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अवधूत गीता · अध्याय 4

अवधूत गीता

अध्याय 4 · सर्व-निरसन एवं स्व-रूप-निर्वाण

“स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम्”, अर्थात् हम स्वरूप-निर्वाण हैं, अनामय, समस्त रोग से परे। यही टेक इस अध्याय की हर ध्वनि में लौट-लौट आती है। दत्तात्रेय यहाँ आवाहनविसर्जन, ध्यान-मंत्र, पूजा-अर्चना, गुरुशिष्य, माता-पिता, संध्या-कर्म, समाधि तक का एक-एक कर निरसन करते जाते हैं। जो भी द्वैत में दो होकर खड़ा होता है, वह क्रम से हट जाता है, और जो शेष रहता है उसी का नाम स्वरूप है, स्वस्थ, अबाधित, सदा अपने में स्थित।

24 श्लोक · पिछला: अध्याय 3

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अध्याय अपना सुर पहले ही पद से बाँध लेता है। दत्तात्रेय पूछते हैं, जहाँ न देवता को बुलाना है, न विदा करना, वहाँ फूल और पत्र किसके लिए चढ़ें, ध्यान और मंत्र किसके निमित्त हों। बुलाना, बिठाना, फूल चढ़ाना, ध्यान धरना, मंत्र जपना, विदा करना, पूजा की हर क्रिया दो को माँगती है, एक पूजने वाला और एक पूज्य। अद्वैत में यही दूरी मिट जाती है। यह किसी उपासना-पद्धति की निंदा नहीं, उस अनुभव की ओर संकेत है जहाँ पहुँच कर हर पद्धति अपना प्रयोजन पूरा करके मौन हो जाती है। और इसी से वे आगे कहते हैं, जो केवल किसी एक जोड़े से छूटा हो, बंध-निर्बंध से, शुद्धि-अशुद्धि से, या योग-वियोग से, वह अभी पूरा विमुक्त नहीं। मुक्ति तभी पूरी होती है जब सारे द्वंद्व एक साथ पीछे छूट जाएँ। हम वही हैं, आकाश के समान, जो सब को धारण करता है पर किसी से बँधता नहीं।

1 · 2

नावाहनं नैव विसर्जनं वा पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति ।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति समासमं चैव शिवार्चनं च ॥ 1 ॥
न केवलं बन्धविबन्धमुक्तो न केवलं शुद्धविशुद्धमुक्तः ।
न केवलं योगवियोगमुक्तः स वै विमुक्तो गगनोपमोऽहम् ॥ 2 ॥

अब वे उस टेक पर आते हैं जो इस अध्याय की धुरी है। “यह सब सत्य है” या “यह सब असत्य है”, ऐसा कोई संकल्प-विकल्प उनके भीतर कभी जन्मा ही नहीं। अनामय का अर्थ है रोग-रहित, और यहाँ रोग कोई शारीरिक व्याधि नहीं, मन का वह ज्वर है जो हर बात पर “हाँ या ना” का निर्णय करता रहता है। उसी प्रकार अज्ञान और ज्ञान का जोड़ा भी उनके भीतर कभी नहीं उठा, और “हम बोध-स्वरूप हैं” यह भी नहीं उठा। तब “बोध है या नहीं” इसका निर्णय किस मुँह से करें। “हम समझ गए” एक सूक्ष्म अहंकार है, और “हम नहीं समझे” उसी का दूसरा रूप; आत्मा दोनों के पार है, क्योंकि वह जानने की क्रिया नहीं, जानने वाला प्रकाश है।

3 · 4

सञ्जायते सर्वमिदं हि तथ्यं सञ्जायते सर्वमिदं वितथ्यम् ।
एवं विकल्पो मम नैव जातः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 3 ॥
अबोधबोधो मम नैव जातो बोधस्वरूपं मम नैव जातम् ।
निर्बोधबोधं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 4 ॥

फिर निषेधों की एक झड़ी लगती है, पर हर निषेध के पीछे वही करुणा है। वे कहते हैं, हम न धर्म से जुड़े हैं, न पाप से, न बंधन से, न मोक्ष से; “किसी से जुड़ा हूँ” या “किसी से अलग हूँ”, यह भेद ही प्रतीत नहीं होता। साधक धर्म से, पुण्य से, मोक्ष से जुड़ने का यत्न करता है, और वह यत्न ठीक भी है, पर परम तत्त्व किसी से जुड़ता नहीं, क्योंकि वह पहले से पूर्ण है। उसी तरह ऊँचा और नीचा कभी रहा ही नहीं, न बीच का तटस्थ भाव, न शत्रु, न मित्र; तब हित-अहित का भेद किस आधार पर कहें। संबंधों का सारा जाल सापेक्ष है, जो एक का शत्रु है वही दूसरे का मित्र हो जाता है, और “हम तटस्थ हैं” कहना भी अधूरा है, क्योंकि तटस्थता भी तभी संभव है जब दो पक्ष सामने हों।

5 · 6

न धर्मयुक्तो न च पापयुक्तो न बन्धयुक्तो न च मोक्षयुक्तः ।
युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 5 ॥
परापरं वा न च मे कदाचित् मध्यस्थभावो हि न चारिमित्रम् ।
हिताहितं चापि कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 6 ॥

अब वे उपासना और ज्ञान की भीतरी संरचना खोलते हैं। न कोई उपासना करने वाला है, न उपासना का कोई रूप, न कोई उपदेश, न अपनी कोई क्रिया; तब “हम शुद्ध चेतना-स्वरूप हैं” यह भी कैसे कहें। संवित् का अर्थ है शुद्ध चेतना, पर चेतना अपने आप को अपना विषय नहीं बना सकती, जैसे आँख अपने आप को नहीं देख सकती। आगे वही बात फैलाव की भाषा में आती है, यहाँ न कुछ व्यापने वाला है, न कुछ जिसमें वह व्यापे, न कोई आधार, न आधार-रहित स्थिति; तब शून्य और अशून्य का जोड़ा कैसे कहें। आत्मा न वह घड़ा है, न उसमें भरा जल, दोनों उपमाएँ अधूरी रह जाती हैं।

7 · 8

नोपासको नैवमुपास्यरूपं न चोपदेशो न च मे क्रिया च ।
संवित्स्वरूपं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 7 ॥
नो व्यापकं व्याप्यमिहास्ति किञ्चित् न चालयं वापि निरालयं वा ।
अशून्यशून्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 8 ॥

जानने और करने, दोनों की त्रिपुटी अब टूटती है। उनके यहाँ न ग्रहण करने वाला है, न ग्रहण किए जाने योग्य कोई वस्तु, न कोई कारण, न कोई कार्य; तब “चिंतन से परे” और “चिंतन का विषय”, इनमें से क्या कहें। जानने में तीन रहते हैं, जानने वाला, जानना, और जो जाना जाए; कर्म में भी तीन, करने वाला, कर्म, और क्रिया, पर आत्मा पर यह त्रिपुटी लागू नहीं होती। इसी सुर में वे फिर पिता के स्नेहिल स्वर में लौटते हैं और “तात” कह कर पास बिठा लेते हैं, मानो किसी प्रिय को समझा रहे हों, कि न कोई भेद करने वाला है, न कुछ जिसमें भेद हो, न कोई जानने वाला, न जाने जाने योग्य कुछ; तब समय में आना-जाना, उठना-बैठना, जन्मना-मरना, यह “गत-आगत” कैसे कहें। परम तत्त्व समय की धारा से ही बाहर है।

9 · 10

न ग्राहको ग्राह्यकमेव किञ्चित् न कारणं वा मम नैव कार्यम् ।
अचिन्त्यचिन्त्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 9 ॥
न भेदकं वापि न चैव भेद्यं न वेदकं वा मम नैव वेद्यम् ।
गतागतं तात कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 10 ॥

अब निषेध शरीर तक उतर आता है। न अपनी कोई देह है, न देह-रहित कोई स्थिति, न बुद्धि, न मन, न इन्द्रियाँ; तब राग और विराग का भेद कैसे कहें। स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर तक, मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ, ये सब उपकरण हैं, और राग-विराग भी मन की ही वृत्तियाँ; जो इन सबको धारण करता है, वह स्वयं इनमें से कोई नहीं। फिर वे “मित्र” कह कर एक और बात कहते हैं, कि केवल नाम ले लेने से कुछ ऊँचा होकर अलग नहीं हो जाता, न नाम न लेने से कुछ छिप जाता है; तब समान और असमान का भेद कैसे कहें। तुलना का प्रश्न, सम या असम, तभी उठता है जब दो हों; जहाँ एक ही है, वहाँ तुलना की भूमि ही नहीं बचती।

11 · 12

न चास्ति देहो न च मे विदेहो बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि ।
रागो विरागश्च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 11 ॥
उल्लेखमात्रं न हि भिन्नमुच्चै-रुल्लेखमात्रं न तिरोहितं वै ।
समासमं मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 12 ॥

साधक की पहचानें भी अब छूटती हैं। न हमने इन्द्रियों को जीता है, न इन्द्रियाँ हम पर हावी हैं, न कोई संयम उठा, न कोई नियम; तब जय और पराजय कैसे कहें। “हमने इन्द्रियों को वश में कर लिया”, यह पहचान भी एक सूक्ष्म बंधन है, और योग के यम-नियम क्रिया की कोटि में आते हैं, हर क्रिया करने वाले को माँगती है। आगे वे “मित्र” से फिर कहते हैं, आकार और निराकार का जोड़ा कभी रहा ही नहीं, न आदि, न अंत, न मध्य; तब बल और निर्बलता कैसे कहें। मूर्त और अमूर्त मन की धारणाएँ हैं, आदि-मध्य-अंत समय की रेखाएँ हैं, और बल-निर्बलता तो और भी सापेक्ष, पहलवान भी पर्वत के सामने निर्बल ठहरता है।

13 · 14

जितेन्द्रियोऽहं त्वजितेन्द्रियो वा न संयमो मे नियमो न जातः ।
जयाजयौ मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 13 ॥
अमूर्तमूर्तिर्न च मे कदाचि-दाद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित् ।
बलाबलं मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 14 ॥

फिर वे “तात” को सम्बोधित कर जीवन-मृत्यु और चेतना की अवस्थाओं तक यह निरसन ले जाते हैं। मरण और अमरत्व, विष और अमृत, ये जोड़े उनके भीतर कभी उठे ही नहीं; तब शुद्ध और अशुद्ध कैसे कहें। जीवन-मृत्यु, विष-औषधि, मलिनता-पवित्रता, ये सब प्रकृति की कोटियाँ हैं और एक-दूसरे के सहारे टिकती हैं; आत्मा में कुछ नया जन्मता ही नहीं। आगे स्वप्न, जागृति और योग-मुद्रा भी हटती हैं, न रात, न दिन; तब तुर्य और अतुर्य कैसे कहें। जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य, चेतना की ये चार अवस्थाएँ माण्डूक्य उपनिषद् में आती हैं, पर अद्वैत के शिखर पर ये चार भी एक-दूसरे के सापेक्ष अवस्थाएँ ही हैं, और शुद्ध आत्मा सबका साक्षी है, स्वयं किसी में बँधी नहीं।

15 · 16

मृतामृतं वापि विषाविषं च सञ्जायते तात न मे कदाचित् ।
अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 15 ॥
स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित् ।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 16 ॥

अब स्वर थोड़ा बदलता है, अब वे शिष्य से सीधे कहते हैं, हमें इस रूप में जानो। हमें उस रूप में जानो जो “सब” और “कुछ नहीं”, दोनों से मुक्त है; माया और माया का अभाव, दोनों कभी रहे ही नहीं; तब संध्या आदि कर्म कैसे कहें। संध्या-वंदन, यज्ञ, हवन, ये पूर्व-साधना के अंग हैं और अपने स्थान पर इनका मूल्य है, पर परम स्तर पर, जहाँ करने वाला और करने योग्य कर्म, दोनों का भेद नहीं बचता, वहाँ केवल सहज स्थिति रहती है। और फिर, हमें उस रूप में जानो जो हर समाधि में सहज स्थित है, लक्ष्य और लक्ष्य-रहित, दोनों से मुक्त; तब योग और वियोग कैसे कहें। समाधि किसी प्रयत्न से रची स्थिति नहीं, अपने स्वरूप को पहचान लेने का नाम है; जो पहले से समाहित है, उसे समाधि लगानी नहीं पड़ती।

17 · 18

संविद्धि मां सर्वविसर्वमुक्तं माया विमाया न च मे कदाचित् ।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 17 ॥
संविद्धि मां सर्वसमाधियुक्तं संविद्धि मां लक्ष्यविलक्ष्यमुक्तम् ।
योगं वियोगं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 18 ॥

अब बुद्धि के गर्व और पारिवारिक पहचान, दोनों एक साथ हटते हैं। न हम मूर्ख हैं, न पण्डित, न कोई मौन, न कोई वाणी; तब तर्क और वितर्क कैसे कहें। “हम विद्वान हैं” शास्त्रज्ञ का गर्व है, “हम तो कुछ जानते ही नहीं” आत्म-निंदा का गर्व, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू और दोनों बुद्धि की कोटि में। उसी सहजता से पिता, माता, कुल, जाति, जन्म से मृत्यु तक, ये कभी अपने रहे ही नहीं; तब स्नेह और मोह कैसे कहें। कुल-जाति सामाजिक पहचान है, माता-पिता जैविक, जन्म-मृत्यु अस्तित्व की, और यहाँ जिस स्नेह का निषेध है वह जैविक और सामाजिक लगाव है; आत्मा का सहज प्रेम इन सीमाओं से कहीं विस्तृत है, किसी रिश्ते की डोर से बँधा नहीं।

19 · 20

मूर्खोऽपि नाहं न च पण्डितोऽहं मौनं विमौनं न च मे कदाचित् ।
तर्कं वितर्कं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 19 ॥
पिता च माता च कुलं न जाति-र्जन्मादि मृत्युर्न च मे कदाचित् ।
स्नेहं विमोहं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 20 ॥

अब निषेधों की लंबी पंक्ति के बाद प्रकाश की ओर मोड़ आता है। पहले एक अंतिम निषेध, हम कभी अस्त नहीं हुए, सदा उदित हैं, तेज और तेज-हीनता कभी रहे ही नहीं; तब संध्या आदि कर्म कैसे कहें। सदोदित का अर्थ है सदा उगा हुआ, जो कभी डूबता नहीं; सूर्य की उपमा भी पीछे रह जाती है, क्योंकि सूर्य अस्त होता है, आत्मा कभी नहीं, और संध्या-वंदन तो उदय-अस्त की दो संधियों पर होता है। फिर तीन सकारात्मक संकेत आते हैं, और बल इस पर है कि इन्हें निश्चय से जानो। बिना संदेह जानो, हम निराकुल हैं, जिसमें कोई क्षोभ नहीं; निरंतर हैं, अखंड, जिसमें कोई दरार नहीं; निरंजन हैं, जिस पर कोई मल, कोई आवरण नहीं चढ़ता।

21 · 22

अस्तं गतो नैव सदोदितोऽहं तेजोवितेजो न च मे कदाचित् ।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 21 ॥
असंशयं विद्धि निराकुलं मां असंशयं विद्धि निरन्तरं माम् ।
असंशयं विद्धि निरञ्जनं मां स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 22 ॥

अंत में अध्याय अपने आप पर मुड़ कर पूरा होता है। “तात” को सम्बोधित कर वे कहते हैं, धीर पुरुष सारे ध्यानों को त्याग देते हैं, शुभ और अशुभ, दोनों कर्मों को त्याग देते हैं, और त्याग का अमृत पीते हैं। ध्यान भी अंततः एक क्रिया है, शुभ हो या अशुभ कर्म अपनी डोर से बाँधता ही है, सोने की हो या लोहे की; त्याग का अमृत यही है, जहाँ करने का बोझ उतर जाता है और सहज, स्थिर, अमर स्थिति शेष रहती है। और जहाँ “पाना” नाम की कोई चीज़ ही नहीं बचती, वहाँ छंद और लक्षण का कोई काव्य-नियम नहीं चलता; सम-रस में डूबा, भाव से पवित्र हुआ परम-अवधूत उस तत्त्व का प्रलाप करता है। प्रलाप यहाँ बेसुध, बेफिक्र वाणी है, समता के रस में डूबे अवधूत की मस्ती, जो किसी शास्त्र-शुद्ध छंद की चिंता किए बिना उसी तत्त्व को बोलती चली जाती है।

23 · 24

ध्यानानि सर्वाणि परित्यजन्ति शुभाशुभं कर्म परित्यजन्ति ।
त्यागामृतं तात पिबन्ति धीराः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ 23 ॥
विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ 24 ॥

आगे

अध्याय 5: दृष्टांत और अनुभूति, ब्रह्म-अनुभव की ओर इशारा करते संकेत।

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