Lulla Family

अंग 1291

अंग
1291
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक मः 1 ॥
घर महि घरु देखाइ देइ सो सतिगुरु पुरखु सुजाणु ॥
पंच सबद धुनिकार धुनि तह बाजै सबदु नीसाणु ॥
दीप लोअ पाताल तह खंड मंडल हैरानु ॥
तार घोर बाजिंत्र तह साचि तखति सुलतानु ॥
सुखमन कै घरि रागु सुनि सुंनि मंडलि लिव लाइ ॥
अकथ कथा बीचारीऐ मनसा मनहि समाइ ॥
उलटि कमलु अंम्रिति भरिआ इहु मनु कतहु न जाइ ॥
अजपा जापु न वीसरै आदि जुगादि समाइ ॥
सभि सखीआ पंचे मिले गुरमुखि निज घरि वासु ॥
सबदु खोजि इहु घरु लहै नानकु ता का दासु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ वह है समझदार सतिगुरू पुरख जो हृदय-घर में परमात्मा के रहने की जगह दिखा देता है; (जब मनुष्य) उस घर में (पहुँचता है) तब गुरू का शबद-रूप नगारा बजता है (भाव। गुरू-शबद का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि कोई और आकर्षण उस पर असर नहीं डाल सकता। तब मानो।) पाँच किस्म के साजों की एक-रस संगीतक आवाज़ उठती है (जो मस्ती पैदा करती है) इस अवस्था में (पहुँच के) मनुष्य (बेअंत कुदरति के करिश्मे) द्वीपों। लोकों। पातालों। खण्डों और मण्डलों को देख के हैरान होता है; (इस सारी कुदरति का) पातशाह सच्चे तख़्त पर बैठा दिखता है। उस हालत में पहुँचने से। मानो। साज़ों की ऊँची सुर की घनघोर झड़ी लगी हुई रहती है। इस ईश्वरीय मिलाप में बैठा मनुष्य (मानो) राग सुन-सुन के अफुर अवस्था में सुरति जोड़े रखता है (भाव। ईश्वरीय मिलाप की मौज में इतना मस्त होता है कि जगत का कोई फुरना उसके मन में नहीं उठता)। यहाँ पर (इस अवस्था में) बेअंत प्रभू के गुण ज्यों-ज्यों विचारे जाते हैं। त्यों-त्यों मन का फुरना मन में ग़रक होता जाता है; ये मन किसी और तरफ़ नहीं जाता क्योंकि हृदय-रूप कमल-फूल (माया से) पलट के नाम-अमृत से भर जाता है; उस प्रभू में। जो सबका आदि है और जुगों के बनने से भी पहले का है। मन इस तरह लीन होता है कि प्रभू की याद (किसी वक्त) नहीं भूलती। जीभ हिलाए बग़ैर ही सिमरन होता रहता है। (इस तरह) गुरू के सन्मुख होने पर मनुष्य पूरी तरह से अपने घर में टिक जाता है (जहाँ से इसको कोई बेदख़ल नहीं कर सकता। इसकी) सारी ज्ञानेन्द्रियां और पाँचों (दैवी गुण। भाव। सत-संतोख-दया-धर्म-धैर्य) संगी बन जाते हैं। सतिगुरू के शबद को समझ के जो मनुष्य इस (सिर्फ अपने) घर को पा लेता है। नानक उसका सेवक है। 1।
मः 1 ॥
चिलिमिलि बिसीआर दुनीआ फानी ॥
कालूबि अकल मन गोर न मानी ॥
मन कमीन कमतरीन तू दरीआउ खुदाइआ ॥
एकु चीजु मुझै देहि अवर जहर चीज न भाइआ ॥
पुराब खाम कूजै हिकमति खुदाइआ ॥
मन तुआना तू कुदरती आइआ ॥
सग नानक दीबान मसताना नित चड़ै सवाइआ ॥
आतस दुनीआ खुनक नामु खुदाइआ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ बिजली की चमक (की तरह) दुनिया (की चमक) बहुत है। पर है नाश हो जाने वाली। (जिस चमक को देख के) मुझ मूर्ख को मौत याद ही ना रही। मैं कमीना हूँ। मैं बहुत ही बुरा हूँ। पर। हे ख़ुदा ! आप दरिया (-दिल) है; मुझे अपना एक ‘नाम’ दे। और चीज़ें ज़हर (जैसी) हैं। ये मुझे अच्छी नहीं लगतीं। हे ख़ुदा ! (मेरा शरीर) कच्चा कूज़ा (प्याला) है जो पानी से भरा हुआ है। यह आपकी (अजीब) कारीगरी है। (हे ख़ुदा !) आप तुआना (बलवान) है। मैं आपकी कुदरति से (जगत में) आया हूँ। हे ख़ुदा ! नानक आपके दरबार का कुक्ता है और मस्ताना है (मेहर कर। ये मस्ती) नित्य बढ़ती रहे। (क्योंकि) दुनिया आग (की तरह) है और आपका नाम ठंढ डालने वाला है। 2।
पउड़ी नवी मः 5 ॥
सभो वरतै चलतु चलतु वखाणिआ ॥
पारब्रहमु परमेसरु गुरमुखि जाणिआ ॥
लथे सभि विकार सबदि नीसाणिआ ॥
साधू संगि उधारु भए निकाणिआ ॥
सिमरि सिमरि दातारु सभि रंग माणिआ ॥
परगटु भइआ संसारि मिहर छावाणिआ ॥
आपे बखसि मिलाए सद कुरबाणिआ ॥
नानक लए मिलाइ खसमै भाणिआ ॥27॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी नवी महला 5॥ यह सारा (जगत परमात्मा का) तमाशा हो रहा है। इसको तमाशा ही कहा जा सकता है। (इस तमाशे को रचने वाला) पारब्रहम परमात्मा सतिगुरू के माध्यम से जाना जाता है। सतिगुरू के शबद (-रूप) नगारे से सारे विकार उतर जाते हैं (भाग जाते हैं)। सतिगुरू की संगति में (रहने से। विकारों से) बचाव हो जाता है और बेमुथाज हो जाया जाता है। (गुरू की बरकति से) दातार प्रभू को सिमर-सिमर के। (मानो) सारे रंग भोग लेते हैं (भाव। सिमरन के आनंद के मुकाबले में दुनियावी रंग फीके पड़ जाते हैं) (सिमरन करने वाला मनुष्य) जगत में भी प्रकट हो जाता है। प्रभू की मेहर की छतरी (सायबान) उस पर। मानो। तन जाती है। मैं प्रभू से सदके हूँ। वह (गुरू से) खुद ही मेहर करके अपने साथ जोड़ लेता है। हे नानक ! जो लोग पति-प्रभू को प्यारे लगते हैं उनको अपने साथ मिला लेता है। 27।
सलोक मः 1 ॥
धंनु सु कागदु कलम धंनु धनु भांडा धनु मसु ॥
धनु लेखारी नानका जिनि नामु लिखाइआ सचु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मुबारिक है वह कागज़ और कलम। मुबारक है वह दवात और स्याही; और। हे नानक ! मुबारक है वह लिखने वाला जिसने प्रभू का सच्चा नाम लिखाया (प्रभू की सिफत-सालाह लिखाई)। 1।
मः 1 ॥
आपे पटी कलम आपि उपरि लेखु भि तूं ॥
एको कहीऐ नानका दूजा काहे कू ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (हे प्रभू !) आप स्वयं ही तख़्ती (पट्टी) है। आप स्वयं ही कलम है। (पट्टी पर सिफतसालाह का) लेख भी आप स्वयं ही है। हे नानक ! (सिफतसालाह करने-कराने वाला) एक प्रभू को ही कहना चाहिए। और दूसरा कैसे हो सकता है। 2।
पउड़ी ॥
तूं आपे आपि वरतदा आपि बणत बणाई ॥
तुधु बिनु दूजा को नही तू रहिआ समाई ॥
तेरी गति मिति तूहै जाणदा तुधु कीमति पाई ॥
तू अलख अगोचरु अगमु है गुरमति दिखाई ॥
अंतरि अगिआनु दुखु भरमु है गुर गिआनि गवाई ॥
जिसु क्रिपा करहि तिसु मेलि लैहि सो नामु धिआई ॥
तू करता पुरखु अगंमु है रविआ सभ ठाई ॥
जितु तू लाइहि सचिआ तितु को लगै नानक गुण गाई ॥28॥1॥ सुधु
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! जगत की बणतर तूने खुद ही बनाई है और आप खुद ही इसमें हर जगह मौजूद है; आपके जैसा आपके बिना और कोई नहीं। आप ही हर जगह गुप्त बरत रहा है। आप किस तरह का है और कितना बड़ा है- यह बात आप खुद ही जानता है। अपना मूल्य आप स्वयं ही डाल सकता है। आप अदृश्य है। आप (मानवीय) इन्द्रियों की पहुँच से परे है। आप अपहुँच है। गुरू की मति आपके दीदार करवाती है। मनुष्य के अंदर जो अज्ञान। दुख और भटकना है ये गुरू के बताए ज्ञान द्वारा दूर होते हें। हे प्रभू ! जिस पर आप मेहर करता है उसको अपने साथ मिला लेता है वह आपका नाम सिमरता है। आप सबको बनाने वाला है। सब में मौजूद है (फिर भी) अपहुँच है। और है सब जगह व्यापक। हे नानक ! (कह-) हे सच्चे प्रभू ! जिधर आप जीव को लगाता है उधर ही वह लगता है आप (जिसको प्रेरता है) वही आपके गुण गाता है। 28। 1। सुधु।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 1॥ वह है समझदार सतिगुरू पुरख जो हृदय-घर में परमात्मा के रहने की जगह दिखा देता है; (जब मनुष्य) उस घर में (पहुँचता है) तब गुरू का शबद-रूप नगारा बजता है (भाव।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।