Lulla Family

अवधूत गीता · अध्याय 1

अवधूत गीता

अध्याय 1 · आत्म-स्वरूप, खंड एक · श्लोक 1-76

दत्तात्रेय का सबसे निर्भीक वचन। पहले अध्याय का पूरा भार एक ही तत्त्व पर: आत्मा ही ब्रह्म है, और उसके अतिरिक्त कुछ नहीं। यहाँ कर्म-कांड का अवलंब नहीं, पूजा का कोई पृथक् देव नहीं, बंध और मोक्ष का भेद भी नहीं। केवल “मैं” का स्वरूप, गगन की भाँति असीम और निरंजन।

76 श्लोक · पठन-काल लगभग 36 मिनट · अवधूत गीता मुख्य पृष्ठ

पढ़ने में लगभग 25 मिनट · 4,233 शब्द

प्रवेश

अवधूत वह है जिसने सब उतार फेंका। वस्त्र की बात नहीं; मन के सब आवरण, सब कल्पनाएँ, “मैं यह हूँ” की सब पकड़ें, सब छूट चुकीं। परम्परा दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सम्मिलित स्वरूप मानती है, और इस ग्रंथ में उनका एक ही स्वर है: आत्मा वही परम तत्त्व है, सदा से रही है, सदा रहेगी। यहाँ कुछ “बनना” नहीं, केवल अपने स्वरूप को पहचानना है।

प्रथम अध्याय के छिहत्तर श्लोक आत्मा का प्रत्यक्ष वर्णन हैं। कथा नहीं, उपमाओं की भरमार नहीं, केवल सीधी घोषणाएँ। हर श्लोक एक ही लक्ष्य पर बैठता है, और वही एक सत्य बार-बार नए शब्दों में लौटता है, क्योंकि कहने को एक ही बात है।

मूल सूत्र

इस अध्याय के आधार-श्लोक: श्लोक 1 (अद्वैतवासना ईश्वरअनुग्रह से), 8 (मन, वाणी, शरीर के तीनों कर्म मेरे नहीं), 25 (तत्त्वमसि और नेति-नेति), 27 (शिव को न जानूँ, तो कैसे भजूँ), 31 (घटाकाश की उपमा), 41 (सर्वं जगद् विद्धि का चतुर्विध मंत्र), 50 (न बद्ध, न मुक्त), 68 (हे मन, आप ही तत्त्व, गगन-समान)। अवधूत गीता विचार से अधिक मनन में खुलती है; एक-एक श्लोक पर ठहराव ही इसका पठन है।

ग्रंथ अपने पहले ही वचन में अपनी जड़ पर हाथ रख देता है। अद्वैत की ओर जो झुकाव उठता है, वह अपने प्रयत्न का फल नहीं, ईश्वर के अनुग्रह का संकेत है; और वही झुकाव जिज्ञासु को संसार के महान भय से बचाने के लिए जागता है। फिर अवधूत एक प्रश्न में सारा रहस्य खोल देते हैं। जिसने आत्मा से ही, आत्मा में, यह सब भर रखा है, उस निराकार, अभिन्न, अव्यय शिव की वंदना हम किस मुख से करें, क्योंकि वंदना में तो दो चाहिए, करने वाला और जिसे किया जाए, और यहाँ दूसरा है ही नहीं। पाँच भूतों वाला यह सारा विश्व मरुभूमि के उस जल जैसा है जो दूर से दिखता है और पास जाने पर मिलता नहीं; उसके बीच हम अकेले हैं, निरंजन, तो नमस्कार किसे करें। केवल आत्मा ही सब है, न भेद, न अभेद; “है” कहें या “नहीं है”, कुछ बनता ही नहीं, बस विस्मय शेष रह जाता है।

1 · 2 · 3 · 4

ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना ।
महद्भयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते ॥ 1 ॥
येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ 2 ॥
पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् ।
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ 3 ॥
आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते ।
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ 4 ॥

यही वेदान्त का सर्व-सार है, यही ज्ञान और विज्ञान दोनों: हम आत्मा हैं, निराकार, स्वभाव से सर्व-व्यापी; यह व्यापकता कमाई हुई वस्तु नहीं, मूल स्थिति है। जो सर्वात्मक देव है, निष्कल, गगन की भाँति असीम, स्वभाव से निर्मल और शुद्ध, वही “यह मैं” है, इसमें कोई संशय नहीं। हम ही अव्यय हैं, अनंत, शुद्ध-विज्ञान-स्वरूप; सुख और दुख चित्त पर बीतते हैं, उस “मैं” को छूते तक नहीं, फिर वे किसी के कैसे हों। मन, शरीर और वाणी, तीनों के कर्म शुभ हों या अशुभ, उन पर “मेरा” लगता ही नहीं, क्योंकि हम ज्ञान-अमृत हैं, शुद्ध, इन्द्रियों के परे। और यह मन भी देखिए, कभी गगन-आकार, कभी सर्वतो-मुख, कभी मन से परे, कभी मन ही सब; पर परमार्थ में देखें तो “मन” नाम की कोई वस्तु बचती ही नहीं।

5 · 6 · 7 · 8 · 9

वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ 5 ॥
यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः ।
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवायं न संशयः ॥ 6 ॥
अहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः ।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ 7 ॥
न मानसं कर्म शुभाशुभं मे न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे ।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ 8 ॥
मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम् ।
मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः ॥ 9 ॥

हम एक हैं, यह सब हैं, व्योम से परे, निरंतर; तब आत्मा को प्रत्यक्ष या छिपी हुई कैसे देखें, क्योंकि देखने में द्रष्टा और दृश्य दोनों चाहिए, और यहाँ केवल एक है। अब अवधूत मन को पुकार कर समझाते हैं। आप एक हैं, सब में सम, अव्यय, यह क्यों नहीं समझते; हे प्रभु, आप सदा-उदित और अखंडित हैं, फिर दिन-रात का भेद कैसे मानते हैं, क्योंकि दिन और रात तो सूर्य से दूर खड़े देखने वाले के लिए हैं, स्वयं सूर्य के लिए नहीं। आत्मा को सतत, सर्वत्र एक और निरंतर जानिए; “हम ध्याता हैं, परम ध्येय है”, यह बँटवारा उस अखंड को खंडित कैसे करेगा। आप न जन्मे, न मरे, आपका देह कभी रहा ही नहीं; श्रुति अनेक रूपों में यही घोषित करती है, “सब ब्रह्म है।” आप बाहर और भीतर, सर्वत्र और सर्वदा शिव ही हैं, फिर अपने स्वरूप को भूले हुए पिशाच की भाँति इधर-उधर क्यों दौड़ते हैं।

10 · 11 · 12 · 13 · 14

अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम् ।
पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम् ॥ 10 ॥
त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम् ।
सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे ॥ 11 ॥
आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम् ।
अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम् ॥ 12 ॥
न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन ।
सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः ॥ 13 ॥
स बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा ।
इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ॥ 14 ॥

संयोग और वियोग न आपके हैं, न हमारे; जुड़ाव और दूरी तो “दो” की मान्यता पर टिके हैं, पर न आप, न हम, न यह जगत, सब केवल आत्मा है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, इन पाँच विषयों के न आप हैं, न ये आपके; आप ही परम तत्त्व हैं, फिर किसलिए संताप उठाते हैं। जन्म-मृत्यु, बंध-मोक्ष, शुभ-अशुभ, ये आपके चित्त के नहीं; हे वत्स, क्यों रोते हो, नाम और रूप न आपका है, न हमारा। गुरु की यह ममता-भरी पुकार चित्त की ओर मुड़ती है, हे चित्त, पिशाच की भाँति भ्रांत होकर क्यों दौड़ते हो; आत्मा को अभिन्न देख लो, और राग के त्याग से सुखी हो जाओ, क्योंकि दर्शन पहले हो जाए तो त्याग सहज पीछे चला आता है।

15 · 16 · 17 · 18

संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे ।
न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम् ॥ 15 ॥
शब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः ।
त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे ॥ 16 ॥
जन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ ।
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे ॥ 17 ॥
अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ।
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव ॥ 18 ॥

आप ही तो तत्त्व हैं, विकार से रहित, निष्कम्प, एक, मुक्ति का ही साकार रूप; आपके न राग है, न विराग, फिर काम की कामना से क्यों जलते हैं, क्योंकि “हम मुक्ति-स्वरूप ही हैं”, इस पहचान के साथ ही कामना की जड़ कट जाती है। सब श्रुतियाँ यही कहती हैं, वह तत्त्व निर्गुण है, शुद्ध, अव्यय, अशरीर, सम; उसे ही हमें जान लो, इसमें संशय नहीं। साकार को झूठ जानो, निराकार को निरंतर सत्य; इसी एक विवेक के उपदेश से फिर पुनर्जन्म का सम्भव शेष नहीं रहता। विद्वान एक ही सम-तत्त्व का वचन देते हैं, और राग के हटते ही चित्त “एक” और “अनेक” का बँटवारा नहीं रखता, बहुत की दृष्टि के साथ ही सब बँटवारे चले जाते हैं।

19 · 20 · 21 · 22

त्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम् ।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः ॥ 19 ॥
वदन्ति श्रुतयः सर्वाः निर्गुणं शुद्धमव्ययम् ।
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः ॥ 20 ॥
साकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम् ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ 21 ॥
एकमेव समं तत्त्वं वदन्ति हि विपश्चितः ।
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते ॥ 22 ॥

जब मोक्ष-स्वरूप सब एक है, तब समाधि किस पर, अनात्म पर लगे या आत्म-स्वरूप पर, या “है-नहीं” पर; समाधि भी एक “करना” है जो ध्याता और ध्येय का भेद मानकर चलता है, और अद्वैत में वह भेद ही नहीं। आप विशुद्ध हैं, सम-तत्त्व, देह से परे, अजन्मा, अव्यय; फिर “जानता हूँ” या “नहीं जानता”, यह आत्मा को कैसे मानते हैं, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का यह विभाजन भी मन का ही है। “तत्त्वमसि” आदि महावाक्य से अपनी आत्मा सीधे ब्रह्म के साथ अभिन्न ठहरती है, और “नेति-नेति” श्रुति पाँच-भूतों वाले को झूठ कह कर छुड़ा देती है; एक से असली को पकड़ना, दूसरे से असत् को छोड़ना। आत्मा में, आत्मा से, सब कुछ आपसे निरंतर पूर्ण है; ध्याता, ध्यान और चित्त, ये आपके हैं ही नहीं, फिर जो स्वयं पूर्ण है, वह बिना लज्जा के किसी अन्य का ध्यान कैसे करे।

23 · 24 · 25 · 26

अनात्मरूपं च कथं समाधिरात्मस्वरूपं च कथं समाधिः ।
अस्तीति नास्तीति कथं समाधिर्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम् ॥ 23 ॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः ।
जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ 24 ॥
तत्त्वमस्यादिवाक्येन स्वात्मा हि प्रतिपादितः ।
नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम् ॥ 25 ॥
आत्मन्येवात्मना सर्वं त्वया पूर्णं निरन्तरम् ।
ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम् ॥ 26 ॥

अब वह वचन आता है जहाँ भक्ति का द्वैत अपने ही अद्वैत में लीन हो जाता है। शिव को हम जानते नहीं, तो कहें कैसे, भजें कैसे; और यदि हम ही शिव हैं, परमार्थ-तत्त्व, सम-स्वरूप, गगन-समान, तो अपनी ही पूजा अपने से दूर खड़े होना है। “हम तत्त्व हैं” यह कथन भी कल्पना है; सम-तत्त्व तो कल्पना के हेतु से ही रहित है, और जो ग्राह्य-ग्राहक से मुक्त है, वह स्व-संवेद्य भी कैसे हो, क्योंकि जानने वाला और जाना जाने वाला, यह भेद वहाँ टिकता ही नहीं। न कोई अनंत-रूप वस्तु है, न कोई तत्त्व-रूप वस्तु, क्योंकि “वस्तु” शब्द ही उसे सीमित करने का भ्रम है; परमार्थ-तत्त्व आत्म-एक-रूप है, वहाँ न हिंसक है, न अहिंसा। आप विशुद्ध हैं, सम-तत्त्व, देह से परे, अजन्मा, अव्यय; तब आत्मा के विषय में विभ्रम कैसा, “हम विभ्रांत हैं” यह फिर कैसे, क्योंकि संदेह करने वाला भी वही आत्मा है।

27 · 28 · 29 · 30

शिवं न जानामि कथं वदामि शिवं न जानामि कथं भजामि ।
अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं समस्वरूपं गगनोपमं च ॥ 27 ॥
नाहं तत्त्वं समं तत्त्वं कल्पनाहेतुवर्जितम् ।
ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत् ॥ 28 ॥
अनन्तरूपं न हि वस्तु किञ्चित्तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित् ।
आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा ॥ 29 ॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम् ।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः ॥ 30 ॥

अब वह प्रसिद्ध उपमा आती है। घड़ा फूटा, तो उसके भीतर का आकाश महाकाश में मिल गया, भेद-रहित; घड़े की दीवार ने जिसे घेर रखा था, वह कभी अलग था ही नहीं। शिव-बुद्धि से शुद्ध हुए हमें कोई भेद दिखता नहीं। फिर अवधूत उपमा को भी काट देते हैं, क्योंकि उपमा अंत में स्वयं भी छोड़नी पड़ती है: न घड़ा, न घटाकाश, न जीव, न जीव का विग्रह; केवल ब्रह्म जानो, जिसमें जानने वाला और जाना जाने वाला दोनों नहीं। सर्वत्र, सर्वदा, सब को सतत-ध्रुव आत्मा ही जानो; वह रूप से शून्य है और सत्ता से अशून्य, दोनों कोटियों के परे और दोनों में व्याप्त, उसी को हमें जान लो। और फिर समाज, कर्म-कांड और गति-आगति, सब निरस्त: न वेद, न लोक, न देव, न यज्ञ, न वर्ण-आश्रम, न कुल, न जाति, न पितरों का धूम-मार्ग, न देवों का दीप्ति-मार्ग; केवल ब्रह्म-एक-रूप परमार्थ-तत्त्व शेष है।

31 · 32 · 33 · 34

घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम् ।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे ॥ 31 ॥
न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः ।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम् ॥ 32 ॥
सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम् ।
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः ॥ 33 ॥
वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा वर्णाश्रमो नैव कुलं न जातिः ।
न धूममार्गो न च दीप्तिमार्गो ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ 34 ॥

आप व्याप्य और व्यापक, दोनों से मुक्त एक हैं; जो ढके और जो ढका जाए, उन दोनों के परे, फिर आत्मा को प्रत्यक्ष या अपरोक्ष कैसे मानें। कुछ लोग अद्वैत चाहते हैं, कुछ द्वैत, पर वे उस सम-तत्त्व को नहीं पाते जो द्वैत और अद्वैत दोनों से रहित है, क्योंकि “अद्वैत” को चाहना भी एक अंतिम पकड़ है। श्वेत आदि किसी वर्ण से रहित, शब्द आदि किसी गुण से रहित, मन और वाणी के अगोचर उस तत्त्व को कोई कैसे कहे, क्योंकि वहीं से वाणी लौट आती है। और जब यह सारा दृश्य, देह आदि सब, गगन की भाँति होते हुए भी जैसे न हो, ऐसा झूठ जान लिया जाता है, तभी ब्रह्म का संवेदन होता है, और आपकी द्वैत की परम्परा अपने आप टूट जाती है।

35 · 36 · 37 · 38

व्याप्यव्यापकनिर्मुक्तः त्वमेकः सफलं यदि ।
प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ 35 ॥
अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे ।
समं तत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ 36 ॥
श्वेतादिवर्णरहितं शब्दादिगुणवर्जितम् ।
कथयन्ति कथं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ 37 ॥
यदाऽनृतमिदं सर्वं देहादिगगनोपमम् ।
तदा हि ब्रह्म संवेत्ति न ते द्वैतपरम्परा ॥ 38 ॥

बिना प्रयत्न की वह सहज आत्मा परब्रह्म के साथ भी हमें अभिन्न ही दिखती है; वह व्योम-आकार एक ही है, तो उसमें ध्याता और ध्यान का सेतु कहाँ। जो हम करते हैं, जो खाते हैं, जो हवन और दान करते हैं, वह सब हमारे लिए कुछ नहीं; कर्म होते रहें, हम विशुद्ध, अजन्मा, अव्यय बने रहते हैं। फिर एक मंत्र की लय में चार बार वही दृष्टि लौटती है, ताकि मन में बैठ जाए: सब जगत को निराकृति जानो, सब जगत को विकार-हीन जानो, सब जगत को विशुद्ध-देह जानो, सब जगत को शिव का ही एक रूप जानो। आप ही तत्त्व हैं, इसमें संदेह नहीं; तो और क्या जानें, क्योंकि आत्मा को किसी अन्य प्रमाण से जाना नहीं जाता, वह केवल स्वयं से स्वयं को प्रकाशित है।

39 · 40 · 41 · 42

परेण सहजात्मापि ह्यभिन्नः प्रतिभाति मे ।
व्योमाकारं तथैवैकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत् ॥ 39 ॥
यत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत् ।
एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः ॥ 40 ॥
सर्वं जगद्विद्धि निराकृतीदं सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम् ।
सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम् ॥ 41 ॥
तत्त्वं त्वं न हि सन्देहः किं जानाम्यथवा पुनः ।
असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ 42 ॥

हे तात, माया और माया का अभाव, छाया और अछाया, ये सब द्वैत की कल्पनाएँ हैं, इनमें से कुछ है ही नहीं; तत्त्व एक है, यही सब है, व्योम-आकार, निरंजन। हम आदि, मध्य और अंत से मुक्त हैं; हम कभी बंधे ही नहीं, स्वभाव से निर्मल और शुद्ध हैं, यही हमारी निश्चित मति है, और बंधन को कभी हुआ ही न मानना, यही उसका मर्म है। महत् से आरम्भ यह सारा जगत हमें कुछ भी प्रतीत नहीं होता; जहाँ सृष्टि का वह मूल विकार ही नहीं दिखता, वहाँ केवल ब्रह्म है, फिर वर्ण और आश्रम की स्थिति का स्थान कहाँ। हम सब प्रकार से सब जानते हैं, एक और निरंतर; हम बिना किसी अवलंब के अशून्य हैं, और व्योम आदि पाँच भूत शून्य, सत्ता और असत्ता का यही स्पष्ट विवेक।

43 · 44 · 45 · 46

मायाऽमाया कथं तात छायाऽछाया न विद्यते ।
तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम् ॥ 43 ॥
आदिमध्यान्तमुक्तोऽहं न बद्धोऽहं कदाचन ।
स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः ॥ 44 ॥
महदादि जगत्सर्वं न किञ्चित्प्रतिभाति मे ।
ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ॥ 45 ॥
जानामि सर्वथा सर्वमहमेको निरन्तरम् ।
निरालम्बमशून्यं च शून्यं व्योमादिपञ्चकम् ॥ 46 ॥

आत्मा न नपुंसक है, न पुरुष, न स्त्री; न बोध, न कल्पना; उसे आनंद-सहित या आनंद-रहित भी कैसे मानें, क्योंकि वह आनंद और अनानंद दोनों कोटियों से आगे है। वह छह-अंग वाले योग से शुद्ध नहीं होता, मन के नाश से नहीं, गुरु के उपदेश से भी नहीं; क्योंकि साधन उसे शुद्ध करते हैं जो पहले से अशुद्ध हो, पर तत्त्व सदा शुद्ध है, स्वयं ही तत्त्व, स्वयं ही प्रकाशित। न पाँच भूतों का बना देह है, न विदेह; केवल आत्मा ही सब है, तब जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, ये तीन और इनके परे तुरीय, ये अवस्थाएँ भी कैसी। और फिर वेदान्त का चरम वचन आता है: हम न बद्ध हैं, न मुक्त, न ब्रह्म से अलग, न कर्ता, न भोक्ता, व्याप्य और व्यापक दोनों से रहित; जब बंधन कभी था ही नहीं, तब मोक्ष किसका और किससे।

47 · 48 · 49 · 50

न षण्ढो न पुमान्न स्त्री न बोधो नैव कल्पना ।
सानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ 47 ॥
षडङ्गयोगान्न तु नैव शुद्धं मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् ।
गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव बुद्धम् ॥ 48 ॥
न हि पञ्चात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि ।
आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ 49 ॥
न बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक् ।
न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ 50 ॥

जैसे जल में जल मिला देने पर वह भेद-रहित एक हो जाता है, वैसे ही सांख्य के दो मूल, प्रकृति और पुरुष, हमें अभिन्न ही प्रतीत होते हैं। यदि सच में आप न मुक्त हैं, न कभी बद्ध, तो आत्मा को साकार या निराकार भी कैसे मानें, यह भी तो एक विभाजन ही है। आपका परम-रूप हम जानते हैं, प्रत्यक्ष और गगन-समान; और जो दृश्य रूप है वह उस मरुभूमि के जल जैसा है जो दूर से दिखता है, पास जाने पर मिलता नहीं। न कोई गुरु है, न शिष्य, न चित्त का कोई निश्चय; शिक्षा का वह सम्बन्ध भी, जिसमें गुरु एक ओर और शिष्य दूसरी ओर खड़े हैं, अंततः लुप्त हो जाता है, और शेष रहता है केवल “हम ब्रह्म हैं”, दूसरा कुछ नहीं, यही परावर है।

51 · 52 · 53 · 54

यथा जलं जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम् ।
प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ 51 ॥
यदि नाम न मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन ।
साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ 52 ॥
जानामि ते परं रूपं प्रत्यक्षं गगनोपमम् ।
यथा परं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम् ॥ 53 ॥
न गुरुर्नापि शिष्यश्च न च चित्तस्य निश्चयः ।
अहं ब्रह्मेति विख्यातं नान्योऽस्तीति परावरम् ॥ 54 ॥

अब हर पद के आगे विस्मय का स्वर बजता है: अरे बोध, अरे ज्ञान, अरे सुख, अरे परम, अरे शास्त्र, अरे तीर्थ, अरे ध्यान, अरे भ्रम; जो-जो वस्तु बड़ी मानी गई, वह एक ही विस्मय में समेट कर अंत में “भ्रम” कह दी गई। फिर मित्र-भाव से वही पुकार लौटती है, हे सखे, किसलिए रोते हो; न आपकी जरा है, न मृत्यु, न कोई दुख-रूप, न आपका कोई बदलने वाला स्वरूप, न आप में कोई विकार। हे सखे, किसलिए भटकते हो; न आपका बुढ़ापा है, न मन, न आयु, न कोई स्वभाव, बस वही एक बात बार-बार समझाने की धीर लगन। और बुद्धि से रहित आपको स्त्री और स्वर्ण का मोह कैसा, मान का मोह कैसा, जहाँ भेद करने वाली बुद्धि ही नहीं, वहाँ ये लोभ-मूल भी कैसे टिकें।

55 · 56 · 57 · 58

अहो बोधमहो ज्ञानमहो सुखमहो परम् ।
अहो शास्त्रमहो तीर्थमहो ध्यानमहो भ्रमः ॥ 55 ॥
किं नाम रोदिषि सखे न जरा न मृत्यु- र्किं नाम रोदिषि सखे न च दुःखरूपम् ।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते स्वरूपं किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारः ॥ 56 ॥
किं नाम भ्राम्यसि सखे न च ते जरादिः किं नाम भ्राम्यसि सखे न च ते मनश्च ।
किं नाम भ्राम्यसि सखे न च ते वयश्च किं नाम भ्राम्यसि सखे न च ते स्वभावः ॥ 57 ॥
किं ते कान्ताकनकमोहो बुद्धिवर्जितस्य ।
किं ते मानमोहो बुद्धिवर्जितस्य ॥ 58 ॥

अब “मैं” अपने चरम विस्तार पर पहुँचता है: अरे, हम ही शिव हैं, हम ही वंदनीय, हम ही देव, और जो यह चर-अचर जगत दिखता है, वह भी हम ही हैं। यदि वह देव सर्वगत है, स्थिर, पूर्ण, निरंतर, तो हमें कहीं अंतराल दिखता ही नहीं, और जहाँ रिक्त स्थान ही नहीं, वहाँ वह बाहर और भीतर कैसे हो। यह सारा जगत अखंडित और निरंतर स्फुरित हो रहा है; अहो, यह माया का महा-मोह, यह द्वैत और अद्वैत की विकल्पना, एक अखंड तत्त्व पर ये विकल्प आरोपित होते देख विस्मय और करुणा दोनों उठते हैं। साकार हो या निराकार, “नेति-नेति” से दोनों को सदा निरस्त करते जाने पर, भेद और अभेद से मुक्त, अंत में जो रहता है, वही केवल शिव।

59 · 60 · 61 · 62

अहो शिवो ह्यहं वन्द्यो ह्यहं वन्द्योऽहमेव हि ।
अहं देवो ह्यहं देवो जगच्चाहं चराचरम् ॥ 59 ॥
यदि सर्वगतो देवः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः ।
अन्तरं हि न पश्यामि स बाह्याभ्यन्तरः कथम् ॥ 60 ॥
स्फुरत्येव जगत्कृत्स्नमखण्डितनिरन्तरम् ।
अहो मायामहामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ 61 ॥
साकारं च निराकारं नेति नेतीति सर्वदा ।
भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः ॥ 62 ॥

आपकी न माँ है, न पिता, न बंधु, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र, न कोई पक्ष लेने वाला, न विपक्ष में जाने वाला; सब सम्बन्ध भी “नहीं” कह दिए, और यही सबसे कठिन पचने वाला वचन है, इसीलिए सबसे साहसी, तब चित्त में यह संताप कैसा। दिन और रात आपके चित्त के नहीं, न उदय है, न अस्त; तो देह से परे जो है, उसमें शरीर होने की कल्पना ज्ञानी कैसे करें। न अविभक्त, न विभक्त, न दुख-सुख आदि, न सर्व, न असर्व; सब विरोधी युग्म एक साथ काट कर आत्मा को अव्यय जानो, वह इनमें से किसी कोटि में समाता नहीं। न हम कर्ता हैं, न भोक्ता; हमारा कोई कर्म न पहले था, न अब है; न हमारा देह है, न विदेह, तब “मेरा” या “मेरा नहीं” का प्रश्न ही कैसा, क्योंकि ममता-रहित होना भी एक स्थिति ही है, और तत्त्व उससे भी आगे है।

63 · 64 · 65 · 66

न ते च माता च पिता च बन्धुः न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम् ।
न पक्षपाती न विपक्षपातः कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते ॥ 63 ॥
दिवा नक्तं न ते चित्तं उदयास्तमयौ न हि ।
विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः ॥ 64 ॥
नाविभक्तं विभक्तं च न हि दुःखसुखादि च ।
न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम् ॥ 65 ॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च न मे कर्म पुराऽधुना ।
न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम् ॥ 66 ॥

हममें राग आदि कोई दोष नहीं, देह आदि का दुख भी हमारा नहीं; हमें एक, विशाल, गगन-समान आत्मा जानो, यही वह प्रतिमा है जिस पर मन ठहर कर विश्राम पाता है। और अंत में मन को मित्र मानकर अवधूत समूचे अध्याय का सार एक वाक्य में रख देते हैं: हे मन-सखा, बहुत बोलने से क्या लाभ, यह सब केवल तर्क-योग्य है; जो सार हमने कहा वह बस इतना, आप ही तत्त्व हैं, गगन-समान। फिर देह छूटने की बात आती है: किसी भी भाव में, कहीं भी, देह छूटने पर योगी वहीं लीन हो जाते हैं, जैसे घड़े का आकाश महाकाश में, क्योंकि मरने का स्थान, ढंग या समय कुछ नहीं ठहराता।

67 · 68 · 69

न मे रागादिको दोषो दुःखं देहादिकं न मे ।
आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम् ॥ 67 ॥
सखे मनः किं बहुजल्पितेन सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम् ।
यत्सारभूतं कथितं मया ते त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि ॥ 68 ॥
येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि ।
योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे ॥ 69 ॥

तीर्थ में हो या किसी अन्त्यज के घर में, स्मृति खो कर भी जो देह त्यागता है, वह उसी क्षण देह-मुक्त होकर कैवल्य में व्याप्त हो जाता है; मरने के स्थान का पुण्य-पाप तत्त्व-दृष्टि में गौण है, यही दत्तात्रेय का निर्भीक वचन है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, और दो पैरों वाले से लेकर सारा चर-अचर, योगी इन सबको मरुभूमि के जल जैसा मानते हैं; जहाँ बंधन ही मृगतृष्णा है, वहाँ उसका अंत, मोक्ष भी, उसी कोटि में आ जाता है। अतीत, अनागत और वर्तमान, तीनों कालों के कर्म, “न हम करते हैं, न भोगते हैं”, यह हमारी निश्चल मति है, और इस निश्चय में स्थिर होकर सब स्थिर हो जाता है।

70 · 71 · 72

तीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्टस्मृतिरपि त्यजन् ।
समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत् ॥ 70 ॥
धर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम् ।
मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम् ॥ 71 ॥
अतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च ।
न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः ॥ 72 ॥

अब “अवधूत” शब्द साकार हो उठता है: सूने घर में सम-रस से पवित्र, अकेला, सुखपूर्वक वह बैठता है; नग्न विचरता है, गर्व त्याग कर, और केवल आत्मा में सब कुछ पा लेता है, यही उसकी जीवन-रेखा है। जहाँ जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति, ये तीन, और तुरीय भी नहीं, वहाँ वह केवल आत्मा को ही पाता है; और जहाँ धर्म और अधर्म भी नहीं, वहाँ बद्ध और मुक्त का प्रश्न ही कैसा। वह कुछ पाता-खोजता ही नहीं; न मंत्र, न छंद का लक्षण, न तंत्र; सम-रस में मग्न और भावना से पवित्र, परम-अवधूत अपने ही इस वचन को “प्रलाप” कह देता है, क्योंकि जहाँ कहने को कुछ शेष नहीं, वहाँ शब्द भी निरर्थक बहाव मात्र है। और प्रथम अध्याय यहीं विश्राम लेता है: सब शून्य और अशून्य है, सत्य और असत्य का भेद नहीं रहता; यह वचन स्वभाव की सहजता से उठा है और शास्त्र के बोध से भी पुष्ट है, अनुभव और प्रमाण दोनों इसमें साथ हैं।

73 · 74 · 75 · 76

शून्यागारे समरसपूत- स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः ।
चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं विन्दति केवलमात्मनि सर्वम् ॥ 73 ॥
त्रितयतुरीयं न हि नहि यत्र विन्दति केवलमात्मनि तत्र ।
धर्माधर्मौ न हि नहि यत्र बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र ॥ 74 ॥
विन्दति विन्दति न हि नहि मन्त्रं छन्दोलक्षणं न हि नहि तन्त्रम् ।
समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ 75 ॥
सर्वशून्यमशून्यं च सत्यासत्यं न विद्यते ।
स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ 76 ॥

अध्याय का संकेत

दूसरे अध्याय में यही धारा आगे बहती है, थोड़े और स्थूल रूप में, जहाँ बार-बार वही वचन लौटता है, “आप ही ब्रह्म हैं।” प्रथम अध्याय की कील श्लोक 50 में है, “न बद्ध, न मुक्त, न ब्रह्म से पृथक्।” बंधन यदि कभी हुआ ही नहीं, तो मोक्ष का प्रश्न भी अपने आप विलीन हो जाता है।

मूल पाठ: अवधूत गीता, परम्परा से दत्तात्रेय की रचना। देवनागरी मूल यथावत्, प्रथम अध्याय के 76 श्लोक।

स्थायी पता: /avadhuta-gita/adhyaya-1/

अंतिम बार देखा गया: 2026-05-23

English