Lulla Family

अंग 1292

अंग
1292
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु मलार बाणी भगत नामदेव जीउ की॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवीले गोपाल राइ अकुल निरंजन ॥
भगति दानु दीजै जाचहि संत जन ॥1॥ रहाउ ॥
जां चै घरि दिग दिसै सराइचा बैकुंठ भवन चित्रसाला सपत लोक सामानि पूरीअले ॥
जां चै घरि लछिमी कुआरी चंदु सूरजु दीवड़े कउतकु कालु बपुड़ा कोटवालु सु करा सिरी ॥
सु ऐसा राजा स्री नरहरी ॥1॥
जां चै घरि कुलालु ब्रहमा चतुर मुखु डांवड़ा जिनि बिस्व संसारु राचीले ॥
जां कै घरि ईसरु बावला जगत गुरू तत सारखा गिआनु भाखीले ॥
पापु पुंनु जां चै डांगीआ दुआरै चित्र गुपतु लेखीआ ॥
धरम राइ परुली प्रतिहारु ॥
सोु ऐसा राजा स्री गोपालु ॥2॥
जां चै घरि गण गंधरब रिखी बपुड़े ढाढीआ गावंत आछै ॥
सरब सासत्र बहु रूपीआ अनगरूआ आखाड़ा मंडलीक बोल बोलहि काछे ॥
चउर ढूल जां चै है पवणु ॥
चेरी सकति जीति ले भवणु ॥
अंड टूक जा चै भसमती ॥
सोु ऐसा राजा त्रिभवण पती ॥3॥
जां चै घरि कूरमा पालु सहस्र फनी बासकु सेज वालूआ ॥
अठारह भार बनासपती मालणी छिनवै करोड़ी मेघ माला पाणीहारीआ ॥
नख प्रसेव जा चै सुरसरी ॥
सपत समुंद जां चै घड़थली ॥
एते जीअ जां चै वरतणी ॥
सोु ऐसा राजा त्रिभवण धणी ॥4॥
जां चै घरि निकट वरती अरजनु ध्रू प्रहलादु अंबरीकु नारदु नेजै सिध बुध गण गंधरब बानवै हेला ॥
एते जीअ जां चै हहि घरी ॥
सरब बिआपिक अंतर हरी ॥
प्रणवै नामदेउ तां ची आणि ॥
सगल भगत जा चै नीसाणि ॥5॥1॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: रागु मलार बाणी भगत नामदेव जीउ की ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ मैंने तो उस प्रभू का सिमरन किया है। जो सारी सृष्टि का रक्षक है। जिसकी कोई खास कुल नहीं। जिस पर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती और (जिस के दर पर) सारे भगत मँगते हैं (और कहते हैं कि हे दाता ! हमें) अपनी भक्ति की दाति बख्श। 1। रहाउ। (जिसका इतना बड़ा शामियाना है कि) यह चारों दिशाएं (उस शामियाने की मानो) कनातें हैं। (राजाओं के राज-महलों में तस्वीर घर होते हैं। परमात्मा एक ऐसा राजा है कि) सारा बैकुंठ उसका (जैसे) तस्वीर-घर है। और सारे ही जगत में उसका हुकम एक-सार चल रहा है। (राजाओं की रानियों का जोबन तो चार दिनों का होता है। परमात्मा एक ऐसा राजा है) जिसके महल में लक्ष्मी है। जो सदा जवान रहती है (जिसका जोबन कभी नाश होने वाला नहीं)। ये चाँद-सूर्य (उसके महल के। मानो) छोटे से दीपक हैं। जिस काल का हाला हरेक जीव के सिर पर है (जिस काल का हाला हरेक जीव को भरना पड़ता है। जिस काल से जगत का हरेक जीव थर-थर काँपता है) और जो काल (इस जगत-रूप शहर के सिर पर) कोतवाल है। वह काल बेचारा (उस परमात्मा के घर में। जैसे। एक) खिलौना है वह परमात्मा (मानो) एक बहुत बड़ा राजा है । 1। (कि लोगों के ख्याल के अनुसार) जिस ब्रहमा ने सारा संसार पैदा किया है। चार मुँहों वाला वह ब्रहमा भी उसके घर में बर्तन घड़ने वाला एक कुम्हार ही है (भाव। उस परमात्मा के सामने लोगों का जाना-माना ब्रहमा भी इतनी ही हस्ती रखता है जितनी कि किसी गाँव के चौधरी के सामने गाँव का गरीब कुम्हार)। (इन लोगों की नजरों में तो) शिव जी जगत का गुरू (है)। जिसने (जगत के जीवों के लिए) असल समझने-योग्य उपदेश सुनाया है (भाव। जो सारे जीवों को मौत का संदेशा पहुँचाता है। जो सब जीवों का नाश-कर्ता माना जा रहा है)। ये शिव जी (सृष्टि के मालिक) उस परमात्मा के घर में (जैसे) एक बावला सा मसखरा है। (राजाओं के राज-महलों के दरवाजों पर चौबदार खड़े होते हैं। जो राजाओं की हजूरी में जाने वालों को रोकते व आज्ञा देते हैं। घट-घट में बसने वाले राजन-प्रभू ने ऐसा नियम बनाया है कि हरेक जीव का किया) अच्छा या बुरा काम उस प्रभू के महल के दर पर चौबदार है (भाव। हरेक जीव के अंदर हृदय-घर में प्रभू बस रहा है। पर जीव के अपने किए अच्छे-बुरे काम ही उस प्रभू से दूरी बना देते हैं)। जिस चित्रगुप्त का सहम हरेक जीव को लगा हुआ है। (वह) चित्रगुप्त उसके घर में एक मुनीम (जितनी हस्ती रखता) है। (लोगों के हिसाब से) पर्लय लाने वाला धर्मराज उस प्रभू के महल का एक (मामूली सा) दरबान है सृष्टि का मालिक वह परमात्मा एक ऐसा राजा है। 2। जिसके दर पर (शिव जी के) गण-देवताओं के रागी और सारे ऋषी – ये बेचारे ढाढी (बन के उसकी सिफतों की वारें) गाते हैं। सारे शास्त्र (जैसे) बहु-रूपीये हैं। (यह जगत। जैसे। उसका) छोटा सा अखाड़ा है। (इस जगत के) राजे उसका हाला भरने वाले हैं। (उसकी सिफत के) सुंदर बोल बोलते हैं। वह प्रभू एक ऐसा राजा है कि उसके दर पर पवन चौर-बरदार है। माया उसकी दासी है जिसने सारा जगत जीत लिया है। यह धरती उसके लंगर में। मानो। चूल्हा है (भाव। सारी धरती के जीवों को वह खुद ही रिज़क देने वाला है) तीन भवनों का मालिक परमात्मा एक ऐसा राजा है। 3। विष्णु का कछु-अवतार जिसके घर में। जैसे। एक पलंघ है ; हजार फनों वाला शेशनाग जिसकी सेज की तनियों (का काम देता) है; जगत की सारी बनस्पति (उसको फूल भेट करने वाली) मालिन है। छिआन्नवे करोड़ बादल उसका पानी भरने वाले (नौकर) हैं। गंगा उसके दर पर उसके नाखूनों का पसीना है। और सातों ही समुंद्र उसके पनघट (घड़वंजी) हैं। जगत के ये सारे जीव-जंतु उसके बर्तन हैं तीनों भवनों का मालिक वह प्रभू एक ऐसा राजा है । 4। वह प्रभू एक ऐसा राजा है जिसके घर में उसके नजदीक रहने वाले अर्जुन। प्रहलाद। अंबरीक। नारद। नेजै (योग-साधना में) सिद्धहस्त योगी। ज्ञानवान मनुष्य। शिव जी के गण-देवताओं के रागी। बावन बीर आदि उसकी (एक साधारण सी) खेल हैं। जगत के यह सारे जीव-जंतु उस प्रभू के घर में हैं। वह हरी-प्रभू सब में व्यापक है। सबके अंदर बसता है। नामदेव विनती करता है- मुझे उस परमात्मा की ओट का आसरा है सारे भगत जिसके झंडे तले (आनंद ले रहे) हैं। 5। 1।
मलार ॥
मो कउ तूं न बिसारि तू न बिसारि ॥
तू न बिसारे रामईआ ॥1॥ रहाउ ॥
आलावंती इहु भ्रमु जो है मुझ ऊपरि सभ कोपिला ॥
सूदु सूदु करि मारि उठाइओ कहा करउ बाप बीठुला ॥1॥
मूए हूए जउ मुकति देहुगे मुकति न जानै कोइला ॥
ए पंडीआ मो कउ ढेढ कहत तेरी पैज पिछंउडी होइला ॥2॥
तू जु दइआलु क्रिपालु कहीअतु हैं अतिभुज भइओ अपारला ॥
फेरि दीआ देहुरा नामे कउ पंडीअन कउ पिछवारला ॥3॥2॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: मलार ॥ मुझे आप ना बिसारना। मुझे आप ना भुलाना। हे सुंदर राम ! मुझे आप ना बिसारना। 1। रहाउ। (इन पण्डियों को) यह वहम है कि ये ऊँची जाति वाले हैं। (इस करके ये) सारे मेरे ऊपर गुस्से हो गए हैं; शूद्र-शूद्र कह-कह के और मार-पीट के मुझे इन्होंने उठा दिया है। हे मेरे बीठल पिता ! इनके आगे मेरे अकेले की पेश नहीं चलती। 1। यदि तूने मुझे मरने के बाद मुक्ति दे दी। आपकी मुक्ति का किसी को पता नहीं लगना; ये पांडे मुझे नीच कह रहे हैं। इस तरह तो आपकी अपनी ही इज्जत कम हैं रही है (क्या आपकी बँदगी करने वाला कोई व्यक्ति नीच रह सकता है।)। 2। (हे सुहणे राम !) आप तो (सब पर। चाहे कोई नीच कुल का हैं अथवा ऊँची कुल का) दया करने वाला है। आप मेहर का घर है। (फिर आप) है भी बहुत बली और बेअंत। (क्या आपके सेवक पर कोई आपकी मर्जी के बिना धक्का कर सकता है।) (मेरी नामदेव जी की आरजू सुन के प्रभू ने) देहुरा मुझ नामदेव की तरफ फेर दिया। और पांडों की ओर पीठ हो गई। 3। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मलार बाणी भगत नामदेव जीउ की ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ मैंने तो उस प्रभू का सिमरन किया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।