76 श्लोक, श्लोक-दर-श्लोक
श्लोक 1Ishvar-anugrahईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना ।
महद्भयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते ॥ १॥
īśvarānugrahādeva puṃsāmadvaitavāsanā ।
mahadbhayaparitrāṇādviprāṇāmupajāyate ॥ 1॥
ईश्वर-कृपा से ही पुरुषों में अद्वैत-वासना उत्पन्न होती है, और वो भी विप्रों में जिन्हें महद्भय (mahA-bhaya, सबसे-बड़े-भय यानी मृत्यु-संसार) से paritrAN (बचाव) प्राप्त हुआ हो।
संगति: Stotra का opening, बहुत-important।ईश्वर-कृपा है। और यह कृपा उसी को मिलती है जिसे पहले ‘महद्भय’ से मुक्ति मिल चुकी हो, यानी जिसने मृत्यु-संसार के डर से ऊपर उठना सीख लिया हैं।
श्लोक 2Pratham-vandanयेनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २॥
yenedaṃ pūritaṃ sarvamātmanaivātmanātmani ।
nirākāraṃ kathaṃ vande hyabhinnaṃ śivamavyayam ॥ 2॥
जिसने इस सब को आत्मा-से, आत्मा-में, आत्मा-के-द्वारा भरा हुआ है, उस निराकार, अभिन्न, शिव, अव्यय को हम कैसे प्रणाम करें?
संगति: एक paradox: नमस्कार करने के लिए दो चाहिए, नमस्कार करने वाला और नमस्कार-लेने वाला। मगर अद्वैत में दो नहीं। तो प्रणाम कैसे? यह verse पूरे stotra का tone set करता है, हर-traditional-रूप को question करता है।
श्लोक 3Vishva-marichikaपञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् ।
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३॥
pañcabhūtātmakaṃ viśvaṃ marīcijalasannibham ।
kasyāpyaho namaskuryāmahameko nirañjanaḥ ॥ 3॥
पाँच-भूत-आत्मक यह विश्व मरीचि-जल (मृग-तृष्णा) समान है। किसको हम namaskAr करें, हम तो अकेले निरंजन हैं।
संगति: विश्व illusion है, यह बौद्ध भी कहते, अद्वैत-वेदान्त भी। मगर बौद्ध ‘शून्य’ पर पहुँचते, अद्वैत ‘पूर्ण’ पर। दत्तात्रेय यहाँ ‘अहं एको निरंजन’ कह कर अद्वैत-position लेते हैं।
श्लोक 4Bhed-abhed naaआत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते ।
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४॥
ātmaiva kevalaṃ sarvaṃ bhedābhedo na vidyate ।
asti nāsti kathaṃ brūyāṃ vismayaḥ pratibhāti me ॥ 4॥
आत्मा ही केवल सब-कुछ है, भेद-अभेद नहीं। ‘है’ या ‘नहीं’ कैसे कहूँ? मुझे यह विस्मय (आश्चर्य) ही लगता है।
संगति: Realised-state का बयान। logic-categories (‘है’, ‘नहीं’, ‘भेद’, ‘अभेद’) सब-collapse हो जाते हैं। बचता है सिर्फ़ विस्मय। यह ‘aesthetic-realisation’ का statement है।
श्लोक 5Vedanta ka saarवेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५॥
vedāntasārasarvasvaṃ jñānaṃ vijñānameva ca ।
ahamātmā nirākāraḥ sarvavyāpī svabhāvataḥ ॥ 5॥
वेदान्त का सार-सर्वस्व, ज्ञान-विज्ञान, यही है: हम-आत्मा निराकार, सर्व-व्यापी, स्वभावतः हैं।
संगति: एक-वाक्य में पूरा-वेदान्त। अहम् + आत्मा + निराकार + सर्व-व्यापी + स्वभावतः। पाँच-शब्द, पूरा-दर्शन।
श्लोक 6Niskala devataयो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः ।
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवायं न संशयः ॥ ६॥
yo vai sarvātmako devo niṣkalo gaganopamaḥ ।
svabhāvanirmalaḥ śuddhaḥ sa evāyaṃ na saṃśayaḥ ॥ 6॥
जो सर्व-आत्मक देव, निष्कल, गगन-समान, स्वभाव-निर्मल, शुद्ध है, वही यह (आत्मा), इसमें कोई-संशय नहीं।
संगति: देव और आत्मा का identification। नीचे पाँच-attributes। ‘गगन-समान’ (आकाश-तुल्य) पूरे-stotra का सबसे-frequent-metaphor है।
श्लोक 7Suchhh-vij~nan vigrahअहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः ।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७॥
ahamevāvyayo’nantaḥ śuddhavijñānavigrahaḥ ।
sukhaṃ duḥkhaṃ na jānāmi kathaṃ kasyāpi vartate ॥ 7॥
हम ही अव्यय, अनन्त, शुद्ध-विज्ञान-विग्रह। सुख-दुःख नहीं जानते, फिर किस के लिए कैसे यह वर्तता है?
संगति: Realised-state में सुख-दुःख dissolve हो जाते हैं। यह ‘किसके लिए?’ वाला सवाल पूरे stotra में बार-बार आएगा।
श्लोक 8Karm ka tyaagन मानसं कर्म शुभाशुभं मे
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे ।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे
ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८॥
na mānasaṃ karma śubhāśubhaṃ me
na kāyikaṃ karma śubhāśubhaṃ me ।
na vācikaṃ karma śubhāśubhaṃ me
jñānāmṛtaṃ śuddhamatīndriyo’ham ॥ 8॥
हमारा कोई-मानसिक कर्म नहीं शुभ-अशुभ, कोई-कायिक नहीं, कोई-वाचिक नहीं। हम ज्ञान-अमृत, शुद्ध, अतीन्द्रिय।
संगति: Triple-negation (मन-वाणी-शरीर)। यह वेदान्त की त्रिकरण-शुद्धि का negative-side, सब-कर्म collapse।
श्लोक 9Manas-vichaarमनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम् ।
मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः ॥ ९॥
mano vai gaganākāraṃ mano vai sarvatomukham ।
mano’tītaṃ manaḥ sarvaṃ na manaḥ paramārthataḥ ॥ 9॥
मन गगन-आकार है, सर्व-तो-मुख है, मन-अतीत है, मन-सर्व है, मगर परमार्थ-तह में मन नहीं।
संगति: मन के बारे में चार-statements, अन्त में ‘मन नहीं।’ यह नागार्जुन की catuShkoTi-तर्क-style है, सब-options exhaust करो, फिर silence।
श्लोक 10Pratyaksha-tirohitअहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम् ।
पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम् ॥ १०॥
ahamekamidaṃ sarvaṃ vyomātītaṃ nirantaram ।
paśyāmi kathamātmānaṃ pratyakṣaṃ vā tirohitam ॥ 10॥
हम एक हैं, यह सब-कुछ हैं, व्योम-से-अतीत हैं, निरंतर हैं। तो हम अपने को कैसे देखें, साक्षात् या तिरोहित?
संगति: Self-observation का paradox। देखने वाला और देखा-जाने वाला अगर एक हो, तो ‘देखना’ meaningful नहीं रहता।
श्लोक 11Aakhanditatamत्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे
समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम् ।
सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो
दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे ॥ ११॥
tvamevamekaṃ hi kathaṃ na budhyase
samaṃ hi sarveṣu vimṛṣṭamavyayam ।
sadodito’si tvamakhaṇḍitaḥ prabho
divā ca naktaṃ ca kathaṃ hi manyase ॥ 11॥
आप-ही-एक हैं, फिर क्यों नहीं समझते? सबमें-समान, अव्यय, सदा-उदित, अखण्डित प्रभु। फिर ‘दिन’ और ‘रात’ का भेद कैसे करते हैं?
संगति: स्वयं को confront करते हुए। चित्त को सीधे संबोधन।मन-mtnoth के projection हैं।
श्लोक 12Dhyaata-dhyey ekआत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम् ।
अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम् ॥ १२॥
ātmānaṃ satataṃ viddhi sarvatraikaṃ nirantaram ।
ahaṃ dhyātā paraṃ dhyeyamakhaṇḍaṃ khaṇḍyate katham ॥ 12॥
आत्मा को सतत जानो, सब-त्र एक, निरंतर। हम ध्याता, परम-ध्येय, अखण्ड। यह कैसे खण्डित हो?
संगति: मेडिटेशन में ध्याता-ध्यान-ध्येय की त्रिपुटी (triplet) है। अद्वैत में यह collapse, तीनों एक।
श्लोक 13Janma-mrityu naaन जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन ।
सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः ॥ १३॥
na jāto na mṛto’si tvaṃ na te dehaḥ kadācana ।
sarvaṃ brahmeti vikhyātaṃ bravīti bahudhā śrutiḥ ॥ 13॥
आप न जन्मे न मरे, न आपका देह कभी था। ‘सब ब्रह्म है’, यह श्रुति बहु-बार कहती है।
संगति: श्रुति-प्रमाण: सब-ब्रह्म। तो जो-आप-हो, वो ही ब्रह्म, तो जन्म-मरण कैसे?
श्लोक 14Bahy-aabhyantar shivस बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा ।
इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ॥ १४॥
sa bāhyābhyantaro’si tvaṃ śivaḥ sarvatra sarvadā ।
itastataḥ kathaṃ bhrāntaḥ pradhāvasi piśācavat ॥ 14॥
आप बाह्य-अभ्यन्तर, शिव सब-त्र-सदा। फिर इत-स्तह क्यों पिशाच-जैसे भागते हैं?
संगति: एक-तीक्ष्ण-प्रश्न: आप-शिव हैं, फिर पागल-जैसे क्यों इधर-उधर भाग रहे हैं? यह दत्तात्रेय का सीधा-question, अहंकार को directly hit करता है।
श्लोक 15Sanyog-viyog naaसंयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे ।
न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम् ॥ १५॥
saṃyogaśca viyogaśca vartate na ca te na me ।
na tvaṃ nāhaṃ jagannedaṃ sarvamātmaiva kevalam ॥ 15॥
संयोग-वियोग न आपके, न मेरे। न आप, न हम, न जगत्। सब आत्मा ही केवल।
संगति: Relational-categories (मिलना-बिछुड़ना) भी collapse। ‘मैं-आप-जगत्’ तीनों conventional-fictions हैं।
श्लोक 16Shabd-adi panchakशब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः ।
त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे ॥ १६॥
śabdādipañcakasyāsya naivāsi tvaṃ na te punaḥ ।
tvameva paramaṃ tattvamataḥ kiṃ paritapyase ॥ 16॥
शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध, इन-पाँच का आप नहीं, न आपका। आप ही परम-तत्त्व, फिर क्यों परिताप (दुःख) करते हैं?
संगति: इन्द्रिय-तत्त्वों से identity break-कर के realisation। पाँच इन्द्रिय-विषयों से separation।
श्लोक 17Naam-rupa naaजन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ ।
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे ॥ १७॥
janma mṛtyurna te cittaṃ bandhamokṣau śubhāśubhau ।
kathaṃ rodiṣi re vatsa nāmarūpaṃ na te na me ॥ 17॥
जन्म-मृत्यु आपकी चित्त नहीं, बन्ध-मोक्ष नहीं, शुभ-अशुभ नहीं। हे वत्स, क्यों रोते हैं? नाम-रूप आपका भी नहीं, मेरा भी नहीं।
संगति: Vatsa (बच्चा) कह कर compassion दिखाते। एक-warm का स्वर का verse, बाक़ी-stark का स्वर वालों के बीच।
श्लोक 18Pishachvat naअहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ।
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव ॥ १८॥
aho citta kathaṃ bhrāntaḥ pradhāvasi piśācavat ।
abhinnaṃ paśya cātmānaṃ rāgatyāgātsukhī bhava ॥ 18॥
हे चित्त! क्यों भ्रान्त हो पिशाच-जैसे भागते हैं? अभिन्न (एक) आत्मा को देखो, राग-त्याग से सुखी बनो।
संगति: Repetition for emphasis: ‘पिशाचवत्’ दूसरी-बार। मन को एक practical-instruction: राग-त्याग, और सुख।
श्लोक 19Vimoksh vigrahत्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं
निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम् ।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः
कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः ॥ १९॥
tvameva tattvaṃ hi vikāravarjitaṃ
niṣkampamekaṃ hi vimokṣavigraham ।
na te ca rāgo hyathavā virāgaḥ
kathaṃ hi santapyasi kāmakāmataḥ ॥ 19॥
आप ही वो तत्त्व हैं, विकार-रहित, निष्कम्प, एक, विमोक्ष-विग्रह। आपका न राग न विराग, फिर क्यों काम-काम से तपते हैं?
संगति: Mathematical-elegance का verse। आप-तत्त्व, बाकी सब-डिस्क्रिप्शन इसी की। और अंत में काम-काम (lust-pursuit) से free।
श्लोक 20Shrutigana sammatवदन्ति श्रुतयः सर्वाः निर्गुणं शुद्धमव्ययम् ।
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः ॥ २०॥
vadanti śrutayaḥ sarvāḥ nirguṇaṃ śuddhamavyayam ।
aśarīraṃ samaṃ tattvaṃ tanmāṃ viddhi na saṃśayaḥ ॥ 20॥
सब श्रुति-यें कहती हैं, निर्गुण, शुद्ध, अव्यय, अशरीर, सम-तत्त्व। हमको ऐसा जानो, कोई संशय नहीं।
संगति: श्रुति-multiple का प्रमाण। निर्गुण-तत्त्व ही दत्तात्रेय की self-identity है।
श्लोक 21Saakar mithyaसाकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम् ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ २१॥
sākāramanṛtaṃ viddhi nirākāraṃ nirantaram ।
etattattvopadeśena na punarbhavasambhavaḥ ॥ 21॥
साकार (form-वाला) अनृत (false) जानो, निराकार निरंतर। इस-तत्त्व-उपदेश से पुनर्जन्म नहीं।
संगति: Soteriology: यह realisation मोक्ष देती है, फिर जन्म नहीं। punarbhavasambhava का negation।
श्लोक 22Ek-anek dvandaएकमेव समं तत्त्वं वदन्ति हि विपश्चितः ।
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते ॥ २२॥
ekameva samaṃ tattvaṃ vadanti hi vipaścitaḥ ।
rāgatyāgātpunaścittamekānekaṃ na vidyate ॥ 22॥
विद्वान सब-एक ही तत्त्व कहते। राग-त्याग से चित्त एक-अनेक नहीं रहता।
संगति: वेदान्त-शास्त्र की unanimous-position: एक। ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति।’
श्लोक 23Samaadhi paradoxअनात्मरूपं च कथं समाधि\-
रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः ।
अस्तीति नास्तीति कथं समाधि\-
र्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम् ॥ २३॥
anātmarūpaṃ ca kathaṃ samādhi\-
rātmasvarūpaṃ ca kathaṃ samādhiḥ ।
astīti nāstīti kathaṃ samādhi\-
rmokṣasvarūpaṃ yadi sarvamekam ॥ 23॥
अन-आत्म-रूप कैसे समाधि? आत्म-स्वरूप कैसे समाधि? ‘है’ कैसे? ‘नहीं है’ कैसे? अगर सब-एक हो तो मोक्ष-स्वरूप भी कैसे?
संगति: Catuskoti-elimination। सब-positions exhaust। यही गौडपाद का तरीक़ा।
श्लोक 24Videh aja avyayविशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः ।
जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ २४॥
viśuddho’si samaṃ tattvaṃ videhastvamajo’vyayaḥ ।
jānāmīha na jānāmītyātmānaṃ manyase katham ॥ 24॥
आप विशुद्ध, सम-तत्त्व, विदेह, अज, अव्यय। ‘जानता हूँ’ या ‘नहीं जानता’, इस-तरह आत्मा को कैसे मानते हैं?
संगति: Knower-known कोई-position आत्मा पर apply नहीं हो सकती। एक meta का स्तर point।
श्लोक 25Tat tvam asiतत्त्वमस्यादिवाक्येन स्वात्मा हि प्रतिपादितः ।
नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम् ॥ २५॥
tattvamasyādivākyena svātmā hi pratipāditaḥ ।
neti neti śrutirbrūyādanṛtaṃ pāñcabhautikam ॥ 25॥
‘तत् त्वम् असि’ इत्यादि वाक्य से स्वात्मा प्रतिपादित। ‘नेति-नेति’ श्रुति कहती है, अनृत है यह पाँच-भौतिक।
संगति: महावाक्य की direct-quotation। अद्वैत का foundational वचन। और ‘नेति-नेति’ (न-इति, न-इति) negation की विधि।
श्लोक 26Dhyaata-dhyana naaआत्मन्येवात्मना सर्वं त्वया पूर्णं निरन्तरम् ।
ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम् ॥ २६॥
ātmanyevātmanā sarvaṃ tvayā pūrṇaṃ nirantaram ।
dhyātā dhyānaṃ na te cittaṃ nirlajjaṃ dhyāyate katham ॥ 26॥
आपके अंदर आप-से सब पूर्ण, निरंतर। ध्याता-ध्यान आपका चित्त नहीं। निर्लज्ज होते हुए कैसे ध्यान करते हैं?
संगति: ध्यान-process itself एक conceptual-error है, अद्वैत-perspective से। ‘निर्लज्ज’ (बिना-लाज) word strong-है, इस-error पर directly हिट।
श्लोक 27Bhajana-vandana paradoxशिवं न जानामि कथं वदामि
शिवं न जानामि कथं भजामि ।
अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं
समस्वरूपं गगनोपमं च ॥ २७॥
śivaṃ na jānāmi kathaṃ vadāmi
śivaṃ na jānāmi kathaṃ bhajāmi ।
ahaṃ śivaścetparamārthatattvaṃ
samasvarūpaṃ gaganopamaṃ ca ॥ 27॥
कैसे कहूँ? शिव को जानता नहीं, कैसे भजूँ? अगर हम-शिव हैं, तो परमार्थ-तत्त्व, सम-स्वरूप, गगन-समान।
संगति: एक-deep-paradox: bhakti के लिए दो-चाहिए, भक्त और भगवान। अद्वैत में दो नहीं। तो भजन कैसे? यह सबसे-तीक्ष्ण-वाक्य।
श्लोक 28Grahy-grahak nirmuktनाहं तत्त्वं समं तत्त्वं कल्पनाहेतुवर्जितम् ।
ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत् ॥ २८॥
nāhaṃ tattvaṃ samaṃ tattvaṃ kalpanāhetuvarjitam ।
grāhyagrāhakanirmuktaṃ svasaṃvedyaṃ kathaṃ bhavet ॥ 28॥
हम तत्त्व नहीं, सम-तत्त्व, कल्पना-हेतु-वर्जित। ग्राह्य-ग्राहक (object-subject) से निर्मुक्त, स्व-संवेद्य (self-experienced) कैसे होंगे?
संगति: Subject-object structure collapse। ‘मैं देखता-हूँ’ में देखने-वाला और देखी-जाने-वाली चीज़, दोनों आत्मा के projection हैं।
श्लोक 29Ananta rupa nahiअनन्तरूपं न हि वस्तु किञ्चि\-
त्तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित् ।
आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं
न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा ॥ २९॥
anantarūpaṃ na hi vastu kiñci\-
ttattvasvarūpaṃ na hi vastu kiñcit ।
ātmaikarūpaṃ paramārthatattvaṃ
na hiṃsako vāpi na cāpyahiṃsā ॥ 29॥
अनन्त-रूप कोई-वस्तु नहीं, तत्त्व-स्वरूप कोई-वस्तु नहीं। आत्म-एक-रूप परमार्थ-तत्त्व, न हिंसक, न अहिंसा।
संगति: नैतिक-categories भी collapse। हिंसा-अहिंसा conventional-distinctions हैं, ultimate-नहीं।
श्लोक 30Vibhrama kathamविशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम् ।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः ॥ ३०॥
viśuddho’si samaṃ tattvaṃ videhamajamavyayam ।
vibhramaṃ kathamātmārthe vibhrānto’haṃ kathaṃ punaḥ ॥ 30॥
आप विशुद्ध, सम-तत्त्व, विदेह, अज, अव्यय। आत्म-अर्थ में विभ्रम कैसे? मैं फिर भ्रान्त कैसे?
संगति: Confronting-self-question: अगर आत्मा शुद्ध, तो भ्रम कहाँ-से आया? यह माया-question का root।
श्लोक 31Ghat-akash udaharanघटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम् ।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे ॥ ३१॥
ghaṭe bhinne ghaṭākāśaṃ sulīnaṃ bhedavarjitam ।
śivena manasā śuddho na bhedaḥ pratibhāti me ॥ 31॥
घट (matka) टूटा, घट-आकाश (matke-के-अंदर का आकाश) सु-लीन (बाहर-वाले आकाश में मिल गया), भेद-वर्जित। शिव-मन से शुद्ध, मुझे भेद नहीं दिखता।
संगति: Ghat-akash-दृष्टान्त: matka-में-आकाश अंदर-बाहर एक ही है, matka tअब्ही दीवार है। तब-शरीर तब्ही दीवार। शरीर-टूटा, सब-आकाश-एक।
श्लोक 32Ghat-jeev naaन घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः ।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम् ॥ ३२॥
na ghaṭo na ghaṭākāśo na jīvo jīvavigrahaḥ ।
kevalaṃ brahma saṃviddhi vedyavedakavarjitam ॥ 32॥
न घट, न घट-आकाश, न जीव, न जीव-विग्रह। केवल ब्रह्म जानो, वेद्य-वेदक से वर्जित।
संगति: पिछले-verse के dRRiShTanta को extend। सब-distinctions illusory।
श्लोक 33Sarva-shoonya-ashoonyaसर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम् ।
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः ॥ ३३॥
sarvatra sarvadā sarvamātmānaṃ satataṃ dhruvam ।
sarvaṃ śūnyamaśūnyaṃ ca tanmāṃ viddhi na saṃśayaḥ ॥ 33॥
सब-त्र-सब-दा सब आत्मा सतत-ध्रुव। सब-शून्य और अ-शून्य, मुझे ऐसा जानो।
संगति: Buddhist (शून्य) और Vedantic (अशून्य, पूर्ण) position मिलते। दोनों एक-ही point को आ-रहे हैं।
श्लोक 34Varn-aashram naaवेदा न लोका न सुरा न यज्ञा
वर्णाश्रमो नैव कुलं न जातिः ।
न धूममार्गो न च दीप्तिमार्गो
ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ ३४॥
vedā na lokā na surā na yajñā
varṇāśramo naiva kulaṃ na jātiḥ ।
na dhūmamārgo na ca dīptimārgo
brahmaikarūpaṃ paramārthatattvam ॥ 34॥
न वेद, न लोक, न सुर, न यज्ञ, न वर्ण-आश्रम, न कुल, न जाति। न धूम-मार्ग, न दीप्ति-मार्ग। ब्रह्म-एक-रूप परमार्थ।
संगति: Anti-Establishment! जाति-वर्ण-यज्ञ-वैदिक-system, सब-conventional। ब्रह्म इस-से ऊपर।
श्लोक 35Vyapy-vyapak naaव्याप्यव्यापकनिर्मुक्तः त्वमेकः सफलं यदि ।
प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ३५॥
vyāpyavyāpakanirmuktaḥ tvamekaḥ saphalaṃ yadi ।
pratyakṣaṃ cāparokṣaṃ ca hyātmānaṃ manyase katham ॥ 35॥
व्याप्य-व्यापक (पकड़ा-जाने-वाला और पकड़ने-वाला) से निर्मुक्त, आप एक, सफल-यदि। प्रत्यक्ष-अपरोक्ष आत्मा कैसे मानते?
संगति: Container-contained dichotomy भी collapse।
श्लोक 36Dvaita-advaita transcendenceअद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे ।
समं तत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ३६॥
advaitaṃ kecidicchanti dvaitamicchanti cāpare ।
samaṃ tattvaṃ na vindanti dvaitādvaitavivarjitam ॥ 36॥
कुछ-अद्वैत चाहते, कुछ-द्वैत। सम-तत्त्व नहीं पाते, जो द्वैत-अद्वैत दोनों-से वर्जित।
संगति: बहुत-important verse: अद्वैत-भी एक-position है, और किसी-position के against खड़ी है (द्वैत)। दोनों-से ऊपर तत्त्व।
श्लोक 37Manovaachaam agocharश्वेतादिवर्णरहितं शब्दादिगुणवर्जितम् ।
कथयन्ति कथं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ ३७॥
śvetādivarṇarahitaṃ śabdādiguṇavarjitam ।
kathayanti kathaṃ tattvaṃ manovācāmagocaram ॥ 37॥
श्वेत-इत्यादि वर्ण-रहित, शब्द-इत्यादि गुण-वर्जित। मन-वाणी से अगोचर, उस-तत्त्व को कैसे कहते?
संगति: Apophatic-theology का essence। तत्त्व mind-language-beyond। मगर stotra खुद-शब्दों से बना, तो यह self-aware-irony।
श्लोक 38Mithy-tva से ब्रह्म-bodhयदाऽनृतमिदं सर्वं देहादिगगनोपमम् ।
तदा हि ब्रह्म संवेत्ति न ते द्वैतपरम्परा ॥ ३८॥
yadā’nṛtamidaṃ sarvaṃ dehādigaganopamam ।
tadā hi brahma saṃvetti na te dvaitaparamparā ॥ 38॥
जब यह सब (देह-इत्यादि) गगन-समान अनृत (false) जानो, तब ब्रह्म-संवेदना (experience) होगी। द्वैत-परंपरा नहीं।
संगति: Pre-condition for brahman-anubhuti: देह-asakti छोड़ना।
श्लोक 39Sahaj-atmaपरेण सहजात्मापि ह्यभिन्नः प्रतिभाति मे ।
व्योमाकारं तथैवैकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत् ॥ ३९॥
pareṇa sahajātmāpi hyabhinnaḥ pratibhāti me ।
vyomākāraṃ tathaivaikaṃ dhyātā dhyānaṃ kathaṃ bhavet ॥ 39॥
पर-के साथ सहज-आत्मा भी अभिन्न। व्योम-आकार एक ही, ध्याता-ध्यान कैसे हो?
संगति: ‘सहज’ word महत्त्वपूर्ण, यह नाथ-संप्रदाय का key-term, ‘natural-state’।
श्लोक 40Karm-akarmयत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत् ।
एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः ॥ ४०॥
yatkaromi yadaśnāmi yajjuhomi dadāmi yat ।
etatsarvaṃ na me kiñcidviśuddho’hamajo’vyayaḥ ॥ 40॥
जो करता हूँ, खाता हूँ, होम करता हूँ, देता हूँ, यह सब मेरा नहीं। हम विशुद्ध, अज, अव्यय।
संगति: गीता का ‘न त्वेवाहं जातु नासम्’ (मैं कभी नहीं था ऐसा-नहीं-है) का echo। कर्ता-भोक्ता disclaimer।
श्लोक 41Jagat shiv-rupसर्वं जगद्विद्धि निराकृतीदं
सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम् ।
सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं
सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम् ॥ ४१॥
sarvaṃ jagadviddhi nirākṛtīdaṃ
sarvaṃ jagadviddhi vikārahīnam ।
sarvaṃ jagadviddhi viśuddhadehaṃ
sarvaṃ jagadviddhi śivaikarūpam ॥ 41॥
सब-जगत् को निराकृत जानो, सब-जगत् को विकार-हीन जानो, सब-जगत् को विशुद्ध-देह जानो, सब-जगत् को शिव-एक-रूप जानो।
संगति: चार-line, चार-statements, एक quartet। एक beautiful crescendo।
श्लोक 42Tvam tattvamतत्त्वं त्वं न हि सन्देहः किं जानाम्यथवा पुनः ।
असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४२॥
tattvaṃ tvaṃ na hi sandehaḥ kiṃ jānāmyathavā punaḥ ।
asaṃvedyaṃ svasaṃvedyamātmānaṃ manyase katham ॥ 42॥
तत्त्व आप ही हैं, संशय नहीं। क्या जानूँ या क्या-नहीं-जानूँ? असंवेद्य, स्व-संवेद्य आत्मा कैसे मानते?
संगति: तत्त्व-tvam का strong-वाक्य, मगर थोड़ी-different-रूप, ‘तत्त्व-आप ही’।
श्लोक 43Maya-amaayaमायाऽमाया कथं तात छायाऽछाया न विद्यते ।
तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम् ॥ ४३॥
māyā’māyā kathaṃ tāta chāyā’chāyā na vidyate ।
tattvamekamidaṃ sarvaṃ vyomākāraṃ nirañjanam ॥ 43॥
माया-अमाया कैसे, हे तात? छाया-अछाया नहीं। तत्त्व एक यह सब, व्योम-आकार, निरंजन।
संगति: द्वैत-binaries (माया-अमाया, छाया-अछाया) collapse। तात (पिता-तरह) कहना, intimate का स्वर।
श्लोक 44Aadi-madhy-antamuktआदिमध्यान्तमुक्तोऽहं न बद्धोऽहं कदाचन ।
स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः ॥ ४४॥
ādimadhyāntamukto’haṃ na baddho’haṃ kadācana ।
svabhāvanirmalaḥ śuddha iti me niścitā matiḥ ॥ 44॥
हम आदि-मध्य-अंत-मुक्त, कभी-नहीं-बँधे। स्वभाव-निर्मल, शुद्ध, यह मेरी निश्चित-मति है।
संगति: Time-categories से ऊपर। ‘ आदि-मध्य-अन्त’ तीन-time-divisions। तीनों-से free।
श्लोक 45Mahad-aadi netiमहदादि जगत्सर्वं न किञ्चित्प्रतिभाति मे ।
ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ॥ ४५॥
mahadādi jagatsarvaṃ na kiñcitpratibhāti me ।
brahmaiva kevalaṃ sarvaṃ kathaṃ varṇāśramasthitiḥ ॥ 45॥
महद् (बुद्धि) इत्यादि जगत् कुछ-नहीं दिखता। ब्रह्म-केवल सब। वर्ण-आश्रम-स्थिति कैसे?
संगति: सांख्य-शब्दों (महद्) पर भी negation। सिर्फ़-ब्रह्म।
श्लोक 46Niraalamb-ashoonyजानामि सर्वथा सर्वमहमेको निरन्तरम् ।
निरालम्बमशून्यं च शून्यं व्योमादिपञ्चकम् ॥ ४६॥
jānāmi sarvathā sarvamahameko nirantaram ।
nirālambamaśūnyaṃ ca śūnyaṃ vyomādipañcakam ॥ 46॥
हम सब-तरह सब-जानते, एक-निरंतर। निरालंब (आधार-रहित), अ-शून्य, और शून्य व्योम-आदि-पंचक (पाँच-तत्त्व)।
संगति: एक paradox-वाक्य: निरालंब (no-support) मगर अ-शून्य (not-empty)।
श्लोक 47Strii-pum dvanda nahiन षण्ढो न पुमान्न स्त्री न बोधो नैव कल्पना ।
सानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४७॥
na ṣaṇḍho na pumānna strī na bodho naiva kalpanā ।
sānando vā nirānandamātmānaṃ manyase katham ॥ 47॥
न षण्ढ, न पुरुष, न स्त्री। न बोध, न कल्पना। आनन्द-वाला या निरानन्द आत्मा कैसे मानते?
संगति: Gender-binaries भी इस-तत्त्व पर apply नहीं। आधुनिक-readings के लिए significant।
श्लोक 48Shudhh: kaise nahiषडङ्गयोगान्न तु नैव शुद्धं
मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् ।
गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं
स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव बुद्धम् ॥ ४८॥
ṣaḍaṅgayogānna tu naiva śuddhaṃ
manovināśānna tu naiva śuddham ।
gurūpadeśānna tu naiva śuddhaṃ
svayaṃ ca tattvaṃ svayameva buddham ॥ 48॥
षडंग-योग से शुद्ध नहीं, मन-विनाश से नहीं, गुरु-उपदेश से नहीं। स्वयं तत्त्व, स्वयम् ही बुद्ध।
संगति: बहुत-important: कोई-spiritual-practice शुद्धि नहीं देती। यह intrinsic है। यह विवेकानन्द-कह वाला ‘आप ही अपने मोक्षदाता’ पंक्ति का root।
श्लोक 49Pancha-deh naaन हि पञ्चात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि ।
आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९॥
na hi pañcātmako deho videho vartate na hi ।
ātmaiva kevalaṃ sarvaṃ turīyaṃ ca trayaṃ katham ॥ 49॥
पंच-आत्मक देह नहीं, विदेह वर्तता नहीं। आत्मा ही केवल सब। तुरीय और त्रिक (तीन-states) कैसे?
संगति: पंच-कोश-system भी अप्लाई नहीं। और तुरीय-त्रिक-distinction-भी collapse।
श्लोक 50Baddh-mukt naaन बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक् ।
न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ ५०॥
na baddho naiva mukto’haṃ na cāhaṃ brahmaṇaḥ pṛthak ।
na kartā na ca bhoktāhaṃ vyāpyavyāpakavarjitaḥ ॥ 50॥
न बँधा, न मुक्त। न ब्रह्म से अलग। न कर्ता, न भोक्ता। व्याप्य-व्यापक से वर्जित।
संगति: बन्ध-मोक्ष के परे, तो साधना-समाधि क्या-है? बस-है। existence ही mukti।
श्लोक 51Jal-jal udaharanयथा जलं जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम् ।
प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ५१॥
yathā jalaṃ jale nyastaṃ salilaṃ bhedavarjitam ।
prakṛtiṃ puruṣaṃ tadvadabhinnaṃ pratibhāti me ॥ 51॥
जैसे जल में जल मिले, पानी-भेद-वर्जित। प्रकृति-पुरुष वैसे ही अभिन्न मुझको दिखते।
संगति: Beautiful image: water-in-water। सांख्य के प्रकृति-पुरुष-द्वैत को भी अद्वैत में dissolve।
श्लोक 52Saakar nirakar dvandaयदि नाम न मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन ।
साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ५२॥
yadi nāma na mukto’si na baddho’si kadācana ।
sākāraṃ ca nirākāramātmānaṃ manyase katham ॥ 52॥
अगर-कभी मुक्त-नहीं, बँधे-नहीं, तो साकार-निराकार आत्मा कैसे मानते?
संगति: बँधा-मुक्त गया, तो साकार-निराकार-भी जाएगा।
श्लोक 53Param rup gaganaopamanजानामि ते परं रूपं प्रत्यक्षं गगनोपमम् ।
यथा परं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम् ॥ ५३॥
jānāmi te paraṃ rūpaṃ pratyakṣaṃ gaganopamam ।
yathā paraṃ hi rūpaṃ yanmarīcijalasannibham ॥ 53॥
आपका परम-रूप जानता हूँ, प्रत्यक्ष, गगन-समान। मरीचि-जल-समान।
संगति: एक-गहन confidence-वाक्य: मैं जानता हूँ।
श्लोक 54Guru-upadesh naaन गुरुर्नोपदेशश्च न चोपाधिर्न मे क्रिया ।
विदेहं गगनं विद्धि विशुद्धोऽहं स्वभावतः ॥ ५४॥
na gururnopadeśaśca na copādhirna me kriyā ।
videhaṃ gaganaṃ viddhi viśuddho’haṃ svabhāvataḥ ॥ 54॥
न गुरु, न उपदेश, न उपाधि, न क्रिया। विदेह-गगन जानो, हम विशुद्ध स्वभावतः।
संगति: Anti-pedagogical statement। मगर यह extreme का स्तर पर ही valid। शुरुआत में गुरु-ज़रूरी।
श्लोक 55Param tattva ahankar nahiविशुद्धोऽस्य शरीरोऽसि न ते चित्तं परात्परम् ।
अहं चात्मा परं तत्त्वमिति वक्तुं न लज्जसे ॥ ५५॥
viśuddho’sya śarīro’si na te cittaṃ parātparam ।
ahaṃ cātmā paraṃ tattvamiti vaktuṃ na lajjase ॥ 55॥
आप विशुद्ध, सशरीर नहीं। चित्त पर-तत्त्व नहीं। ‘हम ही आत्मा परम-तत्त्व’ कहते लाज नहीं?
संगति: अहम्-ब्रह्म-अस्मि declare करने में conventional-shame होती है। दत्तात्रेय कहते, उस-शर्म को छोड़ो।
श्लोक 56Vatsa peebकथं रोदिषि रे चित्त ह्यात्मैवात्मात्मना भव ।
पिब वत्स कलातीतमद्वैतं परमामृतम् ॥ ५६॥
kathaṃ rodiṣi re citta hyātmaivātmātmanā bhava ।
piba vatsa kalātītamadvaitaṃ paramāmṛtam ॥ 56॥
हे चित्त, क्यों रोते? आत्मा ही आत्मा-से आत्मा बनो। हे वत्स, कल-अतीत अद्वैत परम-अमृत पियो।
संगति: Maternal का स्वर। ‘वत्स’ (बच्चा), ‘पीओ’ (पी लो)। दुलार-affection से चित्त को point किया।
श्लोक 57Bodh-abodhनैव बोधो न चाबोधो न बोधाबोध एव च ।
यस्येदृशः सदा बोधः स बोधो नान्यथा भवेत् ॥ ५७॥
naiva bodho na cābodho na bodhābodha eva ca ।
yasyedṛśaḥ sadā bodhaḥ sa bodho nānyathā bhavet ॥ 57॥
न बोध, न अबोध। न बोध-अबोध। जिसका ऐसा सदा-बोध, उसी का बोध, अन्यथा नहीं।
संगति: Meta-knowing। ‘बोध है’ भी एक mental-construct है। तो वो भी छोड़ो।
श्लोक 58Sahaj dhruvज्ञानं न तर्को न समाधियोगो
न देशकालौ न गुरूपदेशः ।
स्वभावसंवित्तरहं च तत्त्व\-
माकाशकल्पं सहजं ध्रुवं च ॥ ५८॥
jñānaṃ na tarko na samādhiyogo
na deśakālau na gurūpadeśaḥ ।
svabhāvasaṃvittarahaṃ ca tattva\-
mākāśakalpaṃ sahajaṃ dhruvaṃ ca ॥ 58॥
ज्ञान न तर्क, न समाधि-योग, न देश-काल, न गुरु-उपदेश। स्वभाव-संवित्तर-तर हम तत्त्व, आकाश-कल्प, सहज, ध्रुव।
संगति: सहज-तत्त्व। यह natural state नहीं acquire करना है, यह already-है।
श्लोक 59Janma-mrityuन जातोऽहं मृतो वापि न मे कर्म शुभाशुभम् ।
विशुद्धं निर्गुणं ब्रह्म बन्धो मुक्तिः कथं मम ॥ ५९॥
na jāto’haṃ mṛto vāpi na me karma śubhāśubham ।
viśuddhaṃ nirguṇaṃ brahma bandho muktiḥ kathaṃ mama ॥ 59॥
हम जन्मे-नहीं, मरे-नहीं। शुभ-अशुभ कर्म नहीं। विशुद्ध, निर्गुण, ब्रह्म। बन्ध-मुक्ति कैसे?
संगति: जन्म-मरण कह कर पूरी-soteriology को आगे रद्द किया।
श्लोक 60Bahy-aabhyantar paradoxयदि सर्वगतो देवः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः ।
अन्तरं हि न पश्यामि स बाह्याभ्यन्तरः कथम् ॥ ६०॥
yadi sarvagato devaḥ sthiraḥ pūrṇo nirantaraḥ ।
antaraṃ hi na paśyāmi sa bāhyābhyantaraḥ katham ॥ 60॥
अगर सर्व-गत देव, स्थिर, पूर्ण, निरंतर, तो अन्तर (gap) नहीं दिखता। ‘बाह्य-अभ्यन्तर’ कैसे?
संगति: बाहर-अंदर distinction भी ले-जाएँ। जब सब-कुछ देव, तो ‘बाहर’ कहाँ?
श्लोक 61Maya-maha-mohस्फुरत्येव जगत्कृत्स्नमखण्डितनिरन्तरम् ।
अहो मायामहामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ ६१॥
sphuratyeva jagatkṛtsnamakhaṇḍitanirantaram ।
aho māyāmahāmoho dvaitādvaitavikalpanā ॥ 61॥
स्फुरत्येव (चमकता है) यह जगत्, अखण्डित, निरंतर। आह, माया-महा-मोह, द्वैत-अद्वैत-विकल्पना।
संगति: एक exclamation-style verse। ‘अहो!’ word से दर्द। माया-mohabbat को directly call out।
श्लोक 62Kevala shivसाकारं च निराकारं नेति नेतीति सर्वदा ।
भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः ॥ ६२॥
sākāraṃ ca nirākāraṃ neti netīti sarvadā ।
bhedābhedavinirmukto vartate kevalaḥ śivaḥ ॥ 62॥
साकार और निराकार, नेति-नेति सब-दा। भेद-अभेद-निर्मुक्त, केवल शिव वर्तता।
संगति: एक summary-verse: सब-categories से ऊपर, बस-शिव।
श्लोक 63Mata-pita relationsन ते च माता च पिता च बन्धुः
न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम् ।
न पक्षपाती न विपक्षपातः
कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते ॥ ६३॥
na te ca mātā ca pitā ca bandhuḥ
na te ca patnī na sutaśca mitram ।
na pakṣapātī na vipakṣapātaḥ
kathaṃ hi santaptiriyaṃ hi citte ॥ 63॥
आपकी न माता, न पिता, न बन्धु। न पत्नी, न पुत्र, न मित्र। न पक्षपाती, न विपक्षपाती। चित्त में यह संताप क्यों?
संगति: Family-relations जो हमें suffer करवाती हैं, वो conventional हैं। आत्मा-level पर कुछ-नहीं।
श्लोक 64Divaa-naktam naaदिवा नक्तं न ते चित्तं उदयास्तमयौ न हि ।
विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः ॥ ६४॥
divā naktaṃ na te cittaṃ udayāstamayau na hi ।
videhasya śarīratvaṃ kalpayanti kathaṃ budhāḥ ॥ 64॥
आपके चित्त को न दिन, न रात। न उदय-अस्तमय। विदेह को शरीर कैसे मानते?
संगति: Diurnal-cycle भी shariraka है, atmik नहीं।
श्लोक 65Avibhakt vibhaktनाविभक्तं विभक्तं च न हि दुःखसुखादि च ।
न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम् ॥ ६५॥
nāvibhaktaṃ vibhaktaṃ ca na hi duḥkhasukhādi ca ।
na hi sarvamasarvaṃ ca viddhi cātmānamavyayam ॥ 65॥
अविभक्त-विभक्त नहीं, सुख-दुःख-इत्यादि नहीं। सर्व-असर्व नहीं। आत्मा को अव्यय जानो।
संगति: Triple-pair negation। Whole-part, joy-sorrow, all-not-all।
श्लोक 66Karta-bhokta naaनाहं कर्ता न भोक्ता च न मे कर्म पुराऽधुना ।
न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम् ॥ ६६॥
nāhaṃ kartā na bhoktā ca na me karma purā’dhunā ।
na me deho videho vā nirmameti mameti kim ॥ 66॥
हम कर्ता-नहीं, भोक्ता-नहीं। कर्म पुराना-अभी कोई-नहीं। न देह, न विदेह। ‘मेरा-नहीं’, ‘मेरा’ क्या?
संगति: मेरा-not-मेरा द्वैत भी जाता।
श्लोक 67Rag-doSh naaन मे रागादिको दोषो दुःखं देहादिकं न मे ।
आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम् ॥ ६७॥
na me rāgādiko doṣo duḥkhaṃ dehādikaṃ na me ।
ātmānaṃ viddhi māmekaṃ viśālaṃ gaganopamam ॥ 67॥
हमको राग-इत्यादि दोष नहीं, देह-इत्यादि दुःख नहीं। हमको एक जानो, विशाल, गगन-समान।
संगति: बहुत common-verse for daily-contemplation।
श्लोक 68Sakhe manahसखे मनः किं बहुजल्पितेन
सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम् ।
यत्सारभूतं कथितं मया ते
त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि ॥ ६८॥
sakhe manaḥ kiṃ bahujalpitena
sakhe manaḥ sarvamidaṃ vitarkyam ।
yatsārabhūtaṃ kathitaṃ mayā te
tvameva tattvaṃ gaganopamo’si ॥ 68॥
सखे मन! बहु-जल्पन से क्या? सखे मन, यह सब-वितर्क है। मैंने आपको जो-सार कहा, आप-ही-तत्त्व, गगन-समान।
संगति: Final-pivot: मन को ‘सखे’ (मित्र) कह कर पुकारना। एक gentle-closure।
श्लोक 69Ghat-akash mrituयेन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि ।
योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे ॥ ६९॥
yena kenāpi bhāvena yatra kutra mṛtā api ।
yoginastatra līyante ghaṭākāśamivāmbare ॥ 69॥
किसी-भी भाव से, कहीं-भी मरने पर, योगी वहीं लीन हो जाते हैं, जैसे घट-आकाश ambar में।
संगति: Death-theory। योगी का death-place कोई-मायने नहीं रखता।
श्लोक 70Tirth-antyaj gehतीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्टस्मृतिरपि त्यजन् ।
समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत् ॥ ७०॥
tīrthe cāntyajagehe vā naṣṭasmṛtirapi tyajan ।
samakāle tanuṃ muktaḥ kaivalyavyāpako bhavet ॥ 70॥
तीर्थ में या चाण्डाल-घर में, स्मृति-खो-कर भी जो छोड़ता है, उसी-काल में देह-मुक्त, कैवल्य-व्यापक।
संगति: उग्र-वाक्य: मरने का स्थान-condition matters नहीं।
श्लोक 71Marichi-jal jagatधर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम् ।
मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम् ॥ ७१॥
dharmārthakāmamokṣāṃśca dvipadādicarācaram ।
manyante yoginaḥ sarvaṃ marīcijalasannibham ॥ 71॥
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, दो-पैर-इत्यादि चर-अचर सब, योगी मरीचि-जल-समान मानते।
संगति: चार-पुरुषार्थ भी illusory। मरीचि-जल metaphor again।
श्लोक 72Karm akarmअतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च ।
न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः ॥ ७२॥
atītānāgataṃ karma vartamānaṃ tathaiva ca ।
na karomi na bhuñjāmi iti me niścalā matiḥ ॥ 72॥
अतीत-अनागत कर्म, वर्तमान भी। हम-न करते, न भोगते, यह निश्चल मति।
संगति: Karma-doctrine का transcendence।
श्लोक 73Avadhuta-charyaशून्यागारे समरसपूत\-
स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः ।
चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं
विन्दति केवलमात्मनि सर्वम् ॥ ७३॥
śūnyāgāre samarasapūta\-
stiṣṭhannekaḥ sukhamavadhūtaḥ ।
carati hi nagnastyaktvā garvaṃ
vindati kevalamātmani sarvam ॥ 73॥
शून्य-आगार में, सम-रस-पूत, अकेला, सुख-में बैठा अवधूत। गर्व त्याग कर नग्न चलता, केवल आत्मा में सब-कुछ पाता।
संगति: Beautiful image: empty house में बैठा अवधूत। नग्न (निर्ग्रन्थ-तरह)। सब-कुछ आत्मा-में।
श्लोक 74Tritay-turiya naaत्रितयतुरीयं न हि नहि यत्र
विन्दति केवलमात्मनि तत्र ।
धर्माधर्मौ न हि नहि यत्र
बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र ॥ ७४॥
tritayaturīyaṃ na hi nahi yatra
vindati kevalamātmani tatra ।
dharmādharmau na hi nahi yatra
baddho muktaḥ kathamiha tatra ॥ 74॥
त्रित्य (तीन-state) और तुरीय (चौथा) जहाँ नहीं, वहीं आत्मा-में सब पाता। धर्म-अधर्म जहाँ नहीं, वहाँ बद्ध-मुक्त कैसे?
संगति: Beyond Mandukya-Upanishad का तुरीय भी। ‘सहज’ पर पहुँच गए।
श्लोक 75Mantra-tantra naaविन्दति विन्दति न हि नहि मन्त्रं
छन्दोलक्षणं न हि नहि तन्त्रम् ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ ७५॥
vindati vindati na hi nahi mantraṃ
chandolakṣaṇaṃ na hi nahi tantram ।
samarasamagno bhāvitapūtaḥ
pralapitametatparamavadhūtaḥ ॥ 75॥
मन्त्र पाता-नहीं, छन्द-लक्षण नहीं, तन्त्र नहीं। सम-रस-मगन, भावित-पूत, यह सब प्रलाप परम-अवधूत का।
संगति: एक self-deprecating closure: मेरा यह सब प्रलाप (बड़बड़) है, मगर परम-अवधूत वाला प्रलाप।
श्लोक 76Sarv-shoonya satyaa-satyaसर्वशून्यमशून्यं च सत्यासत्यं न विद्यते ।
स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ ७६॥
sarvaśūnyamaśūnyaṃ ca satyāsatyaṃ na vidyate ।
svabhāvabhāvataḥ proktaṃ śāstrasaṃvittipūrvakam ॥ 76॥
सब-शून्य-अशून्य, सत्य-असत्य नहीं। स्वभाव-भावतः कहा गया, शास्त्र-संवित्ति-पूर्वक।
संगति: अध्याय-१ का closing-verse। स्वभाव से, शास्त्र-aware हो कर कहा गया।