अवधूत गीता, अध्याय 1: आत्म-तत्त्व | Avadhūta Gītā Ch.1

अवधूत गीता · अध्याय एक

आत्म-तत्त्व

छिहत्तर श्लोकों में दत्तात्रेय का सबसे लम्बा गायन, पूरे ग्रंथ की नींव।

एक स्व-गायन की शुरुआत

पहला अध्याय अवधूत गीता का सबसे विस्तृत है, छिहत्तर श्लोक, और शेष ग्रंथ का परिचय भी। दत्तात्रेय यहाँ किसी प्रश्न के उत्तर में नहीं बोल रहे। यह उनका अपना उद्घोषण है, एक तरह की ज़ोर से सोची हुई स्व-स्वीकृति, जो शब्दों में बँध कर हम तक आ पहुँची है।

श्लोक एक में ही पूरी पुस्तक की कुंजी मिल जाती है, “ईश्वर के अनुग्रह से ही पुरुषों में अद्वैत-वासना उत्पन्न होती है”। यह कोई शिक्षा-वाक्य नहीं है, यह एक स्वीकृति है, इस बात की कि जिस बोध की बात आगे की जाएगी, वो पढ़ने या सोचने से नहीं उपजता। इसका आना अनुग्रह की तरह आना है, और जो पाठक यह स्वीकार कर सके, उसके लिए शेष श्लोक एक नए तरह के तर्क-शास्त्र में खुल जाते हैं।

आगे के पच्हत्तर श्लोक एक केन्द्रीय वाक्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, “मैं हूँ”। हर श्लोक उसी एक तत्त्व को थोड़ा-सा अलग कोण से कहता है। कहीं “मैं गगन-समान हूँ”, कहीं “मैं अकालिक हूँ”, कहीं “मैं द्वैत-अद्वैत-वर्जित हूँ”। यह दोहराव श्रोता को थका सकता है, मगर यही ग्रंथ का तरीक़ा है, बार-बार उसी एक तत्त्व का संकेत, जब तक वो श्रोता के भीतर बैठ न जाए।

76 श्लोक, श्लोक-दर-श्लोक

श्लोक 1Ishvar-anugrah
ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना । महद्भयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते ॥ १॥
īśvarānugrahādeva puṃsāmadvaitavāsanā । mahadbhayaparitrāṇādviprāṇāmupajāyate ॥ 1॥

ईश्वर-कृपा से ही पुरुषों में अद्वैत-वासना उत्पन्न होती है, और वो भी विप्रों में जिन्हें महद्भय (mahA-bhaya, सबसे-बड़े-भय यानी मृत्यु-संसार) से paritrAN (बचाव) प्राप्त हुआ हो।

संगति: Stotra का opening, बहुत-important।ईश्वर-कृपा है। और यह कृपा उसी को मिलती है जिसे पहले ‘महद्भय’ से मुक्ति मिल चुकी हो, यानी जिसने मृत्यु-संसार के डर से ऊपर उठना सीख लिया हैं।
श्लोक 2Pratham-vandan
येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि । निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २॥
yenedaṃ pūritaṃ sarvamātmanaivātmanātmani । nirākāraṃ kathaṃ vande hyabhinnaṃ śivamavyayam ॥ 2॥

जिसने इस सब को आत्मा-से, आत्मा-में, आत्मा-के-द्वारा भरा हुआ है, उस निराकार, अभिन्न, शिव, अव्यय को हम कैसे प्रणाम करें?

संगति: एक paradox: नमस्कार करने के लिए दो चाहिए, नमस्कार करने वाला और नमस्कार-लेने वाला। मगर अद्वैत में दो नहीं। तो प्रणाम कैसे? यह verse पूरे stotra का tone set करता है, हर-traditional-रूप को question करता है।
श्लोक 3Vishva-marichika
पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् । कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३॥
pañcabhūtātmakaṃ viśvaṃ marīcijalasannibham । kasyāpyaho namaskuryāmahameko nirañjanaḥ ॥ 3॥

पाँच-भूत-आत्मक यह विश्व मरीचि-जल (मृग-तृष्णा) समान है। किसको हम namaskAr करें, हम तो अकेले निरंजन हैं।

संगति: विश्व illusion है, यह बौद्ध भी कहते, अद्वैत-वेदान्त भी। मगर बौद्ध ‘शून्य’ पर पहुँचते, अद्वैत ‘पूर्ण’ पर। दत्तात्रेय यहाँ ‘अहं एको निरंजन’ कह कर अद्वैत-position लेते हैं।
श्लोक 4Bhed-abhed naa
आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते । अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४॥
ātmaiva kevalaṃ sarvaṃ bhedābhedo na vidyate । asti nāsti kathaṃ brūyāṃ vismayaḥ pratibhāti me ॥ 4॥

आत्मा ही केवल सब-कुछ है, भेद-अभेद नहीं। ‘है’ या ‘नहीं’ कैसे कहूँ? मुझे यह विस्मय (आश्चर्य) ही लगता है।

संगति: Realised-state का बयान। logic-categories (‘है’, ‘नहीं’, ‘भेद’, ‘अभेद’) सब-collapse हो जाते हैं। बचता है सिर्फ़ विस्मय। यह ‘aesthetic-realisation’ का statement है।
श्लोक 5Vedanta ka saar
वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानं विज्ञानमेव च । अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५॥
vedāntasārasarvasvaṃ jñānaṃ vijñānameva ca । ahamātmā nirākāraḥ sarvavyāpī svabhāvataḥ ॥ 5॥

वेदान्त का सार-सर्वस्व, ज्ञान-विज्ञान, यही है: हम-आत्मा निराकार, सर्व-व्यापी, स्वभावतः हैं।

संगति: एक-वाक्य में पूरा-वेदान्त। अहम् + आत्मा + निराकार + सर्व-व्यापी + स्वभावतः। पाँच-शब्द, पूरा-दर्शन।
श्लोक 6Niskala devata
यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः । स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवायं न संशयः ॥ ६॥
yo vai sarvātmako devo niṣkalo gaganopamaḥ । svabhāvanirmalaḥ śuddhaḥ sa evāyaṃ na saṃśayaḥ ॥ 6॥

जो सर्व-आत्मक देव, निष्कल, गगन-समान, स्वभाव-निर्मल, शुद्ध है, वही यह (आत्मा), इसमें कोई-संशय नहीं।

संगति: देव और आत्मा का identification। नीचे पाँच-attributes। ‘गगन-समान’ (आकाश-तुल्य) पूरे-stotra का सबसे-frequent-metaphor है।
श्लोक 7Suchhh-vij~nan vigrah
अहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः । सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७॥
ahamevāvyayo’nantaḥ śuddhavijñānavigrahaḥ । sukhaṃ duḥkhaṃ na jānāmi kathaṃ kasyāpi vartate ॥ 7॥

हम ही अव्यय, अनन्त, शुद्ध-विज्ञान-विग्रह। सुख-दुःख नहीं जानते, फिर किस के लिए कैसे यह वर्तता है?

संगति: Realised-state में सुख-दुःख dissolve हो जाते हैं। यह ‘किसके लिए?’ वाला सवाल पूरे stotra में बार-बार आएगा।
श्लोक 8Karm ka tyaag
न मानसं कर्म शुभाशुभं मे न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे । न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८॥
na mānasaṃ karma śubhāśubhaṃ me na kāyikaṃ karma śubhāśubhaṃ me । na vācikaṃ karma śubhāśubhaṃ me jñānāmṛtaṃ śuddhamatīndriyo’ham ॥ 8॥

हमारा कोई-मानसिक कर्म नहीं शुभ-अशुभ, कोई-कायिक नहीं, कोई-वाचिक नहीं। हम ज्ञान-अमृत, शुद्ध, अतीन्द्रिय।

संगति: Triple-negation (मन-वाणी-शरीर)। यह वेदान्त की त्रिकरण-शुद्धि का negative-side, सब-कर्म collapse।
श्लोक 9Manas-vichaar
मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम् । मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः ॥ ९॥
mano vai gaganākāraṃ mano vai sarvatomukham । mano’tītaṃ manaḥ sarvaṃ na manaḥ paramārthataḥ ॥ 9॥

मन गगन-आकार है, सर्व-तो-मुख है, मन-अतीत है, मन-सर्व है, मगर परमार्थ-तह में मन नहीं।

संगति: मन के बारे में चार-statements, अन्त में ‘मन नहीं।’ यह नागार्जुन की catuShkoTi-तर्क-style है, सब-options exhaust करो, फिर silence।
श्लोक 10Pratyaksha-tirohit
अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम् । पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम् ॥ १०॥
ahamekamidaṃ sarvaṃ vyomātītaṃ nirantaram । paśyāmi kathamātmānaṃ pratyakṣaṃ vā tirohitam ॥ 10॥

हम एक हैं, यह सब-कुछ हैं, व्योम-से-अतीत हैं, निरंतर हैं। तो हम अपने को कैसे देखें, साक्षात् या तिरोहित?

संगति: Self-observation का paradox। देखने वाला और देखा-जाने वाला अगर एक हो, तो ‘देखना’ meaningful नहीं रहता।
श्लोक 11Aakhanditatam
त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम् । सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे ॥ ११॥
tvamevamekaṃ hi kathaṃ na budhyase samaṃ hi sarveṣu vimṛṣṭamavyayam । sadodito’si tvamakhaṇḍitaḥ prabho divā ca naktaṃ ca kathaṃ hi manyase ॥ 11॥

आप-ही-एक हैं, फिर क्यों नहीं समझते? सबमें-समान, अव्यय, सदा-उदित, अखण्डित प्रभु। फिर ‘दिन’ और ‘रात’ का भेद कैसे करते हैं?

संगति: स्वयं को confront करते हुए। चित्त को सीधे संबोधन।मन-mtnoth के projection हैं।
श्लोक 12Dhyaata-dhyey ek
आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम् । अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम् ॥ १२॥
ātmānaṃ satataṃ viddhi sarvatraikaṃ nirantaram । ahaṃ dhyātā paraṃ dhyeyamakhaṇḍaṃ khaṇḍyate katham ॥ 12॥

आत्मा को सतत जानो, सब-त्र एक, निरंतर। हम ध्याता, परम-ध्येय, अखण्ड। यह कैसे खण्डित हो?

संगति: मेडिटेशन में ध्याता-ध्यान-ध्येय की त्रिपुटी (triplet) है। अद्वैत में यह collapse, तीनों एक।
श्लोक 13Janma-mrityu naa
न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन । सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः ॥ १३॥
na jāto na mṛto’si tvaṃ na te dehaḥ kadācana । sarvaṃ brahmeti vikhyātaṃ bravīti bahudhā śrutiḥ ॥ 13॥

आप न जन्मे न मरे, न आपका देह कभी था। ‘सब ब्रह्म है’, यह श्रुति बहु-बार कहती है।

संगति: श्रुति-प्रमाण: सब-ब्रह्म। तो जो-आप-हो, वो ही ब्रह्म, तो जन्म-मरण कैसे?
श्लोक 14Bahy-aabhyantar shiv
स बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा । इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ॥ १४॥
sa bāhyābhyantaro’si tvaṃ śivaḥ sarvatra sarvadā । itastataḥ kathaṃ bhrāntaḥ pradhāvasi piśācavat ॥ 14॥

आप बाह्य-अभ्यन्तर, शिव सब-त्र-सदा। फिर इत-स्तह क्यों पिशाच-जैसे भागते हैं?

संगति: एक-तीक्ष्ण-प्रश्न: आप-शिव हैं, फिर पागल-जैसे क्यों इधर-उधर भाग रहे हैं? यह दत्तात्रेय का सीधा-question, अहंकार को directly hit करता है।
श्लोक 15Sanyog-viyog naa
संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे । न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम् ॥ १५॥
saṃyogaśca viyogaśca vartate na ca te na me । na tvaṃ nāhaṃ jagannedaṃ sarvamātmaiva kevalam ॥ 15॥

संयोग-वियोग न आपके, न मेरे। न आप, न हम, न जगत्। सब आत्मा ही केवल।

संगति: Relational-categories (मिलना-बिछुड़ना) भी collapse। ‘मैं-आप-जगत्’ तीनों conventional-fictions हैं।
श्लोक 16Shabd-adi panchak
शब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः । त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे ॥ १६॥
śabdādipañcakasyāsya naivāsi tvaṃ na te punaḥ । tvameva paramaṃ tattvamataḥ kiṃ paritapyase ॥ 16॥

शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध, इन-पाँच का आप नहीं, न आपका। आप ही परम-तत्त्व, फिर क्यों परिताप (दुःख) करते हैं?

संगति: इन्द्रिय-तत्त्वों से identity break-कर के realisation। पाँच इन्द्रिय-विषयों से separation।
श्लोक 17Naam-rupa naa
जन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ । कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे ॥ १७॥
janma mṛtyurna te cittaṃ bandhamokṣau śubhāśubhau । kathaṃ rodiṣi re vatsa nāmarūpaṃ na te na me ॥ 17॥

जन्म-मृत्यु आपकी चित्त नहीं, बन्ध-मोक्ष नहीं, शुभ-अशुभ नहीं। हे वत्स, क्यों रोते हैं? नाम-रूप आपका भी नहीं, मेरा भी नहीं।

संगति: Vatsa (बच्चा) कह कर compassion दिखाते। एक-warm का स्वर का verse, बाक़ी-stark का स्वर वालों के बीच।
श्लोक 18Pishachvat na
अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् । अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव ॥ १८॥
aho citta kathaṃ bhrāntaḥ pradhāvasi piśācavat । abhinnaṃ paśya cātmānaṃ rāgatyāgātsukhī bhava ॥ 18॥

हे चित्त! क्यों भ्रान्त हो पिशाच-जैसे भागते हैं? अभिन्न (एक) आत्मा को देखो, राग-त्याग से सुखी बनो।

संगति: Repetition for emphasis: ‘पिशाचवत्’ दूसरी-बार। मन को एक practical-instruction: राग-त्याग, और सुख।
श्लोक 19Vimoksh vigrah
त्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम् । न ते च रागो ह्यथवा विरागः कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः ॥ १९॥
tvameva tattvaṃ hi vikāravarjitaṃ niṣkampamekaṃ hi vimokṣavigraham । na te ca rāgo hyathavā virāgaḥ kathaṃ hi santapyasi kāmakāmataḥ ॥ 19॥

आप ही वो तत्त्व हैं, विकार-रहित, निष्कम्प, एक, विमोक्ष-विग्रह। आपका न राग न विराग, फिर क्यों काम-काम से तपते हैं?

संगति: Mathematical-elegance का verse। आप-तत्त्व, बाकी सब-डिस्क्रिप्शन इसी की। और अंत में काम-काम (lust-pursuit) से free।
श्लोक 20Shrutigana sammat
वदन्ति श्रुतयः सर्वाः निर्गुणं शुद्धमव्ययम् । अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः ॥ २०॥
vadanti śrutayaḥ sarvāḥ nirguṇaṃ śuddhamavyayam । aśarīraṃ samaṃ tattvaṃ tanmāṃ viddhi na saṃśayaḥ ॥ 20॥

सब श्रुति-यें कहती हैं, निर्गुण, शुद्ध, अव्यय, अशरीर, सम-तत्त्व। हमको ऐसा जानो, कोई संशय नहीं।

संगति: श्रुति-multiple का प्रमाण। निर्गुण-तत्त्व ही दत्तात्रेय की self-identity है।
श्लोक 21Saakar mithya
साकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम् । एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ २१॥
sākāramanṛtaṃ viddhi nirākāraṃ nirantaram । etattattvopadeśena na punarbhavasambhavaḥ ॥ 21॥

साकार (form-वाला) अनृत (false) जानो, निराकार निरंतर। इस-तत्त्व-उपदेश से पुनर्जन्म नहीं।

संगति: Soteriology: यह realisation मोक्ष देती है, फिर जन्म नहीं। punarbhavasambhava का negation।
श्लोक 22Ek-anek dvanda
एकमेव समं तत्त्वं वदन्ति हि विपश्चितः । रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते ॥ २२॥
ekameva samaṃ tattvaṃ vadanti hi vipaścitaḥ । rāgatyāgātpunaścittamekānekaṃ na vidyate ॥ 22॥

विद्वान सब-एक ही तत्त्व कहते। राग-त्याग से चित्त एक-अनेक नहीं रहता।

संगति: वेदान्त-शास्त्र की unanimous-position: एक। ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति।’
श्लोक 23Samaadhi paradox
अनात्मरूपं च कथं समाधि\- रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः । अस्तीति नास्तीति कथं समाधि\- र्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम् ॥ २३॥
anātmarūpaṃ ca kathaṃ samādhi\- rātmasvarūpaṃ ca kathaṃ samādhiḥ । astīti nāstīti kathaṃ samādhi\- rmokṣasvarūpaṃ yadi sarvamekam ॥ 23॥

अन-आत्म-रूप कैसे समाधि? आत्म-स्वरूप कैसे समाधि? ‘है’ कैसे? ‘नहीं है’ कैसे? अगर सब-एक हो तो मोक्ष-स्वरूप भी कैसे?

संगति: Catuskoti-elimination। सब-positions exhaust। यही गौडपाद का तरीक़ा।
श्लोक 24Videh aja avyay
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः । जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ २४॥
viśuddho’si samaṃ tattvaṃ videhastvamajo’vyayaḥ । jānāmīha na jānāmītyātmānaṃ manyase katham ॥ 24॥

आप विशुद्ध, सम-तत्त्व, विदेह, अज, अव्यय। ‘जानता हूँ’ या ‘नहीं जानता’, इस-तरह आत्मा को कैसे मानते हैं?

संगति: Knower-known कोई-position आत्मा पर apply नहीं हो सकती। एक meta का स्तर point।
श्लोक 25Tat tvam asi
तत्त्वमस्यादिवाक्येन स्वात्मा हि प्रतिपादितः । नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम् ॥ २५॥
tattvamasyādivākyena svātmā hi pratipāditaḥ । neti neti śrutirbrūyādanṛtaṃ pāñcabhautikam ॥ 25॥

‘तत् त्वम् असि’ इत्यादि वाक्य से स्वात्मा प्रतिपादित। ‘नेति-नेति’ श्रुति कहती है, अनृत है यह पाँच-भौतिक।

संगति: महावाक्य की direct-quotation। अद्वैत का foundational वचन। और ‘नेति-नेति’ (न-इति, न-इति) negation की विधि।
श्लोक 26Dhyaata-dhyana naa
आत्मन्येवात्मना सर्वं त्वया पूर्णं निरन्तरम् । ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम् ॥ २६॥
ātmanyevātmanā sarvaṃ tvayā pūrṇaṃ nirantaram । dhyātā dhyānaṃ na te cittaṃ nirlajjaṃ dhyāyate katham ॥ 26॥

आपके अंदर आप-से सब पूर्ण, निरंतर। ध्याता-ध्यान आपका चित्त नहीं। निर्लज्ज होते हुए कैसे ध्यान करते हैं?

संगति: ध्यान-process itself एक conceptual-error है, अद्वैत-perspective से। ‘निर्लज्ज’ (बिना-लाज) word strong-है, इस-error पर directly हिट।
श्लोक 27Bhajana-vandana paradox
शिवं न जानामि कथं वदामि शिवं न जानामि कथं भजामि । अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं समस्वरूपं गगनोपमं च ॥ २७॥
śivaṃ na jānāmi kathaṃ vadāmi śivaṃ na jānāmi kathaṃ bhajāmi । ahaṃ śivaścetparamārthatattvaṃ samasvarūpaṃ gaganopamaṃ ca ॥ 27॥

कैसे कहूँ? शिव को जानता नहीं, कैसे भजूँ? अगर हम-शिव हैं, तो परमार्थ-तत्त्व, सम-स्वरूप, गगन-समान।

संगति: एक-deep-paradox: bhakti के लिए दो-चाहिए, भक्त और भगवान। अद्वैत में दो नहीं। तो भजन कैसे? यह सबसे-तीक्ष्ण-वाक्य।
श्लोक 28Grahy-grahak nirmukt
नाहं तत्त्वं समं तत्त्वं कल्पनाहेतुवर्जितम् । ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत् ॥ २८॥
nāhaṃ tattvaṃ samaṃ tattvaṃ kalpanāhetuvarjitam । grāhyagrāhakanirmuktaṃ svasaṃvedyaṃ kathaṃ bhavet ॥ 28॥

हम तत्त्व नहीं, सम-तत्त्व, कल्पना-हेतु-वर्जित। ग्राह्य-ग्राहक (object-subject) से निर्मुक्त, स्व-संवेद्य (self-experienced) कैसे होंगे?

संगति: Subject-object structure collapse। ‘मैं देखता-हूँ’ में देखने-वाला और देखी-जाने-वाली चीज़, दोनों आत्मा के projection हैं।
श्लोक 29Ananta rupa nahi
अनन्तरूपं न हि वस्तु किञ्चि\- त्तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित् । आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा ॥ २९॥
anantarūpaṃ na hi vastu kiñci\- ttattvasvarūpaṃ na hi vastu kiñcit । ātmaikarūpaṃ paramārthatattvaṃ na hiṃsako vāpi na cāpyahiṃsā ॥ 29॥

अनन्त-रूप कोई-वस्तु नहीं, तत्त्व-स्वरूप कोई-वस्तु नहीं। आत्म-एक-रूप परमार्थ-तत्त्व, न हिंसक, न अहिंसा।

संगति: नैतिक-categories भी collapse। हिंसा-अहिंसा conventional-distinctions हैं, ultimate-नहीं।
श्लोक 30Vibhrama katham
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम् । विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः ॥ ३०॥
viśuddho’si samaṃ tattvaṃ videhamajamavyayam । vibhramaṃ kathamātmārthe vibhrānto’haṃ kathaṃ punaḥ ॥ 30॥

आप विशुद्ध, सम-तत्त्व, विदेह, अज, अव्यय। आत्म-अर्थ में विभ्रम कैसे? मैं फिर भ्रान्त कैसे?

संगति: Confronting-self-question: अगर आत्मा शुद्ध, तो भ्रम कहाँ-से आया? यह माया-question का root।
श्लोक 31Ghat-akash udaharan
घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम् । शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे ॥ ३१॥
ghaṭe bhinne ghaṭākāśaṃ sulīnaṃ bhedavarjitam । śivena manasā śuddho na bhedaḥ pratibhāti me ॥ 31॥

घट (matka) टूटा, घट-आकाश (matke-के-अंदर का आकाश) सु-लीन (बाहर-वाले आकाश में मिल गया), भेद-वर्जित। शिव-मन से शुद्ध, मुझे भेद नहीं दिखता।

संगति: Ghat-akash-दृष्टान्त: matka-में-आकाश अंदर-बाहर एक ही है, matka tअब्ही दीवार है। तब-शरीर तब्ही दीवार। शरीर-टूटा, सब-आकाश-एक।
श्लोक 32Ghat-jeev naa
न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः । केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम् ॥ ३२॥
na ghaṭo na ghaṭākāśo na jīvo jīvavigrahaḥ । kevalaṃ brahma saṃviddhi vedyavedakavarjitam ॥ 32॥

न घट, न घट-आकाश, न जीव, न जीव-विग्रह। केवल ब्रह्म जानो, वेद्य-वेदक से वर्जित।

संगति: पिछले-verse के dRRiShTanta को extend। सब-distinctions illusory।
श्लोक 33Sarva-shoonya-ashoonya
सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम् । सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः ॥ ३३॥
sarvatra sarvadā sarvamātmānaṃ satataṃ dhruvam । sarvaṃ śūnyamaśūnyaṃ ca tanmāṃ viddhi na saṃśayaḥ ॥ 33॥

सब-त्र-सब-दा सब आत्मा सतत-ध्रुव। सब-शून्य और अ-शून्य, मुझे ऐसा जानो।

संगति: Buddhist (शून्य) और Vedantic (अशून्य, पूर्ण) position मिलते। दोनों एक-ही point को आ-रहे हैं।
श्लोक 34Varn-aashram naa
वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा वर्णाश्रमो नैव कुलं न जातिः । न धूममार्गो न च दीप्तिमार्गो ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ ३४॥
vedā na lokā na surā na yajñā varṇāśramo naiva kulaṃ na jātiḥ । na dhūmamārgo na ca dīptimārgo brahmaikarūpaṃ paramārthatattvam ॥ 34॥

न वेद, न लोक, न सुर, न यज्ञ, न वर्ण-आश्रम, न कुल, न जाति। न धूम-मार्ग, न दीप्ति-मार्ग। ब्रह्म-एक-रूप परमार्थ।

संगति: Anti-Establishment! जाति-वर्ण-यज्ञ-वैदिक-system, सब-conventional। ब्रह्म इस-से ऊपर।
श्लोक 35Vyapy-vyapak naa
व्याप्यव्यापकनिर्मुक्तः त्वमेकः सफलं यदि । प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ३५॥
vyāpyavyāpakanirmuktaḥ tvamekaḥ saphalaṃ yadi । pratyakṣaṃ cāparokṣaṃ ca hyātmānaṃ manyase katham ॥ 35॥

व्याप्य-व्यापक (पकड़ा-जाने-वाला और पकड़ने-वाला) से निर्मुक्त, आप एक, सफल-यदि। प्रत्यक्ष-अपरोक्ष आत्मा कैसे मानते?

संगति: Container-contained dichotomy भी collapse।
श्लोक 36Dvaita-advaita transcendence
अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे । समं तत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ३६॥
advaitaṃ kecidicchanti dvaitamicchanti cāpare । samaṃ tattvaṃ na vindanti dvaitādvaitavivarjitam ॥ 36॥

कुछ-अद्वैत चाहते, कुछ-द्वैत। सम-तत्त्व नहीं पाते, जो द्वैत-अद्वैत दोनों-से वर्जित।

संगति: बहुत-important verse: अद्वैत-भी एक-position है, और किसी-position के against खड़ी है (द्वैत)। दोनों-से ऊपर तत्त्व।
श्लोक 37Manovaachaam agochar
श्वेतादिवर्णरहितं शब्दादिगुणवर्जितम् । कथयन्ति कथं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ ३७॥
śvetādivarṇarahitaṃ śabdādiguṇavarjitam । kathayanti kathaṃ tattvaṃ manovācāmagocaram ॥ 37॥

श्वेत-इत्यादि वर्ण-रहित, शब्द-इत्यादि गुण-वर्जित। मन-वाणी से अगोचर, उस-तत्त्व को कैसे कहते?

संगति: Apophatic-theology का essence। तत्त्व mind-language-beyond। मगर stotra खुद-शब्दों से बना, तो यह self-aware-irony।
श्लोक 38Mithy-tva से ब्रह्म-bodh
यदाऽनृतमिदं सर्वं देहादिगगनोपमम् । तदा हि ब्रह्म संवेत्ति न ते द्वैतपरम्परा ॥ ३८॥
yadā’nṛtamidaṃ sarvaṃ dehādigaganopamam । tadā hi brahma saṃvetti na te dvaitaparamparā ॥ 38॥

जब यह सब (देह-इत्यादि) गगन-समान अनृत (false) जानो, तब ब्रह्म-संवेदना (experience) होगी। द्वैत-परंपरा नहीं।

संगति: Pre-condition for brahman-anubhuti: देह-asakti छोड़ना।
श्लोक 39Sahaj-atma
परेण सहजात्मापि ह्यभिन्नः प्रतिभाति मे । व्योमाकारं तथैवैकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत् ॥ ३९॥
pareṇa sahajātmāpi hyabhinnaḥ pratibhāti me । vyomākāraṃ tathaivaikaṃ dhyātā dhyānaṃ kathaṃ bhavet ॥ 39॥

पर-के साथ सहज-आत्मा भी अभिन्न। व्योम-आकार एक ही, ध्याता-ध्यान कैसे हो?

संगति: ‘सहज’ word महत्त्वपूर्ण, यह नाथ-संप्रदाय का key-term, ‘natural-state’।
श्लोक 40Karm-akarm
यत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत् । एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः ॥ ४०॥
yatkaromi yadaśnāmi yajjuhomi dadāmi yat । etatsarvaṃ na me kiñcidviśuddho’hamajo’vyayaḥ ॥ 40॥

जो करता हूँ, खाता हूँ, होम करता हूँ, देता हूँ, यह सब मेरा नहीं। हम विशुद्ध, अज, अव्यय।

संगति: गीता का ‘न त्वेवाहं जातु नासम्’ (मैं कभी नहीं था ऐसा-नहीं-है) का echo। कर्ता-भोक्ता disclaimer।
श्लोक 41Jagat shiv-rup
सर्वं जगद्विद्धि निराकृतीदं सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम् । सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम् ॥ ४१॥
sarvaṃ jagadviddhi nirākṛtīdaṃ sarvaṃ jagadviddhi vikārahīnam । sarvaṃ jagadviddhi viśuddhadehaṃ sarvaṃ jagadviddhi śivaikarūpam ॥ 41॥

सब-जगत् को निराकृत जानो, सब-जगत् को विकार-हीन जानो, सब-जगत् को विशुद्ध-देह जानो, सब-जगत् को शिव-एक-रूप जानो।

संगति: चार-line, चार-statements, एक quartet। एक beautiful crescendo।
श्लोक 42Tvam tattvam
तत्त्वं त्वं न हि सन्देहः किं जानाम्यथवा पुनः । असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४२॥
tattvaṃ tvaṃ na hi sandehaḥ kiṃ jānāmyathavā punaḥ । asaṃvedyaṃ svasaṃvedyamātmānaṃ manyase katham ॥ 42॥

तत्त्व आप ही हैं, संशय नहीं। क्या जानूँ या क्या-नहीं-जानूँ? असंवेद्य, स्व-संवेद्य आत्मा कैसे मानते?

संगति: तत्त्व-tvam का strong-वाक्य, मगर थोड़ी-different-रूप, ‘तत्त्व-आप ही’।
श्लोक 43Maya-amaaya
मायाऽमाया कथं तात छायाऽछाया न विद्यते । तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम् ॥ ४३॥
māyā’māyā kathaṃ tāta chāyā’chāyā na vidyate । tattvamekamidaṃ sarvaṃ vyomākāraṃ nirañjanam ॥ 43॥

माया-अमाया कैसे, हे तात? छाया-अछाया नहीं। तत्त्व एक यह सब, व्योम-आकार, निरंजन।

संगति: द्वैत-binaries (माया-अमाया, छाया-अछाया) collapse। तात (पिता-तरह) कहना, intimate का स्वर।
श्लोक 44Aadi-madhy-antamukt
आदिमध्यान्तमुक्तोऽहं न बद्धोऽहं कदाचन । स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः ॥ ४४॥
ādimadhyāntamukto’haṃ na baddho’haṃ kadācana । svabhāvanirmalaḥ śuddha iti me niścitā matiḥ ॥ 44॥

हम आदि-मध्य-अंत-मुक्त, कभी-नहीं-बँधे। स्वभाव-निर्मल, शुद्ध, यह मेरी निश्चित-मति है।

संगति: Time-categories से ऊपर। ‘ आदि-मध्य-अन्त’ तीन-time-divisions। तीनों-से free।
श्लोक 45Mahad-aadi neti
महदादि जगत्सर्वं न किञ्चित्प्रतिभाति मे । ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ॥ ४५॥
mahadādi jagatsarvaṃ na kiñcitpratibhāti me । brahmaiva kevalaṃ sarvaṃ kathaṃ varṇāśramasthitiḥ ॥ 45॥

महद् (बुद्धि) इत्यादि जगत् कुछ-नहीं दिखता। ब्रह्म-केवल सब। वर्ण-आश्रम-स्थिति कैसे?

संगति: सांख्य-शब्दों (महद्) पर भी negation। सिर्फ़-ब्रह्म।
श्लोक 46Niraalamb-ashoony
जानामि सर्वथा सर्वमहमेको निरन्तरम् । निरालम्बमशून्यं च शून्यं व्योमादिपञ्चकम् ॥ ४६॥
jānāmi sarvathā sarvamahameko nirantaram । nirālambamaśūnyaṃ ca śūnyaṃ vyomādipañcakam ॥ 46॥

हम सब-तरह सब-जानते, एक-निरंतर। निरालंब (आधार-रहित), अ-शून्य, और शून्य व्योम-आदि-पंचक (पाँच-तत्त्व)।

संगति: एक paradox-वाक्य: निरालंब (no-support) मगर अ-शून्य (not-empty)।
श्लोक 47Strii-pum dvanda nahi
न षण्ढो न पुमान्न स्त्री न बोधो नैव कल्पना । सानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४७॥
na ṣaṇḍho na pumānna strī na bodho naiva kalpanā । sānando vā nirānandamātmānaṃ manyase katham ॥ 47॥

न षण्ढ, न पुरुष, न स्त्री। न बोध, न कल्पना। आनन्द-वाला या निरानन्द आत्मा कैसे मानते?

संगति: Gender-binaries भी इस-तत्त्व पर apply नहीं। आधुनिक-readings के लिए significant।
श्लोक 48Shudhh: kaise nahi
षडङ्गयोगान्न तु नैव शुद्धं मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् । गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव बुद्धम् ॥ ४८॥
ṣaḍaṅgayogānna tu naiva śuddhaṃ manovināśānna tu naiva śuddham । gurūpadeśānna tu naiva śuddhaṃ svayaṃ ca tattvaṃ svayameva buddham ॥ 48॥

षडंग-योग से शुद्ध नहीं, मन-विनाश से नहीं, गुरु-उपदेश से नहीं। स्वयं तत्त्व, स्वयम् ही बुद्ध।

संगति: बहुत-important: कोई-spiritual-practice शुद्धि नहीं देती। यह intrinsic है। यह विवेकानन्द-कह वाला ‘आप ही अपने मोक्षदाता’ पंक्ति का root।
श्लोक 49Pancha-deh naa
न हि पञ्चात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि । आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९॥
na hi pañcātmako deho videho vartate na hi । ātmaiva kevalaṃ sarvaṃ turīyaṃ ca trayaṃ katham ॥ 49॥

पंच-आत्मक देह नहीं, विदेह वर्तता नहीं। आत्मा ही केवल सब। तुरीय और त्रिक (तीन-states) कैसे?

संगति: पंच-कोश-system भी अप्लाई नहीं। और तुरीय-त्रिक-distinction-भी collapse।
श्लोक 50Baddh-mukt naa
न बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक् । न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ ५०॥
na baddho naiva mukto’haṃ na cāhaṃ brahmaṇaḥ pṛthak । na kartā na ca bhoktāhaṃ vyāpyavyāpakavarjitaḥ ॥ 50॥

न बँधा, न मुक्त। न ब्रह्म से अलग। न कर्ता, न भोक्ता। व्याप्य-व्यापक से वर्जित।

संगति: बन्ध-मोक्ष के परे, तो साधना-समाधि क्या-है? बस-है। existence ही mukti।
श्लोक 51Jal-jal udaharan
यथा जलं जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम् । प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ५१॥
yathā jalaṃ jale nyastaṃ salilaṃ bhedavarjitam । prakṛtiṃ puruṣaṃ tadvadabhinnaṃ pratibhāti me ॥ 51॥

जैसे जल में जल मिले, पानी-भेद-वर्जित। प्रकृति-पुरुष वैसे ही अभिन्न मुझको दिखते।

संगति: Beautiful image: water-in-water। सांख्य के प्रकृति-पुरुष-द्वैत को भी अद्वैत में dissolve।
श्लोक 52Saakar nirakar dvanda
यदि नाम न मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन । साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ५२॥
yadi nāma na mukto’si na baddho’si kadācana । sākāraṃ ca nirākāramātmānaṃ manyase katham ॥ 52॥

अगर-कभी मुक्त-नहीं, बँधे-नहीं, तो साकार-निराकार आत्मा कैसे मानते?

संगति: बँधा-मुक्त गया, तो साकार-निराकार-भी जाएगा।
श्लोक 53Param rup gaganaopaman
जानामि ते परं रूपं प्रत्यक्षं गगनोपमम् । यथा परं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम् ॥ ५३॥
jānāmi te paraṃ rūpaṃ pratyakṣaṃ gaganopamam । yathā paraṃ hi rūpaṃ yanmarīcijalasannibham ॥ 53॥

आपका परम-रूप जानता हूँ, प्रत्यक्ष, गगन-समान। मरीचि-जल-समान।

संगति: एक-गहन confidence-वाक्य: मैं जानता हूँ।
श्लोक 54Guru-upadesh naa
न गुरुर्नोपदेशश्च न चोपाधिर्न मे क्रिया । विदेहं गगनं विद्धि विशुद्धोऽहं स्वभावतः ॥ ५४॥
na gururnopadeśaśca na copādhirna me kriyā । videhaṃ gaganaṃ viddhi viśuddho’haṃ svabhāvataḥ ॥ 54॥

न गुरु, न उपदेश, न उपाधि, न क्रिया। विदेह-गगन जानो, हम विशुद्ध स्वभावतः।

संगति: Anti-pedagogical statement। मगर यह extreme का स्तर पर ही valid। शुरुआत में गुरु-ज़रूरी।
श्लोक 55Param tattva ahankar nahi
विशुद्धोऽस्य शरीरोऽसि न ते चित्तं परात्परम् । अहं चात्मा परं तत्त्वमिति वक्तुं न लज्जसे ॥ ५५॥
viśuddho’sya śarīro’si na te cittaṃ parātparam । ahaṃ cātmā paraṃ tattvamiti vaktuṃ na lajjase ॥ 55॥

आप विशुद्ध, सशरीर नहीं। चित्त पर-तत्त्व नहीं। ‘हम ही आत्मा परम-तत्त्व’ कहते लाज नहीं?

संगति: अहम्-ब्रह्म-अस्मि declare करने में conventional-shame होती है। दत्तात्रेय कहते, उस-शर्म को छोड़ो।
श्लोक 56Vatsa peeb
कथं रोदिषि रे चित्त ह्यात्मैवात्मात्मना भव । पिब वत्स कलातीतमद्वैतं परमामृतम् ॥ ५६॥
kathaṃ rodiṣi re citta hyātmaivātmātmanā bhava । piba vatsa kalātītamadvaitaṃ paramāmṛtam ॥ 56॥

हे चित्त, क्यों रोते? आत्मा ही आत्मा-से आत्मा बनो। हे वत्स, कल-अतीत अद्वैत परम-अमृत पियो।

संगति: Maternal का स्वर। ‘वत्स’ (बच्चा), ‘पीओ’ (पी लो)। दुलार-affection से चित्त को point किया।
श्लोक 57Bodh-abodh
नैव बोधो न चाबोधो न बोधाबोध एव च । यस्येदृशः सदा बोधः स बोधो नान्यथा भवेत् ॥ ५७॥
naiva bodho na cābodho na bodhābodha eva ca । yasyedṛśaḥ sadā bodhaḥ sa bodho nānyathā bhavet ॥ 57॥

न बोध, न अबोध। न बोध-अबोध। जिसका ऐसा सदा-बोध, उसी का बोध, अन्यथा नहीं।

संगति: Meta-knowing। ‘बोध है’ भी एक mental-construct है। तो वो भी छोड़ो।
श्लोक 58Sahaj dhruv
ज्ञानं न तर्को न समाधियोगो न देशकालौ न गुरूपदेशः । स्वभावसंवित्तरहं च तत्त्व\- माकाशकल्पं सहजं ध्रुवं च ॥ ५८॥
jñānaṃ na tarko na samādhiyogo na deśakālau na gurūpadeśaḥ । svabhāvasaṃvittarahaṃ ca tattva\- mākāśakalpaṃ sahajaṃ dhruvaṃ ca ॥ 58॥

ज्ञान न तर्क, न समाधि-योग, न देश-काल, न गुरु-उपदेश। स्वभाव-संवित्तर-तर हम तत्त्व, आकाश-कल्प, सहज, ध्रुव।

संगति: सहज-तत्त्व। यह natural state नहीं acquire करना है, यह already-है।
श्लोक 59Janma-mrityu
न जातोऽहं मृतो वापि न मे कर्म शुभाशुभम् । विशुद्धं निर्गुणं ब्रह्म बन्धो मुक्तिः कथं मम ॥ ५९॥
na jāto’haṃ mṛto vāpi na me karma śubhāśubham । viśuddhaṃ nirguṇaṃ brahma bandho muktiḥ kathaṃ mama ॥ 59॥

हम जन्मे-नहीं, मरे-नहीं। शुभ-अशुभ कर्म नहीं। विशुद्ध, निर्गुण, ब्रह्म। बन्ध-मुक्ति कैसे?

संगति: जन्म-मरण कह कर पूरी-soteriology को आगे रद्द किया।
श्लोक 60Bahy-aabhyantar paradox
यदि सर्वगतो देवः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः । अन्तरं हि न पश्यामि स बाह्याभ्यन्तरः कथम् ॥ ६०॥
yadi sarvagato devaḥ sthiraḥ pūrṇo nirantaraḥ । antaraṃ hi na paśyāmi sa bāhyābhyantaraḥ katham ॥ 60॥

अगर सर्व-गत देव, स्थिर, पूर्ण, निरंतर, तो अन्तर (gap) नहीं दिखता। ‘बाह्य-अभ्यन्तर’ कैसे?

संगति: बाहर-अंदर distinction भी ले-जाएँ। जब सब-कुछ देव, तो ‘बाहर’ कहाँ?
श्लोक 61Maya-maha-moh
स्फुरत्येव जगत्कृत्स्नमखण्डितनिरन्तरम् । अहो मायामहामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ ६१॥
sphuratyeva jagatkṛtsnamakhaṇḍitanirantaram । aho māyāmahāmoho dvaitādvaitavikalpanā ॥ 61॥

स्फुरत्येव (चमकता है) यह जगत्, अखण्डित, निरंतर। आह, माया-महा-मोह, द्वैत-अद्वैत-विकल्पना।

संगति: एक exclamation-style verse। ‘अहो!’ word से दर्द। माया-mohabbat को directly call out।
श्लोक 62Kevala shiv
साकारं च निराकारं नेति नेतीति सर्वदा । भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः ॥ ६२॥
sākāraṃ ca nirākāraṃ neti netīti sarvadā । bhedābhedavinirmukto vartate kevalaḥ śivaḥ ॥ 62॥

साकार और निराकार, नेति-नेति सब-दा। भेद-अभेद-निर्मुक्त, केवल शिव वर्तता।

संगति: एक summary-verse: सब-categories से ऊपर, बस-शिव।
श्लोक 63Mata-pita relations
न ते च माता च पिता च बन्धुः न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम् । न पक्षपाती न विपक्षपातः कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते ॥ ६३॥
na te ca mātā ca pitā ca bandhuḥ na te ca patnī na sutaśca mitram । na pakṣapātī na vipakṣapātaḥ kathaṃ hi santaptiriyaṃ hi citte ॥ 63॥

आपकी न माता, न पिता, न बन्धु। न पत्नी, न पुत्र, न मित्र। न पक्षपाती, न विपक्षपाती। चित्त में यह संताप क्यों?

संगति: Family-relations जो हमें suffer करवाती हैं, वो conventional हैं। आत्मा-level पर कुछ-नहीं।
श्लोक 64Divaa-naktam naa
दिवा नक्तं न ते चित्तं उदयास्तमयौ न हि । विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः ॥ ६४॥
divā naktaṃ na te cittaṃ udayāstamayau na hi । videhasya śarīratvaṃ kalpayanti kathaṃ budhāḥ ॥ 64॥

आपके चित्त को न दिन, न रात। न उदय-अस्तमय। विदेह को शरीर कैसे मानते?

संगति: Diurnal-cycle भी shariraka है, atmik नहीं।
श्लोक 65Avibhakt vibhakt
नाविभक्तं विभक्तं च न हि दुःखसुखादि च । न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम् ॥ ६५॥
nāvibhaktaṃ vibhaktaṃ ca na hi duḥkhasukhādi ca । na hi sarvamasarvaṃ ca viddhi cātmānamavyayam ॥ 65॥

अविभक्त-विभक्त नहीं, सुख-दुःख-इत्यादि नहीं। सर्व-असर्व नहीं। आत्मा को अव्यय जानो।

संगति: Triple-pair negation। Whole-part, joy-sorrow, all-not-all।
श्लोक 66Karta-bhokta naa
नाहं कर्ता न भोक्ता च न मे कर्म पुराऽधुना । न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम् ॥ ६६॥
nāhaṃ kartā na bhoktā ca na me karma purā’dhunā । na me deho videho vā nirmameti mameti kim ॥ 66॥

हम कर्ता-नहीं, भोक्ता-नहीं। कर्म पुराना-अभी कोई-नहीं। न देह, न विदेह। ‘मेरा-नहीं’, ‘मेरा’ क्या?

संगति: मेरा-not-मेरा द्वैत भी जाता।
श्लोक 67Rag-doSh naa
न मे रागादिको दोषो दुःखं देहादिकं न मे । आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम् ॥ ६७॥
na me rāgādiko doṣo duḥkhaṃ dehādikaṃ na me । ātmānaṃ viddhi māmekaṃ viśālaṃ gaganopamam ॥ 67॥

हमको राग-इत्यादि दोष नहीं, देह-इत्यादि दुःख नहीं। हमको एक जानो, विशाल, गगन-समान।

संगति: बहुत common-verse for daily-contemplation।
श्लोक 68Sakhe manah
सखे मनः किं बहुजल्पितेन सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम् । यत्सारभूतं कथितं मया ते त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि ॥ ६८॥
sakhe manaḥ kiṃ bahujalpitena sakhe manaḥ sarvamidaṃ vitarkyam । yatsārabhūtaṃ kathitaṃ mayā te tvameva tattvaṃ gaganopamo’si ॥ 68॥

सखे मन! बहु-जल्पन से क्या? सखे मन, यह सब-वितर्क है। मैंने आपको जो-सार कहा, आप-ही-तत्त्व, गगन-समान।

संगति: Final-pivot: मन को ‘सखे’ (मित्र) कह कर पुकारना। एक gentle-closure।
श्लोक 69Ghat-akash mritu
येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि । योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे ॥ ६९॥
yena kenāpi bhāvena yatra kutra mṛtā api । yoginastatra līyante ghaṭākāśamivāmbare ॥ 69॥

किसी-भी भाव से, कहीं-भी मरने पर, योगी वहीं लीन हो जाते हैं, जैसे घट-आकाश ambar में।

संगति: Death-theory। योगी का death-place कोई-मायने नहीं रखता।
श्लोक 70Tirth-antyaj geh
तीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्टस्मृतिरपि त्यजन् । समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत् ॥ ७०॥
tīrthe cāntyajagehe vā naṣṭasmṛtirapi tyajan । samakāle tanuṃ muktaḥ kaivalyavyāpako bhavet ॥ 70॥

तीर्थ में या चाण्डाल-घर में, स्मृति-खो-कर भी जो छोड़ता है, उसी-काल में देह-मुक्त, कैवल्य-व्यापक।

संगति: उग्र-वाक्य: मरने का स्थान-condition matters नहीं।
श्लोक 71Marichi-jal jagat
धर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम् । मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम् ॥ ७१॥
dharmārthakāmamokṣāṃśca dvipadādicarācaram । manyante yoginaḥ sarvaṃ marīcijalasannibham ॥ 71॥

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, दो-पैर-इत्यादि चर-अचर सब, योगी मरीचि-जल-समान मानते।

संगति: चार-पुरुषार्थ भी illusory। मरीचि-जल metaphor again।
श्लोक 72Karm akarm
अतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च । न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः ॥ ७२॥
atītānāgataṃ karma vartamānaṃ tathaiva ca । na karomi na bhuñjāmi iti me niścalā matiḥ ॥ 72॥

अतीत-अनागत कर्म, वर्तमान भी। हम-न करते, न भोगते, यह निश्चल मति।

संगति: Karma-doctrine का transcendence।
श्लोक 73Avadhuta-charya
शून्यागारे समरसपूत\- स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः । चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं विन्दति केवलमात्मनि सर्वम् ॥ ७३॥
śūnyāgāre samarasapūta\- stiṣṭhannekaḥ sukhamavadhūtaḥ । carati hi nagnastyaktvā garvaṃ vindati kevalamātmani sarvam ॥ 73॥

शून्य-आगार में, सम-रस-पूत, अकेला, सुख-में बैठा अवधूत। गर्व त्याग कर नग्न चलता, केवल आत्मा में सब-कुछ पाता।

संगति: Beautiful image: empty house में बैठा अवधूत। नग्न (निर्ग्रन्थ-तरह)। सब-कुछ आत्मा-में।
श्लोक 74Tritay-turiya naa
त्रितयतुरीयं न हि नहि यत्र विन्दति केवलमात्मनि तत्र । धर्माधर्मौ न हि नहि यत्र बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र ॥ ७४॥
tritayaturīyaṃ na hi nahi yatra vindati kevalamātmani tatra । dharmādharmau na hi nahi yatra baddho muktaḥ kathamiha tatra ॥ 74॥

त्रित्य (तीन-state) और तुरीय (चौथा) जहाँ नहीं, वहीं आत्मा-में सब पाता। धर्म-अधर्म जहाँ नहीं, वहाँ बद्ध-मुक्त कैसे?

संगति: Beyond Mandukya-Upanishad का तुरीय भी। ‘सहज’ पर पहुँच गए।
श्लोक 75Mantra-tantra naa
विन्दति विन्दति न हि नहि मन्त्रं छन्दोलक्षणं न हि नहि तन्त्रम् । समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ ७५॥
vindati vindati na hi nahi mantraṃ chandolakṣaṇaṃ na hi nahi tantram । samarasamagno bhāvitapūtaḥ pralapitametatparamavadhūtaḥ ॥ 75॥

मन्त्र पाता-नहीं, छन्द-लक्षण नहीं, तन्त्र नहीं। सम-रस-मगन, भावित-पूत, यह सब प्रलाप परम-अवधूत का।

संगति: एक self-deprecating closure: मेरा यह सब प्रलाप (बड़बड़) है, मगर परम-अवधूत वाला प्रलाप।
श्लोक 76Sarv-shoonya satyaa-satya
सर्वशून्यमशून्यं च सत्यासत्यं न विद्यते । स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ ७६॥
sarvaśūnyamaśūnyaṃ ca satyāsatyaṃ na vidyate । svabhāvabhāvataḥ proktaṃ śāstrasaṃvittipūrvakam ॥ 76॥

सब-शून्य-अशून्य, सत्य-असत्य नहीं। स्वभाव-भावतः कहा गया, शास्त्र-संवित्ति-पूर्वक।

संगति: अध्याय-१ का closing-verse। स्वभाव से, शास्त्र-aware हो कर कहा गया।

साथ में पढ़ें

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “avadhutagiitaa.itx” से। 76-श्लोक standard-prevalent संस्करण।

परंपरा: दत्तात्रेय-स्वयं-गायन। नाथ-संप्रदाय में foundational, सहज-अद्वैत का root-text।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।