Lulla Family

अंग 1254

अंग
1254
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु मलार चउपदे महला 1 घरु 1
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
खाणा पीणा हसणा सउणा विसरि गइआ है मरणा ॥
खसमु विसारि खुआरी कीनी ध्रिगु जीवणु नही रहणा ॥1॥
प्राणी एको नामु धिआवहु ॥
अपनी पति सेती घरि जावहु ॥1॥ रहाउ ॥
तुधनो सेवहि तुझु किआ देवहि मांगहि लेवहि रहहि नही ॥
तू दाता जीआ सभना का जीआ अंदरि जीउ तुही ॥2॥
गुरमुखि धिआवहि सि अंम्रितु पावहि सेई सूचे होही ॥
अहिनिसि नामु जपहु रे प्राणी मैले हछे होही ॥3॥
जेही रुति काइआ सुखु तेहा तेहो जेही देही ॥
नानक रुति सुहावी साई बिनु नावै रुति केही ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु मलार चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वह सम्पूर्ण विश्व का स्रष्टा है, सर्वशक्तिमान है,वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रहामूर्ति अमर है, वह योनियों के चक्र से रहित है, वह स्वजन्मा है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। सिर्फ खाने। पीने। हसने। सोने के आहर में रहने से (जीव को) मौत भूल जाती है। (मौत के भूलने से) प्रभू-पति को बिसार के जीव वह-वह काम करता रहता है जो इसकी ख्वारी (दुख) का कारण बनते हैं। (प्रभू को बिसार के) जीना धिक्कार-योग्य हो जाता है। सदा यहाँ किसी ने टिके नहीं रहना (फिर क्यों ना जीवन सदाचारी बनाया जाय।)। 1। हे प्राणी ! एक परमात्मा का ही नाम सिमर। (सिमरन की बरकति से) आप आदर सहित प्रभू के चरणों में पहुँचेगा। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जो लोग आपको सिमरते हैं (आपका तो कुछ नहीं सँवारते। क्योंकि) आपको वे कुछ भी नहीं दे सकते (बल्कि आपसे) माँगते ही माँगते हैं। और आपसे नित्य दातें लेते ही रहते हैं। आपके दर से माँगे बिना नहीं रह सकते। आप सारे जीवों को दातें देने वाला है। जीवों के शरीरों में जिंद भी आप खुद ही है। 2। जो लोग गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू का नाम) जपते हैं। वे (आत्मिक जीवन देने वाला) नाम-अमृत हासिल करते हैं। वही सदाचारी जीवन वाले बन जाते हैं। (इसलिए) हे प्राणी ! दिन-रात परमात्मा का नाम जपो। बुरे आचरण वाले लोग भी (नाम जप के) अच्छे बन जाते हैं। 3। (मानवीय जीवन के लिए दो ही ऋतुएं हैं- सिमरन और नाम हीनता। इनमें से) जिस ऋतु के प्रभाव तले मनुष्य जीवन गुजारता है। इसके शरीर को वैसा ही सुख (अथवा दुख) मिलता है। उसी प्रभाव के मुताबिक ही इसका शरीर ढलता रहता है (इसकी ज्ञानेन्द्रियां ढलती रहती हैं)। हे नानक ! मनुष्य के लिए वही ऋतु अच्छी है (जब ये नाम सिमरता है)। नाम सिमरन के बिना (कुदरति की बदलती कोई भी) ऋतु इसको लाभ नहीं दे सकती। 4। 1।
मलार महला 1 ॥
करउ बिनउ गुर अपने प्रीतम हरि वरु आणि मिलावै ॥
सुणि घन घोर सीतलु मनु मोरा लाल रती गुण गावै ॥1॥
बरसु घना मेरा मनु भीना ॥
अंम्रित बूंद सुहानी हीअरै गुरि मोही मनु हरि रसि लीना ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि सुखी वर कामणि पिआरी जिसु गुर बचनी मनु मानिआ ॥
हरि वरि नारि भई सोहागणि मनि तनि प्रेमु सुखानिआ ॥2॥
अवगण तिआगि भई बैरागनि असथिरु वरु सोहागु हरी ॥
सोगु विजोगु तिसु कदे न विआपै हरि प्रभि अपणी किरपा करी ॥3॥
आवण जाणु नही मनु निहचलु पूरे गुर की ओट गही ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि धनु सोहागणि सचु सही ॥4॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ मैं अपने गुरू प्रीतम के आगे विनती करती हूँ। (गुरू ही) पति-प्रभू को ला के मिला सकता है। (जैसे बरखा ऋतु में बादलों की गड़-गड़ाहट सुन के मोर नाचने लगता है। वैसे ही) गुरू-शबद-बादलों की गरज सुन के मेरा मन ठंडा-ठार होता है (मन के विकारों की तपश बुझ जाती है। मेरे प्राण) प्रीतम-प्रभू के प्यार में रंगीज के उसकी सिफतसालाह करते हैं। 1। हे बादल-बरखा कर (हे गुरू ! नाम की बरसात कर। ता कि) मेरा मन उसमें भीग जाए। (जिस सौभाग्यवती जीव-स्त्री को) गुरू ने अपने प्यार-वश कर लिया; उसका मन परमात्मा रस में लीन रहता है। उसके हृदय में नाम-अमृत की बूँद ठंडक देती है (सुख देती है)। 1। रहाउ। जिस (जीव-स्त्री) का मन गुरू के वचनों में (गुरू की बाणी में) लग जाता है। पति-प्रभू की वह प्यारी स्त्री अडोल अवस्था में आत्मिक सुख भोगती है। प्रभू को अपना पति बना के वह जीव-स्त्री भाग्यशाली हो जाती है। उसके मन में उसके तन में प्रभू का प्यार आत्मिक सुख पैदा करता है। 2। वह जीव-स्त्री अवगुण त्याग के प्रभू-चरणों की वैरागनि हो जाती है। सदा कायम रहने वाला हरी उसका सोहाग बन जाता है। उसका पति बन जाता है। जिस जीव-स्त्री पर हरी-प्रभू ने अपनी कृपा (की दृष्टि) की। उस पर मोह आदि की चिंता या प्रभू-चरणों से विछोड़ा कभी जोर नहीं डाल सकता। 3। जिस जीव-स्त्री ने पूरे गुरू का पल्ला पकड़ा है। उसका मन (विकारों से) अडोल हो जाता है (भाव। विकारों की तरफ नहीं दौड़ता)। उसके जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे नानक ! वही जीव-स्त्री गुरू के द्वारा प्रभू का नाम जप के सौभाग्यशाली हो जाती है। वह ठीक अर्थों में सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाती है। 4। 2।
मलार महला 1 ॥
साची सुरति नामि नही त्रिपते हउमै करत गवाइआ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ जिनकी सुरति अडोल हो के प्रभू के नाम में नहीं जुड़ी। वे माया की तृष्णा की तरफ से पलट नहीं सके (अतृप्त ही रहे)। ‘मैं बड़ा बन जाऊँ। मैं बड़ा बन जाऊँ’ – ये कह-कहके उन्होंने अपना जीवन गवा लिया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मलार चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वह सम्पूर्ण विश्व का स्रष्टा है, सर्वशक्तिमान है,वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रहामूर्ति अमर ।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।