अवधूत गीता
अध्याय 2 · आत्म-स्वरूप, खंड दो · श्लोक 1-38
पहले अध्याय में जो “मैं” बोल रहा था, वही यहाँ “वह” कह कर अपनी ओर संकेत करता है। तीस से सैंतीस तक एक ही पंक्ति बार-बार लौटती है, “तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्”, उस शाश्वत ईश-आत्मा को पा लेता है। हर श्लोक एक नया कोण, गन्तव्य वही।
संदर्भ
दत्तात्रेय का यह गान अद्वैत का सबसे निर्भय स्वर है। न कोई कोमलता, न कोई आड़। पहले अध्याय की धारा यहाँ आगे बढ़ती है, पर वाणी का रुख़ बदल जाता है। कहीं उत्तम-पुरुष में, कहीं अन्य-पुरुष में, “उस ईश को”, पर तत्त्व एक ही रहता है। तीस से सैंतीस तक “तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्” आठ बार लौट कर एक टेक बन जाती है।

अवधूत पहली ही साँस में मोल की बात तय कर देते हैं। वक्ता कौन है, यह मत पूछिए, बात क्या है यह देखिए। बालक हो, विषय में डूबा कोई हो, मूर्ख हो, सेवक हो या गृहस्थ, किसी का भी गुरु-वचन क्यों न हो, उसमें कुछ भी अचिन्तनीय नहीं रहता। मलिनता में पड़े रत्न को भला कौन त्याग देता है। रत्न जहाँ भी पड़ा हो, रत्न ही रहता है। और वह रत्न क्या है, वही जो बिना किसी प्रयत्न के, अपनी निश्चलता मात्र से, इस सारे चलते-फिरते जगत को ग्रस लेता है, जो स्वभाव से ही शान्त है, चैतन्य है, आकाश-सा निर्लेप है।
1 · 2
बालस्य वा विषयभोगरतस्य वापि मूर्खस्य सेवकजनस्य गृहस्थितस्य ।
एतद्गुरोः किमपि नैव न चिन्तनीयं रत्नं कथं त्यजति कोऽप्यशुचौ प्रविष्टम् ॥ 1 ॥
प्रयत्नेन विना येन निश्चलेन चलाचलम् ।
ग्रस्तं स्वभावतः शान्तं चैतन्यं गगनोपमम् ॥ 2 ॥
जिसे साधना से कमाना पड़े, वह बोध अभी अधूरा है। आत्म-स्वरूप श्रम का फल नहीं, सहज स्थिति है। फिर अवधूत एक तर्क की गाँठ खोलते हैं। जो अयत्न से ही इस एक चर-अचर को चलाता है, वह तो सर्वगत है। फिर वह हमसे भिन्न होकर अद्वैत कैसे रह सकता है। उसे अपने से अलग मान लेना ही तो द्वैत है। और इसीलिए वे बिना झिझक कह उठते हैं, हम ही परम हैं, क्योंकि हम सार से भी सारतर शिव हैं, आने-जाने से रहित, निर्विकल्प, निराकुल। सब कुछ निथार देने पर अन्त में जो शेष रह जाता है, वही तो आत्म-तत्त्व है।
3 · 4
अयत्नाच्चालयेद्यस्तु एकमेव चराचरम् ।
सर्वगं तत्कथं भिन्नमद्वैतं वर्तते मम ॥ 3 ॥
अहमेव परं यस्मात्सारात्सारतरं शिवम् ।
गमागमविनिर्मुक्तं निर्विकल्पं निराकुलम् ॥ 4 ॥
हम सब अवयवों से मुक्त हैं और देवों से पूजित हैं। पर पूर्ण होने के कारण त्रिदेव-आदि का कोई विभाग हम पर लागू ही नहीं होता, पूर्णता विभाजन को स्वीकार ही नहीं करती। प्रमाद का हमें कोई भय नहीं। वृत्तियों के साथ रहते हुए भी क्या करना है, वृत्तियाँ तो जल में बुदबुदों की भाँति आप ही उठती और आप ही मिटती रहती हैं। उनसे जूझना नहीं, बस साक्षी बने रहना है। महत्-तत्त्व से ले कर सब भूत सदा समाप्ति को प्राप्त होते रहते हैं, चाहे वे मृदु हों, तीक्ष्ण हों, मधुर हों या कटु। जो कभी समाप्त नहीं होता, वही आत्मा है।
5 · 6 · 7
सर्वावयवनिर्मुक्तं तथाहं त्रिदशार्चितम् ।
सम्पूर्णत्वान्न गृह्णामि विभागं त्रिदशादिकम् ॥ 5 ॥
प्रमादेन न सन्देहः किं करिष्यामि वृत्तिमान् ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते बुद्बुदाश्च यथा जले ॥ 6 ॥
महदादीनि भूतानि समाप्यैवं सदैव हि ।
मृदुद्रव्येषु तीक्ष्णेषु गुडेषु कटुकेषु च ॥ 7 ॥
एक उपमा से बात और साफ़ होती है। जैसे जल में कटुता, शीतलता और कोमलता जल से अलग नहीं, वैसे ही प्रकृति और पुरुष हमें एक ही अभिन्न तत्त्व दिखाई देते हैं, दोनों एक ही में समाए। वह तत्त्व सब नामों से रहित है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर परम है, मन–बुद्धि-इन्द्रियों से परे है, निर्दोष है, जगत् का स्वामी है। जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हो, वह किसी इन्द्रिय की पकड़ में आता ही नहीं। और जहाँ ऐसा सहज तत्त्व है, वहाँ “मैं” कैसे रहे, “आप” कैसे रहें, चर-अचर जगत कैसे रहे। सहज स्वरूप में ये तीनों भेद घुल जाते हैं, एक के सिवा कुछ बचता ही नहीं।
8 · 9 · 10
कटुत्वं चैव शैत्यत्वं मृदुत्वं च यथा जले ।
प्रकृतिः पुरुषस्तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ 8 ॥
सर्वाख्यारहितं यद्यत्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं परम् ।
मनोबुद्धीन्द्रियातीतमकलङ्कं जगत्पतिम् ॥ 9 ॥
ईदृशं सहजं यत्र अहं तत्र कथं भवेत् ।
त्वमेव हि कथं तत्र कथं तत्र चराचरम् ॥ 10 ॥
जिसे “गगन-समान” कहा, वह कोई शब्द-भर नहीं, वह वस्तुतः गगन-समान ही है, चैतन्य, निर्दोष, सर्वज्ञ, पूर्ण। आकाश की उपमा यहाँ सच होती है, वह सचमुच आकाश-सा निर्लेप, अनन्त और निर्दोष है। चार स्थूल भूत उस तक पहुँचते ही नहीं, वह न पृथ्वी पर चलता है, न वायु से उड़ता है, न जल से ढका जाता है, न तेज के बीच स्थित होता है। उसका धाम तो पाँचवाँ, आकाश-तत्त्व ही है। और देखिए कैसी उलटी बात, आकाश तक उससे व्याप्त है, पर वह किसी से व्याप्त नहीं होता। वह भीतर-बाहर अखण्ड और निरन्तर स्थित रहता है, सबमें व्यापक, पर स्वयं किसी का व्याप्य नहीं।
11 · 12 · 13
गगनोपमं तु यत्प्रोक्तं तदेव गगनोपमम् ।
चैतन्यं दोषहीनं च सर्वज्ञं पूर्णमेव च ॥ 11 ॥
पृथिव्यां चरितं नैव मारुतेन च वाहितम् ।
वारिणा पिहितं नैव तेजोमध्ये व्यवस्थितम् ॥ 12 ॥
आकाशं तेन संव्याप्तं न तद्व्याप्तं च केनचित् ।
स बाह्याभ्यन्तरं तिष्ठत्यवच्छिन्नं निरन्तरम् ॥ 13 ॥
इतने सूक्ष्म तत्त्व को सीधे पकड़ना कठिन है, इसी से योगियों ने आलम्बन-आदि साधन बताए। वह आधार भी क्रम-क्रम से ही सिद्ध होता है, सहारा एकदम नहीं फलता। पर साधना की पराकाष्ठा है उसी सहारे का छूट जाना। सतत अभ्यास से युक्त साधक जब आधार-रहित हो जाता है, तब उस लय में लीन होकर भीतर गुण-दोष से रहित हो जाता है। जब सहारा भी गिर पड़ता है, तब केवल स्वरूप शेष रहता है। और इस संसार का जो विष मोह और मूर्च्छा में डालता है, इस रौद्र विष-रूप विश्व के नाश का एक ही अमोघ उपाय है, सहज अमृत, सहज आत्म-बोध।
14 · 15 · 16
सूक्ष्मत्वात्तददृश्यत्वान्निर्गुणत्वाच्च योगिभिः ।
आलम्बनादि यत्प्रोक्तं क्रमादालम्बनं भवेत् ॥ 14 ॥
सतताऽभ्यासयुक्तस्तु निरालम्बो यदा भवेत् ।
तल्लयाल्लीयते नान्तर्गुणदोषविवर्जितः ॥ 15 ॥
विषविश्वस्य रौद्रस्य मोहमूर्च्छाप्रदस्य च ।
एकमेव विनाशाय ह्यमोघं सहजामृतम् ॥ 16 ॥
अब एक सुन्दर रूपक आता है, नारियल का। निराकार भाव से ग्राह्य है और साकार दृष्टि से दिखता है। जो भाव और अभाव दोनों से मुक्त है, वही “अन्तराल” कहलाता है, साकार और निराकार के बीच की वह निर्द्वन्द्व स्थिति, जहाँ चित्त को टिकाना है। बाहरी रूप यह विश्व है, भीतर प्रकृति कही जाती है, और नारियल-फल के भीतर के जल की भाँति, भीतर से और भीतर के तत्त्व को जानना चाहिए। नारियल में छिलका, गिरी और जल, तीन परतें हैं, और आत्म-तत्त्व सबसे भीतर का वह जल है। उसी तरह भ्रान्ति-ज्ञान बाहर रहता है, सम्यक्-ज्ञान मध्य में, और मध्य से भी मध्यतर तत्त्व को जानना है। सम्यक्-ज्ञान भी अन्तिम पड़ाव नहीं, उससे भी भीतर, जो उसका भी सार है, वहीं तक पहुँचना है।
17 · 18 · 19
भावगम्यं निराकारं साकारं दृष्टिगोचरम् ।
भावाभावविनिर्मुक्तमन्तरालं तदुच्यते ॥ 17 ॥
बाह्यभावं भवेद्विश्वमन्तः प्रकृतिरुच्यते ।
अन्तरादन्तरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत् ॥ 18 ॥
भ्रान्तिज्ञानं स्थितं बाह्यं सम्यग्ज्ञानं च मध्यगम् ।
मध्यान्मध्यतरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत् ॥ 19 ॥
पूर्णिमा का चन्द्र एक ही अति-निर्मल होता है। उसे वैसा ही एक देखना चाहिए, एक ही तत्त्व को दो रूप में देख लेना भ्रम है, एक देखना ही यथार्थ दृष्टि है। इसी रीति से बुद्धि का भेद सब जगह व्याप्त नहीं रहता। भेद की समझ बढ़े तो भी मूल तत्त्व एक ही रहता है, और जो धैर्य को प्राप्त कर लेता है, वही करोड़ों नामों से गाया जाता है, उसी एक के असंख्य नाम हैं। यहाँ बुद्धि का स्तर निर्णायक नहीं। गुरु-प्रज्ञा के प्रसाद से, चाहे मूर्ख हो या पण्डित, जो तत्त्व को जान ले, वही संसार-सागर से विरक्त होता है। जिसे गुरु-कृपा से तत्त्व-बोध हुआ, उसी की विरक्ति यथार्थ है।
20 · 21 · 22
पौर्णमास्यां यथा चन्द्र एक एवातिनिर्मलः ।
तेन तत्सदृशं पश्येद्द्विधादृष्टिर्विपर्ययः ॥ 20 ॥
अनेनैव प्रकारेण बुद्धिभेदो न सर्वगः ।
दाता च धीरतामेति गीयते नामकोटिभिः ॥ 21 ॥
गुरुप्रज्ञाप्रसादेन मूर्खो वा यदि पण्डितः ।
यस्तु सम्बुध्यते तत्त्वं विरक्तो भवसागरात् ॥ 22 ॥
ऐसा ज्ञानी कैसा होता है। राग-द्वेष से मुक्त, सब प्राणियों के हित में रत, दृढ़-बोध वाला और धीर, वही परम पद को प्राप्त करता है। वह केवल अपने बोध में सिमट कर नहीं रहता, सब प्राणियों के हित में उसकी सहज स्थिति होती है। और उसका अन्त कैसा। जैसे घड़ा फूटने पर भीतर का घटाकाश महाकाश में लीन हो जाता है, वैसे ही देह के अभाव में योगी अपने स्वरूप परमात्मा में लीन हो जाता है। घट के भीतर का आकाश तो टूटने से पहले भी महाकाश ही था, देह टूटी तो “मैं” वही परम-आकाश रह जाता है।
23 · 24
रागद्वेषविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः ।
दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत्परमं पदम् ॥ 23 ॥
घटे भिन्ने घटाकाश आकाशे लीयते यथा ।
देहाभावे तथा योगी स्वरूपे परमात्मनि ॥ 24 ॥
अब अवधूत दो मार्गों में भेद करते हैं। यह मति जो अभी कही गई, यह कर्म-युक्तों के लिए है, अन्त में वही उनकी गति बनती है। योग-युक्तों के लिए ऐसी कोई मति या गति कही ही नहीं गई। कर्म-मार्ग वालों के लिए शास्त्र मति और गति का वर्णन करते हैं, योग-मार्ग वालों के लिए वर्णन नहीं, केवल अनुभव शेष है। कर्म-युक्तों की जो गति है, उसे वाणी कह सकती है, पर योगियों की गति तो अकथ्य है, परम बलवती। योगियों की मंज़िल किसी शब्द में नहीं समाती, वहाँ वाणी लौट आती है।
25 · 26
उक्तेयं कर्मयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः ।
न चोक्ता योगयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः ॥ 25 ॥
या गतिः कर्मयुक्तानां सा च वागिन्द्रियाद्वदेत् ।
योगिनां या गतिः क्वापि ह्यकथ्या भवतोर्जिता ॥ 26 ॥
ऐसा जान कर यह समझ लेना चाहिए कि योगियों का यह मार्ग कल्पित नहीं है। उन्हें सिद्धि कमाने का श्रम नहीं करना पड़ता, विकल्प छोड़ देने पर सिद्धि स्वयं ही प्रवृत्त हो जाती है, विकल्प हटते ही वह अपने आप उतर आती है। और देश-काल का भी उस पर बंधन नहीं, तीर्थ में हो या चाण्डाल के घर में, कहीं भी मरे, योगी फिर गर्भ नहीं देखता और पर-ब्रह्म में लीन हो जाता है। “गर्भ नहीं देखता” का अर्थ है पुनर्जन्म नहीं, मृत्यु का स्थान चाहे जो हो, उसकी गति एक ही है।
27 · 28
एवं ज्ञात्वा त्वमुं मार्गं योगिनां नैव कल्पितम् ।
विकल्पवर्जनं तेषां स्वयं सिद्धिः प्रवर्तते ॥ 27 ॥
तीर्थे वान्त्यजगेहे वा यत्र कुत्र मृतोऽपि वा ।
न योगी पश्यते गर्भं परे ब्रह्मणि लीयते ॥ 28 ॥
अब निर्भयता अपने शिखर पर पहुँचती है। जो सहज, अजन्मा, अचिन्त्य स्वरूप को देख ले, वह जैसा भी आचरण करे, दोषों से लिप्त नहीं होता। एक भी कर्म न करे, तब भी वह न बद्ध है, न संयमी, न तपस्वी। कर्म करे या न करे, स्वरूप को जानने वाला उससे अछूता रहता है, संयम और तप के लेबल भी उस पर नहीं चिपकते। और यहीं से वह टेक आरम्भ होती है जो सैंतीसवें श्लोक तक आठ बार लौटेगी। वह तत्त्व निरामय है, अनुपम है, निराकार, निराश्रय, देहरहित, कामनारहित, निर्द्वन्द्व, निर्मोह और अक्षय-शक्ति वाला, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। हर श्लोक यहाँ से एक-एक उपाधि छीनता जाएगा, और अन्त में वही शाश्वत आत्मा शेष रहेगी।
29 · 30
सहजमजमचिन्त्यं यस्तु पश्येत्स्वरूपं घटति यदि यथेष्टं लिप्यते नैव दोषैः ।
सकृदपि तदभावात्कर्म किञ्चिन्नकुर्यात् तदपि न च विबद्धः संयमी वा तपस्वी ॥ 29 ॥
निरामयं निष्प्रतिमं निराकृतिं निराश्रयं निर्वपुषं निराशिषम् ।
निर्द्वन्द्वनिर्मोहमलुप्तशक्तिकं तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 30 ॥
देखिए अब उपाधियाँ कैसे एक-एक गिरती हैं। जहाँ न वेद है, न दीक्षा, न मुण्डन-क्रिया, न गुरु, न शिष्य, न यन्त्र-सम्पदा, और न मुद्रा-आदि भी भासते हैं, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। सब बाह्य विधि-विधान वहाँ शान्त हो जाते हैं। तन्त्र की तीनों उपाय-धाराएँ भी वहीं रुक जाती हैं, जहाँ न शाम्भव उपाय है, न शाक्त, न आणव, न पिण्ड, रूप, पद-आदि, न आरम्भ-निष्पत्ति-घट-आदि अवस्थाएँ, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। उपायों के पार ही वह तत्त्व है।
31 · 32
वेदो न दीक्षा न च मुण्डनक्रिया गुरुर्न शिष्यो न च यन्त्रसम्पदः ।
मुद्रादिकं चापि न यत्र भासते तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 31 ॥
न शाम्भवं शाक्तिकमानवं न वा पिण्डं च रूपं च पदादिकं न वा ।
आरम्भनिष्पत्तिघटादिकं च नो तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 32 ॥
फिर एक और उपमा, दूध की। जैसे दूध के विकार से फेन और बुदबुदे उठते हैं, वैसे ही जिसके स्वरूप से चर-अचर जगत उत्पन्न, स्थित और लीन होता है, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। दूध से दही बने, फेन बने, बुदबुदे बनें, सब रहते दूध ही हैं, उसी तरह यह सारा जगत अपने मूल में ब्रह्म ही है। और योग की सब प्रक्रियाएँ भी अन्ततः वहाँ छूट जाती हैं, जहाँ न नासा-निरोध है, न दृष्टि या आसन, न बोध, न अबोध भासता है, न कोई नाड़ी-संचार है, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। तकनीक की पकड़ से परे ही वह स्थिति है।
33 · 34
यस्य स्वरूपात्सचराचरं जग- दुत्पद्यते तिष्ठति लीयतेऽपि वा ।
पयोविकारादिव फेनबुद्बुदा- स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 33 ॥
नासानिरोधो न च दृष्टिरासनं बोधोऽप्यबोधोऽपि न यत्र भासते ।
नाडीप्रचारोऽपि न यत्र किञ्चि- त्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 34 ॥
गिनती और माप के सब जोड़े भी वहाँ ढह जाते हैं। जो नानात्व, एकत्व, उभयत्व और अन्यता से रहित है, अणुत्व, दीर्घत्व, महत्त्व और शून्यता से रहित है, मापने वाले, मेय और समता से रहित है, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। न एक न अनेक, न छोटा न बड़ा, ऐसा निरुपाधि तत्त्व। और बाह्य आचरण भी उसकी प्राप्ति में न बाधक है न साधक। सुसंयमी हो या असंयमी, सुसंग्रही हो या असंग्रही, निष्कर्म हो या सकर्म, ऐसा साधक उस शाश्वत ईश-आत्मा को पा लेता है। भीतर का बोध ही निर्णायक है।
35 · 36
नानात्वमेकत्वमुभत्वमन्यता अणुत्वदीर्घत्वमहत्त्वशून्यता ।
मानत्वमेयत्वसमत्ववर्जितं तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 35 ॥
सुसंयमी वा यदि वा न संयमी सुसङ्ग्रही वा यदि वा न सङ्ग्रही ।
निष्कर्मको वा यदि वा सकर्मक- स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 36 ॥
अब टेक अपनी आख़िरी और सबसे सघन उपाधि-त्याग पर आती है। जो न मन है, न बुद्धि, न शरीर, न इन्द्रिय, न तन्मात्र, न पंचभूत, न अहंकार, बल्कि स्वयं आकाश-स्वरूप है, उस शाश्वत ईश-आत्मा को साधक पा लेता है। एक-एक उपाधि छूटने पर जो मूल स्वरूप रह जाता है, वह आकाश-सा निर्लेप है। और अन्तिम श्लोक में शास्त्र का विधि और निषेध का जोड़ा भी टूट जाता है। विधि और निरोध के परमात्म-भाव में लीन हो जाने पर, योगी के भेद-रहित चित्त में न शौच रहता है, न अशौच, उस लिंग-रहित भावना में सब विधेय और निषिद्ध एकाकार हो जाते हैं। जहाँ भेद ही नहीं, वहाँ करना और न करना अलग नहीं रहते।
37 · 38
मनो न बुद्धिर्न शरीरमिन्द्रियं तन्मात्रभूतानि न भूतपञ्चकम् ।
अहङ्कृतिश्चापि वियत्स्वरूपकं तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ 37 ॥
विधौ निरोधे परमात्मतां गते न योगिनश्चेतसि भेदवर्जिते ।
शौचं न वाशौचमलिङ्गभावना सर्वं विधेयं यदि वा निषिध्यते ॥ 38 ॥
आगे
इसके बाद अध्याय तीन, जहाँ “मैं” का अद्वैत और सूक्ष्म होकर खुलता है।
तीस से सैंतीस तक की टेक “तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्” इस खंड का सार है। एक-एक उपाधि के गिरते जाने पर अन्त में जो शाश्वत आत्मा शेष रहती है, यही अवधूत गीता का गन्तव्य है।