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अंग 1282

अंग
1282
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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पउड़ी ॥
अतुलु किउ तोलीऐ विणु तोले पाइआ न जाइ ॥
गुर कै सबदि वीचारीऐ गुण महि रहै समाइ ॥
अपणा आपु आपि तोलसी आपे मिलै मिलाइ ॥
तिस की कीमति ना पवै कहणा किछू न जाइ ॥
हउ बलिहारी गुर आपणे जिनि सची बूझ दिती बुझाइ ॥
जगतु मुसै अंम्रितु लुटीऐ मनमुख बूझ न पाइ ॥
विणु नावै नालि न चलसी जासी जनमु गवाइ ॥
गुरमती जागे तिन॑ी घरु रखिआ दूता का किछु न वसाइ ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा अतुल है। उसके सारे गुण जाचे नहीं जा सकते। पर। उसके गुणों की विचार करे बिना उसकी प्राप्ति भी नहीं होती। प्रभू के गुणों की विचार सतिगुरू के शबद द्वारा ही हो सकती है (जो मनुष्य विचार करता है वह) उसके गुणों में मगन रहता है। अपने आप को प्रभू स्वयं ही तोल सकता है (भाव। प्रभू कितना बड़ा है यह बात वह स्वयं ही जानता है) वह खुद ही (अपने सेवकों को गुरू का) मिलाया मिलता है। प्रभू का मूल्य नहीं पड़ सकता; (वह कितना बड़ा है इस बारे) कोई बात कही नहीं जा सकती। मैं कुर्बान हूँ अपने गुरू से जिसने (मुझे सच्ची सूझ दे दी है)। (गुरू की मति के बिना) जगत ठगा जा रहा है। अमृत लूटा जा रहा है। मन के पीछे चलने वाले लोगों को यह समझ नहीं पड़ती। प्रभू के नाम के बिना (कोई अन्य चीज़ मनुष्य के) साथ नहीं जाएगी (सो। ‘नाम’ से भूला हुआ मनुष्य अपना जनम व्यर्थ गवा के जाएगा)। जो मनुष्य गुरू की मति ले कर (माया के मोह की नींद में से) जाग जाते हैं वे अपना घर (भाव। अपना शरीर। विकारों से) बचा के रखते हैं। इन दूतों (विकारों) का उन पर कोई जोर नहीं चलता। 8।
सलोक मः 3 ॥
बाबीहा ना बिललाइ ना तरसाइ एहु मनु खसम का हुकमु मंनि ॥
नानक हुकमि मंनिऐ तिख उतरै चड़ै चवगलि वंनु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे पपीहे ! न बिलक। अपना मन ना तरसा और मालिक का हुकम मान (उसके हुकम में बरखा होगी) हे नानक ! प्रभू की रज़ा में चलने से ही (माया की) प्यास मिटती है और चौगुना रंग चढ़ता है (भाव। मन पूरे तौर पर खिलता है)। 1।
मः 3 ॥
बाबीहा जल महि तेरा वासु है जल ही माहि फिराहि ॥
जल की सार न जाणही तां तूं कूकण पाहि ॥
जल थल चहु दिसि वरसदा खाली को थाउ नाहि ॥
एतै जलि वरसदै तिख मरहि भाग तिना के नाहि ॥
नानक गुरमुखि तिन सोझी पई जिन वसिआ मन माहि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे पपीहे ! पानी में आप बसता है। पानी में ही आप चलता-फिरता है (भाव। हे जीव ! उस सर्व-व्यापक हरी में ही आप जीता-बसता है)। पर उस पानी की आपको कद्र नहीं। इस वास्ते आप बिलक रहा है। चारों तरफ ही जलों में थलों में बरखा हैं रही है कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ बरखा नहीं होती; इतनी बरसात होते हुए भी जो प्यासे मर रहे हैं उनके भाग्य (अच्छे) नहीं हैं। हे नानक ! गुरू के द्वारा जिनके हृदय में प्रभू आ बसता है उन्हें ये समझ आ जाती है (कि प्रभू हर जगह बसता है)। 2।
पउड़ी ॥
नाथ जती सिध पीर किनै अंतु न पाइआ ॥
गुरमुखि नामु धिआइ तुझै समाइआ ॥
जुग छतीह गुबारु तिस ही भाइआ ॥
जला बिंबु असरालु तिनै वरताइआ ॥
नीलु अनीलु अगंमु सरजीतु सबाइआ ॥
अगनि उपाई वादु भुख तिहाइआ ॥
दुनीआ कै सिरि कालु दूजा भाइआ ॥
रखै रखणहारु जिनि सबदु बुझाइआ ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) नाथ। जती। सिद्धहस्त जोगी। पीर (कई हो गुजरे हैं। पर) किसी ने आपका अंत नहीं पाया (भाव। आप कैसा है और कब से है। कितना है- ये बात कोई बता नहीं सका। कई यत्न कर चुके)। गुरू की शिक्षा पर चलने वाले मनुष्य (ऐसे निश्फल उद्यम छोड़ के। केवल आपका) नाम सिमर के आपके (चरणों में) लीन रहते हैं। (हे भाई !) यह बात उस प्रभू को ऐसे ही अच्छी लगी है कि अनेकों युग अंधेरा ही अंधेरा था (भाव। ये नहीं कहा जा सकता कि जब जगत की रचना हुई थी तब क्या था); फिर भयानक जल ही जल- ये खेल भी उसी ने बनाई; और। वह सदा जीवित रहने वाला प्रभू स्वयं बेअंत ही बेअंत और पहुँच से परे है। (हे भाई !) (जब उसने जगत-रचना कर दी। तब) तृष्णा की आग। वाद-विवाद की भूख-प्यास भी उसने खुद ही पैदा कर दी। दुनिया (भाव। जीवों) के सिर पर मौत (का डर भी उसने पैदा किया है। क्योंकि इनको) यह दूसरा (भाव। प्रभू को छोड़ के यह दिखाई देता जगत) प्यारा लग रहा है। पर। रखने के समर्थ प्रभू जिसने (गुरू के द्वारा) शबद की सूझ बख्शी है (इन अग्नि। वाद। भूख। प्यास और काल आदि से) रक्षा भी खुद ही करता है। 9।
सलोक मः 3 ॥
इहु जलु सभ तै वरसदा वरसै भाइ सुभाइ ॥
से बिरखा हरीआवले जो गुरमुखि रहे समाइ ॥
नानक नदरी सुखु होइ एना जंता का दुखु जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (प्रभू का नाम रूप) यह जल (भाव। बरसात) हर जगह बरस रहा है और बरसता भी है प्रेम से अपनी मौज से (भाव। किसी भेद-भाव के बग़ैर)। पर। केवल वही (जीव-रूप) वृक्ष हरे होते हैं जो गुरू के सन्मुख हो के (इस ‘नाम’ बरखा में) लीन रहते हैं। हे नानक ! प्रभू की मेहर की नजर से सुख पैदा होता है और इन जीवों का दुख दूर होता है। 1।
मः 3 ॥
भिंनी रैणि चमकिआ वुठा छहबर लाइ ॥
जितु वुठै अनु धनु बहुतु ऊपजै जां सहु करे रजाइ ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ जीआं जुगति समाइ ॥
इहु धनु करते का खेलु है कदे आवै कदे जाइ ॥
गिआनीआ का धनु नामु है सद ही रहै समाइ ॥
नानक जिन कउ नदरि करे तां इहु धनु पलै पाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जब प्रभू को भाता है (तब) भीगी हुई रात में (बादल) चमकता है और झड़ी लगा के बरसता है। इसके बरसने से बहुत अन्न (-रूप) धन पैदा होता है। इस धन के बरसने से मन तृप्त होता है और जीवों में जीने की जुगति आती है (भाव। अन्न खाने से जीव जीते हैं)। पर। यह (अन्न-रूप) धन तो करतार का एक तमाशा है जो कभी पैदा होता है कभी नाश हो जाता है। परमात्मा के साथ गहरी सांझ रखने वाले लोगों के लिए प्रभू का नाम ही धन है जो सदा टिका रहता है। हे नानक ! जिन पर प्रभू मेहर की नज़र करता है उनको यह धन बख्शता है। 2।
पउड़ी ॥
आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥
आपे लेखा मंगसी आपि कराए कार ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ हुकमु करे गावारु ॥
आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥
आपे वेखै सुणे आपि सभसै दे आधारु ॥
सभ महि एकु वरतदा सिरि सिरि करे बीचारु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू (सब कुछ) स्वयं ही कर रहा है और (जीवों से) स्वयं ही करवा रहा है (सो। इस अग्नि। वाद। भूख। प्यास। काल आदि के बारे) किसी और के पास फरियाद नहीं की जा सकती। (जीवों से) स्वयं ही (भूख। प्यास आदि वाले) काम करवा रहा है और (इन किए कामों का) लेखा भी खुद ही माँगता है। मूर्ख जीव (ऐसे ही) हैंकड़ दिखाता है (असल में) वही कुछ होता है जो उस प्रभू को अच्छा लगता है। (इन अग्नि। भूख आदि से) अगर प्रभू खुद ही बचाए तो बचा जा सकता है। यह बख्शिश वह खुद ही करने वाला है। जीवों की संभाल प्रभू स्वयं ही करता है। स्वयं ही (जीवों की अरदासें) सुनता है और हरेक जीव को आसरा देता है। सब जीवों में प्रभू स्वयं ही मौजूद है और हरेक जीव का ध्यान रखता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।