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अवधूत गीता · अध्याय 5

अवधूत गीता

अध्याय 5 · ओंकार-निरूपण एवं “सर्वसम” मन्त्र

यह अध्याय ओम् से उठता है और “तत्त्वमसि” पर आ कर ठहर जाता है, फिर एक ही टेक बार-बार लौटाता है, “किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम्”, हे मन, जब सब-कुछ सम ही है, तब रुदन किसके लिए। दत्तात्रेय एक के बाद एक भेद उठाते हैं, ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर, बंध-मोक्ष, गुरुशिष्य, और हर भेद को उसी सम-तत्त्व में विलीन कर देते हैं।

32 श्लोक · पिछला: अध्याय 4

पढ़ने में लगभग 12 मिनट · 1,918 शब्द

दत्तात्रेय पहला शब्द ही ऐसा रखते हैं जो हर सीमा से बड़ा हो। “ओम्” कहा गया, पर वह जो ओम् से संकेतित है, वह गगन-समान है, खुला और निराकार। उसमें पर और अपर का सार-विचार नहीं चलता, विलास और अविलास दोनों वहीं घुल जाते हैं। अ-उ-म् के तीन स्वर और उनके पीछे का अनुनासिक बिंदु, ये ध्वनि-संकेत भी उस आकाश-से तत्त्व पर कैसे टिकें। फिर वे सीधे महावाक्य पर आ जाते हैं। “तत्त्वमसि” आदि श्रुतियाँ आत्मा के विषय में यही प्रतिपादित करती आई हैं कि वह आप ही है, उपाधि-रहित और सर्व-सम। श्रुति का काम था इसे प्रकट करना, वह कर चुकी, अब इसी पर ठहर जाना शेष है। तब हे मन, जब सब सम ही है, आप किसके लिए रोता है।

1 · 2

ॐ इति गदितं गगनसमं तत् न परापरसारविचार इति ।
अविलासविलासनिराकरणं कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥ 1 ॥
इति तत्त्वमसिप्रभृतिश्रुतिभिः प्रतिपादितमात्मनि तत्त्वमसि ।
त्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 2 ॥

अब वे भेदों को एक-एक कर उठाते और गिराते हैं। नीचे और ऊपर का विभाजन नहीं, सर्व-सम; बाहर और भीतर का बँटवारा नहीं, सर्व-सम; और चकित कर देने वाली बात, “एक है” कहना भी एक सीमा बाँध देता है, क्योंकि “एक” का अर्थ तभी है जब “दो” सम्भव हो, सो यह तत्त्व गिनती की भाषा से भी पीछे रह जाता है। वहाँ कल्पना और कल्पक का विचार नहीं चलता, कारण और कार्य का विचार नहीं चलता, पद-संधि अर्थात् शब्द और व्याकरण के नियम तक वहाँ लागू नहीं होते, श्रुति इसे अनिर्वचनीय यों ही नहीं कहती। और समाधि भी तो एक अवस्था है, किसी काल में और किसी स्थान में जागती हुई। सो वहाँ न बोध-अबोध की समाधि है, न देश-स्थान की, न काल-समय की। “हम समाधि में हैं” यह भाव भी समाधि के बाहर का ही है। तब हे मन, क्यों रोता है।

3 · 4 · 5

अध ऊर्ध्वविवर्जितसर्वसमं बहिरन्तरवर्जितसर्वसमम् ।
यदि चैकविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 3 ॥
न हि कल्पितकल्पविचार इति न हि कारणकार्यविचार इति ।
पदसन्धिविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 4 ॥
न हि बोधविबोधसमाधिरिति न हि देशविदेशसमाधिरिति ।
न हि कालविकालसमाधिरिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 5 ॥

फिर वे वेदान्त का प्रसिद्ध दृष्टान्त स्वयं हटा देते हैं। घट के भीतर का आकाश सुनते आए हैं आप, पर यहाँ न घड़े का आकाश रहता है न घड़ा, न जीव की देह रहती है न जीव, केवल आकाश शेष; कारण और कार्य का विभाग भी टूट जाता है। यहाँ तो सर्व-निरंतर-मोक्ष-पद ही है, हर काल और हर स्थान में उपस्थित मुक्ति, जो यहीं है, जिसमें छोटे-बड़े का विचार नहीं, गोल और कोण का विभाजन नहीं, क्योंकि आकार के सब नियम इन्द्रिय-स्तर के हैं। शून्य-अशून्य, शुद्ध-अशुद्ध, सर्व-असर्व, तीनों विरोधी जोड़े एक साथ निरस्त, क्योंकि विरोधाभास मन में उठते हैं, तत्त्व में नहीं। और भिन्न-अभिन्न का विचार वहाँ नहीं, बाहर-भीतर के मिलन का प्रश्न ही नहीं, क्योंकि मिलन तभी हो जब दो हों, और शत्रु-मित्र से भी वह वर्जित है, सर्व-सम। तब हे मन, क्यों रोता है।

6 · 7 · 8 · 9

न हि कुम्भनभो न हि कुम्भ इति न हि जीववपुर्न हि जीव इति ।
न हि कारणकार्यविभाग इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 6 ॥
इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं लघुदीर्घविचारविहीन इति ।
न हि वर्तुलकोणविभाग इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 7 ॥
इह शून्यविशून्यविहीन इति इह शुद्धविशुद्धविहीन इति ।
इह सर्वविसर्वविहीन इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 8 ॥
न हि भिन्नविभिन्नविचार इति बहिरन्तरसन्धिविचार इति ।
अरिमित्रविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 9 ॥

शिष्य और अ-शिष्य का स्वरूप भी एक भेद है, चर-अचर का भेद भी, और दत्तात्रेय कहते हैं, यहाँ तो सर्व-निरंतर-मोक्ष-पद है, जहाँ सब पहले से ही पूर्ण हैं, सो किसी “शिष्य” की आवश्यकता शेष नहीं रहती। निश्चय ही रूप-विरूप से रहित, भिन्न-अभिन्न से रहित, सर्ग और विसर्ग अर्थात् सृष्टि और प्रलय से भी रहित, क्योंकि सृष्टि-प्रलय प्रकृति का खेल हैं, आत्मा को छूते नहीं। गुण-अगुण की कोई रस्सी इसे बाँधती नहीं, और जब जन्म-मरण ही नहीं, तब मृत और जीवित से जुड़े विधि-कर्म, अंत्येष्टि, श्राद्ध, जातकर्म, ये किसके लिए, यह तो शुद्ध-निरंजन-सर्व-सम है। तब हे मन, क्यों रोता है।

10 · 11 · 12

न हि शिष्यविशिष्यस्वरूप इति न चराचरभेदविचार इति ।
इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 10 ॥
ननु रूपविरूपविहीन इति ननु भिन्नविभिन्नविहीन इति ।
ननु सर्गविसर्गविहीन इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 11 ॥
न गुणागुणपाशनिबन्ध इति मृतजीवनकर्म करोमि कथम् ।
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 12 ॥

भाव और अभाव से रहित, काम और अकाम से रहित, और यहाँ बोध की पराकाष्ठा निश्चय ही मोक्ष-समान है, क्योंकि पूर्ण बोध और मोक्ष दो नहीं रहते। यहाँ तो तत्त्व में निरंतर वही एक तत्त्व है, जो अबाधित रूप से सर्वत्र एक ही बना रहता है, संधि और विसंधि से भी परे, सब-कुछ से मुक्त फिर भी सब में समान। और रहने की बात लें तो बेघर हों या कुटी और परिवार के साथ, अवधूत को दोनों एक-से, संग और निःसंग से परे, बोध और अबोध से भी परे; महल हो या वृक्ष-तले, उसके लिए सब बराबर। तब हे मन, क्यों रोता है।

13 · 14 · 15

इह भावविभावविहीन इति इह कामविकामविहीन इति ।
इह बोधतमं खलु मोक्षसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 13 ॥
इह तत्त्वनिरन्तरतत्त्वमिति न हि सन्धिविसन्धिविहीन इति ।
यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 14 ॥
अनिकेतकुटी परिवारसमं इहसङ्गविसङ्गविहीनपरम् ।
इह बोधविबोधविहीनपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 15 ॥

अब वे सत्य की कसौटी रख देते हैं, जो बदले नहीं वही सत्य है। विकार और अविकार दोनों बदलते रहते हैं, सो असत्य; विलक्षण और अलक्षण भी असत्य; सत्य केवल आत्मा में है, जो सदा सम और स्थिर है। और यहाँ “जीव” शब्द को वे सकारात्मक रूप में उठाते हैं, क्योंकि अवधूत-दृष्टि में जीव और ब्रह्म अलग नहीं, उपाधि हट जाने पर जीव ही ब्रह्म है। सो यहाँ जीव निश्चय ही सर्व-सम है, सर्व-निरंतर है, केवल-निश्चल है। उधर विवेक-अविवेक का जोड़ा अबोध ठहरता है और विकल्प-अविकल्प का जोड़ा भी, क्योंकि विवेक भी भेद की भाषा है और भेद के स्तर पर अधूरा रह जाता है, जब कि एक-निरंतर-बोध भेद से रहित है। तब हे मन, क्यों रोता है।

16 · 17 · 18

अविकारविकारमसत्यमिति अविलक्षविलक्षमसत्यमिति ।
यदि केवलमात्मनि सत्यमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 16 ॥
इह सर्वसमं खलु जीव इति इह सर्वनिरन्तरजीव इति ।
इह केवलनिश्चलजीव इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 17 ॥
अविवेकविवेकमबोध इति अविकल्पविकल्पमबोध इति ।
यदि चैकनिरन्तरबोध इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 18 ॥

हर अनुभव को “ऊँचा पद” या “नीचा पद” बना देना मन की पुरानी आदत है, सो दत्तात्रेय हर श्रेणी ही उठा देते हैं, न मोक्ष-पद है न बंध-पद, न पुण्य-पद न पाप-पद, न पूर्ण-पद न रिक्त-पद, इस तत्त्व में कोई क्रम-श्रेणी है ही नहीं। फिर तीन “यदि” के सहारे वे मन को उसी की भाषा में समझाते हैं, यदि वर्ण-विवर्ण से रहित सम है, यदि कारण-कार्य से रहित सम है, यदि भेद-विभेद से रहित सम है, तब रुदन का आधार ही कहाँ बचा। और जिसे सब में व्याप्त एक चेतना कहते हैं, उस सर्व-चित में दो-पैर वाले मनुष्य से ले कर पशु तक की सब कोटियाँ घुल जाती हैं, वह केवल-निश्चल है, हर कोटि से परे और सब में समान। तब हे मन, क्यों रोता है।

19 · 20 · 21

न हि मोक्षपदं न हि बन्धपदं न हि पुण्यपदं न हि पापपदम् ।
न हि पूर्णपदं न हि रिक्तपदं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 19 ॥
यदि वर्णविवर्णविहीनसमं यदि कारणकार्यविहीनसमम् ।
यदिभेदविभेदविहीनसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 20 ॥
इह सर्वनिरन्तरसर्वचिते इह केवलनिश्चलसर्वचिते ।
द्विपदादिविवर्जितसर्वचिते किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 21 ॥

आत्मा सबके पार जा कर ही सब में व्याप्त होती है, सो वे कहते हैं, सबसे परे, निरंतर, सर्वगत, अति-निर्मल, निश्चल, और दिन-रात से वर्जित, क्योंकि दिन-रात तो समय के टुकड़े हैं और आत्मा काल से परे है। उसमें न कुछ आता है न जाता; बंध-निर्बंध का आगमन नहीं, योग-वियोग का आगमन नहीं, तर्क-वितर्क का आगमन नहीं, क्योंकि तर्क-वितर्क मन में आते-जाते रहते हैं और आत्मा अचल बनी रहती है। यहाँ निषेध की धारा काल-विकाल का निषेध करती है, अणु-मात्र कृशानु अर्थात् सूक्ष्मतम अग्नि-कण तक का निषेध करती है, पर अंतिम केवल-सत्य का निषेध नहीं करती, वहीं ठहर जाती है जहाँ अकेला सत्य शेष रह जाता है। तब हे मन, क्यों रोता है।

22 · 23 · 24

अतिसर्वनिरन्तरसर्वगतं अतिनिर्मलनिश्चलसर्वगतम् ।
दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 22 ॥
न हि बन्धविबन्धसमागमनं न हि योगवियोगसमागमनम् ।
न हि तर्कवितर्कसमागमनं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 23 ॥
इह कालविकालनिराकरणं अणुमात्रकृशानुनिराकरणम् ।
न हि केवलसत्यनिराकरणं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 24 ॥

देह और विदेह से रहित, स्वप्न और सुषुप्ति से परे, नाम और विधान से परे, क्योंकि नाम और नियम सब सापेक्ष हैं और शुद्ध अनुभव नाम से रहित है। फिर वही उपमा लौट आती है, गगन-समान शुद्ध और विशाल, सबसे परे और वर्जित, सर्व-सम, सार-असार और विकार से बीता हुआ; आकाश की निर्मलता और विशालता उपमा-भर है, क्योंकि आकाश तो स्वयं एक भौतिक तत्त्व है और आत्मा उससे भी परे। और विरक्ति को भी वे दो कदम आगे ले जाते हैं, यहाँ धर्म-अधर्म से अत्यंत विरक्त, वस्तु-अवस्तु से अत्यंत विरक्त, काम-अकाम से अत्यंत विरक्त, क्योंकि “हम विरक्त हैं” इस भाव से ऊपर “हम विरक्ति से भी विरक्त हैं” की स्थिति है, वैराग्य की पकड़ तक अंततः छूट जाती है। तब हे मन, क्यों रोता है।

25 · 26 · 27

इह देहविदेहविहीन इति ननु स्वप्नसुषुप्तिविहीनपरम् ।
अभिधानविधानविहीनपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 25 ॥
गगनोपमशुद्धविशालसमं अतिसर्वविवर्जितसर्वसमम् ।
गतसारविसारविकारसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 26 ॥
इह धर्मविधर्मविरागतर-मिह वस्तुविवस्तुविरागतरम् ।
इह कामविकामविरागतरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 27 ॥

अब सबसे कोमल भेद की बारी आती है। सुख-दुःख से वर्जित, सर्व-सम; शोक-निःशोक से परे; और गुरु तथा शिष्य से वर्जित, तत्त्व से भी परे, क्योंकि अंतिम तत्त्व पर गुरु अपनी “गुरुता” तक छोड़ देते हैं, यहाँ न कोई गुरु शेष है न कोई शिष्य। फिर वे उत्पत्ति के पहले क्षण को उठाते हैं, बीज से फूटती पहली कोंपल तक को सार-असार के खाँचे में नहीं बाँधा जा सकता, न चल-अचल की समता-विषमता वहाँ है, यह तो विचार-अविचार से ही रहित है। और जो कुछ सारों का संग्रह-सार कहा गया, निज-भाव का जो विभाजन बताया गया, और विषय में जो साधन-रूप होने की बात है, वह सब असत्य है, क्योंकि जब विषय भी आत्मा से अलग नहीं, तब इन्द्रिय किसका साधन, यह सब आरोपण-मात्र है। तब हे मन, क्यों रोता है।

28 · 29 · 30

सुखदुःखविवर्जितसर्वसम-मिह शोकविशोकविहीनपरम् ।
गुरुशिष्यविवर्जिततत्त्वपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 28 ॥
न किलाङ्कुरसारविसार इति न चलाचलसाम्यविसाम्यमिति ।
अविचारविचारविहीनमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 29 ॥
इह सारसमुच्चयसारमिति । कथितं निजभावविभेद इति ।
विषये करणत्वमसत्यमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 30 ॥

अंत में दत्तात्रेय श्रुति की गवाही ले आते हैं। श्रुतियाँ अनेक प्रकार से यही कहती हैं कि आकाश आदि यह सम्पूर्ण जगत मृग-तृष्णा के समान है, मरुस्थल में जल की वह भ्रांति जो है ही नहीं; और यदि सब-कुछ एक-निरंतर-सर्व-सम है, तो जो है ही नहीं उसके लिए रुदन कैसा। फिर वही श्लोक आता है जो अध्याय 4 और 5 दोनों को पूर्ण करता है, दत्तात्रेय का हस्ताक्षर, जहाँ पाने को कुछ शेष नहीं रहता वहाँ काव्य का नियम भी नहीं रहता; सम-रस में डूबा, भावना से पवित्र, परम-अवधूत तत्त्व का प्रलाप करता है। जो कहा गया वह छंद-नियम से शुद्ध भले न हो, पर सम-रस में मग्न अवधूत ऐसे ही बोलते हैं।

31 · 32

बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति यतो वियदादिरिदं मृगतोयसमम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ 31 ॥
विन्दति विन्दति न हि न हि यत्र छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ 32 ॥

आगे

अध्याय 6: सर्व-वर्जन एवं स्वरूप-स्थिति, तीन-गुण, तीन-काल, तीन-शरीर का निरसन।

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