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अंग 1286

अंग
1286
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि सबदु सम॑ालीऐ सचे के गुण गाउ ॥
नानक नामि रते जन निरमले सहजे सचि समाउ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू के सन्मुख होने से ही (प्रभू के सिफत-सालाह का) शबद (हृदय में) संभाला जा सकता है और सदा-स्थिर हरी के गुण गाए जा सकते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य पवित्र हैं जो प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं। वे आत्मिक अडोलता के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू में जुड़े रहते हैं। 2।
पउड़ी ॥
पूरा सतिगुरु सेवि पूरा पाइआ ॥
पूरै करमि धिआइ पूरा सबदु मंनि वसाइआ ॥
पूरै गिआनि धिआनि मैलु चुकाइआ ॥
हरि सरि तीरथि जाणि मनूआ नाइआ ॥
सबदि मरै मनु मारि धंनु जणेदी माइआ ॥
दरि सचै सचिआरु सचा आइआ ॥
पुछि न सकै कोइ जां खसमै भाइआ ॥
नानक सचु सलाहि लिखिआ पाइआ ॥18॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस ने पूरे गुरू का हुकम माना है उसको पूरा प्रभू मिल जाता है; पूरे (भाव। अभॅुल) प्रभू की बख्शिश से प्रभू को सिमर के सिफतसालाह की बाणी वह मनुष्य अपने मन में बसाता है; पूरन आत्मिक समझ और अडोल सुरति की बरकति से वह अपने मन की मैल दूर करता है (इस तरह उसका) सुंदर (हुआ) मन आत्मिक जीवन की सूझ हासिल करके प्रभू-रूप सरोवर में प्रभू-रूप तीर्थ पर स्नान करता है। उस मनुष्य की माँ भाग्यों वाली है। जो गुरू-शबद से मन को वश में ला के (माया के मोह से। जैसे) मर जाता है; वह मनुष्य सच्चे प्रभू की हजूरी में सच्चा और सत्य का व्यापारी माना जाता है। उस मनुष्य के जीवन पर कोई और उंगली नहीं उठा सकता क्योंकि वह पति-प्रभू को भा जाता है। हे नानक ! सदा-स्थिर प्रभू के गुण गा के वह (सिफत-सालाह-रूप माथे पर) लिखे (भाग्य) हासिल कर लेता है। 18।
सलोक मः 1 ॥
कुलहां देंदे बावले लैंदे वडे निलज ॥
चूहा खड न मावई तिकलि बंन॑ै छज ॥
देनि॑ दुआई से मरहि जिन कउ देनि सि जाहि ॥
नानक हुकमु न जापई किथै जाइ समाहि ॥
फसलि अहाड़ी एकु नामु सावणी सचु नाउ ॥
मै महदूदु लिखाइआ खसमै कै दरि जाइ ॥
दुनीआ के दर केतड़े केते आवहि जांहि ॥
केते मंगहि मंगते केते मंगि मंगि जाहि ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ वे लोग मूर्ख हैं जो (चेलों को) (सेहली-) टोपी देते हैं (और अपने आप को मशहूर करने के लिए अपनी जगह गद्दी देते हैं; यह सेहली टोपी) लेने वाले भी बदीद हैं (जो केवल सेहली टोपी से अपने आप को बरकति देने के समर्थ समझ लेते हैं) (इनकी हालत तो इस तरह है जैसे) चूहा (खुद तो) बिल में (घुस) नहीं सकता (और ऊपर से) कमर के साथ छॅज (छन्ना) बाँध लेता है। हे नानक ! (इस तरह की गद्दियाँ स्थापित करके) जो औरों को आशीशें देते हैं वे भी मर जाते हैं और आशिर्वाद लेने वाले भी मर जाते हैं। पर परमात्मा की रजा समझी नहीं जा सकती कि वह (मर के) कहाँ जा पड़ते हैं (भाव। सिर्फ सेहली टोपी और आर्शीवाद प्रभू की हजूरी में कबूल होने के लिए काफी नहीं हैं; मुर्शिद की चेले को आशीश और सेहली टोपी जीवन का सही रास्ता नहीं है)। मैंने तो सिर्फ ‘नाम’ को ही हाड़ी की फसल बनाया है और सच्चा ‘नाम’ ही साउणी की फसल। (भाव। ‘नाम’ ही मेरे जीवन-सफर की पूँजी है)। यह मैंने एक ऐसा पट्टा लिखाया है जो पति-प्रभू की हजूरी में जा पहुँचता है । (नोट। पीर अपने चेलों से हाड़ी-साउणी की फसल के वक्त जा के कार-भेट लेते हैं)। दुनिया के (पीरों-मुरशिदों के तो) बड़े अड्डे हैं। कई यहाँ आते हैं और जाते हैं; कई मंगते इनसे माँगते हैं और कई माँग-माँग के चले जाते हैं (पर प्रभू का ‘नाम’-रूप पट्टा इनसे नहीं मिल सकता)। 1।
मः 1 ॥
सउ मणु हसती घिउ गुड़ु खावै पंजि सै दाणा खाइ ॥
डकै फूकै खेह उडावै साहि गइऐ पछुताइ ॥
अंधी फूकि मुई देवानी ॥
खसमि मिटी फिरि भानी ॥
अधु गुल्हा चिड़ी का चुगणु गैणि चड़ी बिललाइ ॥
खसमै भावै ओहा चंगी जि करे खुदाइ खुदाइ ॥
सकता सीहु मारे सै मिरिआ सभ पिछै पै खाइ ॥
होइ सताणा घुरै न मावै साहि गइऐ पछुताइ ॥
अंधा किस नो बुकि सुणावै ॥
खसमै मूलि न भावै ॥
अक सिउ प्रीति करे अक तिडा अक डाली बहि खाइ ॥
खसमै भावै ओहो चंगा जि करे खुदाइ खुदाइ ॥
नानक दुनीआ चारि दिहाड़े सुखि कीतै दुखु होई ॥
गला वाले हैनि घणेरे छडि न सकै कोई ॥
मखंी मिठै मरणा ॥
जिन तू रखहि तिन नेड़ि न आवै तिन भउ सागरु तरणा ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हाथी कितना ही घी-गुड़ और कई मन दाना खाता है; (तृप्त हो के) डकारता है। फुंकारे मारता है। मिट्टी (सूंड से) उड़ाता है। पर जब साँस निकल जाते हैं तब वह डकारना फूंके मारना खत्म हो जाता है। (धन-पदार्थ के घमण्ड में) अंधी और कमली (हुई दुनिया भी हाथी ही की तरह) फूंके मार-मार के मरती है; (आत्मिक मौत सहेड़ती है)। अगर (अहंकार गवा के) पति में समाए तो पति को भाती है। चिड़ी की चोग है आधा दाना (भाव। बहुत थोड़ा सा) (एक थोड़ी सी चोग चुग के) वह आकाश में उड़ती है और बोलती है; यदि वह मालिक प्रभू को याद करती है और उसको भाती है तो वह चिड़िया ही अच्छी है (डकार और फूकें मारने वाले हाथी से बेहतर तो एक छोटी सी चिड़िया ही है)। एक बली शेर सैकड़ों मृगों को मारता है। उस शेर के पीछे कई और जंगली पशू भी पेट भरते हैं। ताकत के गुमान में वह शेर अपने घुरने में नहीं समाता। पर जब उसके साँस निकल जाते हैं तब उसका गरजना खत्म हो जाता है। वह अंधा किसको गरज-गरज के सुनाता है। पति-प्रभू को तो उसका गरजना अच्छा नहीं लगता। (इस शेर के मुकाबले पर। देखिए।) अॅक टिड्डा। धतूरे से प्यार करता है। धतूरे की डाली पर बैठ के धतूरा ही खाता है; पर अगर वह मालिक प्रभू को याद करता है तो उसको भाता है तो (दहाड़-दहाड़ के औरों को डराने वाले शेर से तो) वह अॅक टिड्डा ही अच्छा है। हे नानक ! दुनिया (में जीना) चार दिनों का है। यहाँ पर मौज माणने से दुख ही निकलता है। (इस दुनिया की मिठास ऐसी है कि ज़बानी ज्ञान की) बातें करने वाले तो बहुत हैं पर (इस मिठास को) कोई छोड़ नहीं सकता। मक्खियां इस मिठास पर मरती हैं। पर। हे प्रभू ! जिनको आप बचाऐ। उनके नजदीक यह मिठास नहीं फटकती। वे संसार-समुंद्र से (साफ) तैर के निकल जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
अगम अगोचरु तू धणी सचा अलख अपारु ॥
तू दाता सभि मंगते इको देवणहारु ॥
जिनी सेविआ तिनी सुखु पाइआ गुरमती वीचारु ॥
इकना नो तुधु एवै भावदा माइआ नालि पिआरु ॥
गुर कै सबदि सलाहीऐ अंतरि प्रेम पिआरु ॥
विणु प्रीती भगति न होवई विणु सतिगुर न लगै पिआरु ॥
तू प्रभु सभि तुधु सेवदे इक ढाढी करे पुकार ॥
देहि दानु संतोखीआ सचा नामु मिलै आधारु ॥19॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! हे अपहुँच ! आप (मनुष्य की) इन्द्रि्रयों की पहुँच से परे है। आप सबका मालिक है। सदा स्थिर है। अदृश्य है और बेअंत है। सारे जीव मंगते हैं आप दाता है। आप एक ही सबको देने वाला है। जिन मनुष्यों ने गुरू की मति के द्वारा (उच्च) समझ हासिल करके आपको सिमरा है उन्होंने सुख प्राप्त किया है; पर। हे प्रभू ! कई जीवों को तूने माया से प्यार करना ही दिया है। आपको इस तरह ही अच्छा लगता है। सतिगुरू के शबद से हृदय में प्रेम-प्यार पैदा करके ही परमात्मा की सिफतसालाह की जा सकती है। प्रेम के बिना बँदगी नहीं हो सकती। और प्रेम सतिगुरू के बिना नहीं मिलता। आप सबका मालिक है। सारे जीव आपको ही सिमरते हैं; मैं (आपका) ढाढी (आपके आगे) एक यही अरजोई करता है – हे प्रभू ! मुझे अपना ‘नाम’ बख्श। मुझे आपका नाम सदा कायम रहने वाला नाम ही (जिंदगी का) आसरा मिले। (जिसकी बरकति से) मैं संतोष वाला हो जाऊँ। 19।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के सन्मुख होने से ही (प्रभू के सिफत-सालाह का) शबद (हृदय में) संभाला जा सकता है और सदा-स्थिर हरी के गुण गाए जा सकते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।