अवधूत गीता, अध्याय 6

अवधूत गीता · अध्याय छह

सर्व-शिव

सत्ताईस श्लोक। यदि सब-कुछ शिव है, तो भेद कैसे रह जाते हैं?

छठा अध्याय एक तार्किक argument-शैली में चलता है। दत्तात्रेय एक प्रारम्भिक वाक्य रखते हैं, “यदि-च-एक-निरन्तर-सर्व-शिवम्” (यदि सब कुछ केवल-निरन्तर-शिव है)। और फिर श्लोक-दर-श्लोक पूछते हैं कि अगर यह सच है, तो यह-और-यह भेद कैसे संभव?

हर श्लोक एक specific-विभाजन को उठाता है। आकाश और पवन में सत्य का भेद कैसे? कारण और कार्य में? प्रकृति और पुरुष में? पुरुष और स्त्री में? जयन्त (युवा) और शिशु (बच्चा) में? आश्रम-वर्ण में? प्रत्येक के साथ एक तरह की तर्क-गर्जना है, “यदि सब शिव है, तो यह कैसे?”

श्लोक बाईस से छब्बीस तक एक अलग refrain आती है, “अहम् एव शिवः परमार्थ इति, अभिवादनम् अत्र करोमि कथम्” (मैं ही शिव परम-अर्थ हूँ, फिर अभिवादन कैसे करूँ?)। यह पाँच श्लोक एक तरह की मधुर-अहंकार-शास्त्र हैं। पारम्परिक नमस्कार-प्रोटोकॉल इसी “मैं” और “तू” के भेद पर खड़ा है। जब यह भेद ही नहीं, तो नमस्कार किसको?

शिव-तत्त्व की चर्चा अवधूत-गीता में काश्मीर-शैव-दर्शन से कुछ-कुछ मिलती-जुलती है, और कई आधुनिक विद्वान इसे काश्मीर-त्रिक-परम्परा की पूर्व-झलक मानते हैं। अभिनवगुप्त की तन्त्रालोक (दसवीं-ग्यारहवीं सदी) में जो शिव-तत्त्व की दार्शनिक-संरचना है, उसकी कई प्रवृत्तियाँ इस अध्याय में बीज-रूप में मिलती हैं।

27 श्लोक

श्लोक 1
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति वयं वियदादिरिदं मृगतोयसमम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव\- मुपमेयमथोह्युपमा च कथम् ॥ १॥
bahudhā śrutayaḥ pravadanti vayaṃ viyadādiridaṃ mṛgatoyasamam । yadi caikanirantarasarvaśiva\- mupameyamathohyupamā ca katham ॥ 1॥
श्रुति-यें कहती हैं, हम आकाश-इत्यादि मृग-तृष्णा। एक-निरंतर सर्व-शिव हो, तो उपमेय-उपमा कैसे?
श्लोक 2
अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं ननु कार्यविकार्यविहीनपरम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ २॥
avibhaktivibhaktivihīnaparaṃ nanu kāryavikāryavihīnaparam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ yajanaṃ ca kathaṃ tapanaṃ ca katham ॥ 2॥
श्लोक 3
मन एव निरन्तरसर्वगतं ह्यविशालविशालविहीनपरम् । मन एव निरन्तरसर्वशिवं मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ ३॥
mana eva nirantarasarvagataṃ hyaviśālaviśālavihīnaparam । mana eva nirantarasarvaśivaṃ manasāpi kathaṃ vacasā ca katham ॥ 3॥
श्लोक 4
दिनरात्रिविभेदनिराकरण\- मुदितानुदितस्य निराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ ४॥
dinarātrivibhedanirākaraṇa\- muditānuditasya nirākaraṇam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ ravicandramasau jvalanaśca katham ॥ 4॥
दिन-रात-विभेद निराकरण, उदित-अनुदित निराकरण। सूर्य-चन्द्र-अग्नि कैसे?
श्लोक 5
गतकामविकामविभेद इति गतचेष्टविचेष्टविभेद इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ ५॥
gatakāmavikāmavibheda iti gataceṣṭaviceṣṭavibheda iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ bahirantarabhinnamatiśca katham ॥ 5॥
श्लोक 6
यदि सारविसारविहीन इति यदि शून्यविशून्यविहीन इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं प्रथमं च कथं चरमं च कथम् ॥ ६॥
yadi sāravisāravihīna iti yadi śūnyaviśūnyavihīna iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ prathamaṃ ca kathaṃ caramaṃ ca katham ॥ 6॥
श्लोक 7
यदिभेदविभेदनिराकरणं यदि वेदकवेद्यनिराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम् ॥ ७॥
yadibhedavibhedanirākaraṇaṃ yadi vedakavedyanirākaraṇam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ tṛtīyaṃ ca kathaṃ turīyaṃ ca katham ॥ 7॥
श्लोक 8
गदिताविदितं न हि सत्यमिति विदिताविदितं न हि सत्यमिति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम् ॥ ८॥
gaditāviditaṃ na hi satyamiti viditāviditaṃ na hi satyamiti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ viṣayendriyabuddhimanāṃsi katham ॥ 8॥
श्लोक 9
गगनं पवनो न हि सत्यमिति धरणी दहनो न हि सत्यमिति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं जलदश्च कथं सलिलं च कथम् ॥ ९॥
gaganaṃ pavano na hi satyamiti dharaṇī dahano na hi satyamiti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ jaladaśca kathaṃ salilaṃ ca katham ॥ 9॥
श्लोक 10
यदि कल्पितलोकनिराकरणं यदि कल्पितदेवनिराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गुणदोषविचारमतिश्च कथम् ॥ १०॥
yadi kalpitalokanirākaraṇaṃ yadi kalpitadevanirākaraṇam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ guṇadoṣavicāramatiśca katham ॥ 10॥
श्लोक 11
मरणामरणं हि निराकरणं करणाकरणं हि निराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गमनागमनं हि कथं वदति ॥ ११॥
maraṇāmaraṇaṃ hi nirākaraṇaṃ karaṇākaraṇaṃ hi nirākaraṇam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ gamanāgamanaṃ hi kathaṃ vadati ॥ 11॥
श्लोक 12
प्रकृतिः पुरुषो न हि भेद इति न हि कारणकार्यविभेद इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं पुरुषापुरुषं च कथं वदति ॥ १२॥
prakṛtiḥ puruṣo na hi bheda iti na hi kāraṇakāryavibheda iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ puruṣāpuruṣaṃ ca kathaṃ vadati ॥ 12॥
श्लोक 13
तृतीयं न हि दुःखसमागमनं न गुणाद्द्वितीयस्य समागमनम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम् ॥ १३॥
tṛtīyaṃ na hi duḥkhasamāgamanaṃ na guṇāddvitīyasya samāgamanam । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ sthaviraśca yuvā ca śiśuśca katham ॥ 13॥
तीसरा नहीं, गुण-द्वितीय नहीं। वृद्ध, युव, शिशु कैसे?
श्लोक 14
ननु आश्रमवर्णविहीनपरं ननु कारणकर्तृविहीनपरम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव\- मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम् ॥ १४॥
nanu āśramavarṇavihīnaparaṃ nanu kāraṇakartṛvihīnaparam । yadi caikanirantarasarvaśiva\- mavinaṣṭavinaṣṭamatiśca katham ॥ 14॥
श्लोक 15
ग्रसिताग्रसितं च वितथ्यमिति जनिताजनितं च वितथ्यमिति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव\- मविनाशि विनाशि कथं हि भवेत् ॥ १५॥
grasitāgrasitaṃ ca vitathyamiti janitājanitaṃ ca vitathyamiti । yadi caikanirantarasarvaśiva\- mavināśi vināśi kathaṃ hi bhavet ॥ 15॥
श्लोक 16
पुरुषापुरुषस्य विनष्टमिति वनितावनितस्य विनष्टमिति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव\- मविनोदविनोदमतिश्च कथम् ॥ १६॥
puruṣāpuruṣasya vinaṣṭamiti vanitāvanitasya vinaṣṭamiti । yadi caikanirantarasarvaśiva\- mavinodavinodamatiśca katham ॥ 16॥
श्लोक 17
यदि मोहविषादविहीनपरो यदि संशयशोकविहीनपरः । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव\- महमत्र ममेति कथं च पुनः ॥ १७॥ महमेति
yadi mohaviṣādavihīnaparo yadi saṃśayaśokavihīnaparaḥ । yadi caikanirantarasarvaśiva\- mahamatra mameti kathaṃ ca punaḥ ॥ 17॥ mahameti
श्लोक 18
ननु धर्मविधर्मविनाश इति ननु बन्धविबन्धविनाश इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं\- मिहदुःखविदुःखमतिश्च कथम् ॥ १८॥
nanu dharmavidharmavināśa iti nanu bandhavibandhavināśa iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ\- mihaduḥkhaviduḥkhamatiśca katham ॥ 18॥
श्लोक 19
न हि याज्ञिकयज्ञविभाग इति न हुताशनवस्तुविभाग इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं वद कर्मफलानि भवन्ति कथम् ॥ १९॥
na hi yājñikayajñavibhāga iti na hutāśanavastuvibhāga iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ vada karmaphalāni bhavanti katham ॥ 19॥
श्लोक 20
ननु शोकविशोकविमुक्त इति ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ननु रागविरागमतिश्च कथम् ॥ २०॥
nanu śokaviśokavimukta iti nanu darpavidarpavimukta iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ nanu rāgavirāgamatiśca katham ॥ 20॥
श्लोक 21
न हि मोहविमोहविकार इति न हि लोभविलोभविकार इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम् ॥ २१॥
na hi mohavimohavikāra iti na hi lobhavilobhavikāra iti । yadi caikanirantarasarvaśivaṃ hyavivekavivekamatiśca katham ॥ 21॥
श्लोक 22
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि कुलजातिविचारमसत्यमिति । अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २२॥
tvamahaṃ na hi hanta kadācidapi kulajātivicāramasatyamiti । ahameva śivaḥ paramārtha iti abhivādanamatra karomi katham ॥ 22॥
आप-मैं कभी-नहीं, कुल-जाति-विचार असत्य। मैं ही शिव परमार्थ, अभिवादन कैसे?
श्लोक 23
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति उपदेशविचारविशीर्ण इति । अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २३॥
guruśiṣyavicāraviśīrṇa iti upadeśavicāraviśīrṇa iti । ahameva śivaḥ paramārtha iti abhivādanamatra karomi katham ॥ 23॥
श्लोक 24
न हि कल्पितदेहविभाग इति न हि कल्पितलोकविभाग इति । अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २४॥
na hi kalpitadehavibhāga iti na hi kalpitalokavibhāga iti । ahameva śivaḥ paramārtha iti abhivādanamatra karomi katham ॥ 24॥
श्लोक 25
सरजो विरजो न कदाचिदपि ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति । अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २५॥
sarajo virajo na kadācidapi nanu nirmalaniścalaśuddha iti । ahameva śivaḥ paramārtha iti abhivādanamatra karomi katham ॥ 25॥
सरज-विरज कभी-नहीं, निर्मल-निश्चल-शुद्ध। मैं ही शिव परमार्थ, अभिवादन कैसे?
श्लोक 26
न हि देहविदेहविकल्प इति अनृतं चरितं न हि सत्यमिति । अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २६॥
na hi dehavidehavikalpa iti anṛtaṃ caritaṃ na hi satyamiti । ahameva śivaḥ paramārtha iti abhivādanamatra karomi katham ॥ 26॥
श्लोक 27
विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र । समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ २७॥
vindati vindati na hi na hi yatra chandolakṣaṇaṃ na hi na hi tatra । samarasamagno bhāvitapūtaḥ pralapati tattvaṃ paramavadhūtaḥ ॥ 27॥
पाता-नहीं-पाता जहाँ, समरस-मग्न परम-अवधूत प्रलपति।

संगति

इस अध्याय का तर्क-शास्त्रीय-ढाँचा एक विशेष मूल्य रखता है। पूर्व-वर्ती चार-पाँच अध्याय अधिकांश-तौर पर घोषणा-स्तर पर थे। यह अध्याय थोड़ा-सा अधिक तकनीकी है। यह बार-बार पाठक से कहता है, “यह मानो, फिर इसका तार्किक परिणाम स्वीकार करो”। पाठक यह नहीं मान सकता तो उसका हक़ है, मगर मानने पर भेदों का धीरे-धीरे dissolve होना अपरिहार्य है।

एक रोचक पंक्ति श्लोक बारह की है, “प्रकृति-पुरुष न हि भेद इति, न हि कारण-कार्य-विभेद इति”। यह सांख्य-दर्शन की केन्द्रीय द्वैत-अवधारणा को directly chalenge करता है। सांख्य के लिए प्रकृति और पुरुष दो स्वतंत्र मूल हैं। अद्वैत-वेदान्त के लिए, और विशेष-रूप-से अवधूत गीता के लिए, यह विभाजन शुद्ध-तत्त्व-स्तर पर खड़ा नहीं रहता।

अध्याय का closing-श्लोक सत्ताईस वही “समरस-मग्न” signature है। तीसरे, चौथे, पाँचवें, अब छठे अध्याय में, एक ही पंक्ति। यह दोहराव एक संरचनात्मक रेखांकन है, हर अध्याय अपने आप में पूर्ण है, मगर सब एक ही व्यक्ति के स्वर से बोले गए हैं।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “avadhutagiitaa.itx” से।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।