Lulla Family

अंग 1255

अंग
1255
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पर धन पर नारी रतु निंदा बिखु खाई दुखु पाइआ ॥
सबदु चीनि भै कपट न छूटे मनि मुखि माइआ माइआ ॥
अजगरि भारि लदे अति भारी मरि जनमे जनमु गवाइआ ॥1॥
मनि भावै सबदु सुहाइआ ॥
भ्रमि भ्रमि जोनि भेख बहु कीन॑े गुरि राखे सचु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
तीरथि तेजु निवारि न न॑ाते हरि का नामु न भाइआ ॥
रतन पदारथु परहरि तिआगिआ जत को तत ही आइआ ॥
बिसटा कीट भए उत ही ते उत ही माहि समाइआ ॥
अधिक सुआद रोग अधिकाई बिनु गुर सहजु न पाइआ ॥2॥
सेवा सुरति रहसि गुण गावा गुरमुखि गिआनु बीचारा ॥
खोजी उपजै बादी बिनसै हउ बलि बलि गुर करतारा ॥
हम नीच होुते हीणमति झूठे तू सबदि सवारणहारा ॥
आतम चीनि तहा तू तारण सचु तारे तारणहारा ॥3॥
बैसि सुथानि कहां गुण तेरे किआ किआ कथउ अपारा ॥
अलखु न लखीऐ अगमु अजोनी तूं नाथां नाथणहारा ॥
किसु पहि देखि कहउ तू कैसा सभि जाचक तू दातारा ॥
भगतिहीणु नानकु दरि देखहु इकु नामु मिलै उरि धारा ॥4॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: उनका मन पराए धन पराई स्त्री और पराई निंदा में मस्त रहा है। वे (सदा पर धन पर नारी पर निंदा की) जहर खाते रहे (आत्मिक खुराक बनाए रखी)। और दुख ही सहेड़ते रहे। सिफत-सालाह की बाणी को विचार के (भी) उनके दुनिया वाले डर और छल (-कपट) ना खत्म हुए। उनके मन में भी माया (की लगन) ही रही। उनके मुँह में भी माया (की द्वंद-कथा) ही रही। वे सदा (माया के मोह के) बेअंत बड़े भार तले लदे रहे। जनम-मरण के चक्करों में पड़ के उन्होंने जीवन व्यर्थ ही गवा लिया। 1। जिनके मन को (प्रभू की सिफतसालाह की) बाणी प्यारी लगती है उनका जीवन सुंदर बन जाता है। (पर। सिफतसालाह की बाणी से टूट के) अनेकों जूनियों में भटक-भटक के अनेकों जूनियों के भेष धारते रहे (भाव। जनम लेते रहे)। जिन की रक्षा गुरू ने की। उनको सदा कायम रहने वाला ईश्वर मिल गया। 1। रहाउ। क्रोध दूर कर के उन्होंने आत्म-तीर्थ में स्नान नही किया। उनको परमात्मा का नाम प्यारा नहीं लगा। (तृष्णा के अधीन रह के) उन्होंने प्रभू का अमूल्य-नाम सदा के लिए त्याग दिया। जिस चौरासी में से निकल के मनुष्य जन्म में आए थे। उसी चौरासी में दोबारा चले गए। जैसे विष्टा के कीड़े विष्टा में ही पैदा होते हैं। और विष्टा में ही फिर मर जाते हैं। (विषौ-विकारों के) जितने भी ज्यादा स्वाद वे लेते गए। उतने ही ज्यादा रोग उनको व्यापते गए। गुरू की शरण ना आने के कारण उनको शांत-अवस्था हासिल नहीं हुई। 2। (मेहर कर) मेरी सुरति आपकी सेवा (-भगती) में टिकी रहे। पूरन आनंद में टिक के मैं आपके गुण गाता रहूँ; गुरू की शरण पड़ कर मैं सदा यह विचार करता रहूँ हे मेरे गुरू ! हे मेरे करतार ! मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ। आपके साथ मेरी गहरी सांझ बनी रहे। (आपके साथ गहरी जान-पहचान के यतन) खोजने वाला मनुष्य आत्मिक जीवन में जनम ले लेता है। पर (नित्य माया के) झगड़े करने वाला जीव आत्मिक मौत मर जाता है। हे प्रभू ! हम (तृष्णा में फस के बड़े) नीचे जीवन वाले हो चुके हैं। हम मूर्ख हैं। हम झूठे पदार्थों में फंसे हुए हैं; पर आप (अपनी सिफतसालाह की) बाणी में (जोड़ के) हमारा जीवन सवारने में स्मर्थ है। जहाँ स्वै की विचार होती है। वहाँ आप (संसार-समुंद्र की विकार-लहरों से) बचाने के लिए आ पहुँचता है। आप सदा कायम रहने वाला है। आप उद्धार करने के समर्थ है। (हमारा) उद्धार कर ले। 3। (हे प्रभू ! मेहर कर) सत्संग में टिक के मैं आपके गुण गाता रहूँ। पर आप बेअंत है। आपके सारे गुण मैं बयान नहीं कर सकता। आप अलख है। आप बयान से परे है। आप अपहुँच है। आप जूनियों से रहित है। आप (बड़े-बड़े) नाथ कहलवाने वालों को भी अपने वश में रखने वाला है। (हे प्रभू ! आपकी रचना को) देख के मैं किसी के आगे यह कहने के लायक नहीं हूँ कि आप कैसा है (भाव। सारे संसार में आपके जैसा कोई नहीं है)। सारे जीव (आपके दर के) मँगते हैं। आप सबको दातें देने वाला है। (हे प्रभू !) आपकी भगती से टूटा हुआ (आपका दास) नानक (आपके) दर पर (आ गिरा है। इस पर) मेहर की निगाह कर। (हे प्रभू !) मुझे आपका नाम मिल जाए। मैं (इस नाम को अपने) सीने से परो के रखॅूँ। 4। 3।
मलार महला 1 ॥
जिनि धन पिर का सादु न जानिआ सा बिलख बदन कुमलानी ॥
भई निरासी करम की फासी बिनु गुर भरमि भुलानी ॥1॥
बरसु घना मेरा पिरु घरि आइआ ॥
बलि जावां गुर अपने प्रीतम जिनि हरि प्रभु आणि मिलाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
नउतन प्रीति सदा ठाकुर सिउ अनदिनु भगति सुहावी ॥
मुकति भए गुरि दरसु दिखाइआ जुगि जुगि भगति सुभावी ॥2॥
हम थारे त्रिभवण जगु तुमरा तू मेरा हउ तेरा ॥
सतिगुरि मिलिऐ निरंजनु पाइआ बहुरि न भवजलि फेरा ॥3॥
अपुने पिर हरि देखि विगासी तउ धन साचु सीगारो ॥
अकुल निरंजन सिउ सचि साची गुरमति नामु अधारो ॥4॥
मुकति भई बंधन गुरि खोल॑े सबदि सुरति पति पाई ॥
नानक राम नामु रिद अंतरि गुरमुखि मेलि मिलाई ॥5॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ जिस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति के मिलाप का आनंद नहीं समझा (भाव। आनंद नहीं पाया) वह सदा (दुनियावी झमेलों में ही) व्याकुल रहती है। उसका चेहरा कुम्हलाया रहता है; (दुनिया वाली आशाएं पूरी ना होने के कारण) उसका दिल टूटा सा रहता है। अपने किए कर्मों के संस्कारों का फंदा उसके गले में पड़ा रहता है; गुरू की शरण ना आने के कारण भटकना में पड़ के वह जीवन के सही रास्ते से वंचित रहती है। 1। हे बादल ! बरखा कर (हे गुरू ! नाम की बरसात कर। आपके नाम-वर्षा की बरकति से) मेरा पति-प्रभू मेरे हृदय में आ बसा है। मैं अपने प्रीतम गुरू से बलिहार हूँ। जिसने हरी-प्रभू से मुझे मिला दिया है। 1। रहाउ। प्रभू के साथ उनकी नई प्रीत बनी रहती है। (भाव। प्यार वाली उमंग कभी कम नहीं होती)। वे हर रोज प्रभू की भक्ति करते हैं जो उनको आत्मिक सुख दिए रखती है। जिन जीवों को गुरू नें प्रभू के दर्शन करवा दिए हैं। वे माया के बँधनों से आजाद हो जाते हैं। वे सदा परमात्मा की भक्ति करते और शोभा कमाते हैं। 3। हे प्रभू ! हम आपके पैदा किए हुए हैं। तीन भवनों वाला सारा ही संसार आपका ही रचा हुआ है (अपनी रची हुई माया के मोह से आप खुद ही सब जीवों को बचाता है)। हे प्रभू ! आप मेरा (मालिक) है। मैं आपका (दास) हूँ (मुझे भी कर्मों के फंदों से बचाए रख)। अगर गुरू मिल जाए। तो माया से रहित प्रभू मिल जाता है। और संसार-समुंद्र (के चक्कर) में नहीं आना पड़ता। 3। (जीव-स्त्री अपने प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के धार्मिक उद्यम-रूपी श्रृंगार करती है। पर) जीव-स्त्री का श्रृंगार तब ही सदीवी समझो (तब ही सफल जानो) जब वह प्रभू-पति को देख के उल्लास में उमंग में आती है। जब सच्चे के सिमरन के द्वारा कुल-रहित माया-रहित प्रभू के साथ एक-रूप हो जाती है। जब गुरू की शिक्षा पर चल के प्रभू का नाम उसके जीवन का सहारा बन जाता है। 4। जो जीव-स्त्री माया के बँधनों से आज़ाद हो गई। जिसके माया के बँधन गुरू ने खोल दिए। वह प्रभू की सिफति-सालाह की बाणी में सुरति जोड़ के (प्रभू की हजूरी में) आदर हासिल करती है; हे नानक ! प्रभू का नाम सदा उसके हृदय में बसता है। गुरू की शरण पड़ कर वह प्रभू-पति के मिलाप में मिल जाती है (अभेद हो जाती है)। 5। 4।
महला 1 मलार ॥
पर दारा पर धनु पर लोभा हउमै बिखै बिकार ॥
दुसट भाउ तजि निंद पराई कामु क्रोधु चंडार ॥1॥
महल महि बैठे अगम अपार ॥
भीतरि अंम्रितु सोई जनु पावै जिसु गुर का सबदु रतनु आचार ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 मलार ॥ (जो मनुष्य गुरू का शबद हृदय में बसाता है और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस हासिल करता है। वह) पराई स्त्री (का संग)। पराया धन। बहुत लालच। अहंकार। विषियों (वाली रुचि)। बुरे कर्म। बुरी नीयत। पराई निंदा। काम और चंडाल क्रोध- यह सब कुछ त्याग देता है। 1। अपहुँच और बेअंत प्रभू जी हरेक शरीर में बैठे हुए हैं (मौजूद हैं)। पर वही मनुष्य प्रभू जी का नाम-अमृत हासिल करता है जिसकी नित्य की क्रिया गुरू का श्रेष्ठ शबद (अपने अंदर बसाना) हो जाए। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उनका मन पराए धन पराई स्त्री और पराई निंदा में मस्त रहा है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।