राग मलार

मानसून का राग, बादलों और बूँदों का।
मल्हार बारिश का राग है। मियाँ-तानसेन के बारे में कथा है कि वो मल्हार गाते-गाते बादल बुला लेते थे, और गोदावरी का पानी ऊँचा कर देते थे। चाहे कथा सच हो या न हो, राग का सुर सच में मेघ-गर्जन और प्रतीक्षा की धुन है।
ग्रंथ में मल्हार की रचनाएँ अंग बारह-सौ-चौवन के क़रीब से शुरू होती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय में कई मल्हार-स्वरूप हैं, मियाँ-मल्हार, सूर-मल्हार, मेघ-मल्हार इत्यादि।
"बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥" मलार M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (65)
- खाणा पीणा हसणा सउणा विसरि गइआ है मरणा ॥अंग 1254
- करउ बिनउ गुर अपने प्रीतम हरि वरु आणि मिलावै ॥अंग 1254
- साची सुरति नामि नही त्रिपते हउमै करत गवाइआ ॥अंग 1254
- जिनि धन पिर का सादु न जानिआ सा बिलख बदन कुमलानी ॥अंग 1255
- पर दारा पर धनु पर लोभा हउमै बिखै बिकार ॥अंग 1255
- पवणै पाणी जाणै जाति ॥अंग 1256
- दुखु वेछोड़ा इकु दुखु भूख ॥अंग 1256
- दुख महुरा मारण हरि नामु ॥अंग 1256
- बागे कापड़ बोलै बैण ॥अंग 1257
- चकवी नैन नंीद नहि चाहै बिनु पिर नंीद न पाई ॥अंग 1273
- जागतु जागि रहै गुर सेवा बिनु हरि मै को नाही ॥अंग 1273
- चात्रिक मीन जल ही ते सुखु पावहि सारिंग सबदि सुहाई ॥1॥अंग 1274
- अखली ऊंडी जलु भर नालि ॥अंग 1274
- मरण मुकति गति सार न जानै ॥अंग 1275
- हेको पाधरु हेकु दरु गुर पउड़ी निज थानु ॥अंग 1279
- आपीन॑ै आपु साजि आपु पछाणिआ ॥अंग 1279
- नानक सावणि जे वसै चहु ओमाहा होइ ॥अंग 1279
- नानक सावणि जे वसै चहु वेछोड़ा होइ ॥अंग 1279
- तू सचा सचिआरु जिनि सचु वरताइआ ॥अंग 1279
- वैदु बुलाइआ वैदगी पकड़ि ढंढोले बांह ॥अंग 1279
- ब्रहमा बिसनु महेसु देव उपाइआ ॥अंग 1279
- आपे छिंझ पवाइ मलाखाड़ा रचिआ ॥अंग 1280
- दोवै तरफा उपाइ इकु वरतिआ ॥अंग 1280
- सो हरि सदा सरेवीऐ जिसु करत न लागै वार ॥अंग 1280
- दूजै दूजी तरफ है कूड़ि मिलै न मिलिआ जाइ ॥अंग 1281
- अतुलु किउ तोलीऐ विणु तोले पाइआ न जाइ ॥अंग 1282
- नाथ जती सिध पीर किनै अंतु न पाइआ ॥अंग 1282
- आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥अंग 1282
- सचा वेपरवाहु इको तू धणी ॥अंग 1283
- खंड पताल असंख मै गणत न होई ॥अंग 1283
- आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥अंग 1284
- सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥अंग 1284
- इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥अंग 1284
- इकि जैनी उझड़ पाइ धुरहु खुआइआ ॥अंग 1285
- सचा अलख अभेउ हठि न पतीजई ॥अंग 1285
- पूरा सतिगुरु सेवि पूरा पाइआ ॥अंग 1286
- कुलहां देंदे बावले लैंदे वडे निलज ॥अंग 1286
- सउ मणु हसती घिउ गुड़ु खावै पंजि सै दाणा खाइ ॥अंग 1286
- अगम अगोचरु तू धणी सचा अलख अपारु ॥अंग 1286
- राती कालु घटै दिनि कालु ॥अंग 1287
- मुआ पिआरु प्रीति मुई मुआ वैरु वादी ॥अंग 1287
- अंम्रित नामु सदा सुखदाता अंते होइ सखाई ॥अंग 1287
- सरमु धरमु दुइ नानका जे धनु पलै पाइ ॥अंग 1287
- दुखी दुनी सहेड़ीऐ जाइ त लगहि दुख ॥अंग 1287
- अंधी कंमी अंधु मनु मनि अंधै तनु अंधु ॥अंग 1287
- लख मण सुइना लख मण रुपा लख साहा सिरि साह ॥अंग 1287
- बधे छुटहि सचि सचु पछाणीऐ ॥अंग 1287
- हरणां बाजां तै सिकदारां एन॑ा पड़ि॑आ नाउ ॥अंग 1288
- आपि उपाए मेदनी आपे करदा सार ॥अंग 1288
- रूपै कामै दोसती भुखै सादै गंढु ॥अंग 1288
- राजु मालु रूपु जाति जोबनु पंजे ठग ॥अंग 1288
- पड़िआ लेखेदारु लेखा मंगीऐ ॥अंग 1288
- धरती पाताली आकासी इकि दरि रहनि वजीर ॥अंग 1289
- अजरु जरै त नउ कुल बंधु ॥अंग 1289
- पड़॑ीऐ नामु सालाह होरि बुधंी मिथिआ ॥अंग 1289
- पहिलां मासहु निंमिआ मासै अंदरि वासु ॥अंग 1289
- मासु मासु करि मूरखु झगड़े गिआनु धिआनु नही जाणै ॥अंग 1289
- हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥अंग 1290
- नानक माइआ करम बिरखु फल अंम्रित फल विसु ॥अंग 1290
- सिरि सिरि होइ निबेड़ु हुकमि चलाइआ ॥अंग 1290
- घर महि घरु देखाइ देइ सो सतिगुरु पुरखु सुजाणु ॥अंग 1291
- चिलिमिलि बिसीआर दुनीआ फानी ॥अंग 1291
- धंनु सु कागदु कलम धंनु धनु भांडा धनु मसु ॥अंग 1291
- आपे पटी कलम आपि उपरि लेखु भि तूं ॥अंग 1291
- तूं आपे आपि वरतदा आपि बणत बणाई ॥अंग 1291
महला 2 (5)
महला 3 (42)
- निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥अंग 1257
- जिनी हुकमु पछाणिआ से मेले हउमै सबदि जलाइ ॥अंग 1258
- गुरमुखि कोई विरला बूझै जिस नो नदरि करेइ ॥अंग 1258
- गुरु सालाही सदा सुखदाता प्रभु नाराइणु सोई ॥अंग 1258
- गण गंधरब नामे सभि उधरे गुर का सबदु वीचारि ॥अंग 1259
- सतिगुर ते पावै घरु दरु महलु सु थानु ॥अंग 1259
- एकसु बिनु मै अवरु न जाणा सतिगुरि दीआ बुझाई ॥1॥अंग 1260
- मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥अंग 1260
- हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥अंग 1260
- इहु मनु गिरही कि इहु मनु उदासी ॥अंग 1261
- भ्रमि भ्रमि जोनि मनमुख भरमाई ॥अंग 1261
- जीवत मुकत गुरमती लागे ॥अंग 1262
- रसना नामु सभु कोई कहै ॥अंग 1262
- करमु होवै ता सतिगुरु पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥अंग 1276
- बिनु नावै जम डंडु सहै मरि जनमै वारो वार ॥अंग 1276
- हरि हरि क्रिपा करे गुर की कारै लाए ॥अंग 1277
- ऊंनवि ऊंनवि आइआ अवरि करेंदा वंन ॥अंग 1280
- ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै नीरु निपंगु ॥अंग 1280
- ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै लाइ झड़ी ॥अंग 1280
- किआ उठि उठि देखहु बपुड़ें इसु मेघै हथि किछु नाहि ॥अंग 1280
- बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥अंग 1281
- कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥अंग 1281
- नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥अंग 1281
- अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥अंग 1281
- बाबीहा ना बिललाइ ना तरसाइ एहु मनु खसम का हुकमु मंनि ॥अंग 1282
- बाबीहा जल महि तेरा वासु है जल ही माहि फिराहि ॥अंग 1282
- इहु जलु सभ तै वरसदा वरसै भाइ सुभाइ ॥अंग 1282
- भिंनी रैणि चमकिआ वुठा छहबर लाइ ॥अंग 1282
- बाबीहा एहु जगतु है मत को भरमि भुलाइ ॥अंग 1283
- वुठै जीआ जुगति होइ धरणी नो सीगारु होइ ॥अंग 1283
- बाबीहा खसमै का महलु न जाणही महलु देखि अरदासि पाइ ॥अंग 1283
- बाबीहा भिंनी रैणि बोलिआ सहजे सचि सुभाइ ॥अंग 1283
- बाबीहा गुणवंती महलु पाइआ अउगणवंती दूरि ॥अंग 1283
- बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥अंग 1284
- बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥अंग 1284
- चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥अंग 1284
- बाबीहा अंम्रित वेलै बोलिआ तां दरि सुणी पुकार ॥अंग 1285
- बाबीहा इव तेरी तिखा न उतरै जे सउ करहि पुकार ॥अंग 1285
- सावणि सरसी कामणी गुर सबदी वीचारि ॥अंग 1285
- सावणि दझै गुण बाहरी जिसु दूजै भाइ पिआरु ॥अंग 1285
- गुर सबदी एकु पछाणिआ एको सचा सोइ ॥अंग 1285
- इंदु वरसै करि दइआ लोकां मनि उपजै चाउ ॥अंग 1285
महला 4 (9)
- अनदिनु हरि हरि धिआइओ हिरदै मति गुरमति दूख विसारी ॥अंग 1262
- गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धूरि साधू की ताई ॥अंग 1263
- तिसु जन कउ हरि मीठ लगाना जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥अंग 1263
- जितने जीअ जंत प्रभि कीने तितने सिरि कार लिखावै ॥अंग 1263
- जिन॑ कै हीअरै बसिओ मेरा सतिगुरु ते संत भले भल भांति ॥अंग 1264
- अगमु अगोचरु नामु हरि ऊतमु हरि किरपा ते जपि लइआ ॥अंग 1264
- गुर परसादी अंम्रितु नही पीआ त्रिसना भूख न जाई ॥अंग 1265
- हरि जन बोलत स्रीराम नामा मिलि साधसंगति हरि तोर ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1265
- राम राम बोलि बोलि खोजते बडभागी ॥अंग 1265
महला 5 (35)
- किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥अंग 1266
- खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥अंग 1266
- सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥अंग 1266
- राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥अंग 1267
- प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥अंग 1267
- माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥अंग 1267
- बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥अंग 1267
- प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥अंग 1268
- प्रभ मेरे प्रीतम प्रान पिआरे ॥अंग 1268
- अब अपने प्रीतम सिउ बनि आई ॥अंग 1268
- घनिहर बरसि सगल जगु छाइआ ॥अंग 1268
- बिछुरत किउ जीवे ओइ जीवन ॥अंग 1268
- हरि कै भजनि कउन कउन न तारे ॥अंग 1269
- आजु मै बैसिओ हरि हाट ॥अंग 1269
- बहु बिधि माइआ मोह हिरानो ॥अंग 1269
- दुसट मुए बिखु खाई री माई ॥अंग 1269
- मन मेरे हरि के चरन रवीजै ॥अंग 1269
- प्रभ को भगति बछलु बिरदाइओ ॥अंग 1270
- गुरमुखि दीसै ब्रहम पसारु ॥अंग 1270
- गुर के चरन हिरदै वसाए ॥अंग 1270
- परमेसरु होआ दइआलु ॥अंग 1271
- गुर सरणाई सगल निधान ॥अंग 1271
- गुर मनारि प्रिअ दइआर सिउ रंगु कीआ ॥अंग 1271
- मनु घनै भ्रमै बनै ॥अंग 1272
- प्रिअ की सोभ सुहावनी नीकी ॥अंग 1272
- गुर प्रीति पिआरे चरन कमल रिद अंतरि धारे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1272
- बरसु सरसु आगिआ ॥अंग 1272
- गुन गोुपाल गाउ नीत ॥अंग 1272
- घनु गरजत गोबिंद रूप ॥अंग 1272
- हे गोबिंद हे गोपाल हे दइआल लाल ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1273
- प्रीतम प्रेम भगति के दाते ॥अंग 1278
- गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥अंग 1278
- राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥अंग 1284
- रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥अंग 1284
- सभो वरतै चलतु चलतु वखाणिआ ॥अंग 1291
भगत नामदेव जी (2)
- सेवीले गोपाल राइ अकुल निरंजन ॥अंग 1292
- मो कउ तूं न बिसारि तू न बिसारि ॥अंग 1292