Lulla Family

अंग 1256

अंग
1256
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दुख सुख दोऊ सम करि जानै बुरा भला संसार ॥
सुधि बुधि सुरति नामि हरि पाईऐ सतसंगति गुर पिआर ॥2॥
अहिनिसि लाहा हरि नामु परापति गुरु दाता देवणहारु ॥
गुरमुखि सिख सोई जनु पाए जिस नो नदरि करे करतारु ॥3॥
काइआ महलु मंदरु घरु हरि का तिसु महि राखी जोति अपार ॥
नानक गुरमुखि महलि बुलाईऐ हरि मेले मेलणहार ॥4॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य दुखों को एक-समान जानता है। जगत द्वारा मिलते अच्छे-बुरे सलूक को भी बराबर जान के सहता है (यह सब कुछ हरी-नाम की बरकति है)। पर यह सूझ-बूझ प्रभू के नाम में सुरति जोड़ने से ही प्राप्त होती है। साध-संगति में रह के गुरू-चरणों से प्यार करने से ही मिलती है। 2। गुरू नाम की दाति देने वाला है देने के समर्थ है (जिस मनुष्य पर करतार की नजर होती है। उस मनुष्य को गुरू की तरफ से) दिन-रात प्रभू-नाम का लाभ मिला रहता है। गुरू के सन्मुख हो के शिक्षा भी वही मनुष्य ले सकता है जिस पर करतार मेहर की नजर करता है। 3। यह मनुष्य शरीर परमात्मा का महल है परमात्मा का मंदिर है परमात्मा का घर है। बेअंत परमात्मा ने इसमें अपनी ज्योति टिका रखी है। (जीव अपने हृदय-महल में बसते प्रभू को छोड़ के बाहर भटकता फिरता है) हे नानक ! (बाहर भटकता जीव) गुरू के द्वारा ही हृदय-महल में मोड़ के लाया जा सकता है। और तब ही मिलाने का समर्थ प्रभू उसको अपने चरणों में जोड़ लेता है। 4। 5।
मलार महला 1 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पवणै पाणी जाणै जाति ॥
काइआं अगनि करे निभरांति ॥
जंमहि जीअ जाणै जे थाउ ॥
सुरता पंडितु ता का नाउ ॥1॥
गुण गोबिंद न जाणीअहि माइ ॥
अणडीठा किछु कहणु न जाइ ॥
किआ करि आखि वखाणीऐ माइ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊपरि दरि असमानि पइआलि ॥
किउ करि कहीऐ देहु वीचारि ॥
बिनु जिहवा जो जपै हिआइ ॥ कोई जाणै कैसा नाउ ॥2॥
कथनी बदनी रहै निभरांति ॥
सो बूझै होवै जिसु दाति ॥
अहिनिसि अंतरि रहै लिव लाइ ॥
सोई पुरखु जि सचि समाइ ॥3॥
जाति कुलीनु सेवकु जे होइ ॥
ता का कहणा कहहु न कोइ ॥
विचि सनातंी सेवकु होइ ॥
नानक पण्हीआ पहिरै सोइ ॥4॥1॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ जो हवा पानी आदि तत्वों के मूल को जान ले (भाव। जो यह समझे कि सारे तत्वों को बनाने वाला परमात्मा स्वयं ही है। और उसके साथ गहरी सांझ डाल ले)। जो अपने शरीर की तृष्णा अग्नि को शांत कर ले। जो उस असल के साथ जान-पहचान डाले जिससे सारे जीव-जंतु पैदा होते हैं। (हाँ) उस मनुष्य का नाम समझदार पण्डित (रखा जा सकता) है। 1। हे माँ ! गोबिंद के गुण (पूरी तरह से) जाने नहीं जा सकते। (वह गोबिंद इन आँखों से) दिखता नहीं। (इस वास्ते उसके सही स्वरूप बाबत) कुछ नहीं कहा जा सकतर। हे माँ ! क्या कह के उसका स्वरूप बयान किया जाए। (जो मनुष्य अपने आप को विद्वान समझ के उस प्रभू का असल स्वरूप बयान करने का यतन करते हैं। वे भूल करते हैं। इस प्रयास में कोई शोभा नहीं)। 1। रहाउ। ऊपर नीचे आसमान में पाताल में (हर जगह परमात्मा व्यापक है। फिर भी उसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। हे भाई !) विचार कर के कोई भी (अगर दे सकते हैं तो) उक्तर दो कि (उस प्रभू के बारे में) कैसे कुछ कहा जा सकता है। परमात्मा का स्वरूप बयान करना तो असंभव है। (पर) अगर कोई मनुष्य दिखावा छोड़ के अपने हृदय में उसका नाम जपता रहे। तो कोई ऐसा मनुष्य ही यह समझ लेता है कि उस परमात्मा का नाम जपने में आनंद कैसा है। 2। वह (चोंच-ज्ञान की बातें) कहने-बोलने से रूक जाता है और वह समझ लेता है (कि सारी सृष्टि का रचनहार मूल प्रभू खुद ही है), – जिस मनुष्य पर परमात्मा की बख्शिश हो (फिर) वह दिन-रात (हर वक्त) अपने अंतरात्मे प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। (हे भाई !) वही है असल मनुष्य जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहता है। 3। अगर कोई मनुष्य उच्च जाति व ऊँची कुल का हो के (जाति-कुल का अहंकार छोड़ के) परमात्मा का भगत बन जाए। उसका तो कहना ही क्या हुआ। (भाव। उसकी पूरी सिफत की ही नहीं जा सकती)। (पर) हे नानक ! (कह-) नीच जाति में भी पैदा हो के अगर कोई प्रभू का भगत बनता है। तो (बेशक) वह मेरी चमड़ी की जुतियाँ बना के पहन ले। 4। 1। 6।
मलार महला 1 ॥
दुखु वेछोड़ा इकु दुखु भूख ॥
इकु दुखु सकतवार जमदूत ॥
इकु दुखु रोगु लगै तनि धाइ ॥
वैद न भोले दारू लाइ ॥1॥
वैद न भोले दारू लाइ ॥
दरदु होवै दुखु रहै सरीर ॥
ऐसा दारू लगै न बीर ॥1॥ रहाउ ॥
खसमु विसारि कीए रस भोग ॥
तां तनि उठि खलोए रोग ॥
मन अंधे कउ मिलै सजाइ ॥
वैद न भोले दारू लाइ ॥2॥
चंदन का फलु चंदन वासु ॥
माणस का फलु घट महि सासु ॥
सासि गइऐ काइआ ढलि पाइ ॥
ता कै पाछै कोइ न खाइ ॥3॥
कंचन काइआ निरमल हंसु ॥
जिसु महि नामु निरंजन अंसु ॥
दूख रोग सभि गइआ गवाइ ॥
नानक छूटसि साचै नाइ ॥4॥2॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ मनुष्य के लिए सबसे बड़ा) रोग है परमात्मा के चरणों से विछोड़ा। दूसरा रोग है माया की भूख। एक और भी रोग है। वह है ताकतवार जमदूत (भाव। जमदूतों का डर। मौत का डर)। और यह वह दुख है वह रोग है जो मनुष्य के शरीर में आ चिपकता है (जब तक शारीरिक रोग पैदा करने वाले मानसिक रोग मौजूद हैं। आपकी दवाई कोई असर नहीं कर सकती)। हे भोले वैद्य ! आप दवा ना दे (आप किस-किस रोग का इलाज करेगा। 1। हे अंजान वैद्य ! ऐसी दवाई देने का कोई लाभ नहीं। (जिस दवाई के बरतने पर भी) शरीर का दुख-दर्द टिका रहे ऐसी दवा कोई असर नहीं करती । 1। रहाउ। जब मनुष्य ने प्रभू-पति को भुला के (विषौ-विकारों के) रस भोगने शुरू कर दिए। तो उसके शरीर में बिमारियां पैदा होने लग पड़ीं। (गलत रास्ते पर पड़े मनुष्य को सही रास्ते पर डालने के लिए। इसके) माया-मोह में अंधे हुए मन को (शारीरिक रोगों के द्वारा) सज़ा मिलती है। सो। हे अंजान वैद्य ! (शारीरिक रोगों को दूर करने के लिए दी गई) आपकी दवाई का कोई लाभ नहीं (विषौ-विकारों के कारण यह रोग तो बार-बार पैदा होएंगे)। 2। चंदन का पौधा तब तक चंदन है जब तक उसमें चँदन की सुगंधि है (सुगंध के बिना यह साधारण लकड़ी ही है)। मनुष्य का शरीर तब तक मनुष्य का शरीर है जब तक इस शरीर में साँसें चल रही हैं। श्वास निकल जाने पर यह शरीर मिट्टी हो जाता है। शरीर के मिट्टी हो जाने के बाद कोई भी मनुष्य दवाई नहीं खाता (पर इस शरीर में निकल जाने वाली जीवात्मा तो विछोड़े और तृष्णा आदि रोगों में ग्रसित हुई चली जाती है। हे वैद्य ! दवाई की असल आवश्यक्ता तो उस जीवात्मा को है)। 3। वह शरीर सोने जैसा शुद्ध रहता है। परमात्मा की जोति (लिश्कारे मारती) है। (हे वैद्य !) जिस शरीर में परमात्मा का नाम बसता है। उसमें बसती जीवात्मा भी नरोई रहती है। वह जीवात्मा अपने सारे रोग दूर करके यहाँ से जाती है। हे नानक ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ के ही जीव (तृष्णा आदि रोगों से) खलासी हासिल करेगा। 4। 2। 7।
मलार महला 1 ॥
दुख महुरा मारण हरि नामु ॥
सिला संतोख पीसणु हथि दानु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ (दुनिया के) दुख-कलेश (इन्सानी जीवन के लिए) जहर (तुल्य) हैं। (पर। हे भाई !) (अगर इस जहर का कुश्ता करने के लिए) परमात्मा का नाम आप (जड़ी-बूटियों आदि) मसाले (की जगह) बरते। (उस कुश्ते को बारीक करने के लिए) संतोख की शिला (पत्थर की सिल जिस पर मसाला पीसा जाता है) बनाए। और (जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए) दान को अपने हाथ में पीसने वाला पत्थर का बट्टा बनाए।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य दुखों को एक-समान जानता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।