सातवाँ अध्याय छोटा है, केवल पन्द्रह श्लोक। मगर इसका विषय बड़ा है, अवधूत आदमी का बाह्य आचरण कैसा होता है।
पहले श्लोक की पंक्ति अप्रत्याशित है, “रथ्या-कर्पट-विरचित-कन्थः, पुण्य-अपुण्य-वर्जित-पन्थः”। यानी “वो सड़क पर पड़े-मिले कपड़ों के टुकड़ों से सिली एक कन्था पहने हुए चलता है, पुण्य-पाप के सब रास्तों से बाहर”। बीस-पच्चीस शब्दों में पूरा-portrait। शून्य-गृह में अकेला, नग्न, शुद्ध-निरंजन-समरस-मग्न। यह एक प्रकार का radical-तपस्या-चित्र है, मगर इसमें कठोरता नहीं है, एक हल्की-सी मुस्कान-जैसी शान्ति है।
शेष श्लोक उसी चित्र के अलग-अलग कोण हैं। योग-वियोग-रहित यो-योगी, भोग-विभोग-रहित भोगी, मन्द-मन्द चलता हुआ, मन से कल्पित सहज-आनन्द। यह एक भारतीय-कथा-साहित्य का परिचित-archetype है, बौद्ध-भिक्षु से लेकर शैव-नागा से लेकर सिख-निहंग तक, कुछ ऐसे-ही व्यक्ति इस archetype की प्रतिध्वनि हैं।
अवधूत-आचरण की परम्परा भारत में आज भी जीवित है, हालाँकि सबसे विरल रूप में। नागा-साधु, अघोरी, और औघड़-संप्रदाय इस-आचरण की भिन्न-शाखाएँ हैं। उनकी संख्या काशी और इलाहाबाद के कुम्भ-मेले के समय सबसे अधिक दिखती है। अनुष्ठानिक-रूप से, यह आचरण आज भी कठोर है, और इसके भीतर रहने वाले लोग अपनी पहचान सामाजिक-व्यवस्था से बाहर ले जाते हैं।
15 श्लोक
श्लोक 1रथ्याकर्पटविरचितकन्थः
पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नो
शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ १॥
rathyākarpaṭaviracitakanthaḥ
puṇyāpuṇyavivarjitapanthaḥ ।
śūnyāgāre tiṣṭhati nagno śuddhanirañjanasamarasamagnaḥ ॥ 1॥
सड़क पर पड़े कपड़ों से सिली कन्था, पुण्य-अपुण्य-वर्जित पथ। शून्य-गृह में नग्न, शुद्ध-निरंजन-समरस-मग्न।
श्लोक 2लक्ष्यालक्ष्यविवर्जितलक्ष्यो
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो
वादविवादः कथमवधूतः ॥ २॥
lakṣyālakṣyavivarjitalakṣyo
yuktāyuktavivarjitadakṣaḥ ।
kevalatattvanirañjanapūto vādavivādaḥ kathamavadhūtaḥ ॥ 2॥
लक्ष्य-अलक्ष्य-वर्जित-लक्ष्य, युक्त-अयुक्त-वर्जित-दक्ष। केवल-तत्त्व-निरंजन-पूत, वाद-विवाद कैसे अवधूत?
श्लोक 3आशापाशविबन्धनमुक्ताः
शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।
एवं सर्वविवर्जितशान्ता\-
स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ ३॥
āśāpāśavibandhanamuktāḥ
śaucācāravivarjitayuktāḥ ।
evaṃ sarvavivarjitaśāntā\- stattvaṃ śuddhanirañjanavantaḥ ॥ 3॥
श्लोक 4कथमिह देहविदेहविचारः
कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं
स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ ४॥
kathamiha dehavidehavicāraḥ
kathamiha rāgavirāgavicāraḥ ।
nirmalaniścalagaganākāraṃ svayamiha tattvaṃ sahajākāram ॥ 4॥
श्लोक 5कथमिह तत्त्वं विन्दति यत्र
रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र
विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ ५॥
kathamiha tattvaṃ vindati yatra
rūpamarūpaṃ kathamiha tatra ।
gaganākāraḥ paramo yatra viṣayīkaraṇaṃ kathamiha tatra ॥ 5॥
श्लोक 6गगनाकारनिरन्तरहंस\-
स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं
बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६॥
gaganākāranirantarahaṃsa\-
stattvaviśuddhanirañjanahaṃsaḥ ।
evaṃ kathamiha bhinnavibhinnaṃ bandhavibandhavikāravibhinnam ॥ 6॥
श्लोक 7केवलतत्त्वनिरन्तरसर्वं
योगवियोगौ कथमिह गर्वम् ।
एवं परमनिरन्तरसर्व\-
मेवं कथमिह सारविसारम् ॥ ७॥
kevalatattvanirantarasarvaṃ
yogaviyogau kathamiha garvam ।
evaṃ paramanirantarasarva\- mevaṃ kathamiha sāravisāram ॥ 7॥
श्लोक 8केवलतत्त्वनिरञ्जनसर्वं
गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ।
एवं कथमिह सङ्गविसङ्गं
सत्यं कथमिह रङ्गविरङ्गम् ॥ ८॥
kevalatattvanirañjanasarvaṃ
gaganākāranirantaraśuddham ।
evaṃ kathamiha saṅgavisaṅgaṃ satyaṃ kathamiha raṅgaviraṅgam ॥ 8॥
श्लोक 9योगवियोगै रहितो योगी
भोगविभोगै रहितो भोगी ।
एवं चरति हि मन्दं मन्दं
मनसा कल्पितसहजानन्दम् ॥ ९॥
yogaviyogai rahito yogī
bhogavibhogai rahito bhogī ।
evaṃ carati hi mandaṃ mandaṃ manasā kalpitasahajānandam ॥ 9॥
योग-वियोग-रहित यो-योगी, भोग-विभोग-रहित भोगी। मन्द-मन्द चलता, मन से कल्पित सहज-आनन्द।
श्लोक 10बोधविबोधैः सततं युक्तो
द्वैताद्वैतैः कथमिह मुक्तः ।
सहजो विरजः कथमिह योगी
शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी ॥ १०॥
bodhavibodhaiḥ satataṃ yukto
dvaitādvaitaiḥ kathamiha muktaḥ ।
sahajo virajaḥ kathamiha yogī śuddhanirañjanasamarasabhogī ॥ 10॥
श्लोक 11भग्नाभग्नविवर्जितभग्नो
लग्नालग्नविवर्जितलग्नः ।
एवं कथमिह सारविसारः
समरसतत्त्वं गगनाकारः ॥ ११॥
bhagnābhagnavivarjitabhagno
lagnālagnavivarjitalagnaḥ ।
evaṃ kathamiha sāravisāraḥ samarasatattvaṃ gaganākāraḥ ॥ 11॥
श्लोक 12सततं सर्वविवर्जितयुक्तः
सर्वं तत्त्वविवर्जितमुक्तः ।
एवं कथमिह जीवितमरणं
ध्यानाध्यानैः कथमिह करणम् ॥ १२॥
satataṃ sarvavivarjitayuktaḥ
sarvaṃ tattvavivarjitamuktaḥ ।
evaṃ kathamiha jīvitamaraṇaṃ dhyānādhyānaiḥ kathamiha karaṇam ॥ 12॥
श्लोक 13इन्द्रजालमिदं सर्वं यथा मरुमरीचिका ।
अखण्डितमनाकारो वर्तते केवलः शिवः ॥ १३॥
indrajālamidaṃ sarvaṃ yathā marumarīcikā ।
akhaṇḍitamanākāro vartate kevalaḥ śivaḥ ॥ 13॥
इन्द्रजाल यह सब, जैसे मरु-मरीचिका। अखण्डित, अनाकार, केवल शिव वर्तता।
श्लोक 14धर्मादौ मोक्षपर्यन्तं निरीहाः सर्वथा वयम् ।
कथं रागविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः ॥ १४॥
dharmādau mokṣaparyantaṃ nirīhāḥ sarvathā vayam ।
kathaṃ rāgavirāgaiśca kalpayanti vipaścitaḥ ॥ 14॥
धर्म से मोक्ष तक सब के लिए हम निरीह। राग-विराग कैसे कल्पित विद्वान?
श्लोक 15विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र
छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ १५॥
vindati vindati na hi na hi yatra
chandolakṣaṇaṃ na hi na hi tatra ।
samarasamagno bhāvitapūtaḥ pralapati tattvaṃ paramavadhūtaḥ ॥ 15॥
पाता-नहीं-पाता जहाँ, समरस-मग्न परम-अवधूत प्रलपति।
संगति
श्लोक चौदह की पंक्ति इस अध्याय की सबसे ऊँची है, “धर्म-आदौ मोक्ष-पर्यन्तं निरीहाः सर्वथा वयम्”। यानी “धर्म से लेकर मोक्ष तक, हम पूरी तरह निरीह (बिना-इच्छा) हैं”। यह सबसे radical-घोषणा है। पारम्परिक हिन्दू-धर्म-शास्त्र चार पुरुषार्थ बताता है, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष। दत्तात्रेय कहते हैं कि अवधूत इन-चारों से ऊपर है, मोक्ष भी एक प्रकार की कामना है, और अवधूत उससे भी मुक्त।
इस अध्याय का व्यवहार-मूल्य भी है। आज भी भारत में नागा-साधु, अघोरी, औघड़, और कुछ-छिटपुट चार्मरत्न-परम्पराओं में यह आचरण जीवित है। पर्यवेक्षक इसे विक्षिप्त समझ सकता है, मगर परम्परा के भीतर देखने वाला इसे एक specific-अनुशासन के रूप में पहचानता है।
श्लोक पन्द्रह वही signature है, “समरस-मग्न भावित-पूत प्रलपति तत्त्वं परम-अवधूत”। अध्याय यहीं पर शान्त होता है, और आठवाँ अध्याय एक अलग tone में खुलता है, अवधूत-शब्द के व्याकरण-विश्लेषण के साथ।