससे तुलना। वही प्रश्न आगे यज्ञ और तप पर आ टिकता है, क्योंकि क्रिया कर्ता और कर्म का भेद माँगती है, और एक शिव में न कर्ता है, न कर्म। फिर वही दृष्टि मन पर मुड़ती है। जिस मन की पहले परीक्षा हुई थी, उसी शुद्ध हुए मन को यहाँ “सर्व-शिव” कह दिया जाता है, क्योंकि निर्मल मन चेतना का ही प्रतिबिंब है। और जब वही मन सब कुछ है, तो वही किसे जाने, वही किससे कहे।

1 · 2 · 3
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति वयं वियदादिरिदं मृगतोयसमम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-मुपमेयमथोह्युपमा च कथम् ॥ 1 ॥
अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं ननु कार्यविकार्यविहीनपरम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ 2 ॥
मन एव निरन्तरसर्वगतं ह्यविशालविशालविहीनपरम् ।
मन एव निरन्तरसर्वशिवं मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ 3 ॥
अब यही टेक जगत् की एक-एक नींव को छूती चलती है। दिन और रात का भेद मिट जाए, उदय और अस्त का भेद मिट जाए, तो सूर्य, चंद्र और अग्नि अलग कैसे ठहरें, जो प्रकाशमान हैं, वे उसी एक प्रकाश से पृथक् कैसे हों जिससे प्रकाशित हैं। काम और निष्कामता बीत जाए, चेष्टा और निश्चेष्टता सरक जाए, क्योंकि अवधूत-स्थिति में जोड़े छोड़ने नहीं पड़ते, स्वयं खिसक जाते हैं; तब बाहर और भीतर की भिन्न मति कहाँ टिके, जब परम सबको व्याप्त है। भेद और अभेद, ज्ञाता और ज्ञेय, जब इनका निराकरण हो और केवल एक शिव शेष रहे, तो माण्डूक्य की वे अवस्थाएँ भी कैसे, सुषुप्ति की तीसरी और तुरीय की चौथी, जो आपस के भेद से ही गिनी जाती हैं। जहाँ कोई भेद नहीं, वहाँ अवस्थाओं की गिनती ही नहीं रहती।
4 · 5 · 6
दिनरात्रिविभेदनिराकरण-मुदितानुदितस्य निराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ 4 ॥
गतकामविकामविभेद इति गतचेष्टविचेष्टविभेद इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ 5 ॥
यदिभेदविभेदनिराकरणं यदि वेदकवेद्यनिराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम् ॥ 6 ॥
जानने की पूरी प्रक्रिया भी यहीं ढह जाती है। “कहा गया और अनकहा” सत्य नहीं, “जाना गया और अनजाना” भी सत्य नहीं; तो विषय, इंद्रिय, बुद्धि और मन, ये सब व्यवहार-भूमि पर ही खड़े रहते हैं, एक शिव में जानने वाले और जानने योग्य का जोड़ा ही नहीं बचता। फिर वही दृष्टि पाँच महाभूतों पर मुड़ती है। आकाश और वायु सत्य नहीं, पृथ्वी और अग्नि सत्य नहीं, जगत् की वही नींव जब भासमात्र हो, तो उससे बने बादल और जल को अलग सत्ता कहाँ से मिले। और जब कल्पित लोक तथा कल्पित देवता भी निरस्त हो जाएँ, सात लोक, अनेक योनियाँ, अनेक देवता, सब कल्पना की सीमा में आ जाएँ, तो “यह गुण है, यह दोष है”, यह नैतिक ढाँचा भी कहाँ ठहरे। एक शिव में गुण-दोष की कोटि ही नहीं रहती।
7 · 8 · 9
गदिताविदितं न हि सत्यमिति विदिताविदितं न हि सत्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम् ॥ 7 ॥
गगनं पवनो न हि सत्यमिति धरणी दहनो न हि सत्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं जलदश्च कथं सलिलं च कथम् ॥ 8 ॥
यदि कल्पितलोकनिराकरणं यदि कल्पितदेवनिराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गुणदोषविचारमतिश्च कथम् ॥ 9 ॥
अब “आना और जाना” पर बात आती है। मरण और अमरण निरस्त, करना और न करना निरस्त; तो गमन-आगमन की, अर्थात् जन्म-मरण के उस चक्र की, बात कोई कैसे कहे। “मैं फिर जन्म लूँगा”, “मैं स्वर्ग जाऊँगा”, ये कथन देह के स्तर के हैं, आत्मा न कहीं से आती है, न कहीं जाती है। फिर सांख्य के दो मूल तत्त्व पुकारे जाते हैं, प्रकृति और पुरुष, और वे भी अभेद में लीन हो जाते हैं, कारण और कार्य का विभेद भी नहीं रहता; जब वही एक है, तो “सक्षम और असक्षम”, “पुरुष और अपुरुष”, ये भेद टिकते नहीं। और जहाँ तीन प्रकार के ताप का जन्म ही न हो, आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक, और जहाँ गुण के कारण किसी दूसरे का आगमन भी न हो, वहाँ बूढ़ा, जवान और शिशु, उम्र की ये कोटियाँ देह की हैं, आत्मा की नहीं।
10 · 11 · 12
मरणामरणं हि निराकरणं करणाकरणं हि निराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गमनागमनं हि कथं वदति ॥ 10 ॥
प्रकृतिः पुरुषो न हि भेद इति न हि कारणकार्यविभेद इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं पुरुषापुरुषं च कथं वदति ॥ 11 ॥
तृतीयं न हि दुःखसमागमनं न गुणाद्द्वितीयस्य समागमनम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम् ॥ 12 ॥
अब वे सामाजिक और प्राकृतिक पहचानें गिरती हैं जिन्हें मनुष्य सबसे दृढ़ मानता है। वह परम आश्रम और वर्ण से परे है, कारण और कर्ता से परे है, इसी से दत्तात्रेय “अवधूत” कहलाते हैं, अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास और वर्ण-व्यवस्था, इन सबके पार; तो नष्ट और अनष्ट की मति भी प्रकृति-भूमि तक ही टिकती है। प्रकृति का चक्र यही है, एक दूसरे को निगलता और निगला जाता है, बनता और मिटता; पर एक शिव में यह चक्र है ही नहीं, इसलिए वहाँ न कुछ विनाशी ठहरता है, न उसके विरोध में अविनाशी। यहाँ तक कि स्त्री और पुरुष की वह कोटि भी, जो सबसे गहरी पहचान मानी जाती है, मिट जाती है; और जब पहचान ही न रहे, तो हर्ष और विषाद, ये दोनों मन की वृत्तियाँ कहाँ टिकें।
13 · 14 · 15
ननु आश्रमवर्णविहीनपरं ननु कारणकर्तृविहीनपरम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम् ॥ 13 ॥
ग्रसिताग्रसितं च वितथ्यमिति जनिताजनितं च वितथ्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-मविनाशि विनाशि कथं हि भवेत् ॥ 14 ॥
पुरुषापुरुषस्य विनष्टमिति वनितावनितस्य विनष्टमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-मविनोदविनोदमतिश्च कथम् ॥ 15 ॥
अब अवधूत साधक की भीतरी पकड़ों को छूते हैं, और एक-एक करके उन्हें खोल देते हैं। यदि वह मोह और विषाद से परे है, संशय और शोक से परे है, तो “मैं” और “मेरा” फिर कैसे, क्योंकि अहम् और मम, यही दो जड़ें हैं जिनसे मोह, विषाद, संशय और शोक जन्मते हैं; जड़ ही न रहे, तो उपजी वृत्तियाँ अपने आप गिर जाती हैं। धर्म–अधर्म और बंध-मोक्ष, साधक की ये पुरानी पकड़ें भी छूट जाती हैं, और दुःख तथा दुःख से छूटने की इच्छा, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक शिव में दोनों का अवकाश नहीं। यहाँ तक कि याज्ञिक और यज्ञ का, अग्नि और आहुति का विभाग भी नहीं, इसलिए अवधूत सीधा पूछ बैठते हैं, “वद”, बता तो सही, फिर कर्म-फल कैसे होंगे; कर्ता, कर्म और फल का वह त्रिक ही जब न रहे, तो कर्मकांड का मूल आधार ढह जाता है।
16 · 17 · 18
यदि मोहविषादविहीनपरो यदि संशयशोकविहीनपरः ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-महमत्र ममेति कथं च पुनः ॥ 16 ॥
महमेति ननु धर्मविधर्मविनाश इति ननु बन्धविबन्धविनाश इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं-मिहदुःखविदुःखमतिश्च कथम् ॥ 17 ॥
न हि याज्ञिकयज्ञविभाग इति न हुताशनवस्तुविभाग इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं वद कर्मफलानि भवन्ति कथम् ॥ 18 ॥
अब पहली टेक अपने अंतिम उच्चारण की ओर बढ़ती है। वह शोक और निःशोक, दोनों से मुक्त है, दर्प और निर्दर्प, दोनों से मुक्त है; तो राग और विराग की मति भी कहाँ, क्योंकि “हमने राग छोड़ दिया, हम वैरागी हैं”, यह कहना भी एक नई पकड़ बन जाता है, और पूर्ण स्थिति में किससे राग, किससे विराग, वही एक शेष है। मोह और विमोह का विकार नहीं, लोभ और अलोभ का विकार नहीं, तो विवेक और अविवेक की मति भी कैसे। यहीं “एकनिरन्तरसर्वशिवम्” की टेक अपना अंतिम स्वर पाती है। यहाँ तक श्लोक भेद-पर-भेद को गिराते आए; अगले श्लोक से टेक बदल जाएगी, “अहमेव शिवः परमार्थः”, और “एक, निरंतर शिव है” से छलांग लगेगी “मैं ही शिव हूँ” तक, दार्शनिक कथन से सीधी अनुभव-घोषणा तक।
19 · 20
ननु शोकविशोकविमुक्त इति ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ननु रागविरागमतिश्च कथम् ॥ 19 ॥
न हि मोहविमोहविकार इति न हि लोभविलोभविकार इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम् ॥ 20 ॥
अब स्वर भीतर से उठता है, “अहमेव शिवः परमार्थः”, मैं ही शिव, यही परम सत्य। यह अद्वैत की सबसे ऊँची घोषणा है, और यहीं से अवधूत हर बार पूछते हैं, फिर अभिवादन किसका करूँ। “आप और मैं” का भेद तो कभी हुआ ही नहीं, कुल और जाति का विचार मिथ्या है; अभिवादन तो दो को माँगता है, एक झुकने वाला और एक जिसे नमन हो, पर जब वही एक शिव है, तो नमस्कार किसे और किसकी ओर से। गुरु और शिष्य का विचार बिखर गया, उपदेश का विचार भी बिखर गया, टुकड़े-टुकड़े; दत्तात्रेय यहाँ “हम गुरु हैं” का दावा तक छोड़ देते हैं, क्योंकि सिखाने वाला और सीखने वाला, उपदेश और उपदेश-ग्राही, सब एक ही में लीन हैं। देह और लोक भी कल्पित हैं, अर्थात् स्वतंत्र सत्ता से रहित; इनकी सारी सत्ता उसी एक शिव से उधार है।
21 · 22 · 23
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ 21 ॥
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति उपदेशविचारविशीर्ण इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ 22 ॥
न हि कल्पितदेहविभाग इति न हि कल्पितलोकविभाग इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ 23 ॥
अब स्वरूप की वही शुद्धता दो छोरों से बचा कर रखी जाती है। मैं कभी रज से युक्त नहीं, न कभी रज से रहित, मैं तो सदा निर्मल, निश्चल और शुद्ध हूँ; “रज” के दोनों अर्थ यहाँ झड़ जाते हैं, रजोगुण भी और धूल भी, क्योंकि जो स्वयं दाग-रहित, कंपन-रहित और मिलावट-रहित है, उसमें रज का होना या न होना, दोनों ही नहीं घटते। देह और विदेह का विकल्प भी नहीं, और मिथ्या आचरण को सत्य कह देना भी ठीक नहीं; “हमारा झूठा बर्ताव ही असली है”, इस उलटी तर्क-शैली को भी श्लोक नकार देता है, क्योंकि अद्वैत के नाम पर सब कुछ को बेमतलब स्वीकार कर लेना भी अधूरापन है, स्वरूप की स्थिति इन दोनों छोरों से परे है। मैं ही शिव हूँ, यही परमार्थ है, तो यहाँ भी अभिवादन किसका करूँ।
24 · 25
सरजो विरजो न कदाचिदपि ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ 24 ॥
न हि देहविदेहविकल्प इति अनृतं चरितं न हि सत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ 25 ॥
और तब वही हस्ताक्षर-श्लोक आता है जिस पर अध्याय 4, 5 और 6, तीनों पूर्ण होते हैं। जहाँ पाना और न पाना कुछ शेष ही नहीं रहता, वहाँ छंद का कोई नियम भी नहीं रहता। सम-रस में डूबा, भाव से पवित्र हुआ परम अवधूत वहीं से तत्त्व बोलता है। उस अवस्था का कथन व्याकरण और छंद की तराजू से नहीं तौला जाता, वह तो सम-रस में मग्न अवधूत का सहज उच्चार है, जहाँ बंधन का प्रश्न ही नहीं उठता।
26
विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ 26 ॥
आगे
अध्याय 7: अवधूत-लक्षण, अवधूत के बाह्य एवं आंतरिक लक्षण।