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अवधूत गीता · अध्याय 8

अवधूत गीता

अध्याय 8 · अवधूत-समापन एवं “अव-धू-त” का अक्षर-अर्थ

आठ अध्यायों का यह गान अब अपने अंत पर है। दत्तात्रेय पहले ईश्वर से एक अनोखी क्षमा माँगते हैं, कि तीर्थ-यात्रा से उसकी व्यापकता को, ध्यान से उसके मन-से-परे-स्वरूप को, और स्तुति से उसके वाणी-से-परे-स्वरूप को मानो सीमित कर बैठे। फिर वे अवधूत के भीतरी लक्षण गिनाते हैं, और “अ-व-धू-त” इन अक्षरों को एक-एक कर खोलते हैं। अंत में इस गीता के पाठ और श्रवण का फल।

9 श्लोक · पिछला: अध्याय 7

पढ़ने में लगभग 6 मिनट · 1,016 शब्द

अद्वैतभक्ति की चरम-सीमा यहीं खुलती है, जहाँ उपासना का हर उपचार ही मानो अपराध बन जाता है। दत्तात्रेय ईश्वर से कहते हैं कि आप तक यात्रा करने से आपकी सर्व-व्यापकता घट गई, क्योंकि जो सर्वत्र है उसके पास कहीं जाना ही क्या। ध्यान धरने से आपके मन-से-परे-स्वरूप का अपमान हुआ, क्योंकि जो मन की पकड़ से परे है उसे मन में कैसे बाँधें। और स्तुति करने से आपके वाणी-से-परे-स्वरूप का अपमान हुआ, क्योंकि जो शब्दों की सीमा से परे है उसे शब्दों में कैसे समेटें। इन तीन-विध अपराधों को सदा क्षमा कीजिए। इस क्षमा-याचना में ही सर्वोच्च स्तुति छिपी है।

1 · यात्रा, ध्यान और स्तुति, तीन अपराधों की क्षमा

त्वद्यात्रया व्यापकता हता ते ध्यानेन चेतःपरता हता ते ।
स्तुत्या मया वाक्परता हता ते क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान् ॥ 1 ॥

क्षमा माँगने के बाद दत्तात्रेय अब उस मुनि का चित्र खींचते हैं जिसे अवधूत कहते हैं। बाहर से वह भले चीथड़े पहने या दिगंबर घूमे, उसकी असली पहचान भीतर है। कामनाओं से उसकी बुद्धि कभी विचलित नहीं होती, इंद्रियाँ उसके वश में हैं, स्वभाव कोमल है, अंतःकरण शुद्ध है, और पास रखने को कुछ बचा ही नहीं। इच्छा-रहित, मिताहारी, शांत और स्थिर वह मुनि सदा ईश्वर की शरण में रहता है। यहाँ अकिंचनता दरिद्रता नहीं, परिग्रह की पूरी समाप्ति है, जहाँ ममता टिकने को जगह ही नहीं पाती।

2 · अवधूत-मुनि के लक्षण, इच्छा-रहित, दान्त, मृदु, शुचि, अकिंचन

कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः ।
अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ 2 ॥

उसका भीतरी चित्र और गहरा होता है। वह सदा सावधान रहता है, स्वभाव से गंभीर है, धैर्य उसका सहज गुण है, और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य, इन छह भीतरी शत्रुओं को वह जीत चुका है। अपने लिए मान का लेश नहीं चाहता, फिर भी दूसरों को मान भरपूर देता है। यह “अमानी मानद” वाली जोड़ी ही उसके स्वभाव का केंद्र है। वह समर्थ है, मित्रवत है, करुणा से भरा है, और वैदिक अर्थ में कवि है, अर्थात वह द्रष्टा जो दूर तक देख लेता है।

3 · अप्रमत्त, गंभीर-आत्मा, धैर्यवान, छह विकारों का विजेता, मानद, मैत्रीशील, करुण

अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमान् जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ 3 ॥

वह कृपालु है और किसी से द्रोह नहीं करता। संसार के सब द्वंद्व, सुख-दुख और मान-अपमान, उन्हें वह बिना शिकायत सह जाता है, इसी से तितिक्षु कहलाता है। उसका सार सत्य है, और उसके आचरण में निंदा के लिए कहीं अवकाश ही नहीं बचता। सब प्राणियों को वह एक ही सम-दृष्टि से देखता है, और सबका उपकार करता है। रहन-सहन चाहे जैसी हो, उसका व्यवहार भीतर से निर्मल और सत्य पर टिका रहता है।

4 · कृपालु, द्रोह-रहित, तितिक्षु, सत्य-सार, अनिंद्य, सम, सर्व-उपकारक

कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ 4 ॥

अब दत्तात्रेय एक प्राचीन प्रणाली की ओर मुड़ते हैं। अवधूत का लक्षण उसके नाम के अक्षरों में ही छिपा है, और इसे वही समझ पाते हैं जो श्रेष्ठ भगवद्-भक्त हैं, जो वेद के अक्षर, अर्थ और तत्त्व के ज्ञाता हैं, और जो वेद-वेदान्त के मर्मज्ञ हैं। यह निरुक्त की पुरानी रीति है, जहाँ शब्द की व्युत्पत्ति में ही उसका तत्त्व निहित माना जाता है। अब “अवधूत” शब्द का प्रत्येक अक्षर अपना अर्थ खोलने लगेगा।

5 · अवधूत का लक्षण अक्षरों से जानने योग्य, वेद-वेदान्त के ज्ञाता जानें

अवधूतलक्षणं वर्णैर्ज्ञातव्यं भगवत्तमैः ।
वेदवर्णार्थतत्त्वज्ञैर्वेदवेदान्तवादिभिः ॥ 5 ॥

पहला अक्षर “अ” अपने भीतर तीन लक्षण समेटे है। जो आशा के बंधन से छूट चुका है, जिसका आदि, मध्य और अंत निर्मल है, और जो सदा आनंद में स्थित रहता है, वही “अ” का धारक है। ये तीनों गुण एक ही स्वरूप के तीन पहलू हैं, और तीनों “अ” से आरंभ होते हैं।

6 · “अ” अक्षर, आशा-पाश से मुक्त, आदि-मध्य-अंत निर्मल, सदा आनंद में

आशापाशविनिर्मुक्त आदिमध्यान्तनिर्मलः ।
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्य लक्षणम् ॥ 6 ॥

दूसरा अक्षर “व” भी तीन लक्षण रखता है, और तीनों “व” से ही आरंभ होते हैं। जिसने वासनाओं को त्याग दिया है, जिसका वचन निर्मल है, और जो वर्तमान में स्थित रहता है, वही “व” का धारक है। वर्तमान में टिक जाना भूत और भविष्य की चिंता से ऊपर उठ जाना है, जहाँ केवल यही क्षण सत्य रह जाता है।

7 · “व” अक्षर, वासना से रहित, वचन निर्मल, वर्तमान में स्थित

वासना वर्जिता येन वक्तव्यं च निरामयम् ।
वर्तमानेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम् ॥ 7 ॥

अब अंतिम अक्षर “त” आता है, और यह भी तीन लक्षण समेटे है। जिसने तत्त्व का चिंतन धारण कर लिया है, जो सांसारिक चिंता और व्यर्थ चेष्टा से रहित है, और जो तमस् तथा अहंकार से मुक्त है, वही “त” का धारक है। बीच का अक्षर “धू” इस संस्करण में अपने व्याख्यान-श्लोक के बिना है। परंपरा में “धू” को “धूत” से जोड़ा जाता है, अर्थात वह जिसने देह-आसक्ति और रागद्वेष, सब को झाड़ डाला हो।

8 · “त” अक्षर, तत्त्व-चिंतन में स्थित, चिंता-चेष्टा से रहित, तमस् और अहंकार से मुक्त

तत्त्वचिन्ता धृता येन चिन्ताचेष्टाविवर्जितः ।
तमोऽहंकारनिर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम् ॥ 8 ॥

अब समापन की फल-श्रुति आती है। आनंद-स्वरूप दत्तात्रेय-अवधूत द्वारा रची हुई इस गीता को जो पढ़ते और जो सुनते हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। इसका सामान्य अर्थ तो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति है, पर अवधूत की दृष्टि में मर्म और गहरा है। पुनर्जन्म नहीं, क्योंकि जन्म-मरण कभी था ही नहीं। आत्मा अजन्मा है, और इस गीता का पाठ-श्रवण उसी अजन्मा स्वरूप को उद्घाटित कर देता है।

9 · आनंद-स्वरूप दत्तात्रेय-अवधूत द्वारा रचित, पढ़ने-सुनने वालों का पुनर्जन्म नहीं

दत्तात्रेयावधूतेन निर्मितानन्दरूपिणा ।
ये पठन्ति च शृण्वन्ति तेषां नैव पुनर्भवः ॥ 9 ॥

समापन

अवधूत गीता यहाँ पूर्ण होती है। आठ अध्यायों में सब विधि-निषेध से परे, परम-आत्म-स्वरूप का गान। दत्तात्रेय का यह वचन काव्य-शास्त्र के नियमों की शुद्धि नहीं खोजता; यह केवल उस अनुभव की ओर संकेत है, जिसे शब्द छू भी नहीं पाते।

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