अवधूत गीता
अध्याय 7 · अवधूत-लक्षण
बाहर रास्ते के चीथड़ों की एक गोदड़ी, सिर पर कोई छत नहीं, और भीतर शुद्ध-निरंजन समरस में पूरी तरह डूबा हुआ चित्त। यही अवधूत है। उसका वेश कुछ भी कह दे, भीतर एक ही समता बहती रहती है, और इसी अध्याय में दत्तात्रेय हमें उस समता के एक-एक लक्षण से मिलाते हैं।
सबसे पहले अवधूत का वह रूप सामने आता है जिसमें न कोई दिखावा है, न संग्रह। तन पर रास्ते में पड़े चीथड़ों से बनी गोदड़ी, पैरों के नीचे वह पथ जो पुण्य और अपुण्य के भेद से रहित है, और रहने को कोई खाली घर, जहाँ वह नग्न-स्थित भीतर के समरस में डूबा रहता है। उसका आचरण न पुण्य की कामना से चलता है, न पाप के भय से, क्योंकि भीतर जो बहता है वह दोनों के पार है। फिर एक प्रश्न उठता है। जिसके लिए साधने योग्य और न-साधने योग्य का भेद ही मिट गया, उसका कोई निशाना शेष नहीं रहता; उसके पास सिद्ध करने को कुछ बचा ही नहीं। वाद-विवाद के लिए दो पक्ष चाहिए, और जहाँ केवल तत्त्व विद्यमान है वहाँ दूसरा पक्ष ही नहीं। तब अवधूत के लिए वाद-विवाद कैसा।

1 · 2
रथ्याकर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नो शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ 1 ॥
लक्ष्यालक्ष्यविवर्जितलक्ष्यो युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो वादविवादः कथमवधूतः ॥ 2 ॥
अब वही समता और गहरी होती जाती है। अवधूत आशा के पाश–बंधन से मुक्त है, और शौच-आचार के नियमों से रहित होकर भी युक्त है, क्योंकि उसकी शुद्धता बाहरी विधि से नहीं, भीतर से सहज उठती है। यह नियमों का तिरस्कार नहीं, अनुशासन के उस पार पहुँचना है जहाँ अनुशासन स्वभाव बन चुका है। इसी से वह सब से रहित और शांत है, स्वयं तत्त्व-रूप, शुद्ध-निरंजन। जो इस सहज तत्त्व में टिका है, उसके भीतर तौलने को कुछ शेष नहीं रहता। तब देह और विदेह का विचार कैसा, राग और विराग का विचार कैसा। यह तत्त्व किसी ने गढ़ा नहीं, यह स्वयं-सिद्ध है, निर्मल, निश्चल, आकाश के समान, अपने सहज आकार में विद्यमान।
3 · 4
आशापाशविबन्धनमुक्ताः शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।
एवं सर्वविवर्जितशान्ता-स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ 3 ॥
कथमिह देहविदेहविचारः कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ 4 ॥
जहाँ तत्त्व को कोई पा लेता है, वहाँ रूप और अरूप का भेद कैसे टिके। विषयी-करण का अर्थ है किसी वस्तु को अपने सामने रखकर अलग कर देना; पर आत्मा को इस तरह विषय बनाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि वही जानने वाला है और वही जाना जाने वाला, दोनों उसी परम गगन-आकार में समा जाते हैं। यहाँ हंस का प्रतीक उठता है। हंस आत्मा का प्राचीन चिह्न है, उपनिषद् में अहं स से, अर्थात् हम वही, गढ़ा हुआ। यह हंस आकाश की तरह निरंतर और निर्लेप है, तत्त्व से विशुद्ध, निरंजन। जो आकाश-समान है उस पर बंधन और मुक्ति, दोनों के विकार छू भी नहीं पाते। तब भिन्न और अभिन्न का भेद वहाँ कैसा।
5 · 6
कथमिह तत्त्वं विन्दति यत्र रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ 5 ॥
गगनाकारनिरन्तरहंस-स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ 6 ॥
केवल-तत्त्व-निरंजन ही सब कुछ है, आकाश के समान निरंतर शुद्ध। रंग का अर्थ है मन की रंगत, उसकी बदलती दशाएँ; हर्ष और विषाद, राग और द्वेष की रंगतें मन में उठती-गिरती रहती हैं, पर आत्मा रंग से छूटी हुई है। जिसमें कोई रंग चढ़ता ही नहीं, उसमें संग और निःसंग का प्रश्न कहाँ। यहीं अवधूत की चाल भी अद्वैत बोल उठती है। मंद-मंद का अर्थ है इतमीनान से, बिना किसी हड़बड़ी। वह न पक्के योगी की तरह चलता है, न भोगी की तरह; योग-वियोग से रहित योगी, भोग-विभोग से रहित भोगी, दोनों एक ही सहज गति में घुल जाते हैं, और सहज-आनंद उसके हर कदम के साथ बहता रहता है।
7 · 8
केवलतत्त्वनिरञ्जनसर्वं गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ।
एवं कथमिह सङ्गविसङ्गं सत्यं कथमिह रङ्गविरङ्गम् ॥ 7 ॥
योगवियोगै रहितो योगी भोगविभोगै रहितो भोगी ।
एवं चरति हि मन्दं मन्दं मनसा कल्पितसहजानन्दम् ॥ 8 ॥
अगला श्लोक चकित कर देता है। बोध और अबोध, दोनों से सदा युक्त रहते हुए भी अवधूत मुक्त है। उच्च अद्वैत में जब साधक जोड़ों के पार चला जाता है, तब दोनों के साथ होना और दोनों से बाहर होना एक ही बात रह जाती है; वहाँ योगी और भोग, मुक्ति और बंधन की रेखाएँ मिट जाती हैं। वह सहज है, रज से रहित, शुद्ध-निरंजन-समरस का भोगी। फिर भी एक प्रश्न लौटता है। लग्न का अर्थ है जुड़ा हुआ, अटका हुआ; साधक का मन कहीं न कहीं अटका रहता है, किसी विचार, किसी वस्तु, किसी अवस्था से। पर अवधूत किसी जोड़े से न जुड़ा है, न उससे छूटा हुआ, क्योंकि उसके भीतर जोड़ा बना ही नहीं रहता। तब सार और असार कैसा, जब तत्त्व सम-रस और आकाश के समान है।
9 · 10
बोधविबोधैः सततं युक्तो द्वैताद्वैतैः कथमिह मुक्तः ।
सहजो विरजः कथमिह योगी शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी ॥ 9 ॥
भग्नाभग्नविवर्जितभग्नो लग्नालग्नविवर्जितलग्नः ।
एवं कथमिह सारविसारः समरसतत्त्वं गगनाकारः ॥ 10 ॥
सदा सब से रहित होकर युक्त, सब तत्त्व से रहित होकर मुक्त। ध्यान भी एक साधन है, एक करण; पर अंतिम स्थिति में किसी साधन की आवश्यकता नहीं रहती। साधन वहीं तक काम आता है जहाँ तक साध्य दूर और अलग दिखाई देता है। अवधूत में साध्य और साधन का भेद ही नहीं बचता, इसलिए ध्यान करना या न करना समान हो जाता है, और जीवन तथा मरण भी वहाँ कोई प्रश्न नहीं रह जाते। फिर एक ही दृष्टि से सारा जगत् खुल जाता है। इन्द्रजाल जादूगर का दिखाया हुआ दृश्य है, आँखों के सामने प्रकट तो होता है पर उसमें कोई सत्ता नहीं; यह सारा जगत् भी ऐसे ही उठता-दिखता है, मरुस्थल की मरीचिका के समान। असली केवल शिव हैं, जो खंडों में बँटते नहीं और किसी आकार में बँधते नहीं। अद्वैत वेदान्त का माया-सिद्धांत यहाँ एक ही श्लोक में सिमट आता है।
11 · 12
सततं सर्वविवर्जितयुक्तः सर्वं तत्त्वविवर्जितमुक्तः ।
एवं कथमिह जीवितमरणं ध्यानाध्यानैः कथमिह करणम् ॥ 11 ॥
इन्द्रजालमिदं सर्वं यथा मरुमरीचिका ।
अखण्डितमनाकारो वर्तते केवलः शिवः ॥ 12 ॥
अब दत्तात्रेय एक बार हम सबकी ओर से बोल उठते हैं। धर्म से लेकर मोक्ष तक, हम सर्वथा निरीह हैं, इच्छा-रहित। विपश्चित् वह है जो शास्त्र पढ़कर ज्ञानी कहलाता है, पर ऐसा पंडित भी कल्पना में ही उलझा रहता है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थ अंततः कल्पना ठहरते हैं। तब वे विद्वान् राग और विराग की कल्पना कैसे करते हैं। सच्चा निरीह वही है जो इनमें से किसी की भी कामना अपने भीतर नहीं रखता। और यहीं इन चार अध्यायों का, चार-पाँच-छह और सात का, एक ही हस्ताक्षर लौट आता है। जहाँ पाना और न पाना दोनों नहीं रहते, वहाँ छंद का कोई नियम भी नहीं टिकता। समरस में डूबा अवधूत काव्य के नियमों की चिंता नहीं करता; उसकी वाणी तत्त्व के उमड़ने से अपने आप बह निकलती है, और उसी बहाव को वह स्वयं प्रलाप कहकर रख देता है।
13 · 14
धर्मादौ मोक्षपर्यन्तं निरीहाः सर्वथा वयम् ।
कथं रागविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः ॥ 13 ॥
विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ 14 ॥
आगे
अध्याय 8: अवधूत-स्थिति का गान, संक्षिप्त समापन, और अव-धू-त इन तीन अक्षरों का अर्थ।