आठवाँ और अन्तिम अध्याय सबसे छोटा है, केवल दस श्लोक। और इसका विषय एक तरह की भाषाई-कलाबाज़ी है। “अवधूत” शब्द को चार अक्षरों में तोड़ कर हर एक का अर्थ अलग से बताया गया है।
“अ” है आशा-पाश-निर्मुक्त, आदि-मध्य-अन्त-निर्मल, आनन्द में नित्य। “व” है वासना-वर्जित, वक्तव्य-निरामय, वर्तमान में स्थित। “धू” है धूलि-धूसर-गात्र, धूत-चित्त, निरामय। “त” है तत्त्व-चिन्ता-धृत, चिन्ता-चेष्टा-वर्जित, तम-अहंकार-निर्मुक्त। यह एक तरह की acronym-व्याख्या है, सरल-सी, मगर परम्परा में इसका अपना स्थान है।
अध्याय की शुरुआत एक अप्रत्याशित श्लोक से होती है, “त्वद्-यात्रया व्यापकता हता ते, ध्यानेन चेतः-परता हता ते, स्तुत्या मया वाक्-परता हता ते, क्षमस्व नित्यं त्रिविधा-अपराधान्”। यानी “हे प्रभु, आपकी यात्रा से (तीर्थयात्रा से) आपकी व्यापकता-गुण मार दिया मैंने, ध्यान करने से आपकी अप्रत्यक्षता मार दी, स्तुति करके आपकी निःशब्दता मार दी, इन तीन-अपराधों को क्षमा कीजिए।” यह श्लोक अद्भुत है, क्योंकि वो पूजा की क्रियाओं को ही एक तरह का अपराध बता रहा है। तीर्थयात्रा करके सर्व-व्यापी को सीमित किया, ध्यान करके मन-से-परे को मन में लाया, स्तुति करके बेबोल को बोल में बाँधा। पूजा-धर्म-शास्त्र पर यह एक चुपचाप टिप्पणी है।
शब्द-व्युत्पत्ति की यह विधि संस्कृत-व्याकरण में “निरुक्ति” कहलाती है। ऋषि-यास्क ने पाँचवीं सदी ईसा-पूर्व के क़रीब “निरुक्त” नामक ग्रंथ रचा, जो वैदिक-शब्दावली की व्युत्पत्ति-विधि का सबसे प्राचीन उदाहरण है। अवधूत-गीता का आठवाँ अध्याय इसी विधि को अपनाता है, और “अवधूत” शब्द के चार अक्षरों में एक पूर्ण-चरित्र-चित्र खींच देता है।
10 श्लोक
श्लोक 1त्वद्यात्रया व्यापकता हता ते
ध्यानेन चेतःपरता हता ते ।
स्तुत्या मया वाक्परता हता ते
क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान् ॥ १॥
tvadyātrayā vyāpakatā hatā te
dhyānena cetaḥparatā hatā te ।
stutyā mayā vākparatā hatā te kṣamasva nityaṃ trividhāparādhān ॥ 1॥
आपकी यात्रा से व्यापकता हत, ध्यान से चित्त-परता हत, मेरी स्तुति से वाक्-परता हत। हे-नित्य! क्षमा कर त्रिविध-अपराध।
श्लोक 2कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः ।
अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ २॥
kāmairahatadhīrdānto mṛduḥ śucirakiñcanaḥ ।
anīho mitabhuk śāntaḥ sthiro maccharaṇo muniḥ ॥ 2॥
कामों-से-न-हत-धी, दान्त, मृदु, शुचि, अकिंचन, अनीह, मित-भुक्, शान्त, स्थिर, मेरे-शरण-में मुनि।
श्लोक 3अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमान् जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३॥
apramatto gabhīrātmā dhṛtimān jitaṣaḍguṇaḥ ।
amānī mānadaḥ kalpo maitraḥ kāruṇikaḥ kaviḥ ॥ 3॥
श्लोक 4कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ ४॥
kṛpālurakṛtadrohastitikṣuḥ sarvadehinām ।
satyasāro’navadyātmā samaḥ sarvopakārakaḥ ॥ 4॥
श्लोक 5अवधूतलक्षणं वर्णैर्ज्ञातव्यं भगवत्तमैः ।
वेदवर्णार्थतत्त्वज्ञैर्वेदवेदान्तवादिभिः ॥ ५॥
avadhūtalakṣaṇaṃ varṇairjñātavyaṃ bhagavattamaiḥ ।
vedavarṇārthatattvajñairvedavedāntavādibhiḥ ॥ 5॥
अवधूत-लक्षण वर्णों-से जानने योग्य, वेद-वर्ण-अर्थ-तत्त्व-ज्ञ, वेद-वेदान्त-वादी द्वारा।
श्लोक 6आशापाशविनिर्मुक्त आदिमध्यान्तनिर्मलः ।
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्य लक्षणम् ॥ ६॥
āśāpāśavinirmukta ādimadhyāntanirmalaḥ ।
ānande vartate nityamakāraṃ tasya lakṣaṇam ॥ 6॥
आ-कार: आशा-पाश-निर्मुक्त, आदि-मध्य-अन्त-निर्मल, आनन्द में नित्य।
श्लोक 7वासना वर्जिता येन वक्तव्यं च निरामयम् ।
वर्तमानेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम् ॥ ७॥
vāsanā varjitā yena vaktavyaṃ ca nirāmayam ।
vartamāneṣu varteta vakāraṃ tasya lakṣaṇam ॥ 7॥
व-कार: वासना-वर्जित, वक्तव्य-निरामय, वर्तमान में वर्तता।
श्लोक 8धूलिधूसरगात्राणि धूतचित्तो निरामयः ।
धारणाध्याननिर्मुक्तो धूकारस्तस्य लक्षणम् ॥ ८॥
dhūlidhūsaragātrāṇi dhūtacitto nirāmayaḥ ।
dhāraṇādhyānanirmukto dhūkārastasya lakṣaṇam ॥ 8॥
धू-कार: धूलि-धूसर-गात्र, धूत-चित्त, निरामय, धारणा-ध्यान-निर्मुक्त।
श्लोक 9तत्त्वचिन्ता धृता येन चिन्ताचेष्टाविवर्जितः ।
तमोऽहंकारनिर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम् ॥ ९॥
tattvacintā dhṛtā yena cintāceṣṭāvivarjitaḥ ।
tamo’haṃkāranirmuktastakārastasya lakṣaṇam ॥ 9॥
त-कार: तत्त्व-चिन्ता-धृत, चिन्ता-चेष्टा-वर्जित, तम-अहंकार-निर्मुक्त।
श्लोक 10दत्तात्रेयावधूतेन निर्मितानन्दरूपिणा ।
ये पठन्ति च शृण्वन्ति तेषां नैव पुनर्भवः ॥ १०॥
dattātreyāvadhūtena nirmitānandarūpiṇā ।
ye paṭhanti ca śṛṇvanti teṣāṃ naiva punarbhavaḥ ॥ 10॥
दत्तात्रेय-अवधूत द्वारा निर्मित आनन्द-रूप यह स्तोत्र। जो पढ़े, जो सुने, उनको पुनर्जन्म नहीं।
संगति
अध्याय दस श्लोकों में दत्तात्रेय अवधूत-व्यक्तित्व के कुछ external-गुण भी बताते हैं, जो भागवत-पुराण में भी मिलते हैं। “कामैः अहत-धीः दान्तः मृदुः शुचिः अकिञ्चनः, अनीहो मित-भुक् शान्तः स्थिरो मच्-चरणो मुनिः”। यानी “कामनाओं से बुद्धि न मार खाई हुई, संयमी, मृदु, शुचि, अकिञ्चन (बिना-वस्तु-सम्बन्ध के), अनीह (इच्छा-रहित), मित-भुक् (कम-खाने वाला), शान्त, स्थिर, मेरे चरण-शरण में जाने वाला मुनि”।
यह सूची एक छोटा-सा character-checklist है। आगे के दो श्लोक उन गुणों को आगे बढ़ाते हैं, “अप्रमत्त, गभीर-आत्मा, धृतिमान्, जित-षड्-गुण, अमानी, मान-द, कल्प, मैत्र, कारुणिक, कवि।”
अन्तिम श्लोक एक “फल-श्रुति” है, “दत्तात्रेय-अवधूत द्वारा निर्मित यह आनन्द-रूप ग्रंथ, जो पढ़ते हैं और सुनते हैं, उनको पुनर्जन्म नहीं होता।” यह श्लोक एक तरह की वैदिक-काव्य-परम्परा का अन्त है, ग्रंथ को सुनने-मात्र से मोक्ष की घोषणा। यह दावा radical है, और परम्परा के भीतर ही इसकी कई परतें खुलती हैं।